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गोम्मटसार कर्मकाण्ड
gommatasaara karmakaanda
संक्षिप्त परिचय
गोम्मटसार का द्वितीय भाग — कर्म-प्रकृतियों, बन्ध-उदय-सत्त्व की गणना का प्राकृत सार; जीवकाण्ड के साथ मिलकर सिद्धान्त-प्रवेश की प्रधान पाठ्य-योजना।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
गोम्मटसार कर्मकाण्ड — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ४८ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. नेमिचन्द्र; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ९४) के अनुसार इनका समय ५५६–५६५ है तथा गुरु श्री प्रभाचन्द्राचार्य-१। इसी लेखनी से गोम्मटसार जीवकाण्ड, द्रव्यसंग्रह, लब्धिसार, क्षपणासार, त्रिलोकसार, जीवतत्त्वप्रदीपिका भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत परिगणित हैं।
गोम्मटसार कर्मकाण्ड (gommatasaara karmakaanda) is entry 48 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. नेमिचन्द्र around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 94) places the author in 556–565, disciple of श्री प्रभाचन्द्राचार्य-1. From the same pen: गोम्मटसार जीवकाण्ड, द्रव्यसंग्रह, लब्धिसार, क्षपणासार, त्रिलोकसार, जीवतत्त्वप्रदीपिका. Contemporary works include चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ४८ — मूल छायाचित्र