बाह्य ग्रन्थालयों में खोज — नई टैब में खुलेगी
कसायपाहुड
kasaayapaahuda
संक्षिप्त परिचय
आचार्य गुणधर कृत प्राकृत गाथाबद्ध सिद्धान्त-ग्रन्थ, जिसमें क्रोध-मान-माया-लोभ — इन कषायों का अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन है।
षट्खण्डागम के साथ यह दिगम्बर परम्परा की द्वितीय श्रुतधारा माना जाता है; इसी पर वीरसेन-जिनसेन की जयधवला टीका रची गई।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
कसायपाहुड — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. गुणधर; रचना-काल २वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २९) के अनुसार इनका समय पूर्वपाद है तथा गुरु श्री लोहाचार्य। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "कषाय पाहुड" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में षट्खण्डागम, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड परिगणित हैं।
कसायपाहुड (kasaayapaahuda) is entry 2 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. गुणधर around the 2nd century CE. The acharya chronology (entry 29) places the author in पूर्वपाद, disciple of श्री लोहाचार्य, and credits him with "कषाय पाहुड". Contemporary works include षट्खण्डागम, समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २ — मूल छायाचित्र