श्रुतधारा
॥ श्री ॥

गद्यचिन्तामणि

gadyachintaamani

आ. वादीभसिंह · १०वीं शती · अभिलेख ४३/९०

श्री वादिराज-2आ. वादीभसिंह

संक्षिप्त परिचय

आचार्य वादीभसिंह कृत — जीवंधर स्वामी की कथा का अलंकृत संस्कृत गद्य-काव्य; बाण की कादम्बरी-शैली का जैन प्रतिरूप माना जाता है।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

गद्यचिन्तामणि — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ४३ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. वादीभसिंह; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २७०) के अनुसार इनका समय ११०३ है तथा गुरु श्री वादिराज-२। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "स्याद्वादसिद्धि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से क्षत्रचूड़ामणि भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड परिगणित हैं।

गद्यचिन्तामणि (gadyachintaamani) is entry 43 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. वादीभसिंह around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 270) places the author in 1103, disciple of श्री वादिराज-2, and credits him with "स्याद्वादसिद्धि". From the same pen: क्षत्रचूड़ामणि. Contemporary works include चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत, गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड.

क्षत्रचूड़ामणि
चन्द्रप्रभचरितप्रद्युम्नचरितयशस्तिलकचम्पूनीतिवाक्यामृतगोम्मटसार जीवकाण्डगोम्मटसार कर्मकाण्ड
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ४३ — मूल छायाचित्र