बाह्य ग्रन्थालयों में खोज — नई टैब में खुलेगी
देवागमस्तोत्र
devaagamastotra
संक्षिप्त परिचय
'देवागम-नभोयान...' से आरम्भ होने वाला स्वामी समन्तभद्र का दार्शनिक स्तोत्र — आप्तमीमांसा इसी का प्रसिद्ध नाम है; सच्चे आप्त की पहचान बाह्य विभूति से नहीं, वीतरागता और युक्तिशास्त्राविरोधी वचन से।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
देवागमस्तोत्र — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १७ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. समन्तभद्र; रचना-काल ४वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६८) के अनुसार इनका समय १२०–१८५ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ" उल्लिखित है। इसी लेखनी से रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, जिनशतक, द्वात्रिंशिका भी इस सूची में सम्मिलित हैं।
देवागमस्तोत्र (devaagamastotra) is entry 17 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. समन्तभद्र around the 4th century CE. The acharya chronology (entry 68) places the author in 120–185, and credits him with "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ". From the same pen: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, जिनशतक, द्वात्रिंशिका.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १७ — मूल छायाचित्र