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प्रवचनसार
pravachanasaara
संक्षिप्त परिचय
आचार्य कुन्दकुन्द की प्रमुख कृति — ज्ञान, ज्ञेय और चरणानुयोग (आचरण) — इन तीन महाधिकारों में जिन-प्रवचन का सार।
शुद्धोपयोग की महिमा और मुनि-धर्म का हृदयग्राही निरूपण इसकी विशेषता है; अमृतचन्द्र और जयसेन की संस्कृत टीकाएँ तथा पं. हेमराज पाण्डेय की वचनिका उपलब्ध हैं।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
प्रवचनसार — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ४ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. कुन्दकुन्द; रचना-काल २वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६५) के अनुसार इनका समय १२७–१७९ है तथा गुरु श्री जिनचन्द्राचार्य। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "समयसारादि ८४ पाहुड" उल्लिखित है। इसी लेखनी से समयसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड, बारस अणुवेक्खा भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में षट्खण्डागम, कसायपाहुड, मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र परिगणित हैं।
प्रवचनसार (pravachanasaara) is entry 4 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. कुन्दकुन्द around the 2nd century CE. The acharya chronology (entry 65) places the author in 127–179, disciple of श्री जिनचन्द्राचार्य, and credits him with "समयसारादि 84 पाहुड". From the same pen: समयसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड, बारस अणुवेक्खा. Contemporary works include षट्खण्डागम, कसायपाहुड, मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ४ — मूल छायाचित्र