श्रुतधारा
॥ श्री ॥

अनगारधर्मामृत

anagaaradharmaamrita

आशाधर · १३वीं शती · अभिलेख ६४/९०

आशाधर

संक्षिप्त परिचय

पं. आशाधर कृत धर्मामृत का मुनि-भाग — अनगार (मुनि) धर्म के मूलगुण-उत्तरगुणों का विस्तृत विवेचन; गृहस्थ पण्डित द्वारा रचित होकर भी मुनि-परम्परा में प्रमाण-रूप से मान्य।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

अनगारधर्मामृत — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६४ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आशाधर; रचना-काल १३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ३७) के अनुसार इनका समय ११७३–१२४३ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "अनगारधर्मामृत" उल्लिखित है। इसी लेखनी से सागरधर्मामृत, श्रावकाचार, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत भी इस सूची में सम्मिलित हैं।

अनगारधर्मामृत (anagaaradharmaamrita) is entry 64 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आशाधर around the 13th century CE. The acharya chronology (entry 37) places the author in 1173–1243, and credits him with "अनगारधर्मामृत". From the same pen: सागरधर्मामृत, श्रावकाचार, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत.

सागरधर्मामृतश्रावकाचारमहाभिषेकजिनयज्ञकल्पधर्मामृत
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६४ — मूल छायाचित्र