श्रुतधारा
॥ श्री ॥

सिद्धिविनिश्चय

siddhivinishchaya

आ. देवनन्दि · ५वीं शती · अभिलेख २५/९०

श्री यशोनन्दिआ. देवनन्दिश्री जयनन्दि

संक्षिप्त परिचय

जैन न्याय-परम्परा का विनिश्चय-ग्रन्थ — प्रमाण, नय और सिद्धियों के स्वरूप का तर्क-पुरस्सर निर्णय; इसी नाम की रचना अकलंक-परम्परा में भी अत्यन्त प्रसिद्ध रही है।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

सिद्धिविनिश्चय — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २५ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. देवनन्दि; रचना-काल ५वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ७८) के अनुसार इनका समय ३३६–३८६ है तथा गुरु श्री यशोनन्दि। समकालीन ग्रन्थों में तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण, न्यायावतार परिगणित हैं।

सिद्धिविनिश्चय (siddhivinishchaya) is entry 25 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. देवनन्दि around the 5th century CE. The acharya chronology (entry 78) places the author in 336–386, disciple of श्री यशोनन्दि. Contemporary works include तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण, न्यायावतार.

तत्त्वार्थवृत्तिसर्वार्थसिद्धिसमाधितन्त्रइष्टोपदेशजैनेन्द्रव्याकरणन्यायावतार
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २५ — मूल छायाचित्र