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जैनेन्द्रव्याकरण
jainendravyaakarana
संक्षिप्त परिचय
आचार्य पूज्यपाद कृत संस्कृत व्याकरण — जैन परम्परा का अपना स्वतन्त्र शब्दानुशासन, जिससे 'जैनेन्द्र' प्रक्रिया चली।
पाणिनीय परम्परा से संक्षिप्ततर सूत्र-पद्धति इसकी विशेषता है।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
जैनेन्द्रव्याकरण — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २४ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. पूज्यपाद; रचना-काल ५वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ८९) के अनुसार इनका समय ४६४–५२४ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "इष्टोपदेश सर्वार्थसिद्धि आदि" उल्लिखित है। इसी लेखनी से तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में सिद्धिविनिश्चय, न्यायावतार परिगणित हैं।
जैनेन्द्रव्याकरण (jainendravyaakarana) is entry 24 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. पूज्यपाद around the 5th century CE. The acharya chronology (entry 89) places the author in 464–524, and credits him with "इष्टोपदेश सर्वार्थसिद्धि आदि". From the same pen: तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश. Contemporary works include सिद्धिविनिश्चय, न्यायावतार.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २४ — मूल छायाचित्र