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परीक्षामुखवृत्ति
parikshaamukhavritti
संक्षिप्त परिचय
आचार्य अनन्तवीर्य कृत — माणिक्यनन्दि के परीक्षामुख सूत्रों की सुगम वृत्ति; प्रमेयरत्नमाला नाम से न्याय-अध्ययन की प्रवेशिका रूप में प्रसिद्ध।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
परीक्षामुखवृत्ति — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६२ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता अनन्तवीर्य; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २०७) के अनुसार इनका समय ९७५–१०२५ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "द्रविड संघी सिद्धि विनिश्चयवृत्ति" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र परिगणित हैं।
परीक्षामुखवृत्ति (parikshaamukhavritti) is entry 62 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by अनन्तवीर्य around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 207) places the author in 975–1025, and credits him with "द्रविड संघी सिद्धि विनिश्चयवृत्ति". Contemporary works include धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६२ — मूल छायाचित्र