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श्रुतधारा
॥ श्री ॥

देवागमस्तोत्र

आ. समन्तभद्र · प्राकृतम्/हिन्दी · ६३ पद्य · ~९ मिनट

सम्पादकीय —स्वस्तिश्री कमर्योगी पीठाधीश रवीन्द्रकीतिर् स्वामी Ô नमो मंगलं कुयार्त्, ह्रीं नमश्चाापि मंगलम्। मोक्षबीजं महामंत्रं, अर्हं नम: सुमंगलम्।। ‘‘स्वाध्याय: परमं तप:’’ आचार्यों ने स्वाध्याय को परम तप कहा है। स्वाध्याय करने से ज्ञान की वृद्धि होती है। नई-नई बातें का ज्ञान होता है। कर्मों की निजर्रा होती है। श्रावक के षट्कतर्व्यें म्ें स्वाध्याय को लिया है- देवपूजा-गु®पास्ति-स्वाध्याय-संयमस्तप:। दानं चेति गृहस्थाणां षट्कमार्णि दिने-दिने।। देवपूजा, गु®आW की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान ये षट्कायर् श्रावकें को प्रतिदिन करते रहना चाहिए। तभी उनका गृहस्थ धमर् सफल माना है। कसायपाहुÌड सूत्रग्रांथ की जयधवला टीका म्ें श्री वीरसेनाचायर् ने कहा है- णाणं पयासओ तवो सोहओ संजमो य गुत्तियरो। तिण्हं पि समाजोए मोक्खो जिणसासणे भणिदं।। अथार्त् ज्ञान स्व-पर प्रकाशक होता है तप से आत्म तòव का शोधन होता है तथा संयम से आत्मा की रक्षा होती है एवं इन तीनें के संयोग-एकीकरण से प्राप्त अवस्था को जिनशासन म्ें मोक्ष की संज्ञा प्रदान की गई है। जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी, वतर्मान म्ें १२०० पीच्छीधारी साधुआW म्ें सबसे प्राचीन दीक्षित, ज्ञान म्ें वयोवृद्ध, ३०० ग्रांथें की लेखिका, सरस्वती की प्रतिकृति, न्याय प्रभाकर, सिद्धान्त वाचस्पति परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा अनुवादित यह ‘आप्तमीमांसा’ ग्रांथ आपके हाथ म्ें आ रहा है। यह न्याय का ग्रांथ ताविर्ककविद्वान श्री समन्तभद्र स्वामी द्वारा रचित है। जिन्हेंने भगवान की भी परीक्षा करके, उन्हW कसौटी पर कस करके नमस्कार किया है। जब जिनधमर् के सर्वोदयी सिद्धान्तें के साथ एकांतवादी मतावलम्बियें के द्वारा अन्यायजनक प्रतिपादन होता है, तब अनेकांत स्याद्वाद शैली म्ें जैनाचायर् उसका खण्डन करके न्याय का पक्ष पु° करते हQ। आप्तमीमांसा एक चमत्कारिक काव्य रचना है। इसम्ें आप्त किस प्रकार होना चाहिए ? आप्त म्ें किन गुणें की आवश्यकता है ? इस बात की सुन्दर मीमांसा की गई है। इसलिए इसका आप्तमीमांसा नाम साथर्क है। ‘देवागम’ पद ( ३ ) ( ४ ) से प्रारंभ होने से इसका देवागम स्तोत्र भी नाम है। प्रारंभ म्ें जब मQ माता जी के पास आया, तब माताजी ने मुझे अ°सहœाी के सारांश रटवा कर शाŒाी की परीक्षा दिलाई थी, जिसम्ें मQने प्रथम श्रोणी म्ें उत्तीणर्ता प्राप्त की थी। जब पूज्य माताजी ने सन् १९६९-७० म्ें अ°सहœाी ग्रांथ का अनुवाद किया, उसी समय इस ग्रांथ का पद्यानुवाद किया था, लेकिन अभी तक इस ग्रांथ के छपने का योग नहाR आ पाया था। अब इस न्याय ग्रांथ के प्रकाशन का योग आया है। आप सभी इस न्याय ग्रांथ को पÌढकर अपनी आत्मा के साथ न्याय करने की प्रि›ाâया म्ें निष्णात बन्ें, यह मंगल भावना है। वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला निरंतर वृद्धि करते हुए चिरकाल तक इसी प्रकार सत्साहित्य प्रकाशित करता रहे, यही जिनेन्द्र देव से प्राथर्ना है। पूज्य माताजी चिरायु हें, स्वस्थ रहW और अपने आगम चक्षु से हम सभी को सम्यग्ज्ञान प्रदान करती रहW, यही मंगल भावना है। N : श्
प्रस्तावना —प्रज्ञाश्रामणी आयिर्का चन्दनामती प्रस्तुत ‘देवागम स्तोत्र’ नामक कृति का दूसरा नाम ‘आप्तमीमांसा’ भी है। ‘‘देवागम नभोयानचामरादिविभूतय:’’ इत्यादि शब्दें से अपने द्वारा प्रारंभ किये गये स्तोत्र को श्री समन्तभद्राचायर् ने ‘देवागमस्तोत्र’ नाम दिया और चूँकि इस पूरे स्तोत्र म्ें उन्हेंने आप्त-भगवान की परीक्षा करके अपनी श्राद्धा और गुणज्ञता के बल पर अर्हन्त भगवान को ही सच्चा आप्त सिद्ध किया है। जिनधर्मी होने के नाते उन्हेंने जिनेन्द्र भगवान को सच्चा आप्त माना हो, एेसा नहाR है, प्रत्युत उन्हेंने सवर्ज्ञता, वीतरागता और हितोपदेशिता इन तीन सवर्जनदुलर्भ गुणें के आधार पर जब भिVा-भिVा मतावलम्बी देवताआW को कसौटी पर परखना शु™ किया तो तीनें गुण एक जगह कहाR भी न दिखने के कारण उन्हW निराश होना पÌडा और जब उन्हेंने चार घातिया कर्मों को न° कर देने वाले अर्हन्त भगवान को सूक्ष्मता से देखा तो उनम्ें उपर्युक्त तीनें गुणें के साथ-साथ अनन्तगुणें का भण्डार भरा हुआ पाया, इसलिए अपने को धन्य मानते हुए श्री समन्तभद्राचायर् जैसे महान ताविर्कक विद्वान् ने अर्हन्त भगवान के अपरिमित गुणें से संसार को भी परिचित कराने हेतु ही ११४ कारिका (श्लोक) म्ें मानो इस ग्रांथ की रचना करके सम्पूणर् स्याद्वाद सिद्धान्त को इसम्ें गागर म्ें सागर के समान ही नहाR, राई के अंदर पवर्त भरने के समान महत्तम कायर् कर दिया है। इस पुस्तक म्ें ११४ कारिकाआW म्ें कुल १० परिच्छेद (अध्याय हQ)। जिनम्ें भाव-अभाव, द्वैत-अद्वैत, नित्य-आfनत्य आदि १० प्रकरणें के अन्दर एकान्त पक्षें का निराकरण करके सवर्त्र स्याद्वाद प्रि›ाâया से वस्तुतòव को समझाया गया है। आप्तमीमांसा स्तोत्र की मूलरचना तòवाथर्सूत्र के मंगलाचरण-मोक्षमागर्स्य नेत्तारं भेत्तारं.......इत्यादि के आधार पर हुई है। अथार्त् परमपूज्य आचायर् श्री उमास्वामी मुनिराज के इस मंगलाचरण को ùदय म्ें धारण करके श्री समन्तभद्राचायर् ने उन मोक्षमागर् के नेता और कमर् पवर्तें के भेत्ता भगवान को सत्य ही कसौटी पर कसते हुए के समान अपने तवर्क एवं प्रमाणें से पूरा स्तोत्र रचकर अर्हन्त भगवान को सच्चा आप्त सिद्ध कर दिया है। न्याय दर्शन के इन श्लोकें का पाठ करने मात्र से भी आत्मतòव की विशुद्धि होती है और ज्ञानावरणकमर् का क्षयोपशम होता है। देवागमस्तोत्र के पठन-श्रावण का चमत्कार- इस स्तोत्र के संबंध म्ें एक रोचक घटना जैन ग्रांथें म्ें आई है कि- आfहच्छत्र नामके वैभवशाली नगर म्ें राजा अवनिपाल राज्य करते थे। समस्त राजविद्याआW म्ें पारंगत उस राजा के पास वेद-वेदांग के ज्ञाता पाँच सौ विद्वान् मनीषी थे उनम्ें प्रमुख विद्वान् का नाम था-पात्रकेसरी। अपने कुल और ज्ञान के गवर् के साथ-साथ उनम्ें यह विशेषता थी कि वे अपनी नित्य की सन्ध्यावन्दन आदि ि›ाâयाआW को करके ही राजसभा म्ें जाते थे और जाते समय मागर् म्ें भगवान् पाÕार्नाथ के जिनालय म्ें जाकर कौतूहुलवश पाÕार्नाथ की प्रतिमा का दर्शन भी कर लेते थे। एक दिन की बात है कि वे जब जिनमंदिर गये तो, वहाँ एक चारित्रभूषण नामके दिगम्बर मुनिराज को इस देवागम स्तोत्र का पाठ करते देखा। उनका सुन्दर स्वर-लय के साथ शुद्ध संस्कृत उच्चारण सुनकर प्रधानविद्वान् पात्रकेसरी जी ने मुनिराज से पूछा-मुनिवर! क्या आप इसका अथर् भी जानते हQ ? मुनि ने कहा-नहाR, मQ इसका अथर् नहाR जानता हूँ, केवल प्रतिदिन इसका पाठ अवश्य करता हूँ। तब पात्रकेसरी बोले-कृपया आप इस स्तोत्र को एक बार और पÌढ दीजिए। मुनिराज के द्वारा दुबारा उसे पÌढते ही पात्रकेसरी ने उसे कण्ठस्थ कर लिया क्येंकि उनकी धारणाशक्ति बहुत विलक्षण थी, उन्हW एक बार ही ठीक से सुन लेने मात्र से कोेई भी पाठ याद हो जाया करता था। अत: देवागम स्तोत्र को भी सुनते ही याद कर लिया और तत्क्षण ही उन्हW दर्शनमोहनीय कमर् के क्षयोपशम से ÂÌढ श्राद्धान हो गया कि जिनेन्द्र भगवान ने जो जीव-अजीव आदिक पदार्थों का स्व™प कहा है, वही सत्य है, शेष कुछ भी सत्य नहाR है। उसके बाद घर पर जाकर भी वे वस्तुतòव का विचार करते रहे। रात्रि म्ें चिन्तन करते-करते उन्हW कुछ विषय समझ म्ें न आने के कारण उनकी निद्रा भंग हो गई, वे सोचने लगे कि-जैनधमर् म्ें प्रमाण और प्रमेय का लक्षण तो बताया है किन्तु अनुमान का लक्षण तो इसम्ें कहाR आया ही नहाR है। एेसा सोच-सोचकर जैनधमर् के प्रति सन्देह करते हुए उन्हW न जाने कब नाRद आ गई। इधर पात्रकेसरी की व्यग्राता और संदिग्ध स्थिति को देखकर प©ाावती देवी का आसन कम्पित हो गया। उन्हेंने तुरंत पात्रकेसरी के स्वप्न म्ें आकर बताया कि-आप चिन्तित न हें, जब आप प्रात:काल जिनमंदिर के दर्शन करने जाएंगे तो भगवान पाÕार्नाथ के पास जाते ही आपकी शंका का समाधान हो जाएगा। ( ५ ) ( ६ )
पात्रकेसरी से इस प्रकार कहकर देवी प©ाावती पाÕार्नाथ जिनालय म्ें गइË और भगवान पाÕार्नाथ के फणा पर एक श्लोक लिखकर अपने स्थान पर चली गइË। वह श्लोक निम्न प्रकार था- अन्यथानुपपVात्वं, यत्र तत्र त्रयेण किम्। नान्यथानुपपVात्वं, यत्र तत्र त्रयेण किम्।। अथार्त् जहाँ पर अन्यथानुपपत्ति है, वहाँ हेतु के दूसरे तीन ™प मानने से क्या प्रयोजन है ? तथा जहाँ पर अन्यथानुपपत्ति नहाR है वहाँ हेतु के तीन ™प मानने से भी क्या फल है ? पात्रकेसरी को प्रात:काल स्वप्न का स्मरण हो आया और ती›ा जिज्ञासा के साथ वे शीघÇ ही नित्य ि›ाâया से निवृत्त होकर मंदिर गये, वहाँ भगवान पाÕार्नाथ के फण पर उपर्युक्त श्लोक लिखा देखकर उनकी शंका का पूणर् समाधान हो गया, अत: उनके आनन्द का पार नहाR रहा। इस प्रकार विद्वान् पण्डित पात्रकेसरी जिनधमर् के ÂÌढश्राद्धानी पण्डित बनकर जैनशासन के स्याद्वादमत का खूब प्रचार-प्रसार करने लगे। अपने पाँच सौ साथी विद्वानें का जिनधमर् के प्रति विद्वेष देखकर पात्रकेसरी ने राजा अवनिपाल की राजसभा म्ें उन सभी के साथ निभर्यतापूवर्क शाŒााथर् किया, उसम्ें विजयी होकर उन्हेंने सम्यग्दर्शन का खूब प्रभाव पैâलाया। इस प्रकार पात्रकेसरी के सुखकारी उपदेश से प्रभावित होकर राजा अवनिपाल एवं सभी पाँच सौ विद्वानें ने श्राद्धापूवर्क जिनधमर् को स्वीकार किया और पात्रकेसरी के गुण एवं पाण्डित्य की चहुँओर प्रशंसा होने लगी। ये पात्रकेसरी आगे दीक्षा लेकर मुनि बने हQ और उनके द्वारा रचित पात्रकेसरी स्तोत्र भी बहुप्रसिद्ध है। भव्यात्माआW! मQने आपको यह देवागम स्तोत्र की कििÃात् महिमा बताई है कि जिसके सुनने मात्र से अनेकें भव्यजीव सम्यग्Âष्टि बन गये। इसी देवागम स्तोत्र पर श्रीभóाकलंक आचायर्देव ने ‘अ°शती’ नामक भाष्य ग्रांथ लिखा है जिसम्ें आठ सौ श्लोक (अनु°ुप् छंद) प्रमाण टीका है। पुन: इन्हाR ११४ कारिकाआW वाले देवागम स्तोत्र अपरनाम आप्तमीमांसा स्तोत्र पर आचायर् श्री विद्यानंद स्वामी ने ‘अ°सहœाी’ ग्रांथ रचा, जिसम्ें आठ हजार श्लोकप्रमाण टीका है। इस अ°सहœाी म्ें आचायर्देव ने अ°शती भाष्य की पूरी टीका को भी गूंथा है अत: जो अ°सहœाी के स्वाध्यायी हQ, उन्हW तीन आचार्यों (श्री समंतभद्र स्वामी, श्री अकलंकदेव, श्री विद्यानंद स्वामी) की कृतियें के अध्ययन का लाभ प्राप्त हो जाता है। हिन्दी पद्यानुवाद एवं सारांश न्यायदर्शन की वुंâजी बन गये हQ!- प्रस्तुत कृति म्ें पूज्य गणिनीप्रमुख आयिर्काशिरोमणि श्री १०५ ज्ञानमती माताजी ने समस्त कारिकाआW का हिन्दी पद्यानुवाद, अन्वयाथर्, कारिकाथर् एवं भावाथर् के द्वारा ग्रांथ को अत्यन्त सरल बनाने का पूणर् प्रयास तो किया ही है किन्तु प्रत्येक परिच्छेद के अंत म्ें जो उन्हेंने सारांश प्रस्तुत किए हQ उनने तो न्यायदर्शन के इस ग्रांथ को जीवन्त ही बना दिया है। अत: अ°सहœाी ग्रांथ म्ें प्रवेश पाने के लिए यह कुÀाी के समान बन गया है। यूँ तो पूज्यश्री के द्वारा सन् १९६९-७० म्ें अनुवादित न्याय का सर्वोच्च ग्रांथ ‘‘अ°सहœाी’ भी तीन भागें म्ें प्रकाशित हो चुका है, जिसे पÌढकर विद्वान् लोग न्यायतीथर्, न्यायाचायर् जैसी उपाधि परीक्षाएँ उत्तीणर् करते हQ। मेरा मानना है कि जो पाठक पहले इस ‘देवागम- स्तोत्र’ के पूरे ग्रांथ का आद्योपान्त अध्ययन कर ल्ेंगे, उन्हW अ°सहœाी समझने म्ें निश्चिात™प से आनन्द की अनुभूति होगी। अन्त म्ें मेरा यही कहना है कि इस ग्रांथ का स्वाध्याय और अध्ययन करके सुधी स्वाध्यायी जन एकान्तमतें के दुराग्राह से हटकर अनेकांत और स्याद्वाद के सर्वोदयी सिद्धान्तें को अपनाएं। सभी के सम्यग्ज्ञान का विकास हो, मिथ्यात्व का विनाश हो इसी भावना के साथ इस ग्रांथ एवं ग्रांथकार आदि के लिए शत- शत नमन। N : श् ( ७ ) ( ८ )
दो शब्द —आयिर्का सु›ातमती सिद्धान्त नत्वार्हतश्चााप्तान्, आदिबÇÿाा स वंद्यते। युगादौ सृि°कतार् य:, ज्ञानज्योति: स मे दिश।। भगवान महावीर के शासनकाल म्ें एक से बÌढकर एक महापु®षें ने जन्म लिया हQ। आचायर् श्री जिनसेन स्वामी, श्री वुंâदवुंâद देव, श्री नेमिचन्द्राचायर्, श्री वीरसेन स्वामी, श्री समंतभद्र स्वामी, श्री अकलंक देव, श्री विद्यानंद स्वामी आदि महान-महान ग्रांथें के रचयिता, न्याय के ताविर्कक विद्वान् हुए हQ, जिन्हेंने अपनी विद्वत्ता के द्वारा जिनधमर् की विशेष प्रभावना की है। ‘आप्तमीमांसा’ अपरनाम देवागम स्तोत्र के रचयिता श्री समन्तभद्र स्वामी हQ, जिन्हेंने ११४ कारिकाआW म्ें इस स्तोत्र की रचना की है। इन कारिकाआW का पद्यानुवाद एवं अथर् पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सरल सुन्दर भाषा म्ें किया है। जिनस्तोत्र संग्राह पुस्तक म्ें पूज्य माताजी ने संस्कृत म्ें अ°सहœाी वन्दना म्ें बहुत ही सुन्दर २४ श्लोकें की रचना की है- सवË जानंति सवर्ज्ञा: केवलज्ञान चक्षुषा। तान् नौमि पूणर्ज्ञानाप्त्यै, भक्तिरागेण कोटिश:।।१६।। दशाध्याये परिच्छिVो, प्रोक्ता: स्याद्वादप्रि›ाâया:। नमाम्य°सहœााR तां, वाक्शुद्धŸौ नयसिद्धये।।१७।। देवागमस्तवोद्भूता, समंतात् भद्रकारिणी। अकलंकवच: पूता विद्यानंदं तनोतु मे।।२०।। २४ श्लोकें म्ें पूज्य माताजी ने देवागम स्तोत्र, अ°शती एवं अ°सहœाी के सार को भर दिया है। हमने इन महान आचार्यों को देखा नहाR लेकिन वतर्मान म्ें इन आचार्यों का अनुसरण करने वाली, कठिन से कठिन एवं सरल से सरल संस्कृत भाषा म्ें ग्रांथ रचना करने वाली, जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी, युग- प्रवतिर्का, ३०० ग्रांथें की लेखिका, चारित्रचन्द्रिका गणिनीपÇमुख श्री ज्ञानमती माताजी के दर्शन सुलभ हQ, यह हम सभी के लिए, सम्पूणर् जैन समाज के लिए बÌडे ही गौरव की बात है। बीसवाR सदी के प्रथमाचायर् चारित्रच›ाâवर्ती आचायर् श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पóशिष्य चारित्रचूÌडामणि आचायर् श्री वीरसागर जी महाराज की शिष्या ‘‘यथा नाम तथा गुण को धारण करने वाली’’ आयिर्काशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् १९६९-७० म्ें अ°सहœाी अपरनाम ‘क°सहœाी’ की ‘स्याद्वादचिंतामणि’ हिन्दी टीका लिखकर न्याय के क्षेत्र म्ें एक कीतिर्मान स्थापित किया है। पूज्य माताजी ने स्वाध्याय, मनन-चिंतन करके, मुनियें, आयिर्काआW, शिष्य-शिष्याआW को पÌढा-पÌढाकर जैनागम का तलस्पर्शी ज्ञान प्राप्त किया है। ‘कातंत्र ™पमाला’ व्याकरण™पी बीज से ज्ञान साधना™प वटवृक्ष प्रस्पुâटित किया है। गोम्मटसार, न्यायदीपिका, प्रमेयकमलमातर्ण्ड, अ°सहœाी, तòवाथर्राजवातिर्क, सवार्थर्सिद्धि, अनगारधमार्मृत, मूलाचार, त्रिलोकसार आदि ग्रांथें को पÌढा-पÌढाकर अल्प समय म्ें विस्तृत ज्ञान प्राप्त किया है। हिन्दी, प्राकृत, संस्कृत, मराठी एवं कVाÌड भाषा का आपको ज्ञान है। आपने कVाÌड म्ें बहुत सुन्दर बारह भावना लिखी है- अरसर वैभव सुरर विमानवु धन यौवन संपदवेल्ला। निरतवु नेनेदरे इन्द्रिय भोगवु य्ेंदु निल्लदु स्थिरवल्ला।। मेरे युव कामन बिल्लिन तेरदलि नोडलु मत्तल्लेनिल्ला। स्वात्म स्वभावव साधिसि संतत मुक्तियुवैâयोUगिहुदल्ला।।१।। आपने जैनभारती, ज्ञानामृत, त्रिलोकभास्कर, प्रवचन निर्देशिका जैसे प्रौÌढ ग्रांथ लिख्ें। प्रतिज्ञा, परीक्षा, जीवनदान, आटे का मुगार्, पति›ाता आदि उपन्यास लिख्ें। द्रव्यसंग्राह, रत्नकरण्डश्रावकाचार ग्रांथ का हिन्दी पद्यानुवाद किया। बाल- विकास, बाल भारती, नारी आलोक आदि पुस्तव्ेंâ जैन वा*्मय का ज्ञान कराने वाली हQ। आपने अध्यात्म, व्याकरण, न्याय, सिद्धान्त, बाल साहित्य, उपन्यास, जैन भूगोल आदि चारें अनुयोग™प विपुल साहित्य का सृजन किया है। इन्द्रध्वज विधान, कल्पद्रुम, सवर्तोभद्र, सिद्धच›ाâ, त्रैलोक्य विधान आदि विधानें की रचना करके भक्तें को भक्ति रस के माध्यम से कर्मों को निर्जीण करने का एवं पुण्य को प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया है। आपने षट्खण्डागम सूत्र ग्रांथ पर संस्कृत म्ें ‘‘सिद्धान्त चिंतामणिटीका’’ १६ पुस्तकें की ३१०० पृ‰ें म्ें मात्र १२ वर्षों म्ें लिखकर एक महान से महान कायर् किया है। आपको समाज ने ‘सिद्धांत च›ोâÕारी’ की उपाधि से अलंकृत किया है। क्येंकि आपने छह खण्ड ™प द्वादशांग को-जिनवाणी को आत्मसात ( ९ ) ( १० )
किया है। प्रत्येक कायर्, चाहे साहित्यसृजन हो, तीथर् का निमार्ण हो, आगम के आधार से ही किया है। शिक्षण-प्रशिक्षण शिविरें का आयोजन, रा°^ीय-अंतरार्°^ीय सेमिनार, तीथËकरें की जन्मकल्याणक भूमियें का विकास, जम्बूद्वीप, तेरहद्वीप, तीनलोक की रचना, आपकी अपूवर् देन है। ज्ञानज्योतिरथ, समवसरणरथ, महावीरज्योतिरथ प्रवतर्न के माध्यम से जैनधमर् का विशेष प्रचार-प्रसार हुआ है। प्रज्ञाश्रामणी पूज्य आयिर्का श्री चंदनामती माताजी ने आपके विराट व्यक्तित्व को देखते हुए सैकÌडें भजन रच डाले हQ। एक भजन म्ें लिखा है- साहित्य सृजन के द्वारा तुमने इतिहास बनाया, शुभ ज्ञान ज्योति के द्वारा जग म्ें प्रकाश पैâलाया। ज्ञान की ज्योति नम लो रे.......... न्याय का ग्रांथ इस ‘आप्तमीमांसा’ की प्रूफरीडिंग के माध्यम सेमेरा भी अच्छा स्वाध्याय हुआ है और यह ज्ञात हुआ है कि इस ग्रांथ की रचना मोक्ष सुख के इच्छुक भव्य पु®षें के लिए की गई है। क्येंकि सम्यक् और मिथ्या उपदेश विशेष क ी जानकारी होने से मिथ्यात्व का त्याग और सम्यक्त्व का ग्राहण शक्य है, अन्यथा नहाR। वास्तव म्ें देखा जाये तो ६० वषर् के दीक्षित जीवन म्ें पूज्य माताजी के द्वारा जो अनुपम कायर् किए गये हQ, वे सभी अनूठे हQ। पूज्य माताजी दीघार्यु हें, स्वस्थ रहW, इन्हाR मंगल भावनाआW के साथ पूज्य माताजी के पावन चरणें म्ें कोटि-कोटि नमन। N : श् ( ११ ) ( १२ ) रा°^गौरव, गणिनीप्रमुख, आयिर्काशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का संक्षिप्त-परिचय -प्रज्ञाश्रामणी आयिर्का चन्दनामती भारत की वसुन्धरा सदैव से तपस्या, त्याग एवं संयम की भूमि रही है। भगवान त्र+षभदेव, राम, महावीर की यह भूमि आज भी एेसे महान व्यक्तित्वें से सुशोभित है कि जो अपने जीवन म्ें ही एेतिहासिक बन जाते हQ। एेसा ही एक महान व्यक्तित्व है-वतर्मान दिगम्बर जैन समाज की सबसे प्राचीन दीक्षित साध्वी-पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी। सन् १९३४ म्ें शरदपूणिर्मा के दिन जिला बाराबंकी (उ.प्र.) के टिवैâतनगर ग्रााम म्ें माता मोहिनी एवं पिता श्री छोटेलाल जैन के दाम्पत्य जीवन के प्रथम पुष्प के ™प म्ें कन्यारत्न ‘मैना’ का जन्म हुआ। छोटी सी आयु से ही अपनी माँ की प्रेरणावश जैन ग्रांथें के स्वाध्याय द्वारा इस बालिका ने अपने वैराग्य को भलीभाँति ÂÌढ कर लिया और १८ वषर् की अल्प आयु म्ें शरदपूणिर्मा के दिन ही परिवार के प्रबल विरोध के बावजूद भी आजन्म बÇÿाचयर्›ात एवं गृहत्याग के कठिन नियम धारण कर लिये। सन् १९५३ म्ें श्री महावीर जी (राज.) आfतशय क्षेत्र पर आचायर्रत्न श्री देशभूषण जी महाराज से आपने क्षुल्लिका दीक्षा लेकर ‘वीरमती’ नाम प्राप्त किया। पुन: १९५६ म्ें बीसवाR सदी के प्रथम आचायर् चारित्रच›ाâवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञानुसार उनके प्रथम पóाधीश शिष्य आचायर्श्री वीरसागर जी महाराज से माधोराजपुरा (राज.) म्ें आपने आयिर्का दीक्षा लेकर ‘ज्ञानमती’ नाम प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्ति हेतु अध्ययन- अध्यापन एवं स्वाध्याय के प्रति आपकी विशेष आfभ®चि देखकर ही गु®वर ने आपको यह नाम प्रदान किया था। दीक्षा के प्रारंभिक वर्षों म्ें आपने सवर्प्रथम संस्कृत व्याकरण एवं जैन आगम का तलस्पर्शी ज्ञान प्राप्त किया तथा साथ ही सहœानाम मंत्रें की रचनापूवर्क अपनी लेखनी का शुभारंभ भी कर दिया। ६० वर्षों से साधनारत इन महान साध्वी ने अब तक २५० से भी आfधक गंÇथें का सृजन किया है। संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत, कVाÌड इत्यादि भाषाआW की प्रकाण्ड विदुषी पूज्य माताजी की काव्य प्रतिभा भी आfद्वतीय है। जिनेन्द्र भक्ति के रस से भरे हुए न जाने कितने ही पूजन-विधानें की रचना पूज्य माताजी ने अपनी लेखनी द्वारा की है। सन् १९९५ म्ें डा@. राम मनोहर लोहिया अवध विÕाविद्यालय (पैâजाबाद) ने पूज्य माताजी की विराट ज्ञान साधना को देखकर जैन इतिहास म्ें प्रथम बार किसी साध्वी को ‘डी.लिट्.’ की मानद् उपाधि प्रदान की। पुन: इसके उपरांत ८ अप्रैल २०१२ को पूज्य माताजी के ५७व्ें आयिर्का दीक्षा दिवस के अवसर पर तीथËकर
( १३ ) ( १४ ) महावीर विÕाविद्यालय, मुरादाबाद म्ें विÕाविद्यालय का प्रथम विशेष दीक्षांत समारोह आयोजित करके विÕाविद्यालय द्वारा पूज्य माताजी के करकमलें डी.लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की गई। कमर्ठता, ÂÌढसंकल्प, अनुशासन के साथ-साथ वात्सल्य की प्रतिबिम्ब पूज्य माताजी की प्रेरणा से कौरवें-पाण्डवें की राजधानी हस्तिनापुर (मेरठ-उ.प्र.) म्ें जैन भूगोल की आfद्वतीय रचना-‘जम्बूद्वीप’ का निमार्ण हुआ है। प्रथम तीथËकर भगवान त्र+षभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान कल्याणक भूमि-प्रयाग् ा (इलाहाबाद) म्ें ‘तीथËकर त्र+षभदेव तपस्थली तीथर्’ का भव्य निमार्ण भी पूज्य मा ताजी की सृजनशक्ति का ही सुन्दर प्रतिफल है। इसी प्रकार भगवान महावीर जन्मभूमि-कुण्ड लपुर (नालंदा) म्ें नंद्यावतर् महल तीथर् का भव्य निमार्ण पूज्य माताजी की प्रेरणा एवंससंघ सानिध्य म्ें मात्र २२ माह के अल्प अन्तराल म्ें हुआ है। २६०० वषर् पूवर् कुण्डलपुर (नालंदा) की जो धरती आfहंसा के अवतार भगवान महावीर के जन्मकल्याणक से महान उत्साह एवं हषर् को प्राप्त हुई थी वह काल के थपेÌडें से भले ही विस्मृत जैसी हो गयी हो, परन्तु जैन समाज के श्राद्धालुआW का वहाँ जाना हमेशा से जारी रहा और अब पूज्य ज्ञानमती माताजी के महान उपकार स्व™प यह जन्मभूमि पुन: इस प्रकार जगमगा उठी है कि आने वाला भविष्य सदैव इसकी चमक से प्रभावित रहेगा। पूज्य माताजी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति (१९८२) एवं भगवान त्र+षभदेव समवसरण श्रीविहार रथ (१९९८) का देशव्यापी प्रवतर्न सम्पVा हुआ एवं कुण्डलपुर से प्रवतिर्त भगवान महावीर ज्योति रथ (२००३) का प्रवतर्न सफलतापूवर्क सम्पVा हुआ है। इन रथें के द्वारा सम्पूणर् भारत म्ें आfहंसामयी सिद्धान्तें की व्यापक प्रभावना हुई। शैक्षणिक क्षेत्र म्ें अनेकानेक रा°^ीय एवं अंतरार्°^ीय संगोि‰याँ-सेमिनार इत्यादि पूज्य माताजी की प्रेरणा द्वारा समय-समय पर सम्पVा हुए हQ तथा आज भी हो रहे हQ। पूज्य माताजी के विराट व्यक्तित्व का आfभनंदन करने के लिए समाज ने उन्हW समय-समय पर युगप्रवतिर्का, चारित्रचन्द्रिका, न्याय प्रभाकर, आयिर्कारत्न, गणिनीप्रमुख, युगनायिका, रा°^गौरव, विÕाविभूति, वाग्देवी, भारतभूषण जैसी उपाधियें से सम्मानित करके स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया है। वतर्मान म्ें महारा°^ प्रान्त के मांगीतुंगी पवर्त पर विÕा की सबसे ऊँची १०८ पुâट उत्तुंग भगवान त्र+षभदेव की प्रतिमा का निमार्ण पूज्य माताजी की प्रेरणा से हो रहा है। २४ घंटे म्ें एक बार आहार लेकर, केशलोंच एवं पदविहार जैसी कठिन साधना करते हुए बÇÿाचयर् एवं चारित्र के तेज को सवर्त्र बिखेरने वाली पूज्य ज्ञानमती माताजी भारतीय संस्कृति की महान धरोहर हQ, जिन्हेंने १५ अप्रैल २००६ को अपनी आयिर्का दीक्षा के ५० वर्षों को पूणर् किया है। २१ दिसम्बर २००८ को जम्बूद्वीप- हस्तिनापुर म्ें पूज्य माताजी की प्रेरणा से आयोजित विÕाशांति आfहंसा सम्मेलन का उद्घाटन भारत की प्रथम महिला रा°^पति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के करकमलें से हुआ और सन् २००९ ‘‘शांतिवषर्’’ के ™प म्ें घोषित हुआ। रा°^पति जी ने जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर म्ें पधारकर पूज्य माताजी का आशीवार्द प्राप्त किया। दीघर्कालीन तपस्विनी एेसी पूज्यनीया माताजी ने सन् २००९ म्ें अपने जीवन के ७५ वषर् पूणर् किए जिसे सन् २००८ से २००९ तक रा°^ीय स्तर पर ‘‘हीरक जयंती महोत्सव वषर्’’ के ™प म्ें मनाया गया। वास्तव म्ें आज के कलिकाल म्ें भी आध्यात्मिक ज्ञान, चारित्र, साधना एवं मोक्षपथ को साकार करने वाले गु®आW का जितना आfभनंदन किया जाये, उतना कम है। जो बिना कुछ कहे अपनी मुद्रा द्वारा ही शांति, संयम, सदाचार का उपदेश देते हQ एेसे साधु इस भारत वसुन्धरा की शान हQ और हम जैसे जो भी प्राणीगण परमसौभाग्य से उनके चरणें म्ें आश्राय प्राप्त कर लेते हQं, वे भी अपने जीवन को सही अर्थों म्ें साथर्क कर लेते हQ। एेसे चतुर्मुखी प्रतिभा की धनी पूज्य माताजी के श्रीचरणें म्ें भावभीना कोटिश: नमन है। N : श्
( १५ ) ( १६ ) दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान का परिचय —स्वस्तिश्री कमर्योगी पीठाधीश रवीन्द्रकीतिर् स्वामी जिस हस्तिनापुर म्ें इस संस्थान द्वारा रा°^ीय स्तर पर कायर् कलाप चल रहे हQ, प्रथम तीथËकर भगवान त्र+षभदेव की पारणा, कौरव-पाण्डव की राजधानी, दर्शन प्रतिज्ञा म्ें प्रसिद्ध मनोवती का इतिहास आदि पौराणिक कथानकें से जुÌडी वह हस्तिनापुर नगरी एक एेतिहासिक एवं पौराणिक नगरी है। सन् १९७२ म W पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के नाम से दिल्ली म्ें इस संस्था का जन्म हुआ। सन् १९७४ से हस्तिनापुर म्ें निमार्ण कायर् प्रारंभ किया गया और अब तक वहाँ अनेक भव्य रचनाएं, मंदिर, कमरे, फ्लैट, कोठियां, भोजनालय, टंकी आदि बन चुके हQ। निमार्ण के आfतरिक्त संस्थान के द्वारा शिक्षा एवं धमर् प्रचार-प्रसार हेतु शिक्षण शिविर, सेमिनार, अंतरार्°^ीय सेमिनार, सम्मेलन आदि के आयोजन भी होते रहते हQ। पूज्य माताजी एवं आयिर्का श्री चंदनामती माताजी द्वारा लिखित चारें अनुयोगें एवं धमर्प्रभावना के समाचारें से सहित सम्यग्ज्ञान मासिक पत्रिका का प्रकाशन सन् १९७४ से बराबर निबार्ध गति से चल रहा है। संस्थान के अंतगर्त ही सन् १९७२ म्ें स्थापित वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला से ३०० से भी आfधक ग्रांथ लाखें की संख्या म्ें प्रकाशित हो चुके हQ। यहां जम्बूद्वीप पुस्तकालय, णमोकार महामंत्र बQक, गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ आदि के ôारा धामिर्क शैक्षणिक एवं पारमाथिर्क कायर्›ाâम चलते रहते हQ। सन् १९७५ से प्रारंभ पंचकल्याणकें म्ें अब तक अनेक पंचकल्याणक प्रति‰ाएं एवं प्रति ५ वर्षों म्ें होने वाले जम्बूद्वीप महामहोत्सव म्ें से ४ महोत्सव हो चुके हQ। इस संस्थान द्वारा जहाँ पूज्य माताजी की प्रेरणा से सन् १९८२ म्ें दिल्ली से स्व. प्रधानमंत्री श्रीमती इंंदिरा गांधी द्वारा उद्घाटित जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ का १०४५ दिनें तक सम्पूणर् भारत म्ें भüमण एवं हस्तिनापुर म्ें उसकी अखण्ड स्थापना हुई, सन् १९९८ म्ें प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा उद्घाटित भगवान त्र+षभदेव समवसरण श्रीविहार द्वारा आEहसामयी सिद्धान्तें का प्रचार-प्रसार हुआ। वहाR भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर (नालंदा) से महामहिम राज्यपाल बिहार प्रान्त द्वारा प्रवतिर्त ‘‘भगवान महावीर ज्योति’’ रथ के भारत भÇमण से जनमानस भगवान महावीर के विषय म्ें आगमसम्मत ज्ञान से परिचित हुआ है। जम्बूद्वीप स्थल पर समय-समय पर भव्य दीक्षाएं भी सम्पVा हुई हQ। इसी संस्थान द्वारा दिल्ली के लालकिला मैदान म्ें ४ फरवरी सन् २००० को प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी द्वारा उद्घाटित ‘‘भगवान त्र+षभदेव अंतरार्°^ीय निवार्ण महामहोत्सव’’ सम्पूणर् देश एवं विदेशें म्ें मनाया गया। जिसके अंतगर्त अनेक संगोि‰याँ, भगवान त्र+षभदेव कीतिर्स्तंभ निमार्ण आदि कायर्›ाâम हुए। सन् २०००- २००१ म्ें संस्थान द्वारा पूज्य माताजी की प्रेरणा से भगवान त्र+षभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञान भूमि प्रयाग-इलाहाबाद म्ें बनारस हाइवे पर ‘‘तीथËकर त्र+षभदेव दीक्षातीथर्’’ का नवनिमार्ण हुआ है तथा ६ अप्रैल सन् २००१ को ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा उद्घाटित रा°^ीय स्तर पर सम्पूणर् भारतवषर् म्ें मनाए जाने वाले भगवान महावीर २६००वाँ जन्मकल्याणक महोत्सव वषर् म्ें पूज्य माताजी द्वारा रचित ‘‘विÕाशांति महावीर विधान’’ का विराट आयोजन प्रथम रा°^ीय N : श् आयोजन के ™प म्ें राजधानी दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान म्ें अक्टूबर २००१ म्ें सम्पVा हुआ। उसी जन्मकल्याणक महोत्सव के अंतगर्त सन् २००३-२००४ म्ें संस्थान द्वारा पूज्य माताजी की प्रेरणा से भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर का विकास कायर् दुÇतगति से हुआ है। ‘‘नंद्यावतर् महल’’ नामक तीथर् परिसर वहाँ का विशेष दर्शनीय स्थल पयर्टकें के लिए आकषर्ण का केन्द्र है। कुण्डलपुर विकास संपVा होने के पहले ही पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने आगामी वषर् २००५ को ‘‘भगवान पाÕार्नाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहœााब्दि महोत्सव वषर्’’ के ™प म्ें मनाने का सारे देश को आ£ान किया और प्रेरणा दी। तदुपरांत पूज्य माताजी ससंघ ने कुण्डलपुर से १४ नवम्बर २००४ को भगवान पाÕार्नाथ की जन्मभूमि बनारस के लिए विहार किया और पूज्य माताजी के सानिध्य म्ें बनारस म्ें भगवान पाÕार्नाथ की जन्मजयंती ६ जनवरी २००५ को इस पाÕार्नाथ महोत्सव वषर् का जोर-शोर के साथ सारे देश की जनता के बीच उत्तरप्रदेश के लोक निमार्ण मंत्री-श्री शिवपाल सिंह यादव एवं अन्य आfतथियें द्वारा उद्घाटन किया गया। इस महोत्सव वषर् के अंतगर्त सवर्प्रथम लम्बे समय से प्रतीक्षित भगवान श्रोयांसनाथ की जन्मभूमि सिंहपुरी-सारनाथ म्ें उनकी विशाल प्रतिमा का पंचकल्याणक प्रति‰ा महोत्सव भव्यता के साथ सम्पVा हुआ। तदुपरांत टिवैâतनगर म्ें भगवान महावीर पंचकल्याणक प्रति‰ा महोत्सव म्ें पधारे उत्तरप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री माननीय श्री मुलायम सिंह यादव ने भगवान पाÕार्नाथ की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर ‘पाÕार्नाथ वषर्’ का शुभारंभ किया और भगवान पाÕार्नाथ की वह प्रतिमा ‘‘पाÕार्नाथ दि. जैन इण्टर कालेज’’ के परिसर म्ें स्थापित की गई है। इसी ëाृंखला म्ें सारे देश म्ें ३ वषर् तक भगवान पाÕार्नाथ तृतीय सहœााब्दि महोत्सव विविध आयोजनें के साथ मनाया गया, जिसका समापन भगवान पाÕार्नाथ की केवलज्ञान भूमि आfहच्छत्र तीथर् पर तिखाल वाले बाबा के महामस्तकाभिषेकपूवर्क ४ जनवरी २००८ को हुआ। २१ दिसम्बर २००८ का दिवस संस्थान के लिए विशेष गौरवपूणर् एवं एेतिहासिक रहा, जब गणतंत्र भारत की महामहिम रा°^पति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का शुभाशीवार्द लेने जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर पधाराR और विÕाश ाति आfहंसा सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस प्रकार आप सबके सहयोग से संचालित हो रहा दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान अपनी चतुर्मुखी योजनाआW से समाज को सदैव लाभान्वित करता रहे यही मंगल कामना है।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (२) अथ प्रथम: परिच्छेद: देवें की पूजा आदि से आप महान नहाR हQ देवागम - नभोयान - चामरादि - विभूतय:। मायाविष्वपि Âश्यन्ते, नातस्त्वमसि नो महान्।।१।। भगवन्! पंचकल्याणक म्ें तव, देवेें का आगमन महान। केवलज्ञान प्रगट होने पर, नभ म्ें अधर गमन सुखदान।। छत्र, चमर आदिक वैभव सब, मायावी म्ें भी दिखते। अत: आप हम जैसें द्वारा, पूज्य-वंद्य नहिं हो सकते।।१।। अन्वयाथर्- (देवागम नभोयान चामरादिविभूतय:) हे भगवन्! आपके जन्मोत्सव आदि म्ें देवें का आना, केवलज्ञान होने के बाद आकाश म्ें गमन और चमर, छत्र आदि समवसरण की विभूतियाँ ये सब (मायाविष्वपि Âश्यन्ते) मायावी इंद्रजालिया आदि जनें म्ें भी देखी जाती हQ (अत: त्वं न: महान् न आfस) अतएव भगवन्! आप मेरे लिए महान-वंद्य नहाR है।।१।। कारिकाथर्- आपके जन्मकल्याणक आदिकें म्ें देवें का आगमन, आप का आकाश मागर् म्ें गमन एवं समवसरण म्ें चामर, छत्र आदि अनेक विभूतियें का होना आदि यह सब बा¢ा वैभव मायावी विद्याधर मस्करी आदिकें म्ें भी पाया जा सकता है अत: हे भगवन्! हम लोगें के लिए आप महान नहाR हQ-स्तुति करने योग्य नहाR हQ।।१।। ` विग्राह आदि महोदय से भी आप महान नहाR हQ अध्यात्मं बहिरप्येष, विग्राहादि-महोदय:। दिव्य: सत्यो दिवौकस्स्व-प्यस्ति रागादिमत्सु स:।।२।। विग्राह आदि महोदय भगवन्! तव अध्यात्म क्षुधादि रहित। बा¢ा महोदय कुसुमवृि°, गंधोदक आदिक देव रचित।। दिव्य, सत्य ये वैभव फिर भी, रागादिक युत सुरगण म्ें। पाये जाते हQ, हे जिनवर! अत: आप नहिं पूज्य हम्ें।।२।। अन्वयाथर्- (एष अध्यात्मं बहिरपि विग्राहादि महोदय:) यह अंतरंग और बहिरंग शरीर आदि का जो महोदय है (दिव्य: सत्य:) जो कि अमानुषिक और सत्य है (स: रागादि मत्सु दिवौकस्सु आfप आfस्त) वह महोदय राग-द्वेष आदि सहित देवें म्ें भी पाया जाता है। इसलिए भी आप हमारे लिए महान नहाR हो सकते हQ।।२।। कारिकाथर्- अंतरंग विग्राह आदि महोदय-निरन्तर पसीनारहितपना आदि एवं बहिरंग-गन्धोदक वृि° आदि महोदय जो कि दिव्य हQ, सत्य अथार्त् वास्तविक हQ। इस प्रकार अन्तरंग, बहिरंग शरीर आदि महोदय भी मस्करीपूरण आदि म्ें न होते हुए भी रागद्वेषयुक्त देवें म्ें पाये जाते हQ, इसलिए भी हे भगवन्! आप महान नहाR हQ।।२।। तीथËकरत्व हेतु से भी आप महान नहाR हQ तीथर्कृत्समयानां च, परस्परविरोधत:। सर्वेषामाप्तता नास्ति, कश्चिादेव भवेद्गु®:।।३।। सभी मतो म्ें तीथËकर, के आगम म्ें दिखे विरोध। सभी आप्त सच्चे परमेÕार, नहिं हो सकते अत: जिनेश!।। इन सबम्ें से कोई एक ही, आप्त-सत्यगु® हो सकता। चित्-सवर्ज्ञ देव परमात्मा, सòवहितंकर जगभतार्।।३।। अन्वयाथर्- (तीथर्कत्समयानां च) सभी तीथËकरें के आगमें म्ें (परस्पर विरोधत:) परस्पर म्ें विरोध पाया जाता है अत: (सर्वेषां आप्तता नास्ति) सभी आप्त नहाR हो सकते हQ (कश्चिादेव भवेत् गु®:) इन सबम्ें से कोई एक ही महान गु® हो सकता है।।३।। कारिकाथर्- परमागम लक्षण तीथर् को करने वाले तीथर्कृत् कहलाते हQ। देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (३) (४) उनके समय अथार्त् आगमें म्ें परस्पर म्ें भिVा-भिVा आfभप्राय होने से विरोध पाया जाता है, अत: सभी को आप्तपना (सवर्ज्ञपना) नहाR है, अथार्त् मीमांसक, सांख्य, सौगत, नैयायिक, चावार्क, तत्वोपप्लववादी, यौग, बÇÿााद्वैतवादी, ज्ञानाद्वैतवादी आदि अनेक एकान्तमतावलम्बी वादियें म्ें सभी के ही सवर्ज्ञता नहाR हो सकती है, इसलिए कोई एक गु®-परमात्मा अवश्य है।।३।। भावाथर्- श्री समंतभद्र स्वामी ‘मोक्षमागर्स्य नेतारं’ आदि मंगलाचरण का आधार लेकर सवर्ज्ञ भगवान की परीक्षा करने म्ें प्रवृत्त होते हQ। तब वे भगवान से मानें प्रश्नोत्तर ही कर रहे हQ अत: पहली कारिका म्ें तो स्वामी ने देवागम आदि वैभव से भगवान को पूज्य नहाR माना, दूसरी कारिका म्ें शरीर आदि के विशेष महोद य से भी पूज्य नहाR माना है। पुन: तीसरी कारिका म्ें तीथËकरत्व हेतु से भी पूज्य नहाR माना है। इसी कारिका म्ें परस्पर विरोध शब्द से श्री विद्यानंद स्वामी नेअ°सहœाी ग्रांथ म्ें मीमांसक आदि के वेेदें म्ें नियोगवाद, विधिवाद आदि के निमित्त से विश ेष™प से परस्पर के विरोध को स्प° किया है एवं जो सवर्ज्ञ को ही नहाR मानते हQ औ र वेदें को अपौ®षेय मानते हQ तथा चावार्क और शून्यमतवादी भी आत्मा एवं परल् ोक का आfस्तत्व न मानने से सवर्ज्ञ का अभाव कहते हQ। इन सभी को समझाते हुए इन के मतें का खण्डन करके ठीक से सवर्ज्ञ का आfस्तत्व सिद्ध किया है। दोषें तथा आवरणें का पूणर्तया अभाव संभव है दोषावरणयोहार्नि-निर्:शेषास्त्यतिशायनात्। क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो, बहिरन्तमर्लक्षय:।।४।। किसी जीव म्ें सवर् दोष अ®, आवरणें की हानि नि:शेष। हो सकती है क्येंकि जगत म्ें, तरतमता से दिखे विशेष।। रागादिक की हानि किन्हाR म्ें, दिखती है कुछ अंशें से। जैसे हेतू से बा¢ाांतर, मल क्षय होता स्वर्णों से।।४।। अन्वयाथर्- (क्वचित्) किसी जीव विशेष म्ें (दोषावरणयोहार्नि: नि:शेषा आfस्त) दोष और आवरणें की हानि पूणर्तया पायी जाती है (आfतशायनात्) क्येंकि अन्य जीवोे म्ें दोष और आवरण की तरतमता देखी जाती है (यथा स्वहेतुभ्यो बहिरंत: मलक्षय:) जैसे अपने हेतु आदि से सुवणर् के किó, कालिमा आदि अंतरंग एवं बहिरंग मल का नाश देखा जाता है।।४।। कारिकाथर्- किसी जीव म्ें दोष और आवरण की हानि परिपूणर् ™प से हो सकती है क्येंकि अन्यत्र उसका आfतशयपना पाया जाता है। जिस प्रकार से अपने हेतुआW के द्वारा कनकपाषाणादि म्ें बा¢ा एवं अंतरंग मल का पूणर्तया अभाव पाया जाता है।।४।। सवर्ज्ञ की व्यवस्था सूक्ष्मांतरितदूराथार्:, प्रत्यक्षा: कस्यचिद्यथा। अनुमेयत्वतोÓग्न्यादिरिति सवर्ज्ञसंस्थिति:।।५।। सूक्ष्म वस्तु परमाणु आदि, अंतरित राम-रावण आदिक। दूरवतिर् हिमवन सुमे® ये, हQ प्रत्यक्ष किसी के नित।। क्येंकि ये अनुमेय कहे हQ, जैसे अग्न्यादिक अनुमेय। इस अनुमान प्रमाण कथित, सवर्ज्ञ व्यवस्था है स्वयमेव।।५।। अन्वयाथर्- (सूक्ष्मांतरित दूराथार्: कस्यचित् प्रत्यक्षा:) सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती पदाथर् किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हQ (अनुमेयत्वत:) क्येंकि ये अनुमान ज्ञान के विषय हQ (यथा अग्न्यादि:) जैसे आfग्न आदि पदाथर् अनुमान ज्ञान के विषय हQ अत: किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हQ (इति सवर्ज्ञसंस्थिति:) इस प्रकार से सवर्ज्ञ की सम्यक् प्रकार से स्थिति सुघटित है।।५।। कारिकाथर्- सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदाथर् किसी न किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हQ क्येंकि वे अनुमान ज्ञान के विषय हQ जैसे आfग्न आदि, इस प्रकार से सवर्ज्ञ सिद्धि होती है। सूक्ष्म-स्वभाव से परोक्ष परमाणु आदिक, अन्तरित-काल से परोक्ष राम, रावण आदिक, दूरवर्ती-देश से परोक्ष हिमवान पवर्त, सुमे® आदिक; ये किसी न किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हQ क्येंकि अनुमेय हQ, जैसे आfग्न आदिक। इस अनुमान वाक्य से सवर्ज्ञ की सम्यक् प्रकार से सिद्धि होती है। आप ही निर्दोष सवर्ज्ञ हQ स त्वमेवासि निर्दोषो, युक्तिशाŒााÓविरोधिवाक्। आfवरोधो यदि°ं ते, प्रसिद्धेन न बाध्यते।।६।। वह रागादिक दोष रहित, सवार्थर्विज्ञ प्रभु तुम्हाR कहे। क्येंकि तुम्हारे वचन युक्ति, आगम से आfवरोधी नित हQ।। प्रत्यक्षादि प्रमाणें से तव, तòव अबाधित हQ जग म्ें। अत: प्रभो! यह शासन तेरा, नित आfवरोधी जन जन म्ें।।६।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५) (६) अन्वयाथर्- (स: निर्दोष: त्वमेव आfस) हे भगवन्! वह निर्दोष सवर्ज्ञ आप ही हQ (युक्तिशाŒााÓविरोधिवाक्) क्येंकि आपके वचन तवर्क और आगम से विरोध रहित हQ। (ते यत् इ°ं आfवरोध:) और जो यह आपका इ° मत है वह आfवरोधी है (प्रसिद्धेन न बाध्यते) क्येंकि वह प्रसिद्ध प्रत्यक्ष आदि प्रमाणें से बाधित नहाR होता है।। कारिकाथर्- हे भगवन्! दोष और आवरण से रहित निर्दोष सूक्ष्मादि पदार्थों को प्रत्यक्ष जानने वाले एवं युक्ति-शाŒा (तवर्क व आगम) से आfवरोधी वचन को बोलने वाले अर्हंत परमात्मा आप ही हQ क्येंकि आपका इ° (मत) विरोध रहित है उसम्ें प्रत्यक्ष, अनुमान आदि किसी भी प्रमाण से बाधा नहाR आती है।।६।। सवर्था एकांतवाद प्रमाण से बाधित है त्वन्मतामृतबा¢ाानां, सवर्थैकांतवादिनाम्। आप्ताभिमानदग्धानां, स्वे°ं °ेन बाध्यते।।७।। प्रभु तव मत अमृत से बाहर, दुराग्राही-एकांतमती। ‘मQ हूँ आप्त’ सदा इस मद से, दग्ध हुए अज्ञानमती।। उनका वह एेकांतिक शासन, इ° उन्हW फिर भी बाधित। प्रत्यक्षादि प्रमाणें से वह, तòव सदा निन्दित दूषित।।७।। अन्वयाथर्- (सवर्थैकांतवादिनां) वस्तु के एक-एक धमर् को सवर्था™प से स्वीकार करने वाले एकांतवादी जन (त्वन्मतामृतबा¢ाानां) जो कि आपके मत™पी अमृत से बहिर्भूत हQ (आप्ताभिमानदग्धानां) और जो ‘मQ आप्त हूँ’ इस प्रकार के आfभमान से दग्ध हQ (स्वे°ं °ेन बाध्यते) उनका जो अपना इ°-मत है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है।।७।। कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके मत ™प अमृत से जो बहिर्भूत हQ सवर्था एकांत™प मत को कहने वाले हQ और ‘‘मQ ही आप्त हूँ’’ इस प्रकार के आfभमान से जो दग्ध हQ उनका इ°-मत प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है।।७।। एकांत म्ें शुभ-अशुभ आदि नहाR बनते कुशलाÓकुशलं कमर्, परलोकश्चा न क्वचित्। एकांत-ग्राह-रत्तेâषु, नाथ! स्व-पर-वैरिषु।।८।। नाथ! स्वपर वैरी एकांत-ग्राह पीिÌडत जन के मत म्ें। शुभ अ® अशुभ ि›ाâया परलोका-दिक फल भी नहिं बनते हQ।। पुण्य-पाप फल बंध-मोक्ष की, नहाR व्यवस्था भी बनती। क्येंकि सवर्था नित्य-क्षणिक म्ें, अथर् ि›ाâया ही नहिं घटती।।८।। अन्वयाथर्- (नाथ एकांतग्राहरत्तेâषु) हे नाथ! जो लोग एकांत को ग्राहण म्ें तत्पर हQ। (स्वपरवैरिषु) वे स्व और पर के शत्रु हQ। (क्वचित् कुशलाकुशलं कमर् च परलोक: न) उनके यहाँ पुण्य-पाप कमर् एवं परलोक भी नहाR सिद्ध होगा।। कारिकाथर्- हे नाथ! नित्य अथवा आfनत्य आदि एकान्त मान्यता का दुराग्राह करने वाले एेसे स्व एवं पर के बैरी-शत्रु मिथ्याÂि° जनें म्ें से किसी के यहाँ भी कुशल-पुण्य, अकुशल-पाप ि›ाâयाएँ तथा परलोकादि की व्यवस्था भी नहाR बन सकती है।।८।। भावैकांत की मान्यता म्ें दोष भावैकांते पदाथार्ना-मभावानामपन्हवात्। सवार्त्मकमनाद्यन्त-मस्व™पमतावकम्।।९।। सब पदाथर् एकांत™प से, आfस्त™प ही यदि जग म्ें। तो अभाव का लोप हुआ फिर, चार दोष है प्रमुख बने।। सब पदाथर् सब™प, अनादि, आfनधन नि:स्व™प हेंगे। हे भगवन्! तव मत के द्वेषी, जन के यहाँ न कुछ हेंगे।।९।। अन्वयाथर्- हे भगवन्! (पदाथार्नां भावैकांते अभावानां अपÖवात्) यदि पदार्थों के आfस्तत्व का ही एकांत माना जाये, तब तो अभावें का लोप हो जाता है (अताववंâ सवार्त्मवंâ अनाद्यनंतं अस्व™पं) पुन: आपसे भिVा अन्य सभी के यहाँ सभी वस्तु सवार्त्मक, अनादि, अनंत और स्व™प शून्य हो जाव्ेंगी। कारिकाथर्- हे भगवन्! यदि आप से भिVा अन्य मतावलम्बियें के यहाँ सभी पदाथर् सवर्था भावैकान्त-नित्य™प ही माने जाव्ेंगे, तब तो अभाव- प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यन्ताभाव™प अभावें का नाश हो जाने से सभी पदाथर् सवार्त्मक, अनादि, अनन्त और अस्व™प-स्व™प रहित-शून्य™प हो जाव्ेंगे। भावाथर्र्- प्रत्येक वस्तु म्ें जैसे भाव धमर् है, वैसे ही अभाव धमर् भी है वह अभाव मुख्यतया चार भेद ™प है। यथा-प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव। यहाँ कारिका के उत्तराधर् म्ें उन्हाR चार अभावें के न मानने से होने वाले दोषें के नाम बताये गये हQ। आगे ग्रांथकार स्वयं इस बात को प्रकट करWग े।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (७) (८) प्रागभाव-प्रध्वंसाभाव को न मानने म्ें दोष कायर्द्रव्यमनादि स्यात्, प्रागभावस्य निन्हवे। प्रध्वंसस्य च धमर्स्य, प्रच्यवेÓनतन्तां ›ाजेत्।।१०।। प्रागभाव को यदि नहिं मानें, सभी कायर् हो अनादि सिद्ध। मिóी म्ें घट सदा बना है, फिर क्या करता च›ाâ निमित्त।। यदि प्रध्वंस धमर् नहिं मानें, किसी वस्तु का अन्त न हो। पिता, पितामह आदि कभी भी, अंत-मरण को प्राप्त न हें।।१०।। अन्वयाथर्- (प्रागभावस्य निÖवे कायर्द्रव्यमनादिस्यात्) यदि प्रागभाव को न माना जावे, तब तो सभी कायर् अनादि हो जाव्ेंगे (प्रध्वंसस्य च धमर्स्य प्रच्यवे अनंतता ं ›ाजेत्) और प्रध्वंस धमर् को नहाR मानने पर सभी वस्तुएं अनंतकाल तक बनी रहWगी।।१० ।। कारिकाथर्- हे भगवन्! यदि प्रागभाव का लोप करWगे, तब तो सम्पूणर् कायर् अनादि सिद्ध हो जाव्ेंगे और यदि प्रध्वंसाभाव का अभाव करWगे, तब तो सभी वस्तु की पयार्य्ें अनन्तपने को प्राप्त हो जाव्ेंगी।।१०।। भावाथर्र्- इस कारिका के अथर् म्ें श्री विद्यानंदस्वामी ने अ°सहœाी म्ें अभाव के नहाR मानने वालें का विस्तृत खंडन किया है। चावार्क प्रागभाव को स्वीकार नहाR करता है, नैयायिक प्रागभाव को तुच्छाभाव ™प मानते हQ। चावार्क प्रध्वंसाभाव को भी नहाR मानता है अत: शब्द को नित्य एक अखण्ड सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। नैयायिक शब्द को नित्यभूत आकाश का गुण मान रहे हQ। अन्योन्याभाव-अत्यंताभाव को न मानने म्ें दोष सवार्त्मवंâ तदेवंâ स्यादन्यापोह-व्यति›ाâमे। अन्यत्र समवाये न, व्यपदिश्येत सवर्था।।११।। यदि अन्योन्याभाव नहाR हो, एक वस्तु सब ™प बने। एक समय म्ें मनुज बने, सुर-पशु-नारक पयार्य घने।। यदि अत्यन्ताभाव न होवे, एक द्रव्य का अन्यें म्ें। हो जावे संमिश्राण फिर यह, जीव-अजीव न भेद बने।।११।। अन्वयाथर्- (अन्यापोहव्यति›ाâमे तदेवंâ सवार्त्मवंâ स्यात्) यदि अन्यापोह का लोप कर दिया जाये, तो वह अपना-अपना इ° एक तòव सब ™प बन जावेगा (अन्यत्र समवाये सवर्था न व्यपदिश्येत) और यदि अत्यंताभाव का लोप किया जावे, तब तो एक इ° तòव का अन्य के तòव म्ें संमिश्राण हो जाने पर सवर्था अपना इ° तòव कहा ही नहाR जा सकेगा।११।। कारिकाथर्- हे भगवन्! यदि अन्यापोह-इतरेतराभाव का लोप किया जावे, तो सभी वस्तु सवार्त्मक एक™प हो जाव्ेंगी। यदि अत्यन्ताभाव का ला ेप किया जावेगा, तब तो अन्यत्र समवाय स्वसमवायी आत्मा का भिVा समवायी प्रधान आदि म्ें समवाय हो जाने पर सभी का इ° तòव सवर्था कहा ही नहाR जा सकेगा। भावाथर्- इस कारिका के अथर् म्ें श्री विद्यानंद महोदय ने उत्पाद, व्यय, धÇौव्य म्ें प्रत्येक के ८१-८१ भेद बÌडे ही रोचक ढंग से किये हQ एवं सत्ता का लक्षण भी ि वशेष वणर्न से सहित है। विशेष जिज्ञासुआW को अ°सहœाी म्ें ही देखना चाहिए। अभावैकान्त की मान्यता म्ें दोष अभावैकांत-पक्षेÓपि, भावापन्हव-वादिनाम्। बोधवाक्यं प्रमाणं न, केन साधनदूषणम्।।१२।। यदि सब वस्तु अभाव™प हQ, शून्यवाद जन के मत म्ें। तब तो भाव-पदारथ विंâचित्, नहिं प्रतिभासित हें जग म्ें।। ज्ञान और आगम भी विंâचित्, नहिं प्रमाण हेंगे तब तो। वैâसे अपने मत का साधन, परमत दूषण किससे हो।।१२।। अन्वयाथर्- (अभावैकांत पक्षेÓपि भावापन्हववादिनां) यदि एकांत से सभी वस्तु को अभाव ™प ही स्वीकार किया जावे, तब तो भावें का सवर्था अभाव करने वाले इन वादियें के यहाँ (बोधवाक्यं प्रमाणं न केन साधनदूषणम्) ज्ञान और आगम दोनें का भी अभाव होने से दोनें प्रमाण नहाR रहWगे। पुन: किसके द्वारा अपने पक्ष का साधन और पर के पक्ष म्ें दूषण दिया जावेगा।।१२।। कारिकाथर्- हे भगवन्! पदाथर् का सवर्था अपलाप करने वाले अभावैकांतवादी माध्यमिकबौद्धें के यहाँ भी ज्ञान एवं वाक्य भी नहाR रहWगे और पुन: बोधवाक्यें की प्रमाणता न होने से वे लोग स्वपक्ष का साधन और परपक्ष का दूषण भी वैâसे कर सव्ेंâगे ?।।१२।। भावाथर्- जब किसी वस्तु का सद्भाव ही नहाR है, सभी वस्तुआW का अभाव ही अभाव है, तब तो स्वाथार्नुमान ™प ज्ञान एवं आगम आदि भी कहाँ रहWगे ? और जब किसी वस्तु का ज्ञान, वचनें से उनका प्रतिपादन ही नहाR रहेगा, तब अपने शून्यवाद का वणर्न भी वैâसे किया जावेगा और आfस्तत्ववादियें के तòवें म्ें दूषण भी वैâसे दिया जावेगा ?
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (९) (१०) एकांत™प भावाभाव और अवक्तव्य म्ें दोष विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वाद-न्याय-विद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।१३।। आfस्त-नास्ति से उभय™प ये, द्रव्य कदापि नहाR हेंगे। क्येंकि विरोध परस्पर इनका, स्याद्वाद विद्वेषी के।। यदि एकांत अवाच्य तòव है, कहो कथन वैâसे होगा? ‘‘तòव अवाच्य’’ यही कहना तो, वाच्य हुआ स्ववचन बाधा।।१३।। अन्वयाथर्- (स्याद्वाद न्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ भाव और अभाव इन दोनें की एकता ™प मान्यता भी नहाR बनती है, क्येंकि इन भाव और अभाव का आपस म्ें विरोध देखा जाता है। (अवाच्यतैकांतेÓपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि एकांत से वस्तु को ‘अवक्तव्य’ ही माना जाये, तो ‘तत्व अवाच्य है’, यह कथन भी नहाR बन सकेगा। कारिकाथर्- हे भगवन्! स्याद्वाद न्याय के विद्वेषी अन्य मतावलम्बियें के यहाँ निरपेक्ष भावाभावात्मक ™प उभयैकांतपक्ष भी श्रोयस्कर नहाR है, क्येंकि उसम्ें भी विरोध आता है। यदि कोई एकांत से तòव को अवाच्य-अवक्तव्य ही कहW, तब तो ‘‘तòव अवाच्य है’’ यह कथन भी नहाR बन सकेगा।।१३।। भावाथर्- हम स्याद्वादियें के यहाँ तो भाव और अभाव इन दोनें की मान्यता का सप्तभंगी म्ें तृतीय भंग माना गया है एवं अवक्तव्य को चतुथर् भंग कहा गया है, क्येंकि हमारे यहाँ कथंचित् पद से सब सुघटित हो जाते हQ किन्तु एकांतवादियें के यहाँ सवर्था एकांत होने से ये दोनें बात्ें अघटित हQ। भाव-अभाव आदि निर्दोष वैâसे हQ ? कथंचित्ते सदेवेे°ं, कथंचिदसदेव तत्। तथोभयमवाच्यं च, नय-योगाVा सवर्था।।१४।। हे भगवन्! तव मत म्ें वस्तू, तòव कथंचित् सत् ही है। वही कथंचित् असत् ™प ही, उभय कथंचित् वो ही है।। वह अवाच्य भी है नयशैली, से ही सप्तभंगयुत है। वस्तु सवर्था आfस्त™प या, नास्ति आदि से अघटित है।।१४।। अन्वयाथर्- (ते कथंचित् सत् एव इ°ं तत् कथंचित् असदेव) हे भगवन्! आपके मत म्ें कथंचित् वस्तु ‘सत्’ ™प ही है एवं वही वस्तु कथंचित् ‘असत्’ ™प ही है। (तथा उभयं अवाच्यं न नय योगात् न सवर्था) तथा वही वस्तु कथंचित् उभय™प है और कथंचित् ‘सत् अवक्तव्य’ कथंचित् ‘असत् अवक्तव्य’ एवं कथंचित् ‘सत् असत् अवक्तव्य’ भी है, यह सभी व्यवस्था नयें की अपेक्षा से ही मानी गई है, किन्तु सवर्था एेसा नहाR है।। कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके मत म्ें कथंचित् वस्तु सत्™प ही है, इ° है एवं वही कथंचित् उभय™प है और वही कथंचित् अवाच्य™प भी है परन्तु यह सब व्यवस्था नयें की अपेक्षा से ही है सवर्था नहाR है। सत् असत् निर्दोष वैâसे हQ ? सदेव सवË को नेच्छेत्स्व™पादि-चतु°यात्। असदेव विपयार्साVा चेVा व्यवति‰ते।।१५।। अपने द्रव्य सुक्षेत्र काल अ®, भाव चतु°य से नित ही। सभी वस्तुएँ आfस्त™प ही, नास्ति™प ही हQ वे भी।। परद्रव्यादि चतु°य से यह, कौन नहाR स्वीकार करे। यदि नहिं माने तव मत हे जिन! वस्तु व्यवस्था नहाR बने।।१५।। अन्वयाथर्- (स्व™पादि चतु°यात् सवË सत् एव विपयार्सात् असत् एव को न इच्छेत्) स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव ™प चतु°य की अपेक्षा से सभी वस्तुएँ ‘सत्’ ™प ही हQ एवं परद्रव्य, परक्षेत्र परकाल की अपेक्षा से सभी वस्तुएँ ‘असत्’ ™प ही हQ इस प्रकार कौन स्वीकार नहाR करेगा ? (न चेत् न व्यवति‰ते) यदि कोई नहाR माने, तो किसी भी वस्तु की व्यवस्था ही नहाR बन सकती है। कारिकाथर्- स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव™प चतु°य की अपेक्षा से सभी वस्तु सत्™प ही हQ, एेसा कौन स्वीकार नहाR करेगा ? एवं परद्रव्यादि चतु°य की अपेक्षा से सभी वस्तु असत्™प ही हQ। यदि एेसा नहाR स्वीकार करW तो किसी के यहाँ भी अपने-अपने इ°तòव की व्यवस्था नहाR हो सकेगी। उभय और अवक्तव्य कथन निर्दोष वैâसे हQ ? ›ाâमापिर्त-द्वयाद् द्वैतं, सहावाच्यमशक्तित:। अवक्तव्योत्तरा: शेषाŒायो भंगा: स्वहेतुत:।।१६।। ›ाâम से स्वपर चतु°य से ही, वस्तु उभय धमार्त्मक हQ। युगपत् द्वय को नहिं कह सकते, अत: ‘‘अवाच्य’’ वस्तु वह है।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (११) (१२) बचे शेष त्रय भंगें म्ें यह, अवक्तव्य उत्तर पद हQ। सत् असत् उभय पदें के आगे, अवक्तव्य निज हेतुक है।।१६।। अन्वयाथर्- (›ाâमापिर्तद्वयात् द्वैतं, सह अशक्तित: अवाच्यं) आfस्त, नास्ति दोनें धर्मों का ›ाâम से कथन करने से ‘आfस्तनास्ति’ ™प तृतीय भेद बनता है एवं परचतु°य के द्वारा कहे गये आfस्त, नास्ति दोनें धर्मों को एक साथ कह नहाR सकते हQ अत: ‘अवक्तव्य’ नाम का चौथा भंग होता है। (अवक्तव्योत्तरा: शेषा: त्रयो भंगा स्वहेतुत:) उपर्युक्त आदि के तीन भंगें के उत्तर म्ें अवक्तव्य पद जोÌड देने से बचे हुए तीन भंग अपने-अपने हेतु से कथंचित् ™प से बन जाते हQ। कारिकाथर्- ›ाâम से दोनें धर्मों की विवक्षा करने से ‘‘स्यादस्तिनास्ति’’ द्वैत™प तीसरा भंग बन जाता है एवं एक साथ दोनें ही धर्मों को कहने की शक्ति किसी भी शब्द म्ें नहाR है, अतएव सहावाच्य होने से चौथा ‘अवक्तव्य™प’ भंग हो जाता है, इसी प्रकार से प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय भंग के उत्तर म्ें ‘अवक्तव्य’ पद के जोÌड देने से शेष तीन भंग भी अपने-अपने हेतु से सिद्ध हो जाते हQ।। भावाथर्- प्रारंभ के आfस्त, नास्ति और आfस्तनास्ति इन तीनें के साथ अवक्तव्य पद जोÌड देने से आगे पाँचव्ें, छठे और सातव्ें भंग बन जाते हQ यथा- सत् अवक्तव्य स्वचतु°य की अपेक्षा एवं युगपत् दोनें धर्मों के न कह सकने से ‘सत् अवक्तव्य’ भंग होता है। परचतु°य की अपेक्षा एवं युगपत् दोनें धर्मों को न कह सकने से ‘असत् अवक्तव्य’ भंग होता है तथा ›ाâम से स्वपरचतु°य की अपेक्षा और युगपत् दोनें को न कह सकने से ‘सत् असत् अवक्तव्य’ भंग होता है। उपर्युक्त १४, १५, १६वाR कारिकाआW के अथर् म्ें अ°सहœाी ग्रांथ म्ें आचायर्देव ने सप्तभंगी का बÌडा सुंदर विवेचन किया है। कोई विशेष चतुर अवक्तव्य नाम से एक आठव्ें भंग को मानने लगे थे, तब आचायर्श्री ने क®णा बुद्धि से उन्हW समझाकर सात ही भंग मानने का विधान किया है। प्रमाण सप्तभंगी और नय सप्तभंगी को भी बहुत ही स्प° किया है। भावधमर् अभाव के साथ रहता है आfस्तत्वं प्रतिषेध्येनाÓविनाभाव्येक-धमिर्णि। विशेषणत्वात्साधम्यË, यथा भेद-विवक्षया।।१७।। एक वस्तु म्ें आfस्त धमर्, अपने प्रतिषेधी नास्ति के। बिना नहिं रह सकता आfवनाभावी कहलाता इससे।। क्येंकि विशेषण है जैसे, अन्वय हेतू व्यतिरेक बिना। नहाR रहे आfवनाभावी है, एेसा यह °ांत बना।।१७।। अन्वयाथर्- (एक धमिर्णि आfस्तत्वं प्रतिषेध्येनाÓबिनाभावी) एक धर्मी™प वस्तु म्ें आfस्तत्व धमर् अपने विरोधी नास्तित्व के साथ ही रहता है (विशेषणत्वात् यथा भेद-विवक्षया साधम्यË) क्येंकि वह विशेषण है जैसे अन्वय हेतु व्यतिरेक हेतु के साथ आfवनाभाव संबंध को लिए हुए रहता है। कारिकाथर्- एक जीवादि धर्मी म्ें आfस्तत्व जो वस्तु का धमर् है, वह प्रतिषेध्य नास्तित्व के साथ आfवनाभावी है, क्येंकि विशेषण है, जैसे कि हेतु म्ें भेद विवक्षा से साधम्यर्, वैधम्यर् के साथ आfवनाभावी है।। भावाथर्- जो जिसके बिना नहाR रहता है, उसका उसके साथ आfवनाभाव कहा जाता है। प्रत्येक वस्तु म्ें आfस्त धमर् नास्ति के साथ आfवनाभावी है। जैसे पुस्तक स्व™प से है पर™प चौकी आदि से नहाR है। अभाव भाव के साथ रहता है नास्तित्वं प्रतिषेध्येनाÓविनाभाव्येक धमिर्णि। विशेषणत्वाद्वैधम्यË यथाÓभेद-विवक्षया।।१८।। एक वस्तु म्ें नास्ति धमर् भी, स्वविरोधी आfस्त के साथ। आfवनाभावी ही रहता है, क्येंकि विशेषण भी वह खास।। जैसे हेतू के प्रयोग म्ें, है व्यतिरेक हेतु नित ही। अन्वय हेतू के सह रहता, आfवनाभावी सुघटित ही।।१८।। अन्वयाथर्- (एक धमिर्णि नास्तित्वं प्रतिषेध्येनाÓविनाभावि) एक वस्तु म्ें नास्तित्व धमर् अपने विरोधी आfस्तत्व के साथ आfवनाभावी है (विशेषणत्वात् यथा अभेद विवक्षया वैधम्यË) क्येंकि वह विशेषण है जैसे व्यतिरेक हेतु अन्वय के साथ आfवनाभावी है।।१८।। कारिकाथर्- एक धर्मी म्ें नास्तित्व भी अपने प्रतिषेध्य-आfस्तत्व के साथ आfवनाभावी है, क्येंकि वह विशेषण है, जैसे कि अभेद विवक्षा (अन्वय की अपेक्षा) से किसी अनुमान म्ें वैधम्यर् साधम्यर् के साथ आfवनाभावी हQ।। वस्तु भावाभावात्मक है विधेयप्रतिषेध्यात्मा, विशेष्य: शब्दगोचर:। साध्यधर्मो यथा हेतुरहेतुश्चााप्यपेक्षया।।१९।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (१३) (१४) वस्तु सदा विधिप्रतिषेधात्मक, है विशेष्य धर्मी विख्यात। क्येंकि शब्द के गोचर है वह, सत् असत् ™प जग ख्यात।। यथा-साध्य-अग्नी का साधन, धूम आfग्न का हेतू है। वही अपेक्षा से हेतू भी, जल के लिए अहेतू है।।१९।। अन्वयाथर्- (विशेष्य: विधेयप्रतिषेध्यात्मा शब्दगोचर:) जो विशेषण के द्वारा जानने योग्य है वह विशेष्य है, वह विधि और प्रतिषेध करने योग्य ही होता है क्येंकि वह शब्द का विषय है (यथा साध्यधमर्: हेतु अपेक्षया च अहेतु आfप) जैसे साध्य साध्य का जो धमर् एक विवेक्षा से अहेतु ™प भी हो जाता है।।१९।। कारिकाथर्- शब्द के विषयभूत विशेष्य-जीवादि समस्त पदाथर् विधि एवं प्रतिषेध इन दोनें धमर्स्व™प हQ, जैसे कि साध्य का धमर् अपेक्षा से हेतु एवं अहेतु भी होता है।। शेष भंग भी नय विवक्षा से बन्ेंगे शेषभंगाश्चा नेतव्या यथोक्त नय-योगत:। न च कश्चिाद्विरोधोÓस्ति मुनीन्द्र! तव शासने।।२०।। आfस्त, नास्ति उभयात्मक ›ाâम से, तीन भंग ये कहे गये। यथायोग्य नय विधि से आगे, भंग चार हQ शेष कहे।। अवाच्य, आfस्त-अवाच्य, नास्ति-अवाच्य, आfस्तनास्ति- अवाच्य। हे मुनीन्द्र! तव शासन म्ें, कुछ भी विरोध नहिं दिखे कदापि।। २०।। अन्वयाथर्- (शेष भंगा: च यथोक्तनययोगत: नेतव्या:) आगे के जो शेष भंग हQ उनको भी यथायोग्य नयें की अपेक्षा से समझ लेना चाहिए (मुनीन्द्र! तव शासने कश्चिात् विरोधो न चास्ति) हे मुनीन्द्र! आपके शासन म्ें कुछ भी विरोध नहाR आता है।।२०।। कारिकाथर्- यथोक्त नयें की अपेक्षा से शेष भंग भी लगा लेना चाहिए। अतएव हे मुनीन्द्र! आपके शासन म्ें कुछ भी विरोध नहाR है।। विशेषाथर्- यहाँ शेष शब्द से तीन भंग के बाद आगे के चार शेष कहे गये हQ। श्रीमद् भóाकलंक देव ने तो अ°शती म्ें दो के बाद तृतीय से आगे तक को भी शेष शब्द से सूचित किया है एवं ‘अथवा’ कहकर तीन के बाद से चार को भी शेष कहा है। आप्तमीमांसा की वृत्ति को करने वाले श्री वसुनंदी सैद्धांतिकाचायर् ने इस कारिका के विरोध शब्द को उपलक्षण मात्र कहा है और इससे आठ दोषें को ग्राहण किया है। उनके नाम-विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति और अभाव। यहाँ कहना यह है कि हे भगवन्! आपके मत म्ें विरोध, वैयधिकरण्य आदि ८ दोष या इनके भेद-प्रभेद से और भी अनेकें दोष नहाR आते हQ। कोई इन दोषें को स्याद्वाद म्ें घटित करता है। यथा- विरोध- भाव अभाव एक-दूसरे के विरोधी होने से एक वस्तु म्ें एक साथ नहाR रह सकते हQ अत: जैनें के यहाँ विरोध दोष आता है। वैयधिकरण्य- दो धर्मों का आधार भिVा होना वैयधिकरण है। जैसे आfस्त का आfधकरण भिVा है और नास्ति का आfधकरण भिVा है। दोनें का आfधकरण भिVा होने पर भी एकाधिकरण मानना वैयधिकरण्य दोष कहलाता है। अनवस्था- जिस प्रकार प्रत्येक पदाथर् म्ें आfस्तत्व नास्तित्व धमर् हQ उसी प्रकार आfस्तत्व-नास्तित्व धमर् म्ें भी अन्य और धमर् स्वपर की अपेक्षा आfस्तत्व- नास्तित्व™प कल्पित करते चलिये। आगे-आगे भी एेसी ही कल्पना होने से अप्रमाणीक अनंत आfस्तत्व-नास्तित्व कल्पना का विराम न होने से अनवस्था दोष आ जाता है। संकर- स्याद्वाद म्ें आfस्तत्व-नास्तित्व एक जगह रहते हQ अत: आfस्तत्व के आधार म्ें आfस्तत्व-नास्तित्व और नास्तित्व के आधार म्ें आfस्तत्व-नास्तित्व के रहने से संकर दोष आता है। व्यतिकर- आfस्तत्व-नास्तित्व के एक साथ रहने से आfस्तत्व ™प से नास्तित्व भी एवं नास्तित्व ™प से आfस्तत्व भी मानना पÌडेगा। अत: स्याद्वाद म्ें व्यतिकर दोष भी आता है। संशय- जब वस्तु को भाव-अभाव धर्मों से उभयात्मक माना है तब यह निश्चाय नहाR हो सकता है कि यह वस्तु आfस्त™प है या नास्ति™प एेसा संशय बना रहने से संशय दोष आता है। अप्रतिपत्ति- संशय होने से वस्तु का ठीक-ठीक ज्ञान नहाR हो सकता है अत: स्याद्वाद मत म्ें अप्रतिपत्ति-अज्ञान नामक दोष आता है। अभाव- यथाथर् ज्ञान के अभाव म्ें वस्तु की व्यवस्था न होने से वस्तु का अभाव ही सिद्ध होता है अत: अभाव दोष आता है। इस प्रकार से अन्य जनें ने अर्हंत के शासन म्ें ये विरोध आदि दोष दिखाये हQ किन्तु जैनाचायर् कहते हQ कि स्याद्वाद म्ेें एक भी दोष नहाR आता है।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (१५) (१६) एक ही वस्तु म्ें आfवरोध ™प विरोधी दो धर्मों का रहना बन जाता है। विरोध के तीन भेद हQ-बध्यघातक, सहानवस्था और प्रतिबध्यप्रतिबंधक। सपर् म्ें नकुल का बध्यघातक भाव है क्येंकि सपर् को नेवला मार डालता है। दोनें एक साथ नहाR रहते। शीत उष्ण का सहानवस्था विरोध है क्येंकि ये दोनें एक साथ नहाR रहते हQ। ये तीनें हमारे यहाँ असंभव हQ क्येंकि एक ही वस्तु म्ें आfस्तधमर् और उसी समय उसम्ें नास्तिधमर् रह जाता है। जैसे एक ही राम म्ें पिता, पुत्र ये दोनें विरोधी धमर् विद्यमान हQ। रामचन्द्र जी लवण और अंकुश के पिता हQ और दशरथ के पुत्र हQ। ये आfस्त-नास्ति धमर् परस्पर म्ें विरोधी नहाR हQ एवं उनकी आधारभूत वस्तु भिVा-भिVा न होकर एक है। अतएव दोनें धर्मों का जीव म्ें एकाधिकरण होने से वैयधिकरण दोष नहाR आता है। हमारे यहाँ एक धर्मी वस्तु म्ें अनंतें धमर् रहते हQ किन्तु एक धमर् म्ें अन्य कोई धमर् नहाR रहता है। अत: अनवस्था भी नहाR है। आfस्त-नास्ति दोनें धमर् अपने-अपने स्वभाव से सहित हQ आfस्त कभी भी नास्ति ™प और नास्ति कभी आfस्त™प से मिश्रिात नहाR होता है। अत: संकर दोष भी नहाR आता है। आfस्तत्व™प से नास्तित्व या नास्तित्व ™प से आfस्तत्व नहाR बन सकते अत: व्यतिकर दोष नहाR आता है। वि®द्ध अनेक धर्मों के अवलंबन करने वाले ज्ञान को संशय कहते हQ किन्तु यहाँ वस्तु स्व की अपेक्षाकृत आfस्त है और पर की अपेक्षा से नास्ति ही है अत: संशय का प्रश्न ही नहाR है। संशय के न होने से वस्तु का यथाथर् ज्ञान हो जाता है अत: अप्रतिपत्ति दोष नहाR आता है। वस्तु की व्यवस्था सुघटित सिद्ध होने से अभाव नाम का दोष भी नहाR है। अत: यह निष्कषर् निकला कि भगवान् जिनेन्द्र के शासन म्ें विरोध आदि कोई भी दोष नहाR आते हQ। वस्तु एक ™प नहाR है एवं विधि निषेधाभ्या-मनवस्थितमथर्कृत्। नेति चेVा यथा कायË, बहिरन्त®पाधिभि:।।२१।। एेसे विधि निषेध द्वारा जो, एक™प से नहाR कही। वह अनवस्थित वस्तु जगत म्ें, अथर् ि›ाâयाकारी नित ही।। यदि एेसा नहिं मानें तो, बा¢ााभ्यंतर द्वय कारण से। कायर् कहा है, वह नहिं होगा, अथर्ि›ाâया नहिं होने से।।२१।। अन्वयाथर्- (एवं विधिनिषेधाभ्यां अनवस्थितं अथर्कृत) इस प्रकार से विधि और निषेध के द्वारा जो वस्तु अवस्थित ™प से एक ™प नहाR है वही वस्तु अथर्ि›ाâयाकारी है (न इति चेत् न यथा बहिरंत: उपाधिभि: कायË) यदि एेसा नहाR माना जाये, तो जैसे बा¢ा और अंतरंग इन दोनें कारणें से कायर् माना गया है, वह उस प्रकार से नहाR बन सकेगा। कारिकाथर्- इस प्रकार से विधि और निषेध के द्वारा अनवस्थित जीवादिवस्तु अथर्ि›ाâयाकारी हQ। यदि एेसा नहाR मानें, तो जिस प्रकार से बहिरंग-अंतरंग उपा धि- सहकारी और उपादान कारणें से अनवस्थितरहित कायर् अथर्ि›ाâयाकारी नहाR है तथैव सभी जीवादिवस्तु विधि-निषेध से रहित अथर्ि›ाâयाकृत् नहाR हो सवेंâगी।। भावाथर्- वस्तु म्ें आfस्त या नास्ति दो म्ें से कोई एक ही धमर् रहे तो वस्तु अवस्थित हो जावेगी, किन्तु दोनें धर्मों के रहने से वह वस्तु अनवस्थित कहला ती है। घटकायर् अंतरंग कारण मिóी और बहिरंग कारण च›ाâ, वुंâभकार आदि से होता है। इसलिए अनवस्थित है। यदि अंतरंग या बहिरंग म्ें से किसी भी एक कारण से ही उत्पत्ति मान लो, तो घट के कारण अवस्थित हो जाने से घट बन ही नहाR सकेग् ाा। प्रत्येक धमर् का अथर् पृथक् है धर्मे धर्मेÓन्य एवार्थो धमिर्णोÓनन्तधमर्ण:। आf”त्वेÓन्यतमान्तस्य, शेषान्तानां तद”ता।।२२।। अनंतधमार् वस्तू के, प्रत्येक धमर् के पृथक्-पृथक्। अथर् कहे हQ अत: वस्तु है, अनंत धमार्त्मक शाÕात।। अनंत धर्मों म्ें जब इक ही, धमर् प्रधान कहा जाता। तब वे शेष धमर् हो जाते, गौण यही जिन ने भाषा।।२२।। अन्वयाथर्- (अनंतधमर्ण: धमिर्णो धर्मे धर्मे अन्य एव अथर्:) अनंत धमर् वाली वस्तु के एक-एक धमर् म्ें भिVा ही अथर् पाया जाता है (अन्यतमान्तस्य अंगित्वे शेषान्तानां तद”ता) उन बहुत धर्मों म्ें से किसी एक धमर् को प्रधान करने पर शेष धर्मों की गौणता हो जाती है। कारिकाथर्- अनंतधर्मों से विशि° जीवादि एक धर्मी के प्रत्येक धमर् म्ें भिVा-भिVा प्रयोजन आदि™प अथर् विद्यमान हQ एवं धर्मों के द्वारा ही धर्मी का कथन होता है अ तएव
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (१७) (१८) उन धर्मों म्ें से किसी एक धमर् को प्रधान करने पर शेष सभी धमर् गौण हो जात् ो हQ।। भावाथर्- जब जीव का आfस्त धमर् प्रधान किया जाता है, तब नास्ति धमर् गौण हो जाता है और जब नास्ति धमर् प्रधान किया जाता है, तब आfस्त धमर् गौण हो जाता है। अन्य धर्मों म्ें भी सप्तभंगी प्रि›ाâया करना एकाÓनेक-विकल्पादा-वुत्तरत्रापि योजयेत्। प्रि›ाâयां भंगिनीमेनां नयैनर्य-विशारद:।।२३।। नय म्ें निपुण जनें को नित ही, एक अनेक विकल्पें म्ें। नित्य क्षणिक आदिक म्ें भी ये, सप्तभंग कर लेने हQ।। सुनय विवक्षा के द्वारा, प्रत्येक धमर् म्ें सुघटित है। सप्तभंग प्रि›ाâया विधी यह, जिनमत म्ें ही वणिर्त है।।२३।। अन्वयाथर्- (नय विशारद: उत्तरत्र एकाÓनेक-विकल्पादौ आfप) जो नयें म्ें कुशल हQ वे आगे-आगे एक-अनेक आदि भेदें म्ें भी (नयै: एनां भंगिनाR प्रि›ाâयां योजयेत्) नयें के द्वारा इस सप्तभंगी प्रि›ाâया को घटित कर लेव्ें। कारिकाथर्- नयें की योजना करने म्ें कुशल स्याद्वादी को आगे इसी प्रकार से एक और अनेक आदि धर्मों म्ें भी इस सप्तभंगी प्रि›ाâया को द्रव्याथिर्क एवं पयार्याथिर्क नयें के अनुसार योजित कर लेना चाहिए।। ।।इति प्रथम: परिच्छेद:।। प्रथम परिच्छेद का सार (कारिका १ से २३ तक) श्रोतव्या°सहœाी श्राुतै: किमन्यै: सहœासंख्यानै:। विज्ञायेत ययैव स्वसमयपरसमयसद्भाव:।। श्री विद्यानंद स्वामी का यह कहना है कि एक अ°सहœाी को ही सुनना चाहिए। अन्य हजारें ग्रान्थें को सुनने से क्या प्रयोजन है ? क्येंकि इस एक अ°सहœाी ग्रां थ के द्वारा ही स्वसमय और परसमय का स्व™प जान लिया जाता है। महान् आचायर् श्री उमास्वामी जी ने महान् ग्रांथराज तòवाथर्सूत्र ग्रांथ की रचना के प्रारंभ म्ें ‘मोक्षमागर्स्य नेतारं भेत्तारं कमर्भूभृतां। ज्ञातारं विÕातत्वानां वंदे तद्गुणलब्धये’ इस मंगल श्लोक को रचा है। श्री समंतभद्रस्वामी ने इस मंगलाचरण श्लोक का आधार लेकर ‘आप्तमीमांसा’ नाम से एक स्तोत्र रचा, जिसका अपरनाम ‘देवागमस्तोत्र’ भी है। श्री भóाकलंक देव ने आप्तमीमांसा स्तुति पर ‘अ°शती’ नाम से भाष्य बनाया है जो कि जैनदर्शन का एक अतीव गूÌढ ग्रांथ बन गया है। इसी आप्तमीमांसा ग्रांथ पर आचायर्वयर् श्री विद्यानंद महोदय ने ‘अ°सहœाी’ नाम से अलंकार टीका बनाई है। इसम्ें अ°शती ग्रांथ को अंतगर्भिर्त किया है, जो कि जैनदर्शन का सर्वोत्कृ° ग्रांथ कहलाता है। इसम्ें दश परिच्छेद म्ें १. भाव-अभाव, २. द्वैत-अद्वैत, ३. नित्य-आfनत्य, ४. भेद-अभेद, ५. अपेक्षा- अनपेक्षा, ६. हेतु-आगम, ७. अंतरंगाथर्-बहिरंगाथर्, ८. दैव-पु®षाथर्, ९. पुण्य- पाप, १०. अज्ञान-ज्ञानवाद, इन एक-एक प्रकरणें के एकांतें का पूवर्पक्षपूवर्क निरसन करके सवर्त्र स्याद्वाद प्रि›ाâया से वस्तु तòव को समझाया गया है। वास्तव म्ें तòव अतòव को तòव म्ें समझने के लिए यह न्याय ग्रांथ एक कसौटी का पत्थर है और आfधक तो क्या कहा जाये स्वामी श्री समंतभद्राचायर्वयर् ने आप्त और अनाप्त की मीमांसा करते हुए आप्त-अर्हंतदेव को ही न्याय की कसौटी पर कसकर सत्य आप्त सिद्ध किया है, देखिए- देवागम-नभोयान - चामरादि - विभूतय:। मायाविष्वपि Âष्यंते नातस्त्वमसि नो महान्।।१।। आfतशय गुणें से युक्त भगवान् की स्तुति करने के इच्छुक श्री समंतभद्र- स्वामी स्वयं अपनी श्राद्धा और गुणज्ञता लक्षण प्रयोजन से ही इस देवागम स्तव म्ें आप्त की मीमांसा करते हुए भगवान से प्रश्नोत्तर करते हुए के समान ही कहते N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) हQ अथार्त् मानो भगवान् यहां प्रश्न कर रहे हQ कि हे समंतभद्र! मुझ म्ें देवें का आगमन, चमर, छत्रादि अनेकें विभूतियाँ हQ फिर भी तुम मुझे नमस्कार क्यें नहाR करते हो ? तब उत्तर म्ें स्वामी जी कहते हQ कि ‘‘हे भगवन्! आपके जन्मकल्याणक आदिकें म्ें देव, च›ाâवर्ती आदि का आगमन, आकाश म्ें गमन, छत्र, चामर, पुष्पवृि° आदि विभूतियाँ देखी जाती हQ किन्तु ये विभूतियाँ तो मायावी जनो म्ें भी हो सकती हQ अतएव आप हमारे लिए महान्-पूज्य नहाR हQ। इस पर भगवान् मानो पुन: प्रश्न करते हQ कि हे समंतभद्र! बा¢ा विभूतियें से तुमने हम्ें नमस्कार नहाR किया, तो न सही किन्तु मस्करी आदि म्ें असंभवी एेसे अंतरंग म्ें पसीना आदि का न होना एवं बहिरंग म्ें जो गंधोदकवृि° आदि महोदय हQ, जो कि दिव्य और सत्य हQ वे मुझम्ें हQ अत: आप मेरी स्तुति करिये। इस पर श्री समंतभद्र स्वामी कहते हQ कि अंतरंग और बहिरंग शरीरादि के महोदय भी रागादिमान देवें म्ें पाये जाते हQ अत: इनसे भी आप महान नहाR हQ अथार्त् देवें के शरीर म्ें भी पसीना, मलमूत्रादि नहाR है उनके यहाँ भी गंधोदकवृि° आदि वैभव होते हQ अत: इन महोदय से भी आप हमारे पूज्य नहाR हQ। मानो पुन: भगवान् कहते हQ कि हे समंतभद्र! रागादिमान देवें म्ें भी असंभवी एेसे तीथर्कृत संप्रदाय को चलाने वाला ‘मQ तीथËकर हूँू’ अत: मQ अवश्य ही तुम्हारे द्वारा स्तुति करने के योग्य हूँ। इस पर श्री समंतभद्रस्वामी प्रत्युत्तर देते हुए के समान कहते हQ कि हे भगवन्! आगम™प तीथर् को करने वाले सभी तीथËकरें के आगमें म्ें परस्पर म्ें विरोध पाया जाता है अत: सभी तो आप्त हो नहाR सकते अथार्त् बुद्ध, कपिल, ईÕार आदि सभी ने अपने-अपने आगमें को रचकर अपना-अपना तीथर् चलाकर अपने को तीथËकर माना है किन्तु सभी के आगम म्ें परस्पर म्ें विरोध होने से सभी सच्चे आप्त नहाR हो सकते हQ इसलिए इन सभी म्ें कोई एक ही परमात्मा-सच्चा आप्त हो सकता है, एेसा अथर् ध्वनित कर देते हQ। इस कारिका की अ°सहœाी टीका म्ें श्री विद्यानंद महोदय ने बहुत ही विस्तार से सभी सम्प्रदायें का परस्पर म्ें विरोध दशार्या है। अन्य सम्प्रदायें म्ें वेदें को प्रमाण मानने वाले वैदिक संप्रदायी हQ। उनम्ें मीमांसक, वैशेषिक, नैयायिक एवं सांख्य वैदिक कहलाते हQ और चावार्क, बौद्ध आदि वेद को नहाR मानने वाले अवैदिक कहलाते हQ। आजकल कुछ लोग वेद के मानने वालें को आस्तिक एवं नहाR मानने वालें को नास्तिक कहते हQ और उसम्ें जैन को भी नास्तिक म्ें लिया है, क्येंकि जैन भी वेदें को प्रामाणिक नहाR मानते हQ किन्तु वास्तव म्ें एेसी बात नहाR है, जो आत्मा, मोक्ष, परलोक आदि के आfस्तत्व को मानते हQ वे आस्तिक एवं आत्मा आदि के आfस्तत्व को न मानने वाले नास्तिक कहलाते हQ अत: चावार्क और शून्यवादी नास्तिक हQ बाकी सभी आस्तिक की कोटि म्ें आ जाते हQ। अस्तु! सभी के सम्प्रदायें के परस्पर विरोध का यहाँ विंâचित् दिग्दर्शन कराते हQ। चावार्क- पृथ्वी, जल, आfग्न और वायु इन चार जÌड तत्वें को ही मानता है। उसका कहना है कि इन्हाR भूतचतु°यें के मिलने से संसार बना है और इन्हाR भूतचतु°यें से आत्मा की उत्पत्ति होती है। ये चावार्क परलोकगमन, पुण्य-पाप का फल आदि नहाR मानते हQ। वेदांती एक बÇÿा™प ही तòव स्वीकार करते हQ, उनका कहना है कि एक परमबÇÿा ही तòव है। संपूणर् विÕा म्ें जो चेतन-अचेतन पदाथर् दिख रहे हQ हम और आप सभी उस एक परमबÇÿा की ही पयार्य्ें हQ। यह चर-अचर जगत मात्र आfवद्या का ही विलास है इत्यादि। बÌडे आश्चायर् की बात है कि एक जÌड से चैतन्य की उत्पत्ति मान रहा है, तो दूसरा चैतन्य बÇÿा से अचेतनेें की उत्पत्ति मान रहा है, दोनें म्ें सवर्था परस्पर विरोध है। एेसे ही बौद्ध सभी वस्तुआW को क्षणिक मानते हQ उनका कहना है कि एक क्षण के बाद सभी वस्तुएँ जÌड-मूल से न° हो जाती हQ, जो उनका ठहरना द्वितीय आदि क्षणें म्ें दिख रहा है, वह सब कल्पनामात्र है। वासना से ही एेसा अनुभव आता है। इधर सांख्य कहता है कि सभी वस्तुएँ सवर्था नित्य ही हQ कोई वस्तु न° नहाR होती है किन्तु तिरोभूत हो जाती है एवं उत्पत्ति भी नहाR है। वस्तु का आविभार्व ही होता है। मिóी से घट बनता नहाR है बल्कि मिóी म्ें घट सदा विद्यमान है। कुम्हार के प्रयोग से प्रगट हो गया है इत्यादि। इन दोनें म्ें भी सवर्था ३६ का आंकÌडा है। वैशेषिक- एक सदाशिव महेÕार को मानकर उसे सृि° का कतार् मानते हQ तो मीमांसक सवर्ज्ञ के आfस्तत्व को न मानकर वेद वाक्यें से ही सम्पूणर् सूक्ष्मादि अतीन्द्रिय पदार्थों का जानना मानते हQ। वेद को प्रमाण मानने वालें म्ें भी उन वेद वाक्यें को पृथक्-पृथक् अथर् करके कई लोग आपस म्ें विसंवाद करते हQ। भाó वेद वाक्यें का अथर् भावना करते हQ। प्रभाकर उन्हाR वाक्यें का अथर् नियोग करते हQ और वेदांती उन्हाR वाक्यें से बÇÿावाद को पु° करते हQ। अतएव श्री समंतभद्रस्वामी कहते हQ कि सभी के सम्प्रदायें म्ें परस्पर म्ें विरोध होने से सभी आप्त नहाR हो सकते हQ किन्तु कोई एक ही आप्त-सच्चा (१९) (२०)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) देव हो सकता है। पुन: मानें भगवान् यह प्रश्न करते हQ कि सच्चे आप्त म्ें आप क्या गुण चाहते हQ ? तो समंतभद्रस्वामी कहते हQ कि वह सवर्ज्ञ होना चाहिए। सूक्ष्म-परमाणु आदि, अंतरित-राम रावण आदि और दूरवर्ती-हिमवन, सुमे® आदि पदाथर् अनुमान ज्ञान से जाने जाते हQ जैसे कहाR पर धुएं को देखकर आfग्न का अनुमान लगाया जाता है, तो वह आfग्न किसी न किसी के प्रत्यक्ष अवश्य है और जिनके ये सूक्ष्मादि पदाथर् प्रत्यक्ष होते हQ, वे ही सवर्ज्ञ हQ। पुन: प्रश्न होता है कि हम संसारी प्राणी अल्पज्ञ हQ तो सवर्ज्ञ वैâसे बन सकते हQ, इस पर आचायर् कहते हQ कि दोष और आवरणें का अभाव किसी जीव म्ें सम्पूणर् ™प से हो सकता है क्येंकि हम लोगें म्ें दोष-रागादि भाव और आवरण-कर्मों की तरतमता देखी जाती है। किन्हाR म्ें रागादि दोष कम हQ किन्हाR म्ें उससे भी कम हQ। इससे यह अनुमान लगता है कि किसी जीव म्ें ये दोषादि सवर्था भी न° हो सकते हQ जैसे कि अपने निमित्तें से स्वणर् पाषाण से किó और कालिमा का सवर्था अभाव हो जाता है और सुवणर् शुद्ध हो जाता है। प्रश्न- दोष और आवरण म्ें क्या अन्तर है ? उत्तर- कमर् के उदय से होने वाले जीव के राग-द्वेष, अज्ञात आदि परिणाम दोष कहलाते हQ। इन्हW भावकमर् भी कहते हQ। ज्ञानावरण आदि पौद्गलिक कमर् आवरण कहलाते हQ इन्हW द्रव्य कमर् कहते हQ। इन दोनें म्ें परस्पर म्ें कायर्-कारण भाव निश्चिात है जैसे बीज से अंकुर एवं अंकुर से बीज की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। उसी प्रकार से दोष से आवरण और आवरण से दोष होते रहते हQ। बौद्ध- अज्ञानादि दोष स्वपरिणाम के निमित्त से ही होते हQ इसम्ेें आवरण (कमर् का उदय) कुछ भी नहाR कर सकता है। जैनाचायर्- एेसा नहाR है। यदि दोषें को स्वनिमित्तक ही मानोगे, तो इनका कभी अभाव नहाR हो सकेगा पुन: इसके नाश के बिना मोक्ष होना भी असंभव हो जावेगा। जैसे-जीव के जीवत्व आदि भाव स्वनिमित्तक होने से कभी न° नहाR होते हQ, इसलिए दोषें को आवरण निमित्तक मानना ही चाहिए। सांख्य- अज्ञान आदि दोष परनिमित्तक ही हQ क्येंकि ये स्वयं प्रधान- प्रकृति-जÌड के परिणाम हQ, आत्मा के नहाR। जैनाचायर्- ये दोष सवर्था परपुद्गल के निमित्त से ही हें, एेसी बात नहाR है अन्यथा मुक्त जीवें म्ें भी इनका प्रसंग आ जावेगा, क्येंकि पुद्गल वगर्णाएं तो वहाँ भी मौजूद हQ किन्तु एेसा नहाR देखा जाता है। उन सिद्धें म्ें अज्ञान आदि दोष के न होने से केवल पुद्गल के निमित्त से वहाँ पर कमर्बंध नहाR होता है। निष्कषर् यह निकलता है कि राग-द्वेष आदि से कमर्बंध होता है और कमर् के उदय से दोष होते हQ। जैसे-ज्ञानावरण कमर् के उदय से जीव म्ें अज्ञान, दर्शनावरण के उदय से अदर्शन, दर्शनमोहनीय के उदय से मिथ्यात्व, चारित्रमोहनीय के उदय से अचारित्र आदि दोष होते हQ। वैसे ही प्रदोष, निन्हव, मात्सयर्, अंतराय आदि भावें के निमित्त से ज्ञानावरण, दर्शनावरण कमर् का आœाव होता है। केवली, श्राुत, संघ, धमर् आदि को झूठा दोष लगाने से दर्शनमोहनीय का एवं कषायें की ती›ाता से चारित्रमोहनीय का आœाव होकर बंध होता है। इस प्रकार से भावकमर् के लिए निमित्त कारण द्रव्यकमर् हQ एवं द्रव्यकमर् के लिए निमित्त कारण भावकमर् हQ, एेसा निश्चाय हो जाता है। जो लोग एेसा समझते हQ कि मेरी भूल से ही संसार है कमर् का उदय मेरा कुछ बिगाÌड नहाR सकता, उन्हW अपनी एकांत मान्यता को हटा देना चाहिए। प्रश्न- जैसे किसी जीव म्ें दोष और आवरण का पूणर्तया नाश हो सकता है, एेसे ही किसी जीव म्ें बुद्धि ज्ञान का भी पूणर्तया नाश मान लेना चाहिए ? उत्तर- ठीक है। हम स्याद्वादी हQ। किसी जीव ने पृथ्वीकाय आदि को शरीर™प से ग्राहण करके छोÌड दिया है, अत: उन पाषाण, मिóी आदि म्ें चैतन्य ज्ञान का सवर्था अभाव हो गया। इससे यह समझना चाहिए कि भस्म, लो‰ आदि पृथ्वीकाय सवर्था अजीव हQ। पृथ्वीकायिक म्ें ही जीव विद्यमान रहता है। दूसरी बात यह है कि मति, श्राुत आदि™प क्षयोपशम ज्ञान का अभाव हो जाता है किन्तु पूणर्-केवलज्ञान का किसी जीव म्ें अभाव होना संभव नहाR है। क्येंकि ज्ञान यह जीव का स्वाभाविक परिणाम है। आत्मा के परिणाम दो प्रकार के हQ-स्वाभाविक और आगंतुक। अनंतज्ञान आदि गुण स्वाभाविक हQ और अज्ञान आदि मल आगंतुक हQ। आगंतुक मिथ्यात्व, राग-द्वेष, अज्ञान आदि दोष के प्रतिपक्षी सम्यग्दर्शन आदि गुणें की वृद्धि हो जाने से दोषें का अभाव हो जाता है। मीमांसक- सम्पूणर् कर्मों से रहित भी आत्मा परमाणु, धमर्, अधमर् आदि अतीन्द्रिय पदार्थों को वैâसे जानेगा ? इनका ज्ञान तो वेद वाक्यें से ही होता है, अत: विÕा म्ें कोई सवर्ज्ञ नहाR हो सकता है। जैनाचायर्- सूक्ष्म, परमाणु आदि और राम-रावण, सुमे® आदि पदाथर् (२१) (२२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हQ क्येंकि वे अनुमान ज्ञान के विषय हQ। सवर्ज्ञ भगवान अतीन्द्रिय ज्ञान से ही सूक्ष्मादि पदार्थों को जानते हQ, इन्द्रिय ज्ञान से नहाR, क्येंकि इन्द्रियाँ तो वतर्मान और नियत पदाथर् को ही विषय करती हQ, भूत, भविष्यत् के अनंत पदार्थों को नहाR। वेद वाक्यें से सूक्ष्मादि पदार्थों का ज्ञान मानने म्ें तो सबसे पहले वेद को सवर्ज्ञ का वाक्य कहना होगा, अन्यथा हम और आप जैसे अल्पज्ञ का कथन निर्दोष नहाR हो सकेगा। अत: कोई न कोई कमर्मल-कलंक रहित अकलंक आत्मा सवर्ज्ञ, सवर्दर्शी है, वही निर्दोष है यह बात सिद्ध हो जाती है। अब वह निर्दोष, सवर्ज्ञ आत्मा कौन हो सकता है ? इस बात की सिद्धि करते हQ- वे निर्दोष सवर्ज्ञ आप ही हQ चावार्क- कोई तीथËकर प्रमाण नहाR हQ, न कोई आगम हQ, न वेद हQ अथवा न कोई तवर्क अनुमान ही है बस एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। पृथ्वी, जल, आfग्न और वायु इन भूतचतु°य से ही चैतन्य की उत्पत्ति होती है। जैनाचायर्- यह बात ठीक नहाR है, देखिए। यदि आप प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हQ तब तो कोई भी प्रत्यक्ष से सवर्ज्ञ के अभाव को सिद्ध नहाR कर सकते हQ। अच्छा! आप पहले इन्द्रिय प्रत्यक्ष से सारे विÕा म्ें घूमकर देख लो कि कहाR भी सवर्ज्ञ तीथËकर नहाR हQ, तभी आपका कहना सत्य होगा और यदि आपने सारे विÕा को देख लिया, जान लिया, तब तो आप स्वयं ही सवर्ज्ञ बन गये क्येंकि ‘सवË जानातीति सवर्ज्ञ:’ जो सभी को जानता है, वही सवर्ज्ञ है। तòवोपप्लववादी- सभी प्रमाण प्रमेय उपप्लुत ही हQ अथार्त् अभाव™प ही हQ, इसलिए सवर्ज्ञ कोई है ही नहाR। जैनाचायर्- आप सभी प्रमाण-ज्ञान, प्रमेय-जीवादि वस्तुआW का अभाव मानते हQ, तब आप अपना और अपनी मान्यता-शून्यवाद का आfस्तत्व स्वीकार करते हQ या नहाR ? यदि करते हQ तब तो सवर्था शून्यवाद नहाR रहा। यदि अपना तथा अपनी मान्यता का भी आfस्तत्व स्वीकार नहाR करते हQ, तब तो आपका कथन भी आfस्तत्व रहित होने से वैâसे माना जायेगा, जैसे कि आकाश का कमल नहाR माना जा सकता है। विशेष- मीमांसक, चावार्क और तòवोपप्लववादी ये तीनें सवर्ज्ञ को मानते ही नहाR हQ एवं बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक और बÇÿावादी ये लोग सवर्ज्ञ को तो मानते हQ किन्तु उनकी मान्यताएं गलत हQ, इस बात का स्प°ीकरण आगे समयानुसार होगा। हे भगवन्! जो आत्मा कमर्मल रहित निर्दोष और सवर्ज्ञ है वह आप ही हQ क्येंकि आपके वचन युक्ति और शाŒा से आfवरोधी हQ। वह आपका आfवरोध इ°-शासन, प्रसिद्ध-प्रत्यक्ष आदि प्रमाणें से बाधित नहाR होता है अथार्त् घातिया कर्मों के न° हो जाने से वीतरागता, सवर्ज्ञता और हितोपदेशिता ये तीन गुण आप अर्हंत म्ें ही घटित होते हQ अन्यत्र किसी म्ें घटित नहाR होते हQ, इसलिए आप अर्हंत ही निर्दोष सवर्ज्ञ हQ क्येंकि आपके वचनेें म्ें किसी प्रकार का विरोध न होने से आपका मत बाधा रहित सवर् प्राणी को हितकर है और आपके शासन म्ें संसार और मोक्ष तथा संसार के कारण और मोक्ष के कारण ये चार तòव बाधा रहित हQं। ये चारें बाधा रहित वैâसे हQ ? इनकी समीक्षा देखिए- मोक्ष की समीक्षा सांख्य- प्रकृति और पु®ष का भेदज्ञान हो जाने पर चैतन्यमात्र स्व™प म्ें आत्मा का अवस्थान हो जाना मोक्ष है। सवर्ज्ञता प्रधान-जÌड का स्व™प है आत्मा का नहाR, क्येंकि ज्ञानादि अचेतन हQ। वे प्रकृति के ही स्व™प हQ। जैनाचायर्- यह आपका कथन असंभव है। हमारे यहाँ तो अनंतज्ञान, दर्शन, सुख आदि स्व™प चैतन्य म्ें अवस्थान हो जाने को ही मोक्ष कहा है, क्येंकि ज्ञानादि आत्मा के स्वभाव हQ, जैसे-चैतन्य। वे ज्ञानादि आत्मा को छोÌडकर अन्यत्र अचेतन म्ें नहाR पाये जाते हQ। ज्ञान से ही आत्मा सुख-दु:ख का अनुभव करता है। ज्ञान को आत्मा का स्वभाव नहाR मानने पर तो आत्मा का आfस्तत्व ही समाप्त हो जावेगा। वैशेषिक- बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धमर्, अधमर् और संस्कार इन नव विशेष गुणें का नाश हो जाना ही मोक्ष है क्येंकि बुद्धि आदि आत्मा के स्वभाव नहाR हQ, आत्मा से भिVा हQ। जैनाचायर्- यह आपका कथन असंभव है। हमारे यहाँ तो अनंतज्ञान, दर्शन, सुख आदि स्व™प चैतन्य म्ें अवस्थान हो जाने को ही मोक्ष कहा है, क्येंकि ज्ञानादि आत्मा के स्वभाव हQ, जैसे-चैतन्य। वे ज्ञानादि आत्मा को छोÌडकर अन्यत्र अचेतन म्ें नहाR पाये जाते हQ। ज्ञान से ही आत्मा सुख-दु:ख का अनुभव करता है। ज्ञान को आत्मा का स्वभाव नहाR मानने पर तो आत्मा का आfस्तत्व ही समाप्त हो जायेगा। यदि मुक्ति म्ें बुद्धि-ज्ञान और सुख का ही विनाश माना जायेगा, तब मुक्ति के लिए कौन बुद्धिमान प्रयत्न करेगा। (२३) (२४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) ज्ञान आत्मा से सवर्था भिVा नहाR है कतार् और करण की अपेक्षा से कथंचित् ही भिVा है। हाँ! इतनी बात अवश्य है कि क्षायोपशमिक ज्ञान और सातावेदनीयजन्य सुख का तो हम लोग भी मुक्ति म्ें विनाश मान लेते हQ किन्तु क्षायिक-पूणर्ज्ञान और अतीन्द्रिय अव्याबाध सुख का तो मोक्ष म्ें अभाव नहाR है प्रत्युत ज्ञान और सुख की पूणर्ता के लिए ही मोक्ष पाने का प्रयत्न किया जाता है। वेदांतवादी- मुक्त जीव के अंनत सुख संवेदन™प ज्ञान तो है, किन्तु उन्हW बा¢ा पदाथर् का ज्ञान नहाR है। जैनाचायर्- पहले यह बताओ कि मुक्त जीव के इन्द्रियें का अभाव है इसलिए बा¢ा पदाथर् का ज्ञान नहाR है, या बा¢ा पदाथर् का अभाव है इसलिए उनका ज्ञान नहाR है ? यदि बा¢ा पदाथर् का अभाव कहW तो सुख का भी अभाव हो जायेगा, क्येंकि आप अद्वैतवादियें ने सुख को भी बा¢ा पदाथर् ही माना है। यदि इन्द्रिय का अभाव कहो, तब तो उन्हW सुख का अनुभव वैâसे होगा ? बौद्ध- आœाव रहित चित्त की उत्पत्ति ही मोक्ष है। जैनाचायर्- यह भी ठीक नहाR है क्येंकि ज्ञान क्षणें म्ें अन्वय पाया जाता है तथा निरन्वय क्षण क्षय (अन्वय रहित क्षण-क्षण म्ें क्षय होने की व्यवस्था) को एकान्त से स्वीकार करने पर आपके द्वारा मान्य मोक्ष की सिद्धि बाधित ही है। इस प्रकार से अन्य मतावलंबियें द्वारा मान्य मोक्ष तòव म्ें बाधा आती है, अत: जैनें द्वारा मान्य ‘कृत्स्नकमर्विप्रमोक्षो मोक्ष:’ सम्पूणर् कर्मों का आत्मा से पृथक् हो जाना मोक्ष है, वहाँ पर अनंत गुणें की सिद्धि हो जाती है। मोक्ष के कारण की समीक्षा- सांख्य ज्ञानमात्र को ही मोक्ष का कारण मानते हQ, सो भी ठीक नहाR है, क्येंकि सवर्ज्ञ भगवान के क्षायिक अनंतज्ञान की पूणर्ता हो जाने पर भी अघातिया कर्मों के शेष रहने से उनका परमौदारिक शरीर पाया जाता है, यदि ज्ञान उत्पVा होते ही मोक्ष हो जावे, तो यहाँ पर सवर्ज्ञ का रहना, उपदेश आदि देना नहाR घटेगा तथा यदि एकांत से ज्ञान ही मोक्ष का कारण मान लिया जावे, तो सभी के आगम म्ें दीक्षा आदि बालचारित्र का अनु‰ान एवं सकल दोषें के अभाव™प अभ्यन्तर चारित्र का जो वणर्न है, वह सब व्यथर् हो जावेगा किन्तु सभी ने तो दीक्षा ग्राहण, गे®आ वŒा धारण और ध्यान आदि को माना ही है। एेसे ही कोई मात्र सम्यग्दर्शन से या कोई-कोई मात्र चारित्र से, ि›ाâयाकांड से ही मुक्ति मानते हQ। उन सबकी मान्यता गलत है। हम जैनें ने तो ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणिमोक्षमागर्:’ इस आगम सूत्र से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनेें की एकता को ही मोक्ष माना है और यही मान्यता सुसंगत है इसलिए जैनाचायर् द्वारा मान्य मोक्ष के कारण तòव ठीक ही हQ। कोई मोक्ष को अकारणक ही कहते हQ किन्तु यह मान्यता बिल्कुल गलत है क्येंकि आfनमित्तक मोक्ष होने से तो हमेशा ही सभी जीवें को मोक्ष हो जावेगा, पुन: कोई संसारी और दु:खी रहेगा ही नहाR, किन्तु एेसा तो प्रत्यक्ष से ही बाधि् ात है। संसार की समीक्षा- सांख्य कहता है कि प्रकृति-जÌड को ही संसार है आत्मा को नहाR है, किन्तु एेसी एकांत मान्यता गलत है। हम देखते हQ कि जÌड के संसगर् से यह संसारी आत्मा संसार म्ें जन्म, मरण आदि अनेकें दु:खें को उठा रही है। ‘संसरणं संसार:’ संसरण करना-एक गति से दूसरी गति म्ें गमन करना इसी का नाम संसार है। इसके पंचपरिवतर्न की अपेक्षा पाँच भेद हQ-द्रव्य संसार, क्षेत्र संसार, काल संसार, भव संसार और भाव संसार। इनका विवेचन फिर कभी किया जावेगा, इसलिए संसार तòव भी सिद्ध ही है। संसार के कारण की समीक्षा- सांख्यें ने मिथ्याज्ञान मात्र को ही संसार का कारण माना है, सो ठीक नहाR है क्योWकि मिथ्याज्ञान का अभाव हो जाने पर भी राग आदि दोनें का अभाव न होने से संसार का अभाव नहाR होता है। यह बात स्वयं सांख्यें ने भी मान ली है एवं हम जैनें को मान्य संसार के कारण आगम म्ें प्रसिद्ध हQ ‘मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बंधहेतव:’ मिथ्यादर्शन, आfवरति, प्रमाद, कषाय और योग ये पाँच बंध के कारण हQ। बंध से ही संसार होता है अत: बंध के कारण ही संसार के कारण माने गये हQ। किन्हाR का कहना है कि संसार के कारण मिथ्यात्व आदि अनादिकालीन हQ अत: ये निर्हेतुक हQ किन्तु एेसी बात नहाR है यद्यपि ये संसार के कारण अनादि हQ फिर भी अहेतुक (अकारक) नहाR हQ। इनके कारण द्रव्यकमर् मौजूद हQ तथा द्रव्यकमर् के कारण ये भावकमर् हQ, इनम्ें परस्पर म्ें कायर्-कारण भाव पाया जाता है इसीलिए इन मिथ्यात्व आदि कार्यों का सम्यग्दर्शन आदि कारणें से विनाश भी हो सकता है अन्यथा निर्हेतुक का विनाश होना असंभव ही हो जाता। इस प्रकार से आप्त-अर्हंत भगवान् के शासन म्ें मोक्ष और मोक्ष के कारण तथा संसार और संसार के कारण ये चार तòव अबाधित ™प से सिद्ध हQ अत: आपके वचन युक्ति और शाŒा से आfवरोधी सिद्ध हQ और इसीलिए आप निर्दोष (२५) (२६)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) परमात्मा हQ, यह बात सिद्ध हो जाती है। हे भगवन्! अपने शासन™पी अमृत से जो बहिर्भूत हQ और ‘‘मQ आप्त हूँ’’ इस प्रकार आfभमान से दग्ध हQ, उन एकांतवादियें का शासन प्रत्यक्षादि प्रमाणें से बाधित है। जैसे कि- सांख्य कहता है कि सुखादि अचेतन हQ क्येंकि वे उत्पVा होते हQ किन्तु जैनाचायर् सुख, ज्ञान आदि को चैतन्य आत्मा म्ें ही मानते हQ अन्यत्र नहाR और प्रत्येक द्रव्य को उत्पाद, व्यय, धÇौव्यात्मक मानते हQ। बौद्ध कहता है कि वणर् आदि परमाणु ही निविर्कल्प ज्ञान म्ें झलकते हQ, वे ही हQ, स्वंâध नाम की कोई चीज नहाR है। किन्तु जैनाचायर् कहते हQ कि परमाणु अत्यंत सूक्ष्म हQ। वे सवर्ज्ञ के अथवा मन:पयर्य ज्ञानी, अवधिज्ञानी के ही ज्ञान का विषय हो सकते हQ अन्य मति, श्राुत ज्ञान के विषय नहाR हो सकते हQ। दो, तीन, चार से लेकर अनंतानंत परमाणुआW का मिलकर स्वंâध बनता है, उसम्ें भी कुछ स्वंâध अचाक्षुष हQ। शब्दादि स्वंâध भी Âि° के विषय नहाR हQ मात्र चक्षु इन्द्रिय गम्य स्थूल स्वंâध ही अपने ज्ञान म्ें झलकते हQ और कल्पना मात्र नहाR हQ। चावार्क भूतचतु°य से चैतन्य की उत्पत्ति मानता है किन्तु चैतन्य तòव अनादिनिधन है। बÇÿााद्वैतवादी एक बÇÿा से ही चेतन-अचेतन की उत्पत्ति मानता है किन्तु सवर्था चेतन-अचेतन द्रव्य अपनी सत्ता को लिए हुए पृथक्-पृथक् ही हQ। हे नाथ! नित्य अथवा आfनत्य आदि एवंâात मान्यताआW के दुराग्राही स्व और पर के वैरी मिथ्याÂि° जनें म्ें किसी के यहाँ भी पुण्य-पापादि ि›ाâयाआW एवं परलोक आदि भी सिद्ध नहाR हो सकते हQ। यदि कोई कहे कि शून्यवादियें ने और अद्वैतवादियें ने तो स्वयं ही पुण्य- पाप, परलोक आदि को माना ही नहाR है अन्यथा उनका शून्यवाद नहाR टिकेगा और द्वैतवाद आ जायेगा। आचायर् कहते हQ कि एेसा कहना ठीक नहाR है क्येंकि उन लोगें ने भी पुण्य-पाप आदि को और परलोक को भी संवृति (कल्पना) से माना है और अद्वैतवादियेें ने आfवद्या से प्राय: सुख-दु:ख, पुण्य-पाप और इहलोक, परलोक को स्वीकार किया ही है किन्तु ये सब एकांतवादी दुराग्राही हQ अत: इनके यहाँ किसी भी तòव की सिद्धि असंभव है। सांख्य सभी तòवें को भाव™प ही मानता है उसके यहाँ अभाव या विनाश नाम की कोई चीज नहाR है उसका कहना है कि मिóी म्ें घट विद्यमान है, वुंâभार, दण्ड, चाक आदि निमित्तें से वह घट आविर्भूत हुआ है न कि उत्पVा। कुम्हार, चाक आदि दीपक की तरह ज्ञापक निमित्त हQ कारक निमित्त नहाR हQ इत्यादि। आचायर् कहते हQ कि यदि ‘अभाव’ को नहाR माना जाएगा, तो प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यंताभाव इन चारें अभावें का लोप हो जावेगा जो कि सवर्था वि®द्ध है। अब इन अभावें के लक्षण बताते हQ- प्रागभाव आदि का वणर्न भावैकांते पदाथार्ना - मभावानामपन्हवात्। सवार्त्मकमनाद्यन्त-मस्व™पमतावकम्।।९।। सांख्य एकांत से पदार्थों को भाव™प ही मानता है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि सभी पदार्थों को भाव™प ही मानने पर तो अभावें का लोप हो जायेगा। अभाव के चार भेद हQ-प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यंताभाव। प्रागभाव को नहाR मानने पर तो सभी कायर् अनादि हो जाय्ेंगे। प्रध्वंस धमर् का लोप करने पर सभी अनंत हो जाय्ेंगे। इतरेतराभाव के अभाव म्ें सभी पदाथर् सवार्त्मक हो जाय्ेंगे तथा अत्यंताभाव के न मानने से सभी पदाथर् अस्व™प-अपने स्वभाव से शून्य हो जाय्ेंगे। प्रागभाव- कायर् का उत्पVा होने के पहले न होना प्रागभाव है। जैसे-घट बनने के पहले मिóी ™प कारण म्ें घट™प कायर् का अभाव है वह प्राक्-पहले अभाव न होना प्रागभाव है। द्रव्य की अपेक्षा प्रागभाव अनादि है और पयार्य की अपेक्षा आदि है। घट बनाने के लिए मिóी के पिंड को चाक पर रखकर घुमाया। उसकी स्थास, कोश, कुशूल आदि पयार्य्ें बनाR उनम्ें जिस क्षण के बाद ही घट बनने वाला है उस क्षण को त्र+जुसूत्र नय की अपेक्षा से प्रागभाव कहते हQ इसके पूवर्-पूवर् पयार्यें को भी प्रागभाव कहते हQ किन्तु आfन्तम क्षण की पयार्य का विनाश होने पर ही घट बनता है इसलिए प्रागभाव का अभाव होकर घट बनता है। यदि मिóी म्ें घट का प्रागभाव न मान्ें तो घटद्रव्य अनादिकाल से मिóी म्ें बना रहेगा। प्रागभाव के न मानने पर कायर्-द्रव्य अनादि हो जाय्ेंगे, अत: प्रागभाव मानना ज™री है। प्रध्वंसाभाव- यदि प्रध्वंस को न मान्ें तो घट आदि कार्यों का कभी भी नाश नहाR होगा पुन: वे अनंत हो जाय्ेंगे किन्तु एेसा नहाR है। विद्यमान घट म्ें प्रध्वंसाभाव का अभाव करके अथार्त् घट का प्रध्वंस करके कपाल उत्पVा होते हQ इसलिए प्रध्वंसाभाव भी वास्तविक है। (२७) (२८)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) इतरेतराभाव- एक पयार्य का दूसरी पयार्य म्ें न होना इतरेतराभाव है। जैसे-पुद्गल की पुस्तक पयार्य म्ें चौकी पयार्य का अभाव है। जीव की मनुष्य पयार्य म्ें देव पयार्य का अभाव है। यदि इस इतरेतराभाव को न माना जाय, तो एक मनुष्य पयार्य म्ें देव, नारक आदि पयार्य्ें आ जाय्ेंगी। पुन: सभी पदाथर् अन्य स्व™प हो जाव्ेंगे। अत: इतरेतराभाव भी मान्य है। अत्यंताभाव- एक द्रव्य म्ें दूसरे द्रव्य का अभाव अत्यंताभाव है। जैसे- जीव द्रव्य पुद्गल™प नहाR होता है। पुद्गल जीव™प नहाR होता है। सांख्यमत बौद्ध आदि मत ™प नहाR होता है, इत्यादि ™प से यदि अत्यंताभाव को नहाR मान्ेंगे तो सभी वस्तुएँ पर स्वभाव के मिश्राण हो जाने से अपने स्वभाव से शून्य हो जाय्ेंगी, तो वे अवस्तु हो जाव्ेंगी अत: यह भी आवश्यक है। भावाथर्- जिसके अभाव म्ें नियम से कायर् की उत्पत्ति होवे, वह प्रागभाव है। जिसके होने पर नियम से कायर् का विनाश होवे वह प्रध्वंस है। जिसके सद्भाव म्ें दूसरी अनंतें पयार्यें का अभाव रहे वह इतरेतराभाव है। घट-पट का परस्पर म्ेें इतरेतराभाव है। भिVा-भिVा द्रव्य म्ें अत्यंताभाव है। जीव स्व™प से आfस्तत्व™प होकर भी पुद्गलादि से अभाव™प है क्येंकि सभी पदाथर् स्व™प से भाव™प और पर™प से अभाव™प लक्षण वाले ही हQ। मीमांसक शब्द को नित्य मानता है अत: उसम्ें प्रागभाव नहाR मानता है किन्तु जैनाचार्यों ने शब्द को पौद्गलिक शब्द वगर्णा ™प होने से नित्य माना है और पयार्य की Âि° से आfनत्य माना है इसलिए शब्द म्ें प्रागभाव घटित हQ। वक्ता के तालु आदि प्रयत्न से शब्द उत्पVा होते हQ और विन° भी होते हQ। नैयायिक अभाव को सवर्था तुच्छाभाव ™प ही मानता है किन्तु जैनाचायर् अभाव को भावांतर ™प मानते हQ। जैसे-‘अजैन:’ कहने से जैन के बजाय और किसी अन्य धमर् वाले व्यक्ति का बोध होता है न कि सवर्था अभाव का। दीपक के बुझने पर प्रकाश का अभाव हुआ मतलब अंधकार का सद्भाव हुआ। प्रकाश और अंधकार दोनें पुद्गल की ही पयार्य्ें हQ अत: जैनाचार्यों द्वारा मान्य अभाव भावांतर (भिVा भाव) ™प ही है। नैयायिक शब्द को अमूतिर्क-आकाश का गुण अमूतिर्क ही मानता है उसका कहना है कि ‘शब्द पुद्गल का स्वभाव नहाR है क्येंकि उसका स्पर्श नहाR पाया जाता है सुखादि के समान’ यदि शब्द को पुद्गल की पयार्य मानोगे, तब तो उनका चक्षु से देखना, मयार्दा को उल्लघंन कर आगे भी पैâलना, बिखरना, कणर् म्ें भर जाना, एक ही श्रोत्रेन्द्रिय म्ें प्रवेश हो जाना आदि अनेक दोष आते हQ। शब्द तो निश्छिद्र महल के भीतर से निकल जाते हQ एवं आभ्यंतर म्ें बाहर से आकर प्रवेश कर जाते हQ, व्यवधान का भेदन भी नहाR करते हQ अतएव वे पौद्गलिक नहाR हQ। जैनाचायर्- शब्द पुद्गल की ही पयार्य हQ। अत: मूतिर्क ही हQ, स्पर्श, रस, गंध, वणर् से सहित हQ क्येंकि ‘‘स्पर्शरसगंधवणर्वन्त: पुद्गला:’ यह सूत्र है। बहुत से पुद्गल स्वंâध भी एेसे अचाक्षुष हQ जिनका स्पर्श आदि व्यक्त नहाR है, एतावता उनको अमूतिर्क नहाR कह सकते एवं न उनका अभाव ही कर सकते हQ तथा शब्द से प्रतिघात भी देखा जाता है। कोई मोटी एवं कÌडी पूÌडी आदि खा रहा है, उसके कÌड-कÌड शब्दें से प्राय: प्रतिघात देखा जाता है। जैसे-कोई पु®ष उच्चध्वनि से पाठ कर रहा है और दूसरा धीरे-धीरे बोल रहा है, तो उसकी ध्वनि दब जाती है अत: शब्द का स्पर्श नहाR मानना गलत है। जो आपने ‘चक्षु आदि से दिखना चाहिए’ इत्यादि दोष दिये हQ वे भी दोष गंध परमाणुआW म्ें भी मानने पÌडWगे क्येंकि गंध परमाणु भी पुद्गल की पयार्य हQ, वे भी नहाR दिखते हQ। यदि आप कहW कि गंध परमाणु अÂश्य हQ अत: चक्षु इन्द्रिय से नहाR देखे जाते हQ, पुन: शब्दें को भी तथैव मानो, क्या बाधा है ? पवन से प्रेरित होने पर उन शब्दें का विस्तृत होना आदि मानो तो गंध परमाणुआW म्ें भी मानना पÌडेगा। भित्ति आदि से परमाणुआW का प्रतिघात प्रसिद्ध है तथैव शब्दें का भी प्रतिघात प्रसिद्ध है एवं जो आपने कहा कि स्वंâध™प से परिणत मूतिर्मान शब्द परमाणुआW के द्वारा श्रोता का कान पूणर्तया भर जायेगा एवं पौद्गलिक शब्द एक ही श्रोता के कान म्ें प्रवि° हो जाव्ेंगे पुन: उसी योग्य देश म्ें स्थित अन्य श्रोताआW को कुछ भी शब्द सुनाई नहाR पÌडWगे, इत्यादि दोष तो आपके गंध परमाणुआW म्ें भी आ जाव्ेंगे। वे भी गंध परमाणु नाक म्ें भर जाव्ेंगे तो स्वांस लेना ही कठिन हो जावेगा एवं वे नाक म्ें भी घुस जाव्ेंगे तो अन्य किसी सूंघने वाले को कुछ भी गंध नहाR आ सकेगी, इस पर नैयायिक ने कहा कि हमारे यहाँ एेसा माना है कि सÂश परिणाम वाले गंध परमाणु सब तरफ पैâल जाते हQ अत: उक्त दोष नहाR आते हQ। यदि समान परिणाम वाले गंध परमाणु सब तरफ पैâल जाते हQ अत: उक्त दोष नहाR आते हQ तब तो समान परिणाम वाले शब्द परमाणु भी नाना दिशाआW म्ें पैâल जाते हQ अत: एक श्रोता को ही सुनाई देवे इत्यादि दोष नहाR आते हQ। यदि (२९) (३०)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) आप कहW कि गंध परमाणुआW को ज्ञान विशेष की अन्यथानुपपत्ति होने से निश्चाय हो जाता है उसम्ें भाग्य की कल्पना नहाR है किन्तु शब्द के आगमन म्ें भाग्य की कल्पना कीजिए। इस पर आचार्यों का कहना है कि-श्रोताआW के जिन-जिन श्राुतज्ञानावरण ™प शब्दावरण का क्षयोपशम होता है उसी प्रकार से उपलब्धि योग्य परिणाम विशेष के होने से उन-उन ही अक्षरें का सुनना होता है। जो आपने कहा कि निश्छिद्र महल से निकलना आदि होने से शब्द पुद्गल नहाR है सो भी ठीक नहाR है क्येंकि छिद्ररहित भवन से निकलना एवं प्रवि° होना पुद्गल म्ें वि®द्ध नहाR है क्येंकि वे शब्द पुद्गल सूक्ष्म स्वभाव वाले हQ जैसे तेल, घी आदि चिकने पदाथर् निश्छिद्र घÌडे से बाहर निकलकर घÌडे को चिकना कर देते हQ एवं उष्ण, शीत, स्पर्श आदि निश्छिद्र घÌडे म्ें प्रवि° होकर उसकी अभ्यंतर की वस्तु गमर् या ठंडी कर देते हQ यह बात सवर्जन सुप्रसिद्ध है। तòवाथर्सूत्र म्ें ‘‘शब्दबंधसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवंतश्चा’’ इस सूत्र म्ें शब्द को पुद्गल की पयार्य सिद्ध किया है। अत: शब्द आकाश का गुण नहाR है और न अमूतिर्क ही है, एेसा समझना चाहिए। यही कारण है कि आजकल शब्दें को टेपरिकार्डर म्ें भर लेते हQ, रेडियो, टेलीफोन आदि द्वारा हजारें मील दूर पहुँचा देते हQ यह सब पौद्गलिक शक्ति का ही विकास हो रहा है। इन सभी आविष्कारें से भी शब्द पौद्गलिक और मूतिर्क सिद्ध हो रहे हQ। अ°सहœाीकार आचायर्वयर् श्री विद्यानंद महोदय ने ग्रांथ के प्रथम अध्याय म्ें भावैकांत का खंडन किया है अथार्त् जो सांख्य आदि सभी पदार्थों को सवर्था सद्भाव ™प ही स्वीकार करते हQ उनका खंडन करके प्रागभाव आदि चार प्रकार के अभावें को सिद्ध किया है पुन: जो लोग सभी पदार्थों को अभाव ™प ही मानते हQ उनका निरसन कर रहे हQ। बौद्धें के यहाँ माध्यमिक नाम का एक भेद है। ये लोग सभी जगत को सवर्था शून्य™प ही मानते हQ। उनका कहना है कि ‘यह जगत सवर्था शून्य™प ही है जो कुछ भी प्रतिभास हो रहा है वह असत्य है। जो चेतन-अचेतन तòव दिख रहे हQ, वे संवृति (कल्पना) ™प हQ एवं शून्यवाद को सिद्ध करने म्ें जो आगम अनुमान आदि प्रमाण हQ वे भी काल्पनिक हQ। इस पर जैनाचायर् प्रश्न करते हQ कि आप बौद्धें के यहाँ वह ‘संवृति’ क्या चीज है ? यदि कहो कि संवृति का अथर् है अपने स्व™प से होना’ तब तो हमने भी स भी वस्तुआW का स्व™प से आfस्तत्व माना है। यदि कहो कि ‘संवृति-पर™प से न होना’ यह अथर् भी हमारे अनुवूâल ही है क्येंकि हम लोग भी वस्तु म्ें पर™प से नास्ति धमर् मानते हQ। यदि कहो कि ‘विचारें का न होना संवृति है’ तब तो शून्य के साध् ाक वाक्य भी वैâसे बन्ेंगे ? अत: बÌडे आश्चायर् की बात है कि दिग्नागाचायर् आदि आज भी इस शून्यवाद को सिद्ध करने म्ें लगे हुए हQ इसम्ें उनके मोहनीय कमर् के ती›ा उदय व् ोâ सिवाय और कोई भी कारण नहाR हो सकता है क्येंकि जब सवर्था शून्यवाद ही है, तब आपके बुद्ध भगवान, आगम आदि भी वैâसे सिद्ध हो सव्ेंâगे ? बौद्ध- वास्तव म्ेें हमारे यहाँ बुद्ध भगवान और आगम आदि सभी विभüम ™प ही हQ। ये सभी संवृति से ही मान्य हQ अथार्त् काल्पनिक हQ। जैन- तब तो प्रश्न यह होता है कि इस विभüम म्ें विभüम है या आfवभüम ? यदि विभüम म्ें आfवभüम है तो सभी विभüम ™प नहाR रहे और यदि विभüम म्ें भी विभüम है तो विभüम वैâसे रहेगा ? आfपतु विभüम म्ें विभüम के हो जाने से आfवभüम-सत्य ही सिद्ध हो जायेगा इसलिए सवर्था नैरात्म्यवाद श्रोयस्कर नहाR है क्येंकि उसके मानने वाले तो सबसे पहले अपना, अपने भगवान का, सभी का ही घात कर लेते हQ। कोई-कोई भाó लोग भाव और अभाव इन दोनें को भी मान रहे हQ किन्तु दोनें को परस्पर निरपेक्ष मानते हQ, इसलिए उनकी मान्यता भी गलत है। क्येंकि सभी वस्तु स्व™प के समान पर™प से आfस्त™प एवं पर™प के समान स्व™प से नास्ति™प नहाR है तथा आfस्त धमर् नास्तित्व की एवं नास्ति धमर् आfस्तत्व की अपेक्षा रखता है। इसलिए ‘उभयैकात्म्य’ भी गलत है। कोई बौद्ध लोग वस्तु को सवर्था सत्-असत् धमर् से रहित होने से अवक्तव्य मानते हQ। उनका कहना है कि प्रत्येक वस्तु सवर्था ‘अवाच्य’ है क्येंकि शब्दें से उसका कथन नहाR कहा जा सकता है किन्तु यह एकान्त भी श्रोयस्कर नहाR है। जैनाचायर् वस्तु को सत्™प-भाव™प भी मानते हQ, असत्-अभाव™प भी मानते हQ, भावाभाव-उभयात्मक भी मानते हQ तथा अवक्तव्य-अवाच्य भी मानते हQ। सो वैâसे ? भावाभावाद्यनेकांत सिद्धि हे भगवन्! आपके शासन म्ें सभी वस्तुएँ कथंचित् भाव-आfस्त-सत्™प हQ और वे ही सभी वस्तुएँ कथंचित् अभाव-नास्ति-असत्™प हQ, कथंचित् उभय आदि सप्तभंग™प से प्रसिद्ध हQ। यथा- (३१) (३२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) ‘प्रश्नवशादेकत्र वस्तुन्यविरोधेन विधिप्रतिषेधकल्पनासप्तभंगी’ प्रश्न के निमित्त से एक ही वस्तु म्ें आfवरोध ™प से विधि और निषेध की कल्पना सप्तभंगी कहलाती है। इस सप्तभंगी को जीव द्रव्य म्ें घटित करते हQ- १. स्यात् जीव द्रव्य आfस्त ™प है, २. स्यात् जीव द्रव्य नास्ति ™प है, ३. स्यात् जीव द्रव्य आfस्त नास्ति ™प है, ४. स्यात् जीव द्रव्य अवक्तव्य है, ५. स्यात् जीव द्रव्य आfस्त अवक्तव्य है, ६. स्यात् जीव द्रव्य नास्ति अवक्तव्य है, ७. स्यात् जीव द्रव्य आfस्तनास्ति अवक्तव्य है, यहाँ पर आfस्तत्वादि एकान्त का निषेधक और अनेकांत का द्योतक ‘कथंचित्’ इस अपरनाम वाला ‘स्यात्’ शब्द बहुत ही महत्वशाली है, उसी का स्प°ीकरण- प्रथम भंग म्ें जीव द्रव्य स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा से आfस्त™प है। द्वितीय भंग म्ें वही जीव द्रव्य पर-अजीवादि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा से नास्ति ™प है अथार्त् जीव द्रव्य म्ें पर-अजीव का आfस्तत्व नहाR है। वही जीव द्रव्य ›ाâम से स्व और पर दोनें की अपेक्षा करने से आfस्तनास्ति ™प है। वही जीव द्रव्य युगपत् दोनें धर्मों को न कह सकने से अवक्तव्य-अवाच्य ™प है। वही जीव द्रव्य स्वचतु°य से तथा युगपत् स्वपरचतु°य से विवक्षित करने से ‘आfस्त अवक्तव्य’ इस पाँचव्ें भंग ™प है। वही जीवद्रव्य परचतु°य तथा युगपत् स्वपरचतु°य की अपेक्षा से नास्ति अवक्तव्य ™प है। वही जीवद्रव्य स्वपरचतु°य की ›ाâम और युगपत् अपेक्षा रखने से ‘आfस्तनास्ति अवक्तव्य’ इस सातव्ें भंग ™प है। यह कथन बिल्कुल ठीक नहाR है क्येंकि प्रत्येक वस्तुएँ स्व™प से सत् ™प एवं पर™प से असत्-अभाव ™प हQ तथा आfस्त धमर् नास्तित्व का आfवनाभावी है वैसे ही नास्ति धमर् आfस्तत्व के बिना नहाR रह सकता है। जब प्रथम भंग म्ें भाव प्रधान रहता है, तब शेष छहें भंग गौण हो जाते हQ एवं जब द्वितीय भंग का अभाव धमर् प्रधान रहता है, तब भी शेष छह भंग गौण हो जाते हQ। इस प्रकार से ‘आfपर्तानपिर्त सिद्धे:’ सूत्र के अनुसार आfपर्त-विवक्षित धमर् प्रधान रहता है तथा अनपिर्त-आfववक्षित धमर् गौण रहता है तभी वस्तु तòव की सिद्धि होती है। जैसे जीव का जब नित्य धमर् प्रधान किया जाता है, तब आfनत्य धमर् न° न होकर गौण हो जाता है एवं जब आfनत्य धमर् विवक्षित-कहा जाता है तब नित्य धमर् आfववक्षित-गौण हो जाता है। ये आfस्त-नास्ति नित्य-आfनत्य आदि धमर् यद्यपि परस्पर विरोधी दिखते हQ लेकिन प्रत्येक वस्तु म्ें पाये ही जाते हQ। प्रश्न- एक वस्तु म्ें प्रत्यक्षादि से वि®द्ध भी विधि प्रतिषेध कल्पना कर लेना चाहिए ? उत्तर- नहाR, क्येंकि सूत्र म्ें ‘आfवरोधेन’ पद है, जिसका अथर् है प्रत्यक्ष अनुमान और आगम आदि से आfव®द्ध धर्मों म्ें ही सप्तभंगी घटित करना। प्रश्न- प्रत्येक वस्तु म्ें अनंत धमर् हQ अत: ‘अनंत भंगी’ हो जाव्ें, सात ही भंग क्यें ? उत्तर- प्रत्येक वस्तु के अनंत धर्मों म्ें से प्रत्येक धमर् म्ें सप्तभंगी घटित होती है इसलिए अनंत भंगी नहाR हेंगी। भंग सात ही क्यें ? शिष्यें के द्वारा उतने ही प्रश्न होते हQ। सात ही प्रश्न क्यें ? तो सात प्रकार की ही जिज्ञासा होती हQ। जिज्ञासा सात प्रकार की ही क्यें? तो सात प्रकार का संशय होता है। संशय सात प्रकार का ही क्यें ? तो उस संशय के विषयभूत वस्तु के धमर् सात प्रकार के ही हQ। इस प्रकार से सप्तभंगी से सिद्ध वस्तु ही अथर् ि›ाâयाकारी हQ अन्यथा वह वस्तु अवस्तु-आकाश पुष्पवत् सवर्था ही अभाव™प हो जाएगी अत: हे भगवन्! सभी प्रकार के विरोध आदि दोषें से रहित आपका स्याद्वाद शासन जयवंत होवे। N : श् (३३) (३४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (३५) (३६) अथ द्वितीय: परिच्छेद: अद्वैत एकांत म्ें दोष अद्वैतैकान्तपक्षेÓपि, °ो भेदो वि®ध्यते। कारकाणां ि›ाâयायाश्चा, नैवंâ स्वस्मात्प्रजायते।।२४।। यदि अद्वैत™प है सब जग, यह एकांत लिया जावे। तब तो कारक और ि›ाâया का, भेद दिखे वह नहिं पावे।। दिखता है साक्षात् भेद जो, वह भी है वि®द्ध होगा। क्येंकि एक ही बÇÿाा ही, निज से उत्पVा नहाR होता।।२४।। अन्वयाथर्- (अद्वैतैकांतपक्षेÓपि कारकाणां ि›ाâयायाश्चा °: भेद: वि®ध्यते) यदि अद्वैत ™प एकांत पक्ष लिया जाये, तो कारक और ि›ाâयाआW का जो भेद दिख रहा है, वह वि®द्ध हो जाता है (एवंâ स्वस्मात् न जायते) क्येंकि कोई भी अपने से ही आप उत्पVा नहाR हो सकता है।। कारिकाथर्- बÇÿााद्वैत, शब्दाद्वैत, ज्ञानाद्वैत, चित्राद्वैत आदि अद्वैत एकांत पक्ष म्ें भी कारक और ि›ाâयाआW का देखा गया भेद विरोध को प्राप्त होता है, क्येंकि कोई भी एक (बÇÿा) अपने से ही आप उत्पVा नहाR होता है। अद्वैत म्ें शुभ-अशुभ आदि द्वैत नहाR बनते कमर्द्वैतं फलद्वैतं, लोकद्वैतं च नो भवेत्। विद्याÓविद्याद्वयं न स्याद्बंधमोक्षद्वयं तथा।।२५।। पुण्य-पाप द्वय, सुख-दुख फल द्वय, इह परलोक द्वैत जग म्ें। विद्या और आfवद्या द्वय अ®, बंध-मोक्ष द्वय नहिं हेंगे।। इन द्वैतें म्ें एक द्वैत भी, यदि मानें अद्वैत नहाR। अत: बÇÿा या शब्द ज्ञानमय, जगत् एकमय घटे नहाR।।२५।। अन्वयाथर्- (कमर्द्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं च नो भवेत्) इस अद्वैत सिद्धांत के मानने से शुभ-अशुभ कमर् का युगल, उसके फलस्व™प पुण्य-पाप का युगल अथवा सुख-दु:ख का युगल, इहलोक-परलोक का युगल™प द्वैत नहाR बन सकता है। (विद्याविद्याद्वयं तथा बंधमोक्षद्वयं न स्यात्) इसी प्रकार विद्या और आfवद्या का द्वैत तथा बंध और मोक्ष का द्वैत भी नहाR बन सकता है।। कारिकाथर्- इस अद्वैत एकांत पक्ष म्ें दो कमर्, दो फल, दो लोक नहाR बन सकते हQ उसी प्रकार से विद्या और आfवद्या, बंध और मोक्ष भी घटित नहाR हो सकते हQ।। अद्वैत म्ें द्वैत आ जाता है हेतोरद्वैतसिद्धिश्चोद्-द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययो:। हेतुना चेद्विना सिद्धि-र्द्वैतं वा*्मात्रतो न किम्।।२६।। यदि अद्वैतसिद्धि हेतू से, तब तो साध्य और साधक। द्वैत हुए क्येंकि बÇÿाा है, साध्य हेतु उसका ज्ञापक।। यदी हेतु के बिना सिद्ध है, यह अद्वैत वचन से ही। तब तो द्वैतसिद्धि भी क्यें नहिं, होवे वचनमात्र से ही।।२६।। अन्वयाथर्- (हेतो: अद्वैतसिद्धि: चेत् हेतु साध्ययो: द्वैतं स्यात्) यदि हेतु से अद्वैत की सिद्धि मानें तब तो हेतु और साध्य के मानने पर द्वैत हो जाता है (चेत् हेतुना बिना सिद्धि: वा*्मात्रत: द्वैतं विंâ न) यदि हेतु के बिना ही अद्वैत की सिद्धि मानते हो, तब तो वचन मात्र से ही द्वैत की सिद्धि भी क्यें न हो जावे ? कारिकाथर्- यदि हेतु से अद्वैत की सिद्धि होती है, तब तो हेतु और साध्य ये दो हो गये अत: द्वैत ही सिद्ध हुआ न कि अद्वैत। और यदि हेतु के बिना वचन मात्र से अद्वैत की सिद्धि होती है तब तो वा*्मात्र से ही द्वैत की सिद्धि क्यें न हो जावे। भावाथर्- जब हेतु से अद्वैत को सिद्ध किया जावेगा, तब अद्वैत साध्य की कोटि म्ें आ गया और हेतु तथा साध्य से द्वैत ही बन गया। अपने हाथ से ही अपने पैर पर कुल्हाÌडी मार ली। सिद्ध करने चले थे अद्वैत को, सिद्ध हो गया द्वैत। यदि हेतु के बिना ही अद्वैत की सिद्धि कहो, तब तो अपने वचनमात्र से ही तो अद्वैत को मानोगे, फिर भला वचन मात्र से द्वैत भी क्यें न हो जावे ? अद्वैत के बिना द्वैत वैâसे ? अद्वैतं न विना द्वैता-दहेतुरिव हेतुना। संज्ञिन: प्रतिषेधो न, प्रतिषेध्याÂते क्वचित्।।२७।। द्वैत बिना अद्वैत न होगा, नञ् समास से बना सही। यथा हेतु के बिना अहेतू, हो सकता है कभी नहाR।। वस्तू का निषेध-प्रतिषेध, योग्य वस्तु बिन बने नहाR। है निषिद्ध ‘आकाशकुसुम’ फिर भी वह वृक्षें म्ें नित ही।।२७।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (३७) (३८) अन्वयाथर्- (द्वैतात् विना अद्वैतं न हेतुना अहेतु: इव) द्वैत के बिना अद्वैत नहाR हो सकता है जैसे कि हेतु के बिना अहेतु शब्द नहाR बन सकता (प्रतिषेध्यात् त्र+ते क्वचित् संज्ञिन: प्रतिषेधो न) क्येंकि निषेध करने योग्य वस्तु के बिना किसी भी नाम वाली वस्तु का निषेध नहाR किया जा सकता है। कारिकाथर्- जिस प्रकार से हेतु के बिना अहेतु सिद्ध नहाR है, उसी प्रकार से द्वैत के बिना अद्वैत भी नहाR बन सकता। क्येंकि प्रतिषेध्य-द्वैतादि के बिना अद्वैत™प का प्रतिषेध भी नहाR हो सकता है।। भावाथर्- द्वैत एक नाम सहित-संज्ञी शब्द है और उसका निषेध करने वाला अद्वैत शब्द है ‘न द्वैतं-अद्वैतं’ के अनुसार अद्वैत द्वैत के बिना नहाR बन सकता है। पृथक्त्वैकांत नहाR बनता पृथक्त्वैकान्तपक्षेÓपि, पृथक्त्वादपृथक्तु तौ। पृथक्त्वे न पृथक्त्वं स्यादनेकस्थौ ¢ासौ गुण:।।२८।। इस पृथक्त्वैकांत पक्ष म्ें, द्रव्य गुणें से पृथक्त्व गुण। अपृथक् है या पृथक् कहो यदि, अपृथक् है तब पक्ष अघट।। यदी कहो यह द्रव्य गुणें से, अलग पÌडा तब सिद्ध नहाR। क्येंकि एक अनेकें म्ें यह, रहता अत: आfसद्ध सही।।२८।। अन्वयाथर्- (पृथक्त्वैकांतपक्षेÓपि पृथक्त्वात् अपृथक्तु तौ) यदि प्रत्येक द्रव्य गुण आदि के पृथक्ता का ही एकांत माना जावे, तो पृथक् गुण से द्रव्यादि के भिVा होने से वे गुणगुणी अपृथव्â आfभVा हो जाव्ेंगे (पृथक्त्वे पृथक्त्वं न स्यात् असौ गुण: हि अनेकस्थ:) यदि वे गुण गुणी पृथक् ही हQ, तब तो पृथक् नाम का कोई गुण सिद्ध नहाR होगा, क्येंकि वह एक होते हुए भी अनेकें म्ें स्थित रहने वाला माना गया है। अत: उसके पृथक्त्व ™प म्ें कोई आfस्तत्व नहाR बनता है।। कारिकाथर्- पृथक्त्वैकांत पक्ष म्ें भी पृथक्त्वगुण से पदार्थों को भिVा मानने पर पृथक्-पृथक् ™प रहे हुए पदाथर् गुण और गुणी सब अपृथक्-आfभVा हो जाय्ेंगे। एवं सभी को पृथक्त्व-भिVा-भिVा मानने पर पृथक्त्वगुण की सिद्धि नहाR हो सकेगी, क्येंकि यह पृथक्त्व गुण अनेक पदार्थों म्ें रहने वाला माना गया है।। बौद्ध की पृथक्त्व मान्यता म्ें दोष संतान: समुदायश्चा साधम्यर्ञ्च निरंकुश:। प्रेत्यभावश्चा तत्सवË न स्यादेकत्व-निन्हवे।।२९।। यदि एकत्व नहाR मानो, संतान™प अन्वय वैâसा? नहिं होवे समुदाय सÂशता, नहिं परलोक गमन होगा।। बाल-वृद्ध पयार्य अनेकें, नहाR घटWगी जो निबार्ध। क्षणिवैâकांत पक्ष म्ें क्षण-क्षण, म्ें होता है सब कुछ नाश।। २९।। अन्वयाथर्- (एकत्वनिन्हवे संतान: समुदाय: च साधम्यË च प्रेत्यभावश्चा निरंकुश:) यदि एकत्व का सवर्था लोप किया जावे, तो संतान, समुदाय, सÂशता और परलोक गमन जो कि अंकुश रहित-अबाधित सिद्ध हQ (तत्सवË न स्यात्) वे सभी घटित नहाR हो सव्ेंâगे।। कारिकाथर्- एकत्व का सवर्था निÖव करने पर निरंकुश-सकल बाधक रहित अस्खलित™प से प्रमाण प्रसिद्ध संतान, समुदाय, साधम्यर्, परलोक तथा दिये हुए को लेना आदि ये सब व्यवहार सिद्ध नहाR हो सकते हQ। क्या ज्ञान ज्ञेय से सवर्था भिVा है सदात्मना च भिVां चेज्ज्ञानं ज्ञेयाद् द्विधाप्यसत्। ज्ञानाÓभावे कथं ज्ञेयं बहिरन्तश्चा ते द्विषाम्।।३०।। ज्ञान यदी निज ज्ञेय वस्तु से, सत्स्व™प से भिVा कहा। तब तो ज्ञान-ज्ञेय दोनें का, भी आfस्तत्व समाप्त हुआ।। प्रभो! ज्ञान के अभाव होने से बा¢ााभ्यंतर सब ज्ञेय। वैâसे हेंगे सिद्ध! कहो फिर, तव मत विद्वेषी के मेय।।३०।। अन्वयाथर्- (चेत् सदात्मना च ज्ञानं ज्ञेयात् भिVां द्विधा आfप असत्) यदि सत् ™प से भी ज्ञान ज्ञेय पदार्थों से भिVा है, तब तो ज्ञान और ज्ञेय दोनें ही असत् हो जाव्ेंगे (ते द्विषां ज्ञानाÓभावे बहिरंतश्चा ज्ञेयं कथं) हे भगवन्! आपके विद्वेषी ए कांतवादियें के यहाँ ज्ञान के अभाव म्ें बहिरंग और अंतरंगभूत ज्ञेय पदाथर् वैâसे सिद्ध हो सव् ेंâगे। कारिकाथर्- यदि सत्™प से भी ज्ञान ज्ञेय से भिVा माना जाये, तब तो ज्ञान और ज्ञेय दोनें ही असत्™प हो जाय्ेंगे, क्येंकि हे भगवन्! आपके द्वेषी सवर्थैकांतवादियें के यहाँ ज्ञान के अभाव म्ें बहिस्तòव™प तथा अन्तस्तòव™प ज्ञेय पदार्थों की सिद्धि भी वैâसे हो सकेगी ? बौद्ध के यहाँ वचन किसको कहते हQ ? सामान्याथार् गिरोÓन्येषां, विशेषो नाÓभिलप्यते। सामान्याभावतस्तेषां, मृषैव सकला गिर:।।३१।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (३९) (४०) बौद्धजनें के यहाँ वचन, सामान्य अथर् को ही कहते। है विशेष, वास्तविक स्वलक्षण, वचन उसे नहिं कह सकते।। बिन विशेष सामान्य कहाँ है, फिर सामान्य न होने से। सारे वचन व्यथर् अ® झूठे, ही हेंगे उनके मत से।।३१।। अन्वयाथर्- (अन्येषां गिर: सामान्याथार्: विशेषो न आfभलप्यते) आप बौद्धें के यहाँ वचन सामान्य अथर् को ही कहते हQ, विशेष अथर् को नहाR कहते हQ। (सामान्याÓभावत: तेषां सकला गिर: मृषा एव) विशेष के बिना सामान्य का भी अभाव हो जाने से आप बौद्धें के यहाँ सभी वचन मिथ्या ही ठहरते हQ। कारिकाथर्- आप बौद्धें के यहाँ वचन सामान्य अथर् को कहने वाले हQ, उन वचनें के द्वारा विशेष का कथन नहाR किया जा सकता है पुन: आपके यहाँ सामान्य का अभाव होने से सम्पूणर् वचन असत्य-मिथ्या ही हQ।। भावाथर्- प्रत्येक वस्तु के सामान्य-विशेष एेसे दो धमर् रहते हQ। यदि वचनें से सामान्य का ही कथन होवे, तब विशेष का कथन न हो सकने से विशेष का अभाव हो जाने से सामान्य नहाR रह सकेगा और सभी वचन असत्य अथर् को ही कहने वाले हो जाव्ेंगे। अद्वैत पृथक्त्व एकान्त म्ें दोष विरोधाVोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।३२।। ये एकत्व पृथक्त्व उभय, आपस म्ें नित्य विरोधी हQ। स्याद्वाद विद्वेषी के ये, उभय तòव निरपेक्ष रहW।। यदि दोनें हQ ‘अवाच्य’ द्वैताद्वैत कथन नहिं हो युगपत्। तब निरपेक्ष अवाच्य यही वच, वैâसे होवेगा सुघटित?।।३२।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ अद्वैत और द्वैत का एकात्म्य भी नहाR बन सकेगा, क्येंकि इन दोनें का परस्पर म्ें विरोध पाया जाता है (आवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) एकांत से इन दोनें की अवाच्यता स्वीकार करने पर भी ‘अवाच्य’ यह वचन नहाR बोला जा सकता है। अथार्त् स्याद्वाद को न मानने से ये बाधाएं आती हQ। कारिकाथर्- स्याद्वाद न्याय से द्वेष रखने वाले एकांतवादियें के यहाँ उभयैकात्म्य भी सिद्ध नहाR हो सकता है क्येंकि पृथक्त्वैकांत एवं अपृथक्त्वैकांत इन दोनें का परस्पर म्ें विरोध है। यदि आप कहW कि हम तòव को एकांत से अवाच्य मानते हQ, तब तो ‘‘अवाच्य’’ यह कथन भी नहाR बन सकेगा।। अद्वैत और पृथक्त्व सच्चे भी हQ अनपेक्ष्ये पृथक्त्वैक्ये, ¢ावस्तु द्वय-हेतुत:। तदेवैक्यं पृथक्त्वं च, स्वभेदै: साधनं यथा।।३३।। यदि एकत्व पृथक्त्व परस्पर, म्ें निरपेक्ष रहW तब तो। हेतुद्वय से उभय न हेंगे, वस्तुभूत विंâचित् भी तो।। यदि अपृथक् पृथक्त्वापेक्षी, पृथक्-अपृथक् अपेक्षी है। तब तो वस्तुभूत आfवरोधी, भेदापेक्षि हेतुवत् हQ।।३३।। अन्वयाथर्- (अनपेक्ष्ये पृथक्त्वैक्ये हि अवस्तु द्वय हेतुत:) ये अद्वैत और पृथक्त्व एक-दूसरे की अपेक्षा न रखने से अवस्तु हQ क्येंकि दो हेतु पाये जाते हQ (तत् एव एेक्यं पृथक्त्वं च यथा स्वभेदै: साधनं) उसी प्रकार अद्वैत और पृथक्त्व ये दोनें एक-दूसरे की अपेक्षा रखने से वस्तुभूत हQ जैसे कि हेतु अपने अन्वय व्यतिरेक भेदें से वास्तविक होता है।। कारिकाथर्- यदि पृथक्त्व और एकत्व ये दोनें धमर् परस्पर निरपेक्ष हQ तो वे अवस्तु™प हQ किन्तु दो प्रकार के हेतुआW से परस्पर सापेक्ष से ही पृथक्त्व और एकत्व धमर् वस्तुभूत हQ, जैसे पक्षधमर्त्व आदि अपने भेदें से निरपेक्ष हेतु अवस्तु™प है और वही हेतु अपने भेदें से सापेक्ष होकर वस्तु™प है। भावाथर्- जीवादि वस्तु कथंचित् अद्वैत ™प हQ क्येंकि सत् की अपेक्षा से सभी वस्तुआW म्ें एकत्व का अनुभव आ रहा है। उसी प्रकार से वे ही जीवादि वस्तु कथंचित् पृथक्त्व ™प हQ क्येंकि द्रव्य पयार्य आदि की अपेक्षा सबका पृथक्- पृथक् अनुभव आ रहा है। ये दो हेतु सभी वस्तु को उभय™प सिद्ध कर रहे हQ। सभी वस्तुएँ एकत्व और पृथक्त्व ™प वैâसे हQ ? सत्सामान्यात्तु सर्वैक्यं, पृथग्द्रव्यादिभेदत:। भेदाभेदविवक्षाया-मसाधारण-हेतुवत् ।।३४।। सत् सामान्य अपेक्षा जग म्ें, सभी वस्तुएँ एकस्व™प। द्रव्य तथा गुण-पयर्य से सब, वस्तु पृथक् हQ भेदस्व™प।। यथा असाधारण हेतू भी, भेदाभेद विवक्षा से। है अनेक अ® एक उसी विधि, सब कुछ एक अनेक रहW।।३४।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (४१) (४२) अन्वयाथर्- (सत्सामान्यात् तु सर्वैक्यं द्रव्यादिभेदत: पृथक्) सत् सामान्य की अपेक्षा से सभी वस्तु एकत्व ™प है एवं द्रव्य गुण आदि के भेद से सभी वस्तु भिVा-भिVा हQ। (भेदाभेदविवक्षायां असाधारण-हेतुवत्) जिस प्रकार असाधारण हेतु अभेद Âि° से एक और भेद Âि° से अनेक ™प हो जाता है, उसी प्रकार से सभी पदाथर् सत् ™प से अभेद विवक्षा करने पर एक ™प हQ एवं द्रव्य, गुण, पयार्यें के भेद की विवक्षा से भिVा-भिVा हQ।। कारिकाथर्- भेद और अभेद की विवक्षा म्ें असाधारण हेतु की तरह सत्सामान्य की अपेक्षा से सभी जीवादि वस्तुआW म्ें एकत्व है एवं द्रव्यादि के भेद की अपेक्षा पृथक्त्व भी है।। सत् म्ें ही विवक्षा और आfववक्षा होती है विवक्षा चाविवक्षा च, विशेष्येÓनन्तधमिर्णि। सतो विशेषणस्यात्र नाÓसतस्तैस्तदथिर्भि:।।३५।। अनंतधमार् वस्तू म्ें ही, घटे विवक्षा आfववक्षा। ये दोनें सत™प विशेषण, को कहताR न असत् इच्छा।। अर्थी करW विवक्षा तथा अनर्थी आfववक्षा करते। सत् वस्तू म्ें ही दोनें हQ, असत् वस्तु म्ें नहिं घटते।।३५।। अन्वयाथर्- (अत्र अनंतधमिर्णि विशेष्ये सत: विशेषणस्य विवक्षा च आfववक्षा च) इस अनंतधमार्त्मक विशेष्य-जीवादि पदार्थों म्ें सत् ™प विशेषण की ही विवक्षा और आfववक्षा (असत: न) असत् ™प विशेषण की नहाR की जाती है (तै: तदथिर्भि:) और ये विवक्षा-आfववक्षा उन-उन विशेषण के इच्छुक जनें द्वारा ही की जाती है।। कारिकाथर्- अनंतधमार्त्मक जीवादि पदाथर्™प विशेष्य म्ें एकत्वानेकत्व™प विशेषणें के इच्छुक विद्वानें द्वारा सत् स्व™प विशेषण की ही विवेक्षा और आfववक्षा की जाती है, असत् ™प विशेषण की नहाR की जाती है। भावाथर्- यदि कोई वस्तु के एकत्व को कहने की इच्छा करते हQ तो वे उस एकत्व की विवक्षा के इच्छुक कहलाते हQ, यदि एकत्व के कहने की इच्छा नहाR करते हQ, तब वे एकत्व की आfववक्षा के इच्छुक कहलाते हQ। वस्तु के एक धमर् को कहने की इच्छा म्ें उसी वस्तु का अन्य विरोधी गुण गौण हो जाता है। इसलिए उस गौण गुण की आfववक्षा हो जाती है। ये विवक्षा और आfववक्षा आfस्त™प पदार्थों म्ें ही होती है असत् ™प म्ें नहाR क्येंकि असत्भूत पदाथर् आकाश कुसुमवत् है ही नहाR, तब उसम्ें विवक्षा-आfववक्षा वैâसे बन सकेगी ? एक वस्तु म्ें भेद और अभेद दोनें वैâसे हेंगे ? प्रमाणगोचरौ सन्तौ, भेदाभेदौ न संवृती। तावेकत्राÓवि®द्धौ ते, गुणमुख्यविवक्षया।।३६।। सत्यज्ञान के गोचर होते, आfस्त™प हQ भेद-अभेद!। कल्पित™प नहाR है क्येंकि, ये प्रमाण के विषय जिनेश!।। एक वस्तु म्ें मुख्य गौण से, दोनें रहते आfवरोधी। जिनकी जहाँ विवक्षा हो वह, मुख्य दूसरा गौण सही।।३६।। अन्वयाथर्- (भेदाÓभेदौ प्रमाणगोचरौ सन्तौ न संवृती) ये भेद और प्रमाण के विषय हQ और सत् ™प हQ, संवृति ™प नहाR हQ (ते गुणमुख्यविवक्षया तौ एकत्र आfव®द्धौ) हे भगवन्! आपके मत म्ें गौण और मुख्य की अपेक्षा से ये दोनें एक ही वस्तु म्ें आfवरोध ™प से रहते हQ। अथार्त् चार कारिका तक अद्वैत और पृथक्त्व का अनेकांत सिद्ध किया है। कारिकाथर्- ये दोनें भेद और अभेद प्रमाण के विषय होने से सत् ™प है- वास्तविक है, संवृति™प-काल्पनिक नहाR है। हे भगवन्! आपके शासन म्ें ये भेदाभेद एक ही जीवादि वस्तु म्ें गौण और मुख्य की विवक्षा से विरोध रहित हQ।। ।।इति द्वितीय: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) द्वितीय परिच्छेद का सार अद्वैत-द्वैत एकांत का निराकरण और स्याद्वाद सिद्धि (कारिका २४ से ३६ तक) एक बÇÿााद्वैतवादी जनें का सम्प्रदाय है ये लोग कहते हQ कि ‘सवË वै खलु इदं बÇÿा नेह नानास्ति कश्चान’। यह सारा जगत् एक बÇÿा स्व™प है, यहाँ भिVा वस्तुएँ कुछ नहाR हQ। ये चेतन-अचेतन जितने भी पदाथर् दिख रहे हQ वे सब एक बÇÿा की ही पयार्य हQ। एेसे ही शब्दाद्वैतवादी सारे जगत को एक शब्द बÇÿा स्व™प ही मानते हQ। विज्ञानाद्वैतवादी सारे जगत को एक ज्ञान मात्र ही मानते हQ, चित्राद्वैतवादी सारे जगत को चित्रज्ञान ™प कहते हQ और शून्याद्वैतवादी सब कुछ शून्य ™प ही मानते हQ। एेसे ये पाँच अद्वैतवादी हQ, ये लोग एक अद्वैत के सिवाय द्वैत™प (दो ™प) कोई चीज नहाR मानते हQ, इनका कहना है कि जो भी द्वैत™प संसार दिख रहा है वह सब आfवद्या या कल्पना से ही है, वास्तविक नहाR है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष, सुख-दु:ख, विद्या-आfवद्या आदि ™प से सवर्त्र दो चीज्ें ही उपलब्ध होती हQ। इसम्ें एक को काल्पनिक कहने पर दूसरी भी काल्पनिक होने से कोई व्यवस्था नहाR बन सकती तथा आपने आगम से बÇÿा तòव को सिद्ध किया, तो आगम और बÇÿा दो हो गये। यदि आगम को बÇÿाा का स्वभाव कहो तो भी स्वभाव और स्वभाव वाले की अपेक्षा दो हो गये। दूसरी बात यह है कि जैसे-जैन के बिना अजैन नहाR बनता, वैसे ही द्वैत के बिना अद्वैत की सिद्धि नहाR होती है तथा जिस आfवद्या से ये भेद दिख रहे हQ वह आfवद्या परमबÇÿा से भिVा है या आfभVा ? यदि भिVा कहो तो द्वैत हो गया और यदि आfभVा कहो तो तुम्हारा बÇÿा आfवद्या से आfभVा होने से आfवद्या ™प हो गया, इसलिए आपका बÇÿा आfवद्या™प हो जाने से हमारा विद्या™प द्वैत तòव ही सिद्ध हो गया। यौग के दो भेद हQ-नैयायिक और वैशेषिक। ये लोग द्रव्य से गुण को सवर्था भिVा मानते हQ। उनके मत से आfग्न से उष्णता सवर्था भिVा है किन्तु जैनाचायर् पूंछते हQ कि उष्णता के संबंध के पहले आfग्न उष्ण थी या ठंडी ? यदि उष्ण थी, तो उष्णता के संबंध ने क्या किया, यदि आfग्न ठंडी थी और उष्णता ने उष्ण किया, तो वह पूवर् म्ें उष्ण गुण और ठंडी आfग्न उपलब्ध नहाR होते हQ। वास्तव म्ें उष्णता के बिना आfग्न का आfस्तत्व ही असंभव है इसलिए जैन मत म्ें द्रव्य से गुण को आfभVा माना है और संज्ञा आदि के भेद से ही भिVा माना है। बौद्ध ने कायर्-कारण को परस्पर म्ें सवर्था भिVा माना है, उसका कहना है कि मिóी का सवर्था नाश होकर घÌडा बना है परन्तु यह बात किसी के गले नहाR उतरती है तथा इन्हेंने कायर् (घÌडे) के अणु-अणु को भी सवर्था भिVा-भिVा माना है किन्तु एेसा मानने से तो घÌडे म्ें पानी वैâसे भरा जा सकेगा ? आfभप्राय यह हुआ कि बÇÿााद्वैतवादी चेतन, अचेतन, संसारी, मुक्त कायर् कारण आदि सभी म्ें अद्वैत-एक™पता सिद्ध करते हQ। योग और सभी द्रव्य गुण आदि म्ें और कायर् कारण आदि म्ें द्वैत यानी पृथक्-पृथक्पना सिद्ध करते हQ। मीमांसक सवर्था अद्वैत और पृथक् ™प उभय का एकान्त मानता है। बौद्ध भेदाभेद को सवर्था अवाच्य-अवक्तव्य कहते हQ। इन चारें की मान्यताएं कथमपि संभव नहाR हQ। जैनसिद्धान्त के अनुसार सभी चेतन-अचेतन वस्तु ™प जगत अद्वैत एक ™प है, क्येंकि सभी वस्तुएँ सत् सामान्य की अपेक्षा आfस्त™प हQ। सभी वस्तुएँ पृथक्त्व™प हQ क्येंकि संज्ञा संख्या, लक्षण आदि से सभी म्ें भेद हQ। सभी वस्तुएँ उभय™प हQ क्येंकि ›ाâम से अद्वैत और भेद™प द्वैत की अपेक्षा है। सभी वस्तुएँ अवक्तव्य हQ क्येंकि एक साथ अद्वैत और द्वैत दोनें धमर् को कह नहाR सकते। सभी वस्तुएँ अद्वैत अवक्तव्य ™प हQ क्येंकि ›ाâम से अद्वैत की और युगपत् उभय की विवक्षा है। सभी वस्तुएँ द्वैत अवक्तव्य हQ क्येंकि ›ाâम से द्वैत की और युगपत् दोनें धर्मों की विवक्षा है। इस प्रकार सभी वस्तुएँ कथंचित् भेदाभेदात्मक होकर ही प्रमाण का विषय हQ क्येंकि मुख्य और गौण की विवक्षा पाई जाती है। जब वस्तुआW म्ें अभेद धमर् विवक्षित होता है, तब वह प्रधान हो जाता है और द्वैत धमर् गौण हो जाता है। जब द्वैत प्रधान होता है, तब अद्वैत गौण हो जाता है, यही स्याद्वाद प्रि›ाâया है। N : श् (४३) (४४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (४५) (४६) अथ तृतीय: परिच्छेद: वस्तु को सवर्था नित्य मानने म्ें दोष नित्यत्वैकान्तपक्षेÓपि, विि›ाâया नोपपद्यते। प्रागेव कारकाभाव:, क्व प्रमाणं क्व तत्फलम्।।३७।। यदि सवर्था सभी वस्तु हQ, नित्य कहो तब क्या होगा? हलन, चलन परिणमन™प, विि›ाâया कायर् वैâसे होगा।। कत्तार्दि कारक के पहले, ही अभाव होगा निश्चिात। ज्ञाता बिन फिर ज्ञान कहाँ, अ® कहाँ ज्ञान का फल सुघटित ?।।३७।। अन्वयाथर्- (नित्यत्वैकांतपक्षे आfप विि›ाâया न उपपद्यते) यदि सवर्था सभी वस्तुआW को नित्य ही माना जाये, तब तो कुछ भी ि›ाâया आदि परिवतर्न नहाR हेंगे (प्रागेव कारकाभाव: क्व प्रमाणं क्व तत्फलं) क्येंकि नित्य म्ें पहले ही कत्तार्-कमर् आदि कारकें का अभाव है पुन: प्रमाण कहाँ रहेगा और जब प्रमाण नहाR होगा, तब उसका फल भी कहाँ रहेगा ? कारिकाथर्- नित्यत्वैकांत पक्ष म्ें भी परिणमन स्व™प एवं परिस्पंद™प विविध ि›ाâयाएँ नहाR हो सकती हQ क्येंकि कायर् की उत्पत्ति के पहले से ही कारक का अभाव है एवं कारक के अभाव म्ें प्रमाण भी कहाँ रहेगा ? और उसका फल भी कहाँ रहेगा ? भावाथर्- जब सभी जीवादि पदाथर् सवर्था नित्य हQ, तब उनम्ें किसी भी प्रकार का परिणमन, एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त करना आदि नहाR बन सकता है। कथंचित् आfनत्य मानने से ही जीव का जन्म, मरण, बचपन से युवावस्था आदि परिवतर्न घटित नहाR हेंगे, सवर्था म्ें नहाR बन्ेंगे। प्रमाण और कारकें के नित्य होने म्ें विि›ाâया वैâसी ? प्रमाणकारवैâव्यर्त्तंâ, व्यत्तंâ चेदिन्द्रियाथर्वत्। ते च नित्ये विकायË विंâ, साधोस्ते शासनाद्बहि:।।३८।। इन्द्रिय द्वारा विषयें की है, आfभव्यक्ति जैसे वैसे। कारक और प्रमाणें द्वारा, वे अव्यक्त प्रगट होते।। ये प्रमाण कारक दोनें ही, नित्य सवर्था सांख्य कहW। भगवन्! तव शासन से बाहर, विधि ि›ाâया भी हो वैâसे?।।३८।। अन्वयाथर्- (इन्द्रियाथर्वत् प्रमाणकारवैâ: व्यत्तंâ व्यत्तंâ चेत्) जिस प्रकार से इन्द्रियाँ अपने विषय को व्यक्त करती हQ, उसी प्रकार से यदि प्रमाण और कारकें के द्वारा व्यक्त को आfभव्यक्त-प्रकट किया जाता है, तब तो (ते च नित्ये ते साधो: शासनाद्बहि: विंâ विकायË) आपके यहाँ वे प्रमाण और कारक सवर्था नित्य हQ अत: हे साधो! आपके शासन से बहिर्भूत जनें के यहाँ व्यक्त को प्रकट करने ™प से भी विि›ाâया वैâसे बन सकेगी ? कारिकाथर्- जिस प्रकार इन्द्रियें के द्वारा अथर् अपने-अपने विषय के पदाथर् आfभव्यक्त किये जाते हQ, उसी प्रकार प्रमाण और कारकें के द्वारा व्यक्त- महान, अहंकार आदि तòव आfभव्यक्त किये जाते हQ। इस प्रकार से यदि सांख्य कहW तो उचित नहाR है। उनके यहाँ प्रमाण और कारक तो सवर्था नित्य हQ, इसलिए हे भगवन्! आपके शासन से बहिर्भूत उन सांख्यें के यहाँ विकायर्-आfभव्यक्ति या अवस्था परिणमन वैâसे हो सकता है ? अथार्त् किसी भी प्रकार का आfभव्यक्ति- ™प भी परिणमन नहाR हो सकता है। सवर्था सत् ™प कायर् उत्पVा वैâसे होगा ? यदि सत्सवर्था कायË पुंवVोत्पत्तुमर्हति। परिणाम-प्रक्èप्तिश्चा, नित्यत्वैकान्त-बाधिनी।।३९।। विद्यमान यदि कायर् हमेशा, कारण क्यें माना जावे। उत्पत्ती के योग्य न आत्मा, वैसे ही घट मत होवे।। मिóी म्ें घट सदा उपस्थित, च›ाâ दण्ड फिर क्या करते ?। यदि परिणमन व्यवस्था है फिर, नित्यपक्ष बाधित उससे।।३९।। अन्वयाथर्- (यदि कायË सवर्था सत् पुंवत् उत्पत्तुं न अर्हति) यदि कायर् को सवर्था विद्यमान ™प ही माना जाये, तो पु®ष के समान उत्पन नहाR हो सकता है (परिणामप्रक्èप्ति: च नित्यत्वैकांतबाधिनी) क्येंकि जो वस्तु म्ें परिणमन- परिवतर्न की कल्पना है वह सवर्था नित्यत्व एकांत को बाधित करने वाली है। कारिकाथर्- यदि कायर् को सवर्था सत् ™प माना जाये, तब तो पु®ष के समान वह उत्पVा ही नहाR हो सकता है और यदि परिणमन की कल्पना करW, तब तो नित्यत्वैकांत म्ें बाधा आ जाती है। भावाथर्- सांख्य कायर् को सवर्था विद्यमान ™प ही मानता है उसका कहना है कि मिóी म्ें घÌडा, बीज म्ें अंकुरे सदा ही विद्यमान हQ च›ाâ, वुंâभकार एवं किसान मिóी, जल आदि कारण सामग्राी केवल कायर् को प्रकट कर देती हQं। वे
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (४७) (४८) कारण कलाप कायर् को उत्पVा नहाR करते हQ। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि यह कल्पना ठीक नहाR है। हेतु के दो भेद हQ-कारक हेतु और ज्ञापक हेतु। मिóी से घट बनाने म्ें वुंâभकार, च›ाâ, दण्ड आदि कारक हेतु हQ और कमरे म्ें घट-पट आदि वस्तुएँ रखी हQ अंधेरा होने से दिखती नहाR है। तब दीपक आदि से उन्हW प्रकट कर देना, देख लेना होता है अत: दीपक आदि ज्ञापक हेतु हQ। संसार के बहुत से कायर् कारक हेतु से ही बनते हQ। यदि एेसा न माने तो पदार्थों म्ें जो परिवतर्न देखा जाता है, वह वैâसे बनेगा क्येंकि परिवतर्न होने से सवर्था नित्य एकांत की व्यवस्था नहाR है। नित्य एकांत म्ें पुण्य पापादि भी असंभव हQ पुण्य-पापि›ाâया न स्यात्, प्रेत्यभाव: फलं कुत:। बन्ध-मोक्षौ च तेषां न, येषां त्वं नाÓसि नायक:।।४०।। नित्यैकांत पक्ष म्ें शुभ अ® अशुभ ि›ाâया भी नहिं होवे। नहिं होगा परलोकगमन फिर, सुख-दु:ख फल वैâसे होवे।। कमर्बंध अ® मोक्ष व्यवस्था, भी उनके मत म्ें नहिं है। हे भगवन्! जिनके तुम स्वामी, नहाR उन्हW सब दुघर्ट है।।४०।। अन्वयाथर्- (येषां त्वं नायक: न आfस) हे भगवन्! जिनके आप स्वामी नहाR हQ (तेषां पुण्यपापि›ाâया न स्यात्) उनके यहाँ पुण्य और पाप ि›ाâयाएँ नहाR हो सकती हQ (प्रेत्यभावं फलं कुत: बंधमोक्षौ च न) पुण्य पाप के फलस्व™प परलो कगमन भी वैâसे होगा? पुन: बंध और मोक्ष की व्यवस्था भी नहाR बन सकेगी। कारिकाथर्- सवर्था नित्य पक्ष म्ें पुण्य, पाप™प ि›ाâया नहाR हो सकती है। उसके अभाव म्ें परलोक एवं सुख-दु:खादि फल भी वैâसे हो सकते हQ ? हे भगवन ्! जिनके आप नायक-स्वामी नहाR हQ उनके यहाँ बंध और मोक्ष भी नहाR हो सकते हQ। क्षणिक एकांत भी असंभव है क्षणिवैâकान्तपक्षेÓपि, प्रेत्यभावाद्यसंभव:। प्रत्यभिज्ञाद्यभावाVा, कायार्रम्भ: कुत: फलम्।।४१।। क्षणिवैâकांत पक्ष म्ें भी, परलोकगमन वैâसे होगा?। बंध-मोक्ष प्रि›ाâया असंभव, है फिर धमर् कहाँ होगा?।। क्येंकि प्रत्यभिज्ञान असंभव, है स्मृति अनुमान कहाँ?। पुन: कायर् आरंभ न होगा, फल भी उसका रहा कहाँ?।।४१।। अन्वयाथर्- (क्षणिवैâकांत पक्षेÓपि प्रेत्यभावाद्य संभव:) यदि वस्तु को सवर्था क्षणिक ™प ही माना जाये, तो भी परलोक गमन आदि असंभव ठहरते हQ (प्रत्यभिज्ञाद्यभावात् कायार्रंभ: न फलं कुत:) और प्रत्यभिज्ञान, स्मरण, अनुमान आदि ज्ञानें का अभाव हो जाने से कायर् का आरंभ भी नहाR हो सकेगा पुन: कायर् के अभाव म्ें सुख-दु:खादि फल भी वैâसे बन सव्ेंâगे ? कारिकाथर्- क्षणिवैâकांत पक्ष म्ें भी प्रेत्यभाव आदि असंभव हQ, क्येंकि प्रत्यभिज्ञान आदि का अभाव होने से कायार्दि का आरंभ नहाR हो सकता है पुन: फल वैâसे हो सकेगा ? भावाथर्- प्रत्येक वस्तु को यदि सवर्था क्षण-क्षण म्ें न° होने वाली मान लिया जावे, तब तो आत्मा का आfस्तत्व कुछ काल के लिए भी नहाR रह सकता है। पुन: पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष, परलोक-गमन आदि किसको हेंगे और स्मरण, प्रत्यभिज्ञान, अनुमान आदि के न होने से कोई भी व्यक्ति कुछ भी कायर् वैâसे कर सकेगा एवं उसका फल सुख-दु:ख भी वैâसे भोगेगा? अथार्त् क्षणिवैâकांत म्ें भी कुछ भी व्यवस्था नहाR बन सकती है। कायर् सवर्था असत् से वैâसे होगा ? यद्यसत्सवर्था कायË, तन्माजनि ख-पुष्पवत्। मोपादान-नियामोÓभून्माÓÓÕाास: कायर्-जन्मनि।।४२।। यदि कायर् सवर्था असत् है, गगन कुसुमवत् नाEह होगा। यदि असत् की हो उत्पत्ती, उपादान फिर क्या होगा? जौ बीजें से जौ ही हें, यह उपादान कारण निष्फल। पुन: कायर् के उत्पादन म्ें, सब विÕाास रहा असफल।।४२।। अन्वयाथर्- (यदि सवर्था कायË असत् तत् खपुष्पवत् मा जनि) यदि कायर् को सवर्था असत् ही माना जावे, तब तो वह कायर् आकाश पुष्पवत् उत्पVा मत होवे (उपादाननियामो मा भूत् कायर्जन्मनि आÕाास: मा) असत् के उत्पाद म्ें तो कायर् के उपादान का नियम भी नहाR बन सकता एवं कायर् की उत्पत्ति म्ें कुछ भी विÕाास नहाR रहेगा। कारिकाथर्- यदि कायर् को सवर्था असत्™प ही मान्ें, तब तो आकाश पुष्प के समान वह कभी उत्पVा ही नहाR हो सकेगा एवं उसके उपादान कारण का नियम भी नहाR बन सकेगा तथा उसके अभाव म्ें कायर् की उत्पत्ति का कोई विÕाास भी
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (४९) (५०) नहाR हो सकेगा। भावाथर्- बौद्धें का कहना पूर्वोक्त सांख्य से सवर्था उल्टा ही रहता है। सांख्य ने कहा था कि मिóी म्ें घट सदा विद्यमान ही रहता है और बौद्ध कहता है कि मिóी के पिंड का सवर्था नाश हो जाने के बाद घÌडा उत्पVा होता है अत: घट कायर् सवर्था आfवद्यमान से ही बना है। इस पर जैनाचायर् कहते हQ कि तब तो जैसे आकाश के पूâल नहाR हQ वैसे ही कारण के नहाR रहने से वे कायर् भी नहाR हेंगे। यदि जबरदस्ती मान भी लेवोगे तो भी उस कायर् की उत्पत्ति म्ें उपादान कारण का कुछ भी नियम नहाR रहेगा। कारण दो प्रकार के होते हQ एक निमित्तकारण, दूसरा उपादान कारण। घट के बनने म्ें मिóी उपादान कारण है, वही घट™प परिणत हो जाती है। दण्ड, चाक, वुंâभार आदि निमित्त कारण हQ ये छूट जाते हQ। यदि उपादान कारण का सवर्था विनाश करके घÌडा बना है, तब तो तन्तु से या बीज से भी घÌडा बन जावे, मिóी से घट, तंतु से वŒा और बीज से अंकुर एेसा नियम नहाR बन सकेगा तथा कायर् की उत्पत्ति म्ें भी विÕाास न रहने से कृषक गेहूँ के बीज को बोकर गेहूँ की उत्पत्ति म्ें विÕाास नहाR कर पावेगा। क्षणिक एकांत म्ें कायर्कारण भाव असंभव है न हेतु-फल-भावादि-रन्यभावादनन्वयात्। सन्तानान्तरवVौक:, सन्तानस्तद्वत: पृथक्।।४३।। हेतुभाव फलभाव न हेंगे, क्येंकि न अन्वय हQ उनम्ें। भिVा-भिVा संतान सÂश, है अन्यभाव पूर्वोत्तर म्ें।। पूर्वोत्तर क्षण मेW इक ही, संतान कहो तो ठीक नहाR। क्येंकि निज वस्तू से इक, संतान पृथक् है कभी नहाR।।४३।। अन्वयाथर्- (हेतुफलभावादि: न अन्यभावात् सन्तानान्तरवत् अनन्वयात्) सवर्था क्षणिक एकांत म्ें कायर् कारण भाव आदि नहाR बन सकते हQ क्येंकि वे परस्पर म्ें भिVा होते हQ उनम्ें भिVा सन्तान के समान अन्वय नहाR पाया जाता है (एक: संतान: तद्वत: पृथक् न) जो एक संतान होता है, वह संतानी से भिVा नहाR होता है। कारिकाथर्- इस क्षणिक एकांत पक्ष म्ें भिVा संतान के समान कारण- कायर्भाव आदि कुछ भी नहाR हो सकते हQ, क्येंकि इनम्ें अन्वय के न होने से भिVापना है। संतानी से पृथक् कोई एक संतान नहाR है। भावाथर्- बौद्धो के यहाँ मृत्पिंड और घट म्ें कारण कायर् भाव नहाR बनता है क्येंकि उनके यहाँ दोनें ही भिVा हQ। दोनें म्ें अन्वय ™प द्रव्य एक नहाR है। हम जैनें ने तो मृत्पिंड और घट दोनें म्ें अन्वय ™प द्रव्य एक माना है ये लोग नहाR मानते हQ। अतएव जैसे देवदत्त और जिनदत्त भिVा-भिVा हQ, उनम्ें अन्वय भाव नहाR है। वैसे ही देवदत्त की बाल्यावस्था, युवावस्था ™प पयार्य्ें भी भिVा ही हQ क्येंकि इन पयार्यें म्ें भी बौद्ध अन्वय ™प एक आत्मा नहाR मानता है। अत: संतानी से भिVा एक संतान परमाथर्भूत कोई वस्तु नहाR है। बौद्ध भिVा-भिVा कायर्क्षणें म्ें एकत्व को संवृति से मानता है अन्येष्वनन्यशब्दोÓयं, संवृत्तिनर् मृषा कथम्। मुख्याथर्: संवृत्तिनर् स्याद्, विना मुख्याVा संवृति:।।४४।। भिVा चित्तक्षण म्ें जो है, संतान™प से इक आत्मा। यह संवृति से कथन यदि तव, संवृति क्यें नहिं हो मिथ्या।। यदि संतति को मुख्य कहो तो, मुख्य अथर् संवृत्ति नहिं है। यदि संवृति है पुन: मुख्य के, बिन संवृत्ति नहाR घटती है।। ४४।। अन्वयाथर्- (अन्येषु अनन्यशब्द: अयं संवृति: मृषा कथं न) यदि कहा जाये कि भिVा-भिVा चित्तक्षणें म्ें जो आfभVा एक आत्मा कहा जाता है, वह संवृति से कहा जाता है तब यह संवृति काल्पनिक होने से मिथ्या क्यें नहाR है। (मुख्याथर्: संवृति: न स्यात्) क्येंकि संवृति मुख्य अथर् को कहने वाली नहाR है (मुख्यात् बिना संवृति: न) और मुख्य अथर् के बिना संवृति हो नहाR सकती है। कारिकाथर्- अन्य भिVा-भिVा क्षणें म्ें अनन्य-ये क्षण आfभVा है एेसा कहना यह संवृति है तो यह असत्य क्यें नहाR होगी ? क्येंकि संवृत्ति मुख्य अथर् को नहाR कह सकती है और मुख्य के बिना भी संवृति हो नहाR सकती है। भावाथर्- कायर्-कारण आदि भिVा-भिVा लक्षणें म्ें जो एकता का व्यवहार है, वह संवृति से कहा जाता है और बौद्धें की यह संवृति काल्पनिक है एेसा स्वयं उन्हेंने ही संवृति का लक्षण किया है, तब यह संवृति मुख्य अथर् को कहने वाली न होने से असत्य अथर् को ही कहती है और यह नियम है कि मुख्य अथर् के बिना काल्पनिक अथर् भी असंभव है, जैसे आfग्न पदाथर् मुख्य है तभी ›ाâोधी बालक म्ें आfग्न की कल्पना की जाती है अन्यथा नहाR।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५१) (५२) बौद्ध के यहाँ चतुष्कोटि विकल्प अवक्तव्य है चतुष्कोटेविर्कल्पस्य, सवार्न्तेषूक्त्ययोगत:। तòवाÓन्यत्वमवाच्यं चेत्तयो: संतानतद्वतो:।।४५।। सब धर्मों म्ें चार कोटि से, भेद कहे नहिं जा सकते। सत् या असत् उभय-अनुभय, इन चारें म्ें ही दोष दिखे।। इसीलिए संतान और संतानी तòव ‘अवाच्य’ कहे। क्येंकि ये दोनें हि एक या, भिVा नहाR यह बौद्ध कहW।। अन्वयाथर्- (चेत् सवार्न्तेषु चतुष्कोटे: विकल्पस्य उक्त्ययोगत:) यदि यह कहा जाये कि सभी धर्मों म्ें चतुष्कोटि विकल्प के कहने का अभाव है (तयो: संतानतद्वतो: तòवान्यत्वं अवाच्यं) अत: उन संतान और संतान का भी तòव- एकत्वधमर् और अन्यत्वधमर् अवाच्य ठहरता है। बौद्ध के कथन का आचायर् आगे की कारिका द्वारा उत्तर दे रहे हQ। कारिकाथर्- सवाËत-समस्त धर्मों म्ें चार कोटि ™प विकल्प के कहने का अभाव होने से उन संतान और संतानी के तòव-एकत्व और अन्यत्व-अनेकत्व धमर् अवाच्य हQ यदि बौद्ध एेसा कहते है, तब तो आचायर् उसका स्प°ीकरण करते हुए आगे कारिका म्ें कहWगे। एकांत से अवक्तव्य मान्यता म्ें दोष अवक्तव्यचतुष्कोटि-विकल्पोÓपि न कथ्यताम्। असवार्न्तमवस्तु स्या-दविशेष्य-विशेषणम्।।४६।। तब तो चतुष्कोटि का विकल्प, अवक्तव्य है इस विध भी। नहाR कथन हो सकता फिर सब, वस्तु विकल्पातीत हुई।। सब धर्मों से विरहित वस्तू, सदा अवस्तू™प हुई। चूँकि विशेष्य-विशेषण भी, उसम्ें हो सकता कभी नहाR।।४६।। अन्वयाथर्- (अवक्तव्यचतुष्कोटिविकल्प: आfप न कथ्यताम्) तब तो चार कोटि का विकल्प ‘अवक्तव्य’ है, यह भी नहाR कहना चाहिए (असवाËतं अवस्तु आfवशेष्यविशेषणं स्यात्) क्येंकि जो वस्तु सभी धर्मों से रहित है वह अवस्तु है और उसम्ें विशेषण-विशेष्य भाव भी नहाR बन सकता है। कारिकाथर्- ‘‘चतुष्कोटि विकल्प अवक्तव्य है’’ एेसा भी नहाR कहा जा सकेगा, पुन: वे जीवादि पदाथर् असवाËत-सभी धर्मों से रहित होते हुए अवस्तु™प ही हो जाय्ेंगे। असत् का निषेध होता है क्या ? द्रव्याद्यन्तरभावेन, निषेध: संज्ञिन: सत:। असद्भेदो न भावस्तु, स्थानं विधि-निषेधयो:।।४७।। संज्ञी स्वद्रव्यादि चतु°य, से सत्™प प्रसिद्ध रहे। उसका परद्रव्यादि चतु°य, से ही सदा निषेध कहW।। असत्™प का निषेध वैâसे, हो सकता है कहो सही। चूँकि सवर्था असत् पदारथ, विधि-निषेध का विषय नहाR।। ४७।। अन्वयाथर्- (संज्ञिन: सत: द्रव्याद्यंतर भावेन निषेध:) जो संज्ञी और सत् है उसी का परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से निषेध किया जाता है (असद्भेदो भावस्तु विधिनिषेधयो: स्थानं न) क्येंकि असत् ™प पदाथर् विधि और निषेध का स्थान नहाR हो सकता है। अथार्त् जो वस्तु आfस्त ™प है, उसी म्ें आfस्त-नास्ति धमर् की कल्पना शक्य है, जो वस्तु है ही नहाR उसम्ें नास्ति आदि धमर् वैâसे रहWगे। यदि कहो आकाश का पुष्प नहाR है अत: उसम्ें ‘नास्ति’ शब्द का व्यवहार होता है, तो बात भी ठीक नहाR है क्येंकि स्वयं स्वामीजी ने अन्यत्र भी कहा है कि ‘खे नास्ति पुष्पं त®षु प्रसिद्धं’ आकाश म्ें पुष्प नाम की चीज है, अतएव उनका निषेध किया जाता है। कारिकाथर्- सत्™प संज्ञी पदाथर् का ही द्रव्यांतर आदि की अपेक्षा से निषेध किया जाता है। क्येंकि असत् ™प वस्तु विधि -निषेध का स्थान ही नहाR हो सकती है। अवस्तु ही अवक्तव्य है अवस्त्वनभिलाप्यं स्यात्सवार्न्तै: परिवजिर्तम्। वस्त्वेवावस्तुतां याति, प्रि›ाâयाया विपयर्यात्।।४८।। सब धर्मों से रहित वस्तु म्ें, सदा अवस्तू ही हेंगी। वे तो ‘अवक्तव्य’ कोटि म्ें, वाच्य वचन से नहिं हेंगी।। वस्तू ही प्रि›ाâया पलटने, से अवस्तु बन जाती है। परद्रव्यादि चतु°य से ही, वस्तु अवस्तु कहाती है।।४८।। अन्वयाथर्- (सवार्न्तै: परिवजिर्तं अवस्तु अनभिलाप्यं स्यात्) जो सभी धर्मों से रहित है वही अवस्तु है और वही अवक्तव्य है (प्रि›ाâयाया विपयर्यात् वस्तु एव अवस्तुतां याति) क्येंकि प्रि›ाâया के पलट देने से वस्तु ही अवस्तुपने को प्राप्त हो जाती है।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५३) (५४) कारिकाथर्- जो समस्त धर्मों से रहित है वह अवस्तु है और वही अवाच्य है। क्येंकि प्रि›ाâया के विपयर्य से-स्व™पादि से विपरीत पर™पादि से वस्तु ही अवस्तु ™प हो जाती है। भावाथर्- जब वस्तु म्ें परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव चतु°य की अपेक्षा करते हQ, तभी वह वस्तु कथंचित् अवस्तु कहलाती है न कि सभी धर्मों से रहित अवस्तु। सभी धर्मों से रहित को कहा नहाR जा सकता सवार्न्ताश्चोदवक्तव्यास्तेषां विंâ वचनं पुन:। संवृत्तिश्चोन्मृषैवेषा परमाथर्-विपयर्यात्।।४९।। यदि सब धमर् अवाच्य रहWगे, पुन: कथन उनका वैâसे? धमर्देशना, स्वपर पक्ष, साधन दूषण वाणी वैâसे? यदी वचन संवृती™प, फिर मिथ्या ही वे सिद्ध हुए। इन परमाथर् वि®द्ध वचन से, नहिं सत्याथर् बोध होवे।।४९।। अन्वयाथर्- (चेत् सवाËता अवक्तव्या: पुन: तेषां वचनं ाEक) यदि सभी धमर् अवक्तव्य हQ, तब तो उनका धमर् देशना आदि कथन भी वैâसे होगा ? (संवृति: चेत् परमाथर्विपयर्यात् एषा मृषा एव) यदि कहो कि अवक्तव्य का कथन संवृति ™प है, तब तो यह संवृति परमाथर् से विपरीत होने से असत्य ही है। कारिकाथर्- यदि सभी धमर् अवक्तव्य ही हQ पुन: आपके यहाँ उनका कथन भी वैâसे हो सकेगा ? और यदि आप कहW कि उनका कथन संवृति ™प है तब तो परमाथर् से विपरीत होने से यह संवृति तो असत्य ही है। आप बौद्ध वस्तु को अवाच्य क्यें मानते हो ? अशक्यत्वादवाच्यं किमभावात्किमबोधत:। आद्यन्तोक्ति-द्वयं न स्यातEक व्याजेनोच्यतां स्पुâटम्।।५०।। कहो बौद्ध जी! तòव आपका, ‘अवक्तव्य’ किस विध से है?। क्या अशक्ति से या अभाव से या अबोध से नहिं कहते।। इन तीनें म्ें आदि-अंत के, कारण शक्य नहाR दिखते। अत: बहाना करने से क्या, साफ कहो कि अभाव है।।५०।। अन्वयाथर्- (विंâ अशक्यत्वात् अवाच्यं अभावात् विंâ अबोधत:) क्या वस्तु का कहना शक्य न होने से वह अवाच्य है अथवा उसका अभाव है या उसका ज्ञान नहाR है ? (अद्यान्तोक्तिद्वयं न स्यात् व्याजेन विंâ स्पुâटं उच्यताम्) इन तीनें प्रश्नें म्ें से आदि के और अंत के हेतु तो हो नहाR सकते हQ अत: बहानेबाजी से क्या ? स्प° कहिए कि वस्तु का अभाव है। कारिकाथर्- आप बौद्धें के यहाँ तत्व अवाच्य क्यें है ? क्या अशक्य होने से अवाच्य है या उसका अभाव होने से अवाच्य है अथवा उसका ज्ञान न होने से अवाच्य है ? इनम्ें से आदि और अन्त ™प दो पक्ष तो बन नहाR सकते। इसलिए बहानेबाजी से क्या ? स्प° कहिए कि तòव का अभाव है। सवर्था क्षणिक म्ें कृतनाश आदि दोष आते हQ हिनस्त्यनभिसंधातृ, न हिनस्त्यभिसंधिमत्। बध्यते तद्द्वयापेतं, चित्तं बद्धं न मुच्यते।।५१।। हिंसा के आfभप्राय रहित, हिंसा करता कोई निश्चिात। ाEहसा के आfभप्राय सहित, नहिं हिंसा कर सकता ाEकचित्।। इन दोनें से रहित बंधा है, बद्ध जीव नहाR छूटेगा। क्षणिक निरन्वय नाश पक्ष म्ें, अन्य जीव फल भोगेगा।।५१।। अन्वयाथर्- (अनभिसंधातृ हिनस्ति अनभिसंधिमत् न हिनस्ति) क्षणिक एकांत म्ें हिंसा के आfभप्राय से रहित जीव हिंसा करता है और हिंसा के आfभप्राय से सहित आत्मा हिंसा नहाR कर सकती है (तद्द्वयापेक्षं बध्यते बद्धं चित्तं न मुच्यते) आfभप्राय और अनभिप्राय इन दोनें अवस्थाआW से रहित अन्य ही आत्मा बंध को प्राप्त होती है और बंधी हुई आत्मा नहाR छूटती है। कारिकाथर्- हिंसा के आfभप्राय से सहित चित्त तो हिंसक नहाR होगा तथा आfभप्राय से रहित चित्त हिंसा करे एवं हिंसा के आfभप्राय से सहित और रहित से भिVा तीसरा ही चित्त बंध को प्राप्त होगा तथा जो बंधा है, उससे भिVा चौथा ही चित्त बंध से युक्त हो सकेगा अथार्त् आप बौद्धें के क्षणिवैâकांत म्ें यह व्यवस्था हो जायेगी। भावाथर्- बौद्ध के क्षणिक एकांत मत म्ें जो हिंसा का आfभप्राय करता है, वह द्वितीय क्षण म्ें समाप्त हो गया और दूसरा कोई आत्मा आ गया, जो हिंसा कर डालता है पुन: द्वितीय क्षण म्ें वह समाप्त हो जाता है, तब तीसरा ही इस हिंसा के पाप से बंध जाता है और वह समाप्त हो जाता है, इत्यादि बाधाएँ आती हQ।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५५) (५६) नाश को निर्हेतुक मानने म्ें दोष अहेतुकत्वाVााशस्य, हिंसाहेतुनर् हिंसक:। चित्त-सन्तति-नाशश्चा, मोक्षो ना°ांग-हेतुक:।।५२।। यदी नाश निर्हेतुक है, हिंसक हिंसा म्ें हेतु नहाR। तथा चित्तसंतति विनाश से, मोक्ष कहा निर्हेतु सही।। पुन: आप अ°ांग निमित्तक, मोक्ष कहा सो वैâसे हो? यदी नाश निर्हेतुक है तब मोक्ष सहेतुक वैâसे हो?।।५२।। अन्वयाथर्- (नाशस्य अहेतुकत्वात् हिंसाहेतु: हिंसक: न) नाश को अहेतुक मानने से हिंसक हिंसा म्ें हेतु नहाR हो सकता है (चित्तसंततिनाश: मोक्ष: च अ°ांगहेतुक: न) यदि चित्तसंतति के नाश™प मोक्ष होता है, तब वह मोक्ष अ°ांग हेतुक नहाR बन सकता है। कारिकाथर्- यदि आप बौद्ध नाश को अहेतुक मानते हQ तो हिंसा के हेतु को हिंसक नहाR मानना चाहिए और चित्तसंतति के निरोध™प मोक्ष को भी अ°ांग हेतुक नहाR कहना चाहिए। भावाथर्- बौद्धें ने नाश को निष्कारणक माना है और चित्त संतति के नाश को मोक्ष कहा है पुन: उस मोक्ष को सम्यक्त्व, संज्ञा, संज्ञी, वाक्कायकमर्, अंतव्यार्याम, अजीव, स्मृति और समाधि इन आठ कारणें से होना बताया है। उधर नाश को अहेतुक कह दिया है पुन: चित्तसंतति के नाश™प मोक्ष को अ°ांग हेतुक कह दिया, यह बात परस्पर वि®द्ध हो गई है। बौद्ध ने हेतु को विसÂश कायर् के लिए माना है वि™पकायार्रम्भाय, यदि हेतुसमागम:। आश्राfयभ्यामनन्योÓसा-वविशेषादयुक्तवत्।।५३।। कायर् विसÂश करने हेतू, हेतु समागम यदी कहो। तब वह हेतू नाश और उत्पाद उभय म्ें निमित अहो।। आश्रायभूत अत: हेतू, इन दोनें से आfभVा रहता। इक ही मुद्गर घट का नाश, कपाल उत्पाद उभय करता।।५३।। अन्वयाथर्- (यदि वि™पकायार्रम्भाय हेतु समागम:) यदि विसÂश कायर् को उत्पVा करने के लिए हेतु का समागम माना जावे (असौ आश्राfयभ्यां अनन्य: आfवशेषात् अयुक्तवत्) तो यह हेतु नाश तथा उत्पाद दोनें का कारण होने से अपने इन दोनें आश्राfययें से भिVा नहाR है, क्येंकि उन नाश, उत्पाद ™प दोनें आश्रायीभूतें म्ें परस्पर म्ें भेद नहाR है। जैसे अपृथक् सिद्ध पदार्थों का कारण अपने आश्राfययें से भिVा नहाR होता है। कारिकाथर्- यदि आप विसÂश कायर् को आरंभ करने के लिए हेतु का समागम स्वीकार करते हQ। तब तो यह हेतु का व्यापार अपने आश्रायी-नाश और उत्पाद से आfभVा ही है क्येंकि उन दोनें म्ें परस्पर म्ें कोई भेद नहाR है। जैसे- अयुक्त-अपृथक् सिद्ध पदार्थों का कारण अपने आश्राfययें से भिVा नहाR होता है।। भावाथर्- बौद्ध का यह कहना है कि नाश तो निर्हेतुक है किन्तु उससे जो कायर् होता है, वह सहेतुक है। जैसे किसी ने घÌडे पर मुद्गर मारा तो घÌडे का पूâटना मुद्गर हेतुक नहाR है, किन्तु जो कपाल बन गये हQ वे मुद्गर हेतुक हQ क्येंकि वे विसÂश कायर् हQ किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि एक मुद्गर ही घÌडे के पूâटने म्ें और कपाल के उत्पVा होने म्ें दोनें म्ें हेतु है अत: एक ही हेतु नाश और उत्पाद दोनें को करता है, वह बात ही स्प° सिद्ध है। बौद्ध के यहाँ स्वंâधादि म्ें उत्पादादि नहाR बनते हQ स्कन्धा: सन्ततयश्चौव, संवृतित्वादसंस्कृता:। स्थित्युत्पत्तिव्ययास्तेषां, न स्यु: खर-विषाणवत्।।५४।। बौद्धों की स्वंâध संततियाँ, कही गई हQ असंस्कृत™प। क्येंकी वे संवृत्ति™प हQ, नहिं परमाथर्भूत सत्™प।। ™प, वेदना, विज्ञान अ® संज्ञा, संस्कार पांच स्वंâध। व्यय, उत्पाद, धÇौव्य उनम्ें नहिं, घट सकता जैसे खरëाृंग।।५४।। अन्वयाथर्- (स्वंâधा: संततयश्चौव असंस्कृता: संवृतित्वात्) बौद्धें के यहाँ संततियाँ अकायर् ™प हQ क्येंकि वे संवृति ™प हQ (तेषंा स्थित्युत्पत्तिव्यया: खरविषाणवत् न स्यु:) अत: उनम्ें उत्पाद, व्यय, धÇौव्य नहाR हो सकते हQ जैसे कि गधे के साRग म्ें उत्पाद-व्यय-धÇौव्य का अभाव है। कारिकाथर्- स्वंâधें की परम्परा असंस्कृत ही है। क्येंकि वह संवृत्ति ™प है, इसलिए खर विषाण के समान इन स्वंâधें म्ें उत्पाद, व्यय, धÇौव्य भी नहाR हो सकता है। भावाथर्- बौद्धें ने हमेशा ही प्रत्येक परमाणु-परमाणु को पृथक्-पृथक् आपस म्ें स्पर्श रहित माना है अत: उसके यहाँ स्वंâध परम्परा असत्य ही है पुन: वह कपाल आदि कायर्™प वैâसे हो सकेगी और जब स्वंâध वास्तविक नहाR है,
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५७) (५८) तब उनम्ें उत्पाद, व्यय, धÇौव्य व्यवस्था असंभव है। बौद्ध के यहाँ स्वंâध के पाँच भेद हQ-™प, वेदना, विज्ञान, संज्ञा, संस्कार। इनकी उत्पत्ति आदि वैâसे बनेगी, क्येंकि ये कायर्भूत नहाR हQ। नित्य क्षणिक का उभय एकांत सदोष है विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।५५।। नित्य आfनत्य उभय धर्मों का, मेल सदैव विरोधी है। स्याद्वाद नय के विद्वेषी चूँकि सदा निरपेक्ष कहW।। इन दोनें का ‘अवक्तव्य’ भी, यदि एकांत विधी से है। तब तो अवक्तव्य यह कहना, सचमुच स्ववचन बाधित है।। ५५।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वादन्याय के विद्वेषियें के यहाँ नित्य क्षणिक का उभय एकात्म्य भी असंभव है, क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) और इन दोनें का अवाच्य एकांत माना जावे, तो ‘तòव अवाच्य है’ यह कथन भी युक्त नहाR है। कारिकाथर्- स्याद्वादनीति से द्वेष रखने वालें के यहाँ नित्यत्व, आfनत्यत्व ™प उभयैकांत मानना भी सिद्ध नहाR है क्येंकि निरपेक्ष उभयैकांत म्ें परस्पर म्ें विरोध है तथा यदि तòव को सवर्था अवाच्य™प ही स्वीकार करW तो भी ‘‘तòव अवाच्य है’’ यह कथन भी युक्त नहाR हो सकता है। नित्य और क्षणिक स्याद्वाद म्ें निर्दोष हQ नित्यं तत्प्रत्यभिज्ञानाVााकस्मात्तदविच्छिदा। क्षणिवंâ कालभेदात्ते बुद्ध्यसंचरदोषत:।।५६।। वस्तु सभी हQ नित्य कथंचित् चूँकि उनका प्रत्यभिज्ञान। नहिं होता यह अकस्मात् आfवच्छिVा™प से अनुभवज्ञान।। वस्तु कथंचित् आfनत्य भी है, चूँकि काल से भेद दिख्ें। भगवन्! यदि सवर्था कहW तब ज्ञान असंचर दोष दिखे।।५६।। अन्वयाथर्- (ते तत् नित्यं प्रत्यभिज्ञानात् अकस्मात् न तत् आfवच्छिदा) हे भगवन्! आपके मत म्ें वह वस्तु नित्य है क्येंकि उसका प्रत्यभिज्ञान पाया जाता है और यह प्रत्यभिज्ञान आकस्मिक नहाR है क्येंकि वह आfवच्छिVा ™प से अनुभव म्ें आता है (क्षणिवंâ कालभेदात् बुद्ध्यसंचरदोषत:) वही वस्तु क्षणिक भी है क्येंकि काल के भेद से परिणमन पाया जाता है। यदि एेसा न मान्ें, तो ज्ञान का संचार नहाR होना यह दोष आ जावेगा। कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके यहाँ सभी वस्तु कथंचित् नित्य हQ क्येंकि प्रत्यभिज्ञान से जानी जाती है। यह प्रत्यभिज्ञान आकस्मिक-निविर्षयक भी नहाR है। क्येंकि उसका आfवच्छेद ™प से अनुभव होता है तथा वे ही जीवादि वस्तुएँ काल भेद की अपेक्षा से कथंचित् क्षणिक भी हQ अन्यथा बुद्धि का वहाँ संचरण नहाR हो सकता है। भावाथर्- सभी वस्तुएँ कथंचित् नित्य हQ क्येंकि ‘यह वही है’ एेसा जोÌड ™प ज्ञान होता है। यह ज्ञान अकस्मात् तो हो नहाR सकता है प्रत्युत आfवच्छिVा परम्परा से अनुभव म्ें आ रहा है। दस वषर् पहले किसी को देखा है यदि वह सामने आ गया, तब दस वषर् पहले की याद होकर ‘यह वही है’ ज्ञान देखा जाता है। यदि ज्ञान एक आत्मा के अन्वय™प से विच्छेद रहित न हो, तो एेसा वैâसे होगा ? उसी प्रकार वे ही सभी वस्तुएँ कथंचित् आfनत्य हQ क्येंकि काल के निमित्त से परिणमन हो रहा है। एक ही पयार्य म्ें बचपन का नाश, जवानी का उत्पाद अथवा देवपयार्य का नाश, मनुष्य पयार्य का उत्पाद आदि देखा जाता है। यदि सभी वस्तुआW को कथंचित् नित्य और आfनत्य न मानें तो ज्ञान म्ें जो संचरण-परिणमन दिखता है, वह नहाR होना चाहिए। उत्पाद, व्यय, धÇौव्य की व्यवस्था न सामान्यात्मनोदेति, न व्येति व्यक्तमन्वयात्। व्येत्युदेति विशेषात्ते, सहैकत्रोदयादि सत्।।५७।। भगवन्! तव मत म्ें द्रव्याथिर्क नय से वस्तू नहिं उपजे। नहिं विनशे भी कोई वस्तू, क्येंकि अन्वय प्रगट रहे।। वही वस्तु पयार्यÂि° से, विनशे उपजे क्षण-क्षण म्ें। एक वस्तु म्ें युगपत् व्यय, उत्पाद घÇौव्य होना सत् है।।५७।। अन्वयाथर्- (ते सामान्यात्मना न उदेति न व्येति व्यत्तंâ अन्वयात्) हे भगवन्! आपके यहाँ सभी वस्तुएँ सामान्य ™प से न उत्पVा होती हQ न विन° ही होती हQ क्येंकि प्रगट™प से अन्वय™प हQ (विशेषात् व्येति उदेति एकत्र सह उदयादि सत्) और विशेष-पयार्य ™प से वे ही वस्तुएँ न° होती हQ एवं उत्पVा होती हQ क्येंकि एक ही वस्तु म्ें एक साथ उत्पाद, व्यय, धÇौव्य का होना ‘सत्’ कहलाता है।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (५९) (६०) कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके अनेकांत शासन म्ें सभी जीवादि वस्तु सामान्य ™प से न तो उत्पVा होती हQ, न विन° होती हQ। क्येंकि उनम्ें सामान्य ™प अन्वय स्प°तया देखा जाता है। किन्तु विशेष की अपेक्षा से वही उत्पVा होती और विन° होती है एवं युगपत् एक वस्तु म्ें उत्पादादि तीनें ही पाये जाते हQ, क्येंकि ‘सत्’ उत्पादादि त्रयात्मक ही है। भावाथर्- ‘‘उत्पादव्ययधÇौव्ययुत्तंâ सत्’’ इस प्रकार से सत् का लक्षण माना गया है और वही सत् द्रव्य का लक्षण है ‘‘सद्द्रव्यलक्षणं’’ इस सूत्र से स्प° है। द्रव्य का यह लक्षण प्रत्येक द्रव्य म्ें प्रतिसमय पाया जाता है। उत्पाद आदि आfभVा हQ कार्योत्पाद: क्षयो हेतोनिर्यमाल्लक्षणात्पृथक्। न तौ जात्याद्यवस्थाना-दनपेक्षा: खपुष्पवत्।।५८।। उपादान कारण का जो क्षय, वही कायर् का है उत्पाद। एक हेतु है दोनें म्ें, फिर भी लक्षण से भिVा विभाग।। जाती आदि अवस्थित कारण, से दोनें म्ें भेद नहाR। उत्पादादि यदी अनपेक्षित, गगनपुष्पवत् असत् सही।।५८।। अन्वयाथर्- (हेतो: क्षय: नियमात् कार्योत्पाद: लक्षणात् पृथक्) जो उपादान कारणभूत हेतु का नाश है, वही नियम से कायर् का उत्पाद है एवं लक्षण से दोनें म्ें भिVाता है (न तौ जात्याद्यवस्थानात् अनपेक्षा: खपुष्पवत्) किन्तु जाति अवस्थान के कारण उत्पाद, व्यय भिVा नहाR है। परस्पर की अपेक्षा से रहित उत्पाद, व्यय और धÇौव्य आकाश पुष्प के समान असत् ही हQ। कारिकाथर्- कायर् का उत्पाद ही एक हेतु नियम से अपने मृत्पिंड ™प उपादान कारण का विनाश है। उत्पाद और विनाश ये दोनें अपने-अपने लक्षण से भिVा-भिVा हQ तथा जाति सामान्य आदि के अवस्थान से ये दोनें भिVा नहाR है। परस्पर म्ें अनपेक्ष उत्पाद, व्यय, धÇौव्य ये तीनें ही खपुष्प के समान हQ। भावाथर्- मृत्पिंड ™प उपादान कारण का नाश होकर ही घट™प कायर् उत्पVा होता है, एेसा नियम देखा जाता है। यदि उत्पाद व्यय सवर्था भिVा ही हें, तो व्यवस्था नहाR बन सकती है। हाँ! दोनें का लक्षण भिVा-भिVा अवश्य है। उपादान कारण का पूवर् के आकार से न° हो जाना व्यय है, उत्तराकार से प्रगट हो जाना उत्पाद है एवं दोनें अवस्थाआW मेW वस्तु का आfस्तत्व विद्यमान रहना धÇौव्य है। ये कथंचित् सापेक्ष होकर ही रहते हQ। एक द्रव्य के नाश आदि म्ें भिVा भाव होते हQ घट-मौलिसुवणार्र्थी, नाशोत्पादस्थितिष्वयम्। शोक-प्रमोद-माध्यस्थ्यं, जनो याति सहेतुकम्।।५९।। घट का इच्छुक घÌडा नाश से, करता शोक सहेतुक है। मुकुट आfथर् तो मुकुटोत्पाद से, हषिर्त हुआ सहेतुक है।। स्वणार्र्थी इन उभय अवस्था, म्ें मध्यस्थ स्वभाव धरे। व्यय-उत्पाद-धÇौव्य के ये, °ांत सहेतुक कहे खरे।।५९।। अन्वयाथर्- (अयं जन: घटमौलिसुवणार्र्थी) जो मनुष्य घट, मुकुट या स्वणर् के इच्छुक हQ वे ›ाâम से (नाशोत्पादस्थितिषु सहेतुकम् शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं याति) घट के नाश म्ें सकारणक शोक को, मुकुट के उत्पाद म्ें प्रमोद को एवं दोनें अवस्थाआW म्ें सुवणर् के रहने से सुवणर् इच्छुक माध्यस्थ भाव को प्राप्त होते हQ। कारिकाथर्- घट, मौलि एवं सुवणर् के इच्छुक ये तीन व्यक्ति नाश, उत्पाद एवं स्थिति म्ें सहेतुक ही शोक, प्रमोद एवं माध्यस्थ भाव को प्राप्त होते हQ। भावाथर्- यदि कोई सुवणर् के घट को तुÌडवाकर उससे मुकुट बनवा रहा है, तो घट का इच्छुक जन शोक को प्राप्त हो जाता है और उसका शोक सकारणक होता है। जो मुकुट चाहता था, वह मनुष्य मुकुट पाकर प्रसVा हो जाता है एवं यदि कोई सुवणर् मात्र का इच्छुक था, तो वह दोनें ही अवस्थाआW म्ें शोक-हषर् न करके मध्यस्थ भाव से उसे ले लेता है। नाश, उत्पाद और धÇौव्य इन तीनें ही अवस्थाआW म्ें मनुष्य की प्रवृत्ति विषाद आदि™प हो रही है, वह सहेतुक है, अहेतुक नहाR है। वस्तु तòव त्रयात्मक है पयो›ातो न दध्यत्ति, न पयोत्ति दधि›ात:। अगोरस›ातो नोभे, तस्मात्तòवं त्रयात्मकम्।।६०।। क्षीर पिऊँगा यह ›ात जिसके, दही नहाR वह खाता है। दधि›ात वाला क्षीर न पीता, चूँकि क्षीर को त्यागा है।। गोरस त्यागी उभय न लेता, चूँकि द्रव्य पर Âि° धरे। इससे वस्तू तòव त्रयात्मक, सह धÇुव व्यय उत्पाद धरW।।६०।। अन्वयाथर्- (पयो›ातो न दधि आfत्त दधि›ात: न पय: आfत्त) जिसको दूध पीने का ›ात है वह दही नहाR खाता है, दधि के नियम वाला दूध को नहाR पीता
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) है (अगोरस›ातो न उभे तस्मात् तòवं त्रयात्मवंâ) और जिसको गो रस का त्याग है, वह दूध-दही दोनें को नहाR पीता है, इसीलिए वस्तु तòव त्रयात्मक है। कारिकाथर्- जिसका दूध ही लेने का नियम है वह दधि को नहाR खाता है और जिसको दधि को लेने का नियम है वह दूध नहाR पीता है और जिसका गोरस का ही त्याग है वह दूध और दही दोनें को ही नहाR खाता है इसलिए तòव भी त्रयात्मक है। ।।इति तृतीय: परिच्छेद:।। N : श् तृतीय परिच्छेद का सार नित्यैकांत-आfनत्यैकांत का खंडन और स्याद्वाद सिद्धि (कारिका ३७ से ६० तक) सांख्य सभी पदार्थों को सवर्था वूâटस्थ नित्य मानते हQ, उनका कहना है कि आत्मा जानने ™प ि›ाâया का भी कत्तार् नहाR है। ज्ञान और सुख प्रकृति (जÌड) के धमर् है, केवल आत्मा इनका भोक्ता अवश्य है। ये लोग कारण म्ें कायर् को सदा विद्यमान ™प ही मानते हQ। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि सभी पदार्थों म्ें परिणमन दिख रहा है अत: वे सवर्था नित्य नहाR हQ तथा ज्ञान और सुख ये आत्मा के ही स्वभाव हQ, आत्मा से भिVा नहाR हQ। मQ सुखी हूँ, मQ दु:खी हूँ इत्यादि™प से जो स्वसंवेदन होता है वह ज्ञान के द्वारा ही होता है और वह अनुभव सवर्था नित्य नहाR है। प्रत्येक वस्तु पूवार्कार को छोÌडकर उत्तराकार को ग्राहण करती है और उन दोनें अवस्थाआW म्ें अन्वय संबंध पाया जाता है, इस अन्वय स्वभाव से वस्तु नित्य है तथा पूवार्कार, उत्तराकार के त्याग और ग्राहण™प से व्यय और उत्पाद स्व™प भी है, अत: आfनत्य भी है। जीव ने मनुष्य पयार्य को छोÌडकर देव पयार्य ग्राहण की तथा दोनें अवस्थाआW म्ें अन्वय ™प जीवात्मा विद्यमान है, एेसा स्प° है तथा मिóी से वुंâभकार घट बनाता है, घट उसम्ें विद्यमान था वुंâभार ने प्रगट कर दिया, यह कल्पना गलत है। हाँ, मिóी म्ें घट शक्ति™प से अवश्य है अथार्त् मिóी म्ें घट बनने की शक्ति अवश्य है, कारक निमित्तें से प्रकट हो जाती है अत: आत्मा आदि पदाथर् द्रव्य Âि° से नित्य हQ, पयार्य Âि° से आfनत्य हQ। बौद्ध का कहना है कि सभी पदाथर् सवर्था क्षण-क्षण म्ें न° हो रहे हQ। उनम्ें जो कहाR स्थायित्व दिख रहा है वह सब वासना मात्र है तथा ये लोग कारण का जÌडमूल से विनाश मानकर ही कायर् की उत्पत्ति मानते हQ। इस पर जैनाचायर् कहते हQ कि सभी पदार्थों को सवर्था क्षणिक मानने पर तो स्मृति, प्रत्यभिज्ञान आदि सिद्ध नहाR हेंगे, प्रात: अपने घर से निकलकर कोई भी व्यक्ति पुन: यह वही घर है, जिसम्ें मQ रहता हूँ, एेसा स्मृतिपूवर्क प्रत्यभिज्ञान नहाR हो सकने से वापस नहाR आ सकेगा। पुन: सारे लोक व्यवहार समाप्त हो जाव्ेंगे तथा मृत्पिंड के सभी परमाणु का सवर्था नाश हो गया पुन: घट किससे बना ? यह प्रश्न होता रहेगा, कारण के विनाश के बाद कायर् की उत्पत्ति मानने (६१) (६२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) से तो मिóी से ही घट क्यें बने ? तंतु से घट और मृत्पिंड से वŒा भी बन जाय्ेंगे, जौ के अंकुरें से चने पैदा होने लग्ेंगे, कोई व्यवस्था नहाR बन सकेगी। अत: कारण का कायर्™प परिणत हो जाना ही कायर् है। तंतु ही वŒा ™प परिणत होते हQ, यही सिद्धांत सत्य है। बौद्ध कहता है कि वस्तु सत् है, असत् है, उभय ™प है, अनुभय ™प है, ये चार विकल्प ही हो सकते हQ और ये चारें ही विकल्प अवाच्य हQ-कहे नहाR जा सकते अत: ‘वस्तु अवाच्य है।’ जैनाचायर् कहते हQ कि भाई! ‘वस्तु अवाच्य हQ’ इस वाक्य से भी पुन: तुमने वैâसे कहा, इस वाक्य से वाच्य कर देने से वह अवाच्य कहां रही, यह तो एेसा है कि कोई मुँह से कहे कि ‘मQ मौन›ाती हूँ’ बौद्ध की एक और मान्यता बहुत ही विचित्र है वह कहता है कि ‘विनाश अहेतुक है’ घÌडे पर मुद्गर का प्रहार हुआ वह पूâट गया, तो उसका कहना है कि मुद्गर के निमित्त से घÌडा नहाR पूâटा है, प्रत्युत स्वभाव से ही पूâटा है। हाँ, मुद्गर के निमित्त से कपाल टुकÌडे अवश्य उत्पVा हुए हQ। जैनाचायर् तो घÌडे के पूâटने म्ें और कपाल के उत्पVा होने म्ें दोनें म्ें ही एक मुद्गर को ही हेतु मानते हQ क्येंकि इन्हेंन् ो पूवार्कार घट का विनाश और उत्तराकार कपाल का उत्पाद इन दोनें को एक हेतुक और एक समय म्ें ही माना है। घट का पूâटना ही तो कपाल का उत्पाद है। इस बेचारे बौद्ध ने तो कायर् को ही सहेतुक मान लिया है, किन्तु आजकल कुछ एेसे भी लोग हQ जो विनाश और उत्पाद दोनें को ही अहेतुक कह देते हQ, उनका कहना है कि कायर् का उत्पाद होना था, तब निमित्त उपस्थित हो गया, वह सवर्था आfवंâचित्कर है, उस बेचारे ने क्या किया है ? एेसा कहने वालें की दशा तो बौद्धें से भी आfधक शोचनीय है। बौद्ध के सवर्था क्षणिक मत म्ें अपने किये हुए को नहाR भोगना और दूसरे के किए हुए का फल पाना ये दोष भी आ जाते हQ। जैसे-किसी व्यक्ति की आत्मा ने हिंसा का भाव किया, वह उसी क्षण न° हो गई, दूसरी आत्मा ने आकर हिंसा कर दी, वह भी न° हो गई, तीसरी आत्मा को पाप का बंध हो गया, उसी क्षण वह भी न° हो गया, चौथी आत्मा ने आकर उसका फल दु:ख भोगा। अहो! यह सिद्धान्त बहुत ही हास्यास्पद है। सप्तभंगी प्रि›ाâया- जैन सिद्धान्त के अनुसार तो सभी पदाथर् कथंचित् नित्य हQ क्येंकि द्रव्याथिर्क नय से वे कभी न° नहाR होते हQ। सभी पदाथर् कथंचित् आfनत्य हQ क्येंकि पयार्यें का विनाश और उत्पाद देखा जाता है। सभी पदाथर् कथंचित् नित्य और आfनत्य उभय™प हQ क्येंकि ›ाâम से द्रव्याथिर्क और पयार्याथिर्क दोनें नयें की अपेक्षा है। सभी पदाथर् कथंचित् अवक्तव्य हQ क्येंकि एक साथ दोनें नयें की विवक्षा होने से दोनें धमर् एक साथ कहे नहाR जा सकते हQ। सभी पदाथर् कथंचित् नित्य और अवक्तव्य हQ क्येंकि ›ाâम से द्रव्याथिर्क नय और युगपत् दोनें की विवक्षा है। सभी पदाथर् कथंचित् आfनत्य और अवक्तव्य इस छठे भंग™प हQ क्येंकि ›ाâम से पयार्याथिर्क नय और युगपत् दोनें नयें की विवक्षा है। सभी पदाथर् कथंचित् नित्यानित्य और अवक्तव्य हQ क्येंकि ›ाâम से दोनें नय और युगपत् दोनें नयें की अपेक्षा है। इस प्रकार सप्तभंगी प्रि›ाâया से सभी बात्ें व्यवस्थित हQ। N : श् (६३) (६४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (६५) (६६) अथ चतुथर्: परिच्छेद: क्या कायर् कारण आदि सवर्था भिVा हQ ? कायर्-कारण-नानात्वं, गुणं-गुण्यन्यतापि च। सामान्य-तद्वदन्यत्वं, चैकान्तेन यदीष्यते।।६१।। कायर् और कारण म्ें भेद, गुणी से गुण भी भिVा रहे। उसी तरह सामान्य और, सामान्यवान् भी पृथक् कहW।। वैशेषिक मत कहे सवर्था, भिVा-भिVा गुण द्रव्य सभी। पुन: वस्तु से सòव पृथव्â हQ, अत:वस्तु हQ असत् सभी।।६१।। अन्वयाथर्- (यदि एकांतेन कायर्कारणनानात्वं गुणगुण्यन्यतापि च) यदि आप एकांत से कायर्-कारण म्ें और गुण-गुणी म्ें भेद मानते हQ (सामान्यतद्वदन्यत्वं इष्यते) और सामान्य एवं सामान्यवान् म्ें भी भेद मानते हQ, तब तो क्या दोष आता है उसे अगली कारिका म्ें बताते हQ। कारिकाथर्- कायर् कारण म्ें सवर्था भिVाता है, गुण और गुणी म्ें भी सवर्था भिVाता है एवं सामान्य और सामान्यवान् म्ें सवर्था भिVाता है। यदि आप एकांत से एेसा मानते हQ तो इस कारिका की अ°सहœाी टीका म्ें इनकी एकांत मान्यता देकर अगली कारिका म्ें उसका निराकरण किया है। वैशेषिक के सवर्था भिVौकांत म्ें दोष एकस्याÓनेक-वृत्तिनर्, भागाÓभावाद्बहूनि वा। भागित्वाद्वाÓस्य नैकत्वं, दोषो वृत्तेरनार्हते।।६२।। एक अनेकें म्ें नहिं रहता, चूँकि अंश नहिं है उसम्ें। यदि वा अंश कहो उसम्ें, तब कायर् एक ही बहुत बन्ें।। यदि भागित्व कहो तब तो वह, एक न एक कहा सकता। अर्हत् मत से भिVा जनें म्ें, वृत्ति दोष यह कहलाता।।६२।। अन्वयाथर्- (एकस्य अनेकवृत्ति: न भागाÓभावाद् बहूनि वा) सवर्था कायर्कारण आदि म्ें भेद मानने पर तो एक की अनेकें म्ें वृत्ति नहाR हो सकेगी, क्येंकि उस एक म्ें विभाग के अभाव से निरंशता है अथवा अनेकें म्ें रहना मानें, तो वह एक बहुत हो जाव्ेंगे (भागित्वात् वा अस्य एकत्वं न अनार्हते वृत्ते: दोष:) अथवा यदि उस एक को भागित्व ™प मानकर वृत्ति मानें तो उसका एकत्व नहाR बन सकता है। इस प्रकार से अर्हंत मत से भिVा सवर्था एकांत म्ें एक की अनेक म्ें वृत्ति मानने से अनेकें दोष आ जाते हQ। कारिकाथर्- एक की अनेक म्ें वृत्ति नहाR हो सकती है क्येंकि उनम्ें भाग- अंशें का अभाव है अथवा यदि वृत्ति मानोगे तब तो एक को अनेक ™प मानना पÌडेगा तथा यदि एक ही अवयवी के भाग-अंश मानोगे, तब तो यह एक ™प नहाR कहा जायेगा, इस प्रकार से एक की अनेक वृत्ति मानने पर हे अर्हंत्! आपके मत से बा¢ा परमतावलम्बियें के यहाँ अनेक दोष आते हQ। भावाथर्- वैशेषिक कायर्-कारण आदि को सवर्था भिVा मानते हQ उनके यहाँ वŒा एक कायर् है और वह अंश कल्पना से रहित है तथा अपने अनेक तंतु कारणें म्ें रहता है कुछ समझ म्ें नहाR आता है कि एक निरंश कायर् अनेकें कारण तंतुआW म्ें वैâसे रहता है? हम जैनियें के यहाँ मात्र परमाणु को निरंश कहा है और आकाश को भी अंश सहित सिद्ध किया है वह कायर् कारण म्ें वैâसे रहता है, इत्यादि का अ°सहœाी म्ें स्प°ीकरण किया गया है। वैशेषिक को देश-काल भेद भी मानना चाहिए देश-काल-विशेषेÓपि, स्याद्वृत्तिर्युत-सिद्धवत्। समान-देशता न स्यान्मूतर्कारण-कायर्यो:।।६३।। यदि अवयव-अवयवी आदि म्ें, भेद सवर्था कहो सुजान। देश-काल से भी होगा यह, भेद पुन: युतसिद्ध समान।। पृथक्-पृथक् आश्राय वाले, घट-पट म्ें भी वृत्ती होगी। तब तो मूतर् कायर् कारण म्ें, एकदेशता नहिं होगी।।६३।। अन्वयाथर्- (देशकालविशेषे आfप युतसिद्धवत् वृत्ति: स्यात्) यदि अवयव अवयवी का परस्पर म्ें सवर्था भेद माना जाये, तो देश और काल की अपेक्षा से भी भेद मानना पÌडेगा, तब युतसिद्धवत् पृथक्-पृथक् आश्राय म्ें रहने वाले घट- घट के समान इनम्ें भी वृत्ति माननी होगी। (मूतर्कारणकायर्यो: समानदेशता न स्यात्) पुन: मूतिर्क कारण और कायर् म्ें जो समान देशता देखी जाती है, वह नहाR हो सकेगी। कारिकाथर्- अवयव, अवयवी आदि म्ें परस्पर म्ें अत्यन्त भेद मानने पर देशकाल की अपेक्षा से भी इनम्ें भेद मानना होगा एवं देश, काल से भी भेद के मानने पर इनकी वृत्ति युतसिद्ध पदार्थों की तरह होगी, पुन: मूतर् कायर्-कारण म्ें सामान्य देशता-एकदेशपना नहाR बन सकेगा।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (६७) (६८) भावाथर्- इसका भाव यह है कि जब धमर् और धर्मी म्ें अवयव-अवयवी आदि पदार्थों म्ें सवर्था ही अत्यंत भेद है तब देश और काल की अपेक्षा भी उनम्ें भेद मानना पÌडेगा। जैसे घट और वृक्ष आदि पदाथर् सवर्था भिVा हQ वैसे ही जीव और ज्ञान, वŒा और तंतु आदि भी सवर्था ही भिVा रहWगे। घट और उसकी मिóी म्ें भी सवर्था भेद ही बना रहेगा। समवाय से वृत्ति मानने म्ें दोष आश्रायाश्राfयभावाVा स्वातन्त्र्यं समवायिनाम्। इत्ययुक्त: स संबन्धो न युक्त: समवायिभि:।।६४।। यदि समवायी पदाथर् का है आश्राय और आश्रायी भाव। अत: स्वतंत्र नहाR है जिससे, भिVों म्ें है वृत्ति अभाव।। चूूँकि स्वयं जो असम्बद्ध, वह एक अवयवी वस्तू का। अवयव बहुतें से वैâसे तद्वत् संबंध करा सकता?।।६४।। अन्वयाथर्- (समवायिनां आश्रायाश्राfयभावात् स्वातंत्र्यं न) यदि कहा जाये कि समवायी अवयव-अवयवी आदि म्ें आश्राय-आश्रायी भाव होने के कारण स्वतंत्रता नहाR है (इति समवायिभि: अयुक्त: स संबंध: न युक्त:) तब तो समवायियें के साथ अयुक्त-दूसरे समवाय संबंध से असंबंधित वह समवाय संबंध घटता ही नहाR है। अथार्त् जो स्वयं असंबद्ध है, वह एक का दूसरे के साथ संबंध वैâसे करा सकता है ? कारिकाथर्- आश्राय और आश्रायी भाव के होने से समवायि-तंतुपटादिकें म्ें स्वतंत्रता-भिVाता नहाR है यदि आप वैशेषिक एेसा कहते हQ, तब तो समवायियें के साथ अयुक्त (दूसरे समवाय संबंध से असंबंधित) वह समवाय संबंध युक्तियुक्त नहाR है अथार्त् समवाय लक्षण संबंध समवायियें के साथ असंबंधित होने से सिद्ध नहाR हो पाता है। भावाथर्- वैशेषिक का कहना है कि कायर्कारण, ि›ाâया-ि›ाâयावान्, गुण- गुणी आदि म्ें स्वतंत्रता नहंी है कि जिससे युत-सिद्ध पदार्थों के समान देश और काल आदि के भेद से उनकी वृत्ति मानी जा सके, इनम्ें आश्राय-आश्रायी भाव है। अवयव आदि आश्रायभूत हQ और अवयवी आदिकें म्ें आश्रायी भाव है तथा ये परस्पर म्ें समवाय संबंध से बंधे हQ, अत: ये समवायी पदाथर् देश काल आदि के भेद से अपनी वृत्ति नहाR कर सकते हQ। इस पर जैनाचायर् कहते हQ कि हे वैशेषिक! समवायियें को आश्राय- आश्राfयभाव म्ें रखकर उनको परस्पर म्ें जोÌडने वाला यह समवाय पदाथर् उनकी स्वतंत्रता को अपहरण करने वाला है। वह समवाय इन समवायियें म्ें दूसरे समवाय से जुÌडता है, यह स्वत: ? यदि यह समवाय इन समवायियें म्ें दूसरे समवाय से रहता है तो अनवस्था दोष आता है। यदि कहो कि समवाय अपने समवायियें म्ें स्वत: रहता है तो फिर इन द्रव्यादि समवायियें को इस समवाय के द्वारा जुÌडने की क्या आवश्यकता है जैसे बिना समवाय के यह समवाय अपने द्रव्यादि समवायियें म्ें जुÌड जाता है, एेसे ही द्रव्य गुण आदि स्वयं बिना समवाय के जुÌडे हुए हQ मान लो क्या बाधा है ? सामान्य समवाय एक-एक हQ सामान्यं समवायश्चााप्येवैâकत्र समाप्तित:। अन्तरेणाश्रायं न स्यान्नाशोत्पादिषु को विधि:।।६५।। आश्राय बिन सामान्य और समवाय नहाR रहते प्रत्येक। एक-एक द्रव्यादि नित्य म्ें, समाप्त होते ये इक-एक।। पुन: न° उत्पVा आfनत्यें कार्यों म्ें वैâसे हेंगे?। चूँकि नित्य ये दोनें उन, वस्तू म्ें वैâसे ठहरWगे।।६५।। अन्वयाथर्- (सामान्यं समवायश्चा आfप आश्रायं अन्तरेण न स्यात् एवैâकत्र समाप्तित:) ये सामान्य और समवाय दोनोW भी आश्राय के बिना नहाR रह सकते हQ क्येंकि ये दोनें एक-एक ही हQ अत: एक-एक द्रव्य आदि म्ें ही समाप्त हो जाते हQ (नाशोत्पादिषु क: विधि:) तब नाश हुए और उत्पVा हुए आfनत्य कार्यों म्ें उन सामान्य और समवाय की व्यवस्था वैâसे बनेगी ? कारिकाथर्- जिस प्रकार से सामान्य सत्ता बिना आश्राय के नहाR रह सकता है, तथैव समवाय भी बिना आश्राय के नहाR रह सकता है और अपने आश्रायभूत प्रत्येक नित्य व्यक्तियें-पदार्थों म्ें ये दोनें पूणर्™प से रहते हQ। इसलिए नाशोत्पादादि-आfनत्य पदार्थों म्ें इनका विधान वैâसे होगा अथार्त् इनका आfस्तत्व वहाँ वैâसे सिद्ध होगा ? सामान्य समवाय भी परस्पर म्ें भिVा हQ सवर्थानभिसंबंध: सामान्यसमवाययो:। ताभ्यामर्थो न संबद्धस्तानि त्रीणि खपुष्पवत्।।६६।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (६९) (७०) आपस म्ें सामान्य और, समवाय सदा संबंध रहित। इन दोनें से द्रव्य गुणादिक, पदाथर् नहिं हQ संंबंधित।। इसीलिए सामान्य तथा, समवाय अथर् ये तीनें ही। गगनकुसुमवत् ‘असत्’ अवस्तू हो जावे परमत म्ें ही।।६६।। अन्वयाथर्- (सामान्यसमवाययो: सवर्था अनभिसंबंध:) सामान्य और समवाय का सवर्था ही परस्पर म्ें कोई संबंध नहाR है (ताभ्यां अर्थो न संबद्ध: तानि त्रीणि खपुष्पवत्) तब उन दोनें के साथ द्रव्य गुण आदि अथर् भी संबंधित नहाR है पुन: सामान्य समवाय और पदाथर् ये तीनें ही आकाशपुष्पवत् असत् ठहरते हQ। कारिकाथर्- सामान्य और समवाय का सवर्था-संयोगादि प्रकार से संबंध नहाR है। क्येंकि संयोग दो द्रव्यें म्ें ही होता है और इन दोनें के द्वारा अथर्- पदाथर् संबंधित नहाR होता है। अत: सामान्य-समवाय और पदाथर् ये तीनें ही खपुष्प के समान असत् हो जाय्ेंगे। परमाणु की अन्य™प परिणति न मानने म्ें दोष अनन्यतैकान्तेÓणूनां संघातेÓपि विभागवत्। असंहतत्वं स्याद्भूतचतुष्वंâ भüान्तिरेव सा।।६७।। यदि परमाणु सदा नित्य हQ, अन्य ™प परिणम्ें नहाR। तब स्वंâध ™प म्ें भी वे, भिVा-भिVा ही रहW सही।। पुन: भूमि-जल-वायु आfग्न, इन भूतचतु°य का स्वंâध। भüांत™प ही हो जावेगा, क्येंकि अणू सब पृथव्â-पृथक्।।६७।। अन्वयाथर्- (अणूनां अनन्यतैकांते विभागवत् संघाते आfप असंहतòवं स्यात्) यदि परमाणुआW को एकांत ™प से अनन्य-एक™प ही माना जावे अथार्त् परमाणुआW का कभी भी भिVा-भिVा™प परिणमन न माना जाये, तब तो परमाणुआW का संघात होने पर भी स्वंâध™प होना नहाR बन सकेगा जैसे कि परमाणुआW के विभाग म्ें स्वंâध होना नहाR बनता है (सा भूतचतुष्कभüांति: एव) पुन: जो भूत चतुष्क हQ वे भüांति ™प ही रहWगे। कारिकाथर्- परमाणुआW म्ें आfभVा ™प एकांत पक्ष के मानने पर उनकी संघात-स्वंâध अवस्था म्ें भी विभाग-विभक्त पदार्थों की तरह उनको पृथक्- पृथक् परस्पर असंबंधित ही मानना पÌडेगा, पुन: एेसी स्थिति म्ें आपके द्वारा स्वीकृत भूतचतुष्क भüांति™प ही हो जायेगा, अथार्त् पाथिर्व जलीय, तैजस एवं वायवीय परमाणुआW के संघात™प पृथ्वी, जल, आfग्न, वायु, भूतचतुष्क हQ। ये भüांत हो जाय्ेंगे। कायर् भüांत है तो कारण भी भüांत है कायर्भüान्तेरणु-भüान्ति: कायर्लिंगं हि कारणम्। उभयाÓभावतस्तत्स्थं, गुणजातीतरच्च न।।६८।। यदि कायर् स्वंâध भüांत हQ, तब कारण परमाणू भüांत। चूँकि कायर् हेतू से होता, कारण परमाणू का ज्ञान।। यदि दोनें ये भüांत हुए तब, दोनें का हो गया अभाव। उनम्ें रहने वाले गुण जात्यादिक का फिर नहिं सद्भाव।।६८।। अन्वयाथर्- (कायर् भüांते: अणुभüांति: कारणं कायर्लिंगं हि) यदि स्वंâध™प भूतचतु°य को भüांत कहोगे, तो उसके कारणभूत परमाणु भी भüांत ही मान्ें जाव्ेंगे, क्येंकि कारण कायर् हेतुक ही होता है (उभयभावत: तत्स्थं गुणजातीरत् च न) पुन: कायर्कारण दोनें ही भüांत होने से दोनें का अभाव हो जावेगा और तब उनम्ें रहने वाले गुण जाति ि›ाâयादि भी नहाR बन सव्ेंâगे। कारिकाथर्- कायर्भूत चतुष्क को भüांत मानने से परमाणुआW को भी भüांत मानना पÌडेगा। क्येंकि कायर् के हेतु से ही कारण का ज्ञान होता है एवं इन दोनें के अभाव से इनम्ें स्थित रहने वाले गुण, जाति और ि›ाâया आदि कुछ भी सिद्ध नहाR हो सव्ेंâगे। सांख्य के यहाँ कायर्कारणादि म्ें एकत्व ही है एकत्वेÓन्यतराभाव:, शेषाÓभावोÓविनाभुव:। द्वित्वसंख्याविरोधश्च, संवृत्तिश्चोन्मृषैव सा।।६९।। कायर् और कारण म्ें यदि, एकत्व कहो तब एक रहे। चूँकी दोनें आfवनाभावी, अत: शेष भी नहाR रहे।। द्वित्व कथन भी वि®द्ध होता, यदि संवृत्ति से मानोगे। संवृत्ति तो यह मृषा कहाती, अत: सभी मिथ्या हेंगे।।६९।। अन्वयाथर्- (एकत्वे अन्यतराभाव: शेषाभावो आfवनाभुव:) यदि सांख्य मतानुसार कायर्-कारण आदि म्ें सवर्था एकत्व ही माना जाये तो एक की मान्यता म्ें दो म्ें से किसी एक का अभाव ही ठहरेगा पुन: जो एक बचा है उसका भी अभाव हो जावेगा, क्येंकि वह पहले के साथ आfवनाभावी था (द्वित्वसंख्याविरोधश्चा
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (७१) (७२) संवृति: चेत् सा मृषा एव) पुन: द्वित्व आदि संख्या का भी विरोध हो जावेगा। यदि कहो कि द्वित्व आदि संख्याएँ संवृति ™प हQ तब तो यह संवृति तो असत्य ही है। कारिकाथर्- आप सांख्य आदि सवर्था कायर्-कारण म्ें एकत्व स्वीकार करWगे तब तो दोनें म्ें से किसी एक का अभाव हो जायेगा। पुन: एक किसी का अभाव होने पर शेष दूसरे बचे हुए का भी अभाव हो जायेगा; क्येंकि उन दोनें म्ें आfवनाभाव नियम है तथा च ‘यह कायर् है और यह कारण है’ इस तरह की दो की संख्या म्ें भी विरोध हो जायेगा। यदि आप कहW कि संवृत्ति से ये सब कायर्-कारण, द्वित्व संख्यादि हQ तब तो वह आपकी संवृत्ति तो सवर्था असत्य ही है। सवर्था भिVा-आfभVा की उभय और अवाच्य भी सदोष है विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।७०।। यदी कायर् कारण म्ें भेदा-भेद उभय का एेक्य कहो। स्याद्वादमत द्वेषी के यह, वैâसे होगा सत्य अहो।। यदी कायर्-कारण का भेदा-भेद अवाच्य कहे कोई। तब ‘अवाच्य’ यह कथन असंगत, स्याद्वाद बिन घटे नहाR।।७०।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषी लोगें के यहाँ कायर्-कारण आदि की भिVाता और आfभVाता इन दोनें का एकात्म्य माना जाये, तो भी नहाR बनता है क्येंकि इन भिVा-आfभVा का परस्पर म्ें विरोध है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि सवर्था दोनें को अवाच्य™प स्वीकार किया जावे, तो कायर्-कारण का भेद-अभेद अवाच्य है, यह कथन भी नहाR बन सकेगा। कारिकाथर्- स्याद्वाद नीति के शत्रुआW के यहाँ अन्यता और अनन्यता™प उभयैकात्म्य संभव नहाR है, क्येंकि वे दोनें परस्पर विरोधी हQ। यदि कोई कहे कि हम तòव को अन्यत्व, अनन्यत्व से रहित ‘‘अवाच्य™प’’ मानते हQ, तब तो तòव अवाच्य है। इस प्रकार से वाक्य द्वारा कथन भी नहाR कहा जा सकता है। कथंचित् कायर्-कारण आदि का भेद-अभेद ठीक है द्रव्यपयार्ययोरैक्यं, तयोरव्यतिरेकत:। परिणामविशेषाच्च, शक्तिमच्छक्तिभावत:।।७१।। द्रव्य और पयार्य कथंचित्, एक™प हQ अभेद ही। क्येंकि उभय है आfभVा उनका, पृथक्करण है शक्य नहाR। । द्रव्य और पयार्य कथंचित्, भिVा कहे सवर्था नहाR। चूँकि भिVा परिणमन भेद से, शक्तिमान अ® शक्ति से भी।।७१।। संज्ञासंख्या-विशेषाच्च, स्वलक्षणविशेषत:। प्रयोजनादिभेदाच्च, तVाानात्वं न सवर्था।।७२।। नाम भेद से संख्या से भी, द्रव्य और पयार्य पृथक्। निज-निज लक्षण भेद उभय म्ें, इसीलिए हQ पृथव्â-पृथक्।। दोनें का है भिVा प्रयोजन, अ® प्रतिभास भेद भी है। इसी अपेक्षा द्रव्य और, पयार्य कथंचित् भिVा रहW।।७२।। अन्वयाथर्- (द्रव्यपयार्ययो: एेक्यं तयो: अव्यतिरेकत:) द्रव्य और पयार्यें म्ें कथंचित् आfभVाता है क्येंकि उन दोनें को पृथक् नहाR कर सकते हQ (तVाात्वं परिणामविशेषात् च शक्तिमत् शक्तिभावत:) कथंचित् द्रव्य और पयार्यें म्ें भिVाता भी है क्येंकि उनम्ें परिणमन भेद पाया जाता है और शक्तिमान् एवं शक्तिभाव से भी भेद है। (संज्ञासंख्याविशेषात् च स्वलक्षणविशेषत: प्रयोजनादिभेदात् च) द्रव्य पयार्य म्ें कथंचित् नाम, संख्या आदि भेद से भी भेद हQ। अपने-अपने लक्षण भेद से भी भेद है एवं प्रयोजन, काल, प्रतिभास आदि से भी भेद है (सवर्था न) किन्तु द्रव्य पयार्यें म्ें सवर्था भेद नहाR है। कारिकाथर्- द्रव्य और पयार्य म्ें एकत्व हQ, क्येंकि वे दोनें सवर्था भिVा नहाR है तथा परिणाम विशेष से शक्तिमान, शक्तिभाव से, संज्ञा, संख्या की विशेषता से, अपने-अपने लक्षणें की भिVाता से एवं प्रयोजनादि के भेद से वे दोनें नाना-भिVा-भिVा भी हQ, किन्तु सवर्था भिVा-भिVा नहाR हQ। ।।इति चतुथर्: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) चतुथर् परिच्छेद का सार भेदैकांत और अभेदैकांत का खंडन और स्याद्वाद सिद्धि (कारिका ६१ से ७२ तक) योग कहता है कि कायर्-कारण, गुण-गुणी, अवयव-अवयवी आदि सभी परस्पर म्ें भिVा-भिVा हQ। यह समवाय नाम का एक संबंध मानता है जिसका अथर् है ‘अयुतसिद्ध म्ें संबंध होना’ उस समवाय से ही सब के संबंध मानता है। जैसे-जीव से ज्ञान भिVा है समवाय से ईÕार संबंधित हुआ है किन्तु जीव म्ें ज्ञान के संबंध के पहले जीव का तथा ज्ञान का पृथक्-पृथक् आfस्तत्व दिख नहाR रहा है जैसे-दंड के संबंध के पहले मनुष्य और दंड दोनें अलग-अलग दिख रहे हQ पीछे उनका संबंध हो जाने से ‘दंडी’ यह संज्ञा हो जाती है वैसे यहाँ गुण-गुणी पृथक् ™प से दिखते नहाR है। कायर्-कारण म्ें भी सवर्था भिVाता नहाR है कथंचित् ही है। इनका समवाय भी सिद्ध नहाR होता है जिसे हम जैन तादात्म्य संबंध कहते हQ उसे समवाय भले ही कह दो किन्तु अलग से यह कोई समवाय संबंध सिद्ध नहाR है। सांख्य का कहना है कि महान अलंकार आदि कायर् हQ और प्रधान कारण है, इन दोनें म्ें परस्पर म्ें एकत्व ही है। आचायर् कहते हQ कि कायर् कारण म्ें सवर्था एकत्व मानने से तो दोनें म्ें से कोई एक ही रहेगा और दूसरे का अभाव हो जावेगा। पुन: एक के अभाव म्ें दूसरा भी नहाR रह सकेगा अत: कायर्, कारण आदि को सवर्था एक™प नहाR मानना चाहिए। योग परस्पर निरपेक्ष भिVाता और आfभVाता दोनें ही मान लेते हQ। बौद्ध कहता है कि वस्तु सवर्था अवाच्य ही है किन्तु जैनाचायर् परस्पर सापेक्ष ™प से तòव को भिVा-भिVा उभयात्मक मानते हQ और एक साथ दोनें धर्मों को न कह सकने से चतुथर् भंग™प से कथंचित् ‘अवाच्य’ भी मान लेते हQ सवर्था नहाR। सभी वस्त ुएँ व्यंजन पयार्य की अपेक्षा वाच्य हQ और अथर् पयार्य की अपेक्षा से अवाच्य हQ। अद्वैतवादी का कहना है कि द्रव्य एक है वही वास्तविक है, पयार्य्ें अनेक हQ वे अवास्तविक हQ। द्रव्य उन पयार्यें से भिVा है। सौगत का कहना है कि वणार्दिक™प अनेक पयार्ये हQ, वे ही वास्तविक हQ, किन्तु द्रव्य नाम की तो कोई चीज ही नहाR है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि द्रव्य और पयार्यें म्ें कथंचित् एकत्व है क्येंकि उन दोनें को पृथक्-पृथक् करना अशक्य है। तथैव द्रव्य और पयार्यें म्ें कथंचित् भिVापना भी है क्येंकि दोनें का लक्षण भिVा है, प्रयोजन आदि से भी भिVाता है। द्रव्य का लक्षण सत् है, तो पयार्य का लक्षण है-उस-उस प्रतिविशि°™प से होना। सहभावी गुण होते हQ और ›ाâमभावी पयार्य्ें होती हQ। द्रव्य अनादि-अनंत एक स्वभाव है, पयार्य्ें सादि-सांत अनेक स्वभाव वाली हQ। फिर भी द्रव्य से निरपेक्ष केवल पयार्य्ें रह नहाR सकती और पयार्य निरपेक्ष द्रव्य का आfस्तत्व भी असंभव है। गुण और पयार्यें के समूह का नाम ही द्रव्य है अथवा उत्पाद, व्यय और धÇौव्य इन त्रयात्मक ही द्रव्य है। सप्तभंगी प्रि›ाâया- द्रव्य और पयार्यें का पृथक्-पृथक् विवेचन करना अशक्य होने से दोनें म्ें कथंचित् एकत्व है। असाधारण™प स्वस्वलक्षण के भेद से कथंचित् दोनें म्ें नानापना सिद्ध है। ›ाâम से दोनें नयें की अपर्णा करने से द्रव्य और पयार्य्ें कथंचित् एकत्व भिVात्व™प उभयात्मक हQ। युगपत् दोनें नयें की अपर्णा करने से कहना ही अशक्य है अत: कथंचित् द्रव्य और पयार्य्ें दोनेें अवक्तव्य हQ। भिVा-भिVा लक्षण और एक साथ दोनें नयें की अपर्णा करने से कथंचित् नानात्व अवक्तव्य है। दोनें का पृथक्-पृथक् अशक्य विवेचन होने से और एक साथ दोनें नयें की अपर्णा करने से द्रव्य-पयार्यें म्ें कथंचित् एकत्व अवक्तव्य है। ›ाâम से तथा अ›ाâम से आfपर्त दोनें नयें से द्रव्य पयार्य कथंचित् नाना एकत्व अवक्तव्य™प है। इस प्रकार से द्रव्य और पयार्यें म्ें प्रमाण तथा नय से आfव®द्ध सप्तभंगी सुघटित है। N : श् (७३) (७४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (७५) (७६) अथ पंचम: परिच्छेद: धमर्, धर्मी सवर्था आपेक्षिक या अनापेक्षिक ही नहाR है यद्यापेक्षिकसिद्धि: स्याVा द्वयं व्यवति‰ते। अनापेक्षिकसिद्धौ च, न सामान्यविशेषता।।७३।। धमर् और धर्मी आपस म्ें, यदि आपेक्षिक सिद्ध कहW। एक दूसरे के अभाव से, दोनें ही तब न° हुए।। यदी परस्पर अनपेक्षा से, दोनें सिद्ध कहे जाते। तब सामान्य विशेष उभय भी, एक बिना नहिं रह सकते।।७३।। अन्वयाथर्- (यदि आपेक्षिकसिद्धि: स्यात् न द्वयं व्यवति‰ते) यदि सवर्था धमर्-धर्मी की परस्पर म्ें अपेक्षाकृत ही सिद्धि मानी जावे, तो दोनें ही सिद्ध नहाR हो सव्ेंâगे (अनापेक्षिकसिद्धौ च सामान्यविशेषता न) यदि सवर्था धमर्-धर्मी म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा न करके ही सिद्धि मानी जावे, तो भी सामान्य और विशेष भाव नहाR बन सव्ेंâगे। कारिकाथर्- यदि धमर् और धर्मी की सिद्धि सवर्था अपेक्षाकृत ही मानी जाव्ें, तब तो इन दोनें की व्यवस्था ही नहाR बन सकेगी क्येंकि एक के द्वारा एक का विघात हो जावेगा। यदि दोनें की सिद्धि सवर्था अनापेक्षिक ही माने जावे, तब तो इस स्थिति म्ें सामान्य और विशेष भाव सिद्ध नहाR हो सव्ेंâगे। आपेक्षिक-अनापेक्षिक का उभय एवं अवाच्य एकांत से नहाR घटता विरोधाVोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विष् ााम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।७४।। यदि आपेक्षिक सिद्धि अनापेक्षिक सिद्धी का एेक्य कहW। स्याद्वाद बिन नहाR घटेगा, चूँकि परस्पर वि®द्ध हQ।। इन दोनें का ‘अवक्तव्य’, एकांत™प से यदि मानें। तब तो ‘अवक्तव्य’ यह कहना, स्ववचन बाधित ही जानो।।७४।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के बैरियें के आपेक्षिक-अनापेक्षिक इन दोनें का एकात्म्य भी नहाR बन सकता है क्येंकि दोनें म्ें परस्पर म्ें विरोध है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) और यदि इन दोनें का अवाच्य एकांत ही स्वीकार किया जावे, तो भी नहाR बन सकता है क्येंकि ‘अवाच्य’ है यह कथन भी शक्य नहाR हो सकेगा। कारिकाथर्- स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ एकांत से आपेक्षिक और अनापेक्षिक ™प उभयैकात्म्य भी सिद्ध नहाR होता है। क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है। एकांत से अवाच्यता को ही मानने पर तो ‘‘अवाच्य’’ इस प्रकार से कथन भी नहाR बन सकता है। आपेक्षिक-अनापेक्षिक की अनेकांत व्यवस्था धमर्धम्यर्विनाभाव: सिद्धयत्यन्योÓन्यवीक्षया। न स्व™पं स्वतो ¢ोतत्, कारकज्ञापका”वत्।।७५।। धमर् और धर्मी का आfवनाभाव™प संबंध सदा। आपस म्ें सापेक्ष कथंचित्, आपेक्षिक है कहलाता।। किन्तु धमर्-धर्मी दोनें का, निज स्व™प है स्वत: प्रसिद्ध। कारक-ज्ञापक अवयव सÂश, नहिं स्वभाव है आपेक्षिक।।७५।। अन्वयाथर्- (धमर्-धम्यर्विनाभाव: अन्योन्यवीक्षया सिद्धŸाति) धमर् और धर्मी म्ें आfवनाभाव है वह परस्पर म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा से ही सिद्ध होता है (न स्व™पं, स्वतो हि एतत् कारकज्ञापका”वत्) किन्तु इन धमर्-धर्मी का स्व™प परस्पर म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा कृत् नहाR है वह स्व™प तो स्वत: ही सिद्ध है जैसे कि कारक के कत्तार्-कमर् आदि अवयव एवं ज्ञापक के बोध्य-बोधक आदि अवयव स्वत: सिद्ध हQ। कारिकाथर्- धमर् और धर्मी का आfवनाभाव ही परस्पर की अपेक्षा से सिद्ध होता है। किन्तु वह इनका स्व™प नहाR है। क्येंकि कारक और ज्ञापक के अंगें के समान यह स्व™प तो स्वत: ही सिद्ध है। ।।इति पंचम: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) पंचम परिच्छेद का सार एकांत™प अपेक्षा-अनपेक्षा का खंडन और स्याद्वाद सिद्धि (कारिका ७३ से ७५ तक) बौद्ध का कहना है कि धमर् और धर्मी परस्पर म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा से ही सिद्ध होते हQ। जैसे कि मध्यमा और अनामिका अंगुली। अत: ये धमर्-धर्मी कल्पित हQ, वास्तविक नहाR हQ क्येंकि ये निविर्कल्प ज्ञान म्ें प्रतिभासित नहाR होते हQ। ये तो निविर्कल्प के अनंतर होने वाले विकल्प ज्ञान से कल्पित किये गये हQ। योग का कहना है कि धमर् और धर्मी सवर्था अनापेक्षिक ही हQ-कदाचित् भी एक-दूसरे की अपेक्षा नहाR रखते हQ। इस पर जैनाचार्यों का कथन है कि धमर् और धर्मी का स्व™प स्वत: सिद्ध है, वह स्व™प तो एक-दूसरे की अपेक्षा नहाR रखता है किन्तु धमर् और धर्मी का आfवनाभाव परस्पर म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा ही सिद्ध होता है। जैसे कारक के अंग कतार् और कमर् स्वत: सिद्ध हQ। कतार् का स्व™प कमर् की अपेक्षा नहाR रखता है अन्यथा कतार् के स्व™प का अभाव हो जाने से कमर् के स्व™प का भी अभाव हो जायेगा अत: कथंचित् ये दोनें आपेक्षिक सिद्ध नहाR हQ। उसी प्रकार योग इन दोनें को सवर्था अनापेक्षिक ही मानता है, सो भी ठीक नहाR है। कतार् का व्यवहार कमर् के व्यवहार की अपेक्षा अवश्य रखता है, क्येंकि कमर् के निश्चायपूवर्क ही कतार् जाना जाता है। जैसे- ज्ञानादि गुण धमर् हQ और जीव धर्मी है, ये धमर् और धर्मी अपने-अपने स्व™प से स्वत: सिद्ध हQ अत: परस्पर आपेक्षिक नहाR हQ। जीव का स्व™प चैतन्य है और ज्ञान का स्व™प जानना है। ये अपने-अपने स्व™प म्ें एक-दूसरे की अपेक्षा नहाR रखते हQ किन्तु धर्मी के बिना धमर् अथवा धमर् के बिना धर्मी नहाR रह सकते हQ अत: कथंचित् एक-दूसरे की अपेक्षा से भी सिद्ध होते हQ। स्याद्वाद प्रि›ाâया- कथंचित् धमर् और धर्मी आपेक्षिक सिद्ध हQ, क्येंकि एक-दूसरे के बिना नहाR रह सकते हQ। कथंचित् ये दोनें अनापेक्षिक सिद्ध हQ, क्येंकि इन दोनें का स्व™प स्वत: सिद्ध है। कथंचित् ये दोनें अनापेक्षिक दोनें ™प हQ। एक साथ दोनें अपेक्षाआW का कथन न हो सकने से कथंचित् ये अवक्तव्य हQ। ›ाâम से आपेक्षिक और युगपत् दोनें की विवक्षा होने से कथंचित् आपेक्षिक अवक्तव्य हQ। ›ाâम से अनापेक्षिक और युगपत् दोनें की विवक्षा से कथंचित् अनापेक्षिक अवक्तव्य हQ। ›ाâम से और युगपत् दोनें की विवक्षा होने से कथंचित् आपेक्षिक-अनापेक्षिक अवक्तव्य हQ। इस प्रकार से स्याद्वाद के द्वारा ही वस्तुतòव की सिद्धि होती है। N : श् (७७) (७८)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (७९) (८०) अथ ष‰: परिच्छेद: सवर्था हेतु सिद्ध या आगम सिद्ध तòव बाधित है सिद्धं चेद्धेतुत: सवË न प्रत्यक्षादितो गति:। सिद्धं चेदागमात्सवË वि®द्धाथर्मतान्यपि।।७६।। यदी हेतु से सभी तòव की, सिद्धी मानी जाए सही। तब प्रत्यक्ष अनुमान आदि से, वस्तुस्थिति अ® ज्ञान नहाR।। यदि आगम से सभी तòव को, सच्चे सिद्ध कोई करते। तब वि®द्ध मत वाले आगम, से वि®द्ध मत सच हेंगे।।७६।। अन्वयाथर्- (हेतुत: सवË सिद्धं चेत् प्रत्यक्षादित: गति: न) यदि सभी तòव हेतु से सिद्ध हQ तब तो प्रत्यक्षादि प्रमाण से किसी वस्तु का ज्ञान नहाR हो सकेगा (आगमात् सवË सिद्धं चेत् वि®द्धाथर्मतानि आfप) यदि आगम से सभी तòव सिद्ध माने जाव्ेंगे, तब तो वि®द्ध अथर् को कहने वाले आगम भी प्रमाण हो जाव्ेंगे। कारिकाथर्- यदि सभी तòव एकांत से हेतु से ही सिद्ध होते हQ तब तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणें से किसी तòव की सिद्धि नहाR हो सकेगी। यदि सभी तòव आगम से ही सिद्ध माने जाय्ेंगे, तब तो वि®द्ध अथर् के प्रतिपादन करने वाले मत भी आगम से सिद्ध हो जाव्ेंगे। हेतु के और आगम के उभय एवं अवाच्य भी सदोष हQ विरोधाVोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।७७।। हेतू-आगम दोनें का, एकात्म्य बने नहिं परमत म्ें। स्याद्वाद विद्वेषी जन के, दिखे विरोध परस्पर म्ें।। यदि दोनें का ‘अवक्तव्य’ है, यह एकांत लिया जावे। तब तो ‘अवक्तव्य’ पर से भी, क्यें वक्तव्य किया जावे।।७७।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ हेतु और आगम के उभय का एकात्म्य भी नहाR हो सकता है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि इन उभय तòव को सवर्था अवाच्य कहा जाये, तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहाR किया जा सकता है। कारिकाथर्- स्याद्वादन्याय के द्वेषी जनें के यहाँ हेतुवाद और आगमवाद™प उभयैकात्म्य भी नहाR बन सकता है क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है तथा इन दोनें के अवक्तव्यैकांत को स्वीकार करने पर तो ‘अवाच्य’ इस प्रकार का शब्द प्रयोग भी नहाR किया जा सकता है। हेतु और आगम का अनेकांत वक्तयर्नाप्ते यद्धेतो: साध्यं तद्धेतुसाधितम्। आप्ते वक्तरि तद्वाक्यात्साध्यमागमसाधितम्।।७८।। वक्ता आप्त नहाR होने से, हेतू से जो सिद्ध हुआ। युक्तसिद्ध वह तòव सदा ही, हेतू साधित कहा गया।। वक्ता आप्त यही होवे तो, उनके वचनें से साधित। सभी तòव निबार्ध™प से, कहलाते आगम साधित।।७८।। अन्वयाथर्- (अनाप्ते वक्तरि हेतो: यत् साध्यं तत् हेतु साधितम्) यदि वक्ता आप्त नहाR है तब हेतु से जो साध्य है वह हेतु साधित कहलाता है (आप्ते वक्तरि तत् वाक्यात् साध्यं आगमसाधितं) यदि वक्ता आप्त है तब उनके वचनें से जो तòव सिद्ध होते हQ वे आगम साधित कहलाते हQ। कारिकाथर्- वक्ता के आप्त न होने पर जो हेतु से साध्य होता है, वह हेतु साधित है और वक्ता जब आप्त होता है, तब उसके वाक्य से जो सिद्ध होता है, वह आगम साधित है। ।। इति ष‰: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) छठे परिच्छेद का सार एेकांतिक हेतुवाद और आगमवाद का खंडन तथा स्याद्वाद सिद्धि (कारिका ७६ से ७८ तक) बौद्ध हेतु से ही तòवें की सिद्धि मानते हQ, बÇÿााद्वैतवादी आगम से ही परम बÇÿा को सिद्ध करते हQ। वैशेषिक तथा बौद्ध प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो प्रमाणें से ही तòवें की सिद्धि मानते हQ। आचायर् इन सबका ›ाâम से खंडन करते हQ। बौद्ध- सभी उपेय तòव हेतु से ही सिद्ध हQ प्रत्यक्ष से नहाR, क्येंकि जो युक्ति से घटित नहाR होता, उसे हम देखकर भी श्राद्धा नहाR करते हQ। जैन- आपके यहाँ हेतु को ही प्रमाण मानने से तो प्रत्यक्ष, आगम आदि सभी अप्रमाण हो जाव्ेंगे। पुन: अनुमान ज्ञान भी उत्पVा नहाR हो सकेगा तथा शाŒा के उपदेश से भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहाR होगा और तब तो आपके बुद्ध भगवान भी अप्रमाण हो जाव्ेंगे, क्येंकि बुद्ध भगवान का ज्ञान हेतु से नहाR हो सकता है। बÇÿााद्वैतवादी- सभी तòव आगम से ही सिद्ध हQ, क्येंकि अनुमान से सिद्ध भी वाक्य यदि आगम से बाधित है, तो वह अग्राा¢ा है। जैसे-‘‘बÇाÿाण को मदिरा पीना चाहिए, क्येंकि वह द्रव है, दूध के समान’’ यह कथन अनुमान से तो सिद्ध है किन्तु ‘‘बÇाÿाणो न सुरां पिबेत्’’ इत्यादि आगम से बाधित है और हमारे यहाँ परम बÇÿा भी तो आगम से ही सिद्ध है। जैन- इस प्रकार आगम को ही प्रमाण मानने पर तो आपके यहाँ अन्य लोगें द्वारा वि®द्ध अथर् को कहने वाले आगम भी प्रमाण हो जाव्ेंगे, क्येंकि आगम- आगम से तो सभी समान हQ। यदि आप अपने आगम को ही समीचीन कहो, तो उसकी समीचीनता का निणर्य भी तो युक्ति-हेतु से ही किया जायेगा। अत: आपका आगम भी तो हेतु सापेक्ष ही रहा अत: एकांत मान्यता ठीक नहाR है। वैशेषिक-सौगत- प्रत्यक्ष और अनुमान से ही तòवें की सिद्धि होती है, आगम से नहाR। जैन- यह कथन भी सारहीन है, क्येंकि ग्राहें के संचार एवं चंद्रग्राहण आदि ज्योतिष शाŒा से ही सिद्ध हQं अत: हेतु आगम, प्रत्यक्ष और अनुमान इन सभी से ही उपेय तòव सिद्ध होते हQ। इन दोनें का निरपेक्ष उभयैकात्म्य भी श्रोयस्कर नहाR है तथा स्याद्वाद के अभाव म्ें अवाच्य तòव कहना भी असंभव है। स्याद्वाद सिद्धि- वक्ता के आप्त न होने पर जो हेतु से सिद्ध होता है, वह हेतु साधित है एवं वक्ता जब आप्त होता है तब उसके वाक्य से जो सिद्ध होता है, वह आगम साधित है। ‘यो यत्र अवंचक: स तत्राप्त:’ जो जिस विषय म्ें अवंचक-आfवसंवादक है वह आप्त हQ, इससे भिVा अनाप्त हQ। कथंचित् सभी वस्तुएँ हेतु से सिद्ध हQ, क्येंकि उनम्ें इन्द्रिय और आप्त वचन की अपेक्षा नहाR है। कथंचित् सभी आगम से सिद्ध हQ, क्येंकि इन्द्रिय और हेतु की अपेक्षा है। कथंचित् उभय™प हQ, क्येंकि ›ाâम से दोनेें की विवक्षा है। कथंचित् अवक्तव्य हQ, क्येंकि युगपत् दोनें की विवक्षा है। कथंचित् हेतु से सिद्ध और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से हेतु की और युगपत् दोनेें की विवक्षा है। कथंचित् आगम से सिद्ध और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से आगम की और युगपत् दोनें की विवक्षा है। कथंचित् उभय™प और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से दोनें की और युगपत् दोनें की विवक्षा है। भावाथर्- जैन सिद्धांत म्ें ‘प्रमाणनयैरधिगम:’ सूत्र के द्वारा प्रमाण और नयें से वस्तु तòव को समझने का उपदेश दिया गया। प्रमाण के प्रत्यक्ष और परोक्ष की अपेक्षा दो भेद हQ। इन्द्रिय और मन से होने वाले ज्ञान को कहाR (न्याय ग्रांथेंम्ें) सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है तथा स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तवर्क, अनुमान और आगम ये परोक्ष प्रमाण हQ। इन सभी के द्वारा वस्तु तòव को ठीक से समझना चाहिए। N : श् (८१) (८२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (८३) (८४) अथ सप्तम: परिच्छेद: सवर्था अंतरंग अथर् मानना सदोष है अन्तर”ाथर्तैकान्ते बुद्धिवाक्यं मृषाÓखिलम्। प्रमाणाभासमेवातस्तत् प्रमाणाÂते कथम्।।७९।। स्वसंविदित जो ज्ञान तत्व है, अन्तरंग यदि अथर् वही। तब बुद्धि-अनुमान-शाŒा सब, बा¢ा वस्तु हQ मृषा सही।। अत: प्रमाणाभास हुये ये, अनुमान आगम चूंकि मृषा। बिन प्रमाण के कहाँ प्रमाणाभास बनेगा सभी सफा।।७९।। अन्वयाथर्- (अंतर”ाथर्तैकांते आfखलं बुद्धिवाक्यं मृषा) यदि एकांत से अंतरंग अथर्™प ज्ञान तòव को ही माना जाये, तब तो सम्पूणर् बुद्धि™प अनुमान और वाक्य् ा™प आगम मिथ्या हो जाव्ेंगे (अत: प्रमाणाभासं एव तत् प्रमाणात् त्र+ते कथं) इसी सेवे प्रमाणाभास हो जाव्ेंगे पुन: प्रमाणाभास भी प्रमाण के बिना वैâसे संभव है ? कारिकाथर्- यदि अंतरंग-ज्ञान™प पदाथर् को ही वास्तविक मानकर उसका एकांत स्वीकार किया जावे, तब तो सभी बुद्धि-अनुमान और वाक्य-आगम मिथ्या ही हो जावेगा। अत: वे बुद्धि और वाक्य प्रमाणाभास ही सिद्ध हेंगे। पुन: वह प्रमाणाभास भी प्रमाण के बिना वैâसे सिद्ध हो सकेगा ? ज्ञान मात्र मानने से साध्य-साधन भी नहाR बन्ेंगे साध्यसाधनविज्ञप्तेयर्दि विज्ञप्तिमात्रता। न साध्यं न च हेतुश्चा, प्रतिज्ञाहेतुदोषत:।।८०।। साध्य हेतु का ज्ञान यदी, बस ज्ञान मात्र माना जावे। तब तो साध्य नहाR होगा, हेतू °ांत नहाR हेंगे।। चूँकि ‘प्रतिज्ञादोष’ कहा जो, स्ववचन बाधित आवेगा। ‘हेतुुदोष’ है आfसद्धादि ये, आते सब दूूषित होगा।।८०।। अन्वयाथर्- (यदि साध्यसाधनविज्ञप्ते: विज्ञप्तिमात्रता) यदि साध्य और साधन के ज्ञान को ज्ञानमात्र ही माना जाये, तब तो (न साध्यं न च हेतु: च प्रतिज्ञाहेतुदोषत:) साध्य और हेतु ये दोनें नहाR बनते हQ एवं द्वितीय चकार से °ांत भी नहाR बनता है, क्येंकि एेसा कहने म्ें प्रतिज्ञा दोष और हेतु दोष उपस्थित होता है। कारिकाथर्- साध्य और साधन की विज्ञप्ति को यदि विज्ञान मात्र ही स्वीकार किया जावे, तब तो प्रतिज्ञा और हेतु के दोष से न साध्य ही सिद्ध होगा न हेतु एवं °ांत ही बन सव्ेंâगे। भावाथर्- प्रतिज्ञा दोष अथार्त् स्ववचन विरोध होता है और हेतु दोष अथार्त् आfसद्ध, वि®द्ध, अनैकांतिक दोष आते हQ। साध्य सहित पक्ष के कहने को ‘प्रतिज्ञा’ एवं साधन के वचन को हेतु कहते हQ। विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध सभी तòवें को ज्ञान मात्र ही कहता है तब साध्य और साधन व्यवस्था वैâसे बनेगी ? सवर्था बहिरंग अथर् ही है एेसा कहना भी सदोष है बहिर”ाथर्तैकान्ते प्रमाणाभासनिन्हवात्। सर्वेषां कायर्सिद्धि:स्याद्वि®द्धाथार्Óभिधायिनाम्।।८१।। बा¢ा अथर् को ही यदि मानें, चेतन का बस नाश हुआ। तभी प्रमाणाभास विपयर्य, संशय आदि समाप्त हुआ।। पुन: विरोधी कथनी वाले, सबके सभी विरोधी मत। सच्चे हो जाव्ेंगे फिर तो, नहाR रहW मिथ्यात्वी जन।।८१।। अन्वयाथर्- (बहिर”ाथर्तैकांते प्रमाणाभासनिन्हवात्) यदि एकांत से बा¢ा पदाथर् ही माने जाव्ें, अंतरंग ज्ञान तòव न माना जावे, तब तो इससे प्रमाणाभास का लोप हो जावेगा (वि®द्धाथार्भिधायिनां सर्वेषां कायर्सिद्धि: स्यात्) तब तो वि®द्ध अथर् को कहने वाले सभी जनें के सभी कायर् सिद्ध हो जाव्ेंगे। कारिकाथर्- घट-पटादि बा¢ा पदाथर् ही एकांत से हQ अंतरंग पदाथर् नहाR हQ, एेसी एकांत मान्यता म्ें तो संशयादि ™प प्रमाणाभास का निन्हव हो जाने से सभी वि®द्धाथर् को कहने वालें की भी कायर्सिद्धि हो जावेगी, क्येंकि बा¢ा पदाथर् सभी सत्य™प ही हQ। अंतरंग और बहिरंग अथर् का उभय और अवाच्य भी सदोष हQ विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।८२।। अंतरंग बहिरंग ज्ञेय का, जो एेकांतिक ‘एेक्य’ कहा। स्याद्वाद विद्वेषी जन के, मत म्ें सदा विरोध रहा।। ज्ञान और बा¢ााथर् वस्तु को, यदी अवाच्य कहा जिसने। तब तो वचनें से ‘अवाच्य’ को, वैâसे वाच्य किया उसने।।८२।।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (८५) (८६) अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ ज्ञान तòव और बा¢ा तòव इन उभय का एकात्म्य भी नहाR हो सकता है क्येंकि इनका परस्पर म्ें विरोध है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि इन दोनें का सवर्था अवाच्य स्वीकार किया जावे, तब तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहाR हो सकेगा। कारिकाथर्- स्याद्वादन्याय के विद्वेषियें के यहाँ एकान्त से इन दोनें का उभयैकात्म्य भी संभव नहाR है, क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है एवं तत्व को अवाच्य ™प स्व् ाीकार करने पर तो ‘‘अवाच्य’’ यह शब्द भी नहाR कहा जा सकता है। ज्ञान पदाथर् और बा¢ा पदाथर् दोनें ही सिद्ध हQ भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिन्हव:। बहि:प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तिVाभं च ते।।८३।। भाव प्रमेयापेक्षा करके, नहाR प्रमाणाभास रहे। चूँकी ज्ञान स्व-स्व™प, संवेदन से हि प्रमाण कहे।। बा¢ा पदाथर् प्रमेयापेक्षा, कहे प्रमाण, प्रमाणाभास। अत: नाथ! तव मत म्ें अंत:-बा¢ा तòव दोनें विख्यात।।८३।। अन्वयाथर्- (ते भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिन्हव:) हे भगवन्! आपके मत म्ें अंत: प्रमेय की अपेक्षा करने पर प्रमाणाभास का लोप हो जाता है (बहि: प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तिVाभं च) बा¢ा पदार्थों के प्रमेय की अपेक्षा करने पर प्रमाण और प्रमाणाभास दोनें ही होते हQ। कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके सिद्धान्त म्ें भाव-ज्ञान को प्रमेय™प से अपेक्षित करने पर प्रमाणाभास का लोप हो जाता है एवं बा¢ा पदाथर् को प्रमेय ™प से अपेक्षित करने पर तो प्रमाण एवं प्रमाणाभास दोनें ही सिद्ध हो जाते हQ। भावाथर्- स्वसंवेदन ज्ञान की अपेक्षा से सभी ज्ञान प्रमाण हQ चाहे संशय आदि ही क्यें न हें क्येंकि सभी ज्ञान अपने-अपने स्व™प के द्योतक होने से अपने-अपने विषय म्ें प्रमाण ही हQ। वहाँ प्रमाणाभास का नाम ही नहाR है, किन्तु जब बा¢ा पदार्थों को प्रमेय करते हQ तब प्रमाण और प्रमाणाभास दोनें ही व्यवस्थाएँ बन जाती हQ। जहाँ विसंवाद होता है अथवा बाधा आती है वहाँ प्रमाणाभास बनता है, किन्तु जहाँ विसंवाद न होकर निबार्धता रहती है वहाँ प्रमाण बनता है। इस प्रकार से प्रमाण-अप्रमाण की व्यवस्था म्ें कोई विरोध नहाR आता है। जीव शब्द बा¢ा अथर् से सहित है जीवशब्द: सबा¢ााथर्: संज्ञात्वाद्धेतुशब्दवत्। मायादिभüान्तिसंज्ञाश्चा, मायाद्यै: स्वै: प्रमोक्तिवत्।।८४।। जीव शब्द निज बा¢ा अथर् से, युक्त नित्य चैतन्य पु®ष। चूँकि संज्ञा™प कहा है जैसे हेतू शब्द सुलभ।। माया आदि शब्द दिखते हQ, भüांत™प फिर भी वे सब। ज्ञान शब्दवत् अपना-अपना, अथर् प्रगट करते संतत।।८४।। अन्वयाथर्- (जीवशब्द: सबा¢ााथर्: संज्ञात्वात् हेतुशब्दवत्) ‘जीव’ यह शब्द अपने बा¢ा अथर् से युक्त है क्येंकि संज्ञा या नाम वाला है जैसे हेतु शब्द बा¢ा अथर् के बिना नहाR होता है (मायादिभüांति संज्ञाश्चा स्वै: मायाद्यै: प्रमोक्तिवत्) माया आदि भüांत अथर्वाचक शब्द भी अपने-अपने माया आदि भüांत अथर् को लिए हुए ही होते हQ जैसे कि प्रमाण शब्द अपने अथर् को लिए हुए होता है। कारिकाथर्- संज्ञा™प होने से ‘हेतु’ इस शब्द की तरह जीव यह शब्द भी जीव लक्षण अपने बा¢ा अथर् से सहित हQ। जैसे प्रमाण वचन अपने अथर् से युक्त हQ तथैव मायादि, भüांति शब्द अपने मायादि अर्थों से सहित हQ। संज्ञा ™प हेतु निर्दोष है बुद्धिशब्दाथर्संज्ञास्तास्तिœो बुद्ध ्यादिवाचिका:। तुल्या बुद्धŸाादिबोधाश्चा, त्रयस्तत्प्रतिबिम्बका:।।८५।। बुद्धी, शब्द, अथर् ये तीनें, संज्ञा नाम कहे जाते। निज से पृथक् बुद्धि अ® शब्द, अथर् वस्तु को ये कहते।। अत: तुल्य है तथा नाम त्रय, के प्रतिबिम्बक भी तीनें। बुद्धि शब्द अ® अथर् ज्ञान ये, बा¢ा वस्तु व्यंजक तीनें।।८५।। अन्वयाथर्- (बुद्धिशब्दाथर्संज्ञा: ता: तिœा: बुद्धŸाादिवाचका:) बुद्धि, शब्द और अथर् ये तीनें नाम अपने से भिVा बुद्धि, शब्द एवं अथर् ™प अपने वाच्य अथर् को कहते हQ (बुद्धŸाादिबोधा: च तुल्या: त्रय: तत्प्रतिबिम्बका:) तथा जो बुद्धि शब्द और अथर्™प तीनें के ज्ञान हQ वे तुल्य हQ एवं ये तीनें ही बुद्धŸाादि विषय के प्रतिबिम्बक हQ। कारिकाथर्- ज्ञान, शब्द एवं अथर् इन तीनें की संज्ञाएँ बुद्धि आदि पदाथर् को कहने वाली हQ। अत: वे तुल्य हQ तथा बुद्धि, शब्द और अथर् ™प ज्ञान हQ वे भी
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (८७) (८८) तीनें बुद्धि आदि विषय के प्रतिबिम्बक हQ। भावाथर्- उच्चरित शब्द से जो निश्चिात ज्ञान होता है वही उसका निजी अथर् है जैसे घट शब्द के उच्चारण से श्रोता को वंâबुग्राीवादि सहित घट पदाथर् का बोध होता है अत: घट शब्द का अथर् घट™प पदाथर् माना गया है। वैसे ही शब्द-शब्द से उसका बा¢ा अथर् स्प° झलक जाता है। जीवाथर्क जीव शब्द, बुद्धि अथर्क जीव शब्द एवं नाम अथर्क जीव शब्द ये तीनें ही अपने से भिVा अथर् ज्ञान एवं नाम™प तीन वाच्य अथर् को कहते हQ क्येंकि इनके प्रतिबिम्बक ज्ञान तीन ही होते हQ। इस प्रकार से एक जीव पदाथर् का ज्ञान नाम एवं अथर् ™प से प्रतिपादन करने वाली होने से इन संज्ञाआW म्ें समानता है एवं एक जीव को ही ज्ञान नाम एवं अथर् ™प संज्ञाआW म्ें दिखाने वाले होने से इनके प्रतिबिम्बक ज्ञानें म्ें समानता है। विज्ञानाद्वैतवादी का समाधान वत्तृâश्रोतृप्रमात ¸ णां बोधवाक्यप्रमा: पृथव्â। भüान्तावेव प्रमाभüान्तौ बा¢ााÓर्थाै ताÂशेतरौ।।८६।। वक्ता, श्रोता और प्रमाता, इनके ज्ञान अ® वाक्य प्रमाण। पृथक्-पृथक् हQ यदि ज्ञानादिक, भüांत™प ही कहे तमाम।। प्रमा भüांत होने से तो फिर, इ° आfन° पदाथर् सभी। तथा प्रमाण अ® अप्रमाण ये, भüांत ™प हो जाएं सही।।८६।। अन्वयाथर्- (वत्तृâश्रोतृप्रमात ¸ णां बोधवाक्यप्रमा: पृथक्) वक्ता श्रोता और प्रमाता इन तीनें के ज्ञान, वाक्य और प्रमा पृथक्-पृथक् हQ (भüांतै एव प्रमाभüांतौ ब ा¢ाार्थाै ताÂशेतरौ) यदि इनको भüांत™प माना जावे, तो ज्ञान भी भüांत™प हो जावेगा। प्रमाण और अप्रमाण एवं इ° आfन° पदाथर् भी भüांत स्व™प ही हो जाव्ेंगे। कारिकाथर्- वक्ता, श्रोता एवं प्रमाता के बोध वाक्य एवं प्रमा ये शब्द भिVा- भिVा ही अवभासित होते हQ। यदि बोध, वाक्य और प्रमा को भüांति™प ही माना जावे, तब तो प्रमाण भी भüांत™प हो जायेगा, पुन: ताÂश भüांत-अप्रमाण एवं इतर- अभüांत-प्रमाण ™प वे इ° और आfन° बा¢ा पदाथर् भी भüांत ही मनाने पÌडWगे। ज्ञान और शब्द की प्रमाणता वैâसे है ? बुद्धिशब्दप्रमाणत्वं, बा¢ाार्थे सति नाÓसति। सत्यानृतव्यवस्थैवं, युज्यतेÓथार्प्त्यनाप्तिषु।।८७।। बा¢ा पदाथर् के होने पर, ज्ञान अ® शब्द प्रमाण सही। बा¢ा पदारथ नहिं होवे यदि, ज्ञान अ® शब्द प्रमाण नहाR।। अत: अथर् की प्राप्ती से ही, वस्तु व्यवस्था घटती है। किन्तु अथर् यदि प्राप्त न हो तब, मृषा व्यवस्था बनती है।। ८७।। अन्वयाथर्- (बा¢ाार्थे सति बुद्धि शब्दप्रमाणत्वं असति न) बा¢ा पदाथर् के होने पर ही ज्ञान और शब्द म्ें प्रमाणता आती है और बा¢ा अथर् के नहाR होने पर नहाR आती है (एवं अथार्प्त्यनाप्तिषु सत्यानृतव्यवस्था युज्यते) इसी प्रकार से बा¢ा पदाथर् की प्राप्ति म्ें सत्य की व्यवस्था एवं प्राप्ति न होने म्ें असत्य की व्यवस्था बनती है। कारिकाथर्- बा¢ा पदाथर् के होने पर बुद्धि-ज्ञान और शब्द को प्रमाणता है एवं बा¢ााथर् के नहाR होने पर उनको प्रमाण™पता नहाR है। इस प्रकार से अथर् की प्राप्ति और अप्राप्ति म्ें सत्य एवं असत्य की व्यवस्था की जाती है। भावाथर्- विज्ञानाद्वैतवादी ज्ञान को ही प्रमाण मानता है। इस पर आचायर् कहते हQ कि बा¢ा पदार्थों को माने बिना ज्ञान म्ें प्रमाणता-अप्रमाणता की व्यवस्था नहाR बन सकती है। अंतर्ज्ञेय ™प ज्ञान को ही प्रमेय करने की अपेक्षा रखने पर तो सम्यग्ज्ञान एवं मिथ्याज्ञान सब म्ें प्रमाणता होती है क्येंकि संशय, विपयर्य, अनध्यवसाय ™प मिथ्याज्ञान भी अपने-अपने स्व™प को जैसे का तैसा कहते हQ अत: स्व™प ज्ञान की अपेक्षा सभी ज्ञान प्रमाण ही हQ किन्तु जब ज्ञान म्ें प्रमाणता की कसौटी करनी होती है तब उस ज्ञान के द्वारा जाने गये पदार्थों की ओर Âि° डालनी पÌडती है। यदि ज्ञान का विषयभूत पदाथर् जिस ™प से ज्ञान से जाना गया है। वैसा ही दिख रहा है तब तो वह ज्ञान सत्य माना जाता है। यदि उस ™प से नहाR दिख रहा है। तब वह ज्ञान असत्य माना जाता है। इसलिए ज्ञान म्ें प्रमाणता और अप्रमाणता बा¢ााथर् के होने पर ही आती है अन्यथा नहाR। वैसे ही शब्द म्ें प्रमाणता और अप्रमाणता भी बा¢ा अथर् के होने पर ही आती है अन्यथा नहाR, क्येंकि स्वपक्ष साधन और परपक्ष दूषण शब्द बिना एवं बा¢ा अथर् के बिना नहाR बन सकते हQ। इसलिए बा¢ा अथर् वास्तविक हQ, एेसा मानना चाहिए। ।।इति सप्तम: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) सातव्ें परिच्छेद का सार अंतरंगाथर् एवं बहिरंगाथर् के एकांत का खंडन एवं स्याद्वाद सिद्धि (कारिका ७९ से ८७ तक) विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध कहता है कि अंतरंगाथर् विज्ञान मात्र ही एक तòव है किन्तु दिखने वाले बहिरंग पदाथर् कुछ भी नहाR हQ ये तो कल्पना मात्र हQ। ये सब बा¢ा पदाथर् इंद्रजालिया के खेल के समान हQ अथवा स्वप्न के राज्य समान हQ। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि आपकी इस एकांत मान्यता से तो हेतु और आगम से सिद्ध मोक्ष तòव एवं अनुमान, आगम आदि सभी प्रमाण आदि मिथ्या हो जाय्ेंगे तथा बा¢ा पदाथर् भी प्रत्यक्ष म्ें जो दिख रहे हQ वे सवर्था काल्पनिक नहाR है अन्यथा नर-नारकादि पयार्य्ें और उनके निमित्त से होने वाले सुख-दु:ख भी काल्पनिक ही कहे जाय्ेंगे और तब संसार भी काल्पनिक ही सिद्ध होगा। इस व्यवस्था से तो आपके बुद्ध भगवान काल्पनिक कहने पर तो मोक्ष भी काल्पनिक एवं आपका मत भी काल्पनिक ही हो जायेगा। कोई बा¢ा पदाथर्वादी है- जितने भी बा¢ा पदाथर् हQ वे सब ज्ञान से संबंधित हQ क्येंकि ज्ञान विषयाकार होता है। अत: बा¢ा पदाथर् ही वास्तविक हQ ज्ञान स्वतंत्र कोई चीज नहाR है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि यदि आप सभी पदार्थों को ज्ञान से संबंधित मान्ेंगे तब तो प्रमाण और प्रमाणाभास दोनें ही खत्म हो जाय्ेंगे। तृण के अग्रा भाग पर सौ हाथी बैठे हQ। इत्यादि ऊटपटांग वाक्यें का ज्ञान एवं स्वप्न का ज्ञान अपने-अपने पदाथर् से संबंधित नहाR है क्येंकि इन ज्ञानें म्ें विसंवाद देखा जाता है। इन अंतरंग-ज्ञानतòव और बहिरंग-बा¢ा पदाथर् को परस्पर निरपेक्ष मानने वाले उभयैकात्म्यवादी का सिद्धांत भी वि®द्ध ही है। उसी प्रकार दोनें तòवें को एकांत से अवाच्य मानना भी अघटित ही है। स्याद्वाद की अपेक्षा अंतरंग और बहिरंग दोनें ही तòव वास्तविक हQ। सभी ज्ञान स्व™प संवेदन की अपेक्षा से एवं सòव प्रमेयत्वादि की अपेक्षा से प्रमाण™प ही हQं अतएव अंत: प्रमेय की अपेक्षा से प्रमाणाभास कुछ भी नहाR है किन्तु जब बहि: प्रमेय-बा¢ा पदार्थों को प्रमेय करते हQ, तब ज्ञान म्ें प्रमाण और प्रमाणाभास दोनें ही सिद्ध हो जाते हQ इसलिए अंतस्तत्व और बहिस्तत्व दोनें ही सिद्ध हQ। जीव के आfस्तत्व की सिद्धि चावार्क- जीव अपने स्व™प से रहित है, वह शरीर इन्द्रिय आदि के समूह ™प ही है। जन्म के पूवर् और मरण के अनंतर चैतन्य नामक कोई तòव नहाR है अत: अनादिनिधन कोई आत्मा नहाR है। चैतन्य भी सत् है और भूतचतु°य भी सत् है। सत् ™प से दोनें समन्वित हQ अत: जीव भूतचतु°य से उत्पVा होता है किन्तु भूतचतु°य तो परस्पर म्ें भिVा-भिVा हQ। उन चारें म्ें एक विकारी समन्वय नहाR है अथार्त् पृथ्वी, जल, आfग्न और वायु ये चारें तòव भिVा-भिVा ही हQ। जैनाचायर्- यह आपका कथन सवर्था असत् है। जीव गया, जीव विद्यमान है, इत्यादि ™प से यह जीव शब्द लोकव्यवहार का आश्राय लेता है। यह व्यवहार शरीर, इन्द्रिय आदि म्ें नहाR हो सकता है। वैसे ही जन्म से पहले और मरण के अनंतर भी चैतन्य का आfस्तत्व सिद्ध है, किसी को जातिस्मरण होता हुआ देखा जाता है, बालक माता का स्तनपान करता है इत्यादि बात्ें भी संस्कार से मानी जाती हQ। आपने जो भूतचतु°य से चैतन्य की उत्पत्ति मानी है, वह भी सवर्था गलत है क्येंकि अचेतन से चेतन की उत्पत्ति होना असंभव है तथा ये चारें भूतचतु°य परस्पर म्ें सजातीय होने से एक-दूसरे ™प भी परिणत हो सकते हQ इसलिए ये सवर्था भिVा-भिVा भी नहाR हQ। चंद्रकांत मणि ™प पृथ्वी से जल की उत्पत्ति, सूयर्कांत से आfग्न की उत्पत्ति आदि तथा जलबिन्दु से सीप म्ें मोती की उत्पत्ति आदि देखी जाती है अत: अनादिनिधन जीव तòव सिद्ध है वह ज्ञान दर्शन उपयोग स्वभाव वाला है। एेसे ही सांख्य जीव को वूâटस्थ नित्य अपरिणामी ज्ञान शून्य मानते हQ। वे ज्ञान को प्रकृति (जÌड) का धमर् मानते हQ। योग जीव को स्वसंवेदन ज्ञान के द्वारा नहाR जानने योग्य-अस्वसंविदित मानते हQ। बÇÿावादी कहते हQ कि सभी शरीर म्ें एक आfभVा ™प (परमबÇÿा) जीवात्मा है। बौद्ध आत्मा को प्रतिक्षण भिVा-भिVा ही मानते हQ। इन सब के द्वारा जीव शब्द बा¢ााथर् सहित नहाR है क्येंकि यह सब मान्यता केवल कपोलकल्पित ही है। इस प्रकार जीव तòव की सिद्धि हो जाने से अंतरंग तòव सिद्ध हो जाता (८९) (९०)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (९१) (९२) अथ अ°म: परिच्छेद: क्या भाग्य से ही सभी कायर् सिद्ध हो सकते हQ ? दैवादेवाथर्सिद्धिश्चोद्दैवं पौ®षत: कथम्। दैवतश्चोदनिर्मोक्ष: पौ®षं निष्फलं भवेत्।।८८।। यदी भाग्य से सभी कायर् की, सिद्धि मान लिया तब तो। पु®षारथ से भाग्य™प यह, कायर् बना यह कहना क्यें।। यदी भाग्य यह पूवर्-पूवर् के, भाग्यें से ही बन जाता। तब तो मोक्ष नहाR किसको भी, पौ®ष भी निष्फल होगा।।८८।। अन्वयाथर्- (चेत् दैवात् एव अथर्सिद्धि: पौ®षत: दैवं कथं) यदि एकांत से भाग्य से ही सभी कार्यों की सिद्धि हो जाती है तब पु®ष के व्यापार™प पु®षाथर् द्वारा भाग्य का निमार्ण वैâसे होता है ? (दैवत: चेत् आfनर्मोक्ष: पौ®षं निष्फलं भवेत्) यदि पूवर् के भाग्य से भाग्य बनता है, तब तो कभी भी किसी को मोक्ष नहाR हो सकेगी क्येंकि पूवर्-पूवर् के भाग्य से भाग्य का निमार्ण होता ही रहेगा और मोक्ष का अभाव मानने से तो पु®षाथर् निष्फल ही हो जावेगा। कारिकाथर्- यदि दैव-भाग्य से ही अथर्-प्रयोजन की सिद्धि मानी जाये, तब तो वह दैव पौ®ष से पु®ष के व्यापार से वैâसे सिद्ध होगा ? यदि एेसा कहो कि उस दैव की सिद्धि भी दैव से ही होती है, तब तो मोक्ष भी कभी नहाR हो सकेगा अत: उस मोक्ष का अभाव हो जावेगा एवं मोक्ष के कारण™प से स्वीकृत पौ®ष-पु®षाथर् भी निष्फल हो जावेगा। क्या एकांत से पु®षाथर् से ही कायर् सिद्ध होते हQ ? पौ®षादेव सिद्धिश्चोत् पौ®षं दैवत: कथम्? पौ®षाच्चेदमोघं स्यात्, सवर्प्राणिषु पौ®षम्।।८९।। यदि पु®षाथर् अकेले से ही, सभी कायर् की सिद्धि कहो। तब तो भाग्य उदय से यह, पु®षारथ वैâसे बना अहो!।। यदि पु®षाथर् स्वयं पौ®ष से, होता तब तो सब जन के। सभी कायर् की सिद्धी होगी, चूंकि सभी म्ें पौ®ष है।।८९।। अन्वयाथर्- (चेत् पौ®षात् एव सिद्धि: दैवत: पौ®षं कथं) यदि पु®षाथर् से ही सम्पूणर् कार्यों की सिद्धि मानी जाये, तो भाग्य से पु®षाथर् वैâसे माना जावेगा? है। उसी प्रकार से बा¢ा पदाथर् भी परमाथर् सत्य है क्येंकि साधन और दूषण का प्रयोग देखा जाता है। बा¢ा पदाथर् के होने पर ही ज्ञान एवं शब्द प्रमाण™प हQ, बा¢ा पदाथर् के अभाव म्ें प्रमाणभूत नहाR हQ। इस प्रकार से अथर् की प्राप्ति और अप्राप्ति से ही सत्य और असत्य की व्यवस्था हो जाती है। भावाथर्- जीव तòव वास्तविक है अन्यथा ‘न जीव: अजीव:’ इस नियम से अजीव का आfस्तत्व ही समाप्त हो जावेगा तथा जीव के बिना बा¢ा पदार्थों को बतलाने वाला भी कोई नहाR रहेगा अत: जीव तòव की निबार्ध सिद्धि हो जाने से बा¢ा पदाथर् भी निबार्ध™प से सिद्ध हो जाते हQ। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (९३) (९४) (पौ®षात् चेत् अमोघं स्यात् सवर्प्राणिषु पौ®षं) यदि कहो कि पु®षाथर् से ही पु®षाथर् बनता है तब तो सभी के कायर् सिद्ध हो जाव्ेंगे, क्येंकि पु®षाथर् तो सभी प्राणियें म्ें पाया जाता है। कारिकाथर्- यदि केवल पु®षाथर् से ही अथर् की सिद्धि मानी जावे, तब तो दैव से पु®षाथर् देखा जाता है, वह वैâसे घटेगा? यदि कहो कि पु®षाथर् भी पु®षाथर् से ही उत्पVा होता है पुन: किये गये सभी कायर् सफल होने चाहिए, क्येंकि पु®षाथर् तो सभी प्राणियें म्ें पाया जाता है। भाग्य-पु®षाथर् के उभय एवं अवाच्य का खंडन विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।९०।। भाग्य और पु®षाथर् उभय का, एेक्य नहाR है आपस म्ें। चूँकि विरोधी हQ ये दोनें, स्याद्वाद नय द्वेषी के।। यदि इन दोनें की ‘अवाच्यता’, कहो सवर्था की विधि से। तब तो वचनें से ‘अवाच्य’ इस, पद को वाच्य किया वैâसे?।।९०।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ भाग्य और पु®षाथर् इन दोनें का एकात्म्य भी संभव नहाR है क्येंकि दोनें का परस्पर म्ें विरोध है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: >ा युज्यते) यदि अवाच्यता का एकांत माना जाता है तो ‘ये दोनें तòव अवाच्य हQ’’ एेसा कहना भी असंभव हो जाता है। कारिकाथर्- स्याद्वाद न्याय के बैरियें के यहाँ उभय एेकात्म्य भी नहाR हQ अथार्त् पृथक् कायर् की अपेक्षा से दैव एवं पौ®ष के एकात्म्य को मीमांसक ने माना है वह भी सिद्ध नहाR है, क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है। एकांत से अवाच्यता के मानने पर ‘अवाच्य’ यह उक्ति ही असंभव है। भाग्य और पु®षाथर् का अनेकांत अबुद्धिपूवार्Óपेक्षाया-मि°ानि°ं स्वदैवत:। बुद्धिपूवर्व्यपेक्षायामि°ानि°ं स्वपौ®षात्।।९१।। बिना विचारे अनायास ही, इ° आfन° कायर् कोई। जब बन जावे तब समझो तुम, भाग्य प्रधान हमारा ही।। बुद्धीपूवर्क यदि प्रयत्न से, इ° आfन° कायर् बनते। तब तो निज के पु®षाथर् को, मुख्य भाग्य को गौण कहW।।९१।। अन्वयाथर्- (अबुद्धिपूवार्पेक्षायां इ°ानि°ं स्वदैवत:) बुद्धि व्यापार की अपेक्षा रखे बिना अनायास ही जो इ°-आfन° कायर् सिद्ध हो जाते हQ वे अपने-अपने भाग्य से सिद्ध होते हQ। (बुद्धिपूवर्व्यपेक्षायां इ°ानि°ं स्वपौ®षात्) एवं बुद्धिपूवर्क की अपेक्षा करके जो इ°-आfन° कायर् सिद्ध होते हQ वे पु®षाथर्कृत हQ। कारिकाथर्- अबुद्धिपूवर्क की अपेक्षा म्ें जो इ° एवं आfन° कायर् होते हQ वे स्वभाग्य से होते हQ एवं बुद्धिपूवर्क की अपेक्षा करने पर सभी इ°, आfन° कायर् अपने पु®षाथर् से होते हQ। भावाथर्- ये भाग्य और पु®षाथर् सदैव एक-दूसरे की अपेक्षा रखकर होते हQ भाग्य के बिना अकेला पु®षाथर् एवं पु®षाथर् के बिना अकेला भाग्य असंभव है। जब कोई भी कायर् बिना प्रयास के सफल होते हQ तब भाग्य की प्रधानता और पु®षाथर् गौण है एवं जब कोई भी कायर् प्रयत्नपूवर्क सिद्ध होते हQ तब पु®षाथर् प्रधान है भाग्य गौण है। ।।इति अ°म: परिच्छेद:।। N : श्
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) आठव्ें परिच्छेद का सार दैव और पु®षाथर् के एकांत का खंडन एवं स्याद्वाद की सिद्धि (कारिका ८८ से ९१ तक) कोई मीमांसक भाग्य से ही सभी कार्यों की सिद्धि मानते हQ। चावार्क पु®षाथर् से ही सभी कार्यों की सिद्धि कहते हQं। कोई विशेष मीमांसक स्वगार्दि को भाग्य से एवं कृषि आदि को पु®षाथर् से मानते हQ और कोईर् बौद्ध लोग कार्यों की सिद्धि म्ें इन दोनें को भी न मानकर अवक्तव्य से ही सिद्धि मानते हQ। यहाँ सबसे प्रथम भाग्येकांत पक्ष का निराकरण करते हQ- मीमांसक- सभी कायर् भाग्य से ही सिद्ध होते हQ पु®षाथर् कुछ नहाR कर सकता है। जैन- तब तो पुण्य और पाप™प आचरण के द्वारा भाग्य का निमार्ण वैâसे होता है ? मीमांसक- पूवर्-पूवर् के भाग्य से ही आगे-आगे के भाग्य का निमार्ण होता है >ा कि पुण्य-पाप आदि आचरणें से। जैन- तब तो इस प्रि›ाâया से पूवर्-पूवर् के भाग्य से आगे-आगे के भाग्य का निमार्ण होते रहने से भाग्य का अभाव कभी भी नहाR हो सकेगा और तब तो मा ेक्ष कभी नहाR हो सकेगी तथा मोक्ष के लिए किये गये पु®षाथर् भी व्यथर् हो जाव Wगे ? मीमांसक- पु®षाथर् से भाग्य का निर्मूल नाश हो जाता है इसलिए मोक्ष की सिद्धि और उसके पु®षाथर् सफल हQ। जैन- तब आपने भी पु®षाथर् को तो मान ही लिया, पुन: भाग्य का एकांत कहाँ रहा ? पु®षाथर् एकांतवाद का निराकरण चावार्क- सभी कायर् पु®षाथर् से ही सिद्ध होते हQ। जैन- यह भी एकांत ठीक नहाR है, क्येंकि एक साथ अनेकें जन खेती करते हQ किन्तु किसी को विशेष लाभ और किसी को हानि भी होती हुई देखी जाती है किन्तु पु®षाथर् तो सभी के समान हQ पुन: एेसा अन्तर क्यें है ? इसलिए एकांत से पु®षाथर् से ही कायर् की सिद्धि मानना गलत है। कोई-कोई दैव-पु®षाथर् को मान करके भी दोनें को परस्पर निरपेक्ष मानते हQ, सो भी ठीक नहाR है। एकांत से अवक्तव्य मानने पर भी स्ववचन विरोध आता है। अतएव स्याद्वाद की पद्धति से वस्तु तòव की सिद्धि होती है- ‘‘अबुद्धिपूवार्पेक्षायामि°ानि°ं स्वदैवत:। बुद्धिपूवर्व्यपेक्षायामि°ानि°ं स्वपौ®षात्’’।।९१।। बिना बिचारे अनायास ही जब अनुवूâल अथवा प्रतिवूâल कायर् सिद्ध हो जाते हQ तब उनम्ें भाग्य की प्रधानता है और जब बुद्धिपूवर्क अनुवूâल या प्रतिवूâल कार्यों की सिद्धि होती है तब उनम्ें पु®षाथर् की प्रधानता है। ये भाग्य और पु®षाथर् एक-दूसरे की अपेक्षा रखने वाले होने से ही सम्यक् कहलाते हQ अन्यथा परस्पर निरपेक्ष होने से मिथ्या एकांत™प हो जाते हQ अत: ये दोनें सापेक्ष ही कार्यों की सिद्धि म्ें समथर् होते हQ, एेसा समझना। सप्तभंगी की प्रि›ाâया- (१) कथंचित् सभी कायर् दैवकृत होते हQ, क्येंकि अनायास ही सिद्ध हुए हQ। (२) कथंचित् सभी कायर् पु®षाथर्कृत होते हQ, क्येंकि बुद्धिपूवर्क प्रयत्न से सिद्ध हुए हQ। (३) कथंचित् सभी कायर् भाग्य और पु®षाथर् दोनें कृत हQ, क्येंकि दोनें की विवक्षा है। (४) कथंचित् सभी कायर् अवक्तव्य हQ, क्येंकि इन दोनें को एक साथ कह नहाR सकते हQ। (५) कथंचित् दैवकृत और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से दैव की युगपत् दोनें की विवक्षा है। (६) कथंचित् सभी कायर् पु®षाथर्कृत और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से पु®षाथर् की और युगपत् दोनें की विवक्षा है। (७) कथंचित् सभी कायर् दैव और पु®षाथर्कृत अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से दोनें की और युगपत् दोनें की विवक्षा है। इस प्रकार स्याद्वाद की अपेक्षा से भाग्य और पु®षाथर् दोनें ही सापेक्ष होकर कायर् साधक होते हQ अन्यथा नहाR, एेसा समझना चाहिए। N : श् (९५) (९६)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) (९७) (९८) अथ नवम: परिच्छेद: क्या पर को सुख-दु:ख देने से ही पुण्य-पाप बंध निश्चिात है ? पापं धुÇवं परे दु:खात् पुण्यं च सुखतो यदि। अचेतनाÓकषायौ च, बध्येयातां निमित्तत:।।९२।। यदि पर को दु:ख देने से ही, पाप बंध सुख से हो पुण्य। वंâटक आदि अचेतन को तब, पाप बंध हो पय १ को पुण्य।। यदि चेतन नहिं बंधते है तब, अकषायी मुनि गतरागी। जन को सुख-दु:ख के निमित्त से, पुण्य-पाप के हें भागी।। ९२।। अन्वयाथर्- (यदि परे दु:खात् पापं धÇुवं सुखत: च पुण्यं) यदि पर को दु:ख देने से निश्चिात ही पाप का बंध होता है और पर को सुख देने से पुण्य बंध होता है (अचेतनाकषायौ च निमित्तत: बध्येयातां) तब तो अचेतन और कषाय रहित भी निमित्त से बंध जाव्ेंगे। कारिकाथर्- यदि दूसरे प्राणी म्ें दु:ख उत्पVा करने से एकांतत: पाप का बंध तथा सुख देने से पुण्य का बंध माना जायेगा, तब तो अचेतन पदाथर् एवं वीतरागी भी निमित्त से पुण्य-पाप ™प बंध को प्राप्त हो जाव्ेंगे। क्या स्वयं म्ें दु:ख-सुख से पुण्य-पाप होता है ? पुण्यं धÇुवं स्वतो दु:खात् पापं च सुखतो यदि। वीतरागो मुनिविर्द्वांस्ताभ्यां युÀयािVामित्तत:।।९३।। यदि अपने को दु:ख देने से, पुण्य बंध सुख से हो पाप। तब तो वीतराग मुनि निज म्ें, कायक्लेश से सहते ताप।। मुनि विद्वान् तòव को समझ्ें, संतोषामृत सुख भोगी। ये दोनें फिर पुण्य-पाप से, बंधे मुक्ति किसको होगी।।९३।। अन्वयाथर्- (यदि स्वत: दु:खात् धÇुवं पुण्यं सुखत: च पापं) यदि स्वयं म्ें दु:ख उत्पVा करने से निश्चिात ही पुण्य का बंध एवं स्वयं को सुख देने से पाप का बंध होता है तब तो (वीतरागो विद्वान् मुनि: निमित्तत: ताभ्यां युंज्यात्) कषाय रहित वीतराग मुनि और विद्वान् मुनिजन भी पुण्य-पाप का बंध करने लग्ेंगे क्येंकि ये भी अपने सुख-दु:ख की उत्पत्ति म्ें निमित्त कारण होते हQ। कारिकाथर्- यदि अपने आप म्ें दु:ख को उत्पVा करने से एकांत से पुण्य बंध एवं सुख उत्पादन करने से पाप बंध माना जावे, तो वीतराग एवं विद्वान् मुनि भी निमित्त से पुण्य, पाप से बंध जाने चाहिए। पुण्य-पाप का उभय एवं अवक्तव्य भी एकांत से सदोष है विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।९४।। पुण्य-पाप के बध्ंा, उभय का, यदि एकात्म्य लिया जावे। स्याद्वाद विद्वेषी जन म्ें, सदा विरोधि रहा आवे।। यदि दोनें की ‘अवक्तव्यता’, कहो सदा एकांत सही। तब तो ‘अवक्तव्य’ इस वच से, स्वमत कथन यह शक्य नहाR।।९४।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ इन पुण्य-पाप™प दोनें सिद्धांतें का एकात्म्य भी नहाR है क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि दोनें को अवाच्य ही एकांत से कहा जाये, तो यह पुण्य-पाप बंध अवाच्य है यह कथन भी अशक्य हो जावेगा। कारिकाथर्- स्याद्वादविद्वेषी के यहाँ उभयैकात्म्य भी ठीक नहाR हQ, क्येंकि परस्पर म्ें विरोध आता है। सवर्था ‘अवाच्य’ तòव को स्वीकार करने पर तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहाR बन सकेगा। पुन: पुण्य-पाप का बंध वैâसे होता है ? विशुद्धिसंक्लेशा”ं चेत् स्वपरस्थं सुखाÓसुखम्। पुण्यपापाœावौ युक्तौ न चेद्व्यथर्स्तवाÓर्हत:।।९५।। यदी स्व-पर का सुख उनके, परिणाम विशुद्धी म्ें हेतू। तथा स्व-पर का दु:ख उनके, संक्लेश भाव म्ें यदि हेतू।। तब ये सुख-दु:ख पुण्य-पाप के, आœाव म्ें हेतू बनते। यदि एेसा नहिं तब तो अर्हन्! तव मत म्ें यह व्यथर् कहे।।९५।। अन्वयाथर्- (चेत् स्वपरस्थं सुखासुखं विशुद्धिसंक्लेशां”ं) यदि स्वपर को होने वाला सुख और दु:ख विशुद्धि और संक्लेश के कारण है (पुण्यपापाœावौ युक्तौ न चेत् तव अर्हत: व्यथर्:) तब तो उनसे पुण्य और पाप का आœाव होना युक्त है। यदि वे सुख-दु:ख विशुद्धि और संक्लेश के कारण नहाR है तब तो अर्हन् भगवन्! वे व्यथर् ही हQ। १. दूध
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) कारिकाथर्- यदि अपने सुख-दु:ख एवं परसंंबंधी सुख, दु:ख विशुद्धि एवं संक्लेश के निमित्त से होते हQ तब तो उनसे ही पुण्य और पाप का आœाव होना युक्त ही है। यदि विशुद्धि और संक्लेश ™प परिणाम नहाR है, तब तो वे व्यथर् ही हQ अथार्त् पुण्य, पाप का आœाव हो ही नहाR सकता है, एेसा आप अर्हत्प्रभु का सिद्धान्त है। ।।इति नवम: परिच्छेद:।। N : श् नवम्ें परिच्छेद का सार पुण्य और पाप के एकांत का निराकरण एवं स्याद्वाद की सिद्धि (कारिका ९२ से ९५ तक) भाग्य दो प्रकार का है-एक पुण्य और दूसरा पाप। वही प्राणियें के सुख और दु:ख का कारण है। ‘‘सद्वेद्यशुभायुनार्मगोत्राणि पुण्यं, इतरत्पापं’’ सातावेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और उच्च गोत्र, ये पुण्य ™प हQ और इनसे विपरीत असातावेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम और नीच गोत्र तथा चारें घातिया कमर्, ये पाप™प हQ। कोई एकान्त से कहता है कि पर जीवें म्ें दु:ख उत्पVा करने से पाप एवं पर म्ें सुख उत्पVा करने से पुण्य ही होता है। तो आचायर् कहते हQ कि यह कहना ठीक नहाR है क्येंकि इस प्रकार की मान्यता से तो अचेतन दूध, घी आदि पदाथर् अन्य जीवें को सुख उत्पVा करते हQ इसलिए उनके पुण्यबंध मानना पÌडेगा और विष, वंâटक आदि पदाथर् दु:ख उत्पVा करते हQ, उनके पाप बंध मानना पÌडेगा। यदि आप कहW कि चेतन ही बंध के योग्य हQ, अचेतन नहाR तो भी वीतरागी मुनिराज के पर के सुख-दु:ख के निमित्त से कर्मों का बंध होने लगेगा, अथार्त् कोई महामुनि ध्यान म्ें लीन हQ उन्हW देखकर भक्तजन प्रसVा हो जाते हQ और अज्ञानीजन निंदा करते हQ, उनसे दु:ख अनुभव करते हQ एतावता ये परजीवें के सुख-दु:ख म्ें निमित्त तो हो रहे हQ किन्तु स्वयं वीतरागी हQ इनके भी कमर्बंध मानना पÌडेगा। यदि आप कहW कि उन मुनिराज का वैसा सुख-दु:ख देने का मानो आfभप्राय नहाR है, तब तो पर म्ें सुख-दु:ख करने से ही पुण्य बंध होता है, एेसा आपका एकान्त कहाँ रहा ? इससे विपरीत कोई कहता है कि अपने म्ें दु:ख को उत्पVा करने से पुण्य एवं सुख को उत्पVा करने से पाप बंध ही होता है। इस पर भी आचायर् कहते हQ कि एेसा एकान्त भी श्रोयस्कर नहाR है। देखो! यदि एेसा ही एकांत मानोगे तो वीतरागी मुनिराज त्रिकाल योग के अनु‰ान से और उपवास आदि से अपने म्ें दु:ख उत्पVा करते हQ, तो इन्हW पुण्य बंध हो जावेगा और विद्वान् मुनिजन तòवज्ञान से संतोष लक्षण सुख को अपने म्ें प्राप्त करते हQ तो उन्हW पाप का बंध मानना (९९) (१००)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) पÌडेगा। यदि आप कहW आसक्ति नहाR है अतएव ये वीतरागी और विद्वान् मुनिराज पुण्य पाप से नहाR बंधते हQ, तब तो तुम्हारा एकांत समाप्त हो जाता है और यदि एकांत लेते ही हो, तब तो कषाय रहित वीतराग छ©ास्थ महामुनि को भी बंध होने लगेगा, पुन: कदाचित् भी पुण्य-पाप का अभाव न होने से किसी को भी मुक्ति नहाR मिल सकेगी। कोई-कोई लोग एकांत से परस्पर निरपेक्ष उपर्युक्त दोनें बातें को मानते हQ, इस पर भी आचायर्श्री का कहना है कि यह उभयैकात्म्य भी परस्पर म्ें वि®द्ध होने से ठीक नहाR है। उसी प्रकार से कोई लोग इन पुण्यपाप के बंध की व्यवस्था को एकांत से अवाच्य कह देते हQ सो भी ठीक नहाR है, क्येंकि एकांत से अवाच्य के मानने पर पुन: उसे ‘अवाच्य’ इस शब्द से वाच्य कर देने पर तो स्ववचन बाधित दोष आता है अत: यह अवाच्य एकांत पक्ष भी गलत ही है। अब आचायर् इन पुण्य-पाप के विषय म्ें सही मान्यता को स्प° करते हQ- विशुद्धि के कारण, कायर् और स्वभाव ये विशुद्धि के अंग कहलाते हQ और संक्लेश के कारण, कायर् तथा स्वभाव संक्लेश के अंग कहे जाते हQ। इस विशुद्धि के निमित्त से होने वाला सुख अथवा दुख चाहे निज म्ें हो, चाहे पर म्ें हो अथवा चाहे उभय म्ें हो, वही पुण्याœाव का हेतु है। उसी प्रकार संक्लेश के निमित्त से होने वाला सुख अथवा दु:ख चाहे अपने म्ें हो या चाहे उभय म्ें हो, वही पापाœाव का हेतु है। प्रश्न- संक्लेश क्या है ? एवं विशुद्धि क्या है ? उत्तर- आतर् और रौद्र ध्यान को संक्लेश कहते हQ एवं धमर् तथा शुक्लध्यान को विशुद्धि कहते हQ। उनम्ें भी आतर्ध्यान के इ°वियोगज, आfन°संयोगज, वेदनाजन्य और निदान एेसे चार भेद हQ और रौद्र ध्यान के भी हिंसानंदी, मृषानंदी, चौयार्नंदी और परिग्राहानंदी एेसे चार भेद हQ तथा ‘मिथ्यादर्शन १ , आfवरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बंध के हेतु कहे गये हQ। ये पाँचें ही संक्लेश परिणाम वाले कहलाते हQ। संक्लेश के अभाव म्ें सम्यग्दर्शन आदि के निमित्त से विशुद्धि होत ी है। उन धमर् शुक्लध्यान™प विशुद्धि के द्वारा आत्मा म्ें स्थिरता का होना संभव है। ‘‘विवाद की कोटि को प्राप्त काय आदि की ि›ाâयाएँ स्व पर म्ें सुख अथवा दु:ख हेतुक संक्लेश की कारण हQ या कायर् हQ या स्वभाव स्वभाव हQ, तो वे प्राणियें म्ें अशुभ फलदायी पुद्गल परमाणुआW के संबंध म्ें हेतु हQ, क्येंकि वे संक्लेश की कारण हQ जैसे-विषभक्षण आदि। वैसे ही ‘‘विवाद की कोटि को प्राप्त कायादि ि›ाâयाएँ स्व पर म्ें सुख या दु:ख हेतुक भले ही हें, यदि वे विशुद्धि की कारण हQ या कायर् हQ या स्वभाव हQ तो वे प्राणियें को शुभ फलदायी पुद्गलवगर्णाआW का संबंध कराने म्ें हेतुक हQ, क्येंकि वे विशुद्धि का अंग हQ, जैसे पथ्य आहार आदि’’। अब आचायर् सप्तभंगी प्रि›ाâया के द्वारा स्याद्वाद को सिद्ध करते हQ- कथंचित् स्व पर म्ें स्थित सुख या दु:ख पुण्याœाव के हेतु हQ, क्येंकि वे विशुद्धि के अंग हQ। कथंचित् स्व पर म्ें स्थित सुख या दु:ख पापाœाव के हेतु हQ, क्येंकि वे संक्लेश के अंग स्व™प हQ। कथंचित् स्व पर म्ें स्थित सुख और दु:ख पुण्याœाव और पापाœाव दोनें म्ें हेतु हQ, क्येंकि ›ाâम से दोनें की विवक्षा है। कथंचित् अवक्तव्य ™प हQ क्येंकि युगपत् दोनें को कह नहाR सकते हQ। कथंचित् पुण्याœाव हेतुक और अवक्तव्य™प हQ, क्येंकि ›ाâम से विशुद्धि की और एक साथ दोनें की विवक्षा है। कथंचित् पापाœाव हेतुक और अवक्तव्य हQ, क्येंकि ›ाâम से संक्लेश की और युगपत् दोनें की विवक्षा है। कथंचित् उभय ™प और अवक्तव्य™प हQ, क्येंकि ›ाâम से दोनें की और युगपत् दोनें की अपेक्षा है। यहाँ निष्कषर् यह निकलता है कि यदि धमर्ध्यान आदि™प विशुद्ध परिणामें से किसी को या अपने को दु:ख भी हो जाता है, जैसे-उपवास आदि कराने म्ें या शिष्यें को हित के लिए फटकारने म्ें दु:ख भी है फिर भी पुण्याœाव ही होगा और यदि आतर्-रौद्र ध्यान के निमित्त से परिणामें म्ें संक्लेश हो रहा है तो चाहे अपने म्ें चाहे पर को सुख भी क्यें न हो, परन्तु उससे पाप का आœाव ही होता है इसलिए परिणामें को विशुद्ध बनाना चाहिए। N : श् १. तòवाथर्. आठवाR अ.प्र. सू.। (१०१) (१०२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) अथ दशम: परिच्छेद: क्या अज्ञान से बंध और अल्पज्ञान से मोक्ष होता है ? अज्ञानाच्चेद्धÇुवो बन्धो, ज्ञेया Óनन्त्याVा केवली। ज्ञानस्तोकाद्विमोक्षश्चोदज्ञानाद्बहुतोÓन्यथा।।९६।। यदि अज्ञान बंध का हेतू, निश्चिात है मानो, तब तो। ज्ञेय पदारथ कहे अनन्तों, कोई केवली वैâसे हो?।। अल्पज्ञान से यदि मुक्ती हो, तब तो उसका बहु अज्ञान। बंध हेतु होगा निश्चिात तब, नहाR किसी को मुक्तिलाभ।।९६।। अन्वयाथर्- (चेत् अज्ञानात् धÇुवो बंधो ज्ञेयानन्त्यात् केवली न) यदि अज्ञान से निश्चिात बंध होता है तब ज्ञेय पदाथर् अनंत है उनका ज्ञान न हो सकने से कोई भी केवली नहाR हो सकता है (चेत् ज्ञानस्तोकात् विमोक्ष: बहुतो अज्ञानात् अन्यथा) यदि अल्पज्ञान से मोक्ष होता है तब उसी जीव के बहुत सा अज्ञान रहने से बंध भी होता रहेगा पुन: मोक्ष नहाR हो सकेगा। कारिकाथर्- यदि सांख्य मत के अनुसार अज्ञान से बंध अवश्यंभावी मानें तब तो ज्ञेय पदार्थों के अनन्त होने से कोई केवली नहाR बन सकेगा। यदि एकांत से अल्पज्ञान से ही मोक्ष मानी जावे, तब तो अवशि° बहुत से अज्ञान से अन्यथा-बंध की प्राप्ति हो जावेगी। अज्ञान, अल्पज्ञान से बंध-मोक्ष का उभय और अवक्तव्य नहाR बनता है विरोधाVोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्। अवाच्यतैकान्तेÓप्युक्तिनार्वाच्यमिति युज्यते।।९७।। यदि अज्ञान-ज्ञान से बंध-मोक्ष उभय का एेक्य कहो। स्याद्वाद विद्वेषी मत म्ें, उभय विरोधी हQ तब तो।। यदि दोनें का ‘अवक्तव्य’ ही, अनपेक्षित हो मान लिया। तब तो अवक्तव्य इसको भी, वैâसे वच से प्रकट किया।।९७।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्) स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियें के यहाँ अज्ञान से बंध और अल्पज्ञान से मोक्ष इनका उभय एकात्म्य भी ठीक नहाR है। क्येंकि परस्पर म्ें विरोध है (अवाच्यतैकांते आfप अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते) यदि सवर्था इन दोनें का अवाच्य ही कहा जाये, तो अज्ञान- ज्ञान से बंध-मोक्ष की व्यवस्था कह नहाR सकते अत: ‘अवाच्य है’ यह कथन भी वाच्य ही होने से आपका एकांत नहाR रहता है। कारिकाथर्- स्याद्वादन्याय के द्वेषियें के यहाँ इन दोनेां का परस्पर निरपेक्ष एकांत भी श्रोयस्कर नहाR है, क्येंकि विरोध आता है। एकांत म्ें अवाच्यता को स्वीकार करने पर ‘अवाच्य’ यह वचन ही कथमपि शक्य नहाR है। अज्ञान से बंध एवं अल्पज्ञान से मोक्ष की सुंदर व्यवस्था अज्ञानान्मोहिनो बन्धो नाÓज्ञानाद्-वीतमोहत:। ज्ञानस्तोकाच्च मोक्ष: स्यादमोहान्मोहिनोÓन्यथा।।९८।। स्याद्वाद म्ें मोह सहित, अज्ञान बंध का कारण है। मोहरहित अज्ञान बहुत भी, नहाR बंध का कारण है।। अल्पज्ञान भी मोहरहित है, उससे मोक्ष प्राप्त होगा। किन्तु मोहयुत बहुत ज्ञान से, कमर्बंध निश्चिात होता।।९८।। अन्वयाथर्- (मोहिनो अज्ञानात् बंध: वीतमोहत: अज्ञानात् न) मोह सहित अज्ञान से बंध होता है एवं मोहरहित अज्ञान से बंध नहाR होता है (अमोहात् ज्ञानस्तोकात् च मोक्ष: स्यात् मोहिनो अन्यथा) मोह रहित अल्पज्ञान से मोक्ष होता है और मोह सहित अल्पज्ञान से बंध ही होता है। कारिकाथर्- मोह सहित अज्ञान से बंध एवं मोह रहित अज्ञान से बंध नहाR होता है। मोह रहित अल्पज्ञान से भी मुक्ति होती है किन्तु मोह सहित ज्ञानस्तोक से मुक्ति प्राप्त नहाR हो सकती है। कमर्बंध के अनुसार संसार विचित्र है कामादिप्रभवश्चिात्र: कमर्बन्धाÓनु™पत:। तच्च कमर् स्वहेतुभ्यो जीवास्ते शुद्ध्यशुद्धित:।।९९।। काम ›ाुâधादिक भावें से है, यह उत्पVा भाव संसार। स्वयं उपाजिर्त कर्मों के, अनु™प दिखे हQ विविध प्रकार।। वह ही कमर् हुआ है अपने, रागादिक परिणामें से। कमर् सहित प्राणी दो विध हQ, भव्य-अभव्य प्रकारें से।।९९।। अन्वयाथर्- (कामादिप्रभव: चित्र: कमर्बंधानु™पत:) यह काम, ›ाâोध आदि से होने वाला संसार विचित्र™प है वह संसार अपने-अपने कमर् के अनुवूâल ही होता है (तत् च कमर्स्वहेतुभ्य:) और वह कमर् भी अपने-अपने रागादि परिणाम (१०३) (१०४)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) के निमित्त से होता है (ते जीवा: शुद्ध्यशुद्धित:) जिनको कमर्बंध होता है, वे जीव भी शुद्धि और अशुद्धि के भेद से दो प्रकार के होते हQ। कारिकाथर्- जो काम-रागादिकें का उत्पाद होता है वह कायर्™प-भाव संसार नाना प्रकार का है वह ज्ञानावरणादि कमर्बंध के अनुसार ही होता है और वह कमर् अपने हेतुभूत रागादि परिणामें से ही होता है तथा वे जीव शुद्धि- भव्यत्व और अशुद्धि-अभव्यत्व के भेद से दो प्रकार के हQ। भावाथर्- कोई इस संसार को ईश्वर कृत मानते हQ, किन्तु जैनाचार्यों ने इस संसार को कमर्बंध के निमित्त से होता है, एेसा माना है। कमर्सहित संसारी जीव के भी दो भेद माने हQ भव्य और अभव्य। आगे कारिका म्ें इसी का स्प°ीकरण करते हQ। शुद्धि-अशुद्धि शक्तियाँ वैâसी हQ शुद्ध्यशुद्धी पुन: शक्ती ते पाक्या Óपाक्यशक्तिवत्। साद्यनादी तयोव्यर्क्ती स्वभावोÓतवर्कगोचर:।।१००।। भव्य अभव्य कही दो शक्ती, पकने योग्य न पकने योग्य। उÌडद शक्तिवत् इन दोनें की, आfभव्यक्ती है सादि-अनादि।। सम्यक्त्वादि प्रकट भव्यें के, अभव्य कोरडू मूंग समान। वस्तु स्वभाव तवर्क करने का, विषय नहाR हो सके प्रधान।।१००।। अन्वयाथर्- (पुन: ते शुद्धŸाशुद्धी शक्ती पाक्याÓपाक्यशक्तिवत्) पुन: जीव की वे शुद्धि-अशुद्धि शक्तियाँ पकने योग्य न पकने योग्य की शक्ति के समान हQ (तयो: व्यक्ती साद्यनादी) उन दोनें शक्तियें की व्यक्ति-प्रकटता सादि और अनादि है (स्वभाव: अतवर्कगोचर:) क्येंकि स्वभाव तवर्क के गोचर नहाR होता है। कारिकाथर्- जीवें की ये शुद्धि और अशुद्धि ™प दो शक्तियाँ मूंग आदि के पकने योग्य एवं न पकने योग्य शक्ति के समान हQ पुन: इन दोनें की शक्ति भव्य एवं अभव्य जीवें की अपेक्षा से सादि एवं अनादि है वस्तु का यह स्वभाव तवर्क के अगोचर है। भावाथर्- संसारी जीव के भव्य-अभव्य के भेद से दो भेद हQ उनम्ें जो शक्तियाँ हQ, वे पकने योग्य उÌडद या नहाR पकने योग्य उÌडद के समान है। जैसे- कोरडू मूंग या उÌडद चाहे जितना पकाओ नहाR पकता है वैसे ही अभव्य जीव कभी भी मोक्ष नहाR जा सकते हQ उनकी शुद्धता प्रकट नहाR हो सकती है, इसीलिए ये अशुद्ध ही हQ इनकी अशुद्धि अनादि है, अनंत हQ किन्तु भव्य जीव कर्मों का नाश करके शुद्ध हो जाते हQ इसलिए इनकी शुद्धता की प्रकटता सादि है। कोई कहे एेसा क्यें ? तो इसका कोई उत्तर नहाR है, क्येंकि वस्तु का स्वभाव प्रश्न का विषय नहाR होता है। प्रमाण का लक्षण और भेद तòवज्ञानं प्रमाणं ते, युगपत्सवर्भासनम्। ›ाâमभावि च यज्ज्ञानं, स्याद्वादनयसंस्कृतम्।।१०१।। भगवन्! तव शासन म्ें तòवज्ञान प्रमाण कहा जाता। उसम्ें युगपत् सवर्प्रकाशी, केवलज्ञान कहा जाता।। ›ाâमभावी हQ मतिज्ञानादिक, तòव प्रमाणीभूत सही। स्याद्वाद से नय से संस्कृत, जो ›ाâमभावी ज्ञान वही।।१०१।। अन्वयाथर्- (ते तòवज्ञानं प्रमाणं युगपत् सवर्भासनं) हे भगवन्! आपके तòवज्ञान को प्रमाण कहा है, उसम्ें युगपत् सवर् पदार्थों को प्रकाशित करने वाला ज्ञान केवलज्ञान है (›ाâमभावि च यज्ज्ञानं स्याद्वादनयसंंंस्कृतं) और ›ाâम से उत्पVा होने वाले जो ज्ञान हQ वे स्याद्वाद और नयें से संस्कृत हQ। कारिकाथर्- हे भगवन्! आपके सिद्धान्तानुसार तòवज्ञान ही प्रमाण है, उसम्ें युगपत् सवर्पदार्थों का अवभासन करने वाला ज्ञान केवलज्ञान है एवं ›ाâमभावी जो ज्ञान हQ वे स्याद्वाद और नय से संस्कृत मतिश्राुतज्ञानादि हQ। प्रमाणें का फल क्या है ? उपेक्षा फलमाद्यस्य, शेषस्यादानहानधी:। पूवË वाÓज्ञाननाशो वा, सवर्स्याÓस्य स्वगोचरे।।१०२।। केवलज्ञान प्रमाण™प का, कहा उपेक्षा फल जानो। शेषज्ञान ›ाâमभावी का फल, ग्राहण त्याग बुद्धी मानों।। अथवा ›ाâमभावी ज्ञानें का, कहा उपेक्षा फल यदि वा। सब ज्ञानें का फल स्व-स्व, विषयक अज्ञान नाश होना।।१०२।। अन्वयाथर्- (आद्यस्य फलं उपेक्षा शेषस्य आदानहानधी:) आदि के केवल- ज्ञान का फल उपेक्षा है एवं शेष ›ाâमवर्ती ज्ञानें का फल ग्राहण योग्य को ग्राहण करना और छोÌडने योग्य को छोÌडना इस बुद्धि का होना है (सवर्स्य अस्य पूवार् वा स्वगोचरे अज्ञाननाशो वा) अथवा सभी ज्ञानें का फल उपेक्षा है अथवा सभी (१०५) (१०६)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) ज्ञानें का फल अपने-अपने विषय म्ें अज्ञान का अभाव होना ही है। कारिकाथर्- केवलज्ञान का व्यवहित फल उपेक्षा, शेष, मति, श्राुत आदि चारें ज्ञानें का व्यवहित फल ग्राहण करने योग्य को ग्राहण करना, छोÌडने योग्य को छोÌडना तथा उपेक्षा करना है एवं इन पाँचें ज्ञानें का ही साक्षात् फल अपने- अपने विषयभूत पदार्थों म्ें अज्ञान का नाश होना ही है। ‘स्यात्’ शब्द का महत्व वाक्येष्वनेकान्तद्योती गम्यं प्रति विशेषणम्। स्यािVापातोÓथर्योगित्वात्तव केवलिनामपि।।१०३।। नाथ! आपके या श्राुतकेवलि मुनियें के भी वाक्यें म्ें। स्यात् शब्द है निपात् चूँकि, अथर् साथ संबंधित है।। इसीलिए यह सब वाक्यें म्ें, ‘अनेकांत’ का द्योतक है। गम्य वस्तु के प्रती विशेषण, अथर् विवक्षित सूचक है।।१०३।। अन्वयाथर्- (तव केवलिनां आfप स्यात् निपातो अथर्योगित्वात्) हे भगवन्! आपके तथा श्राुतकेवलियें के भी मतानुसार ‘स्यात्’ यह निपात शब्द है जो कि अथर् के साथ संबंधित है (वाक्येषु अनेकांतद्योती गम्यं प्रति विशेषणम्) यह वाक्यें म्ें अनेकांत का द्योतक तथा गम्य ™प अथर् के प्रति विशेषण माना गया है। कारिकाथर्- हे भगवन्! श्राुत केवलियें के सिद्धान्त म्ें एवं आप केवलज्ञानी के सिद्धांतानुसार ‘‘स्यात्’’ यह शब्द निपात सिद्ध है वाक्यें म्ें अनेकांत का उद्योतन करने वाला है और गम्य-अथर् के प्रति समथर् विशेषण ™प है क्येंकि यह अपने अथर् से रहित है। स्याद्वाद का स्व™प स्याद्वाद: सवर्थैकान्त-त्यागात् विंâवृत्तचिद्विधि:। सप्तभंगनयापेक्षो हेयाÓÓदेयविशेषक:।।१०४।। सदा सवर्थैकांत त्याग से, स्याद्वाद है सुखकर ही। स्यात्-कथंचित् और कथंचन, शब्दें से एकाथर् सही।। सप्तभंग अ® सभी नयें की, सदा अपेक्षा रखता है। सभी वस्तु म्ें हेय और आदेय व्यवस्था करता है।।१०४।। अन्वयाथर्- (स्याद्वाद: सवर्थैकांतत्यागात् विंâ वृत्तचिद्विधि:) यह ‘स्याद्वाद’ पद सवर्था एकांत का त्याग करने वाला है ाEक शब्द से चित् अव्यय लगकर जो शब्द ‘कथंचित्’ आदि निष्पVा होते हQ, वे इसके पयार्यवाची हQ (सप्तभंग नयापेक्षो हेयादेयविशेषक:) यह स्याद्वाद सप्तभंग और नयें की अपेक्षा रखने वाला है तथा हेय और उपादेय का भेद करने वाला होता है। कारिकाथर्- सवर्था एकांत के त्याग से ही स्याद्वाद होता है और कथंचित् आदि इसके पयार्यवाची ही हQ। यह सप्तभंग नयें की अपेक्षा रखने वाला है और हेय उपादेय की विशेष व्यवस्था करने वाला है। स्याद्वाद और केवलज्ञान म्ें क्या अंतर है ? स्याद्वादकेवलज्ञाने सवर्तòवप्रकाशने। भेद: साक्षादसाक्षाच्च, ¢ावस्त्वन्यतमं भवेत्।१०५।। स्याद्वाद वैâवल्यज्ञान ये, सभी तòव के परकाशक। स्याद्वाद सब परोक्ष जाने, केवलज्ञान प्रत्यक्ष प्रगट।। अंतर इतना ही इन दोनें, मेW परोक्ष-प्रत्यक्ष कहा। इन दोनें से नहाR प्रकाशित, अथर् अवस्तू™प हुआ।।१०५।। अन्वयाथर्- (स्याद्वादकेवलज्ञाने सवर्तòवप्रकाशने) स्याद्वाद और केवलज्ञान दोनें ही सभी तòवें के प्रकाशक हQ (भेद: साक्षात् असाक्षात् च अन्यतमं हि अवस्तु भवेत्) इन दोनें के प्रकाशन म्ें पदार्थों का साक्षात् करने और साक्षात् न करने का ही अंतर है इन दोनें ज्ञानें म्ें से जो वस्तु किसी ज्ञान के द्वारा प्रकाशित नहाR होती है, वह अवस्तु कहलाती है। कारिकाथर्- स्याद्वाद और केवलज्ञान ये दोनें ही सम्पूणर् तòवें को प्रकाशित करने वाले हQ। इन दोनें म्ें अन्तर इतना ही है कि केवलज्ञान साक्षात् सम्पूणर् तòवें का प्रकाशक है एवं स्याद्वाद असाक्षात् परोक्ष™प से प्रकाशक है, क्येंकि इन दोनें के बिना प्रकाशित वस्तु अवस्तु ™प ही है। नय और हेतु का लक्षण सधमर्णैव साध्यस्य, साधम्यार्दविरोधत:। स्याद्वादप्रविभक्ताÓथर्-विशेषव्यÀाको नय:।।१०६।। जो सपक्ष के साथ साध्य के, साधर्म्यों से आfवरोधी। साध्य अथर् का ज्ञान कराने, वाला ‘नय’ है प्रगट सही।। स्याद्वाद से प्रगट किये ही, अथर् विशेषें का व्यंजक। सुप्रमाण से ज्ञात वस्तु के, अंश-अंश को करे प्रगट।।१०६।। (१०७) (१०८)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) अन्वयाथर्- (सधमर्णा एव साधम्यार्त् आfवरोधत:) सपक्ष के साथ ही अपने साध्य के साधम्यर् से जो बिना किसी विरोध से (स्याद्वादप्रविभक्ताथर्विशेष्यव्यञ्जक: नय:) श्राुत प्रमाण™प स्याद्वाद के द्वारा जाने गये अथर् विशेष का व्यंजक होता है, वह नय कहलाता है। कारिकाथर्- सपक्ष (°ान्त) के साथ ही साध्य के साधम्यर् से आfवरोध ™प से जो स्याद्वादश्राुत प्रमाण के द्वारा विषयीकृत पदाथर् विशेष का व्यंजक होता है वह नय कहलाता है। यह नय का लक्षण है इसे ही हेतु कहते हQ। भावाथर्- नय हेतुवाद है और स्याद्वाद™प आगम अहेतुवाद है। इन दोनें से संस्कृत तòवज्ञान ही युक्ति एवं आगम से आfव®द्ध होता हुआ सुनिश्चिात ™प से बाधक प्रमाण होने से रहित है। यहाँ नय का लक्षण प्रगट किया है और उसे हेतु स्व™प बतलाया है। क्येंकि जो हेतु का स्व™प है वही नय का स्व™प है जो आपने साध्य के साथ आfवनाभाव संबंध रखता है, वही हेतु है इससे यह स्प° है कि विलक्षण और पंच™प हेतु वास्तविक नहाR है केवल एक अन्यथानुपपत्ति ही हेतु का निर्दोष वास्तविक लक्षण है। जिस प्रकार नय स्याद्वाद से जाने गये अथर् विशेष का प्रगट करने वाला है उसी प्रकार हेतु भी एेसा ही होता है। द्रव्य का स्व™प नयोपनयैकान्तानां, त्रिकालानां समुच्चय:। आfवभüाड्भावसम्बन्धो, द्रव्यमेकमनेकधा।।१०७।। त्रिकालवर्ती नय-उपनय के, एकांतें का जो समुदाय। अपृथक् है तादात्म्य भावयुत, वही द्रव्य है सहज स्वभाव।। द्रव्य कहा यह एक™प भी, और अनेक™प भी है। अनंतधमार् द्रव्य के इक-इक, धमर् कहे नय वो ही हQ।।१०७।। अन्वयाथर्- (त्रिकालानां नयोपनयैकान्तानां समुच्चय:) त्रिकालवर्ती नय और उपनयें के एकांत विषयें का जो समुच्चय है (आfवभüाट् भावसंबंध: द्रव्यं एवंâ अनेकधा) वह कथंचित् तादात्म्य स्वभाव के संबंध को लिए हुए है उसी का नाम द्रव्य है वह द्रव्य एक है और अनेक भेद™प है। कारिकाथर्- त्रिकाल विषयक, नय और उपनयें के एकांत का जो समुच्चय है और आfवभüाड् भाव संबंध-अपृथक् स्वभाव संबंध™प है वही द्रव्य है और वह एक भी है अनेक प्रकार का भी है। भावाथर्- द्रव्य और पयार्य के भेद से नय के अनेक भेद हQ वस्तु के एक अंश को ग्राहण करने वाले वक्ता के आfभप्राय विशेष को नय कहते हQ एवं नयें की शाखा-उपशाखा को उपनय कहते हQ। अनंतधमर् विशि° वस्तु के एक धमर् को ही ग्राहण करना इनका एकांत है त्रिकालवर्ती इन नय और उपनयें का विषयभूत जो पयार्य विशेषें का समुदाय है वह द्रव्य है, वह एकानेक स्व™प है। यह समुदाय कथंचित् तादात्म्य संबंध ™प है। मिथ्यानय-सम्यव्âनय का लक्षण मिथ्यासमूहो मिथ्या चेVा मिथ्यैकान्ततास्ति न:। निरपेक्षा नया मिथ्या, सापेक्षा वस्तु तेÓथर्कृत।।१०८।। यदि मिथ्या एकांतें का, समुदाय हुआ वह मिथ्या ही। तब तो सदा हमारे मत म्ें, वह मिथ्या एकांत नहाR।। नय निरपेक्ष कहे मिथ्या हQ, नय सापेक्ष कहे सम्यव्â। सुनय अथर् ि›ाâयाकारी हQ, उसका समुदय है सम्यक्।।१०८।। अन्वयाथर्- (मिथ्या समूहो मिथ्या चेत् न: मिथ्यैकांतता न आfस्त) यदि कहो कि नयें और उपनयें के एकांतें का जो समूह है वह मिथ्याआW का समूह है वह मिथ्या ही है यदि एेसा कहो तो ठीक नहाR है, क्येंकि हमारे यहाँ मिथ्या एकांतता नहाR है (ते निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा अथर्कृत् वस्तु) हे भगवन्! आपके मत म्ें जो नय परस्पर म्ें निरपेक्ष हQ वे मिथ्या हQ एवं जो नय परस्पर म्ें सापेक्ष हQ वे सम्यव्â हQ उनके विषय म्ें अथर्ि›ाâयाकारी हQ इसलिए उनका समूह ही वस्तु है। कारिकाथर्- मिथ्याभूत एकांत का समुदाय यदि मिथ्या™प ही है तब तो वह मिथ्या एकांत हम जैनियें के यहाँ नहाR है। हे भगवन्! आपके मत म्ें निरपेक्ष नय मिथ्या हQ और सापेक्ष नय वस्तु हQ, अथर्ि›ाâयाकारी हQ। वस्तु को विधि आदि के द्वारा कहते हQ नियम्यतेÓर्थो वाक्येन विधिना वारणेन वा। तथाÓन्यथा च सोÓवश्य-मविशेष्यत्वमन्यथा।।१०९।। विधिवाक्य या निषेधवाक्यें से, पदाथर् का कथन सही। विधिवाक्य से वस्तु आfस्त है, निषेध वच से नास्ति कही।। (१०९) (११०)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) यदि एेसा नहिं मानें तब तो, वस्तु विशेषण शून्य रही। पुन: विशेष्य नहाR होने से, वस्तु ‘अवस्तू’ असत् हुई।।१०९।। अन्वयाथर्- (विधिना वारणेन वा वाक्येन अथर्: नियम्यते) विधि वाक्य अथवा निषेध वाक्य के द्वारा पदाथर् का नियम किया जाता है (स: तथा अन्यथा च अवश्यं अन्यथा आfवशेष्यं) जो अथर् जिस वाक्य से निश्चिात है वह अन्यथा™प होने से विशेष्य न होकर आfवशेष्य ही है। कारिकाथर्- विधि वाक्य अथवा निषेध वाक्य के द्वारा अथर् का निश्चाय किया जाता है। यह अथर् विधि वाक्य से विधि और प्रतिषेध वाक्य से प्रतिषेध ™पसिद्ध है, अन्यथा-एकांत ™प से विचार करने पर तो अथर् के सòव-असòव म्ें भेद ही नहाR हो सकेगा। भावाथर्- प्रत्येक वस्तु विधीवाक्य अथवा निषेध वाक्य के द्वारा प्रसिद्ध है विधिवाक्य से वस्तु आfस्त™प है एवं निषेध वाक्य से नास्ति™प है। यदि एेसा न मानो तो वह वस्तु किसी भी विशेषण से कही नहाR जा सकेगी। उभयात्मक वस्तु को एक ™प कहना मिथ्या है तदतद्वस्तुवागेषा, तदेवेत्यनुशासती। न सत्या स्यान्मृषावाक्यै:, कथं तòवाथर्देशना।।११०।। वस्तू तत् अ® अतत् ™प है, परन्तु जो ‘तत्’ ही कहते। एेसे वच तो असत्य ही हQ, चूँकि वस्तु ‘अतत्’ भी है।। पुन: मृषा वचनें से वैâसे, तòवें का उपदेश घटे। विधीवाक्य से आfस्त मात्र ही, कोई पदारथ नहाR दिखे।।११०।। अन्वयाथर्- (तत् अतत् वस्तु तत् एव इति अनुशासती एषा वाक् सत्या न स्यात्) प्रत्येक वस्तु तत् अतत् ™प हQ किन्तु वस्तु ‘तत् ™प ही है’ इस प्रकार से कहने वाले वचन सत्य नहाR हQ (मृषावाक्यै: तòवाथर्देशना कथं) अत: मृषा वचनें से तòवाथर् का उपदेश वैâसे हो सकता है। कारिकाथर्- ये वचन ‘‘तत्, अतत्’’ स्वभाव वाली वस्तु का प्रतिपादन करते हQ, यदि वचन वह ही है, इस प्रकार स्व™प के समान पर™प से भी विधि™प मात्र ही वस्तु को प्रतिपादित करW तब तो वे वचन असत्य हो जाय्ेंगे पुन: असत्य वचनें से तòवाथर् का उपदेश कथन वैâसे हो सकेगा ? भावाथर्- विधिवादी वेदांती लोगें का कहना है कि वचन केवल वस्तु के आfस्तत्व को ही कहते हQ, किन्तु यह बात गलत है, क्येंकि प्रत्येक वस्तु विधि- निषेध आदि ™प से अनंत धमार्त्मक है और प्रत्येक वचन अपने अथर् को कहते हुए अन्य अथर् का निषेध अवश्य कर देते हQ। वचन का वास्तविक स्वभाव क्या है ? वाक्स्वभावोÓन्यवागथर्-प्रतिषेधनिरंकुश:। आह च स्वाथर्सामान्यं, ताÂग् वाच्यं खपुष्पवत्।।१११।। अन्य वचन के अर्थों के, प्रतिबोध हेतु निरअंकुश ही। निज सामान्य अथर् को कहना, एेसा वचन स्वभाव सही।। किन्तू केवल निषेध मुख से, वचन स्वाथर् प्रतिपादक हQ। एेसे वच से कथित वस्तु ही, गगनकमलवत् ‘असत्’ रहे।।१११।। अन्वयाथर्- (वाक् स्वभाव: अन्यवागथर् प्रतिषेधनिरंकुश: स्वाथर्सामान्यं च आह) वचन का यह स्वभाव है कि अन्य वचन के अथर् के प्रतिषेध करने म्ें निरंकुश और अपने अथर् सामान्य को कहता है (ताÂक् वाच्यं खपुष्पवत्) इस वचन के स्वभाव से भिVा जो वचन केवल निषेध मुख अथर् का प्रतिपादन करते हQ वे आकाशपुष्पवत् असत् हQ। कारिकाथर्- वचन का स्वभाव अन्य वचन के अथर् का प्रतिषेध करने से निरंकुश है और वह पदाथर् सामान्य निरपेक्ष अपने अथर् सामान्य को कहता है। किन्तु ‘केवल निषेध मुख से ही वचन अपने अथर् को कहते हQ।’ एेसा बौद्धें का कथन आकाश पुष्प के समान असत् है। भावाथर्- बौद्धें ने वचनें को अन्यापोह अथर् का कहने वाला माना है अथार्त् किसी ने गौ: शब्द कहा उस शब्द का यह अथर् है कि ‘‘अगो: व्यावृत्ति: गौ:’’ गो से भिVा अन्य अÕा नहाR है गधा नहाR है इत्यादि से अन्य अर्थों का निषेध करके ही शब्द अथर् को कहते हQ। गौ शब्द से गाय अथर् को नहाR कहते हQ। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि केवल अन्य अथर् के निषेध को कहने वाले वचन असत्य हQ क्येंकि प्रत्येक शब्द प्रथम अपने अथर् को अवश्य कहते हQ। गौ शब्द के सुनते ही मनुष्य को गाय का बोध हो जाता है। स्यात्कार ही आfभप्रेत को प्राप्त कराने वाला है सामान्यवाग् विशेषे चेVा शब्दार्थो मृषा हि सा। आfभप्रेतविशेषाप्ते: स्यात्कार: सत्यलाञ्छन:।।११२।। (१११) (११२)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) ये सामान्य वचन ही कहते, अन्यापोह विशेषाथर्क। एेसा कथन असंगत चूंकी, ये वच नहिं शब्दाथर् कथक।। अत: वचन ये मृषा परन्तू जो आfभप्रेत विशेषारथ। प्राप्त कराने हेतू एेसा, स्यात्कार है चिन्ह सुतथ्य।।११२।। अन्वयाथर्- (सामान्यवाग् विशेषे चेत् शब्दाथार् मृषा हि सा) यदि कहा जाये कि सामान्य वाक्य पर के अभाव™प विशेष म्ें ही रहता सो ठीक नहाR है। क्येंकि यह वाक्य विशेष शब्द के अथर् को नहाR कहता है अत: यह वाक्य मिथ्या ही हQ (आfभप्रेतविशेषाप्ते: स्यात्कार: सत्यलाञ्छन:) आfभप्राय म्ें स्थित आfभप्रेत विशेष की प्राप्ति कराने म्ें सच्चा साधनभूत सत्य चिन्ह वाला यह ‘स्यात्कार’ शब्द है। कारिकाथर्- सामान्य वचन विशेष का कथन नहाR करते हQ फिर भी यदि आप मान ल्ेंवे तब तो शब्दाथर् असत्य ही हो जाय्ेंगे। अतएव आfभप्रेत विशेष की प्राप्ति के लिए सत्य लाञ्छन वाला स्यात्कार पद ही है। भावाथर्- आfभप्राय म्ें इ° अथर् विशेष को बताने वाला यह ‘स्यात्’ शब्द चिन्हित स्याद्वाद ही है अन्य सामान्य वचन आदि नहाR है। स्याद्वाद की सम्यक् व्यवस्था विधेयमीप्सिताथार्”ं प्रतिषेध्याÓविरोधि यत्। तथैवाÓÓदेय-हेयत्व-मिति स्याद्वादसंस्थिति:।।११३।। जो विधेय है वह अपने, प्रतिषेध्य नास्ति सह आfवरोधी। इच्छित अर्थों का साधन वह, स्याद्वाद उभयात्मक ही।। वैसे ही आदेय-हेय है, वस्तु का सवर्था नहाR। इस प्रकार से स्याद्वाद की, सम्यक् स्थिति घटित हुई।।११३।। अन्वयाथर्- (यत् विधेयं ईप्सिताथार्”ं प्रतिषेध्याÓविरोधि) जो विधि वाक्य के द्वारा कहा गया विधेय है वह इच्छित अथर् का कारण है और अपने प्रतिषेध्य- नास्ति के साथ आfवनाभावी होने से आfवरोधी है (तथैव आदेयहेयत्वं इति स्याद्वादसंस्थिति:) और उसी प्रकार वस्तु का उपादेय एवं हेयपना सिद्ध है अन्यथा नहाR। इस प्रकार से स्याद्वाद की सम्यक् प्रकार से व्यवस्था हो जाती है। कारिकाथर्- ‘आfस्त’ इत्यादि शब्द से वाच्य विधेय वाक्य ही ईप्सित अथर्ि›ाâया के प्रति कारण है और वह प्रतिषेध्य-नास्तित्वादि धमर् से आfवरोधी- आfवनाभावी है एवं उसी प्रकार से ही आदेय और हेय हQ इस प्रकार से स्याद्वाद की सम्यक् व्यवस्था हो जाती है। आप्त मीमांसा करने का उद्देश्य इतीयमाप्तमीमांसा विहिता हितमिच्छताम् १ । सम्यग्मिथ्योपदेशाथर्विशेषप्रतिपत्तये ।।११४।। हित के इच्छुक भव्यजनें को, सत्य-असत्य बताने को। सम्यक् मिथ्या उपदेशें के, अथर् विशेष समझाने को।। इस प्रकार से रची गई यह, आप्त समीक्षा को करती। कुशल ‘आप्तमीमांसा’ स्तुति यह, सम्यक् ‘‘ज्ञानमती’’ करती।। ११४।। अन्वयाथर्- (इति इयं आप्तमीमांसा हितं इच्छतां) इस प्रकार से यह आप्तमीमांसा हित के चाहने वालें को (सम्यक्-मिथ्योपदेशाथर्विशेषप्रतिपत्तये विहिता) सम्यक् उपदेश और मिथ्या उपदेश के अथर् विशेष का ज्ञान कराने के लिए की गई है। कारिकाथर्- हित प्राप्ति की इच्छा करने वाले भव्य जीवें को सम्यव्â उपदेश और मिथ्या उपदेश के अथर् विशेष का ज्ञान कराने के लिए यह आप्तमीमांसा नाम की स्तुति रचना मQने (श्री समंतभद्र स्वामी ने) बनाई है। भावाथर्- जो भव्य हQ वे ही अपनी आत्मा के हित की भावना करWगे न कि अभव्य, अत: भव्य जीव ही सम्यक् उपदेश को प्राप्तकर-ग्राहणकर मिथ्या उपदेश का त्याग करWगे। यह आप्तमीमांसा स्तोत्र हमारे और आपके सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति और विशुद्धि म्ें निमित्त बन्ें, यही श्रीजिनेन्द्रदेव से प्राथर्ना है। ।।इति ग्रान्थ: समाप्त:।। N : श् (११३) (११४) १. ‘हितमिच्छताम्’ इत्यपि पाठो लभ्यते।
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) दशव्ें परिच्छेद का सार अज्ञान से बंध और ज्ञान से मोक्ष के एकांत का विचार एवं स्याद्वाद की सिद्धि (कारिका ९६ से ११४ तक) सांख्य का कहना है कि अज्ञान से ही बंध होता है और ज्ञान से ही मोक्ष होता है। इस पर जैनाचायर् का कहना है कि यदि आप अज्ञान से बंध अवश्यंभावी मानो गे तो ज्ञेय पदाथर् तो अनंत हQ। पुन: उनको जानने वाला कोई नहाR हो सकेगा औ र यदि अल्पज्ञान से ही मोक्ष मानो तो बचे हुए अवशि° अज्ञान से मोक्ष हो जावेगा। अथवा सभी प्राणियें म्ें कुछ न कुछ ज्ञान संभव ही है अत: सभी जीव मुक्त हो जाव्ेंगे। नैयायिक का कहना है कि दु:ख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञान का उत्तरोत्तर अभाव हो जाने से मोक्ष हो जाती है क्येंकि दु:खादिकें का अभाव तòवज्ञानपूवर्क ही होता है। मिथ्याज्ञान से दोषें की उद्भूति अवश्य होती है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि मिथ्याज्ञान का संपूणर्तया अभाव वैâसे होगा ? पुन: मिथ्याज्ञान से दोष आदि परम्परा चलती ही रहेगी। स्याद्वाद का आश्राय लेने वाले जैनाचार्यों का कहना है कि जो एकांत से यह कहा जाता है कि अज्ञान से बंध और ज्ञान से मोक्ष होता है सो असंभव है क्येंकि सभी को किसी न किसी विषय म्ें अज्ञान तो है ही है पुन: किसी न किसी को मोक्ष नहाR हो सकेगा इसलिए वास्तविक चीज तो यह है कि मोहसहित अज्ञान से बंध होता है किन्तु मोहरहित रागद्वेषादि कषायें से रहित अज्ञान अथार्त् अल्प ज्ञान से मोक्ष होता है क्येंकि मोहकमर्रहित उपशांत कषाय और क्षीण कषाय वाले एेसे ग्यारहव्ें और बारहव्ें गुणस्थान म्ें यद्यपि अज्ञान है फिर भी उनके बंध नहाR होता है इन दोनें गुणस्थानें म्ें केवलज्ञान न होने से अज्ञान है ही है। वस्तुत: केवलज्ञान की अपेक्षा श्राुतज्ञान आदि क्षायोपशमिक ज्ञान अल्प ही हQ। वह अल्पज्ञान मोहरहित छ©ास्थ वीतरागी के चरम समय म्ें मौजूद है, उसी से ही उत्तर क्षण म्ें तेरहव्ें गुणस्थान म्ें केवलज्ञान प्रगट हो जाता है, जिसे कि आहËत्य लक्षण को अपर मोक्ष कहते हQ किन्तु मिथ्याÂि° से लेकर दशव्ें गुणस्थान तक मोहसहित ज्ञान कमर्बंध का ही कारण है अत: स्याद्वाद प्रि›ाâया से समझना चाहिए। (१) कथंचित् अज्ञान से बंध होता है, क्येंकि वह मिथ्यात्व कषायादि से सहित है। (२) कथंचित् अज्ञान से बंध नहाR होता है, क्येंकि वह मिथ्यात्व कषायादि से रहित है। (३) कथंचित् अज्ञान से बंध होता है और नहाR होता है, क्येंकि ›ाâम से मिथ्यात्वादि सहित और रहित दोनें की विवक्षा है। (४) कथंचित् अवक्तव्य है क्येंकि दोनें अपेक्षाआW को एक साथ कह नहाR सकत् ो हQ। (५) कथंचित् अज्ञान से बंध और अवक्तव्य है, क्येंकि ›ाâम से मोहसहित की तथा युगपत् दोनें की विवक्षा है। (६) कथंचित् अज्ञान से अबंध और अवक्तव्य है, क्येंकि ›ाâम से मोहरहित और युगपत् दोनें की अपेक्षा है। (७) कथंचित् अज्ञान से बंध और अबंध तथा अवक्तव्य है, क्येंकि ›ाâम से मोहसहित और रहित की तथा युगपत् दोनें की अपेक्षा है। इसी प्रकार से मोहसहित अल्पज्ञान से मोक्ष नहाR होता है तथा मोह रहित अल्पज्ञान से भी मोक्ष होता है, इसम्ें भी सप्तभंगी प्रि›ाâया घटित करना चाहिए। प्रमाण और नय हे भगवान्! आपके सिद्धान्त म्ें तòवज्ञान ही प्रमाण है। उसम्ें युगपत् सभी पदार्थों का अवभासन-प्रकाशन करने वाला केवलज्ञान है और स्याद्वाद नय से संस्कृत मति, श्राुत आदि शेष ज्ञान ›ाâमभावी हQ। यहाँ पर तòवज्ञान को प्रमाण कहने से अज्ञान, निराकार दर्शन, संशय आदि ज्ञान इन सबका निराकरण हो जाता है। इस प्रमाण से प्रत्यक्ष-परोक्ष एेसे दो भेद होने से परोक्ष के अन्तगर्त स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तवर्क, अनुमान और आगम ये ज्ञान भी प्रमाण ™प हQ। केवलज्ञान का फल तो उपेक्षा है। शेष ज्ञानें का फल ग्राहण करना, त्याग करना तथा उपेक्षा करना इन तीनें™प है अथवा अपने-अपने विषय म्ें अज्ञान का अभाव होना ही ज्ञान का फल है। हे भगवन्! आपके यहाँ ‘स्यात्’ यह पद निपात से सिद्ध है। वाक्यें म्ें अनेकांत उद्योतित करने वाला है एवं अपने अथर् से सहित होने से अथर् के प्रति समथर् विशेषण है। सत्, असत्, नित्य, आfनत्य आदि ™प सवर्था एकांत का निराकरण करने वाला अनेकांत है। जैसे ‘स्याज्जीव:’ एेसा कहने से उसका प्रतिपक्षी अजीव भी जान लिया जाता है। सवर्था एकांत के त्याग से ही स्याद्वाद होता है। ‘कथंचित्’ आदि शब्द इसा r के पयार्यवाची हQ, यह सप्त भंगें की अपेक्षा करके स्वभाव और परभाव के द्वारा वस्तु के सत्-असत् आदि धर्मों की व्यवस्था करता है। विरोध रहित स्याद्वाद™प आगम प्रमाण के द्वारा विषय किये गये पदाथर् (११५) (११६)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) विशेष का जो व्यंजक है वह नय कहलाता है अथार्त् जिसके द्वारा जानने योग्य अथर् का ज्ञान होता है, वह नय है। अनेक ™प अथर् को विषय करने वाला अनेकांत™प ज्ञान प्रमाण है। अन्य धर्मों की अपेक्षा करते हुए वस्तु के एक अंश का ज्ञान नय है और अन्य धर्मों का निराकरण करके वस्तु के एक अंश को ग्राहण करने वाला दुनर्य है, क्येंकि यह विपक्ष का विरोधी होने से केवल स्वपक्ष मात्र का हठाग्राही है। यदि कोई कहे कि मिथ्या-एकांत का समुदाय मिथ्या™प ही है तो हमने एेसा नहाR माना है। हमारे यहाँ निरपेक्ष नय मिथ्या है और उनका समूह भी मिथ्या ही है। यदि वे ही नय सापेक्ष हQ, तो सम्यव्â हQ, वास्तविक हQ। नय के मूल म्ें दो भेद हQ-द्रव्याथिर्क और पयार्याथिर्क। इन दो के ही सात भेद हो जाते हQ। नैगम, संग्राह, व्यवहार, त्र+जुसूत्र, शब्द, समभि™Ìढ और एवंभूत। जो द्रव्य को ही विषय करे, जिसकी Âि° म्ें पयार्य्ें गौण हें, वह द्रव्याथिर्क नय है तथा जो पयार्य मात्र को विषय करे, वह पयार्याथिर्क नय है। जैसे-द्रव्याथिर्क नय से जीव नित्य है। जन्म-मरण से रहित है तथा पयार्याथिर्क नय से जीव आfनत्य है, उसकी पयार्यें का उत्पाद-विनाश होने से वह जीव से भिVा नहाR है। स्याद्वाद सप्तभंग और नयें की अपेक्षा रखने वाला है, देय और उपादेय के भेद को करने वाला है तथा सभी तòवें को केवलज्ञान के समान प्रकाशित करता ह ै। स्याद्वादकेवलज्ञाने सवर्तòवप्रकाशने। भेद: साक्षादसाक्षाच्च ¢ावस्त्वन्यतमं भवेत्।।१०५।। अथर्- स्याद्वाद और केवलज्ञान दोनें ही सम्पूणर् तòवें को प्रकाशित करने वाले हQ। अंतर केवल इतना ही है कि केवलज्ञान साक्षात् सम्पूणर् तòवें को प्रकाा fशत करता है और स्याद्वाद असाक्षात् परोक्ष™प से प्रकाशित करता है। स्याद्वाद आगम परोक्ष™प से सभी पदार्थों का ज्ञान करा देता है। यहाँ पर ‘सवर्’ इस पद से उनकी सम्पूणर् गुण, पयार्यें को नहाR लेना चाहिए क्येंकि ‘मतिश्राुतयोनिर्बंधो द्रव्य् ोष्वसवर्पयार्येषु’ मतिज्ञान तथा श्राुतज्ञान का विषय सभी द्रव्य और उनकी कुछ-कुछ पयार्य्ें हQ, एेसा सूत्रकार का वचन है अत: प्रमाण का विषय धमाËतरें को ग्राहण करना है, नयें क ा विषय धमाËतरें का त्याग करना है क्येंकि प्रमाण से तत्-अतत् स्वभाव का ज्ञा न होता है, नय से तत् एक अंश का ज्ञान होता है तथा दुनर्य से अन्य का निराकरण करके निरपेक्ष एक अंश का ज्ञान होता है। इसलिए- हे भगवन्! जिन्हW हमने निर्दोष™प से निश्चिात किया है, वे निर्दोष आप ही हQ क्येंकि आपके वचन युक्ति और शाŒा से आfवरोधी हQ। आप ही मोक्षमागर् के प्रणेता कमर्भूभृत् के भेत्ता एवं विÕा तòवें के ज्ञाता सिद्ध हQ, इस कारण से आप ही भगवान् अर्हंत सवर्ज्ञ सिद्ध हQ, स्याद्वाद के नायक हQ यह बात सिद्ध हो गई। इस प्रकार से हित की इच्छा करने वालें के लिए मQने यह आप्त की मीमांसा कही है, जो कि सम्यक् और मिथ्या उपदेश के अथर् विशेष को समझने के लि् ाए है। विशेष- अ°सहœाी ग्रांथराज के कुछ सरल और मधुर प्रकरणें को सार™प म्ें समझाने का प्रयास किया गया है, जो विशेष जिज्ञासु हQ उन्हW हिन्दी अनुवाद सहित अ°सहœाी का स्वाध्याय करना चाहिए। स्याद्वाद के रहस्य को समझने के लिए यह एक अनूठा ग्रांथ है। अ°सहœाी ग्रांथराज का महत्व श्रीमदुमास्वामी आचायर् ने तòवाथर्सूत्र की रचना की आदि म्ें ‘‘मोक्षमागर्स्य ने तारं भेत्तारं कमर्भूभृतां। ज्ञातारं विÕातòवानां वंदे तद्गुणलब्धये।।’’ इत्यादि™प से मं गलाचरण किया है, उसी मंगलाचरण पर आचायर्वयर् श्री समंतभद्रस्वामी ने आप्तमीमांसा न ाम के स्तोत्र की रचना की है, उसम्ें श्री समंतभद्राचायर् ने दश अध्यायें म्ें मुख्य™प से दश् ा प्रकार के एकांत का निरसन करके स्याद्वाद की सप्तभंगी प्रि›ाâया को घटित ि कया है। उन एक-एक परिच्छेद म्ें मुख्य-मुख्य एकांतें के खण्डन म्ें उभयैकात्म्य तथा अवाच्य का खण्डन करते हुए ‘विरोधाVोभयैकात्म्यं’ इस कारिका को प्रत्येक स्वाध्याय म W लिया है अत: यह कारिका दस बार आ गई है। जैसे प्रथम अध्याय म्ें मुख्यता से भावैकांत-अभावैकांत का खंडन है पुन: उभयैकात्म्य का खंडन एवं अवाच्य का खण्डन करते हुए विरोधाVोभयैकात्म्यं’’ इत्यादि कारिका की गई है। पुन: कथंचित् भाव-कथंचित् अभाव को सिद्ध करके सप्तभंगी प्रि›ाâया घटित की है तथा इस भाव-अभाव के खण्डन म्ें अनेक अन्य वि षय भी स्प° किये हQ। द्वितीय म्ें एकत्व पृथक्त्व को एकांत से न मानकर प्रत्येक वस्तु कथंचित् एकत्व पृथक्त्व ™प ही है यह प्रगट किया है। तृतीय परिच्छेद म्ें नित्यानित्य को दिखाया है, चतुथर् म्ें भेदाभेदात्मक वस्तु को बताया है, पाँचव्ें म्ें कथंचि त् आपेक्षिक-अनापेक्षिक ™प वस्तु को सिद्ध किया है, पुन: छठे म्ें हेतुवाद आगम व् ाâो स्याद्वाद से सिद्ध करके सातव्ें म्ें अंतस्तòव-बहिस्तòव का अनेकांत बताया है, आठव्ें म्ें दैव पु®षाथर् को स्याद्वाद से प्रगट करके नवम्ें म्ें पुण्य-पाप का अनेवंâात उद्योतित किया है, दशव्ें म्ें ज्ञान-अज्ञान से मोक्षबंध की व्यवस्था को प्रकाशित किया है। स्याद्वाद और नयें का उत्तम रीति से वणर्न किया है। तात्पयर् (११७) (११८)
वीर ज्ञानोदय ग्रांथमाला देवागम स्तोत्र (आप्तमीमांसा) यही है कि इस अ°सहœाी ग्रांथ म्ें जिस रीति से स्याद्वाद का वणर्न प्रत्येक स्थान पर किया गया है वैसा वणर्न अन्यत्र न्यायग्रांथें म्ें कहाR पर भी नहाR है, प्रत्येक अध्याय म्ें सप्तभंगी प्रि›ाâया बहुत ही अच्छी मालूम पÌडती है। अंत म्ें आचायर् नेयह बताया है कि मोक्षाभिलाषी भव्य जीवें के लिए यह आप्त- मीमांसा-सवर्ज्ञ विशेष की परीक्षा की गई है क्येंकि मुख्य™प से मोक्ष ही हित ™प है और उसकी प्राि प्त के कारणभूत रत्नत्रय भी हित ™प माना गया है अत: सम्यक्त्व और मिथ्यात्व विश ेष का ज्ञान कराने के लिए यह आप्तमीमांसा प्रधान ग्रांथ है क्येंकि सत्य-असत्य तò व का एवं आप्त का पूणर्तया निणर्य हो जाने के बाद ही यह जीव असत्य को छोÌडव् ाâर सत्य मागर् का या सत्य आप्त का आश्राय लेता है। अत: यह अ°सहœाी ग्रांथ आहËत्य लक्ष्मी को परिसमाप्ति-प्राप्ति पयËत स्वाथर्संपत्ति को सिद्ध करने वाला है इसलिए शाŒा की आदि म्ें स्तुति किये गये आप्त ही मोक्षमागर् के प्रणेता कमर्भूभृद्भ् ोत्ता और विÕातòवें के ज्ञाता सिद्ध हुए अर्हंत भगवान् ही निर्दोष आप्त हQ उन्हाR के गुणें क ो प्राप्त करने के लिए उन्हW ही नमस्कार करना उचित है अन्य को नहाR। श्रोतव्या°सहœाी श्राुतै: किमन्यै: सहœासंख्यानै:। विज्ञायेत् ययैव स्वसमय परसमय सद्भाव:।। स्वयं विद्यानंदि आचायर्वयर् एेसा कहते हQ कि एक अ°सहœाी ग्रांथ को ही सुनना चाहिए, अन्य हजारें ग्रांथें के सुनने से क्या प्रयोजन है ? क्येंकि इस एक ग्रांथ के द्वारा ही स्वसमय-अपने स्याद्वाद जैन सिद्धांत और परसमय-पर परिकल्पित अनेक एकांत तòवें को समझ नहाR ल्ेंगे तब तक हम अपना सिद्धांत भी अत्यंत सूक्ष्मतया स्याद्वाद की कसौटी पर कस नहाR सव्ेंâगे और जब तक सप्तभंगी स्याद्वाद प्रि›ाâया से हम अपने तòवें को नहाR समझ ल्ेंगे, तब तक एकांतवाद के किसी प्रवाह म्ें बहने का डर बना ही रहेगा। आगम और तवर्क दोनें की कसौटी पर कसा गया तòव ही शुद्ध, सत्य सिद्ध होता है अन्यथा नहाR। केवल सिद्धांत अथवा केवल अध्यात्म ™प आगम से जाना गया तòव कदाचित् बेमालूम ही एकांत के गºे म्ें डाल सकता है किन्तु आगम और तवर्क दोनें के द्वारा समझा गया तòव सम्यक् श्राद्धान से कथमपि च्युत् नहाR कर सकता। श्रीसमंतभद्राचायर्वयर् ने अपनी रचनाआW को भगवान की स्तुति का ™प देते हुए प्रौÌढतया न्याय के ग्रांथ ™प बना दिया है यह विशेषता केवल एक समंतभद्रस्वामी म्ें ही थी कि न्यायपूणर् शब्दें के द्वारा निर्भीकतया भगवान के साथ भी वातार्लाप करते हुए उन्हाR सवर्ज्ञ भगवान की भी परीक्षा करने का साहस कर डाला है। सो ठीक ही है क्येंकि जब उन्हेंने स्वयंभूस्तोत्र की रचना के द्वारा भगवान चन्द्रप्रभु को ही प्रगट कर लिया था, तब उनका इस पद्धति से भगवान को ही न्याय की कसौटी पर कस देना कोई बÌडी बात नहाR है। सचमुच म्ें यह कोई साधारण व्यक्ति का काम नहाR कि भगवान की परीक्षा शु™ कर देवे। श्रीसमंतभद्र जैसे महान मुनिपुंगवें का ही यह काम है। इस ग्रांथ म्ें भगवान को ही निर्दोष आप्त सिद्ध करके अंत म्ें यह बतलाया है कि- इतीयमाप्तमीमांसा विहिताहितमिच्छता। सम्यग्मिथ्योपदेशाथर् - विशेषप्रतिपत्तये।।११४।। अथार्त् यह आप्त की मीमांसा-परीक्षा हित-मोक्षसुख की इच्छा करने वाले भव्य पु®षें के लिए ही की गई है क्येंकि सम्यक् और मिथ्या उपदेश विशेष की जानकारी होने से मिथ्यात्व का त्याग और सम्यक्त्व का ग्राहण शक्य है अन्यथा नहाR। अपने जैनसिद्धांत के ही एक-एक कण™प एक-एक अंश को लेकर मिथ्यावादी जन हठाग्राही बन जाते हQ, वे अपेक्षावाद कथंचित्वाद™प सिद्धांत को नहाR समझ पाते हQ। एक-एक के आग्राह से ही नित्यैकांतवादी, क्षणिवैâकांतवादी आदि बनजाते हQ। जैसे सूक्ष्मत्र+जुसूत्र नय से हमारे यहाँ प्रत्येक वस्तु अथर्पयार्य ™प से प्रतिक्षण होने वाली अथर्-पयार्य एक समयवर्ती क्षणिक है किन्तु यह नय अन्य नयें से सा पेक्ष होने से ही सम्यग्नय है। यदि वह अन्य नयें की अपेक्षा न करे तो मिथ्या नय है इसी एक नय के हठाग्राही बौद्धजन हQ जिन्हेंने अपना क्षणिकसिद्धांत ही बना लिया है इत्यादि। इन सब एकांतें का खण्डन करके यह अ°सहœाी ग्रांथ अपने स्याद्वाद को पद-पद पर पु° करता है अतएव आचायर् विद्यानंदि महोदय ने यह श्लोक साथर्व â ही दिया है कि-इसी एक ग्रांथ से ही सभी स्वसमय और परसमय का ज्ञान हो जाता है। अत: इसका अ°सहœाी महान ग्रांथ साथर्क ही नाम है। इसम्ें ११४ कारिकाआW से श्री समंतभद्राचायर्वयर् ने देवागम स्तोत्र रचना की है उस स्तोत्र के ऊपर श्रीभóाकलंकदेव ने अ°शती नाम से ८०० श्लोक प्रमाण म्ें टीका की हैै पुन: उस अ°शती सहित देवागम स्तोत्र की श्री विद्यानंदि स्वामी ने ८००० (आठ हजार) श्लोक प्रमाण से अ°सहœाी नाम की टीका की है इसका नाम आपने क°सहœाी भी दिया है, क्येंकि न्याय के प्रत्येक प्रकरण इसम्ें बहुत ही क्लि° और जटिलहQ, बÌडे ही क°साध्य हQ तथा आपने इसे ‘अभी°सहœााR पुष्यात्’ कहा है कि यह ग्रांथ नित्य ही हजारें मनोरथें को पु° करे। अत: इस अ°सहœाी ग्रांथराज का नित्य ही मनन करना चाहिए तथा देवागम स्तोत्र को भी नित्य ही पÌढना चाहिए। इस स्तुति के प्रसाद से ही इसका अथर् समझ सव्ेंâगे। (११९) (१२०)
पाठ-स्रोत: दिगम्बर जैन ग्रन्थ संग्रह (डिजिटाइज़्ड मूल पाठ) · CC BY-NC-SA 4.0
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