श्रुतधारा
॥ श्री ॥

हरिवंशपुराण

harivanshapuraana

आ. जिनसेन · ८वीं शती · अभिलेख ३२/९०

आ. जिनसेनश्री गुणभद्राचार्य-1

संक्षिप्त परिचय

आचार्य जिनसेन (पुन्नाटसंघी) कृत संस्कृत महापुराण — बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ, कृष्ण-बलराम और हरिवंश की कथा का जैन दृष्टि से प्रथम विस्तृत निरूपण।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

हरिवंशपुराण — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ३२ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. जिनसेन; रचना-काल ८वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १३४) के अनुसार इनका समय ७४८–८१८ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "हरिवंशपुराण" उल्लिखित है। इसी लेखनी से आदिपुराण भी इस सूची में सम्मिलित है। समकालीन ग्रन्थों में लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थराजवार्तिक, न्यायविनिश्चय, प्रमाणसंग्रह, अष्टशती परिगणित हैं।

हरिवंशपुराण (harivanshapuraana) is entry 32 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. जिनसेन around the 8th century CE. The acharya chronology (entry 134) places the author in 748–818, and credits him with "हरिवंशपुराण". From the same pen: आदिपुराण. Contemporary works include लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थराजवार्तिक, न्यायविनिश्चय, प्रमाणसंग्रह, अष्टशती.

आदिपुराण
लघीयस्त्रयतत्त्वार्थराजवार्तिकन्यायविनिश्चयप्रमाणसंग्रहअष्टशती
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ३२ — मूल छायाचित्र