श्रुतधारा
॥ श्री ॥

वरांगचरित

varaangacharita

जटासिंहनन्दि · ७वीं शती · अभिलेख ७०/९०

जटासिंहनन्दि

संक्षिप्त परिचय

आचार्य जटासिंहनन्दि कृत — राजकुमार वरांग के चरित के माध्यम से श्रावक-मुनि धर्म का काव्यमय निरूपण; संस्कृत जैन काव्य-परम्परा का प्राचीन रत्न।

— सम्पादकीय परिचय; नीचे की तालिका-सामग्री मूल स्रोतों से अक्षरशः है। · Editorial summary; all list data is verbatim from the sources.

अभिलेख-विवरण

वरांगचरित — दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के ९० प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों की कालानुक्रमिक सूची में क्रमांक ७० पर अंकित ग्रन्थ है। रचयिता जटासिंहनन्दि; रचना-काल ७वीं शती (लगभग)। आचार्य-समयानुक्रमणिका (क्रमांक १२१) के अनुसार इनका समय ई.श. ७–८ है। वहाँ इनकी विशेषता/प्रधान कृति के रूप में "वरांगचरित" उल्लिखित है। समकालीन ग्रन्थों में पद्मपुराण परिगणित हैं।

वरांगचरित (varaangacharita) is entry 70 in the chronological list of the 90 principal ancient granths of the Digambar Jain tradition, composed by जटासिंहनन्दि around the 7th century CE. The acharya chronology (entry 121) places the author in ई.श. 7–8, and credits him with "वरांगचरित". Contemporary works include पद्मपुराण.

पद्मपुराण
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प्रमाण: ९०-ग्रन्थ सूची-पोस्टर, पंक्ति ७० — मूल छायाचित्र