श्रुतधारा
॥ श्री ॥

चन्द्रप्रभचरित

chandraprabhacharita

आ. वीरनन्दि · १०वीं शती · अभिलेख ४१/९०

श्री वसुनन्दि-1आ. वीरनन्दिश्री रत्ननन्दि

संक्षिप्त परिचय

आचार्य वीरनन्दि कृत संस्कृत महाकाव्य — आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का चरित; प्रौढ़ काव्य-शैली के लिये संस्कृत परम्परा में समादृत।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

चन्द्रप्रभचरित — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ४१ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. वीरनन्दि; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १०५) के अनुसार इनका समय ६०९–६३९ है तथा गुरु श्री वसुनन्दि-१। समकालीन ग्रन्थों में प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत, गोम्मटसार जीवकाण्ड परिगणित हैं।

चन्द्रप्रभचरित (chandraprabhacharita) is entry 41 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. वीरनन्दि around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 105) places the author in 609–639, disciple of श्री वसुनन्दि-1. Contemporary works include प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत, गोम्मटसार जीवकाण्ड.

प्रद्युम्नचरितगद्यचिन्तामणिक्षत्रचूड़ामणियशस्तिलकचम्पूनीतिवाक्यामृतगोम्मटसार जीवकाण्ड
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ४१ — मूल छायाचित्र