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षट्खण्डागम
shatkhandaagama
संक्षिप्त परिचय
दिगम्बर परम्परा का प्रथम लिपिबद्ध आगम-ग्रन्थ। अंग-ज्ञान के क्रमिक ह्रास को देखकर आचार्य धरसेन ने गिरनार की चन्द्र-गुफा में पुष्पदन्त और भूतबली — इन दो मुनियों को अपना श्रुत-ज्ञान सौंपा; उसी के आधार पर छह खण्डों में यह महान सिद्धान्त-ग्रन्थ रचा गया।
जीव की विविध अवस्थाओं (गुणस्थान, मार्गणा) और कर्म-सिद्धान्त का यह आकर-ग्रन्थ शौरसेनी प्राकृत में है। इसी पर आचार्य वीरसेन ने विशाल धवला टीका लिखी, जिसकी ताड़पत्र प्रतियाँ मूडबिद्री में आज भी सुरक्षित हैं।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
षट्खण्डागम — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. पुष्पदन्त-भूतबली; रचना-काल २वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ५४) के अनुसार इनका समय ६६–१०६ है तथा गुरु श्री धरसेनाचार्य। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "षट्खंडागम" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में कसायपाहुड, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड परिगणित हैं।
षट्खण्डागम (shatkhandaagama) is entry 1 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. पुष्पदन्त-भूतबली around the 2nd century CE. The acharya chronology (entry 54) places the author in 66–106, disciple of श्री धरसेनाचार्य, and credits him with "षट्खंडागम". Contemporary works include कसायपाहुड, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १ — मूल छायाचित्र