श्रुतधारा
॥ श्री ॥

भगवती आराधना

bhagavati aaraadhanaa

आ. शिवार्य · ३वीं शती · अभिलेख ११/९०

श्री मित्रनन्दिआ. शिवार्य

संक्षिप्त परिचय

आचार्य शिवार्य (शिवकोटि) कृत विशाल प्राकृत ग्रन्थ — दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप इन चार आराधनाओं का, विशेषतः समाधिमरण की विधि और भावना का विस्तृत निरूपण।

मूलाराधना नाम से भी प्रसिद्ध; साधक के अन्तिम मंगल की अनुपम मार्गदर्शिका।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

भगवती आराधना — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ११ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. शिवार्य; रचना-काल ३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ३५) के अनुसार इनका समय पूर्वपाद है तथा गुरु श्री मित्रनन्दि। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "मूलाराधना" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में तिलोयपण्णत्ति, रत्नकरण्ड श्रावकाचार परिगणित हैं।

भगवती आराधना (bhagavati aaraadhanaa) is entry 11 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. शिवार्य around the 3rd century CE. The acharya chronology (entry 35) places the author in पूर्वपाद, disciple of श्री मित्रनन्दि, and credits him with "मूलाराधना". Contemporary works include तिलोयपण्णत्ति, रत्नकरण्ड श्रावकाचार.

तिलोयपण्णत्तिरत्नकरण्ड श्रावकाचार
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ११ — मूल छायाचित्र