श्रुतधारा
॥ श्री ॥

रत्नकरण्ड श्रावकाचार

ratnakaranda shraavakaachaara

आ. समन्तभद्र · ३–४वीं शती · अभिलेख १३/९०

आ. समन्तभद्रश्री पात्र केसरी स्वामी

संक्षिप्त परिचय

स्वामी समन्तभद्र कृत — गृहस्थ (श्रावक) धर्म का प्रथम व्यवस्थित संस्कृत ग्रन्थ; सम्यग्दर्शन के अंग, बारह व्रत, ग्यारह प्रतिमाएँ और सल्लेखना का सुगम निरूपण।

श्रावकाचार-परम्परा का आदर्श मूल, जिस पर पं. सदासुखदास की प्रसिद्ध हिन्दी वचनिका है।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

रत्नकरण्ड श्रावकाचार — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १३ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. समन्तभद्र; रचना-काल ३–४वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६८) के अनुसार इनका समय १२०–१८५ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ" उल्लिखित है। इसी लेखनी से आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, देवागमस्तोत्र, जिनशतक, द्वात्रिंशिका भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में तिलोयपण्णत्ति, भगवती आराधना परिगणित हैं।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार (ratnakaranda shraavakaachaara) is entry 13 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. समन्तभद्र around the 3rd–4th century CE. The acharya chronology (entry 68) places the author in 120–185, and credits him with "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ". From the same pen: आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, देवागमस्तोत्र, जिनशतक, द्वात्रिंशिका. Contemporary works include तिलोयपण्णत्ति, भगवती आराधना.

आप्तमीमांसायुक्त्यनुशासनस्वयम्भूस्तोत्रदेवागमस्तोत्रजिनशतकद्वात्रिंशिका
तिलोयपण्णत्तिभगवती आराधना
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १३ — मूल छायाचित्र