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द्वात्रिंशिका
dvaatrinshikaa
संक्षिप्त परिचय
बत्तीस-बत्तीस पद्यों की स्तुति-रचनाओं की प्रतिष्ठित परम्परा का ग्रन्थ — स्तुति के माध्यम से तत्त्व-निरूपण।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
द्वात्रिंशिका — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक १९ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. समन्तभद्र; रचना-काल ४वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ६८) के अनुसार इनका समय १२०–१८५ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ" उल्लिखित है। इसी लेखनी से रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, देवागमस्तोत्र, जिनशतक भी इस सूची में सम्मिलित हैं।
द्वात्रिंशिका (dvaatrinshikaa) is entry 19 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. समन्तभद्र around the 4th century CE. The acharya chronology (entry 68) places the author in 120–185, and credits him with "आप्तमीमांसा/आदि अनेकग्रंथ". From the same pen: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्वयम्भूस्तोत्र, देवागमस्तोत्र, जिनशतक.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति १९ — मूल छायाचित्र