श्रुतधारा
॥ श्री ॥

तिलोयपण्णत्ति

tiloyapannatti

आ. यतिवृषभ · ३वीं शती · अभिलेख १०/९०

श्री नागहस्तिआ. यतिवृषभ

संक्षिप्त परिचय

आचार्य यतिवृषभ कृत 'त्रिलोक-प्रज्ञप्ति' — तीनों लोकों की रचना, द्वीप-समुद्र, ज्योतिष्क, नरक-स्वर्ग आदि का गणना-प्रधान प्राकृत ग्रन्थ।

जैन भूगोल-खगोल और गणित की दृष्टि से अमूल्य आकर।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

तिलोयपण्णत्ति — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १० पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. यतिवृषभ; रचना-काल ३वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६३) के अनुसार इनका समय १४३–१७३ है तथा गुरु श्री नागहस्ति। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "कषायपाहुड" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में भगवती आराधना, रत्नकरण्ड श्रावकाचार परिगणित हैं।

तिलोयपण्णत्ति (tiloyapannatti) is entry 10 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. यतिवृषभ around the 3rd century CE. The acharya chronology (entry 63) places the author in 143–173, disciple of श्री नागहस्ति, and credits him with "कषायपाहुड". Contemporary works include भगवती आराधना, रत्नकरण्ड श्रावकाचार.

भगवती आराधनारत्नकरण्ड श्रावकाचार
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १० — मूल छायाचित्र