श्रुतधारा
॥ श्री ॥

श्रावकाचार

shraavakaachaara

आशाधर · १३वीं शती · अभिलेख ६५/९०

आशाधर

संक्षिप्त परिचय

पं. आशाधर की श्रावक-धर्म विषयक रचना — सागारधर्मामृत की धारा में गृहस्थ के व्रत-आचरण का निरूपण।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

श्रावकाचार — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६५ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आशाधर; रचना-काल १३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ३७) के अनुसार इनका समय ११७३–१२४३ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "अनगारधर्मामृत" उल्लिखित है। इसी लेखनी से सागरधर्मामृत, अनगारधर्मामृत, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत भी इस सूची में सम्मिलित हैं।

श्रावकाचार (shraavakaachaara) is entry 65 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आशाधर around the 13th century CE. The acharya chronology (entry 37) places the author in 1173–1243, and credits him with "अनगारधर्मामृत". From the same pen: सागरधर्मामृत, अनगारधर्मामृत, महाभिषेक, जिनयज्ञकल्प, धर्मामृत.

सागरधर्मामृतअनगारधर्मामृतमहाभिषेकजिनयज्ञकल्पधर्मामृत
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६५ — मूल छायाचित्र