श्रुतधारा
॥ श्री ॥

सुभाषितरत्नसंदोह

subhaashitaratnasandoha

अमितगति · ११वीं शती · अभिलेख ५६/९०

श्री देवसेन सूरिअमितगतिश्री गोपसेन

संक्षिप्त परिचय

आचार्य अमितगति कृत — नीति, वैराग्य और धर्म के संस्कृत सुभाषितों का रत्न-संग्रह।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

सुभाषितरत्नसंदोह — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ५६ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता अमितगति; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १७८) के अनुसार इनका समय ९२३–९६३ है तथा गुरु श्री देवसेन सूरि। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "षट्त्रिंशितिका योगसार प्राभृत, मरणकंडिका आदि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड, परीक्षामुख, परीक्षामुखवृत्ति परिगणित हैं।

सुभाषितरत्नसंदोह (subhaashitaratnasandoha) is entry 56 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by अमितगति around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 178) places the author in 923–963, disciple of श्री देवसेन सूरि, and credits him with "षट्त्रिंशितिका योगसार प्राभृत, मरणकंडिका आदि". From the same pen: धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार. Contemporary works include वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड, परीक्षामुख, परीक्षामुखवृत्ति.

धर्मपरीक्षाश्रावकाचार
वर्धमानचरितपार्श्वनाथचरितन्यायकुमुदचन्द्रप्रमेयकमलमार्तण्डपरीक्षामुखपरीक्षामुखवृत्ति
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ५६ — मूल छायाचित्र