श्रुतधारा
॥ श्री ॥

न्यायविनिश्चय

nyaayavinishchaya

आ. अकलंक · ८वीं शती · अभिलेख २९/९०

श्री गण्डविमुक्तदेव-1आ. अकलंक

संक्षिप्त परिचय

भट्ट अकलंकदेव कृत — प्रत्यक्ष, अनुमान और प्रवचन इन तीन प्रस्तावों में जैन प्रमाण-व्यवस्था का निश्चय; बौद्ध न्याय के साथ गम्भीर संवाद।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

न्यायविनिश्चय — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक २९ पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता आ. अकलंक; रचना-काल ८वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक २९५) के अनुसार इनका समय ११५८–११८२ है तथा गुरु श्री गण्डविमुक्तदेव-१। इसी लेखनी से लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थराजवार्तिक, प्रमाणसंग्रह, अष्टशती भी इस सूची में सम्मिलित हैं। समकालीन ग्रन्थों में हरिवंशपुराण परिगणित हैं।

न्यायविनिश्चय (nyaayavinishchaya) is entry 29 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by आ. अकलंक around the 8th century CE. The acharya chronology (entry 295) places the author in 1158–1182, disciple of श्री गण्डविमुक्तदेव-1. From the same pen: लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थराजवार्तिक, प्रमाणसंग्रह, अष्टशती. Contemporary works include हरिवंशपुराण.

लघीयस्त्रयतत्त्वार्थराजवार्तिकप्रमाणसंग्रहअष्टशती
हरिवंशपुराण
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति २९ — मूल छायाचित्र