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जीवंधरचरित
jivandharacharita
संक्षिप्त परिचय
आचार्य वादिराज कृत — क्षत्रिय-शिरोमणि जीवंधर स्वामी की कथा; वैराग्य-परिणत वीर-कथा की जैन परम्परा का लोकप्रिय काव्य।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
जीवंधरचरित — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ७३ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता वादिराज; रचना-काल ११वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २३१) के अनुसार इनका समय १०१०–१०६५ है तथा गुरु श्री मतिसागर। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "एकीभाव स्तोत्र" उल्लिखित है। इसी लेखनी से पार्श्वनाथचरित भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड परिगणित हैं।
जीवंधरचरित (jivandharacharita) is entry 73 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by वादिराज around the 11th century CE. The acharya chronology (entry 231) places the author in 1010–1065, disciple of श्री मतिसागर, and credits him with "एकीभाव स्तोत्र". From the same pen: पार्श्वनाथचरित. Contemporary works include धर्मपरीक्षा, श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, वर्धमानचरित, न्यायकुमुदचन्द्र, प्रमेयकमलमार्तण्ड.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ७३ — मूल छायाचित्र