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परीक्षामुख
parikshaamukha
संक्षिप्त परिचय
आचार्य माणिक्यनन्दि कृत — जैन न्याय का प्रथम सुव्यवस्थित सूत्र-ग्रन्थ; प्रमाण के लक्षण, भेद, विषय और फल का संक्षिप्त निर्दोष निरूपण।
अकलंक-वाङ्मय का यह सूत्रबद्ध नवनीत कहा जाता है।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
परीक्षामुख — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६१ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता माणिक्यनन्दि; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ११४) के अनुसार इनका समय ६६३–६७९ है तथा गुरु श्री रत्ननन्दि। समकालीन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र परिगणित हैं।
परीक्षामुख (parikshaamukha) is entry 61 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by माणिक्यनन्दि around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 114) places the author in 663–679, disciple of श्री रत्ननन्दि. Contemporary works include धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६१ — मूल छायाचित्र