श्रुतधारा
॥ श्री ॥

तत्त्वार्थवृत्ति

tattvaarthavritti

आ. पूज्यपाद · ५वीं शती · अभिलेख २०/९०

आ. पूज्यपाद

संक्षिप्त परिचय

आचार्य पूज्यपाद की तत्त्वार्थसूत्र-वृत्ति — इनकी प्रसिद्ध सर्वार्थसिद्धि टीका से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध रचना।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

तत्त्वार्थवृत्ति — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २० पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. पूज्यपाद; रचना-काल ५वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ८९) के अनुसार इनका समय ४६४–५२४ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "इष्टोपदेश सर्वार्थसिद्धि आदि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में सिद्धिविनिश्चय, न्यायावतार परिगणित हैं।

तत्त्वार्थवृत्ति (tattvaarthavritti) is entry 20 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. पूज्यपाद around the 5th century CE. The acharya chronology (entry 89) places the author in 464–524, and credits him with "इष्टोपदेश सर्वार्थसिद्धि आदि". From the same pen: सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण. Contemporary works include सिद्धिविनिश्चय, न्यायावतार.

सर्वार्थसिद्धिसमाधितन्त्रइष्टोपदेशजैनेन्द्रव्याकरण
सिद्धिविनिश्चयन्यायावतार
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २० — मूल छायाचित्र