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बारस अणुवेक्खा
baarasa anuvekkhaa
संक्षिप्त परिचय
आचार्य कुन्दकुन्द कृत — अनित्य, अशरण, संसार आदि बारह अनुप्रेक्षाओं (भावनाओं) का प्राकृत गाथाओं में चिन्तन।
वैराग्य-भावना के अभ्यास का आधार-ग्रन्थ।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
बारस अणुवेक्खा — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ८ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. कुन्दकुन्द; रचना-काल २वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६५) के अनुसार इनका समय १२७–१७९ है तथा गुरु श्री जिनचन्द्राचार्य। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "समयसारादि ८४ पाहुड" उल्लिखित है। इसी लेखनी से समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में षट्खण्डागम, कसायपाहुड, मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र परिगणित हैं।
बारस अणुवेक्खा (baarasa anuvekkhaa) is entry 8 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. कुन्दकुन्द around the 2nd century CE. The acharya chronology (entry 65) places the author in 127–179, disciple of श्री जिनचन्द्राचार्य, and credits him with "समयसारादि 84 पाहुड". From the same pen: समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, अष्टपाहुड. Contemporary works include षट्खण्डागम, कसायपाहुड, मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ८ — मूल छायाचित्र