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जयधवला
jayadhavalaa
संक्षिप्त परिचय
कसायपाहुड पर वीरसेन स्वामी द्वारा आरम्भ और शिष्य जिनसेन द्वारा पूर्ण की गई महाटीका — कषाय-सिद्धान्त का अगाध समुद्र।
— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.
अभिलेख-विवरण
जयधवला — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ३६ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. वीरसेन-जिनसेन; रचना-काल ९वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १४५) के अनुसार इनका समय ७७०–८२७ है तथा गुरु श्री एलाचार्य स्वामी। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "धवलाटीका आदि १,००,००० श्लोक प्रमाण टीका के कर्ता" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में आदिपुराण, महापुराण (उत्तरपुराण), धवला, महाधवला, आदिपुराण (संस्कृत पूर्ति), वर्धमानचरित्र परिगणित हैं।
जयधवला (jayadhavalaa) is entry 36 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. वीरसेन-जिनसेन around the 9th century CE. The acharya chronology (entry 145) places the author in 770–827, disciple of श्री एलाचार्य स्वामी, and credits him with "धवलाटीका आदि 1,00,000 श्लोक प्रमाण टीका के कर्ता". Contemporary works include आदिपुराण, महापुराण (उत्तरपुराण), धवला, महाधवला, आदिपुराण (संस्कृत पूर्ति), वर्धमानचरित्र.
प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ३६ — मूल छायाचित्र