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वर्धमानचरित
vardhamaanacharita
संक्षिप्त परिचय
भगवान महावीर के चरित की काव्य-परम्परा का ग्रन्थ — सूची में असग-कृत वर्धमान-चरित दो क्रमांकों (39 एवं 57) पर अंकित है, जो स्रोत की ही व्यवस्था है।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
वर्धमानचरित — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ५७ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता असग; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २१५) के अनुसार इनका समय ९८८ है तथा गुरु श्री नागनन्दि। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "वर्द्धमान चरित्र" उल्लिखित है। इसी लेखनी से वर्धमानचरित्र, शांतिनाथपुराण भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड परिगणित हैं।
वर्धमानचरित (vardhamaanacharita) is entry 57 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by असग around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 215) places the author in 988, disciple of श्री नागनन्दि, and credits him with "वर्द्धमान चरित्र". From the same pen: वर्धमानचरित्र, शांतिनाथपुराण. Contemporary works include धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ५७ — मूल छायाचित्र