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तत्त्वार्थसूत्र
tattvaarthasutra
संक्षिप्त परिचय
आचार्य उमास्वामी (गृद्धपिच्छाचार्य) कृत — सम्पूर्ण जैन दर्शन को संस्कृत सूत्र-शैली में बाँधने वाला युगान्तरकारी ग्रन्थ; 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' से आरम्भ होकर दस अध्यायों में सात तत्त्वों का प्रतिपादन।
जैन परम्परा में सर्वाधिक टीकाएँ इसी पर लिखी गईं — सर्वार्थसिद्धि (पूज्यपाद), राजवार्तिक (अकलंक), श्लोकवार्तिक (विद्यानन्द) आदि। इसे 'मोक्षशास्त्र' भी कहते हैं।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
तत्त्वार्थसूत्र — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १२ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता उमास्वामी; रचना-काल २–३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६७) के अनुसार इनका समय १७९–२४३ है तथा गुरु श्री कुंदकुंद स्वामी। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "तत्त्वार्थसूत्र" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में षट्खण्डागम, कसायपाहुड, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार परिगणित हैं।
तत्त्वार्थसूत्र (tattvaarthasutra) is entry 12 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by उमास्वामी around the 2nd–3rd century CE. The acharya chronology (entry 67) places the author in 179–243, disciple of श्री कुंदकुंद स्वामी, and credits him with "तत्त्वार्थसूत्र". Contemporary works include षट्खण्डागम, कसायपाहुड, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १२ — मूल छायाचित्र