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प्रमेयकमलमार्तण्ड
prameyakamalamaartanda
संक्षिप्त परिचय
आचार्य प्रभाचन्द्र कृत — माणिक्यनन्दि के परीक्षामुख सूत्रों पर विस्तृत टीका; प्रमेय-रूपी कमलों को विकसित करने वाला 'मार्तण्ड' (सूर्य)।
जैन न्याय के अध्ययन की केन्द्रीय पाठ्य-कृति।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
प्रमेयकमलमार्तण्ड — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ६० पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता प्रभाचन्द्र; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ९२) के अनुसार इनका समय ५३१–५५६ है तथा गुरु श्री लोकचन्द्राचार्य। इसी लेखनी से न्यायकुमुदचन्द्र भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, परीक्षामुख परिगणित हैं।
प्रमेयकमलमार्तण्ड (prameyakamalamaartanda) is entry 60 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by प्रभाचन्द्र around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 92) places the author in 531–556, disciple of श्री लोकचन्द्राचार्य. From the same pen: न्यायकुमुदचन्द्र. Contemporary works include धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, परीक्षामुख.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ६० — मूल छायाचित्र