श्रुतधारा
॥ श्री ॥

यशस्तिलकचम्पू

yashastilakachampu

आ. सोमदेव · १०वीं शती · अभिलेख ४५/९०

श्री नेमिदेवआ. सोमदेव

संक्षिप्त परिचय

आचार्य सोमदेव सूरि कृत — गद्य-पद्य मिश्रित चम्पू शैली में यशोधर महाराज की वैराग्य-कथा; अन्तिम आश्वासों का उपासकाध्ययन श्रावकाचार का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

संस्कृत साहित्य की अलंकृत शैली का जैन शिखर।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

यशस्तिलकचम्पू — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ४५ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. सोमदेव; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १८८) के अनुसार इनका समय ९४३–९६८ है तथा गुरु श्री नेमिदेव। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "नीतिवाक्यामृतादि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से नीतिवाक्यामृत भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड परिगणित हैं।

यशस्तिलकचम्पू (yashastilakachampu) is entry 45 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. सोमदेव around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 188) places the author in 943–968, disciple of श्री नेमिदेव, and credits him with "नीतिवाक्यामृतादि". From the same pen: नीतिवाक्यामृत. Contemporary works include चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड.

नीतिवाक्यामृत
चन्द्रप्रभचरितप्रद्युम्नचरितगद्यचिन्तामणिक्षत्रचूड़ामणिगोम्मटसार जीवकाण्डगोम्मटसार कर्मकाण्ड
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ४५ — मूल छायाचित्र