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सागरधर्मामृत
saagaradharmaamrita
संक्षिप्त परिचय
पं. आशाधर कृत धर्मामृत का गृहस्थ-भाग — सागार (गृहस्थ) के व्रत-आचरण का शास्त्रीय निरूपण, स्वोपज्ञ टीकाओं सहित।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
सागरधर्मामृत — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६३ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आशाधर; रचना-काल १३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ३७) के अनुसार इनका समय ११७३–१२४३ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "अनगारधर्मामृत" उल्लिखित है। इसी लेखनी से अनगारधर्मामृत, श्रावकाचार, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत भी इस सूची में सम्मिलित हैं।
सागरधर्मामृत (saagaradharmaamrita) is entry 63 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आशाधर around the 13th century CE. The acharya chronology (entry 37) places the author in 1173–1243, and credits him with "अनगारधर्मामृत". From the same pen: अनगारधर्मामृत, श्रावकाचार, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६३ — मूल छायाचित्र