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न्यायावतार
nyaayaavataara
संक्षिप्त परिचय
आचार्य सिद्धसेन कृत — बत्तीस श्लोकों में प्रमाण-लक्षण का अवतरण; जैन न्याय के प्राचीनतम प्रवेश-ग्रन्थों में परिगणित।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
न्यायावतार — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २६ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. सिद्धसेन; रचना-काल ५वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक ९६) के अनुसार इनका समय ५६८ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "दिगम्बराचार्य सम्मइसुत्तं ग्रंथ के कर्ता" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण, सिद्धिविनिश्चय परिगणित हैं।
न्यायावतार (nyaayaavataara) is entry 26 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. सिद्धसेन around the 5th century CE. The acharya chronology (entry 96) places the author in 568, and credits him with "दिगम्बराचार्य सम्मइसुत्तं ग्रंथ के कर्ता". Contemporary works include तत्त्वार्थवृत्ति, सर्वार्थसिद्धि, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, जैनेन्द्रव्याकरण, सिद्धिविनिश्चय.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २६ — मूल छायाचित्र