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श्रुतावतार
shrutaavataara
संक्षिप्त परिचय
श्रुत के अवतरण की कथा — भगवान महावीर से लेकर अंग-ज्ञान के क्रमिक ह्रास और षट्खण्डागम-लेखन तक की परम्परा का ऐतिहासिक निरूपण।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
श्रुतावतार — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ८२ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता इन्द्रनन्दि; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १८५) के अनुसार इनका समय ९३९ है तथा गुरु श्री बप्पनन्दि। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "श्रुतावतार" उल्लिखित है। इसी लेखनी से नीतिसार भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत परिगणित हैं।
श्रुतावतार (shrutaavataara) is entry 82 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by इन्द्रनन्दि around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 185) places the author in 939, disciple of श्री बप्पनन्दि, and credits him with "श्रुतावतार". From the same pen: नीतिसार. Contemporary works include चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ८२ — मूल छायाचित्र