श्रुतधारा
॥ श्री ॥

समयसार कलश

samayasaara kalasha

अमृतचन्द्राचार्य · १०वीं शती · अभिलेख ९०/९०

अमृतचन्द्राचार्यश्री सिंहाचार्य

संक्षिप्त परिचय

आचार्य अमृतचन्द्र कृत — आत्मख्याति टीका के मध्य रचे गये संस्कृत कलश-काव्य; समयसार के अध्यात्म को छन्दोबद्ध उल्लास में गाने वाले २७८ कलश।

पं. बनारसीदास के नाटक समयसार और राजमल पाण्डेय की बालबोधिनी टीका की प्रेरणा-भूमि।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

समयसार कलश — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ९० पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता अमृतचन्द्राचार्य; रचना-काल १०वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १६९) के अनुसार इनका समय ९०५–९५५ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "आत्मख्याति पुरुषार्थसिद्ध्युपाय आदि" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत परिगणित हैं।

समयसार कलश (samayasaara kalasha) is entry 90 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by अमृतचन्द्राचार्य around the 10th century CE. The acharya chronology (entry 169) places the author in 905–955, and credits him with "आत्मख्याति पुरुषार्थसिद्ध्युपाय आदि". Contemporary works include चन्द्रप्रभचरित, प्रद्युम्नचरित, गद्यचिन्तामणि, क्षत्रचूड़ामणि, यशस्तिलकचम्पू, नीतिवाक्यामृत.

चन्द्रप्रभचरितप्रद्युम्नचरितगद्यचिन्तामणिक्षत्रचूड़ामणियशस्तिलकचम्पूनीतिवाक्यामृत
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ९० — मूल छायाचित्र