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धर्मपरीक्षा
dharmaparikshaa
संक्षिप्त परिचय
आचार्य अमितगति कृत संस्कृत कथा-काव्य — मनोवेग और पवनवेग के व्याज से पौराणिक मिथ्या मान्यताओं की विनोदपूर्ण तार्किक परीक्षा।
व्यंग्य के माध्यम से तत्त्व-बोध कराने वाली अनूठी शैली।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
धर्मपरीक्षा — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ५४ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता अमितगति; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १७८) के अनुसार इनका समय ९२३–९६३ है तथा गुरु श्री देवसेन सूरि। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "षट्त्रिंशितिका योगसार प्राभृत, मरणकंडिका आदि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड, परीक्षामुख, परीक्षामुखवृत्ति परिगणित हैं।
धर्मपरीक्षा (dharmaparikshaa) is entry 54 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by अमितगति around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 178) places the author in 923–963, disciple of श्री देवसेन सूरि, and credits him with "षट्त्रिंशितिका योगसार प्राभृत, मरणकंडिका आदि". From the same pen: श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह. Contemporary works include वर्धमानचरित, पार्श्वनाथचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड, परीक्षामुख, परीक्षामुखवृत्ति.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ५४ — मूल छायाचित्र