श्रुतधारा
॥ श्री ॥

मोक्षमार्गप्रकाशक

टोडरमल · हिन्दी (ढूंढारी) · २५१८ पद्य · ~३७८ मिनट

· नम: सिद्धेभ्य: ·

आचार्यकल्प पंडि़त टोडरमलजी कृत

म्ोक्षमार्गप्रकाशक

पहला अधिकार

पीठबंध प्ररूपण

अथ, मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र लिखा जाता है .
(मंगलाचरण)
दोहा- मंगलमय मंगलकरण, वीतराग-विज्ञान.
नमौं ताहि जातैं भये, अरहंतादि महान॥१॥
करि मंगल करिहौं महा, ग््रंथकरनको काज.
जातैं मिलै समाज सब, पावै निजपद राज॥२॥
अथ, मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र का उदय होता है. वहाँ मंगल करते हैं :-
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं.
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं..
यह प्राकृतभाषामय नमस्कार मंत्र है सो महामंगलस्वरूप है. तथा इसका संस्कृत ऐसा होता है :-
नामोऽर्हद्भ्य:, नम: सिद्धेभ्य:, नम: आचार्रेभ्य:, नम: उपाध्यायेभ्य:, नमो लोके सार्वसाधुभ्य: . तथा इसका अर्थ ऐसा है :- नमस्कार अरहंतोंको, नमस्कार सिद्धों को, नामस्कार आचार्योंको, नमस्कार उपाध्यायोंको, नमस्कार लोक में समस्त साधुओंको . -इस प्रकार इसमें नमस्कार किया, इसलिये इसका नाम नमस्कारमंत्र है .
अब यहँा जिनको नमस्कार किया उनके स्वरूप का चिन्तवन करते हैं :- अरहंतोंका स्वरूप
वहाँ प्रथम अरहंतोंके स्वरूपका विचार करते हैं :- जो गृहस्थपना त्यागकर, मुनिधर्म अंगीकार करके, निजस्वभावसाधन द्वारा चार घातिकर्मों का क्षय करके - अनंतचतुष्टयरूप विराजमान हुए। वहाँ अनंतज्ञान द्वारा तो अपने अनंतगुण-पर्याय सहित समस्त जीवादि द्रव्योंको युगपत् विशेषपने से प्रत्यक्ष जानते हैं, अनंतदर्शन द्वारा उनका सामान्य अवलोकन करतेहैं,अनंतवीर्यद्वाराऐसीसामथ्र्यकोधारणकरतेहैं,अनंतसुखद्वारानिराकुल परमानन्द का अनुभव करते हैं. पुनश्च, जो सर्वथा सर्व राग-द्वेषादि विकारभावों से रहित होकर शांतरसरूप परिणमित हुए हैं। तथा क्षुधा-तृषादि समस्त दोषोंसे मुक्तत होकर देवाधिदेवपने को प्राप्त हुए हैं। तथा आयुध-अंबरादिक व अंगविकारादिक जो काम-कक्रोधादि निंद्यभावोंके चिन्ह उनसे रहित जिनका परम औदारिक शरीर हुआ है। तथा जिनके वचनोंसे लोकमें धर्मतीर्थ प्रवर्तता है, जिसके द्वारा जीवोंका कल्याण होता है। तथा जिनके लौकिक जीवोंको प्रभुत्व माननेके कारणरूप अनेक अतिशय और नानाप्रकारके वैभवका संयुक्तपना पाया जाता है। तथा जिनका अपने हितके अर्थ गणधर-इन्द्रादिक उत्तम जीव सेवन करते हैं. - ऐसे सर्वप्रकार से पूजने योग्य श्री अरहंतदेव हैं उन्हें हमारा नमस्कार हो . सिद्धोंका स्वरूप
अब, सिद्धोंका स्वरूप ध्याते हैं :- जो गृहस्थ-अवस्थाको त्यागकर, मुनिधर्मसाधन द्वारा चार घातिकर्मोंका नाश होने पर अनंतचतुष्टय भाव प्रगट करके, कुछ काल पीछे चार अघातिकर्मोंकेे भी भस्म होने पर परम औदारिक शरीरको भी छोड़कर ऊध्र्वगमन स्वभावसे लोकके अग्रभागमें जाकर विराजमान हुए। वहाँ जिनको समस्त परद्रव्योंका सम्बन्ध छूटनेसे मुक्ततअवस्थाकीसिद्धिहुई,तथाजिनकेचरमशरीरसेकिंचित्न्यूनपुरूषाकारवत् आत्मप्रदेशोंका आकार अवस्थित हुआ, तथा जिनके प्रतिपक्षी कर्मोंका नाश हुआ इसलिये समस्त सम्यक्तत्व-ज्ञान-दर्शनादिक आत्मिक गुण सम्पूर्णतया अपने स्वभावको प्राप्त हुए हैं। तथा जिनके नोकर्मका सम्बन्ध दूर हुआ इसलिये समस्त अमूृर्त्तत्वादिक आत्मिक धर्म प्रगट हुए हैं, तथा जिनके भावकर्मका अभाव हुआ इसलिये निराकुल आनन्दमय शुद्धस्वभावरूप परिणमनहोरहाहै।तथाजिनकेध्यानद्वाराभव्यजीवोंकोस्वद्रव्य-परद्रव्यकाऔर औपाधिकभाव-स्वभावभावोंका विज्ञान होता है, जिसके द्वारा उन सिद्धोंके समान स्वयं होनेका साधन होता है. इसलिये साधने योग्य जो अपना शुद्धस्वरूप उसे दर्शानेको प्रतिबिम्ब समान हैं तथा जो कृतकृत्य हुए हैं इसलिये ऐसे ही अनंतकाल पर्यन्त रहते हैं. - ऐसे निष्पन्न हुए सिद्धभगवान को हमारा नमस्कार हो. आचार्य-उपाध्याय-साधुका सामान्य स्वरूप
अब, आचार्य-उपाध्याय-साधुके स्वरूप का अवलोकन करते हैं :-
जो विरागी होकर, समस्त परिग्रहका त्याग करके, शुद्धोपयोगरूप मुनिधर्म अंगीकार करके - अंतरंगमें तो उस शुद्धोपयोग द्वारा अपनेको आपरूप अनुभव करते हैं। परद्रव्यमें अहंबुद्धि धारण नहीं करते, तथा अपने ज्ञानादिक स्वभावहीको अपना मानते हैं। परभावोंमें ममत्व नहीं करते, तथा जो परद्रव्य व उनके स्वभाव ज्ञान में प्रतिभासित होते हैं उन्हें जानते तो हैं परन्तु इष्ट-अनिष्ट माानकर उनमें राग-द्व्रेष नहीं करते। शरीर की अनेक अवस्थाएँ होती हैं, बाह्य नाना निमित्त बनते हैं, परन्तु वहाँ कुछ भी सुख-दु:ख नहीं मानते। तथा अपने योग्य बाह्य क्रिया जैसे बनती हैं वैसे बनती हैं। खींचकर उनको नहीं करते। तथा अपने उपयोगको बहुत नहीं भ्रमाते हैं। उदासीन होकर निश्चलवृत्तिको धारण करते हैं। तथा कदाचित् मंदरागके उदयसे शुभोपयोग भी होता है - उससे जो शुद्धोपयोगके बाह्य साधन हैं उनमें अनुराग करते हैं। परन्तु उस रागभाावको हेय जानकर दूर करना चाहते हैं। तथा तीव्र कषायके उदयका अभाव होने से हिंसादिरूप अशुभोपयोग परिणतिका तो अस्तित्व ही नहीं रहा है। तथा ऐसी अंतरंग(अवस्था)होने पर बाह्य दिगम्बर सौम्यमुद्राधारी हुए हैं, शरीरका सँवारना आदि विक्रियाओंसे रहित हुए हैं, वनखण्डादिमें वास करते हैं। अट्ठाईस मूलगुणोंका अखण्िडत पालन करते हैं। बाईस परीषहोंको सहन करते हैं। बाारह प्रकारके तपोंको आदरते हैं। कदाचित् ध्यानमुद्रा धारण करके प्रतिमावत् नश्चल होते हैं। कदाचित् अध्ययनादिक बाह्य धर्मक्रियाओंमें प्रवर्तते हैं, कदाचित् मुनिधर्मके सहकारी शरीरकी स्थितिके हेतु योग्य आहार-विहारादि क्रियाओंमें साावधान होते हैं.
ऐसे जैन मुनि हैं उन सबकी ऐसी ही अवस्था होती है. आचार्यका स्वरूप
उनमें जो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रकी अधिकतासे प्रधान पद प्राप्त करके संघमें नायक हुए हैं। तथा जो मुख्यरूपसे तो निर्विकल्प स्वरूपाचरणमें ही मग्न हैं और जो कदाचित् धर्मके लोभी अन्य जीव-याचक उनको देखकर राग अंशके उदयसे करूणाबुद्धि हो तो उनको धर्मोपदेश देते हैं, जो दीक्षाग्राहक हैं उनको दीक्षा देते हैं। जो अपने दोषोंको प्रगट करते हैं उनको प्राय¬ति विधिसे शुद्ध करते हैं.
ऐसे आचरण अचरानेवाले आचार्य उनको हमारा नमस्कार हो. उपाध्यायका स्वरूप
तथा जो बहुत जैन शास्त्रोंके ज्ञाता होकर सांघमें पठन-पाठनके अधिकारी हुए हैं। तथा जो समस्त शास्त्रोंका प्रयोजनभूत अर्थ जान एकाग्र हो अपने स्वरूप को ध्याते हैं, और यदि कदाचित् कषाय अंशके उदयसे वहाँ उपयोग स्थिर न रहे तो उन शास्त्रोंको स्वयं पढ़ते हैं तथा अन्य धर्मबुद्धियोंको पढ़ाते हैं.
ऐसे समीपवर्ती भव्योंको अध्ययन करानेवाले उपाध्याय, उनको हमारा नमस्कार हो. सााधुका स्वरूप
पुनश्च, इन दो पदवी धारकोंके बिना अन्य समस्त जो मुनिपदके धारक हैं तथा जो आत्मस्वभावको साधते हैं। जैसे अपना उपयोग परद्रव्यमें इष्ट-अनिष्टपना मानकर फँसे नहीं व भागे नहीं वैसे उपयोगको सधाते हैं और बाह्यमें उसके साधनभूत तपश्चरणादि क्रियाओंमें प्रवर्तते हैं तथा कदाचित् भक्ति-वंदनादि कार्योंमें प्रवर्तते हैं.
ऐसे आत्मस्वभावके साधक साधु हैं, उनको हमारा नमस्कार हो. पूज्यत्व का कारण
इस प्रकार इन अरहंतादिका स्वरूप है सो वीतराग-विज्ञानमय है. उसहीके द्वारा अरहंतादिक स्तुतियोग्य महान हुए हैं. क्तयोंकि जीवतत्त्ववकी अपेक्षा तो सर्व ही जीव समान हैं,परन्तुरागादिविकारोंसेवज्ञानकीहीनतासेतोजीवनिन्दायोग्यहोतेहैंऔर रागादिककी हीनतासे व ज्ञानकी विशेषतासे स्तुतियोग्य होते हैं। सो अरहंत-सिद्धोंके तो सम्पूर्ण रागादिकी हीनता और ज्ञानकी विशेषता होनेसे सम्पूर्ण वीतराग-विज्ञानभाव संभव है और आचार्य, उपाध्याय तथा साधुओंको एकदेश रागादिककी हीनता और ज्ञानकी विशेषता होनेसे एकदेश वीतराग-विज्ञान संभव है. - इसलिये उन अरहंतादिकको स्तुतियोग्य महान जानना.
पुनश्च, ये जो अरहंतादिक पद हैं उनमें ऐसा जानना कि - मुख्यरूपसे तो तीर्थंकर का और गौणरूपसे सर्वकेवलीका प्राकृत भाषामें अरहंत तथा संस्कृतमें अर्हत् ऐसा नाम जानना. तथा चौदहवें गुणस्थानके अनंतर समयसे लेकर सिद्ध नाम जानना. पुनश्च, जिनको आचार्यपद हुआ हो वे संघमें रहें अथवा एकाकी आत्मध्यान करें अथवा एकाविहारी हों अथवा आचार्योंमें भी प्रधानताको प्राप्त करके गणधरपदवीके धारक हों - उन सबका नाम आचार्य कहते हैं. पुनश्च, पठन-पाठन तो अन्य मुनि भी करते हैं, परन्तु जिनको आचार्यों द्वारा दिया गया उपाध्यायपद प्राप्त हुआ हो वे आत्मध्यानादि कार्य करते हुए भी उपाध्याय ही नाम पाते हैं तथा जो पदवीधारक नहीं हैं वे सर्व मुनि साधुसंज्ञाके धारक जानना.
यहाँ ऐसा नियम नहीं है कि - पंचाचारोंसे आचार्यपद होता है, पठन-पाठनसे उपाध्यायपद होता है, मूलगुणोंके साधनेसे साधुपद होता है। क्तयोंकि ये क्रियाएँ तो सर्व मुनियोंके साधारण हैं, परन्तु शब्दनयसे उनका अक्षरार्थ वैसे किया जाता है. समभिरूढ़नय से पदवीकी अपेक्षा ही आचार्यादिक नाम जानना. जिसप्रकार शब्दनयसे जो गमन करे उसे गाय कहते हैं, सो गमन तो मनुष्यादिक भी करते हैं। परन्तु समभिरूढ़नयसे पर्याय-अपेक्षा नाम है. उसही प्रकार यहाँ समझना.
यहाँ सिद्धोंसे पहले अरहंतोंको नमस्कार किया सो क्तया कारण? ऐसा संदेह उत्पन्न होता है. उसका समाधान यह है :- नमस्कार करते हैं सो अपना प्रयोजन सधनेकी अपेक्षा से करते हैं। सो अरहंतोंसे उपदेशादिकका प्रयोजन विशेष सिद्ध होता है, इसलिये पहले नमस्कार किया है.
इसप्रकारअरहंतादिककास्वरूपचिंतवनकिया,क्तयोंकिस्वरूपचिंतवन
करनेसे विशेष कार्यसिद्धि होती है. पुनश्च, इन अरहंतादिकको पँचपरमेष्टी कहते हैं। क्तयोंकि जो सर्वोत्कृष्ट इष्ट हो उसका नाम परमेष्ट है. पंच जो परमेष्ट उनका समाहार-समुदाय उसका नाम पँचपरमेष्टी जानना.
पुनश्च - ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपाश्र्व, चन्द्रप्रभ, पुष्पदंत, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, शांति, कुन्थु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पाश्र्व, वर्द्धमान नामके धारक चौबीस तिर्थंकर इस भरतक्षेत्रमें वर्तमान धर्मतीर्थके नायक हुए हैं। गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण कल्याणकोंमें इन्द्रादिकों द्वारा विशेष पूज्य होकर अब सिद्धालयमें विराजमान हैं। उन्हें हमारा नमस्कार हो.
पुनश्च - सिमंधर, युगमंधर, बाहु, सुबाहु, संजातक, स्वयंप्रभ, वृषभानन, अनंतवीर्य, सूरप्रभ, विशालकीर्ति, वज्रधर, चन्द्रानन, चन्द्रबाहु, भुजंगम, इरश्वर, नेमिप्रभ, वीरसेन, महाभद्र, देवयश, अजितवीर्य नामके धारक बीस तीर्थंकर पंचमेरू सम्बन्धी विदेहक्षेत्रोंमें वर्तमानमें केवलज्ञान सहित विराजमान हैं। उन्हें हमारा नमस्कार हो.
यद्यपिपरमेष्िटपदमेंइनकागर्भितपनाहैतथापिविद्यमानकालमेंइनकी
विशेषता जानकर अलग नमस्कार किया है.
पुनश्च, त्रिलोकमें जो अकृत्रिम जिनबिम्ब विराजमान हैं, मध्यलोकमें विधिपूर्वक कृत्रिम जिनबिम्ब विराजमान हैं। जिनके दर्शनादिकसे एक धर्मोपदेशके बिना अन्य अपने हितकी सिद्धि जैसे तीर्थंकर-केवली दर्शनादिकसे होती है। वैसे ही होती है। उन जिनबिम्बों को हमारा नमस्कार हो.
पुनश्च, केवलीकी दिव्यध्वनि द्वारा दिये गये उपदेशके अनुसार गणधर द्वारा रचे गये अंग-प्रकीर्णक, उनके अनुसार अन्य आचार्यादिकों द्वारा रचे गये ग्रंथादिक - ऐसे ये सब जिनवचन हैं। स्याद्वाद चिî द्वारा पहिचानने योग्य हैं, न्यायमार्गसे अविरुद्ध हैं, इसलिये प्रामाणिक है। जीवको तत्त्ववज्ञानका कारण हैं, इसलिये उपकारी हैं। उन्हें हमारा नमस्कार हो.
पुनश्च-चैत्यालय,आर्यिका,उत्कृष्टश्रावकआदिद्रव्य।तीर्थक्षेत्रादिक्षेत्र। कल्याणककाल आदि काल तथा रत्नत्रय आदि भाव। जो मेरे द्वारा नमस्कार करने योग्य हैं, उन्हें नमस्कार करता हूँ तथा जो किंचित् विनय करने योग्य हैं उनकी यथायोग्य विनय करता हूँ.
इसप्रकार अपने इष्टोंका सन्मान करके मंगल किया है.
अब वे अरहंतादिक इष्ट कैसे हैं सो विचार करते हैं :- जिसके द्वारा सुख
उत्पन्न हो तथा दु:खका विनाश हो उस कार्यका नाम प्रयोजन है। और जिसके द्वारा उस प्रयोजन की सिद्धि हो वही अपना इष्ट है. सो हमारे इस अवसरमें वीतराग-विशेषज्ञानका होना वही प्रयोजन है, क्तयोंकि उसके द्वारा निराकुल सच्चे सुखकी प्राप्ति होती है और सर्व आकुलतारूप दु:खका नाश होता है. अरहंतादिकसे प्रयोजनसिद्धि
पुनश्च, इस प्रयोजनकी सिद्धि अरहंतादिक द्वारा होती है. किस प्रकार? सो विचारते हैं :-
आत्माकेपरिणामतीनप्रकारकेहैं-संक्तलेश,विशुद्धऔरशुद्ध.वहाँतीव्र कषायरूप संक्तलेश है, मंद कषायरूप विशुद्ध हैं, तथा कषायरहित शुद्ध हैं. वहाँ वीतराग- विशेषज्ञानरूप अपने स्वभावके घातक जो ज्ञानावरणादि घातिया कर्म हैं। उनका संक्तलेश परिणामों द्वारा तो तीव्र बन्ध होता है, और विशुद्ध परिणामों द्वारा मंद-बन्ध होता है, तथा विशुुद्ध परिणाम प्रबल हों तो पूर्वकालमें जो तीव्र बंध हुआ था उसको भी मंद करता है. शुद्ध परिणामों द्वारा बंध नही होता, केवल उनकी निर्जरा ही होती है. अरहंतादिके प्रति स्तवनादिरूप जो भाव होते हैं, वे कषायोंकी मंदता सहित ही होते हैं, इसलिये वे विशुद्ध परिणाम हैं. पुनश्च, समस्त कषाय मिटानेका साधन हंै, इसलिये शुद्ध परिणामका कारण हैं। सोऐसे परिणामोंसे अपने घातक घातिकर्मकी हीनता होनेसे सहज ही वीतराग-विशेषज्ञान प्रगट होता है. जितने अंशोंमें वह हीन हो उतने अंशोंमें यह प्रगट होता है. -इस प्रकार अरहंतादिक द्वारा अपना प्रयोजन सिद्ध होता है.
अथवा अरहंतादिके आकारका अवलोकन करना या स्वरूप विचार करना या वचन सुनना या निकटवर्ती होना या उनके अनुसार प्रवर्तन करना - इत्यादि कार्य तत्काल ही निमित्तभूत होकर रागादिकको हीन करते हैं, जीव-अजीवादिकके विशेष ज्ञानको उत्पन्न करते हैं. - इसलिये ऐसे भी अरहंतादिक द्वारा वीतराग-विशेषज्ञानरूप प्रयोजन की सिद्धि होती है.
यहाँ कोइर कहे कि इनके द्वारा ऐसे प्रयोजनकी तो सिद्धि इस प्रकार होती है, परन्तु जिससे इन्द्रियजनित सुख उत्पन्न हो तथा दु:खका विनाश हो - ऐसे भी प्रयोजन की सिद्धि इनके द्वारा होती है या नहीं? उसका समाधान :-
जो अरहंतादिके प्रति स्तवनादिरूप विशुद्ध परिणाम होते हैं उनसे अघातिया कर्मों की साता आदि पुण्यप्रकृतियों का बन्ध होता है। और यदि वे परिणाम तीव्र हों तो पूर्वकाल में जो असाता आदि पापप्रकृतियोंका बन्ध हुआ था उन्हें भी मन्द करता है अथवा नष्ट करके पुण्यप्रकृतिरूप परिणमित करता है। और उस पुण्यका उदय होने पर स्वयमेव इन्द्रियसुखकी कारणभूत सामग्री प्राप्त होती है तथा पापका उदय दूर होने पर स्वयमेव दु:खकी कारणभूत सामग्री दूर हो जाती है. - इस प्रकार इस प्रयोजनकी भी सिद्धि उनके द्वारा होती है. अथवा जिनशासनके भक्त देवादिक हैं वे उस भक्त पुरुषको अनेक इन्द्रियसुख की कारणभूत सामग्रियोंका संयोग कराते हैं और दु:खकी कारणभूत सामग्रियोंको दूर करते हैं. - इस प्रकार भी इस प्रयोजनकी सिद्धि उन अरहंतादिक द्वारा होती है. परन्तुइस प्रयोजन से कुछ भी अपना हित नही होता।क्तयोंकि यह आत्मा कषायभावोंसे बाह्य सामग्रियों में इष्टअनिष्टपना मानकर स्वयं ही सुख-दु:खकी कल्पना करता है. कषाय के बिना बाह्य सामग्री कुछ सुख- दु:खकी दाता नहीं है. तथा कषाय है सो सर्व आकुलतामय है, इसलिये इन्द्रियजनित सुखकी इच्छा करना और दु:खसे डरना यह भ्रम है.
पुनश्च, इस प्रयोजनके हेतु अरहंतादिक की भक्ति करनेसे भी तीव्र कषाय होनेके कारण पाप बंध ही होता है, इसलिये अपनेको इस प्रयोजन का अर्थी होना योग्य नहीं है. अरहंतादिक की भक्ति करनेसे ऐसे प्रयोजन तो स्वयमेव ही सिद्ध होते हैं.
इसप्रकार अरहंतादिक परम इष्ट माानने योग्य हैं.
तथा वे अरहंतादिक ही परम मंगल हैं. उनमंे भक्तिभाव होनेसे परम मंगल होता है. ‘मंग’ अर्थात् सुख, उसे ‘लाति’ अर्थात् देता है। अथवा ‘मं’ अर्थात् पाप उसे,‘गालयति’ अर्थात् गाले, दूर करे उसका नाम मंगल है . इस प्रकार उनके द्वारा पूर्वोक्त प्रकार से दोनों कार्योंकी सिद्धि होती है, इसलिये उनके परम मंगलपना संभव है . मंगलाचरण करने का कारण
यहाँ कोइर पूछे कि - प्रथम ग्रंथके आदिमें मंगल ही किया सो क्तया कारण है? उसका उत्तर :- सुख से ग्रंथकी समाप्ति हो, पापके कारण कोइर विध्न न हो, इसलिये यहाँ प्रथम मंगल किया है.
यहाँ तर्क - जो अन्यमती इसप्रकार मंगल नहीं करते हैं उनके भी ग्रन्थकी समाप्ति तथा विध्नका न होना देखते हैं वहाँ क्तया हेतु है? उसका समाधान :- अन्यमती जो ग्रन्थ करते हैं उनमें मोहके तीव्र उदयसे मिथ्यात्व-कषायभावोंका पोषण करनेवाले विपरीत अर्थों को धरते(रखते)हैं, इसलिये उनकी निर्विध्न समाप्ति तो ऐसे मंगल किये बिना ही हो. यदि ऐसे मंगलोंसे मोह मंद हो जाये तो वैसा विपरीत कार्य कैसे बने? तथा हम भी ग्रंथ करते हैंउसमें मोहकी मंदताके कारण वीतराग तत्त्ववज्ञानका पोषण करनेवाले अर्थोंको धरेंगे (रखेंगे)। उसकी निर्विध्न समाप्ति ऐसे मंगल करनेसे ही हो. यदि ऐसे मंगल न करें तो मोह की तीव्रता रहे, तब ऐसा उत्तम कार्य कैसे बने?
पुनश्च, वह कहता है कि - ऐसे तो मानेंगे। परन्तु कोइर ऐसा मंगल नहीं करता उसके भी सुख दिखाइर देता है, पापका उदय नहीं दिखाइर देता और कोइर ऐसा मंगल करता है उसके भी सुख नहीं दिखाइर देता, पापका उदय दिखाइर देता है - इसलिये पूर्वोक्त मंगलपना कैसे बने? उससे कहते हैं :-
जीवोंके संक्तलेश-विशुद्ध परिणाम अनेक जातिके हैं. उनके द्वारा अनेक कालोंमें पहले बँधे हुए कर्म एक काल में उदय आते हैं. इसलिये जिसप्रकार जिसके पूर्वमें बहुत धनका संचय हो उसके बिना कमाए भी धन दिखायी देता है और ऋण दिखायी नहीं देता, तथा जिसके पूर्वमें ऋण बहुतहो उसके धन कमाने पर भी ऋण दिखायी देता है धन दिखायी नहीं देता। परन्तु विचार करनेसे कमाना तो धनहीका कारण है, ऋणका कारण नहीं है. उसी प्रकार जिसके पूर्व में बहुत पुण्य का बंध हुआ हो उसके यहाँ ऐसा मंगल किये बिना भी सुख दिखायी देता है, पापका उदय दिखायी नहीं देता. और जिसके पूर्वमें बहुत पापबंध हुआ हो उसके यहाँ ऐसा मंगल करने पर भी सुख दिखायी नहीं देता, पाप का उदय दिखायी देता है। परन्तु विचार करनेसे ऐसा मंगल तो सुखहीका कारण है, पाप उदयका कारण नहीं है. - इस प्रकार पूर्वोक्त मंगलका मंगलपना बनता है.
पुनश्च, वह कहता है कि - यह भी माना। परन्तु जिनशासनके भक्त देवादिक हैं उन्होनें उस मंगल करनेवालेकी सहायता नहीं की और मंगल न करनेवालेको दण्ड नहीं दिया सो क्तया कारण? उसका समाधान :- जीवों को सुख-दु:ख होनेका प्रबल कारण अपना कर्मका उदय है, उसहीके अनुसार बाह्य निमित्त बनते हैं, इसलिये जिसके पापका उदय हो उसको सहायका निमित्त नहीं बनता और जिसके पुण्यका उदय हो उसको दण्डका निमित्त नहीं बनता.
यह निमित्त कैसे नहीं बनता सो कहते हैं :- जो देवादिक हैं वे क्षयोपशमज्ञानसे सबको युगपत् नहीं जान सकते . इसलिये मंगल करनेवाले और नहीं करनेवाले का जानपना किसी देवादिकको किसी कालमें होता है. इसलिये यदि उनका जानपना न हो तो कैसे सहाय करें अथवा दण्ड दें? और जानपनाहो, तब स्वयंको जो अतिमंदकषायहोतो सहाय करनेके या दण्ड देनेके परिणाम ही नहीं होते, तथा तीव्रकषाय हो तो धर्मानुराग नहीं हो सकता, तथा मध्यमकषायरूप वह कार्य करनेके परिणाम हुए और अपनी शक्ति न हो तो क्तया करंे? - इस प्रकार सहाय करनेका या दण्ड देने का निमित्त नहीं बनता .
यदि अपनी शक्ति हो और अपनेको धर्मानुरागरूप मध्यमकषाय का उदय होनेसे वैसे ही परिणाम हों, तथा उस समय अन्य जीवका धर्म-अधर्मरूप कर्त्तव्य जानें, तब कोइर देवादिक किसी धर्मात्मा की सहाय करते हैं अथवा किसी अधर्मीको दण्ड देते हैं. - इस प्रकार कार्य होनेका कुछ नियम तो है नहीं - ऐसे समाधान किया .
यहाँ इतना जानना कि सुख होनेकी, दु:ख न होनेकी, सहाय कराने की, दु:ख दिलाने की जो इच्छा है सो कषायमय है। तत्काल तथा आगामी कालमें दु:खदायक है. इसलिये ऐसी इच्छा को छोड़कर हमने तो एक वीतराग-विषेशज्ञान होने के अर्थी होकर अरहंतादिकको नमस्कारादिरूप मंगल किया है. ग्रंथकी प्रामाणिकता और आगम-परम्परा
इस प्रकार मंगलाचरण करके अब सार्थक—मोक्षमार्गप्रकाशर्कनामके ग्रंथका उद्योत करते हैं. वहाँ, ‘यह ग्रंथ प्रमाण है’ - ऐसी प्रतीति कराने के हेतु पूर्व अनुसारका स्वरूप निरूपण करते हैं :-
अकारादि अक्षर हैं वे अनादि-निधन हैं, किसीके किये हुए नहीं है. इनका आकार लिखना तो अपनी इच्छा के अनुसार अनेक प्रकार है, परन्तु जो अक्षर बोलनेमें आते हैं वे तो सर्वत्र सर्वदा ऐसे प्रवर्तते हैं . इसलिये कहा है कि - ‘सिद्धो वर्णसमाम्नाय:.’ इसका अर्थ यह है कि - जो अक्षरोंका सम्प्रदाय है सो स्वयंसिद्ध है, तथा उन अक्षरोंसे उत्पन्न सत्यार्थके प्रकाशक पद उनके समूहका नाम श्रुत है, सो भी अनादि-निधन है. जैसे - ‘जीव’ ऐसा अनादि-निधन पद है सो जीवको बतलाने वाला है. इस प्रकार अपने-अपने सत्य अर्थके प्रकाशक अनेक पद उनका जो समुदाय सो श्रुत जानना. पुनश्च, जिसप्रकार मोती तो स्वयंसिद्ध है, उनमेंसे कोइर थोडे़ मोतियोंको, कोइर बहुत मोतियोंको, कोइर किसी प्रकार, कोइर किसी प्रकार गूँथकर गहना बनाते हैं। उसी प्रकार पद तो स्वयंसिद्ध हैं, उनमें से कोइर थोडे़ पदोंको, कोइर बहुत पदोंको, कोइर किसी प्रकार, कोइर किसी प्रकार गूँथकर ग्रंथ बनाते हैं. यहाँ मैं भी उन सत्यार्थपदोंको मेरी बुद्धि अनुसार गुँथकर ग्रंथ बनाता हूँ। मेरी मतिसे कल्पित झूठे अर्थके सूचक पद इसमें नहीं गूँथता हूँ. इसलिये यह ग्रँथ प्रमाण जानना.
प्रश्न :-उन पदों की परम्परा इस ग्रंथपर्यन्त किस प्रकार प्रवर्तमान है?
सामाधान :-अनादिसे तीर्थंकर केवली होते आये हैं, उनको सर्वका ज्ञान होता है। इसलिये उन पदोंका तथा उनके अर्थोंका भी ज्ञान होता है. पुनश्च, उन तीर्थंकर केवलियों का दिव्यध्वनि द्वारा ऐसा उपदेश होता है जिससे अन्य जीवोंको पदोंका एवं अर्थोंका ज्ञान होता है। उसके अनुसाार गणधरदेव अंगप्रकीर्णरूप ग्रंथ गूँथते हैं तथा उनके अनुसार अन्य- अन्य आचार्यादिक नानाप्रकार ग्रंथादिककी रचना करते हैं. उनका कोइर अभ्यास करते हैं, कोइर उनको कहते हैं, कोइर सुनते हैं.- इस प्रकार परम्परामार्ग चला आता है.
अब इस भरतक्षेत्रमें वर्तमान अवसर्पिणी काल है. उसमें चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें श्री वर्धमान नामक अंतिम तीर्थंकरदेव हुए. उन्होंने केवलज्ञान विराजमान होकर जीवोंको दिव्यध्वनि द्वारा उपदेश दिया. उसको सुननेका निमित्त पाकर गौतम नामक गणधरने अगम्य अर्थोंको भी जानकर धर्मानुरागवश अंगप्रकीर्णकोंकी रचना की. फिर वर्धमानस्वामी तो मुक्त हुए. वहाँ पीछे इस पंचमकालमें तीन केवली हुए -(१)गौतम,(२)सुधर्माचार्य और(३) जम्बूस्वामी . तत्प¬ात् कालदोषसे केवलज्ञानी होने का तो अभाव हुआ, परन्तु कुछ काल तक द्वादशांगके पाठी श्रुतकेवली रहे और फिर उनका भी अभाव हुआ. फिर कुछ काल तक थोडे़ अंगों के पाठी रहे फिर पीछे उनका भी अभाव हुआ. तब आचार्यादिकों द्वारा उनके अनुसार बनाए गये ग्रंथ तथा अनुसारी ग्रंथोंके अनुसार बनाए गये ग्रंथ उनकी ही प्रवृत्ति रही. उनमें भी कालदोषसे दुष्टों द्वारा कितने ही ग्रंथोंकी व्युच्छित्ति हुइर तथा महान ग्रंथोंका अभ्यासादि न होनेसे व्युच्छित्ति हुइर. तथा कितने ही महान ग्रंथ पाये जाते हैं, उनका बुद्धिकी मन्दताके कारण अभ्यास होता नहीं. जैसे कि - दक्षिणमें गोम्मटस्वामीके निकट मूड़बिद्री नगरमें धवल, महाधवल, जयधवल पाये जाते हैं परन्तु दर्शनमात्र ही हैं. तथा कितने ही ग्रंथ अपनी बुद्धि द्वारा अभ्यास करने योग्य पाये जाते हैं, उनमें भी कुछ ग्रंथों का ही अभ्यास बनता है. ऐसे इस निकृष्ट कालमें उत्कृष्ट जैनमतका घटना तो हुआ, परन्तु इस परम्परा द्वारा अब भी जैन शास्त्रोंमें सत्य अर्थ का प्रकाशन करने वाले पदोंका सद्भाव प्रवर्तमान है. अपनी बात
हमने इस कालमें यहाँ अब मनुष्यपर्याय प्राप्त की. इसमें हमारे पूर्वसंस्कारसे व भले होनहारसे जैनशास्त्रोंके अभ्यास करने का उद्यम हुआ जिससे व्याकरण, न्याय, गणित आदि उपयोगी ग्रंथोंका किंचित् अभ्यास करके टीकासहित समयसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, नियमसार, गोम्मटसार, लब्धिसार, त्रिलोकसार, तत्वार्थसूत्र इत्यादि शास्त्र और क्षपणासार, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, अष्टपाहुड, आत्मानुशासन आदि शास्त्र और श्रावक-मुनिके आचारके प्ररूपक अनेक शास्त्र और सुष्ठुकथासहित पुराणादि शास्त्र - इत्यादि अनेक शास्त्र हैं, उनमें हमारे बुद्धि अनुसार अभ्यास वर्तता है। उससे हमें भी किंचित् सत्यार्थपदोंका ज्ञान हुआ है.
पुनश्च, इस निकृष्ट समयमें हम जैसे मंदबुद्धियों से भी हीन बुद्धिके धनी बहुत जन दिखायी देते हैं. उन्हें उन पदोंका अर्थज्ञान हो, इस हेतु धर्मानुरागवश देशभाषामय ग्रंथ रचनेकी हमें इच्छा हुई है, इसलिये हम यह ग्रंथ बना रहें है. इसमें भी अर्थसहित उन्हीं पदोंका प्रकाशन होता है. इतना तो विशेष है कि - जिस प्रकार प्राकृत-संस्कृत शास्त्रोंमें प्राकृत-संस्कृत पद लिखे जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ अपभ्रंशसहित अथवा यथार्थतासहित देशभाषारूप पद लिखते हैं। परन्तु अर्थमें व्यभिचार कुछ नहीं है.
इस प्रकार इस ग्रंथपर्यन्त उन सत्यार्थपदों की परम्परा प्रवर्तती है. असत्यपद रचना प्रतिषेध
यहाँ कोई पूछता है कि - परम्परा तो हमने इस प्रकार जानी। परन्तु इस परम्परा में सत्यार्थपदोंकी ही रचना होती आयी, असत्यार्थपद नहीं मिले, - ऐसी प्रतीति हमें कैसे हो? उसका समाधान :- असत्यार्थपदों की रचना अति तीव्र कषाय हुए बिना नहीं बनती। क्तयोंकि जिस असत्यरचना से परम्परा अनेक जीवों का महा बुरा हो और स्वयं को ऐसी महाहिंसा के फलरूप नरक-निगोदमें गमन करना पडे़ - ऐसा महाविपरीत कार्य तो कक्रोध, मान, माया, लोभ अत्यन्त तीव्र होने पर ही होता है। किन्तु जैन धर्म में तो ऐसा कषायवान होता नहीं है.
प्रथममूलउपदेशदातातोतीर्थंकरकेवली,सोतोसर्वथामोहकेनाशसे सर्वकषायोंसे रहित ही हैं. फिर ग्रंथकर्त्ता गणधर तथा आचार्य, वे मोहके मंद उदयसे सर्व बाह्याभ्यंतर परिग्रहको त्यागकर महामंदकषायी हुए हैं। उनके उस मंदकषायके कारण किंचित् शुभोपयोग ही की प्रवृत्ति पायी जाती है और कुछ प्रयोजन ही नहीं है. तथा श्रद्धानी गृहस्थ भी कोई ग्रंथ बनाते हैं वे भी तीव्रकषायी नहीं होते. यदि उनके तीव्र कषाय हो तो सर्व कषायोंका जिस-तिस प्रकारसे नाश करनेवाला जो जिनधर्म उसमें रुचि कैसे होती? अथवा जो कोई मोहके उदयसे अन्य कार्यों द्वारा कषायका पोषण करता है तो करो। परन्तु जिन- आज्ञा भंग करके अपनी कषायका पोषण करे तो जैनीपना नहीं रहता.
इस प्रकार जिनधर्ममें ऐसा तीव्रकषायी कोई नहीं होता जो असत्य पदों की रचना करके परका और अपना पर्याय-पर्यायमें बुरा करे .
प्रश्न :-यदि कोई जैनाभास तीव्रकषायी होकर असत्यार्थ पदोंको जैन-शास्त्रों में मिलाये और फिर उसकी परम्परा चलती रहे तो क्तया किया जाय?
समाधान :-जैसे कोई सच्चे मोतियोंके गहनेमें झूठे मोती मिला दे, परन्तु झलक नहीं मिलती। इसलिये परीक्षा करके पारखी ठगाता भी नहीं है, कोई भोला हो वही मोती के नाम से ठगा जाता है। तथा उसकी परम्परा भी नहीं चलती, शीघ्र ही कोई झूठे मोतियों का निषेध करता है. उसी प्रकार कोई सत्यार्थ पदों के समूहरूप जैनशास्त्र में असत्यार्थ पद मिलाये। परन्तु जैन शास्त्रोंके पदोंमें तो कषाय मिटानेका तथा लौकिक कार्य घटाने का प्रयोजन है, और उस पापी ने जो असत्यार्थ पद मिलाये हैं, उनमें कषाय का पोषण करनेकातथालौकिक-कार्यसाधनेकाप्रयोजनहै,इसप्रकारप्रयोजननहींमिलता। इसलिये परीक्षा करके ज्ञानी ठगाता भी नहीं, कोई मूर्ख हो वही जैन शास्त्रके नाम से ठगा जाता है, तथा उसकी परम्परा भी नहीं चलती, शीघ्र ही कोई उन असत्यार्थ पदों का निषेध करता है .
दूसरी बात यह है कि - ऐसे तीव्रकषायी जैनाभास यहाँ इस निकृष्ट कालमें ही होते हैं। उत्कृष्ट क्षेत्र-काल बहुत हैं, उनमें तो ऐसे होते नहीं. इसलिये जैन शास्त्रोंमें असत्यार्थ पदों की परम्परा नहीं चलती. - ऐसा निश्चय करना . पुनश्च, वह कहे कि - कषायोंसे तो असत्यार्थ पद न मिलाये, परन्तु ग्रंथ करनेवालों को क्षयोपशम ज्ञान है, इसलिये कोई अन्यथा अर्थ भासित हो उससे असत्यार्थ पद मिलाये, उसकी तो परम्परा चले?
समाधान :-मूल ग्रंथकर्त्ता तो गणधरदेव हैं, वे स्वयं चार ज्ञान के धारक हैं और साक्षात् केवलीका दिव्यध्वनि- उपदेश सुनते हैं, उसके अतिशयसे सत्यार्थ ही भासित होता है और उसहीके अनुसार ग्रंथ बनाते हैं। इसलिये उन ग्रंथोंमें तो असत्यार्थ पद कैसे गूँथे जायें? तथा जो अन्य आचार्यादिक ग्रंथ बनाते हैं, वे भी यथायोग्य सम्यग्ज्ञानके धारक हैं और वे मूल ग्रंथों की परम्परासे ग्रंथ बनाते हैं. दूसरी बात यह है कि - जिन पदोंका स्वयं को ज्ञान न हो उनकी तो वे रचना करते नहीं, और जिन पदों का ज्ञान हो उन्हें सम्यग्ज्ञान प्रमाणसे ठीक गूँथते हैं. इसलिये प्रथम तो ऐसी सावधानीमें असत्यार्थ पद गूँथे जाते नहीं, और कदाचित् स्वयं को पूर्व ग्रंथों के पदों का अर्थ अन्यथा ही भासित हो, तथा अपनी प्रमाणता में भी उसी प्रकार आ जाये तो उसका कुछ सारा(वश)नहीं है। परन्तु ऐसा किसी को ही भासित होता है सब ही को तो नहीं, इसलिये जिन्हें सत्यार्थ भासित हुआ हो वे उसका निषेध करके परम्परा नहीं चलने देते.
पुनश्च, इतना जानना कि - जिनको अन्यथा जाननेसे जीवका बुरा हो ऐसे देव- गुरु-धर्मादिक तथा जीव-अजीवादिक तत्त्ववोंको तो श्रद्धानी जैनी अन्यथा जानते ही नहीं। इनका तो जैनशास्त्रोंमें प्रसिद्ध कथन है. और जिनको भ्रमसे अन्यथा जानने पर भी जिन- आज्ञा मानने से जीवका बुरा न हो, ऐसे कोई सूक्ष्म अर्थ हैं। उनमें से किसी को कोई अन्यथा प्रमाणतामें लाये तो भी उसका विशेष दोष नहीं है.
वही गोम्मटसार में कहा है :-
सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु स¶हदि .
स¶हदि असब्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा ..(गाथा २७ जीवकाण्ड)
अर्थ :-सम्यग्¹ष्िट जीव उपदेशित सत्य वचनका श्रद्धान करता है और अजानमान गुरुके नियोगसे असत्यका भी श्रद्धान करता है - ऐसा कहा है.
पुनश्च, हमें भी विशेष ज्ञान नहीं है और जिन आज्ञा भंग करनेका बहुत भय है, परन्तु इसी विचारके बलसे ग्रंथ करने का साहस करते हैं. इसलिये इस ग्रंथ में जैसा पूर्व ग्रंथोंमें वर्णन है वैसा ही वर्णन करेंगे. अथवा कहीं पूर्व ग्रंथोंमें सामान्य गूढ वर्णन था, उसका विशेष प्रगट करके वर्णन यहाँ करेंगे. सो इसप्रकार वर्णन करने में मैं तो बहुत सावधानी रखूँगा. साावधानी करने पर भी कहीं सूक्ष्म अर्थका अन्यथा वर्णन हो जाये तो विशेष बुद्धिमान हों, वे उसे सँवार कर शुद्ध करें - ऐसी मेरी प्रार्थना है.
इसप्रकार शास्त्र करने का निश्चय किया है.
अब यहाँ, कैसे शास्त्र वांचने - सुनने योग्य हैं तथा उन शास्त्रों के वक्ता-श्रोता कैसे होने चाहिये उसका वर्णन करते हैं. वाँचने-सुनने योग्य शास्त्र
जो शास्त्र मोक्षमार्गका प्रकाश करंे वही शास्त्र वांचने-सुनने योग्य हैं। क्तयोंकि जीव संसार में नाना दु:खों से पीडि़त है. यदि शास्त्ररूपी दीपक द्वारा मोक्षमार्गको प्राप्त कर लें तो उस मार्ग में स्वयं गमन कर उन दु:खों से मुक्तत हों. सो मोक्षमार्ग एक वीतराग भाव है। इसलिये जिनशास्त्रों में किसी प्रकार राग-द्वेष-मोहभावोंका निषेध करके वीतराग भाव का प्रयोजन प्रगट किया हो उन्हीं शास्त्रों का वांँचना-सुनना उचित है. तथा जिन शास्त्रों में श्रुंगार-भोग-कुतूहलादिकका पोषण करके रागभावका। हिंसा-युद्धादिकका पोषण करके द्वेषभावका। और अतत्त्ववश्रद्धानका पोषण करके मोहभाव का प्रयोजन प्रगट किया हो वे शास्त्र नहीं शस्त्र हैं। क्तयों कि जिन राग-द्वेष-मोह भावों से जीव अनादि से दु:खी हुआ उनकी वासना जीव को बिना सिखलाये ही थी और इन शास्त्रों द्वारा उन्हीं का पोषण किया, भला होने की क्तया शिक्षा दी? जीव का स्वभाव घात ही किया. इसलिये ऐसे शास्त्रों का वंाचना-सुनना उचित नहीं है.
यहाँ वंाचना -सुनना जिस प्रकार कहा। उस प्रकार जोड़ना, सीखना, सिखाना, विचारना, लिखाना आदि कार्य भी उपलक्षण से जान लेना.
इसप्रकार जो साक्षात् अथवा परम्परा से वीतरागभाव का पोषण करे - ऐसे शास्त्र ही का अभ्यास करने योग्य है. वक्ता का स्वरूप
अब इनके वक्ता का स्वरूप कहते हैं :- प्रथम तो वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो जैन श्रद्धान में ¹ढ़ हो। क्तयोंकि यदि स्वयं अश्रद्धानी हो तो औरों को श्रद्धानी कैसे करे? श्रोता तो स्वयं ही से हीनबुद्धि के धारक हैं, उन्हें किसी युक्ति द्वारा श्रद्धानी कैसे करे? और श्रद्धान ही सर्व धर्मका मूल है.पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसे विद्याभ्यास करने से शास्त्र वंाचने योग्य बुद्धि प्रगट हुई हो। क्तयोंकि ऐसी शक्तित के बिना वक्तापने का अधिकारी कैसे हो? पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो सम्यग्ज्ञान द्वारा सर्व प्रकार के व्यवहार- निश्चयादिरूप व्याख्यानका अभिप्राय पहिचानता हो। क्तयोंकि यदि ऐसा न हो तो कहीं अन्य प्रयोजनसहित व्याख्यान हो उसका अन्य प्रयोजन प्रगट करके विपरीत प्रवृत्ति कराये. पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसे जिनआज्ञा भंग करनेका भय बहुत हो। क्तयोंकि ऐसा नहीं हो तो कोई अभिप्राय विचार कर सूत्रविरूद्ध उपदेश देकर जीवोंका बुरा करे. सो ही कहा है :-
बहु गुणविज्जाणिलयो असुत्तभासी तहावि मुत्तव्वो .
जह वरमणिजुत्तो वि हु विग्घयरो विसहरो लोए ..
अर्थ:- जो अनेक क्षमादिक गुण तथा व्याकरणादि विद्या का स्थान है, तथापि उत्सूत्रभाषी है तो छोड़नेयोग्य ही है जैसे कि - उत्कृष्ट मणिसंयुक्त होने पर भी सर्प है सो लोकमें विध्न ही का करनेवाला है.
पुनश्च,वक्ताकैसाहोनाचाहियेकिजिसकोशास्त्रवंाचकरआजीविकाआदि लौकिक-कार्य साधने की इच्छा न हो। क्तयोंकि यदि आशावान हो तो यथार्थ उपदेश नहीं दे सकता, उसे तो कुछ श्रोताओं के अभिप्राय के अनुसार व्याख्यान करके अपना प्रयोजन साधने का ही साधन रहे. तथा श्रोताओं से वक्ता का पद उच्च है। परन्तु यदि वक्ता लोभी हो तो वक्ता स्वयं हीन हो जाये और श्रोता उच्च हो .
पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसके तीव्र क्रोध-मान नहीं हो। क्तयोंकि तीव्र क्रोधी-मानी की निन्दा होगी, श्रोता उससे डरते रहेंगे, तब उससे अपना हित कैसे करेंगे? पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो स्वयं ही नाना प्रश्न उठाकर स्वयं ही उत्तर दे। अथवा अन्य जीव अनेक प्रकार से बहुत बार प्रश्न करें तो मिष्ट वचन द्वारा जिस प्रकार उनका संदेह दूर हो उसी प्रकार समाधान करे . यदि स्वयं में उत्तर देने की सामथ्र्य न हो तो ऐसा कहे कि इसका मुझे ज्ञान नहीं है। क्तयोंकि यदि ऐसा न हो तो श्रोताओंका संदेह दूर नहीं होगा, तब कल्याण कैसे होगा? और जिनमत की प्रभावना भी नहीं हो सकती .
पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसके अनीतिरूप लोकनिंद्य कार्योंकी प्रवृत्ति न हो। क्तयोंकि लोकनिंद्य कार्यों से वह हास्य का स्थान हो जाये, तब उसका वचन कौन प्रमाण करे? वह जिन धर्म को लजाये . पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसका कुल हीन न हो, अंग हीन न हो, स्वर भंग न हो, मिष्ट वचन हो, प्रभुत्व हो। जिससे लोक में मान्य हो - क्तयोंकि यदि ऐसा न हो तो उसे वक्तापने की महंतता शोभे नहीं- ऐसा वक्ता हो . वक्ता में ये गुण तो आवश्य चाहिये .
ऐसा ही आत्मानुशासन में कहा है :-
प्राज्ञ: प्राप्तसमस्तशाÏñदय: प्रव्यक्तलोकस्थित:,
प्रास्ताश: प्रतिभापर: प्रशमवान् प्रागेव ¹ष्टोत्तर: .
प्राय: प्रश्नसह: प्रभु: परमनोहारी परानिन्दया,
ब्रूयाद्धर्मकथां गणी गुणनिधि: प्रस्पष्टमिष्टाक्षर: ॥५॥
अर्थ :-जो बुद्धिमान हो, जिसने समस्त शास्त्रों का रहस्य प्राप्त किया हो, लोक मर्यादा जिसके प्रगट हुई हो, आशा जिसके अस्त हो गई हो, कंातिमान हो, उपशमी हो, प्रश्न करने से पहले ही जिसने उत्तर देखा हो, बाहुल्यतासे प्रश्नों को सहनेवाला हो, प्रभु हो, परकी तथा पर के द्वारा अपनी निन्दारहितपने से परके मन को हरने वाला हो, गुणनिधान हो, स्पष्ट मिष्ट जिसके वचन हों - ऐसा सभा का नायक धर्मकथा कहे .
पुनश्च, वक्ता का विशेष लक्षण ऐसा है कि यदि उसके व्याकरण-न्यायादिक तथा बडे़-बडे़ जैन शास्त्रों का विशेष ज्ञान हो तो विशेष रूप से उसको वक्तापना शोभित हो . पुनश्च, ऐसा भी हो। परन्तु अध्यात्मरस द्वारा यथार्थ अपने स्वरूप का अनुभव जिसको न हुआ हो वह जिन धर्मका मर्म नहीं जानता, पद्धतिहीसे वक्ता होता है . अध्यात्मरसमय सच्चे जिन धर्मका स्वरूप उसके द्वारा कैसे प्रगट किया जाये? इसलिये आत्मज्ञानी हो तो सच्चा वक्तापना होता है, क्तयोंकि प्रवचनसार में ऐसा कहा है कि - आगमज्ञान, तत्त्ववार्थ-श्रद्धान, संयमभाव - यह तीनों आत्मज्ञान से शून्य कार्यकारी नहीं हैं .
पुनश्च, दोहापाहुड़ में ऐसा कहा है :-
पंडिय पंडिय पंडिय कण छोडि वि तुस कंडिया .
पय अत्थं तुट्ठोसि परमत्थ ण जाणइ मूढोसि ..
अर्थ :-हे पांडे हे पांडे हे पांडे तू कण को छोड़ कर तुस(भूसी)ही कूट रहा हैैै। तू अर्थ और शब्द में सन्तुष्ट है, परमार्थ नहीं जानता। इसलिये मूर्ख ही है - ऐसा कहा है .
तथा चौदह विद्याओं में भी पहले अध्यात्मविद्या प्रधान कही है . इसलिये जो अध्यात्मरसका रसिया वक्ता है, उसे जिन धर्मके रहस्यका वक्ता जानना . पुनश्च, जो बुद्धि ऋद्धि के धारक हैं तथा अवधि, मन:पर्यय, केवलज्ञानके धनी वक्ता हैं। उन्हें महान वक्ता जानना . - ऐसे वक्ताओं के विशेष गुण जानना .
सो इन विशेष गुणोंके धारी वक्ता का संयोग मिले तो बहुत भला है ही, और न मिले तो श्रद्धानादिक गुणों के धारी वक्ताओं के मुख से ही शास्त्र सुनना . इस प्रकार के गुणों के धारक मुनि अथवा श्रावक उनके मुख से तो शास्त्र सुनना योग्य है, और पद्धति बुद्धि से अथवा शास्त्र सुननेके लोभ से श्रद्धानादिगुणरहित पापी पुरुषों के मुख से शास्त्र सुनना उचित नहीं है . कहा है कि :-
तं जिणआणपरेण य धम्मो सोयव्व सुगुरुपासम्मि .
अह उचिओ सद्धाओ तस्सुवएसस्स कहगाओ ..
अर्थ:- जो जिन आज्ञा मानने में साावधान है उसे निर्ग्रन्थ सुगुरु ही के निकट धर्म सुनना योग्य है, अथवा उन सुगुरु ही के उपदेश को कहने वाला उचित श्रद्धानी श्रावक उससे धर्म सुनना योग्य है .
ऐसा जो वक्ता धर्मबुद्धि से उपदेशदाता हो वही अपना तथा अन्य जीवों का भला करे . और जो कषायबुद्धि से उपदेश देता है वह अपना तथा अन्य जीवों का बुरा करता है - ऐसा जानना .
इस प्रकार वक्ता का स्वरूप कहा . श्रोता का स्वरूप
अब श्रोता का स्वरूप कहते हैं :- भली होनहार है इसलिये जिस जीवको ऐसा विचार आता है कि मैं कौन हूँ? मेरा क्तया स्वरूप है ? यह चारित्र कैसे बन रहा है? ये मेरे भाव होते हैं उनका क्तया फल लगेगा? जीव दु:खी हो रहा है सो दु:ख दूर होने का क्तया उपाय है? -मुझको इतनी बातोंका निर्णय करके कुछ मेरा हितहो सो करना - ऐसे विचार से उद्यमवन्त हुआ है .पुनश्च, इस कार्य की सिद्धि शास्त्र सुननेसे होती है ऐसा जानकर अति प्रीतिपूर्वक शास्त्र सुनता है। कुछ पूछनाहो सो पूछता है। तथा गुरुओं के कहे अर्थ को अपने अन्तरù में बारम्बार विचारता है और अपने विचार से सत्य अर्थों का निश्चय करके जो कर्तव्य हो उसका उद्यमी होता है-ऐसा तो नवीन श्रोताका स्वरूप जानना.
पुनश्च, जो जैनधर्म के गाढ़ श्रद्धानी हैं तथा नाना शास्त्र सुनने से जिनकी बुद्धि निर्मल हुई है तथा व्यवहार-निश्चयादिका स्वरूप भलीभँाति जानकर जिस अर्थ को सुनते हैं, उसे यथावत् निश्चय जानकर अवधारण करते हैं। तथा जब प्रश्न उठता है तब अति विनयवान होकर प्रश्न करते हैं अथवा परस्पर अनेक प्रश्नोत्तर कर वस्तु का निर्णय करते हैं। शास्त्राभ्यास में अति आसक्त हैं। धर्मबुद्धि से निंद्य कार्यों के त्यागी हुए हैं - ऐसे उन शास्त्रों के श्रोता होना चाहिए .
श्रोताओं के विशेष लक्षण ऐसे हंै - यदि उसे कुछ व्याकरण-न्यायादिक का तथा बडे़ जैन शास्त्रों का ज्ञान हो तो श्रोतापना विशेष शोभा देता है . तथा ऐसा भी श्रोता हो, किन्तु उसे आत्मज्ञान न हुआ हो तो उपदेश का मर्म नहीं समझ सके। इसलिये जो आत्मज्ञान द्वारा स्वरूप का आस्वादि हुआ है, वह जिन धर्म के रहस्य का श्रोता है. तथा जो अतिशयवन्त बुद्धि से अथवा अवधि-मन:पर्यय से संयुक्त हो तो उसे महान श्रोता जानना . ऐसे श्रोताओं के विशेष गुण हैं . ऐसे जिन शास्त्रों के श्रोता होना चाहिये .
पुनश्च, शास्त्र सुनने से हमारा भला होगा - ऐसी बुद्धि से जो शास्त्र सुनते हैं, परन्तु ज्ञान की मंदता से विशेष समझ नहीं पाते उनको पुण्य बन्ध होता है। विशेष कार्य सिद्ध नहीं होता . तथा जो कुल प्रवृत्ति से अथवा पद्धति बुद्धि से अथवा सहज योग बनने से शास्त्र सुनते हैं, अथवा सुनते तो हैं परन्तु कुछ अवधारण नहीं करते । उनके परिणाम अनुसार कदाचित् पुण्यबन्ध होता है, कदाचित् पापबन्ध होता है . तथा जो मद-मत्सर भाव से शास्त्र सुनते हैं अथवा तर्क करने का ही जिनका अभिप्राय है, तथा जो महंतता के हेतु अथवा किसी लोभादिक प्रयोजन के हेतु से शास्त्र सुनते हैं, तथा जो शास्त्र तो सुनते हैं परन्तु सुहाता नहीं है - ऐसे श्रोताओं को केवल पापबन्ध ही होता है .
ऐसा श्रोताओं का स्वरूप जानना . इसी प्रकार यथासंभव सीखना, सिखाना आदि जिनके पाया जाये उनका भी स्वरूप जानना .
इस प्रकार शास्त्र का तथा वक्ता-श्रोता का स्वरूप कहा . सो उचित शाास्त्र को उचित वक्ता होकर वाँचना, उचित श्रोता होकर सुनना योग्य है . मोक्षमार्गप्रकाशक ग्रन्थ की सार्थकता
अब, यह मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र रचते हैं उसकी सार्थकता दिखाते हैं :-
इस संसार अटवी में समस्त जीव हैं वे कर्म निमित्त से उत्पन्न जो नाना प्रकार के दु:ख उनसे पीडि़त हो रहे हैं। तथा वहाँ मिथ्या-अंधकार व्याप्त हो रहा है, उस कारण वहाँ से मुक्त होने का मार्ग नहीं पाते, तड़प-तड़प कर वहाँ ही दु:ख को सहते हैं .
ऐसे जीवों का भला होने के कारणभूत तीर्थंकर केवली भगवानरूपी सूर्य का उदय हुआ। उनकी दिव्यध्वनिरूपी किरणों द्वारा वहाँ से मुक्त होने का मार्ग प्रकाशित किया . जिस प्रकार सूर्य को ऐसी इच्छा नहीं है कि मैं मार्ग का प्रकाशन करूँ, परन्तु सहज ही उसकी किरणें फैलती हैं, उनके द्वारा मार्ग का प्रकाशन होता है। उसी प्रकार केवली वीतराग हैं, इसलिये उनके ऐसी इच्छा नहींहैकि हम मोक्षमार्ग प्रगट करें,परन्तुसहजहीवैसे हीअघातिकर्मों के उदय से उनका शरीररूपपुद्गल दिव्यध्वनिरूप परिणमित होता है, उसके द्वारा मोक्षमार्गका प्रकाशन होता है .
पुनश्च, गणधरदेवों को यह विचार आया कि जब केवलीसूर्य का अस्तपना होगा तब जीव मोक्षमार्गको कैसे प्राप्त करेंगे? और मोक्षमार्ग प्राप्त किये बिना जीव दु:ख सहेंगे। ऐसी करुणा बुद्धिसे अंगप्रकीर्णकादिरूप ग्रन्थ वे ही हुए महान् दीपक उनका उद्योत किया.
पुनश्च, जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाने से दीपकों की परम्परा प्रवर्तती है उसी प्रकार किन्हीं आचार्यादिकों ने उन ग्रन्थों से अन्य ग्रन्थ बनाये और फिर उन पर से किन्हीं ने अन्य ग्रन्थ बनाये . इस प्रकार ग्रन्थ होने से ग्रन्थों की परम्परा प्रवर्तती है . मैं भी पूर्व ग्रन्थों से यह ग्रन्थ बनाता हूँ . पुनश्च, जिस प्रकार सूर्य तथा सर्व दीपक हैं वे मार्ग को एकरूप ही प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार दिव्यध्वनि तथा सर्व ग्रन्थ हैं वे मोक्षमार्ग को एकरूप ही प्रकाशित करते हैं। सो यह भी ग्रन्थ मोक्षमार्ग को प्रकाशित करता है . तथा जिस प्रकार प्रकाशित करने पर भी जो नेत्र रहित अथवा नेत्र विकार सहित पुरुष हैं उनको मार्ग नहीं सूझता, तो दीपक के तो मार्गप्रकाशकपने का अभाव हुआ नहीं है। उसी प्रकार प्रगट करने पर भी जो मनज्ञान रहित है अथवा मिथ्यात्वादि विकार सहित हैं उन्हें मोक्षमार्ग नहीं सूझता, तो ग्रन्थ के तो मोक्षमार्गप्रकाशकपने का अभाव हुआ नहीं है .
इस प्रकार इस ग्रन्थ का मोक्षमार्ग प्रकाशक ऐसा नाम सार्थक जानना .
प्रश्न :-मोक्षमार्ग के प्रकाशक ग्रन्थ पहले तो थे ही, तुम नवीन ग्रन्थ किसलिये बनाते हो?
समाधान :-जिस प्रकार बडे़ दीपकों का तो उद्योत बहुत तेलादिक के साधन से रहता है, जिनके बहुत तेलादिक की शक्ति न हो उनको छोटा दीपक जला दें तो वे उसका सााधन रख कर उसके उद्योत से अपना कार्य करें। उसी प्रकार बडे़ ग्रन्थों का तो प्रकाश बहुत ज्ञानादिक के सााधन से रहता है, जिनके बहुत ज्ञानादिक की शक्ति नहीं है उनको छोटा ग्रन्थ बना दें तो वे उसका साधन रखकर उसके प्रकाश से अपना कार्य करें। इसलिये यह छोटा सुगम ग्रन्थ बनाते हैं .
पुनश्च, यहाँ जो मैं यह ग्रन्थ बनाता हूँ सो कषायों से अपना मान बढ़ाने के लिये अथवा लोभ साधने के लिये अथवा यश प्राप्त करने के लिये अथवा अपनी पद्धति रखने के लिये नहीं बनाता हूँ .जिनकोव्याकरण-न्यायादिका,नय-प्रमाणादिक का तथा विशेष अर्थों का ज्ञान नहीं है उनके इस कारण बडे़ ग्रन्थों का अभ्यास तो बन नहीं सकता। तथा किन्हीं छोटे ग्रन्थों का अभ्यास बने तो भी यथार्थ अर्थ भासित नहीं होता.- इस प्रकार इस समय में मंदज्ञानवान् जीव बहुत दिखाई देते हैं, उनका भला होने के हेतु धर्मबुद्धि से यह भाषामय ग्रन्थ बनाता हूँ .
पुनश्च, जिस प्रकार बडे़ दरिद्री को अवलोकनमात्र चिन्तामणि की प्राप्ति हो और वह अवलोकन न करे, तथा जैसे कोढ़ी को अमृत-पान कराये और वह न करे। उसी प्रकार संसार पीडि़त जीव को सुगम मोक्षमार्ग के उपदेश का निमित्त बने और वह अभ्यास न करे तो उसके अभाग्य की महिमा हमसे तो नहीं हो सकती . उसकी होनहार ही का विचार करने पर अपने को समता आती है . कहा है कि :-
साहीणे गुरुजोगे जे ण सुणंतीह धम्मवयणाइ .
ते धिट्ठदुट्ठचित्ता अह सुहडा भवभयविहुणा ..
स्वाधीन उपदेशदाता गुरु का योग मिलने पर भी जो जीव धर्मवचनों को नहीं सुनते वे धीठ हैं और उनका दुष्ट चित्त है . अथवा जिस संसार भय से तीर्थंकरादि डरे उस संसारभय से रहित हैं वे बडे़ सुभट हैं .
पुनश्च, प्रवचनसार में भी मोक्षमार्ग का अधिकार किया है, वहाँ प्रथम आगमज्ञान ही उपादेय कहा है . सो इस जीव का तो मुख्य कर्त्तव्य आगमज्ञान है . उसके होने से तत्त्ववों का श्रद्धान होता है, तत्त्ववों का श्रद्धान होने से संयम भाव होता है, और उस आगम से आत्मज्ञान की भी प्राप्ति होती है। तब सहज ही मोक्ष की प्राप्ति होती है .
पुनश्च, धर्म के अनेक अù हैं उनमें एक ध्यान बिना उससे ऊँचा और धर्म का अंग नहीं है। इसलिये जिस-तिस प्रकार आगम-अभ्यास करना योग्य है .
पुनश्च,इसग्रन्थकातोवाँचना,सुनना,विचारनाबहुतसुगमहै-कोई व्याकरणादिक का भी साधन नहीं चाहिये। इसलिये अवश्य इसके अभ्यास में प्रवर्तो . तुम्हारा कल्याण होगा .
-इति मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र में पीठबन्ध प्ररूपक
प्रथम अधिकार समाप्त हुआ ॥१॥

दूसरा अधिकार

संसार अवस्थाका स्वरूप

दोहा -मिथ्याभाव अभावतैं, जो प्रगटै निजभाव .
सो जयवंत रहौ सदा, यह ही मोक्ष उपाव ..
अब इस शास्त्र में मोक्षमार्ग का प्रकाश करते हैं . वहाँ बन्धन से छूटने का नाम मोक्ष है . इस आत्मा को कर्म का बन्धन है और उस बन्धन से आत्मा दु:खी हो रहा है, तथा इसके दु:ख दूर करने ही का निरन्तर उपाय भी रहता है, परन्तु सच्चा उपाय प्राप्त किये बिना दु:ख दूर नहीं होता और दु:ख सहा भी नहीं जाता। इसलिये यह जीव व्याकुल हो रहा है .
इस प्रकार जीव को समस्त दु:ख का मूलकारण कर्मबन्धन है . उसके अभावरूप मोक्ष है वही परमहित है, तथा उसका सच्चा उपाय करना वही कर्त्तव्य है। इसलिये इस ही का इसे उपदेश देते हैं . वहाँ, जैसे वैद्य है सो रोग सहित मनुष्य को प्रथम तो रोग का निदान बतलाता है कि इस प्रकार यह रोग हुआ है। तथा उस रोग के निमित्त से उसके जो-जो अवस्था होती हो वह बतलाता है . उससे उसको निश्चय होता है कि मुझे ऐसा ही रोग है. फिर उस रोग को दूर करने का उपाय अनेक प्रकार से बतलाता है और उस उपाय की उसे प्रतीति कराता है - इतना तो वैद्यका बतलाना है . तथा यदि वह रोगी उसका साधन करे तो रोग से मुक्त होकर अपने स्वभावरूप प्रवर्ते, यह रोगी का कर्त्तव्य है.
उसी प्रकार यहाँ कर्मबंधनयुक्त जीवको प्रथम तो कर्मबन्धनका निदान बतलाते हैं कि ऐसे यह कर्मबंधन हुआ है। तथा उस कर्मबंधनके निमित्तसे इसके जो-जो अवस्था होती है वह बतलाते हैं . उससे जीव को निश्चय होता है कि मुझे ऐसा ही कर्मबंधन है . तथा उस कर्मबंधन के दूर होनेका उपाय अनेक प्रकार से बतलाते हैं और उस उपाय की इसे प्रतीति कराते हैं - इतना तो शास्त्र का उपदेश है . यदि यह जीव उसका साधन करे तो कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने स्वभावरूप प्रवर्ते, यह जीव का कर्त्तव्य है .

कर्मबन्धनका निदान

सो यहाँ प्रथम ही कर्मबंधन का निदान बतलाते हैं :-
कर्मबंधन होनेसे नाना औपाधिक भावोंमें परिभ्रमणपना पाया जाता है, एकरूप रहना नहीं होता। इसलिये कर्मबंधन सहित अवस्थाका नाम संसार-अवस्था है. इस संसार- अवस्थामें अनन्तानंत जीवद्रव्य हैं वे अनादि ही से कर्मबंधन सहित हैं. ऐसा नहीं है कि पहले जीव न्यारा था और कर्म न्यारा था, बाद में इनका संयोग हुआ. तो कैसे हैं? - जैसे मेरुगिरि आदि अकृत्रिम स्कंधोंमें अनंत पुद्गलपरमाणु अनादिसे एकबंधनरूप हैं, फिर उनमेंसे कितने ही परमाणु भिन्न होते हैं, कितने ही नये मिलते हैं, इस प्रकारमिलना-बिछुड़ना होता रहता है. उसी प्रकार इस संसारमें एक जीवद्रव्य और अनंत कर्मरूप पुद्गलपरमाणु उनका अनादिसे एकबंधनरूप है, फिर उनमें कितने ही कर्मपरमाणु भिन्न होते हैं, कितने ही नये मिलते हैं.- इस प्रकार मिलना - बिछुड़ना होता रहता है. कर्मोंके अनादिपनेकी सिद्धि
यहाँ प्रश्न है कि - पुद्गलपरमाणु तो रागादिकके निमित्तसे कर्मरूप होते हैं, अनादि कर्मरूप कैसे हैं? समाधान :- निमित्त तो नवीन कार्य हो उसमें ही सम्भव है, अनादि अवस्थामें निमित्तका कुछ प्रयोजन नहीं है. जैसे - नवीन पुद्गलपरमाणुओंका बंधान तो स्निग्ध-रूक्षगुणकेअंशोंहीसेहोताहैऔरमेरुगिरिआदिस्कंधोंमेंअनादि पुद्गलपरमाणुओं का बंधान है, वहाँ निमित्त का क्तया प्रयोजन है? उसी प्रकार नवीन परमाणुओं का कर्मरूप होना तो रागादिक ही से होता है और अनादि पुद्गलपरमाणुओंकी कर्मरूप ही अवस्था है, वहाँ निमित्तका क्तया प्रयोजन है? तथा यदि अनादिमें भी निमित्त मानेंतोअनादिपनारहतानहीं।इसलियेकर्मकाबंधअनादिमानना.सो तत्त्ववप्रदीपिकाप्रवचनासार शास्त्र की व्याख्या में जो सामान्यज्ञेयाधिकार है वहाँ कहा है :- रागादिक का कारण तो द्रव्यकर्म है और द्रव्यकर्मका कारण रागादिक हैं. तब वहाँ तर्क किया है कि - ऐसे तो इतरेतराश्रयदोष लगता है - वह उसके आश्रित, वह उसके आश्रित कहीं रुकाव नहीं है. तब उत्तर ऐसा दिया है :-
नैवं अनादिप्रसिद्धद्रव्यकम्र्मसम्बन्धस्य तत्र हेतुत्वेनोपादानात् .
अर्थ :-इस प्रकार इतरेतराश्रयदोष नहीं है। क्तयोंकि अनादिका स्वयंसिद्ध द्रव्यकर्म का सम्बन्ध है उसका वहाँ कारणपने से ग्रहण किया है.
ऐसा आगम में कहा है तथा युक्ति से भी ऐसा ही संभव है कि - कर्म के निमित्त बिना पहले जीव को रागादिक कहे जायंे तो रागादिक जीव का एक स्वभाव हो जाये। क्तयों कि परनिमित्त के बिना हो उसी का नाम स्वभाव है.
इसलिये कर्म का संबन्ध अनादि ही मानना.
यहाँ फिर प्रश्न है कि - न्यारे-न्यारे द्रव्य और अनादि से उनका संबन्ध - ऐसा कैसे संभव है?
समाधान :- जैसे मूल ही से जल-दूधका, सोना-किट्टिकका, तुष-कणका तथा तेल -तिलका सम्बन्ध देखा जाता है, नवीन इनका मिलाप हुआ नहीं है। वैसे ही अनादिसे जीव-कर्मका संबन्ध जानना, नवीन इनका मिलाप हुआ नहीं है. फिर तुमने कहा - ‘कैसे संभव है?’ अनादिसे जिसप्रकार कई भिन्न द्रव्य हैं, वैसे ही कई मिले द्रव्य हैं। इस प्रकार संभव होनेमें कुछ विरोध तो भासित नहीं होता.
फिर प्रश्न है कि - संबन्ध अथवा संयोग कहना तब संभव है जब पहले भिन्न हों और फिर मिलें. यहाँ अनादिसे मिले जीव-कर्मोंका संबन्ध कैसे कहा है?
समाधान :- अनादिसे तो मिले थे। परन्तु बादमें भिन्न हुए तब जाना कि भिन्न थे तो भिन्न हुए, इसलिये पहले भी भिन्न ही थे - इस प्रकार अनुमानसे तथा केवलज्ञानसे प्रत्यक्ष भिन्न भासित होते हैं. इससे, उनका बन्धन होने पर भी भिन्नपना पाया जाता है. तथा उस भिन्नताकी अपेक्षा उनका संबन्ध अथवा संयोग कहा है। क्तयोंकि नये मिले, या मिले ही हों, भिन्न द्रव्योंके मिलापमें ऐसे ही कहना संभव है.
इस प्रकार इन जीव-कर्म का अनादि संबन्ध है. जीव और कर्मों की भिन्नता
वहाँ जीवद्रव्य तो देखने-जाननेरूप चेतनागुणका धारक है तथा इन्द्रियगम्य न होने योग्य अमूर्त्तिक है, संकोच-विस्तार शक्तिसहित असंख्यातप्रदेशी एकद्रव्य है. तथा कर्म है वह चेतनागुणरहित जड़ है, और मूर्त्तिक है, अनन्त पुद्गलपरमाणुओंका पिण्ड है, इसलिये एकद्रव्य नहीं है. इस प्रकार ये जीव और कर्म हैं - इनका अनादिसंबन्ध है, तो भी जीवका कोई प्रदेश कर्मरूप नहीं होता और कर्मका कोई परमाणु जीवरूप नहीं होता। अपने-अपने लक्षणको धारण किये भिन्न-भिन्न ही रहते हैं. जैसे सोने-चाँदीका एक स्कंध हो, तथापि पीतादि गुणोंको धारण किए सोना भिन्न रहता है और }वेतादि गुणोंको धारण किये चाँदी भिन्न रहती है - वैसे भिन्न जानना. अमूर्तिक आत्मासे मूर्तिक कर्मोंका बंधान किस प्रकार होता है?
यहाँ प्रश्न है कि - मूर्तिक-मूर्तिकका तो बंधान होना बने, अमूर्तिक-मूर्तिकका बंधान कैसे बने?
समाधान :- जिस प्रकार व्यक्त-इन्द्रियगम्य नहीं हैं ऐसे सूक्ष्म पुद्गल तथा व्यक्त इन्द्रियगम्यहैंऐसेस्थूलपुद्गल-उनकाबंधानहोनामानतेहैं।उसीप्रकारजो इन्द्रियगम्य होने योग्य नहीं हैं ऐसा अमूर्तिक आत्मा और इन्द्रियगम्य होने योग्य मूर्तिक कर्म -इनका भी बंधान होना मानना. तथा इस बंधानमें कोई किसीको करता तो है नहीं. जब तक बंधान रहे तब तक साथ रहंे। बिछुडे़ं नहीं, और कारण-कार्यपना उनका बना रहे। इतना ही यहाँ बंधान जानना. सो मूर्तिक-अमूर्तिक के इस प्रकार बंधान होनेमें कुछ विरोध है नहीं.
इस प्रकार जैसे एक जीवको अनादि कर्मसंबन्ध कहा उसी प्रकार भिन्न-भिन्न अनंत जीवोंके जानना. घाति-अघाति कर्म और उनका कार्य
तथा वे कर्म ज्ञानावरणादि भेदोंसे आठ प्रकारके हैं. वहाँ चार घातिया कर्मोंके निमित्तसे तो जीवके स्वभावका घात होता है. ज्ञानावरण-दर्शनावरणसे तो जीवके स्वभाव जो ज्ञान-दर्शन उनकी व्यक्तता नहीं होती। उन कर्मोंके क्षयोपशम के अनुसार किंचित् ज्ञान-दर्शनकीव्यक्ततारहतीहै.तथामोहनीयसेजोजीवकेस्वभावनहींहैऐसे मिथ्याश्रद्धानवक्रोध,मान,माया,लोभादिककषायउनकीव्यक्तताहोतीहै.तथा अन्तरायसे जीवका स्वभाव, दीक्षालेने की सामथ्र्यरूप वीर्य उसकी व्यक्तता नहीं होती। उसके क्षयोपशम के अनुसार किंचित् शक्ति होती है.
इस प्रकार घातिया कर्मोंके निमित्तसे जीवके स्वभावका घात अनादि ही से हुआ है. ऐसा नहीं है कि पहले तो स्वभावरूप शुद्ध आत्मा था, पश्चात् कर्म-निमित्तसे स्वभावघात होने से अशुद्ध हुआ.
यहाँ तर्क है कि - घात नाम तो अभावका है। सो जिसका पहले सद्भाव हो उसका अभाव कहना बनता है. यहाँ स्वभावका तो सद्भाव है ही नहीं, घात किसका किया?
समाधान :- जीवमें अनादि ही से ऐसी शक्ति पायी जाती है कि कर्मका निमित्त न हो तो केवलज्ञानादि अपने स्वभावरूप प्रर्वत्ों, परन्तु अनादि ही से कर्मका संबन्ध पाया जाता है, इसलिये उस शक्तिकी व्यक्तता नहीं हुई. अत: शक्ति-अपेक्षा स्वभाव है, उसका व्यक्त न होने देने की अपेक्षा घात किया कहते हैं.
तथा चार अघातिया कर्म है, उनके निमित्तसे इस आत्माको बाह्य सामग्रीका संबन्ध बनता है. वहाँ वेदनीयसे तो शरीरमें अथवा शरीरसे बाह्य नानाप्रकार सुख-दु:खके कारण परद्रव्योंका संयोग जुड़ता है। आयुसे अपनी स्थिति पर्यन्त प्राप्त शरीरका सम्बन्ध नही छूट सकता। नाम से गति, जाति, शरीरादिक उत्पन्न होते हैं। और गोत्र से उच्च-नीच कुल की प्राप्ति होती है.
इस प्रकार अघाति कर्मोंसे बाह्य सामग्री एकत्रित होती है, उसके द्वारा मोह-उदयका सहकारहोनेपरजीवसुखी-दु:खीहोताहै.औरशरीरादिककेसम्बन्धसेजीवके अमूर्त्तत्वादिस्वभाव अपने स्व-अर्थ को नहीं करते - जैसे कोई शरीरको पकडे़ तो आत्मा भी पकड़ा जाये. तथा जब तक कर्म का उदय रहता है तबतक बाह्य सामग्री वैसे ही बनी रहे, अन्यथा नहीं हो सके - ऐसा इन अघाति कर्मोंका निमित्त जानना. निर्बल जड़कर्मों द्वारा जीव के स्वभावका घात तथा बाह्य सामग्री मिलना
यहाँ कोई प्रश्न करे कि - कर्म तो जड़ हैं, कुछ बलवान् नहीं हैं। उनसे जीवके स्वभाव का घात होना व बाह्य सामग्री का मिलना कैसे संभव है?
समाधान :- यदि कर्म स्वयं कर्त्ता होकर उद्यमसे जीव के स्वभाव का घात करे, बाह्य सामग्रीको मिलावे तब तो कर्मके चेतनपना भी चाहिये और बलवानपना भी चाहिये। सो तो है नहीं, सहज ही निमित्त-नैमित्तिक संबन्ध है. जब उन कर्मोंका उदय काल हो। उस काल में स्वयं ही आत्मा स्वभावरूप परिणमन नहीं करता, विभावरूप परिणमन करता है, तथा जो अन्य द्रव्य हैं वे वैसे ही सम्बन्धरूप होकर परिणमित होते हैं.
जैसे - किसी पुरुषके सिर पर मोहनधूल पड़ी है उससे वह पुरुष पागल हुआ। वहाँ उस मोहनधूल को ज्ञान भी नहीं था और बलवानपना भी नहीं था, परन्तु पागलपना उस मोहनधूल ही से हुआ देखते हैं. वहाँ मोहनधूल का तो निमित्त है और पुरुष स्वयं ही पागल हुआ परिणमित होता है - ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक बन रहा है.
तथा जिस प्रकार सूर्य के उदय के काल में चकवा-चकवियोंका संयोग होता है। वहाँ रात्रि में किसी ने द्वेषबुद्धिसे बलजबरी करके अलग नहीं किये हैं, दिन में किसी ने करुणाबुद्धिसे लाकर मिलाये नहीं हैं, सूर्योदयका निमित्त पाकर स्वयं ही मिलते हैं. ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक बन रहा है. उस ही प्रकार कर्म का भी निमित्त-नैमित्तिक भाव जानना. - इस प्रकार कर्म के उदय से अवस्था है.
नवीन बन्ध विचार
वहाँ नवीन बंध कैसे होता है सो कहते हैं - जैसे सूर्यका प्रकाश है सो मेघपटलसे जितना व्यक्त नहीं है उतनेका तो उस कालमें अभाव है, तथा उस मेघपटलके मन्दपनेसे जितना प्रकाश प्रगट है वह उस सूर्यके स्वभावका अंश है - मेघपटलजनित नहीं है. उसी प्रकार जीवका ज्ञान-दर्शन-वीर्य स्वभाव है। वह ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तरायके निमित्त से जितना व्यक्त नहीं है उतने का तो उस कालमें अभाव है. तथा उन कर्मोंके क्षयोपशमसे जितने ज्ञान, दर्शन, वीर्य प्रगट हैं वह उस जीव के स्वभाव का अंश ही है। और कर्म जनित औपाधिकभाव नहीं है. सो ऐसे स्वभाव के अंश का अनादिसे लेकर कभी अभाव नहीं होता . इस ही के द्वारा जीवके जीवत्वपने का निश्चय किया जाता है कि यह देखनेवाली जाननेवाली शक्ति को धरती हुई वस्तु है वही आत्मा है.
तथा इस स्वभाव से नवीन कर्मका बंध नहीं होता। क्तयोंकि निजस्वभाव ही बन्धका कारण हो तो बन्धका छूटना कैसे हो? तथा उन कर्मोंके उदय से जितने ज्ञान, दर्शन, वीर्य अभावरूप हैं उनसे भी बन्ध नहीं है। क्तयोंकि स्वयं ही का अभाव होने पर अन्य को कारण कैसे हो? इसलिये ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तरायके निमित्त सेउत्पन्न भाव नवीन कर्मबन्ध के कारण नहीं है.
तथा मोहनीय कर्मके द्वारा जीवको अयथार्थ-श्रद्धानरूप तो मिथ्यात्वभाव होता है तथा क्रोध, मान , माया, लोभादिक कषाय होते हैं. वे यद्यपि जीवके अस्तित्वमय हैं, जीवसे भिन्न नहीं हैं, जीव ही उनका करता है, जीवके परिणमनरूप ही वे कार्य हैं। तथापि उनका होना मोहकर्मके निमित्त से ही है, कर्मनिमित्त दूर होने पर उनका अभाव ही होता है, इसलिये वे जीवके निजस्वभाव नहीं, औपाधिक भाव हैं. तथा उन भावों द्वारा नवीन बन्ध होता है। इसलिये मोहके उदयसे उत्पन्न भाव बन्ध के कारण हैं.
तथाअघातिकर्मोंके उदयसे बाह्य सामग्री मिलती है,उसमें शरीरादिक तो जीवके प्रदेशोंसेएकक्षेत्रावगाहीहोकरएकबंधानरूपहोतेहैंऔरधन,कुटुम्बादिकआत्मासे भिन्नरूप हैं इसलिये वे सब बंधके कारण नहीं हैं। क्तयोंकिपरद्रव्य बंधका कारण नहीं होता. उनमें आत्माको ममत्वादिरूप मिथ्यात्वादिभाव होते हैं वही बंधका कारण जानना.
योग और उससे होनेवाले प्रकृतिबन्ध, प्रदेशबन्ध
तथा इतना जानना कि नामकर्मके उदयसे शरीर, वचन और मन उत्पन्न होते हैं। उनकी चेष्टा के निमित्तसे आत्माके प्रदेशोंका चंचलपना होता है, उससे आत्मा को पुद्गल-वर्गणासे एक बंधान होनेकी शक्ति होती है, उसका नाम योग है. उसके निमित्त से प्रति समय कर्म रूपहोनेयोग्यअनन्तपरमाणुओंकाग्रहणहोताहै.वहाँअल्पयोगहोतोथोडे़ परमाणुओंका ग्रहण होता है और बहुत योग हो तो बहुत परमाणुओंका ग्रहण होता है. तथा एक समय में जो पुद्गलपरमाणु ग्रहण करे उनमें ज्ञानावरणादि मूल प्रकृतियोंका और उनकी उत्तरप्रकृतियोंका जैसे सिद्धांतमें कहा वैसे बटवारा होता है. उस बटवारेके अनुसार परमाणु उन प्रकृतियोंरूप स्वयं ही परिणमित होते हैं.
विशेष इतना कि योग दो प्रकारका हैं - शुभयोग, अशुभयोग. वहाँ धर्मके अंगोंमें मन-वचन-कायकी प्रवृति होनेपर तो शुभयोग होता है और अधर्मके अंगोंमें उनकी प्रवृत्ति होनेपर अशुभयोग होता है. वहाँ शुभयोग हो या अशुभयोग हो, सम्यक्तत्व प्राप्त किये बिना घातियाकर्मोंकी तो सर्व प्रकृतियोंका निरन्तर बन्ध होता ही रहता है. किसी समय किसी भी प्रकृतिका बन्ध हुए बिना नहीं रहता. इतना विशेष है कि मोहनीयके हास्य-शोक युगलमें, रति-अरति युगलमें, तीनों वेदोंमें एक कालमें एक-एक ही प्रकृति बन्ध होता है.
तथा अघातियाकर्मों की प्रकृतियोंमें शुभयोग होनेपर सातावेदनीय आदि पुण्यप्रकृतियों का बन्ध होता है, अशुभयोग होने पर असातावेदनीय आदि पापप्रकृतियोंका बन्ध होता है, मिश्रयोग होनेपर कितनी ही पुण्यप्रकृतियोंका तथा कितनी ही पापप्रकृतियों का बन्ध होता है.
इस प्रकार योगके निमित्तसे कर्मोंका आगमन होता है. इसलिये योग है वह आस्रव है. तथा उसके द्वारा ग्रहण हुऐ कर्मपरमाणुओंका नाम प्रदेश है, उनका बन्ध हुआ और उनमें मूल-उत्तर प्रकृतियोंका विभाग हुआ। इसलिये योगों द्वारा प्रदेशबन्ध तथा प्रकृतिबन्धका होना जानना. कषायसे स्थिति और अनुभाग बन्ध
तथा मोहके उदयसेमिथ्यात्व क्रोधादिक भाव होते हैं,उन सबका नाम सामान्यत: कषाय है.उससे उन कर्मप्रकृतियोंकी स्थिति बँधती है. वहाँ जितनी स्थिति बँधे उसमें अबाधाकालको छोड़कर पश्चात् जबतक बँधी स्थिति पूर्ण हो तबतक प्रति समय उस प्रकृति का उदय आता ही रहता है.वहाँदेव-मनुष्य-तिर्यंचायुकेबिनाअन्यसर्वघातिया- अघातिया प्रकृतियोंका, अल्प कषाय होनेपर थोड़ा स्थितिबंध होता है, बहुत कषाय होने पर बहुत स्थितिबंध होता है. इन तीन आयुका अल्प कषायसे बहुत और बहुत कषायसे अल्प स्थितिबंध जानना.
तथा उस कषाय द्वारा ही उन कर्मप्रकृतियोंमें अनुभाग शक्तिका विशेष होता है. वहाँ जैसा अनुभाग बंध हो वैसा ही उदयकाल में उन प्रकृतियोंका बहुत या थोड़ा फल उत्पन्न होता है. वहाँ घाति कर्मोंकी सर्वप्रकृतियोंमें तथा अघाति कर्मोंकी पापप्रकृतियोंमें तो अल्प कषाय होनेपर अल्प अनुभाग बंधता है, बहुत कषाय होनेपर बहुत अनुभाग बंधता है।तथा पुण्य-प्रकृतियोंमें अल्प कषाय होने पर बहुत अनुभाग बंधता है, बहुत कषाय होने पर थोड़ा अनुभाग बंधता है.
इस प्रकार कषायों द्वारा कर्मप्रकृतियोंके स्थिति-अनुभागका विशेष हुआ। इसलिये कषायों द्वारा स्थितिबंध-अनुभागबंधका होना जानना.
यहाँ जिसप्रकार बहुत मदिरा भी है और उसमें थोड़े कालपर्यन्त थोड़ी उन्मत्तता उत्पन्न करने की शक्ति है तो वह मदिरा हीनपने को प्राप्त है, तथा यदि थोड़ी भी मदिरा है और उसमें बहुत कालपर्यन्त बहुत उन्मत्तता उत्पन्न करने की शक्ति है तो वह मदिरा अधिकपने को प्राप्त है। उसी प्रकार बहुत भी कर्मप्रकृतियोंके परमाणु हैं और उनमें थोड़े काल पर्यन्त थोड़ा फल देने की शक्ति है तो वे कर्मप्रकृतियाँ हीनता को प्राप्त हैं, तथा थोड़े भी कर्मप्रकृतियों के परमाणु हैं और उनमें बहुत काल पर्यन्त बहुत फल देने की शक्ति है तो वे कर्मप्रकृतियाँ अधिकपनेको प्राप्त हैं.
इसलिये योगों द्वारा हुए प्रकृतिबंध-प्रदेशबंध बलवान् नहीं हैं, कषायों द्वारा किया गया स्थिति बंध अनुभागबंध ही बलवान् है। इसलिये मुख्यरूप से कषायोंको ही बंधका कारण जानना.जिन्हें बंध नहीं करना हो वे कषाय नहीं करें. ज्ञानहीन जड़-पुद्गल परमाणुओंका यथायोग्यप्रकृतिरूप परिणमन
अब यहाँ कोई प्रश्न करे कि - पुद्गल परमाणुतो जड़ है, उन्हें कुछ ज्ञान नहीं है। तो वे कैसे यथायोग्य प्रकृतिरूप होकर परिणमन करते हैं?
समाधान :- जैसे भूख होनेपर मुख द्वारा ग्रहण किया हुआ भोजनरूप पुद्गलपिण्ड मांस, शुक्र, शोणित आदि धातुरूप परिणमित होता है. तथा उस भोजन के परमाणुओंमें यथायोग्य किसी धातुरूप थोडे़ और किसी धातुरूप बहुत परमाणु होते हैं. तथा उनमें कई परमाणुओंका सम्बन्ध बहुत काल रहता है, कइयोंका थोडे़ काल रहता है. तथा उन परमाणुओंमें कई तो अपने कार्योंको उत्पन्न करनेकी बहुत शक्ति रखते हैं, कई थोड़ी शक्ति रखते हैं. वहाँ ऐसा होने में कोई भोजनरूप पुद्गलपिण्डको ज्ञान तो नहीं है कि मैं इसप्रकार परिणमन करूँ तथा और भी कोई परिणमन कराने वाला नहीं है। ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिकभाव हो रहा है उससे वैसे ही परिणमन पाया जाता है.
उसी प्रकार कषाय होने पर योगद्वार से ग्रहण किया हुआ कर्मवर्गणारूप पुद्गलपिण्ड ज्ञानावरणादि प्रकृतिरूप परिणमित होता है. तथा उन कर्मपरमाणुओंमें यथायोग्य किसी प्रकृतिरूप थोड़े और किसी प्रकृतिरूप बहुत परमाणु होते हैं. तथा उनमें कई परमाणुओंका सम्बन्ध बहुत काल और कइयों का थोड़े काल रहता है. तथा उन परमाणुओंमें कई तो अपने कार्य को उत्पन्न करने की बहुत शक्ति रखते हैं और कई थोड़ी शक्ति रखते हैं. वहाँ ऐसा होने में किसी कर्मवर्गणारूप पुद्गलपिण्डको ज्ञान तो है नहीं कि मैं इस प्रकार परिणमन करूँ तथा और भी कोई परिणमन कराने वाला नहीं है। ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक भाव बन रहा है उससे वैसे ही परिणमन पाया जाता है.
ऐसेतोलोकमेंनिमित्त-नैमित्तिकबहुतहीबनरहेहैं.जैसेमंत्रनिमित्तसे जलआदिकमें रोगादिक दूर करने की शक्ति होती है तथा कंकरी आदि में सर्पादि रोकने की शक्ति होती है। उसी प्रकार जीवभाव के निमित्त से पुद्गलपरमाणुओंमें ज्ञानावरणादिरूप शक्ति होती है. यहाँ विचार कर अपने उद्यम से कार्य करे तो ज्ञान चाहिये, परन्तु वैसा निमित्तबनने पर स्वयमेव वैसे परिणमन हो तो वहाँ ज्ञान का कुछ प्रयोजन नहीं है.
इस प्रकार नवीन बन्ध होने का विधान जानना. सत्तारूप कर्मों की अवस्था
अब जो परमाणु कर्मरूप परिणमित हुए हैं उनका जबतक उदयकाल न आये तबतक जीवकेप्रदेशोंसेएकक्षेत्रावगाहरूपबंधानरहताहै.वहाँजीवभावकेनिमित्तसेकई प्रकृतियोंकी अवस्थाका पलटना भी हो जाता है. वहाँ कई अन्य प्रकृतियोंके परमाणु थे वे संक्रमणरूप होकर अन्य प्रकृतियोंके परमाणु हो जायें. तथा कई प्रकृतियों की स्थिति और अनुभाग बहुत थे सो अपकर्षण होकर थोड़े हो जायें, तथा कई प्रकृतियों की स्थिति एवं अनुभाग थोड़े थे सो उत्कर्षण होकर बहुत हो जायें. इस प्रकार पूर्व में बँधे हुए परमाणुओं की भी जीवभावोंका निमित्त पाकर अवस्था पलटती है, और निमित्त न बने तो नहीं पलटे, ज्यों की त्यों रहे.
इस प्रकार सत्तारूप कर्म रहते हैं. कर्मों की उदयरूप अवस्था
तथा जब कर्मप्रकृतियोंका उदयकाल आये तब स्वयमेव उन प्रकृतियोंके अनुभागके अनुसार कार्य बने, कर्म उन कार्यों को उत्पन्न नहीं करते. उनका उदयकाल आने पर वह कार्य बनता है - इतना ही निमित्त-नैमित्तिक संबंध जानना. तथा जिस समय फल उत्पन्न हुआ उसके अनन्तर समय में उन कर्मरूप पुद्गलों को अनुभाग शक्ति का अभाव होने से कर्मत्वपनेका अभाव होता है, वे पुद्गल अन्य पर्यायरूप परिणमित होते हैं इसका नाम सविपाक निर्जरा है.
इस प्रकार प्रति समय उदय होकर कर्म खिरते हैं.
कर्मत्वपनेकी नास्ति होने के पीछे वे परमाणु उसी स्कंध में रहें या अलग हो जायें - कुछ प्रयोजन नहीं रहता. यहाँ इतना जानना की :- इस जीव को प्रति समय अनंत परमाणु बंधते हैं। वहाँ एक समयमें बंधे हुए परमाणु अबाधाकाल को छोड़कर अपनी स्थिति के जितने समय हों उनमें क्रम से उदय में आते हैं. तथा बहुत समयोंमें बंधे परमाणु जोकि एक समयमें उदय आने योग्य हैं वे इकट्ठे होकर उदय में आते हैं. उन सब परमाणुओंका अनुभाग मिलकर जितना अनुभाग हो उतना फल उस काल में उत्पन्न होता है. तथा अनेक समयोंमें बंधे परमाणु बंधसमयसे लेकर उदयसमय पर्यन्त कर्मरूप अÂस्तत्वको धारण कर जीवसे संबन्धरूप रहते हैं.
इसप्रकारकर्मोंकीबन्ध-उदय-सत्तारूपअवस्थाजानना.वहाँप्रतिसमयएक समयप्रबद्धमात्र परमाणु बँधते हैं तथा एक समयप्रबद्धमात्र की निर्जरा होती है. डेढ़-गुण हानिसे गुणित समयप्रबद्धमात्र सदाकाल सत्ता में रहते हैं.
सो इन सबका विशेष आगे कर्म अधिकारमें लिखेंगे वहाँ से जानना.
„व्यकर्म व भावकर्म का स्वरूप और प्रवृत्ति
तथा इस प्रकार यह कर्म है सो परमाणुरूप अनंत पुद्गलद्रव्यों से उत्पन्न किया हुआ कार्य है, इसलिये उसका नाम द्रव्यकर्म है. तथा मोहके निमित्तसे मिथ्यात्वक्रोधादिरूप जीवके परिणाम हैं वह अशुद्धभावसे उत्पन्न किया हुआ कार्य है, इसलिये इसका नाम भाव कर्म है. द्रव्यकर्म के निमित्त से भावकर्म होता है और भावकर्म के निमित्तसे द्रव्यकर्मका बन्ध होताहै.तथाद्रव्यकर्मसेभावकर्मऔरभावकर्मसेद्रव्यकर्म-इसीप्रकारपरस्पर कारणकार्यभावसे संसारचक्रमें परिभ्रमण होता है.
इतना विशेष जानना की :- तीव्र-मंद बन्ध होने से या संक्रमणआदि होने से या एक काल में बंधे अनेक काल में या अनेककाल में बंधे एककाल में उदय आनेमें किसी काल में तीव्र उदय आये तब तीव्रकषाय हो, तब तीव्र ही नवीन बंध हो। तथा किसी काल में मंद उदय आये तब मंद कषाय हो, तब मंद ही बंध हो. तथा उन तीव्र-मंदकषायों ही के अनुसार पूर्व बँधे कर्मोंका भी संक्रमणादिक हो तो हो.
इस प्रकार अनादिसे लगाकर धाराप्रवाहरूप द्रव्यकर्म और भावकर्मकी प्रवृत्ति जानना.
नोकर्मका स्वरूप और प्रवृत्ति
तथा नामकर्मके उदयसे शरीर होता है वह द्रव्यकर्मवत् किंचित् सुख-दु:खका कारण है, इसलिये शरीर को नोकर्म कहते हैं. यहाँ नो शब्द ईषत्(अल्प)वाचक जानना. सो शरीर पुद्गलपरमाणुओं का पिण्ड है और द्रव्यइन्द्रिय, द्रव्यमन, श्वासोच्छ्वास तथा वचन - ये भी शरीर ही के अंग हैं। इसलिये उन्हें भी पुद्गलपरमाणुओंके पिण्ड जानना.
इसप्रकार शरीरके और द्रव्यकर्मके सम्बन्ध सहित जीवके एकक्षेत्रावगाहरूप बंधान होता है. सो शरीरके जन्म समय से लेकर जितनी आयु की स्थिति हो उतने काल तक शरीर का संबन्ध रहता है. तथा आयु पूर्ण होने पर मरण होता है तब उस शरीरका संबन्ध छूटता है, शरीर आत्मा अलग-अलग हो जाते हैं. तथा उसके अनंतर समयमें अथवा दूसरे, तीसरे, चौथे समय जीवकर्मोदय के निमित्तसे नवीन शरीर धारण करता है। वहाँ भी अपनी आयुपर्यंत उसी प्रकार संबन्ध रहता है, फिर मरण होता है तब उससे संबन्ध छूटता है. इसी प्रकार पूर्व शरीर का छोड़ना और नवीन शरीर ग्रहण करना अनुक्रम से हुआ करता है.
तथा यह आत्मा यद्यपि असंख्यातप्रदेशी है तथापि संकोच-विस्तार शक्तिसे शरीर प्रमाण ही रहता है। विशेष इतना कि समुद्घात होने पर शरीर से बाहर भी आत्मा के प्रदेश फैलते हैं और अंतराल समय में पूर्व शरीर छोड़ा था उस प्रमाण रहते हैं.
तथा इस शरीर के अंगभूत द्रव्यइन्द्रिय और मन उनकी सहायतासे जीवके जानपने की प्रवृत्ति होती है. तथा शरीरकी अवस्था के अनुसार मोहके उदयसे जीव सुखी-दु:खी होता है. तथा कभी तो जीवकी इच्छाके अनुसार शरीर प्रवर्तता है, कभी शरीर की अवस्था के अनुसार जीव प्रवर्तता है। कभी जीव अन्यथा इच्छारूप प्रवर्तता है, पुद्गल अन्यथा अवस्थारूप प्रवर्तता है.
इस प्रकार इस नोकर्म की प्रवृत्ति जानना.
नित्यनिगोद और इतरनिगोद
वहाँ अनादि से लेकर प्रथम तो इस जीवके नित्यनिगोदरूप शरीरका संबन्ध पाया जाताहै,वहाँनित्यनिगोदशरीरकोधारणकरकेआयुपूर्णहोनेपरमरकरफिर नित्यनिगोद शरीरको धारण करता है, फिर आयु पूर्ण कर मरकर नित्यनिगोद शरीर ही धारण करता है. इसी प्रकार अनंतानंत प्रमाण सहित जीवराशि है सो अनादि से वहाँ ही जन्म-मरण किया करती है.
तथा वहाँ से छह महीना आठ समय में छहसौ आठ जीव निकलते हैं, वे निकलकर अन्य पर्यायों को धारण करते हैं. वे पृथवी, जल, अग्नि, पवन, प्रत्येक वनस्पतिरूप एकेन्द्रिय पर्यायोंमें तथा दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रियरूप पर्यायों में अथवा नारक, तिर्यंच, मनुष्य, देवरूप पंचेेन्द्रिय पर्यायमें भ्रमण करते हैं. वहाँ कितने ही काल भ्रमण कर फिर निगोद पर्यायोंको प्राप्त करे सो उसका नाम इतरनिगोद है.
तथा वहाँ कितने ही काल रहकर वहाँसे निकलकर अन्य पर्यायों में भ्रमण करते हैं. वहाँ परिभ्रमण करने का उत्कृष्ट काल पृथ्वी आदि स्थावरों में असंख्यात कल्पमात्र है, और द्वीन्द्रियादि पंचेन्द्रिय पर्यन्त त्रसों में साधिक दो हजार सागर है, इतरनिगोद में ढाई पुद्गलपरावर्तनमात्र है जो कि अनन्तकाल है. इतरनिगोद से निकल कर कोई स्थावर पर्याय प्राप्त करके फिर निगोद जाते हैं.
इस प्रकार एकेन्द्रिय पर्यायों में उत्कृष्ट परिभ्रमण काल असंख्यात पुद्गलपरावर्तनमात्र है तथा जघन्य तो सर्वत्र एक अंतर्मुहूर्त काल है. इस प्रकार अधिकंाश तो एकेन्द्रिय पर्यायों का ही धारण करना है, अन्य पर्यायों की प्राप्ति तो काकतालीयन्यायवत् जानना.
इस प्रकार इस जीवको अनादि से ही कर्मबन्धनरूप रोग हुआ है.
इति कर्मबन्धननिदान वर्णनम्.
कर्मबंधनरूप रोगके निमित्तसे होनेवाली जीवकी अवस्था
इस कर्मबंधनरूप रोगके निमित्तसे जीवकी कैसी अवस्था हो रही है सो कहते हैं :-
ज्ञानावरण-दर्शनावरण कर्मोंदयजन्य अवस्था
प्रथम तो इस जीवका स्वभाव चैतन्य है, वह सबके सामान्य-विशेष स्वरूप को प्रकाशित करनेवाला है. जो उनका स्वरूप हो वैसा अपनेको प्रतिभासित हो, उसी का नाम चैतन्य है. वहाँ सामान्यस्वरूप प्रतिभासित होने का नाम दर्शन है, विशेष स्वरूप प्रतिभासित होने का नाम ज्ञान है. ऐसे स्वभाव द्वारा त्रिकालवर्ती सर्वगुणपर्याय सहित सर्व पदार्थों को प्रत्यक्ष युगपत् बिना किसी सहायता के देखे-जाने ऐसी शक्ति आत्मा में सदा काल है। परन्तु अनादि ही से ज्ञानावरण, दर्शनावरण का सम्बन्ध है - उसके निमित्त से इस शक्ति का व्यक्ततपना नहीं होता. उन कर्मों के क्षयोपशम से किंचित् मतिज्ञान-श्रुतज्ञान पाया जाता है और कदाचित् अवधिज्ञान भी पाया जाता है, अचक्षुदर्शन पाया जाता है और कदाचित् चक्षुदर्शन व अवधिदर्शन भी पाया जाता है.
इनकी भी प्रवृत्ति कैसी है सो दिखाते हैं. मतिज्ञान की पराधीन प्रवृत्ति
वहाँ प्रथम तो मतिज्ञान है। वह शरीर के अंगभूत जो जीभ, नासिका, नयन, कान, स्पर्शन ये द्रव्यइन्द्रियाँ और ñदयस्थानमें आठ पँखुरियोंके फूले कमल के आकार का द्रव्यमन - इनकी सहायता से ही जानता है. जैसे - जिसकी ¹ष्िट मंद हो वह अपने नेत्र द्वारा ही देखता है परन्तु चश्मा लगाने पर ही देखता है, बिना चश्में के नहीं देख सकता. उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान मंद है, वह अपने ज्ञान से ही जानता है परन्तु द्रव्यइन्द्रिय तथा मन का संबंध होने पर ही जानता है, उनके बिना नहीं जान सकता. तथा जिस प्रकार नेत्र तो जैसे के तैसे हैं, परन्तु चश्में में कुछ दोष हुआ हो तो नहीं देख सकता अथवा थोड़ा दीखता है या और का और दीखता है। उसी प्रकार अपना क्षयोपशम तो जैसा का तैसा है, परन्तु द्रव्यइन्द्रिय तथा मन के परमाणु अन्यथा परिणमित हुए हों तो जान नहीं सकता अथवा थोड़ा जानता है अथवा और का और जानता है. क्तयोंकि द्रव्यइन्द्रिय तथा मनरूप परमाणुओं के परिणमन को और मतिज्ञान को निमित्त-नैमित्तिक संबंध है, इसलिये उनके परिणमन के अनुसार ज्ञान का परिणमन होता है. उसका उदाहरण - जैसे मनुष्यादिक को बाल-वृद्ध-अवस्था में द्रव्यइन्द्रिय तथा मन शिथिल हो तब जानपना भी शिथिल होता है। तथा जैसे शीत वायु आदि के निमित्त से स्पर्शनादि इन्द्रियों के और मनके परमाणु अन्यथा हों तब जानना नहीं होता अथवा थोड़ा जानना होता है.
तथा इस ज्ञान को और बाह्य द्रव्यों को भी निमित्त-नैमित्तिक संबंध पाया जाता है. उसका उदाहरण - जैसे नेत्रइन्द्रिको अंधकारके परमाणु अथवा फूला आदि के परमाणु या पाषाणादिक के परमाणु आड़े आ जायें तो देख नहीं सकती. तथा लाल काँच आड़ा आ जाये तो सब लाल दीखता है, हरित आड़ा आये तो हरित दीखता है - इस प्रकार अन्यथा जानना होता है.
तथा दूरबीन, चश्मा इत्यादि आड़े आयें तो बहुत दीखने लग जाता है. प्रकाश, जल, हिलव्वी काँच इत्यादि के परमाणु आड़े आयें तो भी जैसे का तैसा दीखता है. इस प्रकार अन्य इन्द्रियों तथा मन के भी यथा संभव जानना. मंत्रादिक के प्रयोग से अथवा मदिरापानादिक से अथवा भूतादिक के निमित्त से नहीं जानना, थोड़ा जानना या अन्यथा जानना होता है. इस प्रकार यह ज्ञान बाह्यद्रव्य के भी आधीन जानना.
तथा इस ज्ञान द्वारा जो जानना होता है वह अस्पष्ट जानना होता है। दूर से कैसा ही जानता है, समीप से कैसा ही जानता है, तत्काल कैसा ही जानता है, जानने में बहुत देर हो जाये तब कैसा ही जानता है, किसी को संशय सहित जानता है, किसी को अन्यथा जानता है, किसी को किंचित जानता है- इत्यादिरूप से निर्मल जानना नहीं हो सकता.
इस प्रकार यह मतिज्ञान पराधीनता सहित इन्द्रिय - मन द्वारसे प्रवर्तता है. उन इन्द्रियों द्वारा तो जितने क्षेत्र का विषय हो उतने क्षेत्र में जो वर्तमान स्थूल अपने जानने योग्य पुद्गल स्कन्ध हों उन्हीं को जानता है. उसमें भी अलग-अलग इन्द्रियों द्वारा अलग- अलग काल में किसी स्कन्धके स्पर्शादिक का जानना होता है. तथा मन द्वारा अपने जानने योग्य किंचित् मात्र त्रिकाल संबंधी दूर क्षेत्रवर्ती अथवा समीप क्षेत्रवर्ती रूपी-अरूपी द्रव्यों और पर्यायों को अत्यन्त अस्पष्टरूप से जानता है. सो भी इन्द्रियों द्वारा जिसका ज्ञान हुआ हो अथवा जिसका अनुमानादिक किया हो उस ही को जान सकता है. तथा कदाचित् अपनी कल्पना ही से असत् को जानता है. जैसे स्वप्न में अथवा जागते हुए भी जो कदाचित् कहीं नहीं पाये जाते ऐसे आकारादिक का चिंतवन करता है और जैसे नहीं हैं वैसे मानता है. इस प्रकार मन द्वारा जानना होता है. सो यह इन्द्रियों व मन द्वारा जो ज्ञान होता है उसका नाम मतिज्ञान है.
यहाँ पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, वनस्पतिरूप एकेन्द्रियोंके स्पर्श ही का ज्ञान है। लट, शंख आदि दो इन्द्रिय जीवोंको स्पर्श, रस का ज्ञान है। कीड़ी, मकोड़ा आदि तीन इन्द्रिय जीवोंको स्पर्श, रस, गंध का ज्ञान है। भ्रमर,मक्षिका, पतंगादिक चौ इन्द्रिय जीवोंको स्पर्श, रस, गंध, वर्ण का ज्ञान है। मच्छ, गाय, कबूतर इत्यादिक तिर्यंच और मनुष्य, देव, नारकी यह पंचेन्द्रिय हैं - इन्हें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्दों का ज्ञान है. तिर्यंचों में कई संज्ञी हैं - कई असंज्ञी हैं. वहाँ संज्ञियोंके मन जनित ज्ञान है, असंज्ञियोंके नहीं है. तथा मनुष्य, देव, नारकी संज्ञी ही हैं, उन सबके मनजनित ज्ञान पाया जाता है.
इस प्रकार मतिज्ञान की प्रवृत्ति जानना. श्रुतज्ञान की पराधीन प्रवृत्ति
अब, मतिज्ञान द्वारा जिस अर्थ को जाना हो उसके संबंध से अन्य अर्थ को जिसके द्वारा जाना जाये सो श्रुतज्ञान है. वह दो प्रकार का है - १.अक्षरात्मक २.अनक्षरात्मक. जैसे ‘घट’, यह दो अक्षर सुने या देखे वह तो मतिज्ञान हुआ। उनके संबंध से घट-पदार्थ का जानना हुआ सो श्रुतज्ञान है. इस प्रकार अन्य भी जानना. यह तो अक्षरात्मक श्रुतज्ञान है. तथा जैसे स्पर्श द्वारा शीत का जानना हुआ वह तो मतिज्ञान है। उसके संबन्ध से ‘यह हितकारी नहीं है इसलिये भाग जाना’ इत्यादिरूप ज्ञान हुआ सो श्रुतज्ञान है. इस प्रकार अन्य भी जानना. यह अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान है.
वहाँ एकेन्द्रियादिक असंज्ञी जीवों को तो अनक्षरात्मक ही श्रुतज्ञान है और संज्ञी पंचेन्द्रियोंके दोनों है. यह श्रुतज्ञान है सो अनेक प्रकार से पराधीन ऐसे मतिज्ञान के भी आधीन है तथा अन्य अनेक कारणोंके आधीन है। इसलिये महा पराधीन जानना. अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, केवलज्ञानकी प्रवृत्ति
अब, अपनी मर्यादा के अनुसार क्षेत्र-काल का प्रमाण लेकर रूपी पदार्थों को स्पष्ट- रूप से जिसके द्वारा जाना जाय वह अवधिज्ञान है. वह देव, नारकियों में तो सबको पाया जाता है और संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच तथा मनुष्यों के भी किसी को पाया जाता है. असंज्ञी पर्यन्त जीवों के यह होता ही नहीं है. सो यह भी शरीरादिक पुद्गलों के आधीन है. अवधि के तीन भेद हैं - १.देशावधि २.परमावधि ३.सर्वावधि. इनमें थोड़े क्षेत्र-काल की मर्यादा लेकर किंचित्मात्र रूपी पदार्थों को जानने वाला देशावधि है, सो ही किसी जीव के होता है.
तथा परमावधि, सर्वावधि और मन:पर्यय - ये ज्ञान मोक्षमार्ग में प्रगट होते हैं। केवलज्ञान मोक्षरूप है इसलिये इस अनादि संसार-अवस्था में इनका सद्भाव ही नहीं है.
इस प्रकार तो ज्ञानी की प्रवृत्ति पायी जाती है. चक्षु-अचक्षु-अवधि-केवलदर्शनकी प्रवृत्ति
अब, इन्द्रिय तथा मनको स्पर्शादिक विषयों का सम्बन्ध होने से प्रथम काल में मतिज्ञान से पूर्व जो सत्तामात्र अवलोकनरूप प्रतिभास होता है उसका नाम चक्षुदर्शन तथा अचक्षुदर्शन है. वहाँ नेत्र इन्द्रिय द्वारा दर्शन होने का नाम तो चक्षुदर्शन है। वह तो चौइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीवों को ही होता है. तथा स्पर्शन, रसना घ्राण, श्रोत्र - इन चार इन्द्रियों और मन द्वारा जो दर्शन होता है उसका नाम अचक्षुदर्शन है। वह यथायोग्य एकेन्द्रियादि जीवोंको होता है.
अब,अवधिकेविषयोंकासम्बन्धहोनेपरअवधिज्ञानकेपूर्वजोसत्तामात्र अवलोकनरूप प्रतिभास होता है उसका नाम अवधिदर्शन है. यह जिनके अवधिज्ञान सम्भव है उन्हीं को होता है.
यह चक्षु, अचक्षु, अवधिदर्शन है सो मतिज्ञान व अवधिज्ञानवत् पराधीन जानना. तथा केवलदर्शन मोक्षस्वरूप है उसका यहाँ सद्भाव ही नहीं है.
इस प्रकार दर्शन का सद्भाव पाया जाता है.
इस प्रकार ज्ञान-दर्शन का सद्भाव ज्ञानावरण, दर्शनावरण के क्षयोपशम के अनुसार होता है. जब क्षयोपशम थोड़ा होता है तब ज्ञान-दर्शन की शक्ति थोड़ी होती है। जब बहुत होता है तब बहुत होती है. तथा क्षयोपशम से शक्ति तो ऐसी बनी रहती है, परन्तु परिणमन द्वारा एक जीव को एक काल में एक विषय का ही देखना और जानना होता है. इस परिणमन ही का नाम उपयोग है. वहाँ एक जीव को एक काल में या तो ज्ञानोपयोग होता है या दर्शनोपयोग होता है. तथा एक उपयोग के भी एक भेद की प्रवृत्ति होती है. जैसे - मतिज्ञान हो तब अन्य ज्ञान नहीं होता . तथा एक भेद में भी एक विषय में ही प्रवृत्ति होती है. जैसे - स्पर्श को जानता है तब रसादिक को नहीं जानता. तथा एक विषय में उसे किसी एक अù में ही प्रवृत्ति होती है. जैसे - उष्णस्पर्श को जानता है तब रूक्षादिक को नहीं जानता.
इस प्रकार एक जीव को एक काल में एक ज्ञेय अथवा ¹श्य में ज्ञान अथवा दर्शन का परिणमन जानना. ऐसा ही दिखाई देता है. जब सुनने में उपयोग लगा हो तब नेत्र के समीप स्थित पदार्थ भी नहीं दीखता. इस ही प्रकार अन्य प्रवृत्ति देखी जाती है.
तथा परिणमन में शीघ्रता बहुत है. उससे किसी कालमें ऐसा माना लेते हैं कि युगपत् भी अनेक विषयों का जानना तथा देखना होता है, किन्तु युगपत् होता नहीं है, क्रम से ही होता है, संस्कारबल से उनका सााधन रहता है. जैसे - कौए के नेत्र के दो गोलक हैं, पुतली एक है वह फिरती शीघ्र है, उससे दोनों गोलकों का सााधन करती है। उसी प्रकार इस जीव के द्वार तो अनेक हैं और उपयोग एक है, वह फिरता शीघ्र है, उससे सर्व द्वारों का साधन रहता है.
यहाँ प्रश्न है कि - एक काल में एक विषय का जानना अथवा देखना होता है तो इतना ही क्षयोपशम हुआ कहो, बहुत क्तयों कहते हो? और तुम कहते हो कि क्षयोपशम से शक्ति होती है तो शक्ति तो आत्मा में केवलज्ञान-दर्शन की भी पायी जाती है.
समाधान :- जैसे किसी पुरुष के बहुत ग्रामों में गमन करने की शक्ति है. तथा उसे किसीे ने रोका और यह कहा कि पाँच ग्रामों में जाओ, परन्तु एक दिन में एक ग्राम को जाओ. वहाँ उस पुरुष के बहुत ग्राम जाने की शक्ति तो द्रव्य अपेक्षा पायी जाती है। अन्य काल में सामथ्र्य हो, परन्तु वर्त्तमान सामथ्र्यरूप नहीं है - क्तयोंकि वर्त्तमान में पाँच ग्रामों से अधिक ग्रामों में गमन नहीं कर सकता. तथा पाँच ग्रामों में जाने की पर्याय-अपेक्षा वर्त्तमान सामथ्र्यरूप शक्ति है, क्तयोंकि उसमें गमन कर सकता है। तथा व्यक्तता एक दिनमें एक ग्राम को गमन करने की ही पायी जाती है.
उसी प्रकार इस जीवके सर्व को देखने-जानने की शक्ति है. तथा उसे कर्मने रोका और इतना क्षयोपशम हुआ कि स्पर्शादिक विषयों को जानो या देखो, परन्तु एक काल में एक ही को जानो या देखो. वहाँ इस जीव के सर्वको देखने-जानने की शक्ति तो द्रव्य अपेक्षा पायी जाती है। अन्य काल में सामथ्र्य हो, परन्तु वर्त्तमान सामथ्र्यरूप नहीं है, क्तयोंकि अपने योग्य विषयों से अधिक विषयों को देख-जान नहीं सकता. तथा अपने योग्य विषयों को देखने-जानने की पर्याय- अपेक्षा वर्त्तमान सामथ्र्यरूप शक्ति है, क्तयोंकि उन्हें देख-जान सकता है। तथा व्यक्तता एक काल में एक ही को देखने या जानने की पायी जाती है.
यहाँ फिर प्रश्न है कि - ऐसा तो जाना। परन्तु क्षयोपशम तो पाया जाता है और बाह्य इन्द्रियादिक का अन्यथा निमित्त होने पर देखना-जानना नहीं होता या थोड़ा होता है या अन्यथा होता है, सो ऐसा होने पर कर्म ही का निमित्त तो नहीं रहा?
समाधान :- जैसे रोकने वाले ने यह कहा की पाँच ग्रामों में से एक ग्राम को एक दिन में जाओ, परन्तु इन किंकरों को साथ लेकर जाओ. वहाँ वे किंकर अन्यथा परिणमित हों तो जाना न हो या थोड़ा जाना हो या अन्यथा जाना हो। उसी प्रकार कर्मका ऐसा ही क्षयोपशम हुआ है कि इतने विषयों में एक विषय को एक काल में देखो या जानो। परन्तु इतने बाह्य द्रव्यों का निमित्त होने पर देखो-जानो. वहाँ वे बाह्य द्रव्य अन्यथा परिणमित हों तो देखना-जानना न हो या थोड़ा हो या अन्यथा हो. ऐसा यह कर्म के क्षयोपशम ही का विशेष है, इसलिये कर्म ही का निमित्त जानना. जैसे किसी को अंधकार के परमाणु आड़े आने पर देखना नहीं हो। उल्लू, बिल्ली आदि को उनके आड़े आने पर भी देखना होता है - सो ऐसा यह क्षयोपशम ही का विशेष है. जैसा-जैसा क्षयोपशम होता है वैसा-वैसा ही देखना-जानना होता है.
इस प्रकार इस जीव के क्षयोपशमज्ञान की प्रवृत्ति पायी जाती है.
तथा मोक्षमार्गमें अवधि-मन:पर्यय होते है वे भी क्षयोपशमज्ञान ही हैं, उनको भी इसी प्रकार एक काल में एकको प्रतिभासित करना तथा परद्रव्यका आधीनपना जानना. तथा जो विशेष है सो विशेष जानना.
इस प्राकर ज्ञानावरण-दर्शनावरण के उदयके निमित्तसे बहुत ज्ञान-दर्शन के अंशों का तो अभाव है और उनके क्षयोपशम से थोड़े अंशों का सद्भाव पाया जाता है.
मोहनीय कर्मोदयजन्य अवस्था
इस जीव को मोह के उदय से मिथ्यात्व और कषायभाव होते हैं. दर्शनमोहरूप जीव की अवस्था
वहाँ दर्शनमोह के उदयसे तो मिथ्यात्वभाव होता है, उससे यह जीव अन्यथा प्रतीतिरूप अतत्त्ववश्रद्धान करता है. जैसा है वैसा तो नहीं मानता और जैसा नहीं है वैसा मानता है. अमूर्तिक प्रदेशों का पुंज, प्रसिद्ध ज्ञानादिगुणोंका धारी अनादिनिधन वस्तु आप है। और मूर्तिक पुद्गलद्रव्योंका पिण्ड प्रसिद्ध ज्ञानादिकों से रहित जिनका नवीन संयोग हुआ ऐसे शरीरादिक पुद्गल पर हैं। इनके संयोगरूप नानाप्रकारकी मनुष्य तिर्यंचादिक पर्यायें होती है - उन पर्यायों में अहंबुद्धि धारण करता है, स्वपरका भेद नहीं कर सकता, जो पर्याय प्राप्त करे उस ही को आपरूप मानता है.
तथा उस पर्याय में ज्ञानादिक हैं वे तो अपने गुण हैं, और रागादिक हैं वे अपने को कर्मनिमित्त से औपाधिकभाव हुए हैं, तथा वर्णादिक हैं वे शरीरादिक पुद्गल के गुण हैं, और शरीरादिक में वर्णादिकोंका तथा परमाणुओंका नानाप्रकार पलटना होता है वह पुद्गल की अवस्था है। सो इन सब ही को अपना स्वरूप जानता है, स्वभाव-परभाव का विवेक नहीं हो सकता.
तथा मनुष्यादिक पर्यायों में कुटुम्ब-धनादिकका संबन्ध होता है वे प्रत्यक्ष अपने से भिन्न हैं तथा वे अपने आधीन नहीं परिणमित होते तथापि उनमें ममकार करता है कि ये मेरे हैं. वे किसी प्रकार भी अपने होते नहीं, यह ही अपनी मान्यता से ही अपने मानता है. तथा मनुष्यादि पर्यायों में कदाचित् देवादिक का या तत्त्ववों का अन्यथा स्वरूप जो कल्पित किया उसकी तो प्रतीति करता है परन्तु यथार्थ स्वरूप जैसा है वैसी प्रतीति नहीं करता.
इस प्रकार दर्शनमोह के उदय से जीव को अतत्त्ववश्रद्धानरूप मिथ्यात्वभाव होता है. जहाँ तीव्र उदय होता है वहाँ सत्य श्रद्धान से बहुत विपरीत श्रद्धान होता है. जब मंद उदय होता है तब सत्यश्रद्धान से थोड़ा विपरीत श्रद्धान होता है. चारित्रमोहरूप जीव अवस्था
जब चारित्रमोहके उदयसे इस जीव को कषायभाव होता है तब यह देखते-जानते हुए भी परपदार्थों में इष्ट-अनिष्टपना मानकर क्रोधादिक करता है.
वहाँ क्रोधका उदय होनेपर पदार्थों में अनिष्टपना मानकर उनका बुरा चाहता है. कोई मन्दिरादि अचेतन पदार्थ बुरे लगें तब तोड़ने-फोड़ने इत्यादि रूप से उनका बुरा चाहता है तथा शत्रु आदि सचेतन पदार्थ बुरे लगें तब उन्हें वध-बन्धनादिसे या मारनेसे दु:ख उत्पन्न करके उनका बुरा चाहता है. तथा आप स्वयं अथवा अन्य सचेतन-अचेतन पदार्थ किसी प्रकार परिणमति हुए, अपनेको वह परिणमन बुरा लगा तब अन्यथा परिणमित कराके उस परिणमन का बुरा चाहता है.
इस प्रकार क्रोधसे बुरा चाहने की इच्छा तो हो, बुरा होना भवितव्य आधीन है.
तथा मान का उदय होने पर पदार्थमें अनिष्टपना मान कर उसे नीचा करना चाहता है, स्वयं ऊँचा होना चाहता है। मल, धूल आदि अचेतन पदार्थों में घृणा तथा निरादर आदि से उनकी हीनता, अपनी उच्चता चाहता है. तथा पुरुषादिक सचेतन पदार्थों को झुकाना, अपने आधीन करना इत्यादिरूप से उनकी हीनता, अपनी उच्चता चाहता है. तथा स्वयं लोक में जैसे उच्च दिखे वैसे श्रुंगारादि करना तथा धन खर्च करना इत्यादिरूप से औरोंको हीन दिखा कर स्वयं उच्च होना चाहता है. तथा अन्य कोई अपने से उच्च कार्य करे उसे किसी उपाय से नीचा दिखाता है और स्वयं नीचा कार्य करे उसे उच्च दिखाता है.
इस प्रकार मानसे अपनी महंतताकी इच्छा तो हो, महंतता होना भवितव्य आधीन है.
तथा माया का उदय होनेपर किसी पदार्थ को इष्ट माानकर नाना प्रकार के छलों द्वारा उसकी सिद्धि करना चाहता है. रत्न सुवर्णादिक अचेतन पदार्थों की तथा स्त्री, दासी, दासादि सचेतन पदार्थों की सिद्धिके अर्थ अनेक छल करता है. ठगनेके अर्थ अपनी अनेक अवस्थाएँ करता है तथा अन्य अचेतन-सचेतन पदार्थों की अवस्था बदलता है. इत्यादिरूप छलसे अपना अभिप्राय सिद्ध करना चाहता है.
इस प्रकार मायासे इष्टसिद्धि के अर्थ छल तो करे, परन्तु इष्टसिद्धि होना भवितव्य आधीन है.
तथा लोभका उदय होने पर पदार्थों को इष्टमान कर उनकी प्राप्ति चाहता है. वस्त्राभरण, धन-धान्यादि अचेतन पदार्थों की तृष्णा होती है। तथा स्त्री-पुत्रादिक चेतन पदार्थों की तृष्णा होती है. तथा अपनेको या अन्य सचेतन-अचेतन पदार्थों को कोई परिणमन होना इष्ट माानकर उन्हें उस परिणमनरूप परिणमित करना चाहता है.
इस प्रकार लोभ से इष्ट प्राप्ति की इच्छा तो हो, परन्तु इष्ट प्राप्ति होना भवितव्य के आधीन है.
इस प्रकार क्रोधादिके उदयसे आत्मा परिणमित होता है.
वहाँयेकषायचारप्रकारकेहैं.१.अनन्तानुबंधी,२.अप्रत्याख्यानावरण,३. प्रत्याख्यानावरण, ४.संज्वलन. वहाँ(जिनका उदयहोनेपर आत्माको सम्यक्तत्व न हो, स्वरूपाचरणचारित्र न हो सके वे अनन्तानुबंधी कषाय हैं.·)ंजिनका उदय होनेपर देशचारित्र नहीं होता, इसलिये किंचित् त्याग भी नहीं हो सकता वे अप्रत्याख्यानावरण कषाय हैं. तथा जिनका उदय होने पर सकलचारित्र नहीं होता, इसलिये सर्वका त्याग नहीं हो सकता वे प्रत्याख्यानावरण कषाय हैं. तथा जिनका उदय होने पर सकलचारित्र में दोष उत्पन्न होते रहते हैं, इसलिये यथाख्यातचारित्र नहीं हो सकता वे संंज्वलन कषाय हैं.
अनादि संसार अवस्थामें इन चारों ही का निरन्तर उदय पाया जाया है. परम कृष्णलेष्यारूप तीव्र कषाय हो वहाँ भी और शुक्तललेश्यारूप मंदकषाय हो वहाँ भी निरंतर चारों ही का उदय रहता है. क्तयोंकि तीव्र-मंद की अपेक्षा अनंतानुबंधी आदि भेद नहीं है, सम्यक्तत्वादिक घात करने की अपेक्षा यह भेद हैं. इन्हीं प्रकृतियोंका तीव्र अनुभाग उदय होने पर तीव्र क्रोधादिक होते हैं, मंद अनुभाग उदय होने पर मंद होते हैं.
तथा मोक्षमार्ग होने पर इन चारों में से तीन, दो, एकका उदय होता है। फिर चारों का अभाव हो जाता है.
तथा क्रोधादिक चारों कषायों में से एक काल में एक ही का उदय होता है. इन कषायों के परस्पर कारणकार्यपना है. क्रोध से मानादिक हो जाते हैं, मान से क्रोधादिक हो जाते हैं। इसलिये किसी कालमें भिन्नता भासित होती है, किसी काल में भासित नहीं होती.
इस प्रकार कषायरूप परिणमन जानना.
तथा चारित्रमोहके ही उदय से नोकषाय होती है। वहाँ हास्य के उदयसे कहीं इष्टपना मान कर प्रफुल्लित होता है, हर्ष मानता है. तथा रति के उदय से किसी को इष्ट माान कर प्रीति करता है, वहाँ आसक्त होता है. तथा अरति के उदय से किसी को अनिष्ट माान कर अप्रीति करता है, वहाँ उद्वेगरूप होता है. तथा शोक के उदय से कहीं अनिष्टपना मानकर दिलगिर होता है, विषाद मानता है. तथा भयके उदयसे किसी को अनिष्ट माानकर उससे डरता है, उसका संयोग नहीं चाहता. तथा जुगुप्साके उदयसे किसी पदार्थ को अनिष्ट माानकर उससे घृणा करता है, उसका वियोग चाहता है.
इस प्रकार ये हास्यादिक छह जानने.
तथा वेदोंके उदयसे इसके काम परिणाम होते हैं. वहाँ स्त्रीवेद के उदय से पुरुष के साथ रमण करने की इच्छा होती है और पुरुषवेद के उदयसे स्त्री के साथ रमण करने की इच्छा होती है, तथा नपुंसकवेद के उदयसे युगपत्-दोनोंसे रमण करने की इच्छा होती है.
इसप्रकार ये नौ तो नोकषाय हैं. यह क्रोधादि सरीखे बलवान नहीं हैं इसलिये इन्हें ईषत् कषाय कहते हैं. यहाँ नौ शब्द ईषत्वाचक जानना. इनका उदय उन क्रोधादिकों के साथ यथासंभव होता है.
इस प्रकार मोह के उदय से मिथ्यात्व और कषायभाव होते हैं, सो ये ही संसार के मूल कारण हैं. इन्हीं से वर्त्तमान काल में जीव दु:खी है, और आगामी कर्मबन्ध के भी कारण ये ही हैं. तथा इन्हीं का नाम राग-द्वेष-मोह है. वहाँ मिथ्यात्वका नाम मोह है। क्तयोंकि वहाँ सावधानी का अभाव है. तथा माया, लोभ, कषाय एवं हास्य, रति और तीन वेदों का नाम राग है। क्तयोंकि वहाँ इष्टबुद्धि से अनुराग पाया जाता है. तथा क्रोध, मान, कषाय और अरति, शोक, भय, जुगुप्साओंका नाम द्वेष है। क्तयोंकि वहाँ अनिष्टबुद्धि से द्वेष पाया जाता है. तथा सामान्यत: सभी का नाम मोह है। क्तयोंकि इनमें सर्वत्र असावधानी पायी जाती है.
अंतरायकर्मोंदयजन्य अवस्था
तथा अंतराय के उदयसे जीव चाहे सो नहीं होता. दान देना चाहे सो नहीं दे सकता, वस्तु की प्राप्ति चाहे सो नहीं होती, भोग करना चाहे सो नहीं होता, उपभोग करना चाहे सो नहीं होता, अपनी ज्ञानादि शक्ति को प्रगट करना चाहे सो प्रगट नहीं हो सकती. इस प्रकार अंतराय के उदय से जो चाहता है सो नहीं होता, तथा उसी क्षयोपशम से किंचित्मात्र चाहा हुआ भी होता है. चाह तो बहुत है, परन्तु किंचित्मात्र दान दे सकता है, लाभ होता है, ज्ञानादिक शक्ति प्रगट होती है। वहाँ भी अनेक बाह्य कारण चाहियें.
इस प्रकार घाति कर्मों के उदय से जीव की अवस्था होती है.
वेदनीयकर्मोंदयजन्य अवस्था
तथा अघातिकर्मों में वेदनीय के उदय से शरीर में बाह्य सुख-दु:ख के कारण उत्पन्न होते हैं. शरीर में आरोग्यपना, शक्तिवानपना इत्यादि तथा क्षुधा, तृषा, रोग, खेद, पीड़ा इत्यादि सुख-दु:ख के कारण होते हैं. बाह्य में सुहावने ऋतु-पवनादिक, इष्ट स्त्री- पुत्रादिक तथा मित्र-धनादिक। असुहावने ऋतु-पवनादिक, अनिष्ट स्त्री-पुत्रादिक तथा शत्रु, दारिद्रय, वध-बन्धनादिक सुख-दु:ख को कारण होते हैं.
यह जो बाह्य कारण कहे हैं उनमें कितने कारण तो ऐसे हैं जिनके निमित्त से शरीर की अवस्था सुख-दु:ख को कारण होती है, और वे ही सुख-दु:ख को कारण होते हैं तथा कितने कारण ऐसे हैं जो स्वयं ही सुख-दु:ख को कारण होते हैं. ऐसे कारणों का मिलना वेदनीय उदय से होता है. वहाँ सातावेदनीय से सुख के कारण मिलते हैं और असातावेदनीय से दु:ख के कारण मिलते हैं.
यहाँ ऐसा जानना कि वे कारण ही सुख-दु:खको उत्पन्न नहीं करते, आत्मा मोह- कर्म उदयसे स्वयं सुख-दु:ख मानता है. वहाँ वेदनीयकर्म के उदयका और मोहकर्म के उदय का ऐसा ही सम्बन्ध है. जब सातावेदनीयका उत्पन्न किया बाह्य कारण मिलता है तब तो सुख मानने रूप मोहकर्मका उदय होता है, और जब असातावेदनीयकाउत्पन्न किया बाह्य कारण मिलता है तब दु:ख मानने रूप मोहकर्मका उदय होता है.
तथा यही कारण किसी को सुखका, किसी को दु:ख का कारण होता है. जैसे - किसी को सातावेदनीयका उदय होने पर मिला हुआ जैसा वस्त्र सुख का कारण होता है, वैसा ही वस्त्र किसी को असातावेदनीयका का उदय होने पर मिला सो दु:ख का कारण होता है. इसलिये बाह्य वस्तु सुख-दु:ख का निमित्तमात्र होती है. सुख-दु:ख होता है वह मोह के निमित्तसे होता है. निर्मोही मुनियों को अनेक ऋद्धि आदि तथा परिषह आदि कारण मिलते हैं तथापि सुख-दु:ख उत्पन्न नहीं होता. मोही जीव को कारण मिलने पर अथवा बिना कारण मिले भी अपने संकल्प ही से सुख-दु:ख हुआ ही करता है. वहाँ भी तीव्र मोही को जिस कारण के मिलने पर तीव्र सुख-दु:ख होते हैं, वही कारण मिलने पर मंद मोही को मंद सुख-दु:ख होते हैं.
इस लिये सुख-दु:खका मूल बलवान कारण मोहका उदय है.अन्य वस्तुएँ हैं वे बलवान कारण नहीं हैं। परन्तु अन्य वस्तुओंके और मोही जीवके परिणामोंके निमित्त- नैमित्तिक की मुख्यता पायी जाती है। उससे मोही जीव अन्य वस्तु ही को सुख-दु:खका कारण मानता है.
इस प्रकार वेदनीय से सुख-दु:खका कारण उत्पन्न होता है. आयुकर्मोदयजन्य अवस्था
तथा आयुकर्म के उदय से मनुष्यादि पर्यायों की स्थिति रहती है. जब तक आयु का उदय रहता है तब तक अनेक रोगादिक कारण मिलने पर भी शरीर से सम्बन्ध नहीं छूटता. तथा जब आयुका उदय न हो तब अनेक उपाय करने पर भी शरीर से संबन्ध नहीं रहता, उस ही काल आत्मा और शरीर पृथक हो जाते हैं.
इस संसार में जन्म, जीवन, मरणका कारण आयुकर्म ही है. जब नवीन आयुका उदय होता है तब नवीन पर्याय में जन्म होता है. तथा जब तक आयुका उदय रहे तब तक उस पर्यायरूप प्राणोंके धारणसे जीना होता है. तथा आयुका क्षय हो तब उस पर्यायरूप प्राण छूटने से मरण होता है. सहज ही ऐसा आयुकर्मका निमित्त है। दूसरा कोई उत्पन्न करने वाला, क्षय करने वाला या रक्षा करने वाला है नहीं - ऐसा निश्चय जानना.
तथा जैसे कोई नवीन वस्त्र पहिनता है, कुछ काल तक पहिने रहता है। फिर उसको छोड़कर अन्य वस्त्र पहिनता है। उसी प्रकार जीव नवीन शरीर धारण करता है, कुछ काल तक धारण किये रहता है, फिर उसको छोड़कर अन्य शरीर धारण करता है. इसलिये शरीर संबन्ध की अपेक्षा जन्मादिक हंै. जीव जन्मादि रहित नित्य ही है तथापि मोही जीव को अतीत अनागतका विचार नहीं है। इसलिये प्राप्त पर्याय मात्र ही अपनी स्थिति मानकर पर्याय संबन्धी कार्योंमें ही तत्पर हो रहा है.
इस प्रकार आयु से पर्याय की स्थिति जानना. नामकर्मोदयजन्य अवस्था
तथा नाम कर्म से यह जीव मनुष्यादि गतियोंको प्राप्त होता है। उस पर्यायरूप अपनी अवस्था होती है. वहाँ त्रस-स्थावरादि विशेष उत्पन्न होते हैं. तथा वहाँ एकेन्द्रियादि जातिको धारण करता है. इस जाति कर्मके उदय को और मतिज्ञानावरणके क्षयोपशमको निमित्त-नैमित्तिकपना जानना. जैसा क्षयोपशम हो वैसी जाति प्राप्त करता है.
तथा शरीरों का संबन्ध होता है। वहाँ शरीर के परमाणु और आत्मा के प्रदेशोंका एक बंधान होता है तथा संकोच-विस्ताररूप होकर शरीरप्रमाण आत्मा रहता है. तथा नोकर्मरूप शरीर में अंगोपांगादिकके योग्य स्थान प्रमाणसहित होते हैं. इसीसे स्पर्शन, रसना आदि द्रव्य-इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं तथा ñदय स्थान में आठ पंखुरियोंके फूले हुए कमलके आकार द्रव्यमन होता है. तथा उस शरीरमें ही आकारादिकका विशेष होना, वर्णादिकका विशेष होना और और स्थूल-सूक्ष्मत्वादिका होना इत्यादि कार्य उत्पन्न होते हैं। सो वे शरीररूप परिणमित परमाणु इस प्रकार परिणमित होते हैं.
तथा }वासोच्छ्वास और स्वर उत्पन्न होते हैं। वे भी पुद्गलके पिण्ड हैं और शरीर से एक बंधानरूप हैं. इनमें भी आत्मा के प्रदेश व्याप्त हैं. वहाँ }वासोच्छ्वास तो पवन है. जैसे आहारका ग्रहण करे और निहारको निकाले तभी जीना होता है। उसी प्रकार बाह्य पवन को ग्रहण करे और अभ्यंतर पवन को निकाले तभी जीवितव्य रहता है. इसलिये }वासोच्छ्वास जीवितव्य का कारण है. इस शरीर में जिस प्रकार हाड़-मांसादिक हैं उसी प्रकार पवन जानना. तथा जैसे हस्तादिकसे कार्य करते हैं वैसे ही पवन से कार्य करते हैं. मुँह में जो ग्रास खाया उसे पवन से निगलते हैं, मलादिक पवन से ही बाहर निकालते हैं, वैसे ही अन्य जानना. तथा नाड़ी, वायुरोग, वायगोला इत्यादिको पवनरूप शरीर के अंग जानना.
स्वर है वह शब्द है. सो जैसे वीणा की ताँत को हिलाने पर भाषारूप होने योग्य जो पुद्गल स्कन्ध हैं वे साक्षर या अनक्षर शब्दरूप परिणमित होते हैं। उसी प्रकार तालु, होंठ इत्यादि अंगों को हिलानेपर भाषापर्याप्ति में ग्रहण किये गये जो पुद्गल स्कन्ध हैं वे साक्षर या अनक्षर शब्दरूप परिणमित होते हैं.
तथा शुभ-अशुभ गमनादिक होते हैं. यहाँ ऐसा जानना कि जैसे दो पुरुषों को इकदंडी बेड़ी है. वहाँ एक पुरुष गमनादिक करना चाहे और दूसरा भी गमनादिक करे तो गमनादिक हो सकते हैं, दोनोंमेंसे एक बैठा रहे तो गमनादिक नहीं हो सकते, तथा दोनों मेंएकबलवान होतोदूसरेकोभीघसीटलेजाये.उसीप्रकारआत्मा केऔर शरीरादिकरूप पुद्गल के एकक्षेत्रावगाहरूप बंधान है। वहाँ आत्मा हलन-चलनादि करना चाहे और पुद्गल उस शक्ति से रहित हुआ हलन-चलन न करे अथवा पुद्गल में तो शक्ति पायी जाती है, परन्तु आत्मा कि इच्छा न हो तो हलन-चलनादि नहीं हो सकते. तथा इनमें पुद्गल बलवान होकर हलन-चलन करे तो उसके साथ बिना इच्छा के भी आत्मा हलन-चलन करता है. इस प्रकार हलन-चलनादि क्रिया होती है. तथा इसके अपयश आदि बाह्य निमित्त बनते हैं. - इस प्रकार ये कार्य उत्पन्न होते हैं, उनसे मोह के अनुसार आत्मा सुखी-दु:खी भी होता है.
ऐसे नामकर्म के उदय से स्वयमेव नानाप्रकार रचना होती है, अन्य कोई करने वाला नहीं है. तथा तीर्थंकरादि प्रकृति यहाँ है ही नहीं. गोत्रकर्मोदयजन्य अवस्था
गोत्रकर्म से उच्च-नीच कुल में उत्पन्न होना होता है। वहाँ अपनी अधिकता-हीनता प्राप्त होती है. मोह के उदय से आत्मा सुखी-दु:खी भी होता है.
इस प्रकार अघातिकर्मोंके निमित्त से अवस्था होती है.
इस प्रकार इस अनादि संसार में घाति-अघातिकर्मोंके उदय के अनुसार आत्माके अवस्था होती है. सो हे भव्य अपने अंतरंग में विचार कर देख कि ऐसे ही है कि नहीं. विचार करने पर ऐसा ही प्रतिभासित होता है. यदि ऐसा है तो तू यह मान कि -—मेरे अनादि संसार रोग पाया जाता है, उसके नाशका मुझे उपाय करना- इस विचार से तेरा कल्याण होगा.
- इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र में संसार अवस्था का निरूपक
द्वितीय अधिकार सम्पूर्ण हुआ ॥२॥

तीसरा अधिकार

सांसारदु:ख तथा

मोक्षसुखका निरूपण

दोहा-सो निजभाव सदा सुखद, अपनौं करौ प्रकाश .
जो बाहुविधि भवदुखनिकौ, करिहै सत्ता नाश ..
अथ, इस संसार-अवस्थामें नानाप्रकारके दु:ख हैं उनका वर्णन करते हैं . क्तयोंकि यदि संसारमें भी सुख हो तो संसार से मुक्त होनेका उपाय किसलिये करें. इस संसारमें अनेक दु:ख हैं, इसलिये संसारसे मुक्त होनेका उपाय करते हैं.
जैसे - वैद्य रोगका निदान और उसकी अवस्थााका वर्णन करके, रोगीको रोगका निश्चयकराकर,फिरउसकाइलाजकरनेकीरुचिकराताहै.उसीप्रकारयहाँ संसारका निदान तथा उसकी अवस्थाका वर्णन करके, संसारीको संसार-रोगका निश्चय कराके, अब उसका उपाय करनेकी रुचि कराते हैं.
जैसे - रोगी रोगसे दु:खी हो रहा है परन्तु उसका मूल कारण नहीं जानता, सच्चा उपाय नहीं जानता और दु:ख सहा नहीं जाता। तब जो उसे भासित हो वही उपाय करता है इसलिये दु:ख दूर नहीं होता, तब तड़प-तड़पकर परवश हुआ उन दु:खों को सहता है. उसे वैद्य दु:खका मूलकारण बतलाये, दु:खका स्वरूप बतलाये, उन उपायोंको झूठा बतलाये, तब सच्चे उपाय करनेकी रुचि होती है. उसी प्रकार संसारी संसार से दु:खी होरहा है परन्तु उसका मूलकारण नहीं जानता, तथा सच्चे उपाय नहीं जानता और दु:ख सहा भी नहीं जाता। तब अपने को भासित हो वही उपाय करता है इसलिये दु:ख दूर नहीं होता, तब तड़प-तड़पकर परवश हुआ उन दु:खों को सहता है. उसे यहाँ दु:खका मूलकारण बतलाते हैं, दु:खका स्वरूप बतलाते हैं, और उन उपायोंको झूठे बतलायें तो सच्चे उपाय करनेकी रूचि हो. इसलिये यह वर्णन यहाँ करते हैं.

संसारदु:ख और उसका मूलकारण

(क)कर्मोंकी अपेक्षासे

वहाँ सब दु:खोंका मूलकारण मिथ्यादर्शन, अज्ञान और असंयम है. जो दर्शन-मोहके उदयसे हुआ अतत्त्ववश्रद्धान मिथ्यादर्शन है, उससे वस्तुस्वरूपकी यथार्थ प्रतीति नहीं हो सकती, अन्यथा प्रतीति होती है. तथा उस मिथ्यादर्शन ही के निमित्तसे क्षयोपशमरूप ज्ञान है वह अज्ञान होरहा है, उससे यथार्थ वस्तुस्वरूपका जानना नहीं होता, अन्यथा जानना होता है. तथा चारित्रमोहके उदयसे हुआ कषायभाव उसका नाम असंयम है, उससे जैसे वस्तुस्वरूप है वैसा नहीं प्रवर्तता, अन्यथा प्रवृत्ति होती है.
इसप्रकार ये मिथ्यादर्शनादिक हैं वे ही सर्व दु:खोंका मूल कारण हैं. किस प्रकार? सो बतलाते हैं :- ज्ञानावरण और दर्शनावरणके क्षयोपशमसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
मिथ्यादर्शनादिकसेजीवकोस्व-परविवेकनहींहोसकता.स्वयंएकआत्मा और अनन्त पुद्गलपरमाणुमय शरीर। इनके संयोगरूप मनुष्यादि पर्याय उत्पन्न होती है, उसी पर्यायको स्व मानता है. तथा आत्माका ज्ञान-दर्शनादि स्वभाव है उसके द्वारा ंकिंचित् जानना-देखना होता है। और कर्मोपाधिसे हुए कक्रोधादिकभाव उनरूप परिणाम पाये जाते है। तथा शरीरका स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण स्वभाव है वह प्रगट है और स्थूल-कृषादिक होना तथा स्पर्शादिकका पलटना इत्यादि अनेक अवस्थायें होती हैं। - इन सबको अपना स्वरूप जानता है.
वहाँ ज्ञान-दर्शनकी प्रवृत्ति इन्द्रिय-मनके द्वारा होती है, इसलिये यह मानता है कि ये त्वचा, जीभ, नासिका, नेत्र, कान, मन मेरे अंग हैं. इनके द्वारा मैं देखता-जानता हँू । ऐसी मान्यतासे इन्द्रियोंमें प्रीति पायी जाती है.
तथा मोहके आवेशसे उन इन्द्रियोंके द्वारा विषय ग्रहण करने की इच्छा होती है. और उन विषयोंका ग्रहण होनेपर उस इच्छाके मिटनेसे निराकुल होता है तब आनन्द मानता है. जैसे कुत्ता ह»ी चबाता है, उससे अपना लोहू निकले उसका स्वाद लेकर ऐसा मानता है कि यह ह»यिोंका स्वाद है. उसी प्रकार यह जीव विषयोंको जानता है, उससे अपना ज्ञान प्रवर्तता है, उस का स्वाद लेकर ऐसा मानता है कि यह विषयका स्वाद है सो विषयमें तो स्वाद है नहीं. स्वयं ही इच्छा की थी, उसे स्वयं ही जानकर स्वयं ही आनन्द मान लिया परन्तु मैं अनादि-अनन्त ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ - ऐसा नि:केवलज्ञानकातोअनुभवनहैनहीं.तथामैंनेनृत्यदेखा,रागसुना,फूलसूँघे, (पदार्थका स्वाद लिया, पदार्थका स्पर्श किया)शास्त्र जाना, मुझे यह जानना। - इस प्रकार ज्ञेयमिश्रित ज्ञानका अनुभवन है उससे विषयोंकी ही प्रधानता भासित होती है. इस प्रकार इस जीवको मोहके निमित्तसे विषयोंकी इच्छा पायी जाती है.
वहाँ इच्छा तो त्रिकालवर्ती सर्वविषयोंको ग्रहण करनेकी है. मैं सर्वका स्पर्श करूँ, सर्वका स्वाद लूँ, सर्वको सूँघूँ, सर्वको देखूँ, सर्वको सुनूँ, सर्वको जानूँ। इच्छा तो इतनी है. परन्तु शक्ति इतनी ही है कि इन्द्रियोंके सम्मुख आनेवाले वर्त्तमान स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द। उनमेंसे किसीको किंचित् मात्र ग्रहण करे तथा स्मरणादिकसे मन द्वारा किंचित् जाने, सो भी बाह्य अनेक कारण मिलने पर सिद्ध हो. इसलिए इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती. ऐसी इच्छा तो केवलज्ञान होने पर सम्र्पूण हो.
क्षयोपशमरूप इन्द्रियोंसे तो इच्छा पूर्ण होती नहीं है, इसलिये मोहके निमित्तसे इन्द्रियोंको अपने-अपने विषय ग्रहणकी निरन्तर इच्छा होती ही रहती है। उससे आकुलित होकर दु:खी होरहा है. ऐसा दु:खी हो रहा है कि किसी एक विषयके ग्रहणके अर्थ अपने मरणको भी नहीं गिनता है. जैसे हाथीको कपटकी हथिनीका शरीर स्पर्श करनेकी, मच्छको बंसीमें लगा हुआ मांसका स्वाद लेनेकी, भ्रमरको कमल-सुगन्ध सूंघनेकी, पतंगेको दीपकका वर्ण देखनेकी, और हरिणको राग सुननेकी इच्छा ऐसी होती है कि तत्काल मरना भासित होतथापिमरणकोनहींगिनते.विषयोंकाग्रहणकरनेपरउसकेमरणहोताथा, विषयसेवन नहीं करने पर इन्द्रियों की पीड़ा अधिक भासित होती हेै. इन इन्द्रियोंकी पीड़ासे पीडि़तरूप सर्व जीव र्निर्विचार होकर जैसे कोई दु:खी पर्वतसे गिर पड़े वैसे ही विषयोंमें छलांग लगाते हैं. नााना कष्टसे धन उत्पन्न करते हैं, उसे विषयके अर्थ खोते हैैैैं. तथा विषयोंके अर्थ जहाँ मरण होना जानते हैं वहाँ भी जाते हैं. नरकादिके कारण जो हिंसादिक कार्य उन्हें करतें हैं तथा कक्रोधादि कषायोंको उत्पन्न करते हैं.
वे करें क्तया? इन्द्रियोंकी पीड़ा सही नहीं जाती, इसलिये अन्य विचार कुछ आता नहीं. इसी पीड़ासे पीडि़त हुए इन्द्रादिक हैं। वे भी विषयोंमें अति आसक्त हो रहे हैं. जैसे खाज-रोगसे पीडि़त हुआ पुरूष आसक्त होकर खुजाता है, पीड़ा न हो तो किसलिये खुजाये। उसी प्रकार इन्द्रियरोगसे पीडि़त हुए इन्द्रादिक आसक्त होकर विषय सेवन करते हैं. पीड़ा न हो तो किसलिये विषय सेवन करें?
इस प्रकार ज्ञानावरण-दर्शनावरणके क्षयोपशमसे हुआ इन्द्रियजनित ज्ञान है, वह मिथ्यादर्शनादिके निमित्तसे इच्छासहित होकर दु:खका कारण हुआ है.
अब, इस दु:खके दूर होनेका उपाय यह जीव क्तया करता है सो कहते हैं. इन्द्रियोंसेविषयोंकाग्रहणहोनेपरमेरीइच्छापूर्णहोगीऐसाजानकरप्रथमतो नानाप्रकारकेभोजनादिकोंसेइन्द्रियोंकोप्रबलकरताहैऔरऐसाहीजानताहैकि इन्द्रियोंके प्रबल रहनेसे मेरे विषय-ग्रहणकी शक्ति विशेष होती है. तथा वहाँ अनेक बाह्य कारण चाहिए उनका निमित्त मिलाता है.
तथा इन्द्रियाँ हैं वे विषय सन्मुख होने पर उनको ग्रहण करती हैं, इसलिए अनेक बाह्यउपायों द्वारा विषयोंका तथा इन्द्रियोंका संयोग मिलाता है. नानाप्रकारके वस्त्रादिकका, भोजनादिकका,पुष्पादिकका,मन्दिर-आभूषणादिककातथागान-वादित्रादिककासंयोग मिलानेके अर्थ बहुत ही खेदखिन्न होता है.
तथा इन इन्द्रियोंके सन्मुख विषय रहता है तबतक उस विषयका किंचित् स्पष्ट जानपना रहता है, पश्चात् मन द्वारा स्मरणमात्र रह जाता है. काल व्यतीत होने पर स्मरण भी मंद होता जाता है, इसलिए उन विषयोंको अपने आधीन रखनेका उपाय करता है और शीघक्र-शीघक्र उनका ग्रहण किया करता है. तथा इन्द्रियोंके तो एक कालमें एक विषयका ही ग्रहण होता है, किन्तु यह बहुत ग्रहण करना चाहता है इसलिये आकुलित होकर शीघक्र- शीघक्र एक विषयको छोड़कर अन्यको ग्रहणकरता है, तथा उसे छोड़कर अन्यको ग्रहण करता है - ऐसे झपट्टे मारता है.
इस प्रकार जो उपाय इसे भासित होते हैं सो करता है, परन्तु वे झूठे हैं. क्तयोंकि प्रथम तो इन सबका ऐसा ही होना अपने आधीन नहीं हैं, महान् कठिन है। तथा कदाचित् उदय अनुसार ऐसी ही विधि मिल जाये तो इन्द्रियोंको प्रबल करनेसे कहीं विषयग्रहणकी शक्ति बढ़ती नहीं है। वह शक्ति तो ज्ञान-दर्शन बढ़ाने पर बढ़ती है सो यह कर्मके क्षयोपशमके आधीन है. किसीका शरीर पुष्ट है उसके ऐसी शक्ति कम देखी जाती है, किसीका शरीर दुर्बल है उसके अधिक देखी जाती है. इसलिए भोजनादि द्वारा इन्द्रियाँ पुष्ट करनेसे कुछ सिद्धि है नहीं. कषायादि घटनेसे कर्मका क्षयोपशम होने पर ज्ञान-दर्शन बढ़े तब विषयग्रहणकी शक्ति बढ़ती है.
तथा विषयोंका जो संयोग मिलाता है वह बहुत काल तक नहीं रहता अथवा सर्व विषयों का संयोग मिलता ही नहीं है, इसलिये यह आकुलता बनी ही रहती है. तथा उन विषयोंको अपने आधीन रखकर शीघक्र-शीघक्र ग्रहण करता है, किन्तु वे आधीन रहते नहीं हैं. वे भिन्न द्रव्य तो अपने आधीन परिणमित होते हैं या कर्मोदय के आधीन हैं. ऐसे कर्मका बन्ध यथायोग्य शुभभाव होने पर होता है और पश्चात् उदय आता है वह प्रत्यक्ष देखते हैं. अनेक उपाय करने पर भी कर्मके निमित्त बिना सामग्री नहीं मिलती.
तथा एक विषयको छोड़कर अन्यका ग्रहण करता है ऐसे झपट्टे मारता है उससे क्तया सिद्धि होती है? जैसे मणकी भूखवालेको कण मिले तो क्तया भूख मिटती है? उसी प्रकार जिसे सर्वके ग्रहणकी इच्छा है उसे एक विषयका ग्रहण होने पर क्तया इच्छा मिटती है? इच्छा मिटे बिना सुख नहीं होता, इसलिए यह उपाय झूठा है.
कोई पूछता है कि इस उपायसे कई जीव सुखी होते देखे जाते हैं, सर्वथा झूठ कैसे कहते हो?
समाधान :- सुखी तो नहीं होते हैं भ्रमसे सुख मानते हैं. यदि सुखी हुए हों तो अन्य विषयोंकी इच्छा कैसे रहेगी? जैसे - रोग मिटने पर अन्य औषधिको क्तयों चाहे? उसी प्रकार दु:ख मिटने पर अन्य विषयोंको क्तयों चाहे? इसलिये विषयके ग्रहण द्वारा इच्छा रुक जाये तो हम सुख मानें. परन्तु जब तक जिस विषयका ग्रहण नहीं होता तब तक तो उसकी इच्छा रहती है और जिस समय उसका ग्रहण हुआ उसी समय अन्य विषय-ग्रहणकी इच्छा होती देखी जाती है, तो यह सुख मानना कैसे है? जैसे कोई महा क्षुधावान रंक उसको एक अन्नका कण मिला उसका भक्षण करके चैन माने। उसी प्रकार यह महा तृष्णावान उसको एक विषयका निमित्त मिला उसका ग्रहण करके सुख मानता है, परमार्थसे सुख है नहीं.
कोई कहे कि जिस प्रकार कण-कण करके अपनी भूख मिटाये उसी प्रकार एक-एक विषयका ग्रहण करके अपनी इच्छा पूर्ण करे तो दोष क्तया?
उत्तर :- यदि वे कण एकत्रित हों तो ऐसा ही मान लें, परन्तु जब दूसरा कण मिलता है तब पहले कणका निर्र्गमन हो जाये तो कैसे भूख मिटेगी? उसी प्रकार जाननेमें विषयोंका ग्रहण एकत्रित होता जाये तो इच्छा पूर्ण हो जाये, परन्तु जब दूसरा विषय ग्रहण करता है तब पूर्वमें जो विषय ग्रहण किया था उसका जानना नहीं रहता, तो कैसे इच्छा पूर्ण हो? इच्छा पूर्ण हुए बिना आकुलता मिटती नहीं है और आकुलता मिटे बिना सुख कैसे कहा जाय?
तथा एक विषयका ग्रहण भी मिथ्यादर्शनादिकके सद्भावपूर्वक करता है, इसलिये आगामी अनेक दु:खोंके कारण कर्म बंधते हैं. इसलिये यह वर्त्तमानमें सुख नहीं है, आगामी सुख का कारण नहीं है, इसलिये दु:ख ही है. यही प्रवचनसारमें कहा है :-
सपरं बाधासहियं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं.
जं इंदिएहिं लद्धं तं सोक्तखं दुक्तखमेव तहा ॥७६॥
अर्थ :- जो इन्द्रियोंसे प्राप्त किया सुख है वह पराधीन है, बाधासहित है, विनाशीक है, बन्धका कारण है, विषम है। सो ऐसा सुख इस प्रकार दु:ख ही है.
इस प्रकार इस संसारी जीव द्वारा किये उपाय झूठे जानना.
तो सच्चा उपाय क्तया है? जब इच्छा तो दूर हो जाये और सर्व विषयोंका युगपत् ग्रहण बना रहे तब यह दु:ख मिटे. सो इच्छा तो मोह जाने पर मिटे और सबका युगपत् ग्रहण केवलज्ञान होने पर हो. इनका उपाय सम्यग्दर्शनादिक है और वही सच्चा उपाय जानना.
इस प्रकार तो मोहके निमित्तसे ज्ञानावरण-दर्शनावरणका क्षयोपशम भी दु:खदायक है उसका वर्णन किया.
यहाँ कोई कहे कि - ज्ञानावरण-दर्शनावरणके उदयसे जानना नहीं हुआ, इसलिये उसे दु:खका कारण कहो। क्षयोपशमको क्तयों कहते हो?
समाधान :- यदि जानना न होना दु:खका कारण हो तो पुद्गलके भी दु:ख ठहरे, परन्तुदु:खकामूलकारणतोइच्छाहैऔरइच्छाक्षयोपशमसेहीहोतीहै,इसलिये क्षयोपशमको दु:खका कारण कहा है। परमार्थसे क्षयोपशम भी दु:खका कारण नहीं है. जो मोहसे विषय- ग्रहणकी इच्छा है वही दु:खका कारण जानना.
मोहनीय कर्म के उदयसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
मोहका उदय है सो दु:खरूप ही है, किस प्रकार सो कहते हैं :- दर्शनमोहसे दु:ख और उससे निवृत्ति
प्रथम तो दर्शनमोहके उदयसे मिथ्यादर्शन होता है। उसके द्वारा जैसा इसके श्रद्धान है वैसा तो पदार्थ होता नहÄ है, जैसा पदार्थ है वैसा यह मानता नहÄ है, इसलिये इसको आकुलता ही रहती है.
जैसे - पागलको किसीने वस्त्र पहिना दिया. वह पागल उस वस्त्रको अपना अंग जानकर अपनेको और वस्त्रको एक मानता है. वह वस्त्र पहिनानेवालेके आधीन होनेसे कभी वह फाड़ता है, कभी जोड़ता है, कभी खोंसता है, कभी नया पहिनाता है - इत्यादि चरित्र करता है. वह पागल उसे अपने आधीन मानता है, उसकी पराधीन किक्रया होती है, उससे वह महा खेदखिन्न होता है. उसी प्रकार इस जीवको कर्मोदयने शरीर सम्बन्ध कराया. यह जीव उस शरीरको अपना अंग जानकर अपनेको और शरीरको एक मानता है. वह शरीर कर्मके आधीन कभी कृष होता है, कभी स्थूल होता है, कभी नष्ट होता है, कभी नवीन उत्पन्न होता है - इत्यादि चरित्र होते हैं.यह जीव उसे अपने आधीन मानता है, उसकी पराधीन किक्रया होती है, उससे महा खेदखिन्न होता है.
तथा जैसे - जहाँ वह पागल ठहरा था वहाँ मनुष्य, घोड़ा, धनादिक कहींसे आकर उतरे, वह पागल उन्हें अपना जानता है. वे तो उन्हींकेआधीन कोई आते हैं, कोई जाते हैं, कोई अनेक अवस्थारूप परिणमन करते हैं। वह पागल उन्हें अपने आधीन मानता है, उनकी पराधीन किक्रया हो तब खेदखिन्न होता है. उसी प्रकार यह जीव जहाँ पर्याय धारण करता है वहाँ स्वयमेव पुत्र, घोड़ा, धनादिक कहÄ से आकर प्राप्त हुए, यह जीव उन्हें अपनाजानताहै.वेतोउन्हींकेआधीनकोईआतेहैं,कोईजातेहैं,कोईअनेक अवस्थारूप परिणमन करते हैं। यह जीव उन्हें अपने आधीन मानता है, और उनकी पराधीन किक्रया हो तब खेदखिन्न होता है.
यहाँ कोई कहे कि - किसी कालमें शरीरकी तथा पुत्रादिककी किक्रया इस जीवके आधीन भी तो होती दिखायी देती है, तब तो यह सुखी होता है?
समाधान:- शरीरादिकके भवितव्यकी और जीवकी इच्छाकी विधि मिलने पर किसी एक प्रकार जैसे वह चाहता है वैसे कोई परिणमित होता है, इसलिये किसी कालमें उसीका विचार होनेपर सुखकासा आभास होता है। परन्तु सर्व ही तो सर्व प्रकारसे जैसे यह चाहता है वैसे परिणमित नहीं होते, इसलिये अभिप्रायमें तो अनेक आकुलता सदाकाल रहा ही करती है.
तथा किसी कालमें किसी प्रकार इच्छानुसार परिणमित होते देखकर कहीं यह जीव शरीर, पुत्रादिकमें अहंकार-ममकार करता है। सो इस बुद्धिसे उनको उत्पन्नकरनेकी, बढ़ाने की, तथा रक्षा करनेकी चिंतासे निरन्तर व्याकुल रहता है. नाना प्रकार कष्ट सहकर भी उनका भला चाहता है.
तथा जो विषयोंकी इच्छा होती है, कषाय होती है, बाह्य-सामग्रीमें इष्ट-अनिष्टपना मानता है, अन्यथा उपाय करता है, सच्चे उपायकी श्रद्धा नहीं करता, अन्यथा कल्पना करता है, सो इन सबका मूलकारण एक मिथ्यादर्शन है. उसका नाश होने पर सबका नाश हो जाता है, इसलिये सब दु:खोंका मूल यह मिथ्यादर्शन है.
तथा उस मिथ्यादर्शनके नाशका उपाय भी नहीं करता. अन्यथा श्रद्धानको सत्यश्रद्धान माने तब उपाय किसलिये करे?
तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय कदाचित् तत्त्ववनिश्चय करनेका उपाय विचारे, वहाँ अभाग्यसे कुदेव-कुगुरु-कुशास्त्रका निमित्त बने तो अतत्त्ववश्रद्धान पुष्ट होजाता है. वह तो जानता है कि इनसे मेरा भला होगा। परन्तु वे ऐसा उपाय करते हैं जिससे यह अचेत हो जाय. वस्तुस्वरूपका विचार करनेको उद्यमी हुआ था सो विपरीत विचारमें दृढ़ हो जाता है और तब विषय-कषायकी वासना बढ़नेसे अधिक दु:खी होता है.
तथा कदाचित् सुदेव-सुगुरु-सुशास्त्रका भी निमित्त बन जाये तो वहाँ उनके निश्चय उपदेशकातोश्रद्धाननहींकरता,व्यवहारश्रद्धानसेअतत्त्ववश्रद्धानीहीरहताहै.वहाँ मंदकषाय हो तथा विषयकी इच्छा घटे तो थोड़ा दु:खी होता है, परन्तु फिर जैसेका तैसा हो जाता है। इसलिये यह संसारी जो उपाय करता है वे भी झूठे हीे होते हैं.
तथा इस संसारीके एक यह उपाय है कि स्वयंको जैसा श्रद्धान है उसी प्रकार पदार्थोंको परिणमित करना चाहता है. यदि वे परिणमित हों तो इसका सच्चा श्रद्धान हो जाये. परन्तुअनादिनिधन वस्तुएँ भिन्न-भिन्न अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती हैं, कोई किसीके आधीन नहीं हैं, कोई किसीके परिणमित करानेसे परिणमित नहीं होतीं.उन्हें परिणमित कराना चाहे वह कोई उपाय नहीं है, वह तो मिथ्यादर्शन ही है.
तो सच्चा उपाय क्तया है? जैसा पदार्थोंका स्वरूप है वैसा श्रद्धान हो जाये तो सर्व दु:ख दूर हो जायें. जिस प्रकार कोई मोहित होकर मुर्देको जीवित माने या जिलाना चाहे तो आप ही दु:खी होता है. तथा उसे मुर्दा मानना और यह जिलानेसे जियेगा नहीं ऐसा मानना सो ही उस दु:खके दूर होने का उपाय है. उसी प्रकार मिथ्या¹ष्िट होकर पदार्थोंको अन्यथा माने, अन्यथा परिणमित करना चाहे तो आप ही दु:खी होता है. तथाउन्हें यथार्थ मानना और यह परिणमित करानेसे अन्यथा परिणमित नहीं होगें ऐसा मानना सो ही उस दु:खके दूर होने का उपाय है. भ्रमजनित दु:खका उपाय भ्रम दूर करना ही है.सो भ्रम दूर होने से सम्यक्श्रद्धान होता है, वही सत्य उपाय जानना. चाारित्रमोहसे दु:ख और उससे निवृत्ति
चाारित्रमोहके उदयसे कक्रोधादिकषायरूप तथा हास्यादि नोकषायरूप जीवके भाव होते हैं, तब यह जीव क्तलेशवान होकर दु:खी होता हुआ विðल होकर नानाप्रकारके कुकार्र्योंंमें प्रवर्तता है. सो ही दिखाते हैं :-
जब इसके कक्रोधकषाय उत्पन्न होती है तब दूसरेका बुरा करनेकी इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय विचारता है, मर्मच्छेदी गालीप्रदानादिरूप वचन बोलता है. अपने अंगोंसे तथा शस्त्र-पाषाणादिकसे घात करता है. अनेक कष्ट सहनकर तथा धनादि खर्च करके व मरणादि द्वारा अपना भी बुरा करके अन्यका बुरा करनेका उद्यम करता है अथवा औरोंसे बुरा होना जाने तो औरोंसे बुरा कराता है. स्वयं ही उसका बुरा होता हो तो अनुमोदन करता है.उसका बुरा होनेसे अपना कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो तथापि उसका बुरा करता है. तथा कक्रोध होनेपर कोई पूज्य या इष्टजन भी बीचमें आयें तो उन्हें भी बुरा कहता है, मारने लग जाता है, कुछ विचार नहीं रहता. तथा अन्यका बुरा न हो तो अपने अंतरंगमें आप ही बहुत संतापवान होता है और अपने ही अंगोंका घात करता है तथा विषादिसे मर जाता है. - ऐसी अवस्था कक्रोध होनेसे होती है.
तथा जब इसके मान कषाय उत्पन्न होती है तब औरोंको नीचा व अपनेको ऊँचा दिखाने की इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है. अन्यकी निंदा करता है, अपनी प्रशंसा करता है व अनेकप्रकारसे औरोंकी महिमा मिटाता है, अपनी महिमा करता है. महाकष्टसे जो धनादिकका संग्रह किया उसे विवाहादि कार्योंमें खर्च करता है तथा कर्ज लेकर भी खर्चता है. मरनेके बाद हमारा यश रहेगा ऐसा विचारकर अपना मरण करके भी अपनी महिमा बढ़ाता है. यदि कोई अपना सन्मानादिक न करे तो उसे भयादिक दिखाकर दु:ख उत्पन्न करके अपना सन्मान कराता है. तथा मान होने पर कोई पूज्य-बड़े हों उनका भी सन्मान नहीं करता, कुछ विचार नहीं रहता. यदि अन्य नीचा और स्वयं ऊँचा दिखाई न दे, तो अपने अंतरंगमें आप बहुत संतापवान होता है और अपने अंगोंका घात करता है तथा विष आदिसे मर जाता है.- ऐसी अवस्था मान होने पर होती है.
तथा जब इसके माया कषाय उत्पन्न होती है तब छल द्वारा कार्य सिद्ध करनेकी इच्छा होती है. उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है, नानाप्रकार कपटके वचन कहता है, शरीरकी कपटरूप अवस्था करता है, बाह्यवस्तुओंको अन्यथा बतलाता है, तथा जिनमें अपना मरण जाने ऐसे भी छल करता है. कपट प्रगट होनेपर स्वयंका बहुत बुरा हो, मरणादिक हो उनको भी नहीं गिनता. तथा माया होनेपर किसी पूज्य व इष्टका भी सम्बन्ध बने तो उनसे भी छल करता है, कुछ विचार नहीं रहता. यदि छल द्वारा कार्यसिद्धि न हो तो स्वयं बहुत संतापवान होता है, अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदिसे मर जाता है. - ऐसी अवस्था माया होनेपर होती है.
तथा जब इसके लोभ कषाय उत्पन्न हो तब इष्ट पदार्थके लाभकी इच्छा होनेसे उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है. उसके साधनरूप वचन बोलता है, शरीरकी अनेक चेष्टा करता है, बहुत कष्ट सहता है, सेवा करता है, विदेशगमन करता है. जिसमें मरण होना जाने वह कार्य भी करता है. जिनमें बहुत दु:ख उत्पन्न हो ऐसे प्रारभ्भ करता है. तथा लोभ होनेपर पूज्य व इष्टका भी कार्य हो वहाँ भी अपना प्रयोजन साधता है, कुछ विचार नहीं रहता. तथा जिस इष्ट वस्तुकी प्राप्ति हुई है उसकी अनेक प्रकारसे रक्षा करता है. यदि इष्ट वस्तुकी प्राप्ति न हो या इष्टका वियोग हो तो स्वयं संतापवान होता है, अपने अंगोंका घात करता है तथा विष आदिसे मर जाता है. - ऐसी अवस्था लोभ होनेपर होती है.
इस प्रकार कषायोंसे पीडि़त हुआ इन अवस्थाओंमें प्रवर्तता है.
तथा इन कषायोंके साथ नोकषाय होती हैं. वहाँ जब हास्यकषाय होती है तब स्वयं विकसित प्रफुल्लित होता है। वह ऐसा जानना जैसे सन्निपातके रोगीका हँसना, नानारोगोंसे स्वयं पीडि़त है तो भी कोई कल्पना करके हँसने लग जाता है. इसी प्रकार यह जीव अनेक पीड़ा सहित है। तथापि कोई झूठी कल्पना करके, अपनेको सुहाता कार्य मानकर हर्ष मानता है, परमार्थत: दु:खी होता है. सुखी तो कषाय-रोग मिटने पर होगा.
तथा जब रति उत्पन्न होती है तब इष्ट वस्तुमें अति आसक्त होता है. जैसे बिल्ली चूहेको पकड़कर आसक्त होती है, कोई मारे तो भी नहीं छोड़ती। सो यहाँ कठिनतासे प्राप्त होनेके कारण तथा वियोग होनेके अभिप्रायसे आसक्तता होती है, इसलिये दु:ख ही है.
तथा जब अरति उत्पन्न होती है तब अनिष्ट वस्तुका संयोग पाकर महा व्याकुल होता है. अनिष्टका संयोग हुआ वह स्वयंको सुहाता नहीं है, वह पीड़ा सही नहीं जाती, इसलिये उसका वियोग करनेको तड़पता है। वह दु:ख ही है.
तथा जब शोक उत्पन्न होता है तब इष्टका वियोग और अनिष्टका संयोग होनेसे अति व्याकुल होकर संताप पैदा करता है, रोता है, पुकार करता है, असावधान हो जाता है, अपने अंगका घात करके मर जाता है। कुछ सिद्धि नहीं है तथापि स्वयं ही महा दु:खी होता है.
तथा जब भय उत्पन्न होता है तब किसीको इष्ट वियोग व अनिष्ट संयोगका कारण जानकर डरता है, अतिविðल होता है भागता है, छिपता है, शिथिल होजाता है, कष्ट होनेके स्थान पर पहुंच जाता है व मर जाता है। सो यह दु:खरूप ही है.
तथा जब जुगुप्सा उत्पन्न होती है तब अनिष्ट वस्तुसे घृणा करता है. उसका तो संयोग हुआ और यह घृणा करके भागना चाहता है या उसे दूर करना चाहता है और खेदखिन्न होकर महा दु:ख पाता है.
तथा तीनों वेदोंसे जब काम उत्पन्न होता है तब पुरूषवेदसे स्त्रीके साथ रमण करनेकी, स्त्रीवेदसे पुरूषके साथ रमण करनेकी और नपंुसकवेदसे दोनोंके साथ रमण करनेकी इच्छा होती है. उससे अति व्याकुल होता है, आतापउत्पन्न होता है, निर्लज्ज होता है, धन खर्च करता है, अपयशको नहीं गिनता, परम्परा दु:ख हो वदण्ड आदि हो उसे नहीं गिनता. कामपीड़ासे पागल हो जाता है, मर जाता है. रसग्रन्थोंमें कामकी दस दशाएँ कहीं हैं. वहाँ पागल होना, मरण होना लिखा है. वैद्यकशास्त्रोंमें ज्वरके भेदोंमें कामज्वरको मरणका कारण लिखा है. प्रत्यक्ष ही कामसे मरण तक होते देखे जाते हैं. कामांधको कुछ विचार नहीं रहता. पिता पुत्री तथा मनुष्य तिर्यंचिनी इत्यादिसे रमण करने लग जाते हंै. ऐसी कामकी पीड़ा है सो महादु:खरूप है.
इस प्रकार कषायों और नोकषायोंसे अवस्थाएँ होती हैं.
यहाँ ऐसा विचार आता है कि यदि इन अवस्थाओंमें न प्रवर्तें तो कक्रोधादिक पीड़ा उत्पन्न करते हैं और इन अवस्थाओंमें प्रवर्तें तो मरणपर्यन्त कष्ट होते हैं. वहाँ मरण-पर्यन्त कष्ट तो स्वीकार करते हैं परन्तु कक्रोधादिककी पीड़ा सहना स्वीकार नहीं करते. इससे यह निश्चित हुआ कि मरणादिकसे भी कषायोंकी पीड़ा अधिक है.
तथाजबइसकेकषायकाउदयहोतबकषायकियेबिनारहानहींजाता. बााह्यकषायोंके कारण मिलें तो उनके आश्रय कषाय करता है, यदि न मिलें तो स्वयं कारण बनाता है. जैसे - व्यापारादि कषायोंका कारण न हो तो जुआ खेलना व कक्रोधादिकके कारणअन्य अनेक खेल खेलना, दुष्ट कथा कहना-सुनना इत्यादि कारण बनाता है. तथा काम-कक्रोधादि पीड़ा करें और शरीरमें उन रूप कार्य करनेकी शक्ति न हो तो औषधि बनाता है. और अन्य अनेक उपाय करता है. तथा कोई कारण बने ही नहीं तो अपने उपयोगमें कषायोंके कारणभूत पदार्थोंका चिंतवन करके स्वयं ही कषायोंरूप परिणमित होता है.
इस प्रकार यह जीव कषायभावोंसे पीडि़त हुआ महान दु:खी होता है.
तथा जिस प्रयोजनके लिये कषायभाव हुआ है उस प्रयोजनकी सिद्धि हो तो मेरा यह दु:ख दूर हो और मुझे सुख हो - ऐसा विचारकर उस प्रयोजनकी सिद्धि होनेके अर्थ अनेक उपाय करना उसे उस दु:खके दूर होनेका उपाय मानता है.
अब यहाँ कषायभावोंसे जो दु:ख होता है वह तो सच्चा ही है, प्रत्यक्ष स्वयं ही दु:खी होता है। परन्तु यह जो उपाय करता है वे झूठे हैं. क्तयों? सो कहते हैं :-
कक्रोधमें तो अन्यका बुरा करना, मानमें औरोंको नीचा दिखाकर स्वयं ऊँचा होना, मायामें छलसे कार्यसिद्धि करना, लोभमें इष्टकी प्राप्ति करना, हास्यमें विकसित होनेका कारण बना रहना, रतिमें इष्ट संयोगका बना रहना, अरतिमें अनिष्टका दूर होना, शोकमें शोकका कारण मिटना, भयमें भयका कारण मिटना, जुगुप्सामें जुगुप्साका कारण दूर होना, पुरूषवेदमें स्त्रीसे रमण करना, स्त्रीवेदमें पुरूषसे रमण करना, नपुंसकवेदमें दोनोंके साथ रमण करना - ऐसे प्रयोजन पाये जाते हैं.
यदि इनकी सिद्धि हो तो कषायका उपशमन होनेसे दु:ख दूर हो जाये, सुखी हो। परन्तु उनकी सिद्धि इसके किये उपायों के आधीन नहीं है, भवितव्यके आधीन है। क्तयोंकि अनेक उपाय करते देखते हैं, परन्तु सिद्धि नहीं होती. तथा उपाय होना भी अपने आधीन नहीं है, भवितव्यके आधीन है। क्तयोंकि अनेक उपाय करनेका विचार करता है और एक भी उपाय नहीं होता देखते हैं.
तथा काकतालीय न्यायसे भवितव्य ऐसा ही हो जैसा अपना प्रयोजन हो, वैसा ही उपाय हो, और उससे कार्यकी सिद्धि भी हो जाये - तो उस कार्य सम्बन्धी किसी कषायका उपशम हो। परन्तु वहाँ रुकाव नहीं होता. जब तक कार्य सिद्ध नहीं हुआ था तब तक तो उस कार्य सम्बन्धी कषाय थी। और जिस समय कार्य सिद्ध हुआ उसी समय अन्य कार्य सम्बन्धी कषाय हो जाती हैं, एक समयमात्र भी निराकुल नहीं रहता. जैसे कोई कक्रोधसे किसीका बुरा सोचता था और उसका बुरा हो चुका, तब अन्य पर कक्रोध करके उसका बुरा चाहने लगा. अथवा थोड़ी शक्ति थी तब छोटोंका बुरा चाहता था, बहुत शक्ति हुई तब बड़ोंका बुरा चाहने लगा. उसी प्रकार मान-माया-लोभादिक द्वारा जो कार्य सोचता था वह सिद्ध हो चुका तब अन्यमें मानादिक उत्पन्न करके उसकी सिद्धि करना चाहता है. थोड़ी शक्ति थी तब छोटे कार्यकी सिद्धि करना चाहता था, बहुत शक्ति हुई तब बड़े कार्यकी सिद्धि करनेकी अभिलाषा हुई. कषायोंमें कार्यका प्रमाण हो तो उस कार्यकी सिद्धि होने पर सुखी हो जाये। परन्तु प्रमाण है नहीं, इच्छा बढ़ती ही जाती है.
यही आत्मानुशासनमें कहा है :-
आशागर्त: प्रतिप्राणी यस्मिन् वि¬मणूपमम् .
कस्य किं कियदायाति वृथा वो विषयैषिता ॥३६॥
अर्थ :- आशारूपी गड्ढा प्रत्येक प्राणीमें पाया जाता है. अनन्तानन्त जीव हैं उन सबके आशा पायी जाती है. तथा वह आशारूपी कूप कैसा है कि उस एक गड्ढ़ेमें समस्त लोक अणु समान है और लोक तो एक ही है तो अब यहाँ कहो किसको कितना हिस्सेमें आये? इसलिये तुम्हें जो यह विषयोंकी इच्छा है सो वृथा ही है. इच्छा पूर्ण तो होती नहीं है, इसलिये कोई कार्य सिद्ध होने पर भी दु:ख दूर नहीं होता. अथवा कोई कषाय मिटे तो उसी समय अन्य कषाय हो जाती है. जैसे - किसीको मारनेवाले बहुत हों तो कोई एक जब नहीं मरता तब अन्य मारने लग जाता है. उसी प्रकार जीवको दु:ख देनेवाले अनेक कषाय हैं। व जब कक्रोध नहीं होता तब मानादिक हो जाते हैं, जब मान न हो तब कक्रोधादिक हो जाते हैं. इस प्रकार कषायका सद्भाव बना ही रहता है, कोई एक समय भी कषाय रहित नहीं होता. इसलिये किसी कषायका कोई कार्य सिद्ध होनेपर भी दु:ख कैसे दूर हो? और इसका अभिप्राय तो सर्व कषायोंका सर्व प्रयोजन सिद्ध करनेका है, वह हो तो यह सुखी हो। परन्तु वह कदापि नहीं हो सकता, इसलिये अभिप्रायमें सर्वदा दु:खी ही रहता है. इसलिये कषायोंके प्रयोजनको साधकर दु:ख दूर करके सुखी होना चाहता है। सो यह उपाय झूठा ही है.
तब सच्चा उपाय क्तया है? सम्यग्दर्शन-ज्ञानसे यथावत् श्रद्धान और जानना हो तब इष्ट-अनिष्ट बुद्धि मिटे, तथा उन्हींके बलसे चारित्रमोहका अनुभाग हीन हो. ऐसा होने पर कषायों का अभाव हो, तब उनकी पीड़ा दूर हो। और तब प्रयोजन भी कुछ नहीं रहे, निराकुल होनेसे महा सुखी हो. इसलिये सम्यग्दर्शनादिक ही यह दु:ख मेटनेका सच्चा उपाय है.
अन्तरायकर्मके उदयसे होनेवाले दु:ख और उससे निवृत्ति
तथा जीवके मोह द्वारा दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्यशक्तिका उत्साह उत्पन्न होता है। परन्तु अन्तरायके उदयसे हो नहीं सकता, तब परम आकुलता होती है. सो यह दु:खरूप है ही.
इसका उपाय यह करता है कि जो वि¼नके बाह्य कारण सूझते हैं उन्हें दूर करनेका उद्यम करता है परन्तु वह उपाय झूठा है. उपाय करने पर भी अन्तरायका उदय होनेसे वि¼न होता देखा जाता है. अन्तरायका क्षयोपशम होनेपर बिना उपाय भी वि¼न नहीं होता. इसलिये वि¼नोंका मूल कारण अन्तराय है.
तथा जैसे कुत्तेको पुरूष द्वारा मारी हुई लाठी लगी, वहाँ वह कुत्ता लाठीसे वृथा ही द्वेष करता है। उसी प्रकार जीवको अन्तरायसे निमित्तभूत किये गये बाह्य चेतन-अचेतन द्रव्यों द्वारा वि¼न हुए, यह जीव उन बाह्य द्रव्योंसे वृथा द्वेष करता है. अन्य द्रव्य इसे वि¼न करना चाहें और इसके न हो। तथा अन्य द्रव्य वि¼न करना न चाहें और इसके हो जाये. इसलिये जाना जाता है कि अन्य द्रव्यका कुछ वश नहीं है. जिनका वश नहीं है उनसे किसलिये लड़े? इसलिये यह उपाय झूठा है.
तब सच्चा उपाय क्तया है? मिथ्यादर्शनादिकसे इच्छा द्वारा जो उत्साह उत्पन्न होता थावहसम्यग्दर्शनादिसेदूरहोताहैऔरसम्यग्दर्शनादिद्वाराहीअन्तरायका अनुभाग घटे तब इच्छा तो मिट जाये और शक्ति बढ़ जाये, तब वह दु:ख दूर होकर निराकुल सुख उत्पन्न होता है. इसलिये सम्यग्दर्शनादि ही सच्चा उपाय है.
वेदनीयकर्मके उदयसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
तथा वेदनीयके उदयसे दु:ख-सुखके कारणोंका संयोग होता है. वहाँ कई तो शरीरमें ही अवस्थाएँ होती हैं, कई शरीरकी अवस्थाको निमित्तभूत बाह्य संयोग होते हैं, और कई बाह्य ही वस्तुओंके संयोग होते हैं. वहाँ असाताके उदयसे शरीरमें तो क्षुधा, तृषा, उच्छ्वास, पीड़ा, रोग इत्यादि होते हैं। तथा शरीरकी अनिष्ट अवस्थाको निमित्तभूत बाह्य अति शीत, उष्ण, पवन, बंधनादिकका संयोग होता है। तथा बााह्य शत्रु, कुपुत्रादिक व कुवर्णादिक सहित स्कन्धोंका संयोग होता है - सो मोह द्वारा इनमें अनिष्ट बुद्धि होती है. जब इनका उदय हो तब मोहका उदय ऐसा ही आवे जिससे परिणामोंमें महा व्याकुल होकर इन्हें दूर करना चाहे, और जब तक वे दूर न हों तब तक दु:खी रहता है. इनके होने से तो सभी दु:ख मानते हैं.
तथा साताके उदयसे शरीरमें आरोग्यवानपना, बलवानपना इत्यादि होते हैं। और शरीरकी इष्ट अवस्थाको निमित्तभूत बाह्य खान-पानादिक तथा सुहावने पवनादिकका संयोग होताहै।तथाबाह्यमित्र,सुपुत्र,स्त्री,किंकर,हाथी,घोड़ा,धन,धान्य,मकान, वस्त्रादिकका संयोग होता है - और मोह द्वारा इनमें इष्टबुद्धि होती है. जब इनका उदय हो तब मोहका उदय ऐसा ही आये कि जिससे परिणामोंमें सुख माने, उनकी रक्षा चाहे, जब तक रहें तब तक सुख माने.सो यह सुख मानना ऐसा है जैसे कोई अनेक रोगोंसे बहुत पीडि़त होरहा था, उसके किसी उपचारसे किसी एक रोगकी कुछ कालके लिये कुछ उपशान्तता हुई, तब वह पूर्व अवस्थाकी अपेक्षा अपनेको सुखी कहता है। परमार्थसे सुख है नहीं. उस प्रकार यह जीव अपने दु:खोंसे बहुत पीडि़त हो रहा था, उसके किसी प्रकारसे किसी एक दु:खकी कुछ कालके लिये उपशान्तता हुई, तब वह पूर्व अवस्थाकी अपेक्षा अपनेको सुखी कहता है। परमार्थसे सुख है नहीं.
तथा इसके असाताका उदय होनेपर जो हो उससे तो दु:ख भासित होता है, इसलिये उसे दूर करनेका उपाय करता है। और साताके उदय होनेपर जो हो उससे सुख भासित होता है, इसलिये उसे रखनेका उपाय करता है - परन्तु यह उपाय झूठा है.
प्रथमतोइसकेउपायकेआधीननहींहै,वेदनीयकर्मकेउदयकेआधीनहै. असाताको मिटाने और साताको प्राप्त करनेके अर्थ तो सभीका यत्न रहता है। परन्तु किसीको थोड़ा यत्न करने पर भी अथवा न करने पर भी सिद्धि हो जाये, किसीको बहुत यत्न करने पर भी सिद्धि नहीं हो। इसलिये जाना जाता है कि इसका उपाय इसके आधीन नहीं है.
तथा कदाचित् उपाय भी करे और वैसा ही उदय आये तो थोड़े काल तक किंचित् किसी प्रकारकी असाताका कारण मिटे और साताका कारण हो। वहाँ भी मोहके सद्भावसे उनको भोगनेकी इच्छासे आकुलित होता है. एक भोग्य वस्तुको भोगनेकी इच्छा हो, जब तक वह नहीं मिलती तब तक तो उसकी इच्छासे आकुल होता है। और वह मिली उसी समय अन्यको भोगनेकी इच्छा होजाती है, तब उससे आकुल होता है. जैसे - किसीको स्वाद लेनेकी इच्छा हुई थी, उसका आस्वाद जिस समय हुआ उसी समय अन्य वस्तुका स्वाद लेनेकी तथा स्पर्शनादि की इच्छा उत्पन्न होती है.
अथवा एक ही वस्तुको पहले अन्य प्रकार भोगनेकी इच्छा हो, जब तक वह नहीं मिले तब तक उसकी आकुलता रहे और वह भोग हुआ उसी समय अन्य प्रकारसे भोगनेकी इच्छा हो जाती है. जैसे स्त्रीको देखना चाहता था, जिस समय अवलोकन हुआ उसी समय रमण करनेकी इच्छा होती है. तथा ऐसे भोग भोगते हुए भी उनके अन्य उपाय करनेकी आकुलता होती है तो उन्हें छोड़कर अन्य उपाय करनेमें लग जाता है। वहाँ अनेक प्रकारकी आकुलता होती है.
देखो, एक धनका उपाय करनेमें व्यापारादिक करते हुए तथा उसकी रक्षा करनेमें सावधानी करते हुए कितनी आकुलता होती है? तथा क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, मल, श्लेष्मादि असाताका उदय आता ही रहे। उसके निराकरणसे सुख माने - सो काहेका सुख है? यह तो रोगका प्रतिकार है. जब तक क्षुधादिक रहें तब तक उनको मिटानेकी इच्छासे आकुलता होती है, वह मिटें तब कोई अन्य इच्छा उत्पन्न हो उसकी आकुलता होती है और फिर क्षुधादिक हों तब उनकी आकुलता हो आती है.
इस प्रकार इसके उपाय करते हुए कदाचित् असाता मिटकर साता हो, वहाँ भी आकुलता बनी ही रहती है, इसलिये दु:ख ही रहता है.
तथा ऐसे भी रहना तो होता नहीं है, उपाय करते-करते ही अपनेको असाता का उदय ऐसा आये कि उसका कुछ उपाय बन नहीं सके और उसकी पीड़ा बहुत हो, सही न जाये, तब उसकी आकुलतासे विðल हो जाये। वहाँ महा दु:खी होता है.
सो इस संसारमें साताका उदय तो किसी पुण्यके उदयसे किसीके कदाचित् ही पाया जाता है। बहुत जीवोंके बहुत काल असाताहीका उदय रहता है. इसलिये उपाय करता है वे झूठे हैं.
अथवा बाह्य सामग्रीसे सुख-दु:ख मानते हैं सो ही भ्रम है. सुख-दु:ख तो साता- असाताका उदय होनेपर मोहके निमित्तसे होते हैं - ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है. लक्ष धनके धनीको सहस्त्र धनका व्यय हुआ तब वह तो दु:खी है और शत धनके धनीको सहस्त्र धन हुआतब वह सुख मानता है. बाह्य सामग्री तो उसके इससे निन्यानवेंगुनी है.अथवा लक्ष धनके धनीको अधिक धन की इच्छा है तो वह दु:खी है और शत धनके धनीको सन्तोष है तो वह सुखी है. तथा समान वस्तु मिलने पर कोई सुख मानता है कोई दु:ख मानता है. जैसे - किसीको मोटे वस्त्रका मिलना दु:खकारी होता है, किसीको सुखकारी होता है. तथा शरीरमें क्षुधा आदि पीड़ा व बाह्य इष्टका वियोग, अनिष्टका संयोग होनेपर किसीको बहुत दु:ख होता है, किसीको थोड़ा होता है, किसीको नहीं होता. इसलिये सामग्रीके आधीन सुख-दु:ख नहीं है, साता-असाताका उदय होनेपर मोह परिणमनके निमित्तसे ही सुख-दु:ख मानते हैं.
यहाँ प्रश्न है कि - बाह्य सामग्रीका तो तुम कहते हो वैसा ही है। परन्तु शरीरमें तो पीड़ा होनेपर दु:खी होता ही है और पीड़ा न होनेपर सुखी होता है - यह तो शरीर- अवस्थाहीके आधीन सुख-दु:ख भासित होते हैं?
समाधान :- आत्माका तो ज्ञान इन्द्रियाधीन है और इन्द्रियाँ शरीरका अù हैं, इसलिये इसमें जो अवस्था हो उसे जाननेरूप ज्ञान परिणमित होता है। उसके साथ ही मोहभाव हो, उससे शरीरकी अवस्था द्वारा सुख-दु:ख विशेष जाना जाता है. तथा पुत्र धनादिकसे अधिक मोह हो तो अपने शरीरका कष्ट सहे उसका थोड़ा दु:ख माने, और उनको दु:ख होनेपर अथवा उनका संयोग मिटने पर बहुत दु:ख माने। और मुनि हैं वे शरीरको पीड़ा होनेपर भी कुछ दु:ख नहीं मानते। इसलिये सुख-दु:खका मानना तो मोहहीके आधीन है. मोहके और वेदनीयके निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है, इसलिये साता-असाता के उदयसे सुख-दु:खका होना भासित होता है. तथा मुख्यत: कितनी ही सामग्री साताके उदयसे होती है, कितनी ही असाताके उदयसे होती है। इसलिये सामग्रियोंसे सुख-दु:ख भासित होते हैं. परन्तु निर्धार करने पर मोहहीसे सुख-दु:ख का मानना होता है, औरों के द्वारा सुख-दु:ख होने का नियम नहीं है. केवलीके साता-असाताका उदय भी है और सुख-दु:खके कारण सामग्रीका संयोग भी है। परन्तु मोह के अभावसे किंचित्मात्र भी सुख- दु:ख नहीं होता. इसलिये सुख-दु:ख को मोहजनित ही मानना. इसलिये तू सामग्रीको दूर करनेका या होनेका उपाय करके दु:ख मिटाना चाहे और सुखी होना चाहे सो यह उपाय झूठा है.
तो सच्चा उपाय क्तया है? सम्यग्दर्शनादिकसे भ्रम दूर हो तब सामग्रीसे सुख-दु:ख भासित नहीं होता, अपने परिणामहीसे भासित होता है. तथा यथार्थ विचारके अभ्यास द्वारा अपनेपरिणामजैसेसामग्रीकेनिमित्तसेसुखी-दु:खीनहोंवैसेसाधनकरेतथा सम्यग्दर्शनादिकी भावनासेही मोह मंद हो जाये तब ऐसी दशा हो जाये कि अनेक कारण मिलने पर भी अपनेको सुख-दु:ख नहीं होता। तब एक शांतदशारूप निराकुल होकर सच्चे सुखका अनुभव करता है, और तब सर्व दु:ख मिटकर सुखी होता है - यह सच्चा उपाय है.
आयुकर्मके उदयसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
तथा आयुकर्मके निमित्तसे पर्यायका धारण करना सो जीवितव्य है और पर्यायका छूटना सो मरण है. यह जीव मिथ्यादर्शनादिकसे पर्यायहीको अपनेरूप अनुभव करता है। इसलिए जीवितव्य रहने पर अपना अस्तित्व मानता है और मरण होने पर अपना अभाव होना मानता है. इसी कारणसेइसे सदाकाल मरणका भय रहता है, उस भयसे सदा आकुलता रहती है. जिनको मरणका कारण जाने उनसे बहुत डरता है, कदाचित् उनका संयोग बने तो महाविðल होजाता है. - इस प्रकार महा दु:खी रहता है.
उसका उपाय यह करता है कि मरणके कारणोंको दूर रखता है अथवा स्वयं उनसे भागता है. तथा औषधादिक साधन करता है। किला, कोट आदि बनाता है - इत्यादि उपाय करता है सो ये उपाय झूठे हैं। क्तयोंकि आयु पूर्ण होने पर तो अनेक उपाय करे, अनेक सहायक हों तथापि मरण हो ही जाता है, एक समयमात्र भी जीवित नहीं रहता. और जब तक आयु पूर्ण न हो तब तक अनेक कारण मिलो, सर्वथा मरण नहीं होता. इसलिये उपाय करनेसे मरण मिटता नहीं है। तथा आयुकी स्थिति पूर्ण होती ही है, इसलिए मरण भी होता ही है. इसका उपाय करना झूठा ही है.
तो सच्चा उपाय क्तया है? सम्यग्दर्शनादिकसे पर्यायमें अहंबुद्धि छूट जाये, स्वयं अनादिनिधन चैतन्यद्रव्य है उसमें अहंबुद्धि आये, पर्यायको स्वांग समान जाने। तब मरणका भय नहीं रहता. तथा सम्यग्दर्शनादिकसे ही सिद्धपद प्राप्त करे तब मरणका अभाव ही होता है. इसलिये सम्यग्दर्शनादिक ही सच्चे उपाय हैं.
नामकर्मके उदयसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
तथा नामकर्मके उदयसे गति, जाति, शरीरादिक उत्पन्न होते हैं. उनमेंसे जो पुण्यके उदयसे होते हैं वे तो सुखके कारण होते हैं और जो पापके उदयसे होते हैं वे दु:खके कारण होते हैं। सो यहाँ सुख मानना भ्रम है. तथा यह दु:खके कारण मिटानेका और सुखके कारण होनेका उपाय करता हैवह झूठा है। सच्चा उपाय सम्यग्दर्शनादिक हैं. जैसा निरूपण वेदनीयका कथन करते हुए किया वैसा यहाँ भी जानना. वेदनीय और नाममें सुख-दु:खके कारणपनेकी समानतासे निरूपणकी समानता जानना.
गोत्रकर्मके उदयसे होनेवाला दु:ख और उससे निवृत्ति
तथा गोत्रकर्मके उदयसे उच्च-नीच कुलमें उत्पन्न होता है. वहाँ उच्च कुलमें उत्पन्न होने पर अपनेको ऊँचा मानता है और नीच कुलमें उत्पन्न होने पर अपनेको नीचा मानता है. वहाँ, कुल पलटनेका उपाय तो इसको भासित नहीं होता इसलिये जैसा कुल प्राप्त किया उसीमें अपनापन मानता है. परन्तु कुल की अपेक्षा ऊँचा-नीचा मानना भ्रम है. कोई उच्च कुलवाला निंद्य कार्य करे तो वह नीचा हो जाये और नीच कुलमें कोई श्लाध्य कार्य करे तो वह ऊँचा हो जाये. लोभादिकसे उच्च कुलवाले नीचे कुलवालेकी सेवा करने लग जाते हैं.
तथा कुल कितने काल रहता है? पर्याय छूटने पर कुलकी बदली होजाती है। इसलिये उच्च-नीच कुलसे अपनेको ऊँचा-नीचा मानने पर उच्च कुलवालेको नीचा होनेके भयका और नीच कुलवालेको प्राप्त किये हुए नीचेपनका दु:ख ही है.
इसका सच्चा उपाय यही है कि - सम्यग्दर्शनादिक द्वारा उच्च-नीच कुलमें हर्ष- विषाद न माने. तथा उन्हींसे जिसकी फिर बदली नहीं होती ऐसा सबसे ऊँचा सिद्धपद प्राप्त करता है तब सब दुख मिट जाते हैं और सुखी होता है.
इस प्रकार कर्मोदयकी अपेक्षा मिथ्यादर्शनादिकके निमित्तसे संसारमें दु:ख ही दु:ख पाया जाता है, उसका वर्णन किया. (ख)पर्याय की अपेक्षा से
पर्यायों की अपेक्षासे अब, इसी दु:खका वर्णन करते हैं :- एकेन्द्रिय जीवोंके दु:ख
इस संसारमें बहुत काल तो एकेन्द्रिय पर्यायमें ही बीतता है. इसलिये अनादिहीसे तो नित्यनिगोदमें रहना होता है। फिर वहाँसे निकलना ऐसा है जैसे भाड़में भुंजते हुए चनेका उचट जाना. इस प्रकार वहाँ से निकलकर अन्य पर्याय धारण करे तो त्रसमें तो बहुत थोड़े ही काल रहता है। एकेन्द्रियमें ही बहुत काल व्यतीत करता है.
वहाँ इतरनिगोदमें बहुत काल रहना होता है तथा कितने काल तक पृथ्वी, अप, तेज, वायु और प्रत्येक वनस्पतिमें रहना होता है. नित्यनिगोदसे निकलकर बादमें त्रसमें रहनेका उत्कृष्ट काल तो साधिक दो हजार सागर ही है तथा एकेन्द्रियमें रहनेका उत्कृष्ट काल असंख्यात पुद्गल परावर्तन मात्र है और पुद्गल परावर्तनका काल ऐसा है जिसके अनन्तवें भागमें भी अनन्त सागर होते हैं. इसलिए इस संसारीके मुख्यत: एकेन्द्रिय पर्यायमें ही काल व्यतीत होता है.
वहाँ एकेन्द्रियके ज्ञान-दर्शनकी शक्तित तो किंचित्मात्र ही रहती है.एक स्पर्शन इन्द्रियके निमित्तसे हुआ मतिज्ञान और उसके निमित्तसे हुआ श्रुतज्ञान तथाा स्पर्शनइन्द्रिय- जनितअचक्षुदर्शन-जिनकेद्वाराशीत-उष्णादिककोकिंचित्जानते-देखतेहैं. ज्ञानावरण-दर्शनावरणकेतीव्रउदयसेइससेअधिकज्ञान-दर्शननहींपायेजातेऔर विषयोंकी इच्छा पायी जाती है जिससे महा दु:खी हैं.तथा दर्शनमोहके उदयसे मिथ्यादर्शन होता है उससे पर्यायका ही अपनेरूप श्रद्धान करते हैं, अन्य विचार करनेकी शक्ति ही नहीं है.
तथा चारित्रमोहके उदयसे तीव्र कक्रोधादिक-कषायरूप परिणमित होते हैं। क्तयोंकि उनके केवलीभगवानने कृष्ण, नील, कापोत यह तीन अशुभ लेश्या ही कही हैं और वे तीव्र कषाय होने पर ही होती हैं. वहाँ कषाय तो बहुत हैं और शक्तित सर्व प्रकारसे महा हीन है इसलिए बहुत दु:खी हो रहे हैं, कुछ उपाय नहीं कर सकते.
यहाँ कोई कहे कि - ज्ञान तो किंचित्मात्र ही रहा है, फिर वे क्तया कषाय करते हैं? समाधान :- ऐसा कोई नियम तो है नहीं कि जितना ज्ञान हो उतनी ही कषाय हो. ज्ञान तो जितना क्षयोपशम हो उतना होता है. जैसे किसी अंधे-बहरे पुरूषको ज्ञान थोड़ा होने पर भी बहुत कषाय होती दिखाई देती है, उसी प्रकार एकेन्द्रियके ज्ञान थोड़ा होने पर भी बहुत कषायका होना माना गया है.
तथा बाह्य कषाय प्रगट तब होती है, जब कषायके अनुसार कुछ उपाय करे परन्तु वे शक्तिहीन हैं इसलिये उपाय कुछ कर नहीं सकते, इससे उनकी कषाय प्रगट नहीं होती. जैसे कोई पुरूष शक्तिहीन है उसको किसी कारणसे तीव्र कषाय हो, परन्तु कुछ कर नहीं सकता, इसलिये उसकी कषाय बाह्यमें प्रगट नहीं होती, वह अति दु:खी होता है। उसी प्रकार एकेन्द्रिय जीव शक्तिहीन हैं। उनको किसी कारणसे कषाय होती है परन्तु कुछ कर नहीं सकते, इसलिये उनकी कषाय बाह्यमें प्रगट नहीं होती, वे स्वयं ही दु:खी होते हैं.
तथा ऐसा जानना कि जहाँ कषाय बहुत हो और शक्ति हीन हो वहाँ बहुत दु:ख होता है और ज्यों-ज्यों कषाय कम होती जाये तथा शक्ति बढ़ती जाये त्यों-त्यों दु:ख कम होता है. परन्तु एकेन्द्रियोंके कषाय बहुत और शक्ति हीन, इसलिये एकेन्द्रिय जीव महा दु:खी हैं. उनके दुख वे ही भोगते हैं और केवली जानते हैं. जैसे - सन्निपात के रोगीका ज्ञान कम हो जाये और बाह्य शक्तिकी हीनतासेअपना दु:ख प्रगट भी न कर सके, परन्तु वह महा दु:खी है. उसी प्रकार एकेन्द्रियका ज्ञान तो थोड़ा है और बाह्य शक्तिहीनताके कारण अपना दु:ख प्रगट भी नहीं कर सकता, परन्तु महा दु:खी है.
तथा अंतरायके तीव्र उदयसे चाहा हुआ बहुत नहीं होता, इसलिए भी दु:खी ही होते हंै.
तथा अघाति कर्मोंमें विशेषरूपसे पापप्रकृतियोंका उदय है। वहाँ असातावेदनीयका उदय होने पर उसके निमित्तसे महा दु:खी होते हैं. वनस्पति है सो पवनसे टूटती है, शीत-उष्णतासे सूख जाती है, जल न मिलनेसे सूख जाती है, अग्निसे जल जाती है। उसको कोई छेदता है, भेदता है, मसलता है, खाता है, तोड़ता है - इत्यादि अवस्था होती है. उसी प्रकार यथासम्भव पृथ्वी आदिमें अवस्थाएँ होती हैं. उन अवस्थाओंके होनेसे वे महा दु:खी होते हैं.
जिस प्रकार मनुष्यके शरीरमें ऐसी अवस्था होने पर दु:ख होता है उसी प्रकार उनके होता है. क्तयोंकि इनका जानपना स्पर्शन इन्द्रियसे होता है और उनके स्पर्शन इन्द्रिय है ही, उसके द्वारा उन्हें जानकर मोहके वशसे महा व्याकुल होते हैं। परन्तु भागनेकी, लड़नेकी, या पुकारनेकी शक्ति नहीं है, इसलिये अज्ञानी लोग उनके दु:खको नहीं जानते. तथा कदाचित् किंचित् साताका उदय होता है, परन्तु वह बलवान नहीं होता.
तथा आयुकर्मसे इन एकेन्द्रिय जीवोंमें जो अपर्याप्त हैं उनके तो पर्यायकी स्थिति उच्छ्वासके अठारहवें भाग मात्र ही है, और पर्याप्तोंकी अंतर्मुहूर्त आदि कितने ही वर्ष पर्यंत है. वहाँ आयु थोड़ा होनेसे जन्म-मरण होते ही रहते हैं उससे दु:खी हैं.
तथा नामकर्ममें तिर्यंचगति आदि पापप्रकृतियोंका ही उदय विशेषरूपसे पाया जाता है. किसी हीन पुण्यप्रकृतिका उदय हो उसका बलवानपना नहीं होता, इसलिये उनसे भी मोहके वशसे दु:खी होते हैं.
तथा गोत्रकर्ममें नीच गोत्रहीका उदय है इसलिये महंतता नहीं होती, इसलिये भी दु:खी ही हैं.
इसप्रकार एकेन्द्रिय जीव महा दु:खी हैं और इस संसारमें जैसे पाषाण आधार पर तो बहुत काल रहता है, निराधार आकाशमें तो कदाचित् किंचितमात्र् काल रहता है। उसीप्रकार जीव एकेन्द्रिय पर्यायमें बहुत काल रहता है, अन्य पर्यायोंमें तो कदाचित् किंचितमात्र् काल रहता है। इसलिये यह जीव संसारमें महा दु:खी है.
विकलत्रय व असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके दु:ख
तथा जीव द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यायोंको धारण करे वहाँ भी एकेन्द्रियवत् दु:ख जानना. विशेष इतना कि - यहाँ कक्रमसे एक-एक इन्द्रियजनित ज्ञान-दर्शनकी तथा कुछ शक्तिकी अधिकता हुई है और बोलने-चालनेकी शक्ति हुई है. वहाँ भी जो अपर्याप्त हैं तथा पर्याप्त भी हीनशक्तिके धारक हैं। छोटे जीव हैं, उनकी शक्ति प्रगट नहीं होती. तथा कितने ही पर्याप्त बहुत शक्तिके धारक बड़े जीव हैं उनकी शक्ति प्रगट होती है। इसलिये वे जीव विषयोंका उपाय करते हैं, दु:ख दूर होनेका उपाय करते हैं. कक्रोधादिकसे काटना, मारना, लड़ना, छल करना, अन्नादिका संग्रह करना, भागना इत्यादि कार्य करते हैं। दु:खसे तड़फड़ाना, पुकारना इत्यादि किक्रया करते हैं। इसलिये उनका दु:ख कुछ प्रगट भी होता है. इस प्रकार लट, कीड़ी आदि जीवोंको शीत,उष्ण, छेदन, भेदनादिकसे तथा भूख-प्यास आदिसे परम दु:खी देखते हैं. जो प्रत्यक्ष दिखायी देता है उसका विचार कर लेना. यहाँ विशेष क्तया लिखें?
इस प्रकार द्वीन्द्रियादिक जीवोंको भी महा दु:खी ही जानना.

संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके दु:ख

नरकगतिके दु:ख
तथा संज्ञी पंचेन्द्रियोंमें नारकी जीव हैं वे तो सर्व प्रकारसे बहुत दु:खी हैं. उनमें ज्ञानादिकी शक्ति कुछ है, परन्तु विषयोंकी इच्छा बहुत है और इष्ट विषयोंकी सामग्री किंचित् भी नहीं मिलती, इसलिए उस शक्तिके होनेसे भी बहुत दु:खी हैं. उनके कक्रोधादि कषायकी अति तीव्रता पायी जाती है। क्तयोंकि उनके कृष्णादि अशुभ लेश्या ही हैं.
वहाँ कक्रोध-मानसे परस्पर दु:ख देनेका कार्य निरन्तर पाया जाता है. यदि परस्पर मित्रता करें तो दु:ख मिट जाये. और अन्यको दु:ख देनेसे उनका कुछ कार्य भी नहीं होता, परन्तु कक्रोध-मानकी अति तीव्रता पायी जाती है उससे परस्पर दु:ख देनेकी ही बुद्धि रहती है. विकिक्रया द्वारा अन्यको दु:खदायक शरीरके अंग बनाते हैं तथा शस्त्रादि बनाते हैं. उनके द्वारा दूसरोंको स्वयं पीड़ा देते हैं और स्वयंको कोई और पीड़ा देता है. कभी कषाय उपशान्त नहीं होती. तथा उनमें माया-लोभकी भी अति तीव्रता है, परन्तु कोई इष्ट साामग्री वहाँ दिखायी नहीं देती इसलिये उन कषायोंका कार्य प्रगट नहीं कर सकते। उनसे अंतरंगमें महा दु:खी हंै. तथा कदाचित् किंचित् कोई प्रयोजन पाकर उनका भी कार्य होता है.
तथा हास्य-रति कषाय हैं, परन्तु बाह्य निमित्त नहीं हैं, इसलिये प्रगट होते नहीं हैं, कदाचित् किंचित् किसी कारणसे होते हैं. तथा अरति-शोक-भय-जुगुप्साके बाह्य कारण बन रहे हैं, इसलिये वे कषायें तीव्र प्रगट होती हैं. तथा वेदोंमें नपुंसकवेद है, सो इच्छा तो बहुत और स्त्री-पुरूषोंसे रमण करनेका निमित्त नहीं है, इसलिये महा पीडि़त हैं.
इस प्रकार कषायों द्वारा अति दु:खी हैं.
तथा वेदनीयमें असाता ही का उदय है उससे वहाँ अनेक वेदनाओंके निमित्त हैं, शरीरमें कुष्ठ, कास, श्वासादि अनेक रोग युगपत् पाये जाते हैं और क्षुधा, तृषा ऐसी है कि सर्वका भक्षण-पान करना चाहते हैं, और वहाँकी मिट्टी ही का भोजन मिलता है, वह मिट्टी भी ऐसी है कि यदि यहाँ आ जाये तो उसकी दुर्गन्धसे कई कोसोंके मनुष्य मर जायें. और वहाँ शीत, उष्णता ऐसी है कि यदि लाख योजनका लोहेका गोला हो तो वह भी उनसे भस्म होजाये. कहीं शीत है कहीं उष्णता है. तथा पृथ्वी वहाँ शस्त्रोंसे भी महातीक्ष्ण कंटकों सहित है. उस पृथ्वीमें जो वन हैं वे शस्त्रकी धार समान पत्रादि सहित हैं. नदी ऐसे जल युक्त है कि जिसका स्पर्श होनेपर शरीर खण्ड-खण्ड होजाये. पवन ऐसा प्रचण्ड है कि उससे शरीर दग्ध हो जाता है. तथा नारकी एक-दूसरेको अनेक प्रकारसे पीड़ा देते हैं, घानीमें पेलते हैं, खण्ड-खण्ड कर डालते हैं, हंडियोंमें राँधते हैं, कोड़े मारते हैं, तप्त लोहादिककास्पर्शकरातेहैं-इत्यादिवेदनाउत्पन्नकरतेहैं.तीसरीपृथ्वीतक असुरकुमार देव जाते हैं. वे स्वयं पीड़ा देते हैं और परस्पर लड़ाते हैं. ऐसी वेदना होने पर भी शरीर छूटता नहीं है, पारेकी भाँति खण्ड-खण्ड हो जाने पर भी मिल जाता है. - ऐसी महा पीड़ा है.
तथा साताका निमित्त तो कुछ है नहीं. किसी अंशमें कदाचित् किसीको अपनी मान्यतासे किसी कारण अपेक्षा साताका उदय होता है तो वह बलवान नहीं होता. आयु वहाँ बहुत है. जघन्य आयु दस हजार वर्ष तथा उत्कृष्ट आयु तेतीस सागर है. इतने काल तक वहाँ ऐसे दु:ख सहने पड़ते हैं. वहाँ नामकर्मकी सर्व पापप्रकृतियोंका ही उदय है, एक भी पुण्यप्रकृतिका उदय नहीं है। उनसे महा दु:खी हैं. तथा गोत्रमें नीच गोत्रका ही उदय है उससे महन्तता नहीं होती इसलिये दु:खी ही हैं. - इस प्रकार नरकगतिमें महा दु:ख जानना. तिर्यंचगतिके दु:ख
तथा तिर्यंचगतिमें बहुत लब्धि-अपर्याप्त जीव हैं. उनकी तो उच्छ्वासके अठारहवें भाग-मात्रआयुहै. तथाकितनेहीपर्याप्त भीछोटेजीव हैं, परन्तु उनकी शक्ति प्रगट भासित नहीं होती. उनके दु:ख एकेन्द्रियवत् जानना। ज्ञानादिकका विशेष है सो विशेष जानना.तथाबड़ेपर्याप्तजीवकितनेहीसम्मूच्र्छनहैं,कितनेहीगर्भजहैं.उनमें ज्ञानादिक प्रगट होते हैं, परन्तु वे विषयोंकी इच्छासे आकुलित हैं. उनमें बहुतोंको तो इष्ट विषयकी प्राप्ति है नहीं। किसीको कदाचित् किंचित् होती है.
तथा मिथ्यात्वभावसे अतत्त्ववश्रद्धानी हो ही रहे हैं और कषाय मुख्यत: तीव्र ही पायी जाती हैं. कक्रोध-मानसे परस्पर लड़ते हैं, भक्षण करते हैं, दु:ख देते हैं। माया-लोभसे छल करते हैं, वस्तुको चाहते हैं। हास्यादिक द्वारा उन कषायोंके कार्योंमें प्रवर्तते हैं. तथा किसीके कदाचित् मंदकषाय होती है, परन्तु थोड़े जीवोंके होती है इसलिये मुख्यता नहीं है.
तथा वेदनीयमें मुख्यत: असाता का उदय है. उससे रोग, पीड़ा, क्षुधा, तृषा, छेदन, भेदन, बहुत भार-वहन, शीत, उष्ण, अंग-भंगादि अवस्था होती है. उससे दु:खी होते प्रत्यक्ष देखे जाते हैं इसलिए बहुत नहीं कहा है. किसीके कदाचित् किंचित् साताका भी उदय होता है परन्तु थोड़े ही जीवोंको है, मुख्यता नहीं है. तथा आयु अन्तर्मुहूर्तसे लेकर कोटि वर्ष पर्यन्त है. वहाँ बहुत जीव अल्प आयुके धारक होते हैं, इसलिये जन्ममरणका दु:ख पाते हैं. तथा भोगभूमियोंकी बड़ी आयु है और उनके साताका भी उदय है, परन्तु वे जीव थोड़े हैं. तथा मुख्यत: तो नामकर्मकी तिर्यंचगति आदि पापप्रकृतियोंका ही उदय है. किसीको कदाचित् किन्हीं पुण्यप्रकृतियोंका भी उदय होता है, परन्तु थोड़े जीवोंको थोड़ा होता है, मुख्यता नहीं है. तथा गोत्रमें नीच गोत्रका ही उदय है इसलिये हीन हो रहे हैं. - इस प्रकार तिर्यंचगतिमें महा दु:ख जानना. मनुष्यगतिके दु:ख
तथा मनुष्यगतिमें असंख्यात जीव तो लब्धि अपर्याप्त हैं वे सम्मूच्र्छन ही हैं, उनकी आयु तो उच्छ्वासके अठारहवें भाग मात्र है. तथा कितने ही जीव गर्भमें आकर थोड़े ही कालमें मरण पाते हैं, उनकी तो शक्ति प्रगट भासित नहीं होती। उनके दु:ख एकेन्द्रियवत् जानना. विशेष है सो विशेष जानना.
तथा गर्भजोंके कुछ काल गर्भमें रहनेके बाद बाहर निकलना होता है. उनके दु:खका वर्णन कर्म अपेक्षासे पहले वर्णन किया है वैसे जानना. वह सर्व वर्णन गर्भज मनुष्योंके सम्भव है. अथवा तिर्यंचोंका वर्णन किया है उस प्रकार जानना.
विशेष यह है कि - यहाँ कोई शक्ति विशेष पायी जाती है तथा राजादिकोंके विशेष साताका उदय होता है तथा क्षत्रियादिकोंको उच्च गोत्रका भी उदय होता है. तथा धन- कुटुम्बादिकका निमित्त विशेष पाया जाता है - इत्यादि विशेष जानना.
अथवा गर्भ आदि अवस्थाओंके दु:ख प्रत्यक्ष भासित होते हैं. जिस प्रकार विष्टामें लट उत्पन्न होती है उसी प्रकार गर्भमें शुकक्र-शोणितके बिन्दुको अपने शरीररूप करके जीव उत्पन्न होता है. बादमें वहाँ कक्रमश: ज्ञानादिककी तथा शरीरकी वृद्धि होती है. गर्भका दु:ख बहुत है. संकुचित रूपसे औंधे मुँह क्षुधा-तृषादि सहित वहाँ काल पूर्ण करता है. जब बाहर निकलता है तब बाल्यावस्था में महा दु:ख होता है. कोई कहते हैं कि बाल्यावस्था में दु:ख थोड़ा है। सो ऐसा नहीं है, किन्तु शक्ति थोड़ी होनेसे व्यक्त नहीं हो सकता. बाादमें व्यापारादिकतथाविषय-इच्छाआदिदु:खोंकीप्रगटताहोतीहै.इष्ट-अनिष्टजनित आकुलता बनी ही रहती है. पश्चात् जब वृद्ध हो तब शक्तिहीन हो जाता है और तब परम दु:खी होता है. ये दु:ख प्रत्यक्ष होते देखे जाते हैं.
हम बहुत क्तया कहें? प्रत्यक्ष जिसे भासित नहीं होते वह कहे हुए कैसे सुनेगा? किसीके कदाचित् किंचित् साताका उदय होता है सो आकुलतामय है. और तीर्थंकरादि पद मोक्षमार्ग प्राप्त किये बिना होते नहीं हैं. - इस प्रकार मनुष्य पर्यायमें दु:ख ही हैं.
एक मनुष्य पर्यायमें कोई अपना भला होनेका उपाय करे तो हो सकता है. जैसे - काने गन्नेकी जड़ व उसका ऊपरी फीका भाग तो चूसने योग्य ही नहीं है, और बीचकी पोरें कानी होनेसे वे भी नहीं चूसी जातीं। कोई स्वादका लोभी उन्हें बिगाड़े तो बिगाड़ो। परन्तु यदि उन्हें बो दे तो उनसे बहुतसे गन्ने हों, और उनका स्वाद बहुत मीठा आये. उसी प्रकारमनुष्य-पर्यायकाबालक-वृद्धपनातोसुखयोग्यनहींहै,औरबीचकीअवस्था रोगक्तलेशादिसे युक्त है, वहाँ सुख हो नहीं सकता। कोई विषयसुखका लोभी उसे बिगाड़े तो बिगाड़ो। परन्तु यदि उसे धर्म साधनमें लगाये तो बहुत उच्चपदको पाये, वहाँ सुख बहुत निराकुल पाया जाता है. इसलिये यहाँ अपना हित साधना, सुख होनेके भ्रमसे वृथा नहीं खोना. देवगतिके दु:ख
तथादेवपर्यायमेंज्ञानादिककीशक्तिऔरोंसेकुछविशेषहै।वेमिथ्यात्वसे अतत्त्ववश्रद्धानी हो रहे हैं. तथा उनके कषाय कुछ मन्द हैं. भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिष्कोंके कषाय बहुत मन्द नहीं हैं और उनका उपयोग चंचल बहुत है तथा कुछ शक्ति भी है सो कषायोंके कार्योंमें प्रवर्तते हैं। कौतूहल, विषयादि कार्योंमें लग रहे हैं और उस आकुलतासे दु:खी ही हैं. तथा वैमानिकोंके ऊपर-ऊपर विशेष मन्दकषाय है और शक्ति विशेष है, इसलिये आकुलता घटनेसे दु:ख भी घटता है.
यहाँ देवोंके कक्रोध-मान कषाय हैं, परन्तु कारण थोड़ा है, इसलिये उनके कार्यकी गौणता है. किसीका बुरा करना तथा किसीको हीन करना इत्यादि कार्य निकृष्ट देवोंके तो कौतूहलादिसे होते हैं, परन्तु उत्कृष्ट देवोंके थोड़े होते हैं, मुख्यता नहीं है। तथा माया-लोभ कषायोंके कारण पाये जाते हैं इसलिये उनके कार्यकी मुख्यता है। इसलिये छल करना, विषय-सामग्रीकी चाह करना इत्यादि कार्य विशेष होते हैं. वे भी ऊँचे-ऊँचे देवोंके कम हैं.
तथा हास्य, रति कषायके कारण बहुत पाये जाते हैं, इसलिए इनके कार्योंकी मुख्यता है. तथा अरति, शोक, भय, जुगुप्सा इनके कारण थोड़े हैं, इसलिये इनके कार्योंकी गौणता है. तथा स्त्रीवेद, पुरूषवेदका उदय है और रमण करनेका भी निमित्त है सो काम सेवन करते हैं. ये भी कषाय ऊपर-ऊपर मन्द हैं. अहमिन्द्रोंके वेदोंकी मन्दताके कारण कामसेवनका अभाव है.
इसप्रकार देवोंके कषायभाव है और कषायसे ही दु:ख है.
तथा इनके कषायें जितनी थोड़ी हैं उतना दु:ख भी थोड़ा है, इसलिये औरोंकी अपेक्षा इन्हें सुखी कहते हैं. परमार्थसे कषायभाव जीवित है उससे दु:खी ही हैं.
तथा वेदनीयमें साताका उदय बहुत है. वहाँ भवनत्रिकको थोड़ा है, वैमानिकोंके ऊपर-ऊपर विशेष है. इष्ट शरीरकी अवस्था, स्त्री, महल आदि सामग्रीका संयोग पाया जाता है. तथा कदाचित् किंचित् असाताका भी उदय किसी कारणसे होता है. वह निकृष्ट देवोंके कुछ प्रगट भी है, परन्तु उत्कृष्टदेवोंके विशेष प्रगट नहीं है. तथा आयु बड़ी है. जघन्य आयु दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट इकतीस सागर है. इससे अधिक आयुका धारी मोक्षमार्ग प्राप्त किये बिना नहीं होता. सो इतने काल तक विषय-सुखमें मग्न रहते हैं. तथा नामकर्मकी देवगति आदि सर्व पुण्यप्रकृतियोंका ही उदय है, इसलिये सुखका कारण है. और गोत्रमें उच्च गोत्रका ही उदय है, इसलिये महन्त पदको प्राप्त हैं.
इस प्रकार इनको पुण्य उदयकी विशेषतासे इष्ट साामग्री मिली है और कषायोंसे इच्छा पायी जाती है, इसलिये उसके भोगनेमें आसक्त हो रहे हैं. परन्तु इच्छा अधिक ही रहती है इसलिये सुखी नहीं होते. उच्च देवोंको उत्कृष्ट पुण्य उदय है, कषाय बहुत मंद है। तथापि उनके भी इच्छाका अभाव नहीं होता, इसलिये परमार्थसे दु:खी ही हैं.
इस प्रकार संसारमें सर्वत्र दु:ख ही दु:ख पाया जाता है. - इस प्रकार पर्याय अपेक्षा से दु:खका वर्णन किया. (ग)दु:खका सामान्य स्वरूप
अब इस सर्व दु:खका सामान्यस्वरूप कहते हैं. दु:खका लक्षण आकुलता है और आकुलता इच्छा होनेपर होती है. चाार प्रकार की इच्छाएँ
इस संसारी जीवके इच्छा अनेक प्रकार पायी जाती है :-
(१)एक इच्छा तो विषय ग्रहणकी है उससे यह देखना-जानना चाहता है. जैसे - वर्ण देखनेकी, राग सुननेकी, अव्यक्तको जाननेकी, इत्यादि इच्छा होती है. वहाँ अन्य कोई पीड़ा नहीं है। परन्तु जब तक देखता-जानता नहीं है तब तक महा व्याकुल होता है. इस इच्छाका नाम विषय है.
तथा(२)एक इच्छा कषायभावोंके अनुसार कार्य करनेकी है जिससे वह कार्य करना चाहता है. जैसे - बुरा करनेकी, हीन करनेकी, इत्यादि इच्छा होती है. यहाँ भी अन्य कोई पीड़ा नहीं है, परन्तु जब तक वह कार्य न हो तब तक महा व्याकुल होता है. इस इच्छाका नाम कषाय है.
तथा(३)एक इच्छा पापके उदयसे जो शरीरमें या बाह्य अनिष्ट कारण मिलते हैं उनको दूर करनेकी होती है. जैसे - रोग, पीड़ा, क्षुधा आदिका संयोग होनेपर उन्हें दूर करनेकी इच्छा होती है सो यहाँ यही पीड़ा मानता है, जब तक वह दूर न हो तब तक महा व्याकुल रहता है. इस इच्छाका नाम पापका उदय है.
इस प्रकार इन तीन प्रकारकी इच्छा होनेपर सभी दु:ख मानते हैं सो दु:ख ही है.
तथा(४)एक इच्छा बाह्य निमित्तसे बनती है। सो इन तीन प्रकारकी इच्छाओंके अनुसार प्रवर्तनेकी इच्छा होती है. इन तीन प्रकारकी इच्छाओंमें एक-एक प्रकारकी इच्छाके अनेक प्रकार हैं. वहाँ कितने ही प्रकारकी इच्छा पूर्ण होनेके कारण पुण्योदयसे मिलते हैं, परन्तु उनका साधन एकसाथ नहीं हो सकता। इसलिये एकको छोड़कर अन्यमें लगता है, फिर भी उसे छोड़कर अन्यमें लगता है. जैसे - किसीको अनेक प्रकारकी सामग्री मिली है. वहाँ वह किसीको देखता है, उसे छोड़कर राग सुनता है, फिर उसे छोड़कर किसीका बुरा करने लग जाता है, उसे छोड़कर भोजन करता है, अथवा देखनेमें ही एकको देखकर अन्यको देखता है. - इसी प्रकार अनेक कार्योंकी प्रवृत्तिमें इच्छा होती है. सो इस इच्छाका नाम पुण्यका उदय है.
इसे जगत सुख मानता है, परन्तु यह सुख है नहीं, दु:ख ही है. क्तयोंकि - प्रथम तो सर्व प्रकारकी इच्छा पूर्ण होनेके कारण किसीके भी नहीं बनते. और किसी प्रकार इच्छा पूर्ण करनेके कारण बनें तो युगपत् उनका साधन नहीं होता. सो एकका साधन जब तक न हो तब तक उसकी आकुलता रहती है। और उसका साधन होने पर उस ही समय अन्यके साधनकी इच्छा होती है तब उसकी आकुलता होती है. एक समय भी निराकुल नहीं रहता, इसलिये दु:ख ही है. अथवा तीन प्रकारकी इच्छारूपी रोगको मिटानेका किंचित् उपाय करता है, इसलिये किंचित् दु:ख कम होता है, सर्व दु:खका तो नाश नहीं होता, इसलिये दु:ख ही है. - इस प्रकार संसारी जीवोंको सर्व प्रकारसे दु:ख ही है.
तथा यहाँ इतना जानना कि - तीन प्रकारकी इच्छासे सर्व जगत पीडि़त है और चौथी इच्छा तो पुण्यका उदय आने पर होती है, तथा पुण्यका बंध धर्मानुरागसे होता है। परन्तु धर्मानुरागमें जीव कम लगता है, जीव तो बहुत पाप किक्रयाओंमें ही प्रवर्तता है. इसलिये चौथी इच्छा किसी जीवके किसी कालमें ही होती है.
यहाँ इतना जानना कि - समान इच्छावान जीवोंकी अपेक्षा तो चौथी इच्छावालेके किंचित् तीन प्रकारकी इच्छाके घटनेसे सुख कहते हैं. तथा चौथी इच्छावालेकी अपेक्षा महान इच्छावाला चौथी इच्छा होने पर भी दु:खी होता है. किसीके बहुत विभूति है और उसके इच्छा बहुत है तो बहुत आकुलतावान है। और जिसके थोड़ी विभूति है तथा उसके इच्छा भी थोड़ी है तो वह थोड़ा आकुलतावान है. अथवा किसीको अनिष्ट सामग्री मिली है और उसे उसको दूर करनेकी इच्छा थोड़ी है तो वह थोड़ा आकुलतावान है. तथा किसीको इष्ट सामग्री मिली है परन्तु उसे उसको भोगनेकी तथा अन्य सामग्रीकी इच्छा बहुत है तो वह जीव बहुत आकुलतावान है.इसलिये सुखी-दु:खी होना इच्छाके अनुसार जानना, बाह्य कारणके आधीन नहीं है.
नारकी दु:खी और देव सुखी कहे जाते हैं वह भी इच्छाकी ही अपेक्षा कहते हैं क्तयोंकि नारकियोंको तीव्र कषायसे इच्छा बहुत है और देवोंके मन्दकषायसे इच्छा थोड़ी है. तथा मनुष्य, तिर्यंचोंको भी सुखी-दु:खी इच्छा ही की अपेक्षा जानना. तीव्र कषायसे जिसके इच्छा बहुत है उसे दु:खी कहते हैं,मन्द कषायसे जिसके इच्छा थोड़ी है उसे सुखी कहते हैं. परमार्थसे दु:ख ही बहुत या थोड़ा है, सुख नहीं है.देवादिकोंको भी सुखी मानते हैं वह भ्रम ही है. उनके चौथी इच्छाकी मुख्यता है इसलिये आकुलित हैं.
इस प्रकार जो इच्छा होती है वह मिथ्यात्व, अज्ञान, असंयमसे होती है. तथा इच्छा है सो आकुलतामय है और आकुलता है वह दु:ख है. इस प्रकार सर्व संसारी जीव नाना दु:खोंसे पीडि़त ही हो रहे हैं.

मोक्षसुख और उसकी प्राप्तिका उपाय

अब, जिन जीवोंको दु:खसे छूटना हो वे इच्छा दूर करनेका उपाय करो. तथा इच्छा दूर तब ही होती है जब मिथ्यात्व, अज्ञान, असंयमका अभाव हो और सम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्रकी प्राप्ति हो. इसलिये इसी कार्यका उद्यम करना योग्य है. ऐसा साधन करने पर जितनी-जितनी इच्छा मिटे उतना-उतना दु:ख दूर होता जाता है और जब मोहके सर्वथा अभावसे सर्व इच्छाका अभाव हो तब सर्व दु:ख मिटता है, सच्चा सुख प्रगट होता है. तथा ज्ञानावरण-दर्शनावरण और अन्तरायका अभावहोतबइच्छाकेकारणभूतक्षायोपशमिक ज्ञान-दर्शनका तथा शक्तिहीनपनेका भी अभाव होता है, अनन्त ज्ञान-दर्शन-वीर्यकी प्राप्ति होती है. तथा कितने ही काल पश्चात् अघातिकर्मोंका भी अभाव हो तब इच्छाके बाह्य कारणोंका भी अभाव होता है. क्तयोंकि मोह चले जानेके बाद किसी भी कालमें कोई इच्छा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं थे, मोहके होने पर कारण थे, इसलिये कारण कहे हैं। उनका भी अभाव हुआ तब जीव सिद्धपदको प्राप्त होते हैं.
वहाँदु:खकातथादु:खकेकारणोंकासर्वथाअभावहोनेसेसदाकालअनुपम, अखंडित, सर्वोत्कृष्ट आनन्द सहित अनन्तकाल विराजमान रहते हैं. वही बतलाते हैं :-
ज्ञानावरण, दर्शनावरण का क्षयोपशम होनेपर तथा उदय होनेपर मोह द्वारा एक-एक विषयकोदेखने-जाननेकीइच्छासेमहाव्याकुलहोताथा।अबमोहकाअभावहोनेसे इच्छाका भी अभाव हुआ इसलिये दु:खका अभाव हुआ है. तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण का क्षय होनेसे सर्व इन्द्रियोंको सर्व विषयोंका युगपत् ग्रहण हुआ, इसलिये दु:खका कारण भी दूर हुआ है वही दिखाते हैं. जैसे - नेत्र द्वारा एक-एक विषयको देखना चाहता था, अब त्रिकालवर्ती त्रिलोकके सर्व वर्णोंको युगपत् देखता है, कोई बिन देखा नहीं रहा जिसके देखनेकी इच्छा उत्पन्न हो. इसी प्रकार स्पर्शनादि द्वारा एक-एक विषयका ग्रहण करना चाहता था, अब त्रिकालवर्ती त्रिलोकके सर्व स्पर्श, रस, गन्ध तथा शब्दोंका युगपत् ग्रहण करता है, कोई बिना ग्रहण किया नहीं रहा जिसका ग्रहण करनेकी इच्छा उत्पन्न हो.
यहाँ कोई कहे कि - शरीरादिक बिना ग्रहण कैसे होगा?
समाधान :- इन्द्रियज्ञान होनेपर तो द्रव्येन्द्रियों आदिके बिना ग्रहण नहीं होता था. अब ऐसा स्वभाव प्रगट हुआ कि बिना इन्द्रियोंके ही ग्रहण होता है.
यहाँ कोई कहे कि :- जैसे मन द्वारा स्पर्शादिकको जानते हैं उसी प्रकार जानना होता होगा। त्वचा,जिðा आदिसे ग्रहण होता है वैसे नहीं होता होगा। सो ऐसा नहीं है - क्तयोंकि मन द्वारा तो स्मरणादि होनेपर अस्पष्ट जानना कुछ होता है. यहाँ तो जिस प्रकार त्वचा, जिðा इत्यादिसे स्पर्श, रसादिकका - स्पर्श करने पर, स्वाद लेने पर, सूँघने- देखने-सुनने पर जैसा स्पष्ट जानना होता है उससे भी अनन्तगुणा स्पष्ट जानना उनके होता है.
विशेष इतना हुआ है कि - वहाँ इन्द्रियविषयका संयोग होने पर ही जानना होता था, यहाँ दूर रहकर भी वैसा ही जानना होता है - यह शक्तिकी महिमा है. तथा मन द्वारा कुछअतीत,अनागतकोतथाअव्यक्तकोजाननाचाहताथा।अबसर्वहीअनादिसे अनन्तकाल पर्यन्त सर्व पदार्थोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावोंको युगपत् जानता है, कोई बिना जाने नहीं रहा जिसको जाननेकी इच्छा उत्पन्न हो. इस प्रकार यह दु:ख और दु:खोंके कारण उनका अभाव जानना.
तथा मोहके उदयसे मिथ्यात्व और कषायभाव होते थे उनका सर्वथा अभाव हुआ इसलिये दु:खका अभाव हुआ। तथा इनके कारणोंका अभाव हुआ, इसलिए दु:खके कारणोंका भी अभाव हुआ है. उन कारणोंका अभाव यहाँ दिखाते हैं :-
सर्व तत्त्वव यथार्थ प्रतिभासित होनेपर अतत्त्ववश्रद्धानरूपमिथ्यात्वकैसेहो?कोई अनिष्ट नहीं रहा, निंदक स्वयमेव अनिष्टको प्राप्त होता ही है। स्वयं कक्रोध किस पर करें? सिद्धोंसे ऊँचा कोई है नहीं, इन्द्रादिक स्वयमेव नमन करते हैं और इष्टको पाते हैं। किससे मान करें?सर्व भवितव्य भासित होगया,कार्य रहा नहीं, किसीसे प्रयोजन रहा नहीं है। किसका लोभ करें? कोई अन्य इष्ट रहा नहीं। किस कारणसे हास्य हो? कोई अन्य इष्ट प्रीति करने योग्य है नहीं। फिर कहाँ रति करें? कोई दु:खदायक संयोग रहा नहीं है। कहाँ अरति करें? कोई इष्ट-अनिष्ट संयोग-वियोग होता नहीं है। किसका शोक करें? कोई अनिष्ट करनेवाला कारण रहा नहीं है। किसका भय करें? सर्व वस्तुएँ अपने स्वभाव सहित भासित होती हैं, अपनेको अनिष्ट नहीं हैं। कहाँ जुगुप्सा करें? कामपीड़ा दूर होनेसे स्त्री- पुरूषदोनोंसेरमणकरनेकाकुछप्रयोजननहींरहा।किसलियेपुरूष,स्त्रीया नपुंसकवेदरूप भाव हो? - इस प्रकार मोह उत्पन्न होनेके कारणोंका अभाव जानना.
तथा अन्तरायके उदयसे शक्ति हीनपनेके कारण पूर्ण नहीं होती थी, अब उसका अभाव हुआ, इसलिये दु:खका अभाव हुआ. तथा अनन्तशक्ति प्रगट हुई इसलिये दु:खके कारणका भी अभाव हुआ.
यहाँ कोई कहे कि - दान, लाभ, भोग, उपभोग तो करते नहीं हैं। इनकी शक्ति कैसे प्रगट हुई?
समाधान :- ये कार्य रोगके उपचार थे। रोग ही नहीं है, तब उपचार क्तयों करें? इसलिये इन कार्योंका सद्भाव तो है नहीं और इन्हें रोकनेवाले कर्मोंका अभाव हुआ, इसलिये शक्ति प्रगट हुई कहते हैं. जैसे - कोई गमन करना चाहता था. उसे किसीने रोका था तब दु:खी था और जब उसकी रोक दूर हुई तब जिस कार्यके अर्थ जाना चाहता था वह कार्य नहीं रहा इसलिये गमन भी नहीं किया. वहाँ उसके गमन न करने पर भी शक्ति प्रगट हुई कही जाती है। उसी प्रकार यहाँ भी जानना. तथा उनके ज्ञानादिकी शक्तिरूप अनन्तवीर्य प्रगट पाया जाता है.
तथाअघातिकर्मोंमेंमोहसेपापप्रकृतियोंकाउदयहोनेपरदु:खमानरहाथा, पुण्यप्रकृतियोंका उदय होनेपर सुख मान रहा था। परमार्थसे आकुलताके कारण सब दु:ख ही था. अब मोहके नाशसे सर्व आकुलता दूर होने पर सर्व दु:खका नाश हुआ. तथा जिन कारणोंसे दु:ख मान रहा था, वे कारण तो सर्व नष्ट हुए। और किन्हीं कारणोंसे ®कचित् दु:ख दूर होनेसे सुख मान रहा था सो अब मूलहीमें दु:ख नहीं रहा, इसलिये उन दु:खके उपचारोंका कुछ प्रयोजन नहीं रहा कि उनसे कार्यकी सिद्धि करना चाहे. उसकी सिद्धि स्वयमेव ही हो रही है.
इसीका विशेष बतलाते हैं :- वेदनीयमें असाताके उदयसे दु:खके कारण शरीरमें रोग, क्षुधादिक होते थे। अब शरीर ही नहीं, तब कहाँ हो? तथा शरीरकी अनिष्ट अवस्थाको कारण आताप आदि थे। परन्तु अब शरीर बिना किसको कारण हो? तथा बाह्य अनिष्ट निमित्त बनते थे। परन्तु अब इनके अनिष्ट रहा ही नहीं. इस प्रकार दु:खके कारणोंका तो अभाव हुआ.
तथा साताके उदयसे ®कचित् दु:ख मिटानेके कारण औषधि, भोजनादिक थे उनका प्रयोजन नहीं रहा है, और इष्टकार्य पराधीन नहीं रहे हैं। इसलिये बाह्यमें भी मित्रादिकको इष्ट मााननेका प्रयोजन नहीं रहा, इनके द्वारा दु:ख मिटाना चाहता था और इष्ट करना चाहता था। सो अब तो सम्पूर्ण दु:ख नष्ट हुआ और सम्पूर्ण इष्ट प्राप्त हुआ.
तथाआयुकेनिमित्तसेजीवन-मरणथा.वहाँमरणसेदु:खमानताथा।परन्तु अविनाशी पद प्राप्त कर लिया इसलिये दु:खका कारण नहीं रहा. तथा द्रव्यप्राणोंको धारण किये कितने ही काल तक जीने-मरनेसे सुख मानता था, वहाँ भी नरक पर्यायमें दु:खकी विशेषतासे वहाँ नहीं जीना चाहता था। परन्तु अब इस सिद्धपर्यायमें द्रव्यप्राणके बिना ही अपने चैतन्यप्राणसे सदाकाल जीता है और वहाँ दु:खका लवलेश भी नहीं रहा.
तथा नामकर्मसे अशुभ गति, जाति आदि होनेपर दु:ख मानता था, परन्तु अब उन सबका अभाव हुआ। दु:ख कहाँसे हो? तथा शुभगति, जाति आदि होनेपर ®कचित् दु:ख दूर होनेसे सुख मानता था। परन्तु अब उनके बिना ही सर्व दु:खका नाश और सर्व सुखका प्रकाश पाया जाता है. इसलिये उनका भी कुछ प्रयोजन नहीं रहा.
तथा गोत्रके निमित्तसे नीचकुल प्राप्तहोनेपर दु:ख मानता था, अब उसका अभाव होनेसे दु:खका कारण नहीं रहा। तथा उच्चकुल प्राप्त होनेपर सुख मानता था, परन्तु अब उच्चकुलके बिना ही त्रैलोक्तय पूज्य उच्चपदको प्राप्त है.
इस प्रकार सिद्धोंके सर्व कर्मोंका नाश होनेसे सर्व दु:खका नाश हो गया है.
दु:खका लक्षण तो आकुलता है, और आकुलता तभी होती है जब इच्छा हो। परन्तु इच्छाका तथा इच्छाके कारणोंका सर्वथा अभाव हुआ इसलिये निराकुल होकर सर्व दु:खरहित अनन्त सुखका अनुभव करता है। क्तयोंकि निराकुलता ही सुखका लक्षण है. संसारमें भी किसी प्रकार निराकुल होकर सब ही सुख मानते हैं। जहाँ सर्वथा निराकुल हुआ वहाँ सुख सम्पूर्ण कैसे नहीं माना जाये?
इस प्रकार सम्यग्दर्शनादि साधनसे सिद्धपद प्राप्त करने पर सर्व दु:खका अभाव होता है, सर्व सुख प्रगट होता है.
अबयहाँ उपदेश देते हैं कि - हे भव्य हे भाई तुझे जो संसारके दु:ख बतलाए सो वे तुझपर बीतते हैं या नहीं, वह विचार. और तू जो उपाय करता है उन्हें झूठा बतलाया सो ऐसे ही हैं या नहीं, वह विचार. तथा सिद्धपद प्राप्त होनेपर सुख होता है या नहीं, उसका भी विचार कर. जैसा कहा है वैसी ही प्रतीति तुझे आती हो तो तू संसारसे छूटकर सिद्धपद प्राप्त करनेका हम जो उपाय कहते हैं वह कर, विलम्ब मत कर. यह उपाय करनेसे तेरा कल्याण होगा.
-इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक शास्त्रमें संसारदु:ख तथा
मोक्षसुखका निरूपक तृतीय अधिकार पूर्ण हुआ ॥३॥

च्ौथा अधिकार

मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्रका निरूपण

दोहा -इस भवके सब दु:खनिके, कारण मिथ्याभाव .
तिनिकी सत्ता नाश करि, प्रगटे मोक्ष उपाव ..
अब यहाँ संसार दु:खोंके बीजभूत मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र हैं
उनके स्वरूपका विशेष निरूपण करते हैं. जैसे वैद्य है सो रोगके कारणोंको विशेषरूपसे कहे तो रोगी कुपथ्य सेवन न करे, तब रोग रहित हो. उसी प्रकार यहाँ संसार के कारणों का विशेष निरूपण करते हैं, जिससे संसारी मिथ्यात्वादिकका सेवन न करे, तब संसार रहित हो. इसलिये मिथ्यादर्शनादिकका विशेष निरूपण करते हैं :-

मिथ्यादर्शनका स्वरूप

यह जीव अनादिसे कर्म सम्बन्ध सहित है. उसको दर्शन मोह के उदय से हुआ जो अतत्त्ववश्रद्धान उसका नाम मिथ्यादर्शन है. क्तयोंकि तद्भाव सो तत्त्वव, अर्थात् जो श्रद्धान करने योग्य अर्थ है उसका जो भाव-स्वरूप उसका नाम तत्त्वव है. तत्त्वव नहीं उसका नाम अतत्त्वव है. इसलिये अतत्त्वव है वह असत्य है। अत: इसी का नाम मिथ्या है. तथा ‘ऐसे ही यह है’ - ऐसा प्रतीतिभाव उसका नाम श्रद्धान है.
यहाँ श्रद्धानहीका नाम दर्शन है. यद्यपि दर्शन का शब्दार्थ सामान्य अवलोकन है तथापि यहाँ प्रकरणवश ही इसी धातु का अर्थ श्रद्धान जानना. - ऐसा ही सर्वार्थसिद्धि नामक सूत्र की टीका में कहा है. क्तयोंकि सामान्य अवलोकन संसार-मोक्षका कारण नहीं होता। श्रद्धान ही संसार-मोक्षका कारण है, इसलिये संसार-मोक्षके कारण में दर्शन का अर्थ श्रद्धान ही जानना.
तथा मिथ्यारूप जो दर्शन अर्थात् श्रद्धान, उसका नाम मिथ्यादर्शन है. जैसा वस्तु का स्वरूप नहीं है वैसा मानना, जैसा है वैसा नहीं मानना, ऐसा विपरीताभिनिवेश अर्थात् विपरीत अभिप्राय, उसको लिये हुए मिथ्यादर्शन होता है.
यहाँ प्रश्न है कि - केवलज्ञानके बिना सर्व पदार्थ यथार्थ भासित नहीं होते और यथार्थ भासित हुए बिना यथार्थ श्रद्धान नहीं होता, तो फिर मिथ्यादर्शनका त्याग कैसे बने?
समाधान :- पदार्थों का जानना, न जानना, अन्यथा जानना तो ज्ञानावरण के अनुसार है। तथा जो प्रतीति होती है सो जानने पर ही होती है, बिना जाने प्रतीति कैसे आये - यह तो सत्य है. परन्तु जैसे(कोई)पुरुष है वह जिनसे प्रयोजन नहीं है उन्हें अन्यथा जाने या यथार्थ जाने, तथा जैसा जानता है वैसा ही माने तो उससे उसका कुछ भी बिगाड़-सुधार नहीं है, उससे वह पागल या चतुर नाम नहीं पाता। तथा जिनसे प्रयोजन पाया जाता है उन्हें यदि अन्यथा जाने और वैसा ही माने तो बिगाड़ होता है, इसलिये उसे पागल कहते हैं। तथा उनको यदि यथार्थ जाने और वैसा ही माने तो सुधार होता है, इसलिये उसे चतुर कहते हैं. उसी प्रकार जीव है वह जिनसे प्रयोजन नहीं है उन्हें अन्यथा जाने या यथार्थ जाने, तथा जैसा जाने वैसा श्रद्धान करे, तो इसका कुछ बिगाड़-सुधार नहीं है, उससे मिथ्या¹ष्िट या सम्यग्¹ष्िट नााम प्राप्त नहीं करता। तथा जिनसे प्रयोजन पाया जाता है उन्हें यदि अन्यथा जाने और वैसा ही श्रद्धान करे तो बिगाड़ होता है, इसलिये उसे मिथ्या¹ष्िट कहते हैं। तथा यदि उन्हें यथार्थ जाने और वैसा ही श्रद्धान करे तो सुधार होता है, इसलिये उसे सम्यग्¹ष्िट कहते हैं.
यहाँ इतना जानना कि - अप्रयोजनभूत अथवा प्रयोजनभूत पदार्थोंका न जानना या यथार्थ-अयथार्थ जानना हो उसमें ज्ञानकी हीनाधिकता होना इतना जीव का बिगाड़- सुधार है और उसका निमित्त तो ज्ञानावरण कर्म है. परन्तु वहाँ प्रयोजनभूत पदार्थोंका अन्यथा या यथार्थ श्रद्धान करने से जीव का कुछ और भी बिगाड़-सुधार होता है, इसलिये उसका निमित्त दर्शनमोह नामक कर्म है.
यहाँ कोई कहे कि जैसा जाने वैसा श्रद्धान करे, इसलिये ज्ञानावरणहीके अनुसार श्रद्धान भासित होता है, यहाँ दर्शनमोह का विशेष निमित्त कैसे भासित होता है?
समाधान :- प्रयोजनभूत जीवादितत्त्ववोंका श्रद्धान करने योग्य ज्ञानावरणका क्षयोपशम तो सर्व संज्ञी पंचेन्द्रियोंके हुआ है. परन्तु द्रव्यलिंगी मुनि ग्यारह अù तक पढ़ते हैं तथा ग्रेवेयकके देव अवधिज्ञानादियुक्त हैं, उनके ज्ञानावरण का क्षयोपशम बहुत होने पर भी प्रयोजनभूत जीवादिकका श्रद्धान नहीं होता। और तिर्यंचादिकको ज्ञानावरणका क्षयोपशम थोड़ा होने पर भी प्रयोजनभूत जीवादिकका श्रद्धान होता है. इसलिये जाना जाता है कि ज्ञानावरण के ही अनुसार श्रद्धान नहीं होता। कोई अन्य कर्म है और वह दर्शनमोह है. उसके उदय से जीव के मिथ्यादर्शन होता है तब प्रयोजनभूत जीवादितत्त्ववोंका अन्यथा श्रद्धान करता है.
प्रयोजनभूत-अप्रयोजनभूत पदार्थ
यहाँ कोई पूछे कि - प्रयोजनभूत और अप्रयोजनभूत पदार्थ कौन हैं?
समाधान :- इस जीव को प्रयोजन तो एक यही है कि दु:ख न हो और सुख हो. किसी जीव के अन्य कुछ भी प्रयोजन नहीं है. तथा दु:ख का न होना, सुख का होना एक ही है। क्तयोंकि दु:ख का अभाव वही सुख है और इस प्रयोजन की सिद्धि जीवादिकका सत्य श्रद्धान करने से होती है. कैसे?
सो कहते हैं :- प्रथम तो दु:ख दूर करने में आपापर का ज्ञान अवश्य होना चाहिये. यदि आपापर का ज्ञान नहीं हो तो अपने को पहिचाने बिना अपना दु:ख कैसे दूर करे? अथवा आपापर को एक जान कर अपना दु:ख दूर करने के अर्थ पर का उपचार करे तो अपना दु:ख दूर कैसे हो? अथवा अपने से पर भिन्न हैं, परन्तु यह पर में अहंकार-ममकार करे तो उससे दु:ख ही होता है. आपापर का ज्ञान होने पर ही दु:ख दूर होता है. तथा आपापर का ज्ञान जीव-अजीव का ज्ञान होने पर ही होता है। क्तयोंकि आप स्वयं जीव हैं, शरीरादिक अजीव हैं.
यदि लक्षणादि द्वारा जीव-अजीव की पहचान हो तो अपनी और पर की भिन्नता भासित हो। इसलिये जीव-अजीव को जानना. अथवा जीव-अजीव का ज्ञान होने पर, जिन पदार्थों के अन्यथा श्रद्धान से दु:ख होता था उनका यथार्थ ज्ञान होने से दु:ख दूर होता है। इसलिये जीव-अजीव को जानना.
तथा दु:खका कारण तो कर्म बन्धन है और उसका कारण मिथ्यात्वादिक आस्रव हैं. यदि इनको न पहिचाने, इनको दु:ख का मूल कारण न जाने तो इनका अभाव कैसे करे? और इनका अभाव नहीं करे तो कर्म बन्धन कैसे नहीं हो? इसलिये दु:ख ही होता है. अथवा मिथ्यात्वादिक भाव हैं सो दु:खमय हैं. यदि उन्हें ज्यों का त्यों नहीं जाने तो उनका अभाव नहीं करे, तब दु:खी ही रहे। इसलिये आस्रव को जानना.
तथा समस्त दु:ख का कारण कर्म बन्धन है. यदि उसे न जाने तो उससे मुक्त होने का उपाय नहीं करे, तब उसके निमित्त से दु:खी हो। इसलिये बन्धको जानना.
तथा आस्रव का अभाव करना सो संवर है. उसका स्वरूप न जाने तो उसमें प्रवर्तन नहीं करे, तब आस्रव ही रहे, उससे वर्तमान तथा आगामी दु:ख ही होता है। इसलिये संवर को जानना.
तथा कथंचित् किंचित् कर्मबंधका अभाव करना उसका नाम निर्जरा है. यदि उसे न जाने तो उसकी प्रवृत्ति का उद्यमी नहीं हो, तब सर्वथा बंध ही रहे, जिससे दु:ख ही होता है। इसलिये निर्जरा को जानना.
तथा सर्वथा सर्व कर्मबंधका अभाव होना उसका नाम मोक्ष है. यदि उसे नहीं पहिचाने तो उसका उपाय नहीं करे, तब संसार में कर्मबंध से उत्पन्न दु:खोंको ही सहे। इसलिये मोक्ष को जानना. इसप्रकार जीवादि सात तत्व जानना.
तथा शास्त्रादि द्वारा कदाचित् उन्हें जाने, परन्तु ऐसे ही हैं ऐसी प्रतीति न आयी तो जानने से क्तया हो? इसलिये उनका श्रद्धान करना कार्यकारी है. ऐसे जीवादि तत्त्ववों का सत्य श्रद्धान करने पर ही दु:ख होने का अभावरूप प्रयोजन की सिद्धि होती है. इसलिये जीवादिक पदार्थ हैं वे ही प्रयोजनभूत जानना.
तथा इनके विशेष भेद पुण्य-पापादिरूप हैं उनका भीश्रद्धान प्रयोजनभूत है, क्तयोंकि सामान्य से विशेष बलवान है. इस प्रकार ये पदार्थ तो प्रयोजनभूत हैं, इसलिये इनका यथार्थ श्रद्धान करने पर तो दु:ख नहीं होता, सुख होता है। और इनका यथार्थ श्रद्धान किये बिना दु:ख होता है, सुख नहीं होता.
तथा इनके अतिरिक्त अन्य पदार्थ हैं वे अप्रयोजनभूत हैं, क्तयोंकि उनका यथार्थ श्रद्धान करो या मत करो उनका श्रद्धान कुछ सुख-दु:खका कारण नहीं है.
यहाँ प्रश्न उठता है कि - पहले जीव-अजीव पदार्थ कहे उनमें तो सभी पदार्थ आ गये। उनके सिवा अन्य पदार्थ कौन रहे जिन्हें अप्रयोजनभूत कहा है.
समाधान :- पदार्थ तो सब जीव-अजीव में गर्भित हैं, परन्तु उन जीव-अजीवों के विशेष बहुत हैं. उनमें से जिन विशेषों सहित जीव-अजीव का यथार्थ श्रद्धान करने से स्व- पर का श्रद्धान हो, रागादिक दूर करने का श्रद्धान हो, उन से सुख उत्पन्न हो। तथा अयथार्थ श्रद्धान करने से स्व-पर का श्रद्धान नहीं हो, रागादिक दूर करने का श्रद्धान नहीं हो, इसलिये दु:ख उत्पन्न हो। उन विशेषों सहित जीव-अजीव पदार्थ तो प्रयोजनभूत जानना.
तथा जिन विशेषों सहित जीव-अजीव का यथार्थ श्रद्धान करने या न करने से स्व- पर का श्रद्धान हो या न हो, तथा रागादिक दूर करने का श्रद्धान हो या न हो - कोई नियम नहीं है। उन विशेषों सहित जीव-अजीव पदार्थ अप्रयोजनभूत जानना.
जैसे-जीवऔरशरीरकाचैतन्य,मूर्त्तत्वादिविशेषोंसेश्रद्धानकरनातो प्रयोजनभूत है। और मनुष्यादि पर्यायों का तथा घट-पटादिका अवस्था, आकारादि विशेष से श्रद्धान करना अप्रयोजनभूत है. इसी प्रकार अन्य जानना.
इस प्रकार कहे गये जो प्रयोजनभूत जीवादिक तत्त्वव उनके अयथार्थ श्रद्धान का नाम मिथ्यादर्शन जानना.
मिथ्यादर्शनकी प्रवृत्ति
अब संसारी जीवों के मिथ्यादर्शनकी प्रवृत्ति कैसे पाई जाती है सो कहते हैं.
यहाँ वर्णन तो श्रद्धान का करना हैै। परन्तु जानेगा तो श्रद्धान करेगा, इसलिये जाननेकी मुख्यता से वर्णन करते हैं.

जीव -अजीवतत्त्वव सम्बन्धी अर्यथााथा श्रद्धान

अनादिकाल से जीव है वह कर्म के निमित्त से अनेक पर्यायें धारण करता है. वहाँ पूर्व पर्यायको छोड़ता है, नवीन पर्याय धारण करता है. तथा वह पर्याय एक तो स्वयं आत्मा और अनंत पुद्गलपरमाणुमय शरीर उनसे एक पिण्ड बन्धानरूप है. तथा जीव को उस पर्यायमंे - ‘यह मैं हूँ’ - ऐसी अहंबुद्धि होती है. तथा स्वयं जीव है, उसका स्वभाव तो ज्ञानादिक है और विभाव क्रोधादिक है और पुद्गलपरमाणुओंके वर्ण, गंध, रस, स्पर्शादि स्वभाव हैं - उन सबको अपना स्वरूप मानता है.
‘ये मेरे है’- इस प्रकार उनमें ममत्वबुद्धि होती है. तथा स्वयं जीव है, उसके ज्ञानादिककीतथाक्रोधादिककीअधिकताहीनतारूपअवस्थाहोतीहैऔर पुद्गलपरमाणुओंकी वर्णादि पलटनेरूप अवस्था होती है उन सबको अपनी अवस्था मानता है. ‘यह मेरी अवस्था है’ - ऐसी ममत्व बुद्धि करता है.
तथा जीव और शरीरके निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है, इसलिये जो क्रिया होती है उसे अपनी मानता है. अपना दर्शन-ज्ञान स्वभाव है, उसकी प्रवृत्ति को निमित्तमात्र शरीर के अंगरूप स्पर्शनादि द्रव्यइन्द्रियाँ है। यह उन्हें एक मानकर ऐसा मानता है कि - हाथ आदि से मैने स्पर्श किया, जीभसे स्वाद लिया, नासिकासे सूँघा, नेत्रसे देखा, कानोंसे सुना. मनोवर्गणारूप आठ पंखुडि़योंके फूले कमल के आकार का ñदयस्थानमें द्रव्यमन है, वह ¹Úगिम्य नहीं ऐसा है, सो शरीर का अंग है। उसके निमित्त होनेपर स्मरणादिरूप ज्ञान की प्रवृत्ति होती है. यह द्रव्यमनको और ज्ञान को एक मानकर ऐसा मानता है कि मैने मनसे जाना.
तथा अपनेको बोलनेकी इच्छा होती है तब अपने प्रदेशों को जिस प्रकार बोलना बने उस प्रकार हिलाता है, तब एकक्षेत्रावगाह सम्बन्ध के कारण शरीर के अंग भी हिलते हैैं. उनके निमित्तसे भाषावर्गणारूप पुदगल वचनरूप परिणमित होते हैं। यह सबको एक मानकर ऐसा मानता है कि मैं बोलता हूँ.
तथा अपनेको गमनादि क्रियाकी या वस्तु ग्रहणादिककी इच्छा होती है तब अपने प्रदेशों को जैसे कार्य बने वैसे हिलाता है. वहाँ एकक्षेत्रावगाह के कारण शरीर के अंग हिलते हंै तब वह कार्य बनता है। अथवा अपनी इच्छा के बिना शरीर हिलता है तब अपने प्रदेश भी हिलते हैं। यह सबको एक मानकर ऐसा मानता है कि मैं गमनादि कार्य करता हूँ, मैं वस्तु का ग्रहण करता हूँ अथवा मैने किया है - इत्यादिरूप मानता है.
तथा जीव के कषायभाव हों तब शरीर की चेष्टा उसके अनुसार हो जाती है. जैसे - क्रोधादिक होने पर लाल नेत्रादि हो जाते हैं, हास्यादि होने पर मुखादि प्रफुल्लित हो जाते हैं, पुरुषवेदादि होने पर लिंगकाठिन्यादि हो जाते हैं। यह सब एक मान कर ऐसा मानता है कि यह कार्य सब मैं करता हूँ. तथा शरीर में शीत, उष्ण, क्षुधा, तृषा, रोग इत्यादि अवस्थाएँ होती हैं। उनके निमित्त से मोहभाव द्वारा स्वयं सुख-दु:ख मानता है। इन सबको एक जानकर शीतादिक तथा सुख-दु:ख अपने को ही हुए मानता है.
तथा शरीर के परमाणुओंका मिलना-बिछुड़ना आदि होने से अथवा उनकी अवस्था पलटने से या शरीर स्कन्ध के खण्ड आदि होने से स्थूल-कृशादिक, बाल-वृद्धादिक अथवा अंगहीनादिक होते हैं और उसके अनुसार अपने प्रदेशों का संकोच-विस्तार होता है। यह सबको एक मान कर मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, मैं बालक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मेरे इन अंगों का भंग हुआ है - इत्यादिरूप मानता है.
तथा शरीर की अपेक्षा गति कुलादिक होते हैं उन्हें अपना मानकर मैं मनुष्य हूँ, मैं तिर्यन्च हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं वैश्य हूँ - इत्यादिरूप मानता है. तथा शरीर का संयोग होने और छूटने की अपेक्षा जन्म-मरण होता है। उसे अपना जन्म-मरण मान कर मैं उत्पन्न हुआ, मैं मरूँगा - ऐसा मानता है.
तथा शरीरहीकी अपेक्षा अन्य वस्तुओंसे नाता मानता है. जिनके द्वारा शरीरकी उत्पत्ति हुई उन्हें अपने माता-पिता मानता हैं। जो शरीरको रमण कराये उसे अपनी रमणी मानता है। जो शरीरसे उत्पन्न हुआ उसे अपना पुत्र मानता है। जो शरीरको उपकारी हो उसे मित्र मानता है। जो शरीर का बुरा करे उसे शत्रु मानता है - इत्यादिकरूप मान्यता होती है.
अधिक क्तया कहें? जिस-तिस प्रकारसे अपनेको और शरीर को एकही मानता है.
इन्द्रियादिकके नाम तो यहाँ कहे हैं। परन्तु इसे तो कुछ गम्य नहीं है. अचेत हुआ पर्याय में अहंबुद्धि धारण करता है. उसका कारण क्तया है? वह बतलाते हैं :-
इस आत्मा को अनादिसे इन्द्रियज्ञान है। उससे स्वयं अमूर्त्तिक है वह तो भासित नहीं होता, परन्तु शरीर मूर्त्तिक है वही भासित होता है. और आत्मा किसी को आपरूप जानकर अहंबुद्धि धारण करे ही करे, सो जब स्वयं पृथक भासित नहीं हुआ तब उनके समुदायरूप पर्यायमें ही अहंबुद्धि धारण करता है.
तथा अपनेको और शरीरको निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध बहुत हैं इसलिये भिन्नता भासित नहीं होती. और जिस विचार द्वारा भिन्नता भासित होती है वह मिथ्यादर्शनके जोर से हो नही सकता। इसलिये पर्याय में ही अहंबुद्धि पाई जाती है.
तथा मिथ्यादर्शनसे यह जीव कदाचित् बाह्यसामग्रीका संयोग होनेपर उसे भी अपनी मानता है. पुत्र, स्त्री, धन, धान्य, हाथी, घोडे़, महल, किंकर आदि प्रत्यक्ष अपनेसे भिन्न और सदाकाल अपने आधीन नहीं ऐसे स्वयंको भासित होते हैं। तथापि उनमें ममकार करता है.
पुत्रादिकमें‘येहैंसोमैंहीहूँ’ऐसीभीकदाचित्भ्रमबुद्धिहोतीहै.तथा मिथ्यादर्शनसे शरीरादिकका स्वरूप अन्यथा ही भासित होता है. अनित्यको नित्य मानता है, भिन्न को अभिन्न मानता है, दु:ख के कारण को सुख का कारण मानता है, दु:खको सुख मानता है - इत्यादि विपरीत भासित होता है.
इस प्रकार जीव-अजीवतत्त्ववोंका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान होता है. आस्रवतत्त्वव सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा इस जीवको मोहके उदयसे मिथ्यात्व-कषायादिभाव होते है, उनको अपना स्वभाव मानता है, कर्मोपाधिसे हुए नहीं जानता. दर्शन-ज्ञान उपयोग और ये आस्रवभाव उनको एक मानता है। क्तयोंकि इनका आधारभूत तो एक आत्मा है और इनका परिणमन एक ही काल में होता है, इसलिये इसे भिन्नपना भासित नहीं होता और भिन्नपना भासित होनेका कारण जो विचार है सो मिथ्यादर्शनके बलसे हो नहीं सकता.
तथा ये मिथ्यात्व-कषायभाव आकुलता सहित हैं इसलिये वर्त्तमान दु:खमय हैं और कर्मबन्धके कारण हैं इसलिये आगामी काल में दु:ख उत्पन्न करेंगे - ऐसा उन्हें नहीं मानता और भला जान इन भावोंरूप होकरस्वयं प्रवर्तता है. तथा वह दु:खी तो अपने इन मिथ्यात्व-कषायभावोंसे होता है और वृथा ही औरोंको दु:ख उत्पन्न करने वाले मानता है. जैसे - दु:खी तो मिथ्याश्रद्धानसे होता है, परन्तु अपने श्रद्धान के अनुसार जो पदार्थ न प्रवर्ते उसे दु:खदायक मानता है. तथा दु:खी तो क्रोध से होता है, परन्तु जिससे क्रोध किया हो उसको दु:खदायक मानता है. दु:खी तो लोभसे होता है परन्तु इÚ वस्तुकी अप्राप्तिको दु:खदायक मानता है. - इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा इन भावोंका जैसा फल आता है वैसा भासित नहीं होता. इनकी तीव्रता
से नरकादि होते हंै तथा मन्दतासे स्वर्गादि होते हैं, वहाँ अधिक-कम आकुलता होती है. ऐसा भासित नहीं होता है इसलिये वे बुरे नहीं लगते. कारण यह है कि - वे अपने किये भासित होते हंै इसलिये उनको बुरे कैसे माने?
इस प्रकार आस्रवतत्त्ववका अयथार्थ ज्ञान होने पर अयथार्थ श्रद्धान होता है. बंधतत्त्वव सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा इन आस्रवभावोंसे ज्ञानावरणादि कर्मोंका बन्ध होता है. उनका उदय होने पर ज्ञान-दर्शनकी हीनता होना, मिथ्यात्व-कषायरूप परिणमन होना, चाहा हुआ न होना, सुख -दु:ख का कारण मिलना, शरीरसंयोग रहना,गति-जाति-शरीरादिकाउत्पन्नहोना, नीच-उच्च कुलका पाना होता है. इनके होनेमें मूलकारण कर्म है, उसे यह पहिचानता नहीं है, क्तयोंकि वह सूक्ष्म है, इसे दिखायी नही देता। तथा वह इसको इन कार्योंका कर्त्ता दिखायी नहीं देता। इसलिये इनके होनेमें या तो अपनेको कर्त्ता मानता है या किसी औरको कर्त्ता मानता है. तथा अपना या अन्यका कर्त्तापना भासित न हो तो मूढ़ होकर भवितव्य को मानता है.
इस प्रकार बन्धतत्त्ववका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान होता है. संवरतत्त्वव सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा आस्रवका अभाव होना सो संवर है. जो आस्रवको यथार्थ नहीं पहिचाने उसे संवरका यथार्थ श्रद्धान कैसे हो? जैसे - किसीके अहितरूप आचरण है। उसे वह अहितरूप भासित न हो तो उसके अभावको हितरूप कैसे माने? जैसे - जीवको आस्रवकी प्रवृत्ति है। इसे वह अहितरूप भासित न हो तो उसके अभावरूप संवरको कैसे हितरूप माने?
तथा अनादि से इस जीवको आस्रवभाव ही हुआ है, संवर कभी नहीं हुआ, इसलिये संवरका होना भासित नहीं होता. संवर होनेपर सुख होता है वह भासित नहीं होता. संवर से आगामी कालमें दु:ख नहीं होगा वह भासित नहीं होता. इसलिये आस्रव का तो संवर करता नहीं है और उन अन्य पदार्थों को दु:खदायक मानता है, उन्हींके न होनेका उपाय किया करता है। परन्तु वे अपने आधीन नहीं हंै. वृथा ही खेदखिन्न होता है.
इस प्रकार संवरतत्त्ववका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान होता है. निर्जरातत्त्वव सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा बन्धका एकदेश अभाव होना सो निर्जरा है. जो बन्धको यथार्थ नहीं पहिचाने उसे निर्जरा का यथार्थ श्रद्धान कैसे हो? जैसे - भक्षण किये हुए विष आदिकसे दु:खका होना न जाने तो उसे नÚ करनेके उपायको कैसे भला जाने? उसी प्रकार बन्धनरूप किये कर्मोंसे दु:ख होना न जाने तो उनकी निर्जराके उपायको कैसे भला जाने?
तथा इस जीवको इन्द्रियों द्वारा सूक्ष्मरूप जो कर्म उनका तो ज्ञान होता नहीं है और उनमें दु:खोंके कारणभूत शक्ति है उसका भी ज्ञान नहींंं है। इसलिये अन्य पदार्थों के ही निमित्तको दु:खदायक जानकर उनका ही अभाव करने का उपाय करता है, परन्तु वे अपने आधीन नहीं हैं. तथा कदाचित् दु:ख दूर करने के निमित्त कोई इष्ट संयोगादि कार्य बनता है तो वह भी कर्म के अनुसार बनता है. इसलिये उनका उपाय करके वृथा ही खेद करता है.
इस प्रकार निर्जरातत्त्ववका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान होता है. मोक्षतत्त्वव सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा सर्व कर्मबंध के अभाव का नाम मोक्ष है. जो बंधको तथा बंधजनित सर्व दु:खो को नहीं पहिचाने उसको मोक्षका यथार्थ श्रद्धान कैसे हो? जैसे - किसीको रोग है। वह उस रोगको तथा रोगजनित दु:खको न जाने तो सर्वथा रोगके अभावको कैसे भला माने? उसी प्रकार इसके कर्मबंधन है। यह उस बंधनको तथा बंधजनित दु:खको न जाने तो सर्वथा बंधके अभावको कैसे भला जाने?
तथा इस जीवको कर्मोंका और उनकी शक्तिका तो ज्ञान है नहीं। इसलिये बाह्य पदार्थोंको दु:खका कारण जानकर उनका सर्वथा अभाव करने का उपाय करता है. तथा यह तो जानता है कि - सर्वथा दु:ख दूर होने का कारण इष्ट साामग्रियोंको जुटा कर सर्वथा सुखी होना है, परन्तु ऐसा कदापि नहीं हो सकता. यह वृथा ही खेद करता है.
इसप्रकार मिथ्यादर्शन से मोक्षतत्त्ववका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान है.
इसप्रकार यह जीव मिथ्यादर्शन के कारण जीवादि सात तत्त्ववोंका जो कि प्रयोजनभूत हैं उनका अयथार्थ श्रद्धान करता है. पुण्य-पाप सम्बन्धी अयथार्थ श्रद्धान
तथा पुण्य-पाप हैं सो इन्हींके विशेष हैं और इन पुण्य-पापकी एक जाति है। तथापि मिथ्यादर्शन से पुण्यको भला जानता है, पापको बुरा जानता है. पुण्यसे अपनी इच्छानुसार किचिंत्कार्य बने, उसको भला जानता है और पापसे इच्छानुसार कार्य नहीं बने, उसको बुरा जानता है। परन्तु दोनों ही आकुलता के कारण हैं इसलिये बुरे ही हैं.
तथा यह अपनी मान्यता से वहाँ सुख-दु:ख मानता है. परमार्थसे जहाँ आकुलता है वहाँ दु:ख ही है। इसलिये पुण्य-पापके उदयको भला-बुरा जानना भ्रम ही है.
तथा कितने ही जीव कदाचित् पुण्य-पापके कारण जो शुभ-अशुभभाव उन्हें भला- बुरा जानते हैं वह भी भ्रम ही है। क्तयोंकि दोनो ही कर्मबन्धनके कारण हैं.
इस प्रकार पुण्य-पापका अयथार्थ ज्ञान होनेपर अयथार्थ श्रद्धान होता है.
इस प्रकार अतत्त्ववश्रद्धानरूप मिथ्यादर्शनका स्वरूप कहा. यह असत्यरूप है इसलिये इसीका नाम मिथ्यात्व है और यह सत्यश्रद्धानसे रहित है इसलिये इसीका नाम अदर्शन है.

मिथ्याज्ञानका स्वरूप

अबमिथ्याज्ञानकास्वरूपकहतेहैं:-प्रयोजनभूतजीवादितत्त्ववोंकोअयथार्थ जाननेका नाम मिथ्याज्ञान है. उसके द्वारा उनको जाननेमें संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय होता है. वहाँ, ‘ऐसे हंै कि ऐसे हैं?’ -इस प्रकार परस्पर विरुद्धता सहित दोरूप ज्ञान उसका नाम संशय है. जैसे - ‘मैं आत्मा हूँ कि शरीर हूँ?’ - ऐसा जानना. तथा ‘ऐसा ही है’ इस प्रकार वस्तुस्वरूपसे विरुद्धता सहित एकरूप ज्ञान उसका नाम विपर्यय है. जैसे - ‘मैं शरीर हूँ’ - ऐसा जानना. तथा ‘कुछ है’ ऐसा निर्धाररहित विचार उसका नाम अनध्यवसाय है. जैसे - ‘मैं कोई हूँ’ - ऐसा जानना. इसप्रकार प्रयोजनभूत जीवादि तत्त्ववों में संशय, विपर्यय, अनध्यवसायरूप जो जानना हो उसका नाम मिथ्याज्ञान है.
तथा अप्रयोजनभूत पदार्थोंको यथार्थ जाने या अयथार्थ जाने उसकी अपेक्षा मिथ्या- ज्ञान-सम्यग्ज्ञान नाम नहीं है. जिस प्रकार मिथ्या¹ष्िट रस्सीको रस्सी जाने तो सम्यग्ज्ञान नाम नहीं होता, और सम्यग्¹ष्िट रस्सीको साँप जाने तो मिथ्याज्ञान नाम नहीं होता.
यहाँ प्रश्न है कि - प्रत्यक्ष सच्चे-झूठे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान-मिथ्याज्ञान कैसे न कहें?
समाधान :- जहाँ जानने ही का - सच-झूठका निर्धार करनेका - प्रयोजन हो वहाँ तो कोई पदार्थ है उसके सच-झूठ जाननेकी अपेक्षा ही सम्यग्ज्ञान-मिथ्याज्ञान नाम दिया जाता है. जैसे - प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाणके वर्णन में कोई पदार्थ होता है। उसके सच्चे जानने रूप सम्यग्ज्ञानका ग्रहण किया है और संशयादिरूप जाननेको अप्रमाणरूप मिथ्याज्ञान कहा है. तथा यहाँ संसार-मोक्षके कारणभूत सच-झूठ जाननेका निर्धार करना है। वहाँ रस्सी, सर्पादिकका यथार्थ या अन्यथा ज्ञान संसार-मोक्षका कारण नहीं है, इसलिये उनकी अपेक्षा यहाँ सम्यग्ज्ञान-मिथ्याज्ञान नहीं कहे हैं. यहाँ तो प्रयोजनभूत जीवादिक तत्त्ववोंके ही जानने की अपेक्षा सम्यग्ज्ञान-मिथ्याज्ञान कहे हैं.
इसी अभिप्रायसे सिद्धान्तमें मिथ्या¹ष्िटके तो सर्व जानने को मिथ्याज्ञान ही कहा और सम्यग्¹ष्िट के सर्व जाननेको सम्यग्ज्ञान कहा.
यहाँ प्रश्न है कि - मिथ्या¹ष्िटको जीवादि तत्त्ववोंका अयथार्थ जानना है, उसे मिथ्याज्ञान कहो। परन्तु रस्सी, सर्पादिकके यथार्थ जाननेको तो सम्यग्ज्ञान कहो?
समाधान :- मिथ्या¹ष्िट जानता है, वहाँ उसको सत्ता-असत्ताका विशेष नहीं
है। इसलिये कारणविपर्यय व स्वरूपविपर्यय व भेदाभेदविपर्यय को उत्पन्न करता है. वहाँ जिसे जानता है उसके मूलकारणको नहीं पहचानता, अन्यथा कारण मानता है। वह तो कारणविपर्यय है. तथा जिसे जानता है उसके मूल वस्तुत्वरूप स्वरूपको नहीं पहचानता, अन्यथास्वरूप मानता है। वह स्वरूपविपर्यय है. तथा जिसे जानता है उसे यह इनसे भिन्न है, इनसे अभिन्न है - ऐसा नहीं पहिचानता, अन्यथा भिन्न-अभिन्नपना मानता है। सो भेदाभेदविपर्यय है. इस प्रकार मिथ्या¹ष्िटके जानने में विपरीतता पाई जाती है.
जैसे मतवाला माताको पत्नी मानता है, पत्नीको माता मानता है। उसी प्रकार मिथ्या¹ष्िटके अन्यथा जानना होता है. तथा जैसे किसी काल में मतवाला माता को माता और पत्नी को पत्नी भी जाने तो भी उसके निश्चयरूप निर्धारसे श्रद्धान सहित जानना नहीं होता, इसलिये उसको यथार्थ ज्ञान नहीं कहा जाता। उसी प्रकार मिथ्या¹ष्िट किसी कालमें किसी पदार्थ को सत्य भी जाने, तो भी उसके निश्चयरूप निर्धारसे श्रद्धान सहित जानना नहीं होता। अथवा सत्य भी जाने, परन्तु उनसेेेे अपना प्रयोजन अयथार्थ ही साधता है। इसलिये उसके सम्यग्ज्ञान नहीं कहा जाता.
इस प्रकार मिथ्या¹ष्िटके ज्ञानको मिथ्याज्ञान कहते है.
यहाँ प्रश्न है कि - इस मिथ्याज्ञानका कारण कौन है?
समाधान:- मोहके उदयसे जो मित्थाात्वभाव होता है, सम्यक्तत्व नहीं होता। वह इस मिथ्याज्ञान का कारण है. जैसे - विषके संयोग से भोजनको भी विषरूप कहते हैं वैसे मित्थाात्वके सम्बन्धसे ज्ञान है सो मिथ्याज्ञान नाम पाता है.
यहाँ कोई कहे कि - ज्ञानावरणको निमित्त क्तयों नहीं कहते?
समाधान:- ज्ञानावरणके उदयसे तो ज्ञानके अभावरूप अज्ञानभाव होता है तथा उसके क्षयोपशमसे किंचित् ज्ञानरूप मति-आदिज्ञान होते हैं. यदि इनमेंसे किसीको मिथ्या- ज्ञान, किसीको सम्यग्ज्ञान कहें तो यह दोनों ही भाव मिथ्या¹ष्िट तथा सम्यग्¹ष्िटके पाये जाते हैं, इसलिये उन दोनोंके मिथ्याज्ञान तथा सम्यग्ज्ञानका सद्भाव हो जायेगा और वह सिद्धान्तसे विरुद्ध होता है, इसलिये ज्ञानावरणका निमित्त नहीं बनता.
यहाँ फिर पूछते हैं कि - रस्सी, सर्पादिके अयथार्थ-यथार्थ ज्ञानका कारण कौन है? उस ही को जीवादि तत्त्ववोंके अयथार्थ-यथार्थ ज्ञानका कारण कहो?
उत्तर :- जाननेमें जितना अयथार्थपना होता उतना तो ज्ञानावरणके उदयसे होता है। और जो यथार्थपना होता है उतना तो ज्ञानावरणके क्षयोपशमसे होता है. जैसे कि - रस्सीको सर्प जाना वहाँ यथार्थ जाननेकी शक्तिका बाधक कारणका उदय है इसलिये अयथार्थ जानता है। तथा रस्सीको रस्सी जाना वहाँ यथार्थ जाननेकी शक्तिका कारण क्षयोपशम है इसलिये यथार्थ जानता है. उसी प्रकार जीवादितत्त्ववोंको यथार्थ जाननेकी शक्ति होने या न होनेमें तो ज्ञानावरणहीका निमित्त है। परन्तु जैसे किसी पुरुषको क्षयोपशम से दु:खकेतथासुखकेकारणभूतपदार्थोंकोयथार्थजाननेकीशक्तिहो।वहाँजिसको असातावेदनीयका उदय हो यह दु:खके कारणभूत जो हों उन्हीं का वेदन करता है, सुखके कारणभूत पदार्थोंका वेदन नहीं करता. यदि सुखके कारणभूत पदार्थोंका वेदन करे तो सुखी हो जाय, असाताका उदय होनेसे हो नहीं सकता. इसलिये यहाँ दु:खके कारणभूत और सुखके कारणभूत पदार्थोंके वेदनमें ज्ञानावरणका निमित्त नहीं है, असाता-साता का उदय ही कारणभूत है. उसी प्रकार जीवमें प्रयोजनभूत जीवादिकतत्त्वव तथा अप्रयोजनभूत अन्यको यथार्थजाननेकीशक्तिहोतीहै.वहाँजिसकेमिथ्यात्वकाउदयहोताहैवहतो अप्रयोजनभूत हों उन्हींका वेदन करता है, जानता है। प्रयोजनभूतको नहीं जानता. यदि प्रयोजनभूत को जाने तो सम्यग्दर्शन हो जाये, परन्तु वह मिथ्यात्वका उदय होनेपर हो नहीं सकता।इसलियेयहाँप्रयोजनभूतऔरअप्रयोजनभूतपदार्थोंकोजाननेमेंज्ञानावरणका निमित्त नहीं है। मिथ्यात्वका उदय-अनुदय ही कारणभूत है.
यहाँ ऐसा जानना कि - जहाँ एकेन्द्रियादिकमें जीवादितत्त्ववोंको यथार्थ जाननेकी शक्ति ही न हो, वहाँ तो ज्ञानावरणका उदय और मिथ्यात्वके उदयसे हुआ मिथ्यादर्शन इन दोनोंका निमित्त है. तथा जहाँ संज्ञी मनुष्यादिकमें क्षयोपशमादि लब्धि होनेसे शक्ति हो और न जाने, वहाँ मिथ्यात्वके उदय का ही निमित्त जानना.
इसलिये मिथ्याज्ञानका मुख्य कारण ज्ञानावरणको नहीं कहा, मोहके उदयसे हुआ भाव वही कारण कहा है.
यहाँ फिर प्रश्न है कि - ज्ञान होने पर श्रद्धान होता है, इसलिये पहले मिथ्याज्ञान कहो बादमें मिथ्यादर्शन कहो?
समाधान :- है तो ऐसा ही। जाने बिना श्रद्धान कैसे हो? परन्तु मिथ्या और सम्यक् - ऐसी संज्ञा ज्ञान को मिथ्यादर्शन और सम्यग्दर्शन के निमित्त से होती है. जैसे - मिथ्या¹ष्िट और सम्यग्¹ष्िट सुवर्णादि पदार्थोंको जानते तो समान हैं।(परन्तु)वही जानना मिथ्या¹ष्िट के मिथ्याज्ञान नाम पाता है और सम्यग्¹ष्िट के सम्यग्ज्ञान नाम पाता है. इसी प्रकार सर्व मिथ्याज्ञान और सम्यग्ज्ञानको मिथ्यादर्शन और सम्यग्दर्शन कारण जानना.
इसलिये जहाँ सामान्यतया ज्ञान-श्रद्धानका निरूपण हो वहाँ तो ज्ञान कारणभूत है, उसे प्रथम कहना और श्रद्धान कार्यभूत है, उसे बादमें कहना. तथा जहाँ मिथ्या-सम्यक् ज्ञान-श्रद्धानका निरूपण हो वहाँ श्रद्धान कारणभूत है, उसे पहले कहना और ज्ञान कार्यभूत है उसे बादमें कहना.
फिर प्रश्न है कि - ज्ञान-श्रद्धान तो युगपत् होते हैं, उनमें कारण-कार्यपना कैसे कहते हो?
समाधान :- वह हो तो वह हो - इस अपेक्षा कारणकार्यपना होता है. जैसे- दीपक और प्रकाश युगपत् होते हैं। तथापि दीपक हो तो प्रकाश हो, इसलिये दीपक कारण है प्रकाश कार्य है. उसी प्रकार ज्ञान-श्रद्धानके है. अथवा मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञानके व सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानके कारण-कार्यपना जानना.
फिर प्रश्न है कि - मिथ्यादर्शन के संयोगसे ही मिथ्याज्ञान नाम पाता है, तो एक मिथ्यादर्शनको ही संसारका कारण कहना था, मिथ्याज्ञानको अलग किस लिये कहा?
समाधान :- ज्ञानही की अपेक्षा तो मिथ्या¹ष्िट और सम्यग्¹ष्िटके क्षयोपशम से हुए यथार्थ ज्ञानमें कुछ विशेष नहीं है तथा वह ज्ञान केवलज्ञानमें भी जा मिलता है, जैसे नदी समुद्रमें मिलती है. इसलिये ज्ञान में कुछ दोष नहीं है. परन्तु क्षयोपशम ज्ञान जहाँ लगता है वहाँ एक ज्ञेय में लगता है, और इस मिथ्यादर्शनके निमित्तसे वह ज्ञान अन्य ज्ञेयोंमें तो लगता है, परन्तु प्रयोजनभूत जीवादितत्त्ववोंका यथार्थ निर्णय करनेमें नहीं लगता. सो यह ज्ञान में दोष हुआ। इसे मिथ्याज्ञान कहा. तथा जीवादितत्त्ववोंका यथार्थ श्रद्धान नहीं होता सो यहश्रद्धानमेंदोषहुआ।इसेमिथ्यादर्शनकहा.ऐसेलक्षणभेदसेमिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञानको भिन्न कहा.
इस प्रकार मिथ्याज्ञानका स्वरूप कहा. इसी को तत्त्ववज्ञान के अभाव से अज्ञान कहते हैं और अपना प्रयोजन नहीं साधता इसलिये इसीको कुज्ञान कहते है.

मिथ्याचारित्रका स्वरूप

अब मिथ्याचारित्रका स्वरूप कहते हैं :- चाारित्रमोहके उदयसे जो कषायभाव होता है उसका नाम मिथ्याचारित्र है. यहाँ अपने स्वभावरूप प्रवृत्ति नहीं है, झूठी परस्वभावरूप प्रवृत्ति करना चाहता है सो बनती नहीं है। इसलिये इसका नाम मिथ्याचारित्र है.
वही बतलाते हैं :- अपना स्वभाव तो ¹ष्टा-ज्ञाता है। सो स्वयं केवल देखनेवाला जाननेवाला तो रहता नहीं है, जिन पदार्थोंको देखता जानता है उनमें इष्ट-अनिष्टपना मानता है, इसलिये रागी-द्वेषी होकर किसीका सद्भाव चाहता है, किसीका अभाव चाहता है. परन्तु उनका सद्भाव या अभाव इसका किया हुआ होता नहीं, क्तयोंकि कोई द्रव्य किसी द्रव्यका कर्त्ता-हर्त्ता है नहीं, सर्वद्रव्य अपने-अपने स्वभावरूप परिणमित होते है। यह वृथा ही कषायभाव से आकुलित होता है.
तथा कदाचित् जैसा यह चाहे वैसा ही पदार्थ परिणमित हो तो अपने परिणमाने से तो परिणमित हुआ नहीं है. जैसे गाड़ी चलती है और बालक उसे धक्तका देकर ऐसा माने कि मैं इसे चला रहा हूँ तो वह असत्य मानता है। यदि उसके चलाने से चलती हो तो जब वह नहीं चलती तब क्तयों नहीं चलाता? उसी प्रकार पदार्थ परिणमित होते हैं और यह जीव उनका अनुसरण करके ऐसा मानता है कि इनको मैं ऐसा परिणमित कर रहा हूँ परन्तु वह असत्य मानता है। यदि उसके परिणमानेसे परिणमित होते हैं तो वे वैसे परिणमित नहीं होते तब क्तयों नहीं परिणमाता? सो जैसा स्वयं चाहता है वैसा तो पदार्थ का परिणमन कदाचित् ऐसे ही बन जाय तब होता है. बहुत परिणमन तो जिन्हें स्वयं नहीं चाहता वैसे ही होते देखे जाते हैं. इसलिये यह निश्चय है कि अपने करनेसे किसी का सद्भााव या अभाव होता नहीं.
तथा यदि अपने करने से सद्भााव-अभाव होते ही नहीं तो कषायभाव करने से क्तया हो? केवल स्वयं ही दु:खी होता है. जैसे - किसी विवाहादि कार्य में जिसका कुछ भी कहा नहीं होता, वह यदि स्वयं कर्त्ता होकर कषाय करे तो स्वयं ही दु:खी होता है - उसी प्रकार जानना.
इसलिये कषायभाव करना ऐसा है जैसे जल का बिलोना कुछ कार्यकारी नहीं है. इसलिये इन कषायोंकि प्रवृत्तिको मिथ्याचारित्र कहते हैं.
इष्ट-अनिष्टकी मिथ्या कल्पना
तथा कषायभाव होते हैं सो पदार्थोंको इष्ट-अनिष्ट माानने पर होते हैं, सो इष्ट- अनिष्ट माानना भी मिथ्या है। क्तयोंकि कोई पदार्थ इष्ट-अनिष्ट है नहीं .
कैसे? सो कहते हैं :- जो अपने को सुखदायक - उपकारी हो उसे इष्ट कहते हैं। अपनेको दु:खदायक - अनुपकारी हो उसे अनिष्ट कहते हैं. लोकमें सर्व पदार्थ अपने-अपने स्वभावके ही कर्त्ता हैं, कोई किसी को सुख-दु:खदायक, उपकारी-अनुपकारी है नहीं. यह जीव ही अपने परिणामोंमें उन्हें सुखदायक - उपकारी मानकर इष्ट जानता है अथवा दु:खदायक -अनुपकारी जानकर अनिष्ट मानता है। क्तयोंकि एक ही पदार्थ किसी को इष्ट लगता है, किसी को अनिष्ट लगता है. जैसे - जिसे वस्त्र न मिलता हो उसे मोटा वस्त्र इष्ट लगता है और जिसे पतला वस्त्र मिलता है उसे वह अनिष्ट लगता है. सूकरादि को विष्टा इष्ट लगती है, देवादिक को अनिष्ट लगती है. किसी को मेघवर्षा इष्ट लगती है किसी को अनिष्ट लगती है. - इसी प्रकार अन्य जानना.
तथा इसी प्रकार एक जीवको भी एक ही पदार्थ किसी कालमें इष्ट लगता है, किसी कालमें अनिष्ट लगता है. तथा यह जीव जिसे मुख्य रूपसे इष्ट माानता है, वह भी अनिष्ट होता देखा जाता है - इत्यादि जानना. जैसे शरीर इष्ट है, परन्तु रोगादि सहित हो तब अनिष्ट हो जाता है। पुत्रादिक इष्ट हैं, परन्तु कारण मिलने पर अनिष्ट होते देखे जाते हैं - इत्यादि जानना. तथा यह जीव जिसे मुख्यरूप से अनिष्ट मानता है, वह भी इष्ट होता देखते हैं. जैसे - गाली अनिष्ट लगती है, परन्तु ससुराल में इष्ट लगती है. इत्यादि जानना.
इस प्रकार पदार्थमें इष्ट-अनिष्टपना है नहीं. यदि पदार्थमें इष्ट-अनिष्टपना होता तो जो पदार्थ इष्ट होता वह सभी को इष्ट ही ंहोता और जो अनिष्ट होता वह अनिष्ट ही होता। परन्तु ऐसा है नहीं. यह जीव कल्पना द्वारा उन्हें इष्ट-अनिष्ट मानता है सो यह कल्पना झूठी है.
तथा पदार्थ सुखदायक - उपकारी या दु:खदायक - अनुपकारी होता है सो अपने- आप नहीं होता, परन्तु पुण्य-पापके उदयानुसार होता है. जिसके पुण्यका उदय होता है उसको पदार्थोंका संयोग सुखदायक - उपकारी होता है और जिसके पापका उदय होता है उसे पदार्थों का संयोग दु:खदायक - अनुपकारी होता है.- ऐसा प्रत्यक्ष देखते है. किसीको स्त्री-पुत्रादिक सुखदायक हैं, किसीको दु:खदायक हंै। किसीको व्यापार करनेसे लाभ है, किसी को नुकसान है। किसीके शत्रुभी दास होजाते हंै। किसीके पुत्र भी अहितकारी होता है. इसलिये जाना जाता है कि पदार्थ अपने आप इष्ट-अनिष्ट नहीं होते, परन्तु कर्मोंदयके अनुसार प्रवर्तते हैं. जैसे किसीके नौकर अपने स्वामीके कहे अनुसार किसी पुरूष को इष्ट- अनिष्ट उत्पन्न करंे तो वह कुछ नौकरों का कर्त्तव्य नहीं है, उनके स्वामी का कर्त्तव्य है. कोई नौकरोंको ही इष्ट-अनिष्ट माने तो झूठ है. उसी प्रकार कर्मके उदय से प्राप्त हुए पदार्थ कर्मके अनुसार जीवको इष्ट-अनिष्ट उत्पन्न करें तो वह कोई पदार्थों का कर्त्तव्य नहीं है, कर्मका कर्त्तव्य है. यदि पदार्थोंको ही इष्ट-अनिष्ट माने तो झूठ है.
इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि पदार्थोंको इष्ट-अनिष्ट मानकर उनमें राग-द्वेष करना मिथ्या है.
यहाँ कोई कहे कि - बाह्य वस्तुओं का संयोग कर्मनिमित्तसे बनता है, तब कर्मोंमें तो राग-द्वेष करना?
समाधान:- कर्म तो जड़ हंै, उनके कुछ सुख-दु:ख देनेकी इच्छा नहीं है. तथा वे स्वयमेव तो कर्मरूप परिणमित होते नहीं हैं, इसके भावोंके निमित्तसे कर्मरूप होते हैं. जैसे - कोई अपने हाथसे पत्थर लेकर अपना सिर फोड़ ले तो पत्थरका क्तया दोष है? उसी प्रकार जीव अपने रागादिक भावोंसे पुद्गलको कर्मरूप परिणमित करके अपना बुरा करे तो कर्मका क्तया दोष है? इसलिये कर्मसे भी राग-द्वेष करना मिथ्या है.
इस प्रकार परद्रव्योंको इष्ट-अनिष्ट मानकर राग-द्वेष करना मिथ्या है. यदि परद्रव्य इष्ट-अनिष्ट होते और वहाँ राग-द्वेष करता तो मिथ्या नाम न पाता। वे तो इष्ट-अनिष्ट हंै नहीं और यह इष्ट-अनिष्ट मानकर राग-द्वेष करता है, इसलिये इस परिणमनको मिथ्या कहा है. मिथ्यारूप जो परिणमन, उसका नाम मिथ्याचारित्र है.
राग-द्वेषका विधान व विस्तार
अब, इस जीवके राग-द्वेष होते हैं, उनका विधान और विस्तार बतलाते हैं :-
प्रथम तो इस जीवको पयार्यमें अहंबुद्धि है सो अपने को और शरीरको एक जानकर प्रवर्तता है. तथा इस शरीरमें अपनेको सुहाये ऐसी इष्ट अवस्था होती है उसमें राग करता है। अपनेको न सुहाये ऐसी अनिष्ट अवस्था होती है उसमें द्वेष करता है. तथा शरीर की इष्ट अवस्था के कारणभूत बाह्य पदार्थोंमें तो राग करता है और उसके घातकों में द्वेष करता है. तथा शरीरकी अनिष्ट अवस्थाके कारणभूत बाह्य पदार्थोंमें तो द्वेष करता है और उनके घातकों में राग करता है. तथा इनमें जिन बाह्य पदार्थों से राग करता है उनके कारणभूत अन्य पदार्थोंमें राग करता है और उनके घातकों में द्वेष करता है. तथा जिन बाह्य पदार्थों से द्वेष करता है उनके कारणभूत अन्य पदार्थोंमें द्वेष करता है और उनके घातकोंमें राग करता है. तथा इनमें भी जिनसे राग करता है उनके कारण व घातक अन्य पदार्थों में राग-द्वेष करता है. तथा जिनसे द्वेष है उनके कारण व घातक अन्य पदार्थोंमें द्वेष व राग करता है. इसी प्रकार राग-द्वेषकी परम्परा प्रवर्तती है.
तथा कितने ही बाह्य पदार्थ शरीर की अवस्था को कारण नहीं हैं उनमें भी राग-द्वेष करता है. जैसे - गाय आदिको बच्चोंसे कुछ शरीर का इष्ट नहीं होता तथापि वहाँ राग करते हैं और कुत्ते आदिको बिल्ली आदिसे कुछ शरीर का अनिष्ट नहीं होता तथापि वहाँ द्वेष करते हैं. तथा कितने ही वर्ण, गंध, शब्दादिके अवलोकनादिकसे शरीर का इष्ट नहीं होता तथापि उनमें राग करता है. कितने ही वर्णादिकके अवलोकनादिकसे शरीर को अनिष्ट नहीं होता तथापि उनमें द्वेष करता है. - इस प्रकार भिन्न बाह्य पदार्थोंमें राग-द्वेष होता है.
तथा इनमें भी जिनसे राग करता है उनके कारण और घातक अन्य पदार्थों में राग व द्वेष करता है. और जिनसे द्वेष करता है उनके कारण और घातक अन्य पदार्थों में द्वेष व राग करता है. इस प्रकार यहाँ भी राग-द्वेषकी परम्परा प्रवर्तती है.
यहाँ प्रश्न है कि - अन्य पदार्थोंमें तो राग-द्वेष करने का प्रयोजन जाना, परन्तु प्रथम ही मूलभूत शरीर की अवस्था में तथा जो शरीर की अवस्था को कारण नहीं है उन पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट माननेका प्रयोजन क्तया है?
समाधान :- जो प्रथम मूलभूत शरीरकी अवस्था आदिक हैं उनमें भी प्रयोजन विचार कर राग-द्वेष करे तो मिथ्याचारित्र नाम क्तयों पाये? उनमें बिना ही प्रयोजन राग-द्वेष करता है और उन्हींके अर्थ अन्य से राग-द्वेष करता है, इसलिये सर्व राग-द्वेष परिणतिका नाम मिथ्याचारित्र कहा है.
यहाँ प्रश्न है कि - शरीरकी अवस्था एवं बाह्य पदार्थोंमें इष्ट-अनिष्ट माननेका प्रयोजन तो भासित नहीं होता और इष्ट-अनिष्ट माने बिना रहा भी नहीं जाता। सो कारण क्तया है?
समाधान :- इस जीव के चारित्रमोह के उदयसे राग-द्वेषभाव होते हैं और वे भाव किसी पदार्थ के आश्रय बिना हो नहीं सकते. जैसे - राग हो तो किसी पदार्थ में होता है, द्वेष हो तो किसी पदार्थ में होता है. - इस प्रकार उन पदार्थोंके और राग-द्वेषके निमित्त- नैमित्तिक सम्बन्ध है. वहाँ विशेष इतना है कि - कितने ही पदार्थ तो मुख्यरूपसे रागके कारण हैं और कितने ही पदार्थ मुख्यरूपसे द्वेषके कारण हैं. कितने ही पदार्थ किसीको किसी कालमें रागके कारण होते हैं और किसीको किसी कालमें द्वेषकेे कारण होते हैं.
यहाँ इतना जानना - एक कार्य होनेमें अनेक कारण चाहिये सो रागादिक होनेमें अन्तरंग कारण मोहका उदय है वह तो बलवान है और बाह्य कारण पदार्थ है वह बलवान नहीं हैं. महा मुनियोंको मोह मन्द होनेसे बाह्य पदार्थोंका निमित्त होने पर भी राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होते. पापी जीवोंको मोह तीव्र होनेसे बाह्य कारण न होने पर भी उनके संकल्पहीसे राग-द्वेष होते हैं. इसलिये मोह का उदय होनेसे रागादिक होते हैं. वहाँ जिस बाह्य पदार्थके आश्रयसे रागभाव होना हो, उसमें बिना ही प्रयोजन अथवा कुछ प्रयोजन सहित इष्ट बाुद्धि होती है. तथा जिस पदार्थके आश्रयसे द्वेषभाव होना हो उसमें बिना ही प्रयोजन अथवा कुछ प्रयोजन सहित अनिष्टबाुद्धि होती है. इसलिये मोहके उदयसे पदार्थोंको इष्ट-अनिष्ट माने बिना रहा नहीं जाता.
इस प्रकार पदार्थोंमें इष्ट-अनिष्टबाुद्धि होने पर जो राग-द्वेषरूप परिणमन होता है उसका नाम मिथ्याचारित्र जानना.
तथा इन राग-द्वेषोंहीके विशेष क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, Ïीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेदरूप कषायभाव हैं। वे सब इस मिथ्या- चारित्रहीके भेद जानना. इनका वर्णन पहले किया ही ह.
तथाइसमिथ्याचारित्रमेंस्वरूपाचरणचारित्रकाअभावहै,इसलियेइसकानाम अचारित्र भी कहा जाता है. तथा यहाँ वे परिणाम मिटते नहीं हैं अथवा विरक्त नहीं हैं, इसलिये इसी का नाम असंयम कहा जाता है अविरति कहा जाता है. क्तयोंकि पाँच इन्द्रियाँ और मन के विषयों में पंचस्थावर और त्रसकी हिंसा में स्वच्छन्दपना हो तथा उनके त्यागरूप भाव नहीं हो, वही बारह प्रकारका असंयम या अविरति है. कषायभाव होनेपर ऐसे कार्य होते हैं इसलिये मिथ्याचारित्रका नाम असंयम या अविरति जानना. तथा इसीका नाम अव्रत जानना - क्तयोंकि हिंसा, अनृत, अस्तेय, अब्रह्म, परिग्रह - इन पापकार्योंमें प्रवृत्तिका नाम अव्रत है. इनका मूलकारण प्रमत्तयोग कहा है. प्रमत्तयोग है वह कषायमय है इसलिये मिथ्याचारित्रका नाम अव्रत भी कहा जाता है.
ऐसे मिथ्याचारित्रका स्वरूप कहा. ·
इसप्रकार इस संसारी जीवके मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्ररूप परिणमन अनादिसे पाया जाता है. ऐसा परिणमन एकेन्द्रियादि असंज्ञी पर्यन्त तो सर्व जीवोंके पाया जाता है. तथा संज्ञी पंचेन्द्रियोंमें सम्यग्¹ष्िटको छोड़कर अन्य सर्व जीवोंके ऐसा ही परिणमन पायाजाताहै.परिणमनमेंजैसाजहाँसंभवहोवैसावहाँजानना.जैसे- एकेन्द्रियादिकोंकोइन्द्रियादिककीहीनता-अधिकतापाईजातीहै.औरधनपुत्रादिकका सम्बन्ध मनुष्यादिकको ही पाया जाता है. इन्हींके निमित्तसे मिथ्यादर्शनादिकका वर्णन किया है. उसमें जैसा विशेष संंभव हो वैसा जानना.
तथा एकेन्द्रियादिक जीव इन्द्रिय, शरीरादिकका नाम नहीं जानते। परन्तु उस नामके अर्थरूप जो भाव है उसमें पूर्वोक्त प्रकारसे परिणमन पाया जाता है. जैसे - मैं स्पर्शन से स्पर्श करता हूँ. शरीर मेरा है ऐसा नाम नहीं जानता, तथापि उसके अर्थरूप जो भाव है उसरूप परिणमित होता है. तथा मनुष्यादिक कितने ही नाम भी जानते हैं और उनके भावरूप परिणमन करते हैं - इत्यादि विशेष सम्भव हैं उन्हें जान लेना.
मोहकी महिमा
ऐसे ये मिथ्यादर्शनादिक भाव जीवके अनादिसे पाये जाते हैं, नवीन ग्रहण नहीं किये हैं. देखो इसकी महिमा, कि जो पर्याय धारण करता है वहाँ बिना ही सिखाये मोहके उदयसेस्वयमेव ऐसा ही परिणमन होता है. तथा मनुष्यादिकको सत्यविचार होनेके कारण मिलने पर भी सम्यक्परिणमन नहीं होता। और श्रीगुरुके उपदेशका निमित्त बने, वे बारम्बार समझायें, परन्तु ये कुछ विचार नहीं करता. तथा स्वयंको भी प्रत्यक्ष भासित हो वह तो नहीं मानता और अन्यथा ही मानता है. किस प्रकार? सो कहते हैं :-
मरण होने पर शरीर-आत्मा प्रत्यक्ष भिन्न होते हैं. एक शरीर को छोड़कर आत्मा अन्य शरीर धारण करता है। वहाँ व्यन्तरादिक अपने पूर्वभवका सन्बन्ध प्रगट करते देखे जाते हैं। परन्तु इसको शरीर से भिन्नबुद्धि नहीं हो सकती. स्त्री-पुत्रादिक अपने स्वार्थके सगे प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। उनका प्रयोजन सिद्ध न हो तो तभी विपरीत होते दिखायी देते हैं। यह उनमें ममत्व करता है और उनके अर्थ नरकादिकमें गमनके कारणभूत नानाप्रकारके पाप उत्पन्न करता है. धनादिक सामग्री किसीकी किसीके होती देखी जाती है, वह उन्हें अपनी मानता है. तथा शरीरकी अवस्था और बाह्य सामग्री स्वयमेव उत्पन्न होती तथा विनष्ट होती दिखायी देती है, यह वृथा स्वयं कर्त्ता होता है. वहाँ जो कार्य अपने मनोरथके अनुसार होता है उसे तो कहता है - ‘मैंने किया’। और अन्यथा होतो कहता है - ‘मैंे क्तया करूँ?’। ऐसा ही होना था अथवा ऐसा क्तयों हुआ? - ऐसा मानता है. परन्तु या तो सर्वका कर्त्ता ही होना था या अकर्त्ता रहना था, सो विचार नहीं है.
तथा मरण अवश्य होगा ऐसा जानता है, परन्तु मरणका निश्चय करके कुछ कर्त्तव्य नहीं करता। इस पर्याय सम्बन्धी ही यत्न करता है. तथा मरण का निश्चय करके कभी तो कहता है कि - मैं मरूँगा और शरीर को जला देंगे. कभी कहता है - मुझे जला देंगे. कभी कहता है - यश रहा तो हम जीवित ही हैं. कभी कहता है - पुत्रादिक रहेंगे तो मैं ही जीऊँगा. - इस प्रकार पागल की भाँति बकता है, कुछ सावधानी नहीं है.
तथा अपने को परलोकमें जाना है यह प्रत्यक्ष जानता है। उसके तो इष्ट-अनिष्टका कुछ भी उपाय नहीं करता और यहाँ पुत्र, पौत्र आदि मेरी सन्ततिमें बहुत काल तक इष्ट बना रहे - अनिष्ट न हो। ऐसे अनेक उपाय करता है किसी के परलोक जाने के बाद इस लोक की सामग्री द्वारा उपकार हुआ देखा नहीं है, परन्तु इसको परलोक होने का निश्चय होने पर भी इस लोक की सामग्री का ही पालन रहता है.
तथा विषय-कषायोंकी परिणतिसे तथा हिंसादि कार्यों द्वारा स्वयं दु:खी होता है, खेदखिन्न होता है, दूसरोंका शत्रु होता है, इस लोकमें निंद्य होता है, परलोकमें बुरा होता है - ऐसा स्वयं प्रत्यक्ष जानता है तथापि उन्हीं में प्रवर्तता है. - इत्यादि अनेक प्रकार से प्रत्यक्ष भासित हो उसका भी अन्यथा श्रद्धान करता है, जानता है, आचरण करता है। सो यह मोह का महात्म्य है.
इस प्रकार यह जीव अनादिसे मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणमित हो रहा है. इसी परिणमन से संसारमें अनेक प्रकारका दु:ख उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका सम्बन्ध पाया जाता है. यही भाव दु:खोंके बीज हैं अन्य कोई नहीं.
इसलिये हे भव्य यदि दु:खोंसे मुक्त होना चाहता है तो इन मिथ्यादर्शनादिक विभावभावोंका अभाव करना ही कार्य है। इस कार्य के करने से तेरा परम कल्याण होगा.
इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्रमें मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्रके
निरूपणरूप चौथा अधिकार समाप्त हुआ ॥४॥

पाँचवाँ अधिकार

विविधमत-समीक्षा

दोहा:-बहुविधि मिथ्या गहनकरी,मलिन भयो निज भाव .
ताको होत अभावहै,सहजरूप दरसाव ..
अब, यह जीव पूर्वोक्त प्रकारसे अनादिहीसे मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणमित हो रहा है. उससे संसारमें दु:ख सहता हुआ कदाचित् मनुष्यादि पर्यायोंमें विशेष श्रद्धानादि करनेकीशक्तिकोपाताहै.वहाँयदिविशेषमिथ्याश्रद्धानादिककेकारणोंसेउन मिथ्याश्रद्धानादिकका पोषण करे तो उस जीवका दु:खसे मुक्त होना अति दुर्लभ होता है.
जैसे कोई पुरुष रोगी है, वह कुछ सावधानीको पाकर कुपथ्य सेवन करे तो उस रोगीका सुलझना कठिन ही होगा. उसी प्रकार यह जीव मिथ्यात्वादि सहित है, वह कुछ ज्ञानादि शक्तिको पाकर विशेष विपरीत श्रद्धानादिकके कारणोंका सेवन करे तो इस जीवका मुक्त होना कठिन ही होगा.
इसलिये जिस प्रकार वैद्य कुपथ्योंके विशेष बतलाकर उनके सेवनका निषेध करता है उसी प्रकार यहाँ विशेष मिथ्याश्रद्धानादिकके कारणोंका विशेष बतलाकर उनका निषेध करते हैं.
यहाँ अनादिसे जो मिथ्यात्वादिभाव पाये जाते हैं उन्हें तो अगृहीत मिथ्यात्वादि जानना, क्तयोंकि वे नवीन ग्रहण नहीं किये है. तथा उनके पुÚ करनेके कारणोंसे विशेष मिथ्यात्वादिभाव होतेे हैं उन्हें गृहीत मिथ्यात्वादि जानना. वहाँ अगृहीत मिथ्यात्वादिका वर्णन तो पहले किया है वह जानना और अब गृहीत मिथ्यात्वादिका निरूपण करते हैं सो जानना.
कुदेव-कुगुरु-कुधर्म और कल्पित तत्त्ववोंका श्रद्धान तो मिथ्यादर्शन है. तथा जिनमें विपरीत निरूपण द्वारा रागादिका पोषण किया हो ऐसे कुशास्त्रों में श्रद्धानपूर्वक अभ्यास सो मिथ्याज्ञान है. तथा जिस आचरणमें कषायोंका सेवन हो और उसे धर्मरूप अंगीकार करें सो मिथ्याचारित्र है.
अब इन्हींको विशेष बतलाते हैं:-
इन्द्र, लोकपाल इत्यादि। तथा अद्वैत ब्रह्म, राम, कृष्ण, महादेव, बुद्ध, खुदा, पीर, पैगम्बर इत्यादि। तथा हनुमान, भैरों, क्षेत्रपाल, देवी, दहाड़ी, सती इत्यादि। तथा शीतला, चौथ, सांझी, गनगौर, होली इत्यादि। तथा सुर्य, चन्द्रमा, गृह, औत, पितृ, व्यन्तर इत्यादि। तथा गाय, सर्प इत्यादि। तथा अग्नि, जल, वृक्ष इत्यादि। तथा शस्त्र, दवात, बर्तन इत्यादि अनेक हैं। उनका अन्यथा श्रद्धान करके उनको पूजते हैं और उनसे अपना कार्य सिद्ध करना चाहते हैं, परन्तु वे कार्यसिद्धि के कारण नहीं हैं. इसलिये ऐसे श्रद्धान को गृहीत मिथ्यात्व कहते हैं.
वहाँ उनका अन्यथा श्रद्धान कैसे होता है सोकहते हें:-
सर्वव्यापी अद्वैत ब्रह्म
अद्वैत ब्रह्मको सर्वव्यापी सर्वका कर्त्ता मानते हैं सो कोई है नहीं. प्रथम उसे सर्वव्यापी मानते हैं सो सर्व पदार्थ तो न्यारे-न्यारे प्रत्यक्ष हैं तथा उनके स्वभाव न्यारे-न्यारे देखे जाते हैं उन्हें एक कैसे माना जाये? इनका मानना तो इन प्रकारों से है:-
एक प्रकार तो यह है कि - सर्व न्यारे-न्यारे हैं, उनके समुदाय की कल्पना करके उसका कुछ नाम रखलें. जैसे घोड़ा, हाथी आदि भिन्न-भिन्न हैं। उनके समुदायका नाम सेना है, उनसे भिन्न कोई सेना वस्तु नहीं है. सो इस प्रकार से सर्व पदार्थ जिनका नाम ब्रह्म है वह ब्रह्म कोई भिन्न वस्तु तो सिद्ध नहीं हुई, कल्पना मात्र ही ठहरी.
तथा एक प्रकार यह है कि - व्यक्तित अपेक्षा तो न्यारे-न्यारे हैं, उन्हें जाति अपेक्षा- कल्पनासे एक कहा जाता है. जैसे - सौ घोड़े हैं, सो व्यक्तित अपेक्षा तो भिन्न-भिन्न सौ ही हैं, उनके आकारादिकी समानता देखकर एक जाति कहते हैं, परन्तु वह जाति उनसे कोई
‘सर्व वैखल्विदं ब्रह्म‘छान्दोग्योपनिषद् प्र० खं० १४ मं० १
‘नेह नानास्ति°कचन‘कठोपनिषद् अ० २ व० ४१ मं० ११ भिन्न ही तो हैनहीं. सो इस प्रकारसे यदि सब ही की किसी एक जातिअपेक्षा एक ब्रह्म माना जाय तो ब्रह्म कोई भिन्न तो सिद्ध हुआ नहीं.
तथा एक प्रकार यह है कि - पदार्थ न्यारे-न्यारे हैं, उनके मिलापसे एक स्कन्ध हो उसे एक कहते हैं. जैसे जलके परमा णु न्यारे-न्यारे हैं, उनका मिलाप होनेपर समुद्रादि कहते हैं। तथा जैसे पृथ्वीके परमाणुओंका मिलाप होनेपर घट आदि कहते हैं। परन्तु यहाँ समुद्रादि व घटादिक हैं, वे उन परमाणुओंसे भिन्न कोई अलग वस्तु तो नहीं है. सो इस प्रकारसे सर्व पदार्थ न्यारे-न्यारे हैं, परन्तु कदाचित् मिलकर एक होजाते हैंवह ब्रह्म है - ऐसा माना जाये तो इनसे अलग तो कोई ब्रह्म सिद्ध नहीं हुआ.
तथा एक प्रकार यह है कि -अंग तो न्यारे-न्यारे हैं और जिसके अंग हैंवह अंगी एक है. जैसे नेत्र, हस्त, पादादिक भिन्न-भिन्न हैं और जिसके यह हैं वह मनुष्य एक है. सो इस प्रकारसे यह सर्व पदार्थ तो अंग हैं और जिसके यह हैं वह अंगी ब्रह्म है. यह सर्व लोक विराट स्वरूप ब्रह्मका अंग है - ऐसा मानते हैं तो मनुष्यके हस्तपादादिक अंगोंमें परस्पर अंतराल होनेपर तो एकत्वपनानहीं रहता, जुडे़ रहने पर ही एक शरीर नाम पाते हैं. सो लोकमें तो पदार्थोंके परस्पर अंतराल भासित होता है। फिर उसका एकत्वपना कैसे माना जाय? अंतराल होनेपर भी एकत्व माने तो भिन्नपना कहाँ माना जायेगा?
यहाँ कोई कहे कि- समस्त पदार्थोंके मध्यमें सूक्ष्मरूप ब्रह्मके अंग हैं उनके द्वारा सब जुड़ रहे हैं. उससे कहते हैं :-
जो अंग जिस अंगसे जुड़ा है वह उसीसे जुड़ा रहता है या टूट-टूटकर अन्य-अन्य अंगोंसे जुड़ता रहता है? यदि प्रथम पक्ष ग्रहण करेगा तो सूर्यादि गमन करते हैं, उनके साथ जिन सूक्ष्म अंगोंसे वह जुड़ता है वे गमन करेंगे.तथा उनके गमन करनेसे वे सूक्ष्म अंग अन्य स्थूल अंगोंसे जुडे़ रहते हैं वे भी गमन करेंगे - इस प्रकार सर्व लोक अस्थिर हो जायेगा. जिस प्रकार शरीरका एक अंग खींचने परसर्व अंग खिच जाते हैं। उसी प्रकार एक पदार्थके गमनादि करनेसे सर्व पदार्थोंके गमनादि होंगे सो भासित नहीं होता. तथा यदि द्वितीय पक्ष ग्रहण करेगा तो अंग टूटनेसे भिन्नपना हो ही जाता है, तब एकत्वपना कैसे रहा? इसलिये सर्व-लोकके एकत्वको ब्रह्म मानना कैसेसम्भव हो सकता है?
तथा एक प्रकार यह है कि - पहले एक था, फिर अनेक हुआ, फिर एक हो जाता है। इसलिये एक है. जैसे जल एक था सो बर्तनोंमें अलग-अलग हुआ, फिर मिलता है तब एक हो जाता है. तथा जैसे - सोने का एक डला था, सो कंकन-कुण्डलादिरूप हुआ, फिर मिलकर सोनेका डला हो जाता है. उसी प्रकार ब्रह्म एक था, फिर अनेकरूप हुआ और फिर एक होगा इसलिये एक ही है.
इस प्रकार एकत्व मानता है तो जब अनेकरूप हुआ तब जुडा़ रहा या भिन्न हुआ? यदि जुड़ा रहा कहेगा तो पुर्वोक्त दोष आयेगा. भिन्न हुआ कहेगा तो उसकाल तो एकत्व नहीं रहा. तथा जल सुवर्णादिकको भिन्न होनेपर भी एक कहते हैं वह तो एक जाति अपेक्षा से कहते हैं,परन्तु यहाँ सर्व पदार्थोंकी एक जाति भासित नहीं होती. कोई चेतन है, कोई अचेतन है, इत्यादि अनेकरूप हैं। उनकी एक जाति कैसे कहे? तथा पहले एक था, फिर भिन्न हुआ मानते है तो जैसे एक पाषाण फूटकर टुकड़े हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्मके खण्ड होगये, फिर उनका इकट्ठा होना मानता है तो वहाँ उनका स्वरूप भिन्न रहता है या एक हो जाता है? यदि भिन्न रहता है तो वहाँ अपने-अपने स्वरूप से भिन्न ही हैं और एक हो जाते हैं तो जड़ भी चेतन हो जायेगा व चेतन जड़ हो जायेगा.वहाँ अनेक वस्तुओंकी एक वस्तु हुई तब किसी कालमें अनेक वस्तु, किसी कालमें एक वस्तु ऐसा कहना बनेगा, ‘अनादि-अनन्त एक ब्रह्म है’- ऐसा कहना नहीं बनेगा.
तथा यदि कहेगाकि लोक-रचना होने से व न होने से ब्रह्म जैसा का तैसा ही रहता है, इसलिये ब्रह्म अनादि-अनन्त है. तो हम पूछते हैं कि लोक में पृथवी, जलादिक देखे जाते हैं वे अलग नवीन उत्पन्न हुए हैं या ब्रह्म ही इन स्वरूप हुआ है? यदि अलग नवीन उत्पन्न हुए हैं तो वे न्यारे हुए, ब्रह्म न्यारा रहा। सर्वव्यापी अद्वैत ब्रह्म नहीं ठहरा. तथा यदि ब्रह्म ही इन स्वरूप हुआतो कदाचित् लोक हुआ, कदाचित् ब्रह्म हुआ, फिर जैसे का तैसा कैसे रहा?
तथा वह कहता है कि - सभी ब्रह्म तो लोक स्वरूप नहीं होता, उसका कोई अंश होता है. उससे कहते हैं - जैसे समुद्रका एक बिन्दु विषरूप हुआ, वहाँ स्थूल ¹ष्िटसे तो गम्य नहीं है, परन्तु सूक्ष्म¹ष्िट देने पर तो एक बिन्दु अपेक्षा समुद्रके अन्यथापना हुआ. उसी प्रकार ब्रह्मका एक अंश भिन्न होकर लोकरूप हुआ, वहाँ स्थूल विचार से तो कुछ गम्य नहीं है, परन्तु सूक्ष्म विचार करने पर तो एक अंश अपेक्षासे ब्रह्मके अन्यथापना हुआ. यह अन्यथापना और तो किसी के हुआ नहीं है.
इस प्रकार सर्वरूप ब्रह्मको मानना भ्रम ही है.
तथा एक प्रकार यह है - जैसे आकाश सर्वव्यापी एक है, उसी प्रकार ब्रह्म सर्वव्यापी एक है. यदि इस प्रकार मानता है तो आकाशवत् बड़ा ब्रह्मको मान, और जहाँ घटपटादिक हैं वहाँ जिस प्रकार आकाश है उसी प्रहार ब्रह्म भी है - ऐसा भी मान. परन्तु जिस प्रकार घटपटादिकको और आकाश को एक ही कहें तो कैसे बनेगा? उसी प्रकार लोक को और ब्रह्मको एक मानना कैसे सम्भव है? तथा आकाश का लक्षण तो सर्वत्र भासित है, इसलिये उसका तो सर्वत्र सद्भाव मानते हैं। ब्रह्मका लक्षण तो सर्वत्र भासित नहीं होता, इसलिये उसका सर्वत्र सद्भावकैसे माने? इस प्रकार से भी सर्वरूप ब्रह्म नहीं है.
ऐसा विचार करने पर किसी भी प्रकार से एक ब्रह्म संभवित नहीं है. सर्व पदार्थ भिन्न-भिन्न ही भासित होते हैं.
यहाँ प्रतिवादी कहता है कि - सर्व एक ही है, परन्तु तुम्हे भ्रम है इसलिये तुम्हे एक भासित नहीं होता तथा तुमने युक्ति कही सो ब्रह्म का स्वरूप युक्ति गम्य नहीं है, वचन अगोचर है. एक भी है, अनेक भी है। भिन्न भी है, मिला भी है. उसकी महिमा ऐसी ही है.
उससे कहते हैं कि - प्रत्यक्ष तुझको व हमको व सबको भासित होता है उसे तो तू भ्रम कहता है. और युक्ति से अनुमान करें सो तू कहता है कि सच्चा स्वरूप युक्तिगम्य है ही नहीं. तथा वह कहता है - सच्चा स्वरूप वचन अगोचर है तो वचन बिना कैसे निर्णय करें? तथा कहता है - एक भी है, अनेक भी है। भिन्न भी है, मिला भी है। परन्तु उनकी अपेक्षा नहीं बतलाता। बावले की भाँति ऐसे भी हैं, ऐसे भी हैं - ऐसा कहकर इसकी महिमा बतलाता है. परन्तु जहाँ न्याय नहीं होता वहाँझूठे ऐसा ही वाचालपना करते हैं सो करो, न्याय तो जिस प्रकार सत्य है उसी प्रकार होगा. सृष्िटकर्त्तावादका निराकरण
तथा अब, उस ब्रह्मको लोक का कर्त्ता मानता है उसेमिथ्यादिखलाते हैं.
प्रथम तो ऐसा मानता है कि ब्रह्मको ऐसी इच्छा हुई कि - ‘एकोऽहं बहुस्यां’ अर्थात् मैं एक हूँ सो बहुत होऊँगा.
वहाँ पूछते हैं - पूर्व अवस्था में दु:खी हो तब अन्य अवस्था को चाहे. सो ब्रह्म ने एक अवस्था से बहुत रूप होने की इच्छा कि तो उस एकरूप अवस्था में क्तया दु:ख था? तब वह कहता है कि दु:ख तो नहीं था, ऐसा ही कौतूहल उत्पन्न हुआ. उसे कहते हैं - यदि पहले थोड़ा सुखी हो और कौतूहल करने से बहुत सुखी हो तो कौतूहल करने का विचार करे. सो ब्रह्मको एक अवस्था से बहुत अवस्था रूप होने पर बहुत सुख होना कैसे संभव है? और यदि पूर्व ही सम्पूर्ण सुखी हो तो अवस्था किस लिये पलटे? प्रयोजन बिना तो कोई कुछ कर्त्तव्य करता नहीं है.
तथा पहले भी सुखी होगा, इच्छानुसार कार्य होने पर भी सुखी होगा। परन्तु इच्छा हुई उस काल तो दु:खी होगा? तब वह कहता है - ब्रह्मके जिस काल इच्छा होती है उसी काल ही कार्य होता है इसलिये दु:खी नहीं होता. वहाँ कहते हैं - स्थूल कालकी अपेक्षा तो ऐसा मानो। परन्तु सूक्ष्मकालकी अपेक्षा तो इच्छाका और कार्यका होना युगपत सम्भव नहीं है. इच्छा तो तभी होती है जब कार्य न हो. कार्य हो तब इच्छा नहीं रहती. इसलिये सूक्ष्मकालमात्र इच्छा रही तब तो दु:खी हुआ होगा। क्तयोंकि इच्छा है सो ही दु:ख है, और कोई दु:ख स्वरूप है नहीं. इसलिये ब्रह्मके इच्छा कैसे बने?
फिर वे कहते हैं कि - इच्छा होनेपर ब्रह्मकी माया प्रकट हुई, वह ब्रह्मको माया हुई तब ब्रह्मभी मायावी हुआ, शुद्धस्वरूप कैसे रहा? तथा ब्रह्मको और मायाको दंडी-दंडवत् संयोगसम्बन्ध है कि अग्नि-उष्णवत् समवायसम्बन्ध है. जो संयोगसम्बन्ध है तो ब्रह्म भिन्न है, माया भिन्न है। अद्वैत ब्रह्म कैसे रहा? तथा जैसे दंडी दंडको उपकारीजानकरग्रहण करता है तैसे ब्रह्म मायाको उपकारीजानता है तो ग्रहण करता है, नहीं तो क्तयों ग्रहण करे? तथा जिस मायाको ब्रह्म ग्रहण करे उसका निषेध करना कैसे सम्भव है? वह तो उपादेय हुई. तथा यदि समवायसम्बन्ध है तो जैसे अग्निका उष्णत्व स्वभाव है वैसे ब्रह्मका माया स्वभावही हुआ. जो ब्रह्मका स्वभाव है उसका निषेध करना कैसे सम्भव है? यह तो उत्तम हुई.
फिर वे कहते हैं कि ब्रह्म तो चैतन्य है, माया जड़ है।सो समवायसम्बन्धमें ऐसे दो स्वभाव सम्भवित नहीं होते. जैसे प्रकाश और अन्धकार एकत्र कैसे सम्भव है?
तथा वह कहता है - मायासे ब्रह्म आप तो भ्रमरूप होता नहीं है, उसकी मायासे जीव भ्रमरूप होता है. उससे कहते हैं- जिस प्रकार कपटी अपने कपटको आप जानता है सो आप भ्रमरूप नहीं होता, उसके कपटसे अन्य भ्रमरूप हो जाता है. वहाँ कपटी तो उसीको कहते है जिसने कपट किया, उसके कपटसे अन्य भ्रमरूप हुये उन्हें तो कपटी नहीं कहते. उसी प्रकार ब्रह्म अपनी मायाको आप जानता है सो आप तो भ्रमरूप नहीं होता, परन्तु उसकी मायासे अन्य जीव भ्रमरूप होते हैं. वहाँ मायावी तो ब्रह्म ही को कहा जायगा, उसकी मायासे अन्य जीव भ्रमरूप हुए उन्हें मायावी किसलिये कहते हैं?
फिर पूछते है कि - वे जीव ब्रह्मसे एक हैं या न्यारे हैं? यदि एक हैं तो जैसे कोई आप ही अपने अंगोंको पीड़ा उत्पन्न करे तो उसे बावला कहते हैं। उसी प्रकार ब्रह्म आप ही जो अपनेसे भिन्न नहीं है ऐसे अन्य जीव उनको मायासे दु:खी करता है सो कैसे बनेगा? तथा जो न्यारे हैं तो जैसे कोई भूत बिना ही प्रयोजन अन्य जीवोंको भ्रम उत्पन्न करके पीड़ा उत्पन्न करता है उसी प्रकार ब्रह्म बिना ही प्रयोजन अन्य जीवोंको माया उत्पन्न करके पीड़ा उत्पन्न करे सो भी बनता नहीं है.
इस प्रकार माया ब्रह्मकी कहते हैं सो कैसे सम्भव है?
फिर वे कहते हैं - माया होनेपर लोक उत्पन्न हुआ वहाँ जीवोंके जो चेतना है वह तो ब्रह्मस्वरूपहै, शरीरादिक माया है. वहाँजिस प्रकार भिन्न-भिन्न बहुतसे पात्रोंमें जल भरा है, उन सबमें चन्द्रमाका प्र्रतिबिम्ब अलग-अलग पड़ता है, चन्द्रमा एक है। उसी प्रकार अलग-अलग बहुतसे शरीरोंमें ब्रह्मका चैतन्यप्रकाश अलग-अलग पाया जाता है. ब्रह्म एक है, इसलिये जीवोंके चेतना है सो ब्रह्मकी है.
ऐसा कहना भी भ्रम ही है। क्तयोंकि शरीर जड़ है इसमें ब्रह्मके प्रतिबिम्बसे चेतना हुई, तो घट-पटादि जड़ हैं उनमें ब्रह्मका प्रतिबिम्ब क्तयों नहीं पड़ा और चेतना क्तयों नहीं हुई?
तथा वह कहता है - शरीरको तो चेतन नहीं करता, जीवको करता है.
तब उससे पूछते हैं कि जीवका स्वरूप चेतन है या अचेतन? यदि चेतन है तो चेतनका चेतन क्तया करेगा ? अचेतन है तो शरीरकी व घटादिककी व जीवकी एक जाति हुई. तथा उससे पूछते हैं - ब्रह्मकी और जीवोंकी चेतना एक है या भिन्न है? यदि एक है तो ज्ञानका अधिक-हीनपना कैसे देखा जाता है? तथा यह जीव परस्पर-वह उसकी जानीको नहीं जानता और वह उसकी जानीको नहीं जानता, सो क्तया कारण है? यदि तू कहेगा, यह घटउपाधि भेद है। तो घटउपाधि होनेसे तो चेतना भिन्न-भिन्न ठहरी. और घटउपाधि मिटने पर इसकी चेतना ब्रह्ममें मिलेगी या नाश हो जायेगी? यदि नाश हो जायेगी तो यह जीव तो अचेतन रह जायेगा. और तू कहेगा कि जीव ही ब्रह्ममें मिल जाता है तो वहाँ ब्रह्ममें मिलने पर इसका अस्तित्व रहता है या नहीं रहता? यदि अस्तित्व रहता है तो यह रहा, इसकी चेतना इसके रही। ब्रह्ममें क्तया मिला? और यदि अस्तित्व नहीं रहता है तो उसका नाश ही हुआ। ब्रह्ममें कौन मिला? यदि तू कहेगा कि ब्रह्मकी और जीवोंकी चेतना भिन्न है, तो ब्रह्म और सर्व जीव आपही भिन्न-भिन्न ठहरे. इस प्रकार जीवोंकी चेतना है सो ब्रह्मकी है - ऐसा भी नहीं बनता.
शरीरादि मायाके कहते हो सो माया ही हाड़-मांसादिरूप होती है या मायाके निमित्तसे और कोई उनरूप होता है. यदि माया ही होती है तो मायाके वर्ण-गंधादिक पहले ही थे या नवीन हुए? यदि पहले ही थे तो पहले तो माया ब्रह्मकी थी, ब्रह्म अर्र्मूर्तिक है वहाँ वर्णादिक कैसे सम्भव है? औैर यदि नवीन हुए तो अर्र्मूर्तिकका र्र्मूर्तिक हुआ, तब अर्र्मूर्तिक स्वभाव शाश्वत नहीं ठहरा. और यदि कहेगा कि - मायाके निमित्त से और कोई होता है, तब और पदार्थ तो तू ठहरता ही नहीं, फिर हुआ कौन?
यदि तू कहेगा - नवीन पदार्थ उत्पन्न होता है। तो वह माया से भिन्न उत्पन्न होता है याअभिन्न उत्पन्न होता है? माया से भिन्न उत्पन्न हो तो मायामयी शरीरादिक किसलिये कहता है, वे तो उन पदार्थमय हुए. और अभिन्न उत्पन्न हुए तो माया ही तद्रूप हुई, नवीन पदार्थ उत्पन्न किसलिये कहता है?
इस प्रकार शरीरादिक माया स्वरूप हैं ऐसा कहना भ्रम है.
तथा वे कहते हैं - मायासे तीन गुण उत्पन्न हुए - राजस, तामस, सात्विक. सो यहभी कहना कैसे बनेगा? क्तयोंकि मानादि कषायरूप भावको राजस कहते है, क्रोधादि कषायरूप भावको तामस कहते हैं, मन्दकषायरूप भावको सात्विक कहते हैं. सो यह भाव तो चेतनामय प्रत्यक्ष देखे जाते हैं और मायाका स्वरूप जड़ कहते हो सो जड़से यह भाव कैसेउत्पन्नहोगें?यदिजड़केभीहोंतोपाषाणादिककेभीउत्पन्नहोंगे,परन्तु चेतनास्वरूप जीवों ही के यह भाव दिखते हैं। इसलिये यह भाव मायासे उत्पन्न नहीं हैं. यदि मायाको चेतन ठहराये तो यह मानें. सो मायाको चेतन ठहराने पर शरीरादिक मायासे उत्पन्न कहेगा तो नहीं मानेंगे. इसलिये निर्धार कर। भ्रमरूप माननेसे लाभ क्तया है?
तथा वे कहते हैं - उन गुणोंसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह तीन देव प्रकट हुए सो कैसे सम्भव है? क्तयोंकि गुणीसे तो गुण होता है गुणसे गुणी कैसे उत्पन्न होगा? पुरुषसे तो क्रोधहोगा, क्रोधसे पुरुष कैसे उत्पन्न होगा? फिर इन गुणोंकी तो निन्दा करते हैं, इनसे उत्पन्न हुए ब्रह्मादिकको पूज्य कैसे माना जाता है? तथा गुण तो मायामयी और इन्हें ब्रह्मके अवतार कहा जाता है सो यह तो मायाके अवतार हुए, इनको ब्रह्मका अवतार∙कैसे कहा जाता है? तथा यह गुण जिनके थोड़े भी पाये जाते हैं उन्हें तो छुड़ानेका उपदेश देते है और जो इन्हींकी मूर्ति उन्हें पूज्य मानें यह कैसा भ्रम है?
तथा उनका कर्त्तव्य भी इन मय भासित होता है. कौतूहलादिक व स्त्री सेवनादिक व युद्धादिक कार्य करते हैं सो उन राजसादि गुणोंसे ही यह क्रियाएँ होती है। इसलिये उनके राजसादिक पाये जाते हैं ऐसा कहो. इन्हें पूज्य कहना, परमेश्वर कहना तो नहीं बनता. जैसे अन्य संसारी हैं वैसे ये भी हैं.
तथा कदाचित् तू कहेगा कि - संसारी तो माया के आधीन हैं सो बिना जाने उन कार्योंको करते हैं. माया ब्रह्मादिकके आधीन है, इसलिये वे जानते ही इन कार्योंको करते हैं, सो यह भी भ्रम है. क्तयोंकि मायाके आधीन होनेसे तो काम-क्रोधादिक ही उत्पन्न होते हैं और क्तया होता है? सो उन ब्रह्मादिकके तो काम-क्रोधादिक की तीव्रता पायी जाती है. कामकी तिव्रता से स्त्रियोंके वशीभूत हुए नृत्य गानादि करने लगे, विðल होने लगे, नानाप्रकार कुचेष्टा करने लगे। तथा क्रोधके वशीभूत हुए अनेक युद्धादि करने लगे। मानके वशीभूत हुए अपनी उच्चता प्रगट करनेके अर्थ अनेक उपाय करने लगे। मायाके वशीभूत हुए अनेक छल करने लगे। लोभके वशीभूत हुए परिग्रहका संग्रह करने लगे- इत्यादि। अधिक क्तया कहें? इस प्रकार वशीभूत हुए चीर हरणादि निर्लज्जोंकी क्रिया और दधि लूटनादि चोरोंकी क्रिया तथा रुण्डमाला धारणादि बावलोंकी क्रिया,बहुरूप धारणादि भूतोंकी क्रिया, गायें चराना आदि नीच कुलवालोंकी क्रिया इत्यादि जो निंद्य क्रियायें उनको तो करने लगे। इससे अधिक मायाके वशीभूत होनेपर क्तया क्रिया होती सो समझमें नहीं आता?
जैसे - कोई मेघपटल सहित अमावस्याकी रात्रीको अन्धकार रहित माने। उसी प्रकार बाह्य कुचेष्टा सहित तीव्र काम-क्रोधादिकोंके धारी ब्रह्मादिकोंको माया रहित मानना है.
फिरवहकहताहैकि-इनकोकाम-क्रोधादिव्याप्तनहींहोते,यहभी परमेश्वरकी लीला है. इससे कहते हैं - ऐसे कार्य करता है वे इच्छासे करता है या बिना इच्छाके करता है? यदि इच्छासे करता है तो स्त्रीसेवनकी इच्छाहीका नाम काम है, युद्धकरनेकी इच्छाहीका नाम क्रोध है,इत्यादि इसी प्रकार जानना. और यदि बिना इच्छा करता है तो स्वयं जिसे न चाहे ऐसा कार्य तो परवश होने पर ही होता है, सो परवशपना कैसे सम्भव है? तथा तू लीला बतलाता है सो परमेश्वर अवतार धारण करके इन कार्योंकी लीला करता हैतो अन्य जीवोंको इन कार्योंसे छुड़ाकर मुक्त करनेका उपदेश किसलिये देते हैं? क्षमा, सन्तोष, शील, संयमादिका उपदेश सर्व झूठा हुआ.
फिर वह कहता है कि परमेश्वरको तो कुछ प्रयोजन नहीं है. लोकरीतिकी प्रवृत्तिके अर्थ वह भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका निग्रह- उसके अर्थ अवतार धारण· करता है. तो इससे पूछते हैं - प्रयोजन बिना चींटी भी कार्य नहीं करती, परमेश्वर किसलिये करेगा? तथा तूने प्रयोजन भी कहा कि - लोकरीतिकी प्रवृत्तिकेअर्थ करता है. सो जैसे कोई पुरुष आप कुचेष्टासे अपने पुत्रोंको सिखाये और वे उस चेष्टारूप प्रर्वत्ों तब उनको मारे ऐसे पिताको भला कैसे कहेंगे? उसी प्रकार ब्रह्मादिक आप काम-क्रोधरूप चेष्टासे अपने उत्पन्न किये लोगों को प्रवृत्ति करायें और वे लोग उस प्रकार प्रवृत्ति करें तब उन्हें नरकादि में डाले. इन्हीं भावोंका फल शास्त्रमें नरकादि लिखा है सो ऐसे प्रभुको भला कैसे माने?
तथा तूने यह प्रयोजन कहा कि भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका निग्रह करना.सो भक्तोंको दु:खदायक जो दुष्ट हुए, वे परमेश्वरकी इच्छासे हुए या बिना इच्छासे हुए? यदि इच्छासे हुएतोजैसेकोईअपनेसेवककोआपहीकिसीसेकहकरमरायेऔरफिरउस मारनेवालेको आप मारे, तो ऐसे स्वामीको भला कैसे कहेंगे? उसी प्रकार जो अपने भक्तको आपही इच्छासे दुष्टों द्वारा पीडि़त कराये और फिर उन दुष्टोंको आप अवतार धारण करके मारे, तो ऐसे ईश्वरको भला कैसे माना जाये?
यदि तू कहेगा कि बिना इच्छा दुष्टहुए - तो या तो परमेश्वरको ऐसा आगामी ज्ञान नहीं होगा कि यह दुष्ट मेरे भक्तोंको दु:ख देंगे, या पहले ऐसी शक्तित नहीं होगी कि इनको ऐसा न होने दे. तथा उससे पूछते हैं कि यदि ऐसे कार्यके अर्थ अवतार धारण किया, सो क्तया बिना अवतार धारण किये शक्तित थी या नहीं? यदि थी तो अवतार क्तयों धारण किया? और नहीं थी तो बादमें सामथ्र्य होनेका कारण क्तया हुआ?
तब वह कहता है - ऐसा किये बिना परमेश्वरकी महिमा प्रगट कैसे होगी? उससे पूछते हैं कि - अपनी महिमा के अर्थ अपने अनुचरोंका पालन करे, प्रतिपक्षियोंका निग्रह करे, वही राग-द्वेष है. वह राग-द्वेष तो संसारी जीवका लक्षण है. यदि परमेश्वरके भी राग-द्वेष पाये जाते हैं तो अन्य जीवोंको राग-द्वेष छोड़कर समताभाव करनेका उपदेश किसलिये दें? तथा राग-द्वेषके अनुसार कार्य करनेका विचार किया, सो कार्य थोड़े या बहुत काल लगे बिना होता नहीं है, तो उतने काल आकुलता भी परमेश्वरको होती होगी. तथा जैसे जिस कार्यको छोटा आदमी ही करसकता हो उस कार्यको राजा स्वयं आकर करे तो कुछ राजाकी महिमा नहीं होती, निन्दा ही होती है. उसी प्रकारजिस कार्यको राजा व व्यंतर देवादिक कर सकें उस कार्यको परमेश्वर स्वयं अवतार धारण करके करता है - ऐसामानें तो कुछ परमेश्वरकी महिमा नहीं होती, निन्दा ही होती है.
तथा महिमा तो कोई और हो उसे दिखलाते हैं। तू तो अद्वैत ब्रह्म मानता है, महिमा किसको दिखाता है? और महिमा दिखलाने का फल तो स्तुति कराना है सो किससे स्तुति कराना चाहता है? तथा तू कहता है सर्व जीव परमेश्वरकी इच्छानुसार प्रवर्तते हैं और स्वयंको स्तुति करानेकी इच्छा है तो सबको अपनी स्तुतिरूप प्रवर्तित करो, किसलिये अन्य कार्य करना पड़े? इसलिये महिमाके अर्थ भी कार्य करना नहीं बनता.
फिर वह कहता है - परमेश्वर इन कार्योंको करते हुए भी अकर्त्ता है, उसका निर्धार नहीं होता. इससे कहते हैं - तू कहेगा कि यह मेरी माता भी है और बाँझ भी है तो तेरा कहा कैसे मानें? जो कार्य करता है उसे अकर्त्ता कैसे मानें? और तू कहता है - निर्धार नहीं होता। सो निर्धार बिना मान लेना ठहरा तो आकाशके फूल, गधेके सींग भी मानो। परन्तु ऐसा असम्भव कहना युक्त नहीं है.
इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेशको होना कहते हैं सो मिथ्या जानना.
फिर वे कहते हैं- ब्रह्मा तो सृष्िटको उत्पन्न करते हैं, विष्णु रक्षा करते हैं, महेश संहार करते हैं - सो ऐसा कहना भी सम्भव नहीं है। क्तयोंकि इन कार्योंको करते हुए कोई कुछ करना चाहेगा, कोई कुछ करना चाहेगा, तब परस्पर विरोध होगा.
और यदि तू कहेगा कि यह तो एक परमेश्वरका ही स्वरूप है. विरोध किसलिये होगा? तो आपही उत्पन्न करे, आप ही नष्ट करे - ऐसे कार्य में कौन फल है? यदि सृष्िट अपनेको अनिष्ट है तो किसलिये उत्पन्न की, और इष्ट है तो किसलिये नष्ट की? और पहले इष्ट लगी तब उत्पन्न की, फिर अनिष्ट लगी तब नष्ट करदी - ऐसा है तो परमेश्वरका स्वभाव अन्यथा हुआ कि सृष्िटका स्वरूप अन्यथा हुआ. यदि प्रथम पक्ष ग्रहण करेगा तो परमेश्वरका एक स्वभाव नहीं ठहरा. सो एक स्वभाव न रहनेका कारण क्तया है? वह बतला. बिना कारण स्वभावका पलटना किसलिये होगा? और द्वितीय पक्ष ग्रहण करेगा तो सृष्िट तो परमेश्वरके आधीन थी, उसे ऐसी क्तयों होने दिया कि अपनेको अनिष्ट लगे?
तथा हम पूछते हैं कि - ब्रह्मा सृष्िट उत्पन्न करते हैं सो कैसे उत्पन्न करते हैं? एक प्रकार तो यह है कि जैसे - मन्दिर बनाने वाला चूना, पत्थर आदि सामग्री एकत्रित करके आकारादि बनाता है। उसी प्रकार ब्रह्मा सामग्री एकत्रित करके सृष्िटकी रचना करता है. तो वह सामग्री जहाँसे लाकर एकत्रित की वह ठिकाना बतला और एक ब्रह्माने ही इतनी रचना बनायी सो पहले-बादमें बनायी होगी या अपने शरीरके हस्तादि बहुत किये होंगे? वह कैसे है सो बतला. जो बतलायेगा उसीमें विचार करने से विरुद्ध भासित होगा.
तथा एक प्रकार यह है - जिस प्रकार राजा आज्ञा करे तदनुसार कार्य होता है, उसी प्रकार ब्रह्माकी आज्ञासे सृष्िट उत्पन्न होती है, तो आज्ञा किनको दी? और जिन्हें आज्ञा दी वे कहाँसे सामग्री लाकर कैसे रचना करते हैं सो बतला.
तथा एक प्रकार यह है - जिस प्रकार ऋद्धिधारी इच्छा करे तदनुसार कार्य स्वयमेव बनता है। उसी प्रकार ब्रह्म इच्छा करे तदनुसार सृष्िट उत्पन्न होती है, तब ब्रह्मा तो इच्छा ही का कर्त्ता हुआ, लोक तो स्वयमेव ही उत्पन्न हुआ. तथा इच्छा तो परमब्रह्मने की थी, ब्रह्माका कर्त्तव्य क्तया हुआ जिससे ब्रह्मको सृष्िटको उत्पन्न करने वाला कहा?
तथा तू कहेगा - परमब्रह्मने भी इच्छा की ब्रह्माने भी इच्छा की तब लोक उत्पन्न हुआ, तो मालुम होता है कि केवल परमब्रह्मकी इच्छा कार्यकारी नहीं है. वहाँ शक्तिहीनपना आया.
तथा हम पूछते हैं - यदि लोक केवल बनानेसे बनता है तब बनाने वाला तो सुखके अर्थ बनायेगा,तो इष्ट ही रचना करेगा. इस लोकमें तो इष्ट पदार्थ थोड़े देखे जाते हैं, अनिष्ट बहुत देखे जाते हैं. जीवोंमें देवादिक बनाये सो तो रमण करनेके अर्थ व भक्ति करानेके अर्थ इष्ट बनाये। और लट, कीड़ी, कुत्ता, सुअर, सिंहादिक बनाये सो किस अर्थ बनाये? वे तो रमणीक नहीं है, भक्ति नहीं करते, सर्व प्रकार अनिष्ट ही हैं. तथा दरिद्री, दुखी नारकियोंको देखकर अपने जुगुप्सा, ग्लानी आदि दु:ख उत्पन्न हों - ऐसे अनिष्ट किसलिये बनाये?
वहँा वह कहता है - जीव अपने पापसे लट, कीड़ी, दरिद्री, नारकी आदि पर्याय भुगतते हैं. उससे पूछते हैं कि - बादमें तो पापहीके फलसे यह पर्याय हुई कहो, परन्तु पहले लोकरचनाकरते ही उनको बनाया तो किस अर्थ बनाया? तथा बादमें जीव पापरूप परिणमित हुये सो कैसे परिणमित हुये? यदिआपही परिणमित हुए कहोगे तो मालुम होता हैब्रह्माने पहले तो उत्पन्न किये, फिर वे इसके आधीन नहीं रहे, इस कारण ब्रह्माको दु:ख ही हुआ.
तथा यदि कहोगे - ब्रह्माके परिणमित करनेसे परिणमित होते हैं तो उन्हें पापरूप किसलिये परिणमित किया? जीव तो अपने उत्पन्न किये थे, उनका बुरा किस अर्थ किया? इसलिये ऐसा भी नहीं बनता.
तथा अजीवोंमें सुवर्ण, सुगन्धादिसहित वस्तुएँ बनायीं सो तो रमण करने के अर्थ बनायीं। कुवर्ण, दुर्गन्धादि सहित वस्तुएँ दु:खदायक बनायीं सो किस अर्थ बनायीं? इनके दर्शनादिसे ब्रह्माको कुछ सुख तो नहीं उत्पन्न होता होगा. तथा तू कहेगा पापी जीवोंको दु:ख देनेके अर्थ बनायी। तो अपने ही उत्पन्न किये जीव उनसे ऐसी दुष्टता किसलिये की, जो उनको दु:खदायक सामग्री पहले ही बनायी? तथा धूल, पर्वतादि कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जो रमणीक भी नहीं है और दु:खदायक भी नहीं हैं- उन्हें किस अर्थ बनाया? स्वयमेव तो जैसी-तैसी ही होती हैं और बनानेवाला जो बनाये वह तो प्रयोजन सहित ही बनाता है। इसलिये ब्रह्माको सृष्िटका कर्त्ता कैसे कहा जाता है?
तथा विष्णुको लोकका रक्षक कहते हैं. रक्षक हो वह तो दो ही कार्य करता है - एक तोदु:ख उत्पत्तिके कारण नहीं होने देता और एक विनष्ट हंोनेके कारण नहीं होने देता. सो लोकमें तो दु:खहीकी उत्पत्तिके कारण जहाँ-तहाँ देखे जाते हैं और उनसे जीवोंको दु:ख ही देखा जाता है. क्षुधा-तृषादि लग रहे हैं, शीत-उष्णादिकसे दु:ख होता है, जीव परस्पर दु:ख उत्पन्न करते हैं, शस्त्रादि दु:खके कारण बन रहे हैं, तथा विनष्ट होनेके अनेक कारण बन रहे हैं.जीवोंको रोगादिक व अग्नि, विष, शस्त्रादिक पर्यायके नाशके कारण देखे जाते हैं, तथा अजीवोंके भी परस्पर विनष्ट होने के कारण देखे जाते हैं. सो ऐसे दोनों प्रकारकी ही रक्षा नहीं की तो विष्णुने रक्षक होकर क्तया किया?
वह कहता है- विष्णु रक्षक ही है. देखो क्षुधा-तृषादिकके अर्थ अन्न-जलादिक बनाये हैं। कीड़ीको कण और कुन्जरको मन पहुँचता है, संकटमें सहायता करता है. मृत्युके कारण उपस्थित होने पर भी·टिटहरीकी भाँति उबारता है - इत्यादि प्रकार से विष्णु रक्षा करता है. उससे कहते हैं- ऐसा है तो जहाँ जीवोंको क्षुधा-तृषादिक बहुत पीडि़त करते हैं और अन्न-जलादिक नहीं मिलते, संकट पड़ने पर सहाय नहीं होती, किंचित कारण पाकर मरण होजाता है, वहाँ विष्णुकी शक्ति हीन हुई या उसे ज्ञान ही नहीं हुआ? लोकमें बहुत तो ऐसे ही दु:खी होते हैं, मरण पाते हैं। विष्णुने रक्षा क्तयों नहीं की?
तब वह कहता है - यह जीवोंके अपने कर्त्तव्यका फल है. तब उससे कहते हैं कि - जैसे शक्तिहीन लोभी झूठा वैद्य किसीका कुछ भला हो तो कहता है मेरा किया हुआ है। और जहाँ बुरा हो, मरण हो, तब कहता है इसकी ऐसी ही होनहार थी. उसी प्रकार तू कहता है कि भला हुआ वहाँ तो विष्णुका किया हुआ और बुरा हुआ तो इसके कर्त्तव्यका फल हुआ. इस प्रकार झूठी कल्पना किसलिये करे? या तो बुरा व भला दोनो विष्णुके किये कहो, या अपने कर्त्तव्यका फल कहो. यदि विष्णुका किया हुआ तो बहुत जीव दु:खी और शीघ्र मरते देखे जाते हैं सो ऐसा कार्य करे उसे रक्षक कैसे कहें? तथा अपने कर्त्तव्यका फल है तो करेगा सो पायेगा, विष्णु क्तया रक्षा करेगा?
तब वह कहता है - जो विष्णुके भक्त हैं उनकी रक्षा करता है. उससे कहते हैं कि -यदि ऐसा है तो कीड़ी कुन्जर आदि भक्त नहीं हैं उनको अन्नादिक पहुचानेमें व संकट मेंं सहाय होने में व मरण न होनेमें विष्णुका कर्त्तव्य मानकर सर्वका रक्षक किसलिये मानता है, भक्तोंहीका रक्षक मान. सो भक्तोंका भी रक्षक नहीं दीखता, क्तयोंकि अभक्त भी भक्त पुरुषोंको पीड़ा उत्पन्न करते देखे जाते हैं.
तब वह कहता है - कई जगह प्रíादादिककी सहाय की है. उससे कहते हैं - जहाँ सहाय की वहाँ तो तू वैसा ही मान। परन्तु हमतो प्रत्यक्ष म्लेच्छ मुसलमान आदि अभक्त पुरुषों द्वारा भक्त पुरुषोंको पीडि़त होते देख व मन्दिरादिको विध्न करते देखकर पूछते है ंकि यहाँ सहाय नहीं करता, सो शक्ति नहीं है या खबर ही नहीं है. यदि शक्ति नहीं है तो इनसे भी हीन शक्तिका धारक हुआ. खबर भी नहीं है तो जिसे इतनी भी खबर नहीं है सो अज्ञान हुआ.
और यदि तू कहेगा - शक्ति भी है और जानता भी है। परन्तु इच्छा ऐसी ही हुई, तो फिर भक्तवत्सल किसलिये कहता है?
इस प्रकार विष्णुको लोकका रक्षक मानना नहीं बनता.
फिर वे कहते हैं - महेश संहार करता है. सो उससे पूछते हैं कि - प्रथम तो महेश संहार सदा करता है या महाप्रलय होता है तभी करता है? यदि सदा करता है तो जिस प्रकार विष्णुकी रक्षा करनेसे स्तुति की। उसी प्रकार उसकी संहार करने से निन्दा करो. क्तयोंकि रक्षा और संहार प्रतिपक्षी हैं.
तथा यह संहार कैसे करता है? जैसे पुरुष हस्तादिसे किसीको मारे या कहकर मराये। उसी प्रकार महेश अपने अंगोंसे संहार करता है या आज्ञासे मराता है? तब क्षण- क्षणमें संहार तो बहुत जीवोंका सर्वलोकमें होता है, यह कैसे-कैसे अंगोंसे व किस-किसको आज्ञा देकर युगपत्(एक साथ)कैसे संहार करता है? तथा महेश तो इच्छा ही करता है, उसकी इच्छासे स्वयमेव उनका संहार होता है। तो उसके सदाकाल मारनेरूप दुष्ट परिणाम ही रहा करते होंगे और अनेक जीवोंको एकसाथ मारने की इच्छा कैसे होती होगी? तथा यदि महाप्रलय होने पर संहार करता है तो परमब्रह्मकी इच्छा होनेपर करता है या उसकी बिना इच्छा ही करता है? यदि इच्छा होने पर करता है तो परमब्रह्मके ऐसा क्रोध कैसे हुआ कि सर्व का प्रलय करने की इच्छा हुई? क्तयोंकि किसी कारण बिना नाश करने की इच्छा नहीं होती और नाश करने की जो इच्छा उसी का नाम क्रोध है सो कारण बतला?
तथा तू कहेगा - परमब्रह्मने यह खेल बनाया था, फिर दूर कर दिया, कारण कुछ भी नहीं है. तो खेल बनाने वाले को भी खेल इष्ट लगता है तब बनाता है, अनिष्ट लगता है तब दूर करता है. यदि उसे यह लोक इष्ट-अनिष्ट लगता है तो उसे लोकसे राग-द्वेष तो हुआ. ब्रह्मका स्वरूप साक्षीभूत किसलिये कहते हो। साक्षीभूत तो उसका नाम है जो स्वयमेव जैसे हो उसी प्रकार देखता-जानता रहे. यदि इष्ट-अनिष्ट मानकर उत्पन्नकरे, नष्ट करे, उसे साक्षीभूत कैसे कहें? क्तयोंकि साक्षीभूत रहना और कर्त्ता-हर्त्ता होना यह दोनों परस्पर विरोधी हैं। एकको दोनों सम्भव नहीं हैं.
तथा परमब्रह्मके पहलेतो यह इच्छा हुई थी कि—मैं एक हूँ सो बहुत होऊँगातब बहुत हुआ. अब ऐसी इच्छा हुई होगी कि—मैं बहुत हूँ सो कम होऊँगा. सो जैसे कोई भोलेपनसे कार्य करके फिर उस कार्यको दूर करना चाहे। उसी प्रकार परमब्रह्मने भी बहुत होकर एक होनेकी इच्छाकी सो मालूम होता है कि बहुत होनेका कार्य किया होगा सो भोलेपनहीसे किया होगा, आगामी ज्ञानसे किया होता तो किस लिये उसे दूर करनेकी इच्छा होती?
तथा यदि परमब्रह्मकी इच्छा बिना ही महेश संहार करता है तो यह परमब्रह्मका व ब्रह्मका विरोधी हुआ.
फिर पूछते हैं - यह महेश लोकका संहार कैसे करता है? अपने अंगोंहीसे संहार करता है कि इच्छा होने पर स्वयमेव ही संहार होता है? यदि अपने अंगोंसे संहार करता है तो सबका एक साथ संहार कैसे करता है? तथा इसकी इच्छा होनेसे स्वयमेव संहार होता है। तब इच्छा तो परमब्रह्मने की थी, इसने संहार क्तयों किया?
फिर हम पूछते हैं कि - संहार होनेपर सर्वलोकमें जो जीव-अजीव थे वे कहाँ गये? तब वह कहता है - जीवोंमें जो भक्त थे वे तो ब्रह्ममें मिल गये, अन्य मायामें मिल गये.
अब इससे पूछते हैं कि - माया ब्रह्मसे अलग रहती है कि बादमें एक हो
जाती है? यदि अलग रहती है तो ब्रह्मवत् माया भी नित्य हुई, तब अद्वैत ब्रह्म नहीं रहा. और माया ब्रह्ममें एक होजाती है तो जो जीव मायामें मिले थे वे भी मायाके साथ ब्रह्ममें मिल गये तो महाप्रलय होनेपर सर्वका परमब्रह्ममें मिलना ठहरा ही, तब मोक्षका उपाय किसलिये करें?
तथा जो जीव मायामें मिले वे पुन: लोकरचना होनेपर वे ही जीव लोकमें आयेंगे कि वे ब्रह्ममें मिल गये थे इसलिये नये उत्पन्न होंगे? यदि वे ही आयेंगे तो मालूम होता है अलग-अलग रहते हैं, मिले क्तयों कहते हो? और नये उत्पन्न होंगे तो जीव का अस्तित्व थोडे़काल पर्यन्त ही रहता है, फिर किसलिये मुक्त होनेका उपाय करें?
तथा वह कहता है - पृथ्वी आदि हैं वे मायामें मिलते हैं, सो माया अमूर्तिक सचेतन है या मूर्तिक अचेतन है? यदि अमूर्तिक सचेतन है तो अमूर्तिकमें मूर्तिक अचेतन कैसे मिलेगा? और मूर्तिक अचेतन है तो यह ब्रह्ममें मिलता है या नहीं? यदि मिलता है तो इसके मिलनेसे ब्रह्म भी मूर्तिक अचेतन से मिश्रित हुआ. और नहीं मिलता है तो अद्वैतता नहीं रही. और तू कहेगा - यह सर्व अमूर्तिक अचेतन हो जाते हैं तो आत्मा और शरीरादिककी एकता हुई, सो यह संसारी एकता मानता ही है, इसे अज्ञानी किसलिये कहें?
फिर पूछते हैं - लोकका प्रलय होनेपर महेशका प्रलय होता है या नहीं होता? यदि होता है तो एकसाथ होता है या आगे-पीछे होता है? यदि एकसाथ होता है तो आप नष्ट होता हुआ लोकको नष्ट कैसे करेगा? और आगे-पीछे होता है तो महेश लोकको नष्ट करके आप कहाँ रहा, आप भी तो सृष्िटमें ही था?
इस प्रकार महेश को सृष्िटका संहारकर्त्ता मानते हैं सो असम्भव है.
इसप्रकारसेवअन्यअनेकप्रकारसेब्रह्मा,विष्णु,महेशकोसृष्िटकाउत्पन्न करनेवाला,रक्षाकरनेवाला,संहारकरनेवालामाननानहींबनता।इसलियेलोकको अनादिनिधन मानना. लोकके अनादिनिधनपनेकी पुष्िट
इस लोकमें जो जीवादि पदार्थ हैं वे न्यारे-न्यारे अनादिनिधन हैं। तथा उनकी अवस्थाका परिवर्तन होता रहता है, उस अपेक्षासे उत्पन्न-विनष्ट होते कहे जाते हैं. तथा जो स्वर्ग-नरक द्वीपादिक हैं वे अनादिसे इसी प्रकार ही हैं और सदाकाल इसी प्रकार रहेंगे.
कदाचित् तू कहेगा - बिना बनाये ऐसे आकारादि कैसे हुए? सो हुए होंगे तो बनाने पर ही हुए होंगे. ऐसा नहीं है, क्तयोंकि अनादि से ही जो पाये जाते हैं वहाँ तर्क कैसा? जिस प्रकार तू परमब्रह्मका स्वरूप अनादिनिधन मानता है, उसी प्रकार उन जीवादिक व स्वर्गादिक को अनाधिनिधन मानते हैं. तू कहेगा - जीवादिक व स्वर्गादिक कैसे हुए? हम कहेंगे परमब्रह्म कैसे हुआ? तू कहेगा - इनकी रचना ऐसी किसने की? हम कहेंगे - परमब्रह्म को ऐसा किसने बनाया? तू कहेगा - परमब्रह्म स्वयंसिद्ध है। हम कहेंगे - जीवादिक व स्वर्गादिक स्वयंसिद्ध है. तू कहेगा - इनकी और परमब्रह्म की समानता कैसे सम्भव है? तो सम्भावना में दूषण बतला. लोकको नवीन उत्पन्न करना, उसका नाश करना, उसमें तो हमने अनेक दोष दिखाये. लोकको अनादिनिधन मानने से क्तया दोष है? सो तू बतला.
यदि तू परमब्रह्ममानता है सो अलग कोई है ही नहीं। इस संसार में जीव हैं, वे ही यथार्थ ज्ञान से मोक्ष मार्ग साधने से सर्वज्ञ वीतराग होते हैं.
यहाँ प्रश्न है कि - तुम तो न्यारे-न्यारे जीव अनादिनिधन कहते हो। मुक्त होने के पश्चात् तो निराकार होते हैं, वहाँ न्यारे-न्यारे कैसे सम्भव है?
समाधान :- मुक्त होने के पश्चात् सर्वज्ञको दिखते है या नहीं दिखते? यदि दिखते हैं तो कुछ आकार दिखता ही होगा. बिना आकार देखे क्तया देखा और नहीं दिखते तो या तो वस्तु ही नहीं है या सर्वज्ञ नहीं है. इसलिये इन्द्रियज्ञानगम्य आकार नहीं है उस अपेक्षा निराकार हैं और सर्वज्ञ ज्ञानगम्य हंै इसलिये आकारवान हैं. जब आकारवान ठहरे तब अलग-अलग हो तो क्तया दोष लगेगा? और यदि तू जाति अपेक्षा एक कहे तो हम भी मानते हैं. जैसे गेहूँ भिन्न-भिन्न हैं उनकी जाति एक है। इस प्रकार एक मानें तो कुछ दोष नहीं है.
इस प्रकार यर्थाथ श्रद्धान से लोक में सर्व पदार्थ अकृत्रिम भिन्न-भिन्न अनादिनिधन मानना. यदि वृथा ही भ्रम से सच-झूठका निर्णय न करे तो तू जाने, अपने श्रद्धानका फल तू पायेगा. ब्रह्मसे कुलप्रवृत्ति आदि का प्रतिषेध
तथा वे ही ब्रह्मसे पुत्र-पौत्रादि द्वारा कुलप्रवृत्ति कहते हैं. और कुलोंमें राक्षस, मनुष्य, देव, तिर्यन्चोंके परस्पर प्रसूति भेद बतलाते हैं. वहाँ देव से मनुष्य व मनुष्य से देव व तर्यन्चसे मनुष्य इत्यादि - किसी माता किसी पिता से किसी पुत्र-पुत्रीका उत्पन्न होना बतलाते हैं सो कैसे संभव है?
तथा मनहीसे व पवनादिसे व वीर्य सूँघने आदिसे प्रसूतिका होना बतलाते हैं सो प्रत्यक्षविरुद्ध भासित होता है. ऐसा होनेसे पुत्र-पौत्रादिक का नियम कैसे रहा? तथा बडे़- बडे़ महन्तोंको अन्य-अन्य माता-पिता से हुआ कहते हैं। सो महन्त पुरुष कुशीलवान माता- पिताके कैसे उत्पन्न होंगे? यह तो लोकमें गाली है. फिर ऐसा कहकर उनको महंतता किसलिये कहते हैं?
तथा गणेशादिककी मैल आदि से उत्पत्ति बतलाते हैं व किसीके अंग किसीमें जुडे़ बतलाते हैं. इत्यादि अनेक प्रत्यक्षविरुद्ध कहते हैं.

अवतार मीमांसा

तथा चौबीस अवतारहुए कहते हैं। वहाँ कितने ही अवतारोंको पूर्णावतार कहते हैं, कितनोंको अंशावतार कहते हैं. सो पूर्णावतार हुए तब ब्रह्म अन्यत्र व्यापक रहा या नहीं रहा? यदि रहा तो इन अवतारोंको पूर्णावतार किसलिये कहते हो? यदि(व्यापक)नहीं रहा तो एतावन्मात्र ही ब्रह्म रहा. तथा अंशावतार हुए वहाँ ब्रह्मका अंश तो सर्वत्र कहते हो, इनमें क्तया अधिकता हुई? तथा कार्य तो तुच्छ था और उसके लिये ब्रह्मने स्वयं अवतार धारण किया कहते हैं सो मालूम होता है बिना अवतार धारण किये ब्रह्मकी शक्ति वह कार्य करने की नहीं थी। क्तयोंकि जो कार्य अल्प उद्यमसे हो वहाँ बहुत उद्यम किसलिये करें?
तथा अवतारोंमें मच्छ, कच्छादि अवतार हुए सो किंचित् कार्य करनेके अर्थ हीन तिर्यंच पर्यायरूप हुआ सो कैसे सम्भव है? तथा प्रल्हादके अर्थ नरसिह अवतार हुआ, सो हरिणांकुशको ऐसा क्तयों होने दिया, और कितने ही काल तक अपने भक्तको किसलिये दु:ख दिलाया? तथा ऐसा रूप किसलिये धारण किया? तथा नाभिराजाके वृषभावतार हुआ बतलाते हैं, सो नाभिको पुत्रपने का सुख उपजानेको अवतार धारण किया. घोर तपश्चरण किसलिये किया? उनको तो कुछ साध्य था ही नहीं. कहेगा कि जगतके दिखलाने को किया। तब कोई अवतार तो तपश्चरण दिखाये, कोई अवतार भोगादिक दिखाये, वहाँ जगत किसको भला जानेगा?
फिर(वह)कहता है - एक अरहंत नाम का राजा हुआउसने वृषभावतारका मत अंगीकार करके जैनमत प्रगट किया, सो जैन में कोई एक अरहंत नहीं हुआ. जो सर्वज्ञपद पाकर पूजने योग्य हो उसी का नाम अर्हत् है.
तथा राम-कृष्ण इन दोनों अवतारोंको मुख्य कहते हैं सो रामावतारने क्तया किया? सीताके अर्थ विलाप करके रावणसे लड़कर उसे मारकर राज्य किया. और कृष्णावतारमें पहले ग्वाला होकर परस्त्री गोपियोंके अर्थ नाना विपरीत निंद्य‘ चेष्टाएँ करके, फिर ‘भगवत स्कन्ध ५, अध्याय ६, ११ जरासिंघु आदिको मारकर राज्य किया. सो ऐसे कार्य करनेमें क्तया सिद्धि हुई?
तथा राम-कृष्णादिकका एक स्वरूप कहते हैं, सो बीचमें इतने काल कहाँ रहे? यदि ब्रह्ममें रहे तो अलग रहे या एक रहे? अलग रहे तो मालूम होता है वे ब्रह्मसे अलग रहते हैं. एक रहे तो राम ही कृष्ण हुए, सीता ही रुक्तिमणी हुई-इत्यादि कैसे कहते हैं?
तथा रामावतारमें तो सीता को मुख्य करते हैं और कृष्णावतारमें सीताको रुक्तिमणी हुई कहते हैं और उसे तो प्रधान नहीं कहते, राधिकाकुमारीको मुख्य करते हैं. तथा पूछे तब कहते हैं - राधिका भक्त थी। सो निज स्त्रीको छोड़कर दासी को मुख्य करना कैसे बनता है? तथा कृष्णके तो राधिका सहित परस्त्री सेवनके सर्व विधान हुए सो यह भक्ति कैसी की, ऐसे कार्य तो महा निंद्य हैं. तथा रुक्तिमणी को छोड़कर राधाको मुख्य किया सो परस्त्री सेवनको भला जान किया होगा? तथा एक राधामें ही आसक्त नहीं हुए, अन्य गोपिकाकुब्जा आदि अनेक परस्त्रियोंमें भी आसक्त हुआ. सो यह अवतार ऐसे ही कार्यका अधिकारी हुआ.
फिर कहते हैं - लक्ष्मी उसकी स्त्री है, और धनादिकको लक्ष्मी कहते हैं। सो यह तो पृथ्वी आदिमें जिस प्रकार पाषाण, धूल हैं। उसी प्रकार रत्न, सुवर्णादि धन देखते हैं। यह अलग लक्ष्मी कौन है जिसका भर्तार नारायण है? तथा सीतादिकको मायाका स्वरूप कहते हैं, सो इनमें आसक्त हुए तब माया में आसक्त कैसे न हुए? कहाँ तक कहें, जो निरूपण करते हैं सो विरुद्ध करते हैं. परन्तु जीवोंको भोगादिककी कथा अच्छी लगती है, इसलिये उनका कहना प्रिय लगता है.
ऐसे अवतार कहे हैं इनको ब्रह्मस्वरूप कहते हैं. तथा औरोंको भी ब्रह्मस्वरूप कहते हैं. एक तो महादेवको ब्रह्मस्वरूप मानते हैं, उसे योगी कहते हैं सो योग किसलिये ग्रहण किया? तथा मृगछाला, भस्म धारण करते हैं सो किस अर्थ धारण की है? तथा रुण्डमाला पहिनते हैं सो हड्डी को छूना भी निंद्य है उसे गलेमें किस अर्थ धारण करते हैं? सर्पादि सहित हैं सो इसमें कौन सी बड़ाई है? आक-धतूरा खाता है सो इसमें कौन भलाई है? त्रिशूलादि रखता है सो किसका भय है? तथा पार्वती को संग लिये है, परन्तु योगी होकर स्त्री रखता है सो ऐसी विपरीतता किसलिये की? कामासक्त था तो घर ही में रहता, तथा उसने नानाप्रकार विपरीत चेष्टा की उसका प्रयोजन तो कुछ भासित नहीं होता, बावले जैसा कर्त्तव्य भासित होता है, उसे ब्रह्मस्वरूप कहते हैं.
तथा कभी कृष्णको इसका सेवक कहते हैं, कभी इसको कृष्णका सेवक कहते हैं, कभी दोनोंको एक ही कहते हैं, कुछ ठिकाना नहीं है.
तथा सूर्यादिको ब्रह्मका स्वरूप कहते हैं. तथा ऐसा कहते हैं कि विष्णु ने कहा है - घातुओंमें सुवर्ण, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, जुएमें झूठ इत्यादिमें मैं ही हूँ। सो पूर्वापर कुछ विचार नहीं करते. किसी एक अंगसे कितने ही संसारी जिसे महंत मानते हैं, उसी को ब्रह्मका स्वरूप कहते हैं। सो ब्रह्म सर्वव्यापी है तो ऐसा विशेष किस लिये किया? और सूर्यादिमें व सुवर्णादिमें ही ब्रह्म है तो सूर्य उजाला करता है, सुर्वण धन है इत्यादि गुणों से ब्रह्म माना। सो दीपादिक भी सूर्यवत् उजाला करते हैं, चाँदि लोहादि भी सूवर्णवत् धन हैं - इत्यादि गुण अन्य पदार्थोंमें भी हैं, उन्हें भी ब्रह्म मानों, बडा़-छोटा मानो, परन्तु जाती तो एक हुई. सो झूठी महंतता ठहराने के अर्थ अनेक प्रकार की युक्ति बनाते हैं.
तथा अनेक ज्वालामालिनी आदि देवियोंको माया का स्वरूप कहकर हिंसादिक पाप उत्पन्न करके उन्हें पूजना ठहराते हैं। सो माया तो निंद्य है, उसका पूजना कैसे सम्भव है? और हिंसादिक करना कैसे भला होगा? तथा गाय, सर्प आदि पशु अभक्ष-भक्षणादिसहित उन्हें पूज्य कहते हैं। अग्नि, पवन, जलादिकको देव ठहराकर पूज्य कहते हैं। वृक्षादिकको युक्ति बना कर पूज्य कहते हैं.
बहुत क्तया कहें? पुरुषलिंग नाम सहित जो हों उनमें ब्रह्मकी कल्पना करते हैं और स्त्रीलिंग नाम सहित हों उनमें मायाकी कल्पना करके अनेक वस्तुओंका पूजन ठहराते हैं. इनके पूजनेसे क्तया होगा सो कुछ विचार नहीं है. झूठे लौकिक प्रयोजन के कारण ठहराकर जगतको भ्रमाते हैं.
तथा वे कहते हैं - विधाता शरीर को गढ़ता है और यम मारता है, मरते समय यम के दूत लेने आते हैं, मरने के पश्चात् मार्गमें बहुत काल लगता है, तथा वहाँ पुण्य-पापका लेखा करते हैं और वहाँ दण्डादिक देते हैं। सो यह कल्पित झूठी युक्ति है. जीव तो प्रति समय अनन्त उपजते-मरते हैं, उनका युगपत् ऐसा होना कैसे सम्भव है? और इसप्रकार माननेका कोई कारण भी भासित नहीं होता.
तथा वे मरनेके पश्चात् श्राद्धादिकसे उसका भला होना कहते हैं, सो जीवित दशातो किसी के पुण्य-पाप द्वारा कोई सुखी-दु:खी होता दिखाई नहीं देता, मरनेके बादमेंकैसे होगा? यह युक्ति मनुष्योंको भ्रमित करके अपना लोभ साधनेके अर्थ बनाई है.
कीड़ी, पतंगा, सिंहादिक जीव भी तो उपजते-मरते हैं, उनको तो प्रलयके जीव ठहराते हैं। परन्तु जिस प्रकार मनुष्यादिकके जन्म-मरण होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार उनके होते देखे जाते हैं. झूठी कल्पना करने से क्तया सिद्धि है?
तथा वे शास्त्रोंमें कथादिकका निरूपण करते हैं वहाँ विचार करने पर विरुद्ध भासित होता है.
तथा यज्ञादिक करना धर्म ठहराते हैं, सो वहाँ बडे़ जीव उनका होम करते हैं, अग्नि आदिकका महा आरम्भ करते हैं, वहाँ जीवघात होता है। सो उन्हीं के शास्त्रों में व लोकमें हिंसा का निषेध है। परन्तु ऐसे निर्दय हैं कि कुछ गिनते नहीं हैं और कहते हैं -—यज्ञार्थं पशव: सृष्टा:इस यज्ञ के ही अर्थ पशु बनाये हैं, वहाँ घात करने का दोष नहीं है.
तथा मेघादिकका होना, शत्रु आदिका विनष्ट होना इत्यादि फल बतलाकर अपने लोभके अर्थ राजादिकोंको भ्रमित करते हैं. सो कोई विष से जीवित होना कहे तो प्रत्यक्ष विरुद्ध है। उसी प्रकार हिंसा करने से धर्म और कार्यसिद्धि कहना प्रत्यक्ष विरुद्ध है. परन्तु जिनकी हिंसा करना कहा, उनकी तो कुछ शक्ति नहीं है, किसी को उनकी पीड़ा नहीं है. यदि किसी शक्तिवान व इष्टका होम करना ठहराया होता तो ठीक रहता. पापका भय नहीं है, इसलिये पापी दुर्बलके घातक होकर अपने लोभके अर्थ अपना व अन्य का बुरा करने में तत्पर हुए हैं.
योग मीमांसा
तथा वे मोक्षमार्ग भक्यिोग और ज्ञानयोग द्वारा दो प्रकारसे प्ररूपित करते हैं. भक्यिोग मीमांसा
अब भक्यिोग द्वारा मोक्षमार्ग कहते हैं उसका स्वरूप कहा जाता हैं :-
वहाँ भक्ति निर्गुण-सगुण भेदसे दो प्रकार की कहते हैं. वहाँ अद्वैत परब्रह्मकी भक्ति करना तो निर्गुण भक्ति है। वह इस प्रकार करते हैं - तुम निराकार हो, निरंजन हो, मन- वचन से अगोचर हो, अपार हो, सर्वव्यापी हो, एक हो, सर्वके प्रतिपालक हो, अधम उधारन हो, सर्वके कर्त्ता-हर्त्ता हो, इत्यादि विशेषणोंसे गुण गाते हैं। सो इनमें कितने ही तो निराकारादि विशेषण हैं सो अभाव रूप हैं, उनको सर्वथा माननेसे अभाव ही भासित होता है. क्तयोंकि आकारादि बिना वस्तु कैसी होगी? तथा कितने ही सर्वव्यापी आदि विशेषण असम्भवी हैं सो उनका असम्भवपना पहले दिखाया ही है.
फिर ऐसा कहते हैं कि - जीवबुद्धिसे मैं तुम्हारा दास हूँ , शास्त्रदृष्िटसे तुम्हारा अंश हूँ, तत्त्ववबुद्धिसे—तू ही मैं हूँसो यह तीनों ही भ्रम है. यह भक्ति करनेवाला चेतन है या जड़़ है? यदि चेतन है तो चेतना ब्रह्मकी है या इसीकी है? यदि ब्रह्मकी है तो—मैं दास हूँऐसा मानना तो यह चेतनाही के होता है सो चेतना ब्रह्मका स्वभाव ठहरा और स्वभाव-स्वभावीके तादात्म्य सम्बन्ध है वहाँ दास और स्वामीका सम्बन्ध कैसे बनता है? दास और स्वामीका सम्बन्ध तो भिन्न पदार्थ हो तभी बनता है. तथा यदि यह चेतना इसीकी है तो यह अपनी चेतना का स्वामी भिन्न पदार्थ ठहरा, तब मैं अंश हूँ व—जो तू है सो मैं हूँऐसा कहना झूठा हुआ.और यदि भक्ति करने वाला जड़ है तोजड़के बुद्धिका होना असम्भव है, ऐसी बुद्धि कैसे हुई? इसलिये—मैं दास हूँऐसा कहना तो तभी बनता है जब अलग-अलग पदार्थ हों. और—तेरा मैं अंश हूँऐसा कहना बनता ही नहीं. क्तयोंकि ‘तू’ और ‘मैं’ ऐसा तो भिन्न हो तभी बनता है, परन्तु अंश-अंशी भिन्न कैसे होंगे? अंशी तो कोई भिन्न वस्तु है नहीं, अंशोंका समुदाय वही अंशी है. और—तू है सो मैं हूँ- ऐसा वचन ही विरुद्ध है. एक पदार्थ में अपनत्व भी माने और उसे पर भी माने सो कैसे सम्भव है। इसलिये भ्रम छोड़कर निर्णय करना.
तथा कितने नाम ही जपते हैं। सो जिसका नाम जपते हैं उसका स्वरूप पहचाने बिना केवल नाम ही का जपना कैसे कार्यकारी होगा? यदि तू कहेगा नाम ही का अतिशय है। तो जो नाम ईश्वर का है वही नाम किसी पापी पुरुषका रखा, वहाँ दोनोंके नाम उच्चारणमें फलकी समानता हो, सो कैसे बनेगा? इसलिये स्वरूपका निर्णय करके पश्चात् भक्ति करने योग्य हो उसकी भक्ति करना.
इसप्रकार निर्गुण भक्ति का स्वरूप बतलाया.
तथा जहाँ काम क्रोधादिसे उत्पन्न हुए कार्योंका वर्णन करके स्तुति आदिकरें उसे सगुणभक्ति कहते हैं.
वहाँ सगुणभक्तिमें लौकिक श्रुंगार वर्णन जैसा नायक-नायिकाका करते हैं वैसा ठाकुर-ठकुरानीकावर्णनकरतेहैं.स्वकीया-परकीयास्त्रीसंबन्धीसंयोग-वियोगरूप सर्वव्यवहार वहाँ निरूपित करते हैं. तथा स्नान करती स्त्रियोंके वस्त्र चुराना, दधि लूटना, स्त्रियोंके पैर पड़ना, स्त्रियोंके आगे नाचना इत्यादि जिन कार्योंको करते संसारी जीव भी लज्जाति हों उन कार्योंका करना ठहराते हैं। सो ऐसा कार्य अतिकामपीडि़त होने पर ही बनता है.
तथा युद्धादिक किये कहते हैं सो यह क्रोधके कार्य हैं. अपनी महिमा दिखानेके अर्थ उपाय किये कहते हैं सो यह मान के कार्य हैं. अनेक छल किये कहते हैं सो माया के कार्य हैं. विषयसामग्री प्राप्ति के अर्थ यत्न किये कहते हैं सो यह लोभके कार्य हैं. कौतूहलादिक किये कहते हैं सो हास्यादिकके कार्य हैं. ऐसे यह कार्य क्रोधादिसे युक्त होनेपर ही बनते हैं.
इस प्रकार काम-क्रोधादिसे उत्पन्न कार्योंको प्रगट करके कहते हैं कि - हम स्तुति करते हैं। सो काम-क्रोधादिकके कार्य ही स्तुति योग्य हुए तो निंद्य कौन ठहरेंगे? जिनकी लोकमें, शाास्त्रमें अत्यन्त निन्दा पायी जाती है उन कार्योंका वर्णन करके स्तुति करना तो हस्तचुगल जैसा कार्य हुआ.
हम पूछते हैं - कोई किसीका नाम तो न कहे और, ऐसे कार्योंही का निरूपण करके कहे कि किसी ने ऐसे कार्य किये हैं, तब तुम उसे भला जानोगे या बुरा जानोगे? यदि भला जानोगे तो पापी भले हुए, बुरा कौन रहा? बुरा जानोगे तो ऐसे कार्य कोई करो, वही बुरा हुआ. पक्षपात रहित न्याय करो.
यदि पक्षपातसे कहोगे कि - ठाकुरका ऐसा वर्णन करना भी स्तुति है तो ठाकुरने ऐसे कार्य किसलिये किये? ऐसे निंद्य कार्य करनेमें क्तया सिद्धि हुई? कहोगे कि - प्रवृत्ति चलाने के अर्थ किये, तो परस्त्रीसेवन आदि निंद्य कार्योंकी प्रवृत्ति चलानेमें आपको व अन्यको क्तया लाभ हुआ? इसलिये ठाकुर को ऐसा कार्य करना सम्भव नहीं है. तथा यदि ठाकुरने कार्य नहीं किये, तुमही कहते हो, तो जिसमें दोष नहीं था उसे दोष लगाया. इसलिये ऐसा वर्णन करना तो निन्दा है - स्तुति नहीं है.
तथा स्तुति करते हुए जिन गुणोंका वर्णन करते हैं उस रूप ही परिणाम होते हैं व उन्हीं में अनुराग आता है. सो काम-क्रोधादि कार्योंका वर्णन करते हुए आप भी काम- क्रोधादिरूप होगा अथवा काम-क्रोधादिमें अनुरागी होगा, सो ऐसे भाव तो भले नहीं हैं. यदि कहोगे - भक्त ऐसा भाव नहीं करते, तो परिणाम हुए बिना वर्णन कैसे किया? उनका अनुराग हुए बिना भक्ति कैसे की? यदि यह भाव ही भले हों तो ब्रह्मचर्यको व क्षमादिकको भला किसलिये कहें? इनके तो परस्पर प्रतिपक्षीपना है.
तथा सगुण भक्ति करने के अर्थ राम-कृष्णादिकी मूर्त्ति भी श्रुùारादि किये, वक्रत्वादि सहित, स्त्री आदि संग सहित बनाते हैं। जिसे देखते ही काम-क्रोधादिभाव प्रगट हो आयें. और महादेवके लिंगहीका आकार बनाते हैं. देखो विडम्बना जिसका नाम लेनेसे लाज आती है, जगत जिसे ढँक रखता है, उसके आकारकी पूजा कराते हैं. क्तया उसके अन्य अंग नहीं थे? परन्तु बहुत विडम्बना ऐसा ही करनेसे प्रगट होती है.
तथा सगुण भक्तिके अर्थ नानाप्रकारकी विषय सामग्री एकत्रित करते हैं. वहाँ नाम ठाकुर का करते हैं और स्वयं उसका उपभोग करते हैं. भोजनादि बनाते हैं और ठाकुर को भोग लगाया कहते हैं। फिर आप ही प्रसादकी कल्पना करके उसका भक्षणादि करते हैं. सो यहाँ पूछते हैं - प्रथम तो ठाकुर के क्षुधा-तृषाकी पीड़ा होगी, न हो तो ऐसी कल्पना कैसे सम्भव है? और क्षुधादिसे पीडि़त होगा तब व्याकुल होकर ईश्वर दु:खी हुआ, औरोंका दु:ख कैसे दूर करेगा? तथा भोजनादि सामग्री आपने तो उनके अर्थ अर्पणकी सो की, फिर प्रसाद तो ठाकुर दे तब होता है, अपना ही किया तो नहीं होता. जैसे कोई राजा को भेंट करे, फिर राजा इनाम दे तो उसे ग्रहण करना योग्य है। परन्तु आज राजा को भेंट करे, वहाँ राजा तो कुछ कहे नहीं और आप ही—राजाने मुझे इनाम दी- ऐसा कहकर उसे अंगीकार करे तो यह खेल हुआ. उसी प्रकार यहाँ भी ऐसा करनेसे भक्ति तो हुई नहीं, हास्य करना हुआ.
फिर ठाकुर और तुम दो हो या एक हो? दो हो तो तूने भेंट की, पश्चात् ठाकुर दे तो ग्रहण करना चाहिए, अपनेआप ग्रहण किसलिये करता है? और तू कहेगा-ठाकुरकी तो मूर्ति है, इसलिये मैं ही कल्पना करता हूँ। तो ठाकुरके करने का कार्य तूने ही किया, तब तू ही ठाकुर हुआ. और यदि एक हो तो भेंट करना, प्रसाद कहना झूठा हुआ. एक होने पर यह व्यवहार सम्भव नहीं होता। इसलिये भोजनासक्त पुरुषों द्वारा ऐसी कल्पना की जाती है.
तथा ठाकुरजी के अर्थ नृत्य-गानादि कराना। शीत, ग्रीष्म, वसन्तादि ऋतुओंमें संसारियोंके सम्भवित ऐसी विषयसामग्री एकत्रित करना इत्यादि कार्य करते हैं. वहाँ नाम तो ठाकुरका लेना और इन्द्रियोंके विषय अपने पोषना सो विषयासक्त जीवों द्वारा ऐसा उपाय किया गया है. तथा वहाँ जन्म, विवाहादिककी व सोने-जागने इत्यादिकी कल्पना करते हैं सो जिस प्रकार लडकि़याँ गुड्डा-गुडि़योंका खेल बना कर कौतूहल करती हैं। उसी प्रकार यह भी कौतूहल करना है, कुछ परमार्थरूप गुण नहीं हैं. तथा बाल ठाकुर का स्वांग बना कर चेष्टाएँ दिखाते हैं, उससे अपने विषयों का पोषण करते हैं और कहते हैं - यह भी भक्ति है, इत्यादि क्तया-क्तया कहें? ऐसी अनेक विपरीतताएँ सगुण भक्तिमें पायी जाती हैं.
इस प्रकार दोनों प्रकार की भक्तिसे मोक्षमार्ग कहते हैं सो उसे मिथ्या दिखाया. ज्ञानयोग मीमाांसा
अब अन्यमत प्ररूपित ज्ञानयोग से मोक्षमार्गका स्वरूप बतलाते हैं:-
एक अद्वैत सर्वव्यापी परब्रह्मको जानना उसे ज्ञान कहते हैं सो उसका मिथ्यापना तो पहले कहा ही है.
तथा अपनेको सर्वथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप मानना, काम-क्रोधादिक व शरीरादिकको भ्रम जानना उसे ज्ञान कहते हैं। सो यह भ्रम है. आप शुद्ध है तो मोक्ष का उपाय किसलिये करता है? आप शुद्ध ब्रह्म ठहरा तब कर्त्तव्य क्तया रहा? तथा अपनेको प्रत्यक्ष काम- क्रोधादिक होते देखे जातें हैं, और शरीरादिक का संयोग देखा जाता है। सो इनका अभाव होगा तब होगा, वर्त्तमानमें इनका सद्भाव मानना भ्रम कैसे हुआ?
फिर कहते हैं - मोक्षका उपाय करना भी भ्रम है. जैसे - रस्सी तो रस्सी ही है, उसे सर्प जान रहा था सो भ्रम था, भ्रम मिटनेपर रस्सी ही है। उसी प्रकार आप तो ब्रह्म ही है, अपनेको अशुद्ध जान रहा था सो भ्रम था, भ्रम मिटने पर आप ब्रह्म ही है. - सो ऐसा कहना मिथ्या है. यदि आप शुद्ध हो और उसे अशुद्ध जाने तो भ्रम है, और आप काम-क्रोधादि सहित अशुद्ध हो रहा है उसे अशुद्ध जाने तो भ्रम कैसे होगा? शुद्ध जाननेपर भ्रम होगा. सो झूठे भ्रम सेअपनेको शुद्धब्रह्म माननेसे क्तया सिद्धि है?
तथा तू कहेगा - यह काम-क्रोधादिक तो मनके धर्म हैं, ब्रह्म न्यारा है. तो तुझसे पूछते हैं - मन तेरा स्वरूप है या नहीं? यदि है तो काम-क्रोधादिक भी तेरे ही हुए। और नहीं है तो तू ज्ञान स्वभाव है या जड़ है? यदि ज्ञानस्वरूप है तो तेरे तो ज्ञान मन व इन्द्रिय द्वारा ही होता दिखाई देता है. इनके बिना कोई ज्ञान बतलाये तो उसे तेरा अलग स्वरूप मानें, सो भासित नहीं होता. तथा—मनज्ञानेधातु से मन शब्द उत्पन्न हुआ है सो मन तो ज्ञान स्वरूप है। सो यह ज्ञान किसका है उसे बतला। परन्तु अलग कोई भासित नहीं होता. तथा यदि तू जड़ है तो ज्ञान बिना अपने स्वरूप का विचार कैसे करता है? यह तो बनता नहीं है. तथा तू कहता है - ब्रह्म न्यारा है, सो वह न्यारा ब्रह्म तू ही है या और है? यदि तू ही है तो तेरे—मैं ब्रह्म हूँऐसा मानने वाला जो ज्ञान है वह तो मन स्वरूप ही है, मन से अलग नहीं है। और अपनत्व मानना तो अपनेहीमें होता है. जिसे न्यारा जाने उसमेंे अपनत्व नहीं माना जाता. सो मन से न्यारा ब्रह्म है, तो मन रूप ज्ञान ब्रह्ममें अपनत्व किसलिये मानता है? तथा यदि ब्रह्म और ही है तो तू ब्रह्म में अपनत्व किसलिये मानता है? इसलिये भ्रम छोड़कर ऐसा जान कि जिसप्रकार स्पर्शनादि इन्द्रियाँ तो शरीर का स्वरूप है सो जड़ है, उसके द्वारा जो जानपना होता है सो आत्मा का स्वरूप है। उसी प्रकार मन भी सूक्ष्म परमाणुओं का पुंज है वह शरीर ही का अंग है. उसके द्वारा जानपना होता है व काम-क्रोधादिभाव होते हैं सो सर्व आत्माका स्वरूप है.
विशेष इतना - जानपना तो निजस्वभाव है, काम-क्रोधादिक औपाधिकभाव हैं, उनसे आत्मा अशुद्ध है. जब काल पाकर काम-क्रोधादि मिटेंगे और जानपने के मन-इन्द्रिय की आधीनता मिटेगी तब केवलज्ञानस्वरूप आत्मा शुद्ध होगा.
इसी प्रकार बुद्धि-अहंकारादिक भी जान लेना। क्तयोंकि मन और बुद्धि आदिक एकार्थ हैं और अहंकारादिक हैं वे काम-क्रोधादिकवत् औपाधिकभाव हैं। इनको अपनेसे भिन्न जानना भ्रम है. इनको अपना जानकर औपाधिकभावोंका अभाव करने का उद्यम करना योग्य है. तथा जिनसे इसका अभाव न हो सके और अपनी महंतता चाहें, वे जीव इन्हें अपने न ठहराकर स्वच्छन्द प्रवर्तते हैं। काम-क्रोधादिक भावों को बढ़ाकर विषय-सामग्रियोंमें व हिंसादिक कार्योंमें तत्पर होते हैं.
तथा अहंकारादिके त्यागको भी वे अन्यथा मानते हैं. सर्वको परब्रह्म मानना, कहीं अपनत्व न मानना उसे अहंकारका त्याग बतलाते हैं सो मिथ्या है। क्तयोंकि कोई आप है या नहीं? यदि है तो आपमें अपनत्व कैसे न मानें? यदि आप नहीं है तो सर्वको ब्रह्म कौन मानता है? इसलिये शरीरादि परमें अहंबुद्धि न करना, वहाँ कर्त्ता न होना सो अहंकार का त्याग है. अपनेमें अहंबुद्धि करने का दोष नहीं है.
तथा सर्वको समान जानना, किसीमें भेद नहीं करना, उसको राग-द्वेषका त्याग बतलाते हैं वह भी मिथ्या है। क्तयोंकि सर्व पदार्थ समान नहीं है. कोई चेतन है, कोई अचेतन है, कोई कैसा है, कोई कैसा है, उन्हें समान कैसे माने? इसलिये परद्रव्योंको इष्ट-अनिष्ट न मानना सो राग-द्वेष का त्याग है. पदार्थोंका विशेष जानने में तो कुछ दोष नहीं है.
इस प्रकार अन्य मोक्षमार्गरूप भावोंकी अन्यथा कल्पना करते हैं. तथा ऐसी कल्पना से कुशील सेवन करते हैं, अभक्ष्य भक्षण करते हैं, वर्णादि भेद नहीं करते, हीन क्रिया आचरते हैं इत्यादि विपरीतरूप प्रवर्तते हैं. जब कोई पूछे तब कहते हैं - यह तो शरीर का धर्म है अथवा जैसी प्रारब्ध(भाग्य)है वैसा होता है, अथवा जैसी ईश्वर की इच्छा होती है वैसा होता है, हमको तो विकल्प नहीं करना.
सो देखो झूठ, आप जान-जानकर प्रवर्तता है उसे तो शरीर का धर्म बतलाता है, स्वयं उद्यमी होकर कार्य करता है उसे प्रारब्ध(भाग्य)कहता है, और आप इच्छा से सेवन करे उसे ईश्वर की इच्छा बतलाता है. विकल्प करता है और कहता है - हमको तो विकल्प नहीं करना. सो धर्म का आश्रय लेकर विषयकषाय सेवन करना है, इसलिये ऐसी झूठी युक्ति बनाता है. यदि अपने परिणाम किंचित् भी न मिलाये तो हम इसका कर्त्तव्य न मानें. जैसे - आप ध्यान धरे बैठा हो, कोई अपने ऊपर वस्त्र डाल गया, वहाँ आप किंचित् सुखी नहीं हुआ। वहाँ तो उसका कर्त्तव्य नहीं है यह सच है. और आप वस्त्रको अंगीकार करके पहिने, अपनी शीतादिक वेदना मिटाकर सुखी हो। वहाँ यदि अपना कर्त्तव्य नहीं मानें तो कैसे सम्भव है? तथा कुशील सेवन करना, अभक्ष्य भक्षण करना इत्यादि कार्य तो परिणाम मिले बिना होते नहीं। वहाँ अपना कर्त्तव्य कैसे न माने? इसलिये यदि काम- क्रोधादि का अभाव ही हुआ हो तो वहाँ किन्हीं क्रियाओं में प्रवृत्ति सम्भव ही नहीं है. और यदि काम-क्रोधादि पाये जाते हैं तो जिस प्रकार यह भाव थोड़े हों तदनुसार प्रवृत्ति करना. स्वच्छन्द होकर इनको बढ़ाना युक्त नहीं है.
तथा कई जीव पवनादिकी साधना करके अपने को ज्ञानी मानते है. वहाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्णारूप नासिकाद्वार से पवन निकले, वहाँ वर्णादिक भेदोंसे पवन ही की पृथ्वी तत्त्ववादिरूप कल्पना करते हैं. उसके विज्ञान द्वारा किंचित्् साधना से निमित्तका ज्ञान होता है इसलिये जगत को इष्ट अनिष्ट बतलाते हैं, आप महन्त कहलाते हैं। सो यह तो लौकिक कार्य है, कहीं मोक्षमार्ग नहीं है. जीवोंको इष्ट-अनिष्ट बतलाकर उनके राग-द्वेष बढ़ाये और अपने मान-लोभादिक उत्पन्न करे, इसमें क्तया सिद्धि है?
तथा प्रणायामादिक साधन करे, पवनको चढ़ाकर समाधि लगाई कहे। सो यह तो जिस प्रकार नट साधना द्वारा हस्तादिकसे क्रिया करता है, उसी प्रकार यहाँ भी साधना द्वारा पवन से क्रिया की. हस्तादिक और पवन यह तो शरीर ही के अंग हैं, इनके साधनेसे आत्महित कैसे सधेगा?
तथा तू कहेगा - वहाँ मन का विकल्प मिटता है, सुख उत्पन्न होता है, यमके वशीभूतपना नहीं होता। सो यह मिथ्या है. जिस प्रकार निद्रामें चेतना की प्रवृत्ति मिटती है, उसी प्रकार पवन साधनेसे यहाँ चेतना की प्रवृत्ति मिटती है. वहाँ मन को रोक रखा है, कुछ वासना तो मिटी नहीं है इसलिये मन का विकल्प मिटा नहीं कहते। और चेतना बिना सुख कौन भोगता है? इसलिये सुख उत्पन्न हुआ नहीं कहते. तथा इस साधना वाले तो इस क्षेत्र में हुए हैं, उनमें कोई अमर दिखाई नहीं देता. अग्नि लगानेसे उसका भी मरण होता दिखाई देता है। इसलिये यम के वशीभूत नहीं है - यह झूठी कल्पना है.
तथा जहाँ साधना में किंचित् चेतना रहे और वहाँ साधनासे शब्द सुने उसे—अनहद नादबतलाता है. सो जिस प्रकार वीणादिकके शब्द सुननेसे सुख मानना है, उसी प्रकार उसके सुननेसे सुख मानना है. यहाँ तो विषय पोषण हुआ, परमार्थ तो कुछ नहीं है. तथा पवन के निकलने-प्रविष्ट होने में—सोहंऐसी शब्द की कल्पना करके उसे—अजपा जापकहते हैं. सो जिस प्रकार तीतर के शब्दमें—तू हीशब्दकी कल्पना करते हैं, कहीं तीतर अर्थका अवधारण कर ऐसा शब्द नहीं कहता. उसी प्रकार यहाँ—सोहंशब्द की कल्पना है, कुछ पवन अर्थ अवधारण करके ऐसा शब्द नहीं कहते। तथा शब्द के जपने- सुनने ही से तो कुछ फल प्राप्ति नहीं है, अर्थका अवधारण करने से फल प्राप्ति होती है.
—सोहंशब्द का तो अर्थ यह है—सो मैं हूँयहाँ ऐसी अपेक्षा चाहिये कि - ‘सो’ कौन? तब उसका निर्णय करना चाहिये। क्तयोंकि तत् शब्द को और यत् शब्द को नित्य सम्बन्ध है. इसलिये वस्तुका निर्णय करके उसमें अहंबुद्धि धारण करनेमें—सोहंशब्द बनता है. वहाँ भी आपको आपरूप अनुभव करे वहाँ तो—सोहंशब्द सम्भव नहीं है, पर को अपनेरूप बतलानेमें—सोहंशब्द सम्भव है. जैसे - पुरुष आपको आप जाने, वहाँ—सो मैं हूँऐसा किसलिये विचारेगा? कोई अन्य जीव जो अपने को न पहचानता हो, और कोई अपना लक्षण न जानता हो, तब उससे कहते हैं -—जो ऐसा है सो मैं हूँ, उसी प्रकार यहाँ जानना.
तथा कोई ललाट, भ्रमर और नासिकाके अग्रको देखने के साधन द्वारा त्रिकुटी आदिका ध्यान हुआ कहकर परमार्थ मानता है. वहाँ नेत्र की पुतली फिरनेसे मूर्त्तिक वस्तु देखी, उसमें क्तया सिद्धि है? तथा ऐसे साधनसे किंचित् अतीत-अनागतादिकका ज्ञान हो, व वचनसिद्धि हो, व पृथ्वी-आकाशादिमें गमनादिककी शक्ति हो, व शरीरमें आरोग्यतादिक हो तो यह तो सर्व लौकिक कार्य है। देवादिकको स्वयमेव ही ऐसी शक्ति पायी जाती है. इनसे कुछ अपना भला तो होता नहीं है। भला तो विषयकषाय की वासना मिटने पर होता है। यह तो विषयकषायका पोषण करने के उपाय हैं। इसलिये यह सर्व साधन किंचित् भी हितकारी नहीं हंै. इनमें कष्ट बहुत मरणादि पर्यन्त होता है ओैर हित सधता नहीं है। इसलिये ज्ञानी वृथा ऐसा खेद नहीं करते, कषायी जीव ही ऐसे साधन में लगते हैं.
तथा किसी को बहुत तपश्चरणादिक द्वारा मोक्षका साधन कठिन बतलाते हैं, किसी को सुगमता से ही मोक्ष हुआ कहते हैं. उद्धवादिकको परम भक्त कहकर उन्हें तो तपका उपदेश दिया कहते हैं और वेश्यादिकको बिना परिणाम(केवल)नामादिक ही से तरना बतलाते हैं, कोई ठिकाना ही नहीं है.
इस प्रकार मोक्षमार्गको अन्यथा प्ररूपित करते हैं.
अन्यमत कल्पित मोक्षमार्गकीमीमांसा
तथा मोक्षस्वरूप को भी अन्यथा प्ररूपित करते हैं. वहाँ मोक्ष अनेक प्रकार से बतलाते हैं.
एक तो मोक्ष ऐसा कहते हैं कि - वैकुण्ठधाममें ठाकुर-ठकुरानी सहित नाना भोग विलास करते हैं, वहाँ पहुँच जाये और उनकी सेवा करता रहे सो मोक्ष है। सो यह तो विरुद्ध है. प्रथम तो ठाकुर ही संसारीवत् विषयासक्त हो रहे हैं। सो जैसे राजादिक हैं वैसे ही ठाकुर हुए. तथा दूसरोंसे सेवा करानी पड़ी तब ठाकुर के पराधीनपना हुआ. और यदि वह मोक्ष प्राप्त करके वहाँ सेवा करता रहे तो जिस प्रकार राजा की चाकरी करना उसी प्रकार यह भी चाकरी हुई, वहाँ पराधीन होने पर सुख कैसे होगा? इसलिये यह भी नहीं बनता.
तथा एक मोक्ष ऐसा कहते हैं - ईश्वरके समान आप होता है। सो भी मिथ्या है. यदि उसके समान और भी अलग होते हैं तो बहुत ईश्वर हुए. लोक का कर्त्ता-हर्त्ता कौन ठहरेगा? सभी ठहरें तो भिन्न इच्छा होनेपर परस्पर विरोध होगा. एक ही है तो समानता नहीं हुई. न्यून है उसको नीचेपनसे उच्च होने की आकुुलता रही। तब सुखी कैसे होगा? जिस प्रकार छोटा राजा या बड़ा राजा संसार में होता है। उसी प्रकार छोटा-बड़ा ईश्वर मुक्तिमें भी हुआ सो नहीं बनता.
तथा एक मोक्ष ऐसा कहते हैं कि - वैकुण्ठमें दीपक जैसी एक ज्योति है, वहाँ ज्योतिमें ज्योति मिल जाती है। सो यह भी मिथ्या है. दीपक की ज्योति तो मूर्त्तिक अचेतन है, ऐसी ज्योति वहाँ कैसे सम्भव है? तथा ज्योति में ज्योति मिलने पर यह ज्योति रहती है या विनष्ट हो जाती है? यदि रहती है तो ज्योति बढ़ती जायेगी, तब ज्योतिमें हीनाधिकपना होगा। और विनष्ट हो जाती है तो अपनी सत्ता नष्ट हो ऐसा कार्य उपादेय कैसे माने? इसलिये ऐसा भी बनता नहीं है.
तथा एक मोक्ष ऐसा कहते हैं कि - आत्मा ब्रह्म ही है, मायाका आवरण मिटने पर मुक्ति ही है। सो यह भी मिथ्या है. यह मायाके आवरण सहित था तब ब्रह्मसे एक था कि अलग था? यदि एक था तो ब्रह्म ही मायारूप हुआ और अलग था तो माया दूर होनेपर ब्रह्ममें मिलता है तब इसका अस्तित्व रहता है या नहीं? यदि रहता है तो सर्वज्ञको तो इसका अस्तित्व अलग भासित होगा। तब संयोग होनेसे मिले कहो, परन्तु परमार्थसे तो मिले नहीं हैं. तथा अस्तित्व नहीं रहता है तो अपना अभाव होना कौन चाहेगा? इसलिये यह भी नहींंं बनता.
तथा कितने ही एक प्रकारसे मोक्षको ऐसा भी कहते हैं कि - बुद्धि आदिकका नाश होनेपर मोक्ष होता है. सो शरीरके अंगभूत मन, इन्द्रियोंके आधीन ज्ञान नहीं रहा. काम क्रोधादिक दूर होनेपर तो ऐसा कहना बनता है। और वहाँ चेतनताका भी अभाव हुआ मानें तो पाषणादि समान जड़ अवस्थाको कैसे भला मानें? तथा भला साधन करनेसे तो जानपना बढ़ता है, फिर बहुत भला साधन करने पर जानपनेका अभाव होना कैसे मानें? तथा लोकमें ज्ञानकी महंततासे जड़पनेकी तो महंतता नहीं है। इसलिये यह नहीं बनता.
इसी प्रकार अनेक प्रकार कल्पना द्वारा मोक्षको बतलाते हैं सो कुछ यथार्थ तो जानते नहीं हैं। संसार अवस्था की मुक्ति अवस्था में कल्पना करके अपनी इच्छानुसार बकते हैं.
इस प्रकार वेदान्तादि मतोंमें अन्यथा निरूपण करते हैं. मुस्लिममत सम्बन्धी विचार
तथा इसी प्रकार मुसलमानोंके मतमें अन्यथा निरूपण करते हैं. जिस प्रकार वे ब्रह्मको सर्वव्यापी, एक, निरंजन, सर्वका कर्त्ता-हर्त्ता मानते हैं। उसी प्रकारयह खुदाको मानते हैं. तथा जैसे वे अवतार हुए मानते हैं वैसेही यह पैगम्बर हुए मानते हैं. जिस प्रकार वे पुण्य-पापका लेखा लेना, यथायोग्य दण्डादिक देना ठहराते हैं। उसी प्रकार यह खुदाको ठहराते हैं. तथा जिस प्रकार वे गाय आदिकको पूज्य कहते हैं। उसी प्रकार यह सूअर आदिको कहते हैं. सब तिर्यंचादिक हैं. तथा जिस प्रकार वे ईश्वरकी भक्तिसे मुक्ति कहते हैं। उसी प्रकार यह खुदाकी भक्तिसे कहते हैं. तथा जिस प्रकार वे कहीं दयाका पोषण, कहीं हिंसाका पोषण करते हैं। उसी प्रकार यह भी कहीं महर करनेका, कहीं कतल करनेका पोषण करते हैं. तथा जिस प्रकार वे कहीं तपश्चरण करनेका, कहीं विषय सेवनका पोषण करते हैं। उसी प्रकार यह भी पोषणकरते हैं. तथा जिस प्रकार वे कहीं मांस-मदिरा, शिकार आदिका निषेध करते हैं, कहीं उत्तम पुरूषों द्वारा उनका अंगीकार करना बतलाते हैं। उसी प्रकार यह भी उनका निषेध व अंगीकार करना बतलाते हैं. ऐसे अनेक प्रकारसे समानता पायी जाती है. यद्यपि नामादिक और और हैं। तथापि प्रयोजनभूत अर्थकी एकता पायी जाती है.
तथा ईश्वर, खुदा आदि मूल श्रद्धानकी तो एकता है और उत्तर श्रद्धानमें बहुत ही विशेष हैं। वहाँ उनसे भी यह विपरीतरूप विषयकषायके पोषक, हिंसादि पापके पोषक, प्रत्यक्षादि प्रमाणसे विरुद्ध निरूपण करते हैं.
इसलिये मुसलमानोंका मत महा विपरीतरूप जानना.
इस प्रकार इस क्षेत्र-कालमें जिन-जिन मतोंकी प्रचुर प्रवृत्ति है उनका मिथ्यापना प्रकट किया.
यहाँ कोई कहे कि- यह मत मिथ्या हैं तो बडे़ राजादिक व बडे़ विद्यावान् इन मतोंमें कैसे प्रवर्तते हैं?
समाधान :- जीवोंके मिथ्यावासना अनादिसे है सो इनमें मिथ्यात्वहीकापोषण है. तथा जीवोंको विषयकषायरूप कार्योंकी चाह वर्तती है सो इनमें विषयकषायरूप कार्योंकाही पोषण है. तथा राजादिकोंका व विद्यावानोंका ऐसे धर्ममें विषयकषायरूप प्रयोजन सिद्ध होता है. तथा जीव तो लोकनिंद्यपनाको भी लांघकर, पाप भी जानकर, जिन कार्योंको करना चाहे। उन कार्योंको करते धर्म बतलायें तो ऐसे धर्ममें कौन नहंीं लगेगा? इसलिये इन धर्मोंकी विशेष प्रवृत्ति है.
तथा कदाचित तू कहेगा-इन धर्मोंमें विरागता, दया इत्यादि भी तो कहते हैं? सो जिस प्रकार झोल दिये बिना खोटा द्रव्य(सिक्तका)नहीं चलता। उसी प्रकार सचको मिलाये बिना झूठ नहीं चलता। परन्तु सर्वके हित प्रयोजनमें विषयकषायका ही पोषण किया है. जिस प्रकार गीतामें उपदेश देकर युद्ध करानेका प्रयोजन प्रकट किया, वेदान्तमें शुद्ध निरूपण करके स्वच्छंद होनेका प्रयोजन दिखाया। उसी प्रकार अन्य जानना. तथा यह काल तो निकृष्ट है, सो इसमें तो निकृष्ट धर्महीकी प्रवृत्ति विशेष होती है.
देखो, इसकालमें मुसलमान बहुत प्रधान होगये, हिन्दु घट गये। हिन्दुओंमें और तो बढ़ गये, जैनी घट गये. सो यह कालका दोष है.
इस प्रकार इस क्षेत्रमें इस काल मिथ्याधर्मकी प्रवृत्ति बहुत पायी जाती है.

अन्यमत निरूपित तत्त्वव-विचार

अब पण्िडतपनेके बलसे कल्पित युक्यिों द्वारा नाना मत स्थापित हुए हैं, उनमें जो तत्त्ववादिक माने जाते हैं, उनका निरूपण करते है:-
सांाख्यमत
वहाँ सांख्यमतमें पच्चीस तत्त्वव मानते है. सो कहते हैं - सत्व, रज:, तम:, यह तीन गुण कहते हैं. वहाँ सत्त्वव द्वारा प्रसाद(प्रसन्न)होता है, रजोगुण द्वारा चित्तकी चंचलता होती है, तमोगुण द्वारा मूढ़ता होती है, इत्यादि लक्षण कहते हैं. इनरूप अवस्थाका नाम प्रकृति है। तथा उससे बुद्धि उत्पन्न होती है। उसीका नाम महतत्त्वव है, उससे अहंकार उत्पन्न होता है। उससे सोलह मात्रा होती हैं. वहाँ पाँच तो ज्ञान इन्द्रियाँ होती है - स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र तथा एक मन होता है. तथा पाँच कर्म इन्द्रियाँ होती है - वचन, चरण, हस्त, लिंग, गुदा. तथा पाँच तन्मात्रा होती है- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द. तथा रूपसे अग्नि, रससे जल, गन्धसे पृथ्वी, स्पर्शसे पवन, शब्दसे आकाश-इस प्रकार हुए कहते हैं. इस प्रकार चौबीस तत्त्वव तो प्रकृतिस्वरूप हैं। इनसे भिन्न निर्गुण कर्त्ता-भोक्ता एक पुरूष है.
इस प्रकार पच्चीस तत्त्वव कहते हैं सो यह कल्पित हैं। क्तयोंकि राजसादिकगुण आश्रय बिना कैसे होंगे? इनका आश्रय तो चेतन द्रव्य ही सम्भव है. तथा इनसे बुद्धि हुई कहते हैं सो बुद्धि नाम तो ज्ञानका है, और ज्ञानगुणधारी पदार्थमें यह होती देखी जाती है, तो इससे ज्ञान हुआ कैसे मानें? कोई कहे- बुद्धि अलग है, ज्ञान अलग है, तब मन तो पहले सोलह मात्रामें कहा, और ज्ञान अलग कहोगे तो बुद्धि किसका नाम ठहरेगा? तथा उससे अहंकार हुआ कहा सो परवस्तु में ‘मैं करता हूँ ’ ऐसा माननेका नाम अहंकार है, साक्षीभूत जाननेसे तो अहंकार होता नहीं है, तो ज्ञानसे उत्पन्न कैसे कहा जाता है?
तथा अहंकार द्वारा सोलह मात्राएँ कहीं, उनमें पाँच ज्ञानइन्द्रियाँ कहीं, सो शरीरमें नेत्रादि आकाररूप द्रव्येद्रियाँ हैं वे तो पृथ्वी आदिवत् जड़ देखी जाती है और वर्णादिकके जाननेरूप भावइन्द्रियाँ हैं सो ज्ञानरूप हैं, अहंकारका क्तया प्रयोजन है? कोई-किसीको- अहंकार, बुद्धि रहित देखनेमें आता है वहाँ अहंकार द्वारा उत्पन्न होना कैसे सम्भव है? तथा मन कहा, सो इन्द्रियवत् ही मन है। क्तयोंकि द्रव्यमन शरीररूप है, भावमन ज्ञानरूप है. तथा पाँच कर्मइन्द्रिय कहते हैं सो यह तो शरीरके अंग हैं, मूर्तिक हैं. अमूर्तिक अहंकारसे इनका उत्पन्न होना कैसे माने?
तथा कर्म इन्द्रियाँ पाँच ही तो नहीं हैं, शरीरके सर्व अंग कार्यकारी हैं. तथा वर्णन तो सर्व जीवाश्रित है, मनुष्याश्रित ही तो नहीं है, इसलिये सूंड, पूंछ इत्यादि अंग भी कर्म इन्द्रियाँ हैं। पाँच हीकी संख्या किसलिये कहते हैं?
तथा स्पर्शादिक पाँच तन्मात्रा कहीं, सो रूपादि कुछ अलग वस्तु नहीं हैं, वे तो परमाणुओं से तन्मय गुण हैं। वे अलग कैसे उत्पन्न हुए? तथा अहंकार तो अमूर्तिक जीव का परिणाम है, इसलिये यह मूर्तिक गुण उससे कैसेउत्पन्न हुए माने?
तथा इन पाँचोंसे अग्नि आदि उत्पन्न कहते हैं सो प्रत्यक्ष झूठ है. रूपादिक और अग्नि आदिकके तो सहभूत गुण-गुणी सम्बन्ध है, कथन मात्र भिन्न है, वस्तुभेद नहीं है. किसी प्रकार कोई भिन्न होते भासित नहीं होते, कथनमात्र से भेद उत्पन्न करते हैं। इसलिये रूपादिसे अग्नि आदि उत्पन्न हुए कैसे कहें? तथा कहनेमें भी गुणीमें गुण हैं, गुणसे गुणी उत्पन्न हुआ कैसे माने?
तथाइनसे भिन्न एक पुरुष कहते हैं, परन्तु उसका स्वरूप अव्यक्तव्य कहकर प्रत्युत्तर नहीं करते, तो कौन समझे? कैसा है, कहाँ है, कैसे कर्त्ता-हर्त्ता है, सो बतला. जो बतलायेगा उसीमें विचार करनेसे अन्यथापना भासित होगा.
इस प्रकार सांख्यमत द्वारा कल्पित तत्त्वव मिथ्या जानना.
तथा पुरुषकोप्रकृतिसे भिन्न जाननेका नाम मोक्षमार्ग कहते हैं। सो प्रथम तो प्रकृति और पुरुष कोई है ही नहीं तथा मात्र जाननेहीसे तो सिद्धि होती नहीं है। जानकर रागादिक मिटाने पर सिद्धि होती है. परन्तु इस प्रकार जाननेसे कुछ रागादिक नहीं घटते. प्रकृतिका कर्त्तव्य माने, आप अकर्त्ता रहे। तो किसलिये आप रागादिक कम करेगा? इसलिये यह मोक्षमार्ग नहीं है.
तथा प्रकृति- पुरुषका भिन्न होना उसे मोक्ष कहते हैं. सो पच्चीस तत्त्ववोंमें चौबीस तत्त्वव तो प्रकृति सम्बन्धी कहे, एक पुरुष भिन्न कहा। सो वे तो भिन्न हैं ही। और कोई जीव पदार्थ पच्चीस तत्त्ववोंमें कहा ही नहीं. तथा पुरुषहीको प्रकृतिका संयोग होनेपर जीव संज्ञा होती है तो पुरुष न्यारे-न्यारे प्रकृति सहित हैं, पश्चात् साधन द्वारा कोई पुरुष प्रकृति रहित होता है-ऐसा सिद्ध हुआ, एक पुरुष न ठहरा.
तथा प्रकृति पुरुषकी भूल है या किसी व्यंतरीवत् भिन्न ही है, जो जीवको आ लगती है? यदि उसकी भूल है तो प्रकृतिसे इन्द्रियादिक व स्पर्शादिक तत्त्वव उत्पन्न हुए कैसे मानें? और अलग है तो वह भी एक वस्तु है, सर्व कर्तव्य उसका ठहरा. पुरुषका कुछ कर्तव्य ही नहीं रहा, तब किसलिये उपदेश देते हैं?
इस प्रकार यह मोक्ष मानना मिथ्या है.
तथा वहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम यह तीन प्रमाण कहते हैं। परन्तु उनके सत्य- असत्य का निर्णय जैन के न्यायग्रन्थों से जानना.
तथा इस सांख्यमत में कोई तो ईश्वर को मानते नहीं हैं, कितनेही एक पुरुषको ईश्वरमानते हैं, कितने ही शिव को, कितने ही नारायण को देव मानते हैं. अपनी इच्छानुसार कल्पना करते हैं, कुछ निश्चय नहीं है. तथा इस मत में कितने ही जटा धारण करते हैं, कितने ही चोटी रखते हैं, कितने ही मुण्िडत होते हैं, कितने ही कत्थई वस्त्र पहिनते हैं। इत्यादि अनेक प्रकार से भेष धारण करके तत्त्ववज्ञान के आश्रय से महन्त कहलाते हैं.
इस प्रकार सांख्यमत का निरूपण किया.
शिवमत
तथा शिवमत में दो भेद हैं- नैयायिक, वैशेषिक. नैयायिकमत
वहाँ नैयायिकमत में सोलह तत्त्वव कहते हैं-प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, ¹ष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान.
वहाँ प्रमाण चार प्रकार के कहते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमा. तथा आत्मा, देह, अर्थ, बुद्धि इत्यादि प्रमेय कहते हैं. ‘तथा यह क्तया है?’ उसका नाम संशय है. जिसके अर्थ प्रवृत्ति हो सो प्रयोजन है. जिसे वादी-प्रतिवादी मानें सो ¹ष्टान्त है. ¹ष्टान्त द्वारा जिसे ठहरायें वह सिद्धान्त है. तथा अनुमान के प्रतिज्ञा आदि पाँच अंग वह अवयव हैं. संशय दूर होनेपर किसी विचार से ठीक हो सो तर्क है. पश्चात प्रतीतिरूप जानना सो निर्णय है. आचार्य-शिष्य में पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अभ्यास सो वाद है. जानने की इच्छारूप कथामें जो छल-जाति आदि दूषण हो सो जल्प है. प्रतिपक्ष रहित वाद सो वितंडा है. सच्चे हेतु नहीं हैं ऐसे असिद्ध आदि भेद सहित हेत्वाभास है. छलसहित वचन सो छल है. सच्चे दूषण नहीं हैं ऐसे दूषणाभास सो जाति है. जिससे प्रतिवादी का निग्रह हो सो निग्रह -स्थान है.
इस प्रकार संशयादि तत्त्वव कहे हैं, सो यह कोई वस्तुस्वरूप तत्त्वव तो हैं नहीं. ज्ञानका निर्णय करने को व वाद द्वारा पंाडित्य प्रगट करने को कारणभूत विचाररूप तत्त्वव कहे हैं। सो इनसे परमार्थकार्य क्तया होगा? काम-क्रोधादि भावको मिटाकर निराकुल होना सो कार्य है। वह प्रयोजनतो यहाँ कुछ दिखाया नहीं है, पंडिताई की नाना युक्यिाँ बनायीं, सो यह भी एक चातुर्य है इसलिये यह तत्त्ववभूत नहीं हैं.
फिर कहोगे - इनको जाने बिना प्रयोजनभूत तत्त्ववोंका निर्णय नहीं कर सकते, इसलिये यह तत्त्वव कहें हैं। सो ऐसी परम्परा तो व्याकरणवाले भी कहते हैं कि - व्याकरण पढ़नेसे अर्थका निर्णय होता है, व भोजनादिकके अधिकारी भी कहते हैं कि-भोजन करनेसे शरीर की स्थिरता होनेपर तत्त्ववनिर्णय करने में समर्थ होते हैं। सो ऐसी युक्ति कार्यकारी नहीं हैं.
तथा यदि कहोगे कि - व्याकरण, भोजनादिक तो अवश्य तत्त्ववज्ञान को कारण नहीं हैं, लौकिक कार्य साधनेको कारण हैं। सो जैसे यह हैं उसी प्रकार तुम्हारे कहे तत्त्वव भी लौकिक(कार्य)साधनेको ही कारण होते हैं. जिस प्रकार इन्द्रियादिकके जानने को प्रत्यक्षादि प्रमाण कहा, व स्थाणु-पुरुषादिमें संशयादिकका निरूपण किया. इसलिये जिनको जाननेसे अवश्य काम-क्रोधादि दूर हों, निराकुलता उत्पन्नहो, वे ही तत्त्वव कार्यकारी हैं.
फिर कहोगे कि - प्रमेय तत्त्ववमें आत्मादिकका निर्णय होता है सो कार्यकारी है। सो प्रमेय तो सर्व ही वस्तु है, प्रमितिका विषय नहीं है ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है। इसलिये प्रमेय तत्त्वव किसलिये कहे? आत्मा आदि तत्त्वव कहना थे.
तथा आत्मादिकका भी स्वरूप अन्यथा प्ररूपित किया है ऐसा पक्षपात रहित विचार करने पर भासित होता है. जैसे आत्मा के दो भेद कहते हैं - परमात्मा, जीवात्मा. वहाँ परमात्मा को सर्वका कर्त्ता बतलाते हैं. वहाँ ऐसा अनुमान करते हैं कि - यह जगत कर्त्ता द्वारा उत्पन्न हुआ है, क्तयोंकि यह कार्य है. जो कार्य है वह कर्त्ता द्वारा उत्पन्न है जैसे - घटादिक. परन्तु यह अनुमानाभास है। क्तयोंकि ऐसा अनुमानान्तर संभव है. यह सर्व जगत कर्त्ता द्वारा उत्पन्न नहीं है, क्तयोंकि इसमें अकार्यरूप पदार्थ भी हैं. जो अकार्य हैं सो कर्त्ता द्वारा उत्पन्न नहीं हैं, जैसे - सूर्य बिम्बादिक. क्तयोंकि अनेक पदार्थों के समुदायरूप जगत में कोई पदार्थ कृत्रिम हैं सो मनुष्यादिक द्वारा किये होते हैं, कोई अकृृत्रिम हैं सो उनका कोई कर्त्ता नहीं है. यह प्रत्यक्षादि प्रमाणके अगोचर हैं इसलिये ईश्वरको कर्त्ता मानना मिथ्या है.
तथा जीवात्माको प्रत्येक शरीर भिन्न-भिन्न कहते हैं, सो यह सत्य है। परन्तु मुक्त होनेके पश्चात् भी भिन्नही मानना योग्य है. विशेष तो पहले कहा ही है.
इसी प्रकार अन्य तत्त्ववोंको मिथ्या प्ररूपित करते हैं.
तथा प्रमाणादिकके स्वरूपकी भी अन्यथा कल्पना करते हैं वह जैन ग्रन्थोंसे परीक्षा करने पर भासित होता है.
इस प्रकार नैयायिक मतमें कहे कल्पित तत्त्वव जानना. वैशेषिकमत
तथा वैशेषिकमत में छह तत्त्वव कहे हैं. द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय.
वहाँ द्रव्य नौ प्रकार हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन. वहाँ पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के परमाणु भिन्न-भिन्न हैं। वे परमाणु नित्य हैं। उनसेे कार्यरूप पृथ्वी आदि होते हैं सो अनित्य हैं. परन्तु ऐसा कहना प्रत्यक्षादिसे विरुद्ध है. इरंधनरूप पृथ्वी आदिके परमाणु अग्निरूप होते देखे जाते हैं, अग्नि के परमाणु राखरूप पृथ्वी होते देखे जाते हैं. जलके परमाणु मुक्ताफल(मोती)रूप पृथ्वी होते देखे जाते हैं. फिर यदि तू कहेगा- वे परमाणु चले जाते हैं, दूसरे ही परमाणु उनरूप होते हैं, सो प्रत्यक्षको असत्य ठहराता है. ऐसी कोई प्रबल युक्ति कह तो इसी प्रकार मानें, परन्तु केवल कहनेसे ही ऐसा ठहरता नहीं है. इसलिये सब परमाणुओंकी एक पुद्गलरूप मूर्तिक जाति है, वह पृथ्वी आदि अनेक अवस्थारूप परिणमित होती है.
तथा इन पृथ्वी आदिका कहीं पृथक् शरीर ठहराते हैं, सो मिथ्या ही है। क्तयोंकि उसका कोई प्रमाण नहीं है. और पृथ्वी आदि तो परमाणुपिण्ड हैं। इनका शरीर अन्यत्र, यह अन्यत्र-ऐसा सम्भव नहीं है इसलिये यह मिथ्या है. तथा जहाँ पदार्थ अटके नहीं ऐसी जो पोल उसे आकाश कहते है। क्षण, पल आदिको काल कहते हैं। सो यह दोनों ही अवस्तु हैं, यह सत्तारूप पदार्थ नहीं हैं. पदार्थोंके क्षेत्र-परिणमनादिकका पूर्वापर विचार करनेके अर्थ इनकी कल्पना करते हैंे. तथा दिशा कुछ है ही नहीं। आकाशमें खण्ड कल्पना द्वारा दिशा मानते हैं. तथा आत्मा दो प्रकार से कहते हैं। सो पहले निरूपण किया ही है. तथा मन कोई पृथक् पदार्थ नहीं हैं. भाव मन तो ज्ञानरूप है सो आत्माका स्वरूप है, द्रव्यमन परमाणुओंका पिण्ड है सो शरीर का अंग है. इस प्रकार यह द्रव्य कल्पित जानना.
तथा चौबीस गुण कहते हैं - स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, संख्या, विभाग, संयोग, परिणाम,पृथकत्व,परत्व,अपरत्व,बुद्धि,सुख,दु:ख,इच्छा,धर्म,अधर्म,प्रयत्न, संस्कार, द्वेष, स्नेह, गुरुत्व, द्रव्यत्व. सो इनमें स्पर्शादिक गुण तो परमाणुओं में पाये जाते हैं। परन्तु पृथ्वीको गंन्धवती ही कहना, जलको शीत स्पर्शवान ही कहना इत्यादि मिथ्या है। क्तयोंकि किसी पृथ्वीमें गंधकी मुख्यता भासित नहीं होती, कोई जल उष्ण देखा जाता है- इत्यादि प्रत्यक्षादि से विरुद्ध है. तथा शब्दको आकाश का गुण कहते हैं, सो मिथ्या है। शब्द तो भींत आदिसे रुकता है इसलिये मूर्तिक है, और आकाश अमूर्तिक सर्वव्यापी है. भींतमें आकाश रहे और शब्दगुण प्रवेश न कर सके, यह कैसे बनेगा? तथा संख्यादिक हैं सो वस्तुमें तो कुछ है नहीं, अन्य पदार्थकी अपेक्षा अन्य पदार्थकी हीनाधिकता जाननेको अपने ज्ञानमें संख्यादिककी कल्पना द्वारा विचार करते हैं. तथा बुद्धि आदि हैं सो आत्मा का परिणमन है, वहाँ बुद्धि नाम ज्ञानका है तो आत्माका गुण है ही, और मनका नाम है तो मन तो द्रव्योंमें कहा ही था, यहाँ गुण किसलिये कहा? तथा सुखादिक है सो आत्मामें कदाचित् पाये जाते हैं, आत्माके लक्षणभूत तो यह गुण हैं नहीं, अव्याप्तपनेसे लक्षणाभास है. तथा स्निग्धादि पुद्गलपरमाणुमें पाये जाते हैं, सो स्निग्ध गुरुत्व इत्यादि तो स्पर्शन इन्द्रिय द्वारा जाने जाते हैं, इसलिये स्पर्शगुणमें गर्भित हुए, अलग किसलिये कहे? तथा द्रव्यत्व गुण जलमें कहा, सो ऐसे तो अग्नि आदिमें ऊध्र्वगमनत्वादि पाये जाते हैं. या तो सर्व कहना थे या सामान्यमें गर्भित करना थे. इस प्रकार यह गुण कहे वे भी कल्पित हैं.
तथा कर्म पाँच प्रकारके कहते हैं - उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, यमन। सो यह तो शरीर की चेष्टाएँ हैं। इनको अलग कहनेका अर्थ क्तया? तथा इतनी ही चेष्टाएँ तो होती नहीं हैं, चेष्टाएँ तो बहुत ही प्रकारकी होती हैं. तथा इनको अलग ही तत्त्वव संज्ञा कही। सो या तो अलग पदार्थ हों तो उन्हें अलग तत्त्वव कहना था, या काम-क्रोधादि मिटानेमें विशेष प्रयोजनभूत हों तो तत्त्वव कहना था। सो दोनो ही नहीं है. और ऐसे ही कह देना हो तो पाषाणादिककी अनेक अवस्थाएँ होती हैं सो कहा करो, कुछ साध्य नहीं हैं.
तथा सामान्य दो प्रकारसे है - पर और अपर. वहाँ पर तो सत्तारूप है, अपर द्रव्यत्वादिरूप है. तथा जिनकी नित्य द्रव्यमें प्रवृत्ति हो वे विशेष हैं। अयुतसिद्ध सम्बन्धका नाम समवाय है. यह सामान्यादिक तो बहुतोंको एक प्रकार द्वारा व एक वस्तुमें भेदकल्पना द्वारा व भेदकल्पना अपेक्षा सम्बन्ध माननेसे अपने विचारहीमें होते हैं, कोई अलग पदार्थ तो हंै नहीं. तथा इनके जाननेसे काम-क्रोधादिमिटानेरूप विशेष प्रयोजनकी भी सिद्धि नहीं है, इसलिये इनको तत्त्वव किसलिये कहा? और ऐसे ही तत्त्वव कहना थे तो प्रमेयत्वादि वस्तुके अनन्त धर्म हैं व संम्बन्ध, आधारादिक कारकोंके अनेक प्रकार वस्तुमें सम्भवित हैं, इसलिये या तो सर्व कहना थे या प्रयोजन जानकर कहना थे. इसलिये यह सामान्यादि तत्त्वव भी वृथा ही कहे हैं.
इस प्रकार वैशेषिकों द्वारा कहे तत्त्वव कल्पित जानना.
तथा वैशेषिक दो ही प्रमाण मानते हैं - प्रत्यक्ष और अनुमान. सो इनके सत्य- असत्यका निर्णय जैन न्याय ग्रन्थोंसेजानना.
तथा नैयायिक तो कहते हैं - विषय, इन्द्रिय, बुद्धि, शरीर, सुख, दु:खोंके अभावसे आत्माकी स्थिति सो मुक्ति है. और वैशेषिक कहते हैं - चौबीस गुणोंमें बुद्धि आदि नौ गुणोंका अभाव सो मुक्ति है. यहाँ बुद्धिका अभाव कहा, सो बुद्धि नाम ज्ञानका है और ज्ञानका अधिकरणपना आत्माका लक्षण कहा था। अब ज्ञानका अभाव होनेपर लक्षणका अभाव होनेसे लक्ष्यका भी अभाव होगा, तब आत्माकी स्थिति किस प्रकार रही? और यदि बुद्धि नाम मनका है तो भावमन तो ज्ञानरूप है ही और द्रव्यमन शरीररूप है सो मुक्त होनेपर द्रव्यमनका सम्बन्ध छूटता ही है, तो जड़ द्रव्य मन का नाम बुद्धि कैसे होगा? तथा मनवत् ही इन्द्रियाँ जानना. तथा विषयका अभाव हो, तो स्पर्शादि विषयोंका जानना मिटता है, तब ज्ञान किसका नाम ठहरेगा? और उन विषयोंका अभाव होगा तो लोकका अभाव होगा. तथा सुखका अभाव कहा, सो सुखहीके अर्थ उपाय करते हैं। उसका जब अभाव होगा, तब उपादेय कैसे होगा? तथा यदि वहाँ आकुलतामय इन्द्रियजनित सुखका अभाव हुआ कहें तो यह सत्य है। क्तयोंकि निराकुलता लक्षण अतीन्द्रिय सुख तो वहाँ सम्पूर्ण सम्भव है, इसलिये सुखका अभाव नहीं है. तथा शरीर दु:ख, द्वेषादिकका वहाँ अभाव कहते हैं सो सत्य है.
तथा शिवमतमें कर्त्ता निर्गुणईश्वर शिव है, उसे देव मानते हैं। सो उसके स्वरूपका अन्यथापना पूर्वोक्त प्रकारसे जानना. तथा यहाँ भस्म, कोपीन, जटा, जनेऊ इत्यादि चिîों सहित भेष होते हैं सो आचारादि भेदसे चार प्रकार हैं:- शैव, पाशुपत, महाव्रती, कालमुख. सो यह रागादि सहित हैं इसलिये सुलिंग नहीं हैं.
इसप्रकार शिवमतका निरूपण किया.
मिमांसकमत
अब मीमांसकमतका स्वरूप कहते हैं. मीमांसक दो प्रकारके हैं:- ब्रह्मवादी और कर्मवादी.
वहाँ ब्रह्मवादी तो ‘यह सर्व ब्रह्म है, दूसरा कोई नहीं है’ ऐसा वेदान्त में अद्वैत ब्रह्मको निरूपित करते हैं। तथा ‘आत्मामेें लय होना सो मुक्ति’ कहते हैं. इनका मिथ्यापना पहले दिखाया है सो विचारना.
तथा कर्मवादी क्रिया, आचार, यज्ञादिक कार्योंका कर्त्तव्यपना प्ररूपित करते हैं सो इन क्रियाओं में रागादिकका सद्भाव पाया जाता है, इसलिये यह कार्य कुछभी कार्यकारी नहीं हैं.
तथा वहाँ ‘भट्ट’ और ‘प्रभाकर’ द्वारा की हुई दो पद्धतियाँ हैं. वहाँ भट्ट तो छह प्रमाण मानते हैं - प्रत्यक्ष, अनुमान, वेद, उपमा, अर्थापत्ति, अभाव. तथा प्रभाकर अभाव बिना पाँच ही प्रमाण मानते हैं, सो इनका सत्यासत्यपना जैन शास्त्रोंसे जानना.
तथा वहाँ षट्कर्म सहित ब्रह्मसुत्रके धारक, शूद्रके अन्नादिकके त्यागी, गृहस्थाश्रम है नाम जिनका ऐसे भट्ट हैं. तथा वेदान्तमें यज्ञोपवीत रहित, विप्रअन्नादिकके ग्राही, भगवत् है नाम जिनका वे चार प्रकारके हैं - कुटीचर, बहूदक, हंस, परमहंस. सो यह कुछ त्यागसे सन्तुष्ट हुए हैं, परन्तु ज्ञान-श्रद्धानका मिथ्यापना और रागादिकका सद्भाव इनके पाया जाता है। इसलिये यह भेष कार्यकारी नहीं हैं.
जैमिनीयमत
तथा यही जैमिनीयमत है। सो इस प्रकार कहते हैं:-
सर्वज्ञदेव कोई है नहीं। नित्य वेदवचन हैं उनसे यथार्थ निर्णय होता है. इसलिये पहले वेदपाठ द्वारा क्रिया में प्रवर्तना वह तो नोदना(प्रेरणा)। वही है लक्षण जिसका ऐसे धर्मका साधन करना. जैसे कहते हैं कि - ‘स्व: कामोऽग्निं यजेत्’ स्वर्गाभिलाषी अग्निको पूजे। इत्यादि निरूपण करते हैं.
यहाँ पूछते हैं - शैव, सांख्य, नैयायिकादि सभी वेदको मानते हैं, तुम भी मानते हो। तुम्हारे व उन सबके तत्त्ववादि निरूपणमें परस्पर विरुद्धता पायी जाती है सो क्तया कारण है? यदि वेदहीमें कहीं कुछ, कहीं कुछ निरूपण किया है, तो उसकी प्रमाणता कैसे रही? और यदि मतवाले ही कहीं कुछ, कहीं कुछ निरूपण करते हैं तो तुम परस्पर झगड़-निर्णय करके एकको वेदका अनुसारी अन्यको वेदसे परा¢्मुख ठहरओ. सो हमें तो यह भासित होताहै-वेदहीमेंपूर्वापरविरुद्धतासहितनिरूपणहै.इसलियेउसकाअपनी-अपनी इच्छानुसार अर्थ ग्रहण करके अलग-अलग मतोंके अधिकारी हुए हैं. परन्तु ऐसे वेदको प्रमाण कैसे करें? तथा अग्नि पूजनेसे स्वर्ग होता है, सो अग्निको मनुष्यसे उत्तम कैसे मानें? प्रत्यक्ष विरुद्ध है. तथा वह स्वर्गदाता कैसे होगी? इसी प्रकार अन्य वेदवचन प्रमाणविरुद्ध हैं. तथा वेदमें ब्रह्मा कहा है, तो सर्वज्ञ क्तयों नहीं मानते? इत्यादि प्रकारसे जैमिनीयमत कल्पित जानना.
बौद्धमत
अब बौद्धमत का स्वरूप कहते हैं:-
ब्ौद्धमतमें चार आर्यसत्यप्ररूपित करते हैं-दु:ख, आयतन, समुदाय, मार्ग. १दुु:खमायतनं चैव तत: समुदायो मत:. वहाँ संसारीके स्कन्धरूप वह दु:ख है. वह पाँच प्रकारका है-विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार, रूप.
वहाँ रूपादिकका जानना सो विज्ञान है। सुख-दु:खका अनुभवन करना सो वेदना है। सोते का जागना सो संज्ञा है। पढ़ा था उसे याद करना सो संस्कार है। रूपका धारण सो रूपहै. यहाँ विज्ञानादिकको दु:ख कहा सो मिथ्या है। दु:ख तो काम-क्रोधादिक हैं, ज्ञान दु:ख नहीं है. यह तो प्रत्यक्ष देखते हैं कि किसीके ज्ञान थोड़ा है और क्रोध-लोभादिक बहुत हैं सो दु:खी हैं। किसीके ज्ञान बहुत है काम-क्रोधादि अल्प है व नहीं हैं सो सुखी है. इसलिये विज्ञानादिक दु:ख नहीं है.
तथा आयतन बारह कहे हैं - पाँच इन्द्रियाँ और उनके शब्दादिक पाँच विषय, एक मन और एक धर्मायतन. सो यह आयतन किस अर्थ कहे हैं? सबको क्षणिक कहते हैं, तो इनका क्तया प्रयोजन है?
तथा जिससे रागादिकके गण उत्पन्न होते हैं ऐसा आत्मा और आत्मीय है नाम जिसका सो समुदाय है. वहाँ अहंरूप आत्मा और ममरूप आत्मीय जानना, परन्तु क्षणिक माननेसे इनको भी कहनेका कुछ प्रयोजन नहीं है.
तथा सर्व संस्कार क्षणिक हैं, ऐसी वासना सो मार्ग है. परन्तु बहुत काल स्थायी कितनी ही वस्तुएँ प्रत्यक्ष देखी जातीं हैं. तू कहेगा - एक अवस्था नहीं रहती। सो यह हम भी मानते हैं. सूक्ष्म पर्याय क्षणस्थायी है. तथा उसी वस्तुका नाश मानते हैं। परन्तु यह तो होता दिखाई नहीं देता, हम कैसे माने? तथा बाल-वृद्धादि अवस्थामें एक आत्माका अस्तित्व भासित होता है। यदि एक नहीं है तो पूर्व-उत्तर कार्यका एक कर्त्ता कैसे मानते हैं? यदि तू कहेगा-संस्कारसे है, तो संस्कार किसके हैं? जिसके हैं वह नित्य है या क्षणिक है? नित्य है तो सर्व क्षणिक कैसे कहते हैं? क्षणिक है तो जिसका आधार ही क्षणिक है उस संस्कारकी परम्परा कैसे कहते हैं? तथा सर्वक्षणिक हुआ तब आप भी क्षणिक हुआ. तू ऐसी वासनाको मार्ग कहता है, परन्तु इस मार्गके फलको आप तो प्राप्त करता ही नहीं है, किसलिये इस मार्ग में प्रवर्तता है? तथा तेरे मतमें निरर्थक शास्त्र किसलिये बनाये? उपदेश तो कुछ कर्त्तव्य द्वारा फल प्राप्त करनेके अर्थदिया जाता है. इस प्रकार यह मार्ग मिथ्या है.
तथा रागादिक ज्ञान संतान वासनाका उच्छेद अर्थात निरोध उसे मोक्ष कहते हैं. परन्तु क्षणिक हुआ तब मोक्ष किसको कहता है? और रागादिकका अभाव होना तो हम भी मानते हैं। परन्तु ज्ञानादिक अपने स्वरूपका अभाव होनेपर तो अपना अभाव होगा, उसका उपाय करना कैसे हितकारी होगा? हिताहितका विचार करनेवाला तो ज्ञानही है। सो अपने अभावको ज्ञानी हित कैसे मानेगा?
तथा बौद्धमतमें दो प्रमाण मानते हैं- प्रत्यक्ष और अनुमान. इसके सत्यासत्यका निरूपण जैन शास्त्रोंसे जानना. तथा यदि ये दो ही प्रमाण हैं तो इनके शास्त्र अप्रमाण हुए, उनका निरूपण किस अर्थ किया? प्रत्यक्ष-अनुमान तो जीव आप ही कर लेंगे, तुमने शाास्त्र किसलिये बनाये?
तथा वहाँ सुगतको देव मानते हैं और उसका स्वरूप नग्न व विक्रियारूप स्थापित करते हैं सो विडम्बना रूप है. तथा कमण्डल और रक्ताम्बरके धारी, पूर्वाîमें भोजन करनेवाले इत्यादि लिंगरूप बौद्धमतके भिक्षुक हैं। सो क्षणिकको भेष धारण करनेका क्तया प्रयोजन? परन्तु महंतता के अर्थ कल्पित निरूपण करना और भेष धारण करना होता है.
इस प्रकार बौद्धों के चार प्रकार हैं - वैभाषिक, स्ौत्रांतिक, योगाचार, माध्यमिक. वहाँ वैभाषिक तो ज्ञान सहित पदार्थको मानते हैं। स्ौत्रांतिक प्रत्यक्ष यह दिखाई देता है, यही हैइससे परे कुछ नहीं है ऐसा मानते हैं. योगाचारोंके आचार सहित बुद्धि पायी जाती है। तथा माध्यमिक हैं वे पदार्थके आश्रय बिना ज्ञानहीको मानते हैं. वे अपनी-अपनी कल्पना करते हैं। परन्तु विचार करनेपर कुछ ठिकानेकी बात नहीं है.
इस प्रकार बौद्धमतका निरूपण किया.
चाार्वाकमत
अब चाार्वाकमत का स्वरूप कहते हैं:-
कोई सर्वज्ञदेव, धर्म, अधर्म, मोक्ष है नहीं, पुण्य-पापका फल है नहीं, परलोक है नहीं। यह इन्द्रियगोचर जितना है वह लोक है - ऐसा चार्वाक कहता है.
सो वहाँ उससे पूछते हैं- सर्वज्ञदेव इस काल-क्षेत्र में नहीं हैं या सर्वदा सर्वत्र नहीं हैं? इस काल-क्षेत्र में तो हम भी नहीं मानते हैं, परन्तु सर्व काल-क्षेत्र में नहीं हैं ऐसा जानना सर्वज्ञ के बिना किसके हुआ? जो सर्व क्षेत्र-कालकी जाने वही सर्वज्ञ और नहीं जानता तो निषेध कैसे करता है?
तथा धर्म-अधर्म लोक में प्रसिद्ध हैं. यदि वे कल्पित हों तो सर्वजन-सुप्रसिद्ध कैसे होते? तथा धर्म-अधर्मरूप परिणति होती देखी जाती है, उससे वर्त्तमानहीमें सुखी-दु:खी होते हैं। इन्हें कैसे न माने? और मोक्षका होना अनुमानमें आता है. क्रोधादिक दोष किसीके हीन हैं, किसीके अधिक हैं। तो मालुम होता है किसीके इनकी नास्ति भी होती होगी. और ज्ञानादि गुण किसीके हीन, किसीके अधिक भासित होते हैं। इसलिये मालुम होता है किसीके सम्पूर्ण भी होते होंगे. इसप्रकार जिसके समस्त दोषकी हानी, गुणोंकी प्राप्ति हो। वही मोक्ष अवस्था है.
तथा पुण्य-पापका फल भी देखते हैं. कोई उद्यम करने पर भी दरिद्री रहता है, किसीके स्वयमेव लक्ष्मी होती है। कोई शरीरका यत्न करने पर भी रोगी रहता है, किसीके बिना ही यत्न निरोगता रहती है - इत्यादि प्रत्यक्ष देखा जाता है। सो इसका कारण कोई तो होगा? जो इसका कारण वही पुण्य-पाप है.
तथा परलोक भी प्रत्यक्ष-अनुमानसे भासित होता है. व्यंतरादि हैं वे ऐसा कहते देखे जाते हैं - ‘मैं अमुक था सो देव हुआ हँू .’ तथा तू कहेगा -—यह तो पवन है। सो हम तो ‘मैं हँू ’ इत्यादि चेतनाभाव जिसके आश्रयसे पाये जाते हैं उसीको आत्मा कहते हैं, तू उसका नाम पवन कहता है. परन्तु पवन तो भीत आदिसे अटकती है, आत्मा मुँदा(बन्द) होने पर भी अटकता नहीं है। इसलिये पवन कैसे माने?
तथा जितना इन्द्रियगोचर है उतना ही लोक कहता है। परन्तु तेरे इन्द्रियगोचर तो थोड़े से भी योजन दूरवर्ती क्षेत्र और थोड़ासा अतीत-अनागत काल - ऐसे क्षेत्र-कालवर्ती भी पदार्थ नहीं हो सकते, और दूर देशकी व बहुत कालकी बातें परम्परासे सुनते ही हैं। इसलिये सबका जानना तेरे नहीं है, तू इतना ही लोक किस प्रकार कहता है?
तथा चार्वाकमतमें कहते हैं कि - पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश मिलनेसे चेतना हो आती है. सो मरने पर पृथ्वी आदि यहाँ रहे, चेतनावान पदार्थ गया सो व्यंतरादि हुआ। जो प्रत्यक्ष भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं. तथा एक शरीरमें पृथ्वी आदि तो भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, चेतना एक भासित होती है. यदि पृथ्वी आदिके आधारसे चेतना हो तो हाड़, रक्त उच्छ्वासादिकके अलग-अलग चेतना होगी. तथा हाथ आदिको काटनेपर जिस प्रकार उसके साथ वर्णादिक रहते हैं, उसी प्रकार चेतना भी रहेगी. तथा अहंकार, बुद्धितो चेतनाके हैं, सो पृथ्वी आदिरूप शरीर तो यहाँ ही रहा, तब व्यंतरादि पर्यायमें पूर्वपर्यायका अहंपना देखा जाता है सो किस प्रकार होता है? तथा पूर्वपर्यायके गुप्त समाचार प्रगट करते हैं सो यह जानना किसके साथ गया? जिसके साथ जानना गया वही आत्मा है.
तथाचार्वाकमतमेंखाना,पीना,भोग-विलासकरनाइत्यादिस्वच्छंन्दवृत्तिका उपदेश है। परन्तु ऐसे तो जगत स्वयमेव ही प्रवर्तता है. वहाँ शास्त्रादि बनाकर क्तया भला होनेका उपदेश दिया? तू कहेगा - तपश्चरण, शील, संयमादि छुड़ानेके अर्थ उपदेश दिया। तो इन कार्योंमें तो कषाय घटनेसे आकुलता घटती है, इसलिये यहीं सुखी होना होता है, तथा यश आदि होता है। तू इनको छुड़ाकर क्तया भला करता है? विषयासक्त जीवोंको सुहाती बातें कहकर अपना व औरोंका बुरा करनेका भय नहीं है। स्वच्छंन्द होकर विषय सेवनके अर्थ ऐसी झूठी युक्ति बनाता है.
इस प्रकार चार्वाकमतका निरूपण किया.

अन्यमत निराकरण उपसंहार

इसी प्रकार अन्य अनेक मत हैं वे झूठी कल्पित युक्ति बनाकर विषय-कषायासक्त पापी जीवों द्वारा प्रगट किये गये हैं। उनके श्रद्धानादिक द्वारा जीवोंका बुरा होता है. तथा एक जिनमत है सो ही सत्यार्थका प्ररूपक है, सर्वज्ञ वीतरागदेव द्वारा भाषित है। उसके श्रद्धानादिकसे ही जीवोंका भला होता है.
ऐसे जिनमतमें जीवादि तत्त्ववोंका निरूपण किया है। प्रत्यक्ष-परोक्ष दो प्रमाण कहे हैं। सर्वज्ञवीतराग अर्हंतदेव हैं। बाह्य-अभ्यंतर परिग्रहरहित निर्गं्रथ गुरु हैं. इनका वर्णन इस ग्रंथ में आगे विशेष लिखेंगे सो जानना.
यहाँ कोई कहे - तुम्हारे राग-द्वेष है, इसलिये तुम अन्यमतकानिषेध करके अपने मतको स्थापित करते हो.
उससे कहते हैं - यथार्थ वस्तुका प्ररूपण करनेमें राग-द्वेष नहीं है. कुछ अपना प्रयोजन विचारकर अन्यथा प्ररूपण करें तो राग-द्वेष नाम पाये.
फिर वह कहता है - यदि राग-द्वेष नहीं है तो अन्यमत बुरे और जैनमत भला ऐसा किस प्रकार कहते हो? साम्यभाव हो तो सबको समान जानो, मतपक्ष किसलिये करते हो?
उससे कहते हैं - बुरेको बुरा कहते हैं, भलेको भला कहते हैं। इसमें राग-द्वेष क्तया किया? तथा बुरे-भलेको समान जानना तो अज्ञान भाव है। साम्यभाव नहीं है.
फिर वह कहता है कि - सर्व मतोंका प्रयोजन तो एक ही है, इसलिये सबको समान जानना?
उससे कहते हैं - यदि प्रयोजन एक हो तो नाना मत किसलिये कहें? एकमतमें तो एक प्रयोजनसहित अनेक प्रकार व्याख्यान होता है, उसे अलग मत कौन कहता है? परन्तु प्रयोजन ही भिन्न-भिन्न हैं सो बतलाते हैं :-

अन्यमतोंसे जैनमतकी तुलना

जैनमतमेंएकवीतरागभावकेपोषणकाप्रयोजनहै।सोकथाओंमें,लोकादिकके निरूपणमें, आचरणमें, व तत्त्ववोंमें जहाँ-तहाँ वीतरागताकी ही पुष्िट की है. तथा अन्यमतों में सरागभावके पोषणका प्रयोजन है।क्तयोंकि कल्पित रचना कषायी जीव ही करते हैं और अनेक युक्यिाँ बनाकर कषायभावही का पोषण करते हैं. जैसे - अद्वैत ब्रह्मवादी सर्वको ब्रह्म मानने द्वारा, सांख्यमती सर्व कार्य प्रकृतिका मानकर अपनेको शुद्ध अकर्त्ता मानने द्वारा, और शिवमती तत्त्वव जाननेहीसे सिद्धि होना मानने द्वारा, मीमांसक कषायजनित आचरणको धर्ममाननेद्वारा,बौद्धक्षणिकमाननेद्वारा,चार्वाकपरलोकादिनमाननेद्वारा- विषयभोगादिरूप कषायकार्योंमें स्वच्छंन्द होनेका ही पोषण करते हैं. यद्यपि किसी स्थानपर कोई कषाय घटानेका भी निरूपण करते हैं। तो उस छलसे अन्य किसी कषायका पोषण करतेहैं.जिसप्रकार-गृहकार्यछोड़करपरमेश्वरकाभजनकरनाठहरायाऔर परमेश्वरका स्वरूप सरागी ठहराकर उनके आश्रयसे अपने विषय-कषायका पोषण करते हैं। तथा जैनधर्ममें देव-गुरु-धर्मादिकका स्वरूप वीतराग ही निरूपण करके केवल वीतरागताही का पोषण करते हैं - सो यह प्रगट है.
हम क्तया कहें? अन्यमती भर्तृहरिने भी वैराग्य प्रकरणमेंऐसा कहा है :-
एकोरागिषु राजते प्रियतमादेहार्द्धधारी हरो,
नीरागेषु जिनो विमुक्तललनासùो न यस्मात्पर: .
दुर्वारस्मरवाणपन्नगविषव्यासक्तमुग्धो जन:,
शेष: कामविडंबितो हि विषयान्भोक्ततुं न मोक्ततुं क्षम: ॥१॥
इसमें सरागियोंमें महादेवको प्रधान कहा और वीतरागियोंमें जिनदेवको प्रधान कहा है. तथा सरागभाव और वीतरागभावों में परस्पर प्रतिपक्षीपना है. यह दोनो भले नहीं हैं। परन्तु इनमें एक ही हितकारी है और वह वीतरागभाव ही है। जिसके होनेसे तत्काल आकुलता मिटनेसे स्तुति योग्य होता है. जिससे आगामी भला होना केवल हमही नहीं कहते, किन्तु सभी मतवाले कहते हैं. सरागभाव होनेपर तत्काल आकुलता होती है, निंदनीक होता है, और आगामी बुरा होना भासित होता है. इसलिये जिसमें वीतरागभावका प्रयोजन है ऐसा जैनमत ही इष्ट हंै. जिनमें सरागभावके प्रयोजन प्रगट किये हैं ऐसे अन्यमत अनिष्ट हैं इन्हें समान कैसे माने?
तथा वह कहते हैं कि- यह तो सच है। परन्तु अन्यमतकीनिन्दा करनेसे अन्यमती दु:खी होंगे विरोध उत्पन्न होगा। इसलिये निन्दा किसलिये करें?
वहाँ कहते हैं कि - हम कषायसे निन्दा करें व औरोंको दु:ख उपजायें तो हम पापी ही हैं। परन्तुअन्यमतके श्रद्धानादिसे जीवोंके अतत्त्ववश्रद्धान £ढ़ हो, जिससे संसारमें जीव दु:खी होंगे, इसलिये करुणाभावसे यथार्थ निरूपण किया है. कोई बिना दोष दु:ख पाता हो, विरोध उत्पन्न करे तो हम क्तया करें? जैसे - मदिराकी निन्दा करनेसे कलाल दु:खी हो, कुशीलकी निन्दा करनेसे वेश्यादिक दु:ख पायें, और खोटा-खरा पहिचाननेकी परीक्षा बतलानेसे ठग दु:खी हो तो क्तया करें? इसी प्रकार यदि पापियोंके भयसे धर्मोंपदेश न दें तो जीवोंका भला कैसे होगा? ऐसा तो कोई उपदेश है नहीं जिससे सभी चैन पायें? तथा वे विरोध उत्पन्न करते हैं। सो विरोध तो परस्पर करें तो होता है। परन्तु हम लड़ेंगे नहीं, वे आप ही उपशान्त हो जायेंगे. हमें तो अपने परिणामों का फल होगा .
तथाकोईकहे-प्रयोजनभूतजीवादिकतत्त्ववोंकाअन्यथाश्रद्धानकरनेसे मिथ्यादर्शनादिक होते हैं, अन्यमतोंका श्रद्धान करनेसे किस प्रकार मिथ्यादर्शनादिक होंगे?
समाधान - अन्यमतोंमें विपरीत युक्ति बनाकर, जीवादिक तत्त्ववोंका स्वरूप यथार्थ भासित न हो यही उपाय किया है। सो किसलिये किया है? जीवादि तत्त्ववोंका यथार्थ स्वरूप भासित हो तो वीतरागभाव होनेपर ही महंतपना भासित हो। परन्तु जो जीव वीतरागी नहीं हैं और अपनी महंतता चाहते हैं, उन्होंने सरागभाव होनेपर भी महंतता मनाने के अर्थ कल्पित युक्ति द्वारा अन्यथा निरूपण किया है. वे अद्वैतब्रह्मादिकके निरूपण द्वारा जीव- अजीवकेऔरस्वच्छन्दवृत्तिकेपोषणद्वाराआस्रव-संवरादिककेऔरसकषायीवत्व अचेतनवत्मोक्षकहनेद्वारामोक्षकेअयथार्थश्रद्धानकापोषणकरतेहैं।इसलिये अन्यमतोंका अन्यथापना प्रगट किया है. इनका अन्यथापना भासित हो तो तत्त्ववश्रद्धानमें रुचिवान हो, और उनकी युक्तिसे भ्रम उत्पन्न न हो.
इस प्रकार अन्यमतोंका निरूपण किया. अन्यमतके ग्रन्थोद्धरणोंसे जैनधर्म की समीचीनता और प्राचीनता
अब अनयमतोंके शास्त्रोंकी ही साक्षीसे जिनमतकी समीचीनता व प्राचीनता प्रगट करते हैं :-
—बड़ा योगवासिष्ठछत्तीस हजार श्लोक प्रमाण है, उसके प्रथम वैराग्य प्रकरणमें अहंकारनिषेध अध्यायमें वसिष्ठ और रामके संवादमें ऐसा कहा है :-
रामोवाच-नांहं रामो न मे वांछा भावेषु च न मे मन:.
शाांतिमास्थातुमिच्छामिस्वात्मन्येवजिनोयथा॥१॥
इसमेंरामजीनेजिनसमानहोनेकीइच्छाकी,इसलियेरामजीसेजिनदेवका उत्तमपना प्रगट हुआ और प्राचीनपना प्रगट हुआ.
तथा—दक्षिणामूर्ति-स्हस्त्रनाममें कहा है :-
शिवोवाच - जैनमार्गरतो जैन जिन क्रोधो जितामय:.
यहाँ भगवत् का नाम जैनमार्गमें रत और जैन कहा, सो इसमें जैनमार्गकी प्रधानता व प्राचीनता प्रगट हुई.
तथा—वैशम्पायनसहस्त्रनाममें कहा है :-
कालनेमिर्महावीर: शूर: शौरिजिनेश्वर: .
यहाँ भगवानका नाम जिनेश्वर कहा, इसलिये जिनेश्वर भगवान हैं.
तथा दुर्वासाऋषिकृत—महिम्निस्तोत्रमें ऐसा कहा है :-
तत्तदर्शनमुख्यशक्तिरिति च त्वं ब्रह्मकर्मेंश्वरी .
कर्त्तार्हन् पुरुषो हरिश्च सविता बुद्ध: शिवत्स्वं गुरु: ॥१॥
यहाँ-—अरहंततुमहोइसप्रकारभगवंतकीस्तुतिकी,इसलियेअरहंतके भगवानपना प्रगट हुआ.
तथा—हनुमन्नाटकमें ऐसा कहा है :-
यं शैवा: समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिन:
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटव: कर्त्तेति नैयायिका:.
अर्हन्नित्यथ जैनशासनरत: कर्मेति मीमांसका: .
सोऽयं वो विदधातु वांछितफलं त्रेलोक्तयनाथ: प्रभु॥१॥
यहाँ छहों मतोंमें एक ईश्वर कहा वहाँ अरहंतदेवके भी ईश्वरपना प्रगट किया.
यहाँ कोई कहे - जिस प्रकार यहाँ सर्व मतोंमें एक ईश्वर कहा, उसी प्रकार तुम भी मानो.
उससे कहते हैं- तुमने यह कहा है, हमने तो नहीं कहा। इसलिये तुम्हारे मतमें अरहंतके ईश्वरपना सिद्ध हुआ. हमारे मतमें भी इसी प्रकार कहें तो हम भी शिवादिकको ईश्वर मानें. जैसे कोई व्यापारी सच्चे रत्न दिखाये, कोई झूठे रत्नदिखाये। वहाँ झूठे रत्नोंवालातो रत्नोंका समान मुल्य लेनेके अर्थ समान कहता है, सच्चे रत्नवाला कैसे समान माने? उसी प्रकार जैनी सच्चे देवादिका निरूपण करता है, अन्यमती झूठे निरूपित करता है। वहाँ अन्यमती अपनी समान महिमाके अर्थ सर्वको समान कहता है, परन्तु जैनी कैसे माने?
तथा—रुद्रयामलतंत्रमें भवानी सहस्त्रनाममें ऐसा कहा है :-
कुण्डासना जगद्धात्री बुद्धमाता जिनेश्वरी .
जिनमाता जिनेन्द्रा च शारदा हंसवाहिनी॥१॥
यहाँ भवानीके नाम जिनेश्वरी इत्यादि कहे, इसलिये जिनका उत्तमपना प्रगट किया.
तथा—गणेशपुराणमें ऐसा कहा है-—जैनं पशुपतं सांख्यं.
तथा—व्यासकृतसूत्रमें ऐसा कहा है :-
जैना एकस्मिन्नेव वस्तुनि उभयं प्ररूपयन्ति स्याद्वादिन:.
इत्यादि उनके शाास्त्रोंमें जैन निरूपण है, इसलिये जैनमतका प्राचीनपना भासित होता है.
तथा—भागवतके पंचमस्कन्धमें ऋषभावतारका वर्णनहै. वहाँ उन्हें करुणामय तृष्णादि रहित, ध्यानमुद्राधारी, सर्वाश्रम द्वारा पूजित कहा है। उनके अनुसार अर्हत राजाने प्रवृत्ति की ऐसा कहते हैं. सो जिस प्रकार राम-कृष्णादि अवतारोंके अनुसार अन्यमत हैं. उसी प्रकार ऋषभावतारके अनुसार जैनमत है। इस प्रकार तुम्हारे मत ही द्वारा जैनमत प्रमाण हुआ.
यहाँ इतना विचार और करना चाहिये - कृष्णादि अवतारों के अनुसार विषय- कषायों की प्रवृत्ति होती है। ऋषभावतारके अनुसार वीतराग साम्यभावकी प्रवृत्ति होती है. यहाँ दोनो प्रवृत्तियोंको समान मानने से धर्म-अधर्मका विशेष नहीं रहेगा और विशेष माननेसे जो भली हो वो अंगीकार करना .
तथा—दशावतार चरित्रमें-—बद्धवापद्मासनं यो नयनयुगमिदं न्यस्य नासाग्रदेशे इत्यादि बुद्धावतारका स्वरूप अरहंतदेव समान लिखा है। सो ऐसा स्वरूप पूज्य है तो अरहंतदेव पूज्य सहज ही हुए.
तथा—काशीखंडमें देवदास राजाको सम्बोधकर राज्य छुडा़या। वहाँ नारायण तो विनयकीर्ति यति हुआ, लक्ष्मीको विनयश्री आर्यिकाकी, गरुड़को श्रावक किया - ऐसा कथन है . सो जहाँ सम्बोधन करना हुआ वहाँ जैनी भेष बनाया। इसलिए जैन हितकारी प्राचीन प्रतिभासित होते हैं.
तथा—प्रभास पुराणमें ऐसा कहा है :-
भवस्य पश्चिमे भागे वामनेन तप: कृतम्.
तेनैव तपसाकृष्ट: शिव:प्रत्यक्षतां गत: ॥१॥
पद्मासनमासीन:श्याममूर्तिर्दिगम्बर: .
नेमिनाथ: शिवेत्येवं नाम चक्रेअस्य वामन:॥२॥
कलिकाले महाघोरेसर्वपापप्रणाशक: .
दर्शनात्स्पर्शनादेवकोटियज्ञफलप्रद: ॥३॥
यहाँ वामन को पद्मासन दिगम्बर नेमिनाथका दर्शन हुआ कहा है। उसीका नाम शिव कहा है. तथा उसके दर्शनादिकसे कोटियज्ञका फल कहा है सो ऐसा नेमिनाथका स्वरूप तो जैनी प्रत्यक्ष मानते हैं। सो प्रमाण ठहरा.
तथा—प्रभास पुराणमें कहा है :-
रैवताद्रौजिनोनेमिर्युगादिर्विमलाचले .
ऋषीणामाश्रमादेव मुक्तिमार्गस्यकारणम् ॥१॥
यहाँ नेमिनाथको जिनसंज्ञा कही, उनके स्थानको ऋषिका आश्रम मुक्तिका कारण कहा और युगादिके स्थानको भी ऐसा ही कहा। इसलिये उत्तम पूज्य ठहरे.
तथा—नगर पुराणमें भवावतार रहस्यमें ऐसा कहा है :-
अकारादिहकारन्तमूर्द्धाधोरेफसंयुतम्.
नाादविन्दुककलाक्रान्तंचन्द्रमंडलसन्निभम् ॥१॥
एत¶ेवि परं तत्त्ववंयोविजनातितत्त्ववत: .
संसारबन्धनं छित्वा स गच्छेत्परमां गतिम् ॥२॥
यहाँ ‘अर्हं’ ऐसे पदको परमतत्त्वव कहा है. उसके जाननेसे परमगतिकी प्राप्ति कही । सो ‘अर्हं’ पद जैनमत उक्त है.
तथा—नगर पुराणमें कहा है :-
दशभिर्भोजितैर्विप्रै यत्फलं जायते कृते.
मुनेरर्हत्सुभक्तस्य तत्फलं जायते कलौ॥१॥
यहाँ कृतयुगमें दस ब्राह्मणोंको भोजन करानेका जितना फल कहा, उतना फल कलियुगमें अर्हंत भक्त मुनिको भोजन करानेका कहा है। इसलिये जैनमुनि उत्तम ठहरे.
तथा—मनुस्मृतिमें कहा है :-
कुलादिबीजं सर्वेषां प्रथमो विमलवाहन: .
चक्षुष्मान् यशस्वी वाभिचन्द्रोअथ प्रसेनजित॥१॥
मरुदेवी च नाभिश्च भरते कुल सत्तमा: .
अष्टमो मरुदेव्यां तु नाभेजति उरक्रम: ॥२॥
दर्शयन् वत्र्मवीराणां सुरासुरनमस्कृत:.
नीतित्रितयकर्त्ता यो युगादौ प्रथमो जिन:॥३॥
यहाँविमलवाहनादिकमनुकहे,सोजैनमेंकुलकरोंकेनामकहेहैऔरयहाँ प्रथमजिनयुगके आदिमें मार्गका दर्शक तथा सुरासुर द्वारा पूजित कहा। सो इसी प्रकार है तो जैनमत युगके आदिहीसे है, और प्रमाणभूत कैसे न कहें?
तथा ऋग्वेदमें ऐसा कहा है :-
ओऽम् त्रेलोक्तय प्रति¤तिान् चतु°वशतितीर्थंकरान् ऋषभाद्यान् वर्द्धमानान्तान् सिद्धान् शरणंप्रपद्ये.ओऽम्पवित्रनग्नमुपविस्पृसामहेएषांनग्नंयेषांजातंयेषांवीरंसुवीरं इत्यादि.
तथा यजुर्वेदमें ऐसा कहा है :-
ओऽम् नमो अर्हतो ऋषभाय.
तथा ऐसा कहा है :-
ओऽम्ऋषभपवित्रंपुरुहुतमध्वज्ञंयज्ञेषुनग्नंपरमंमाहसस्तुतंवरंशत्रुंजयंतं पशुरिद्रमाहतिरितिस्वाहा.ओऽम्त्रातारमिंद्रंऋषभंवदन्ति.अमृतारमिंद्रंहवेसुगतं सुपाश्र्वमिंद्रंहवेशक्रमर्जितंतद्वर्द्वमानपुरुहूतमिंद्रंमाहरितिस्वाहा.ओऽम्नग्नंसुधीरं दिग्वाससं ब्रह्मगर्भ सनातनं उपैमि वीरं पुरुषमर्हंतमादित्यवर्ण तमस: परस्तात स्वाहा. ओऽम् स्वस्तिनइन्द्रोवृद्धश्रवास्वतिन:पूषाविश्ववेदा:स्वस्तिनस्ताक्ष्र्योंअरिष्टनेमिस्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु.दीर्घायुस्त्वायुवलायुर्वाशुभाजातायु.ओऽम्रक्षरक्षअरिष्टनेमि:स्वाहा. वाामदेव शान्त्यर्थमनुविधीयते सोऽस्माकं अरिष्टनेमि: स्वाहा.
सो यहाँ जैन तिर्थंकरोंके जो नाम हैं उनके पूजनादि कहे. तथा यहाँ यह भासित हुआ कि- इनके पीछे वेद रचना हुई हैं.
इस प्रकार अन्यमतकेग्रन्थोंकी साक्षीसे भी जिनमतकी उत्तमता और प्राचीनता दृढ़ हुई. तथा जिनमतको देखनेसे वे मत कल्पित ही भासित होते हैं। इसलिये जो अपने हितका इच्छुक हो वह पक्षपात छोड़कर सच्चे जैनधर्मको अंगीकार करो.
तथा अन्यमतोंमें पूर्वापर विरोध भासित होता है. पहले अवतारमें वेदका उद्धार किया, वहाँ यज्ञादिकमें हिंसादिकका पोषण किया और बुद्धावतारमें यज्ञके निन्दक होकर हिंसादिकका निषेध किया. वृषभावतारमें वीतराग संयमका मार्ग दिखाया और कृष्णावतारमें परस्त्री रमणादि विषयकषायादिकका मार्ग दिखाया. अब यह संसारी किसका कहा करे? किसके अनुसार प्रवर्त्ते? और इन सब अवतारों को एक बतलाते हैं, परन्तु एक भी कदाचित् किसी प्रकार कदाचित् किसी प्रकार कहते हैं व प्रवर्त्तते हैं। तो इसे उनके कहनेकी व प्रवर्त्तनेकी प्रतीति कैसे आये?
तथा कहीं क्रोधादिकषायोंका व विषयोंका निषेध करते हैं, कहीं लड़नेका व विषयादि सेवनका उपदेश देते हैं। वहाँ प्रारब्ध बतलाते हैं. सो बिना क्रोधादि हुए अपने आप लड़ना आदि कार्य हों तो यह भी मानें परन्तु वह तो होते नहीं हैं. तथा लड़ना आदि कार्य करने पर भी क्रोधादि हुए न मानें। तो अलग क्रोधादि कौन हैं जिनका निषेध किया? इसलिये ऐसा नहीं बनता, पूर्वापर विरोध है. गीतामें वीतरागता बतलाकर लड़नेका उपदेश दिया, सो यह प्रत्यक्ष विरोध भासित होता है. तथा ऋषीश्वरादिकों द्वारा श्राप दिया बतलाते हैं, सो ऐसा क्रोध करनेपर निंद्यपना कैसे नहीं हुआ? इत्यादि जानना.
तथा—अपुत्रस्य गतिर्नास्तिऐसा भी कहते हैं और—भारतमें ऐसा भी कहा
है :-
अनेकानि सहस्त्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम्.
दिवं गतानि राजेन्द्र अकृत्वा कुलसन्ततिम्॥१॥
यहाँ कुमार ब्रह्मचारियोंको स्वर्ग गये बतलाया। सो यह परस्पर विरोध है. तथा— ऋषीश्वरभारतमें ऐसा कहा है:-
मद्यमंासाशनं रात्रो भोजन कन्दभक्षणम् .
ये कुर्वन्तिवृथास्तेषां तीर्थयात्रां जपस्तप:॥१॥
वृथा एकादशी प्रोक्ता वृथा जागरणंहरे .
वृथा च पौष्करी यात्रा कृत्स्नं चान्द्रायणं वृथा॥२॥
चातुर्मास्ये तु सम्प्राप्ते रात्रिभोज्यं करोति य: .
तस्य शुद्धिर्न विद्येत् चान्द्रायणशतैरपि ॥३॥
इसमें मद्य-मांसादिकका व रात्रिभोजन व चौमासेमें विशेषरूपसे रात्रिभोजनका व कन्दफल-भक्षणका निषेध किया। तथा बडे़पुरुषोंको मद्य- मांसादिकका सेवन करना कहते हैं, व्रतादिमें रात्रिभोजन व कन्दादि भक्षण स्थापित करते हैं। इस प्रकार विरुद्ध निरूपण करते हैं.
इसी प्रकार अनेक पुर्वापर विरुद्ध वचन अन्यमतके शास्त्रोंमें है सो क्तया किया जाय? कहीं तो पूर्व परम्परा जानकर विश्वास कराने के अर्थ यथार्थ कहा और कहीं विषय-कषाय का पोषण करने के अर्थ अन्यथा कहा। सो जहाँ पूर्वापर विरोध हो उनके वचन प्रमाण कैसे करें?
अन्यमतोंमेंजोक्षमा,शील,सन्तोषादिककापोषणकरनेवालेवचनहैंवेतो जैनमतमें पाये जाते हैं, और विपरीत वचन हैं वे उनके कल्पित हैं. जिनमतानुसार वचनोंके विश्वाससे उनके विपरीत वचनके भी श्रद्धानादिक हो जाते हैं, इसलिये अन्यमतका कोई अंगभलादेखकरभीवहाँश्रद्धानादिकनहींकरना.जिसप्रकारविषमिश्रितभोजन हितकारी नहीं है, उसी प्रकार जानना.
तथा यदि कोई उत्तम धर्मका अंग जिनमतमें न पाया जाये और अन्यमतमें पाया जाये, अथवा किसी निषिद्ध धर्मका अंग जिनमतमें पाया जाये और अन्यत्र न पाया जाये तो अन्यमतका आदर करो। परन्तु ऐसा सर्वथा होता ही नहीं। क्तयोंकि सर्वज्ञके ज्ञानमें कुछ छिपा नहीं है. इसलिये अन्यमतोंके श्रद्धानादिक छोड़कर जिनमतके ¹ढ़ श्रद्धानादिक करना.

श्वेताम्बरमत विचार

तथा कालदोषसे कषायी जीवों द्वारा जिनमतमें भी कल्पित रचना की है. सो बतलाते हैं :-
श्वेताम्बर मतवाले किसीने सुत्र बनाये उन्हें गणधरके बनाये कहते हैं. सो उनसे पूछते हैं - गणधरने आचारांगादिक बनाये हैं सो तुम्हारे वर्त्तमानमें पाये जाते हैं इतने प्रमाण सहित बनाये थे या बहुत प्रमाणसहित बनाये थे? यदि इतने प्रमाण सहित ही बनायेथे तो तुम्हारे शाास्त्रोंमें आचारांगादिकके पदोंका प्रमाण अठारह हजार आदि कहा है, सो उनकी विधि मिला दो.
पदका प्रमाण क्तया ? यदि विभक्तिके अंतको पद कहोगे तो कहे हुये प्रमाणसे बहुत पद हो जायेंगे, और यदि प्रमाण पद कहोगे तो उस एक पदके सााधिक(किंचित अधिक) इक्तयावन करोड़ श्लोक हैं. सो यह तो बहुत छोटे शाास्त्र हैं, इसलिये बनता नहीं है. तथा आचारांगादिकसे दशवैकालिकादिका प्रमाण कम कहा है, और तुम्हारे अधिक हैं, सो किस प्रकार बनता है?
फिर कहोगे -—आचारांगादिक बडे़ थे। कालदोष जानकर उन्हींमेंसे कितनेही सूत्र निकालकर यह शाास्त्र बनाये हैं.तब प्रथम तो टूटक ग्रन्थ प्रमाण नहीं हैं. तथा ऐसा नियम है कि - बड़ा ग्रन्थ बनाये तो उसमें सर्व वर्णन विस्तार सहित करते हैं और छोटा ग्रन्थ बनाये तो वहाँ संक्षिप्त वर्णन करते हैं, परन्तु सम्बन्ध टूटता नहीं है और किसी बडे़ ग्रन्थमेंसे थोड़ासा कथन निकाल लें तो वहाँ सम्बन्ध नहीं मिलेगा-कथनका अनुक्रम टूट जायगा.परन्तुतुम्हारेसूत्रोंमेंतोकथादिककाभीसम्बन्धमिलताभासितहोताहैं- टूटकपना भासित नहीं होता .
तथा अन्य कवियोंसे गणधरकी बुद्धि तो अधिक होगी, उनके बनाये ग्रन्थोंमें थोड़े शब्दोंमें बहुत अर्थ होना चाहिये। परन्तु अन्य कवियों जैसी भी गम्भीरता नहीं है.
तथा जो ग्रन्थ बनाये वह अपना नाम ऐसा नहीं रखता कि -—अमुक कहता है, —मैं कहता हूँऐसा कहता है। परन्तु तुम्हारे सूत्रोंमें—हे गौतमव—गौतम कहते हैं ऐसे वचन हैं. परन्तु ऐसे वचन तो तभी सम्भव हैं जब और कोई कर्त्ता हो. इसलिये यह सूत्र गणधरकृत नहीं हैं, औरके बनाये गये हैं. गणधरके नामसे कल्पित-रचनाको प्रमाण कराना चाहते हैं। परन्तु विवेकी तो परीक्षा करके मानते हैं, कहा ही तो नहीं मानते.
तथा वे ऐसा भी कहते हैं कि - गणधर सूत्रोंके अनुसार कोई दशपूर्वधारी हुए हैं, उन्होंने यह सूत्र बनाये हैं. वहाँ पूछते हैं - यदि नये ग्रन्थ बनाये हैं तो नया नाम रखना था, अंगादिकके नाम किसलिये रखे? जैसे - कोई बड़े साहुकारकी कोठीके नामसे अपना साहुकारा प्रगट करे- ऐसा यह कार्य हुआ. सच्चेको तो जिस प्रकार दिगम्बरमें ग्रन्थों केऔर नाम रखे तथा अनुसारी पूर्व ग्रन्थोंका कहा।उसीप्रकारकहनायोग्यथा. अंगादिककेनाम रखकर गणधरकृतका भ्रम किसलिये उत्पन्न किया? इसलिये गणधरके, पूर्वधारीके वचन नहीं हैं. तथा इन सूत्रोंमें विश्वास करने के अर्थ जो जिनमत अनुसार कथन है वह तो सत्य है ही। दिगम्बर भी उसी प्रकार कहते हैं.
तथा जो कल्पित रचना की है, उसमें पूर्वापर विरुद्धपना व प्रत्यक्षादि प्रमाणमें विरुद्धपना भासित होता है वही बतलाते हैं :- अन्यलिंगसे मुक्तिका निषेध
अन्यलिंगीके व गृहस्थके व स्त्रीके व चाण्डालादि शूद्रों के सााक्षात मुक्तिकी प्राप्ति होना मानते हैं, सो बनता नहीं है. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी एकता मोक्षमार्ग है। परन्तु वे सम्यग्दर्शनका स्वरूप तो ऐसा कहते हैं :-
अरहन्तो महादेवो जावज्जीवं सुसाहणो गुरुणो .
जिणपण्णत्तंतत्तंएसम्मत्तंमएगहियं ॥१॥
सो अन्यलिंगीके अरहन्तदेव, साधु, गुरु, जिनप्रणीततत्त्ववका मानना किस प्रकार सम्भव है? जब सम्यक्तत्व भी न होगा तो मोक्ष कैसे होगा?
यदि कहोगे- अंतरùमें श्रद्धान होनेसे उनके सम्यक्तत्व होता है। सोविपरीत लिंग धारककी प्रशंसादिक करने पर भी सम्यक्तत्वको अतिचार कहा है, तोसच्चा श्रद्धान होनेके पश्चात् आप विपरीत लिंगका धारक कैसे रहेगा?श्रद्धान होनेके पश्चात् महाव्रतादिक अंगीकारकरनेपरसम्यक्चारित्रहोताहै,वहअन्यलिंगमेंकिसप्रकारबनेगा?यदि अन्यलिंगमेंभीसम्यक्चारित्रहोताहैतोजैनलिंगअन्यलिंगसमानहुआ,इसलिये अन्यलिंगीको मोक्ष कहना मिथ्या है. गृहस्थमुक्ति निषेध
तथा गृहस्थ को मोक्ष कहते हैं। सो हिंसादिक सर्व सावद्ययोगका त्याग करने पर सम्यक्चारित्र होता है, तब सर्व सावद्ययोगका त्याग करने पर गृहस्थपना कैसे सम्भव है? यदि कहोगे- अंतरंग त्याग हुआ है, तो यहाँ तो तीनों योग द्वारा त्याग करते हैं, तो काय द्वारा त्याग कैसे हुआ? तथा बााह्य परिग्रहादिक रखने पर भी महाव्रत होते हैं। सो महाव्रतोंमें तो बााह्य त्याग करनेकी ही प्रतिज्ञा करते हैं, त्याग किये बिना महाव्रत नहीं होते . महाव्रत बिना छट्टा आदि गुणस्थान नहीं होता। तो फिर मोक्ष कैसे होगा? इसलिये गृहस्थको मोक्ष कहना मिथ्यावचन है . स्त्रीमुक्तिका निषेध
तथा स्त्रीको मोक्ष कहते हैं। सो जिससे सप्तम नरक गमनयोग्य पाप न हो सके, उससे मोक्ष का कारण शुद्धभाव कैसे होगा? क्तयोंकि जिसके भाव ¹ढ़हों, वही उत्कृष्ट पाप वधर्मउत्पन्नकरसकताहै.तथास्त्रीकेनि:शंकएकान्तमेंध्यानधरनाऔरसर्व परिग्रहादिकका त्याग करना सम्भव नहीं है.
यदि कहोगे - एक समयमें पुरुषवेदी व स्त्रीवेदी व नपुंसकवेदीको सिद्धि होना सिद्धान्तमें कही है, इसलिये स्त्रीको मोक्ष मानते हैं. परन्तु यहाँ वह भाववेदी है या द्रव्यवेदी है?यदि भाववेदी है तो हम मानते ही हैं। तथा द्रव्यवेदी है तो पुरुष-स्त्रीवेदी तो लोकमें प्रचुर दिखायी देते हैं, और नपंुसक तो कोई विरले दिखते हैं। तो एक समय में मोक्ष जाने वाले इतने नपंुसक कैसे सम्भव हैं? इसलिये द्रव्यवेदकी अपेक्षा कथन नहीं बनता.
तथा यदि कहोगे - नववें गुणस्थान तक वेद कहे हैं। सो भी भाववेदकी अपेक्षा ही कथन है. द्रव्यवेदकी अपेक्षा हो तो चौदहवें गुणस्थानपर्यन्त वेदका सद्भाव कहना सम्भव हो.
इसलिये स्त्रीको मोक्षका कहना मिथ्या है . शूद्र्रमुक्तिका निषेध
तथाशूद्रोंकोमोक्षकहतेहैं।परन्तुचाण्डालादिककोगृहस्थसन्मानादिकपूर्वक दानादिक कैसे देंगे? लोकविरुद्धहोता है. तथा नीच कुलवालोंके उत्तम परिणाम नहीं हो सकते . तथा नीच गोत्रकर्मका उदय तो पंचम गुणस्थानपर्यन्त ही है। ऊपरके गुणस्थान चढ़े बिनामोक्षकैसेहोगा?यदिकहोगे-संयमधारणकरनेकेपश्चात्उसकेउच्च गोत्रकाउदय कहते हैं। तो संयम धारण करने- न करनेकी अपेक्षासे नीच-उच्च गोत्रका उदय ठहरा. ऐसा होनेसे असंयमी मनुष्य, तीर्थंकर, क्षत्रियादिकको भी नीच गोत्रका उदय ठहरेगा. यदि उनके कुल अपेक्षा उच्च गोत्रका उदय कहोगे तो चाण्डालिदकके भी कुल अपेक्षा ही नीच गोत्रका उदय कहो. उसका सद्भाव तुम्हारे सूत्रोंमें भी पंचम गुणस्थानपर्यन्त ही कहा है सो कल्पित कहने में पूर्वापर विरोध होगा ही होगा। इसलिये शूद्रोंको मोक्ष कहना मिथ्या है.
इस प्रकार उन्होंने सर्वको मोक्षकी प्राप्ति कही। सो उसका प्रयोजन यह है कि सर्वको भला मानना, मोक्षकी लालच देना और अपने कल्पित मतकी प्रवृत्ति करना. परन्तु विचार करने पर मिथ्या भासित होता है. अछेरोंका निराकरण
तथा उनके शाास्त्रोंमें—अछेराकहते हैं. वहाँ कहते हैं - हुण्डावसर्पिणी के निमित्तसे हुए हैं, इनको छेड़ना नहीं. सो कालदोषसे कितनी ही बातें होती हैं, परन्तु प्रमाण विरुद्ध तो नहीं होती. यदि प्रमाणविरुद्ध भी हों तोआकाशके फूल, गधेके सिंग इत्यादिक होना भी बनेगा। सो सम्भव नहीं है. वे अछेराकहते हैं सो प्रमाणविरुद्ध हैं. किसलिये? सो कहते हैं :-
वर्द्धमान जिन कुछ काल ब्राह्मणीके गर्भमें रहे, फिर क्षत्रियाणीके गर्भमें बढ़े ऐसा कहते हैं. सो किसका गर्भ किसीके रख देना प्रत्यक्ष भासित नहीं होता, अनुमानादिकमें नहीं आता.तथातीर्थंकरकेहुआकहेंतोगर्भकल्याणककिसीकेघरहुआ,जन्मकल्याणक किसीके घर हुआ. कुछ दिन रत्नवृष्िट आदि किसीके घर हुए, कुछ दिन किसीके घर हुए. सोलह स्वप्न किसीको आये, पुत्र किसीके हुआ, इत्यादि असम्भव भासित होता है. तथा माताएँ तो दो हुई और पिता तो एक ब्राह्मण ही रहा. जन्मकल्याणादिमें उसका सन्मान नहीं किया, अन्य कल्पित पिताका सन्मान किया. इस प्रकार तीर्थंकरके दो पिताका कहना महाविपरीत भासित होता है. सर्वोत्कृष्ट पद धारकके लिए ऐसे वचन सुनना भी योग्य नहीं है.
तथा तीर्थंकरके भी ऐसी अवस्था हुई तो सर्वत्र ही अन्य स्त्रीका गर्भ अन्य स्त्रीको रख देना ठहरेगा. तो जैसे वैष्णव अनेक प्रकारसे पुत्र-पुत्रीका उत्पन्न होना बतलाते हैं वैसा यह कार्य हुआ. सो ऐसे निकृष्ट कालमें जब ऐसा नहीं होता तब वहाँ होना कैसे सम्भव है? इसलिये यह मिथ्या है.
तथा मल्लि तीर्थंकरको कन्या कहते है. परन्तु मुनि, देवादिककी सभामें स्त्रीका स्थिति करना, उपदेश देना सम्भव नहीं है। व स्त्रीपर्याय हीन है सो उत्कृष्ट तीर्थंकर पदधारीके नहीं बनती. तथा तीर्थंकरके नग्न लिंग ही कहते हैं, सो स्त्रीके नग्नपना संभव नहीं है. इत्यादि विचार करनेसे असंभव भासित होता है.
तथाहरिक्षेत्रकीभोगभूमियाकोनरकमेंगयाकहतेहैं.सोबन्धवर्णनमेंतो भोगभूमियाको देवगति, देवायुहीका बन्ध कहते हैं, नरक कैसे गया? सिद्धान्तमें तो अनन्त कालमें जो बात हो वह भी कहते हैं. जैसे - तीसरे नरकपर्यन्त तीर्थंकर प्रकृतिका सत्व कहा, भोगभूमियाके नरकायु गतिका बन्ध नहीं कहा. सो केवली भूलते तो नहीं हैं। इसलिये यह मिथ्या है.
इस प्रकार सर्व अछेरे असम्भव जानना.
तथा वे कहते हैं - इनको छेड़ना नहीं। सो झूठ कहनेवाला इसी प्रकार कहता है.
तथा यदि कहोगे - दिगम्बरमें जिस प्रकार तीर्थंकरके पुत्री, चक्रवर्तीका मानभंग इत्यादि कार्य कालदोषसे हुआ कहते हैं। उसी प्रकार यह भी हुए. परन्तु यह कार्य तो प्रमाणविरुद्धनहींहै,अन्यकेहोतेथेसोमहन्तोंकेहुए।इसलियेकालदोषकहाहै. गर्भहरणादि कार्य प्रत्यक्ष अनुमानादिसे विरुद्ध हैं, उनका होना कैसे सम्भव है?
तथा अन्य भी बहुत कथन प्रमाणविरुद्ध कहते हैं. जैसे कहते है - सर्वाथसिद्धिके देव मनहीसे प्रश्न करते हैं, केवली मनहीसे उत्तर देते हैं। परन्तु साामान्य जीवके मनकी बात मन:पर्ययज्ञानीके बिना जान नहीं सकता, तो केवलीके मनकी सर्वाथसिद्धिके देव किस प्रकार जानेंगे? तथा केवलीके भावमनका तो अभाव है, द्रव्यमन जड़-आकारमात्र है, उत्तर किसने दिया? इसलिये यह मिथ्या है.
इसप्रकारअनेकप्रमाणविरुद्धकथनकियेहैं,इसलियेउनकेआगमकल्पित जानना.
श्वेताम्बरमत कथित देव-गुरु-धर्मका अन्यथा स्वरूप
तथा वे श्वेताम्बर मतवाले देव-गुरु-धर्मका स्वरूप अन्यथा निरूपित करते हैं:- देवका अन्यथा स्वरूप
वहाँ केवलीके क्षुधादिक दोष कहते हैं सो यह देवका स्वरूप अन्यथा है, कारण कि क्षुधादिक दोष होनेसे आकुलता होगी तब अनन्त सुख किस प्रकार बनेगा? फिर यदि कहोगे शरीरको क्षुधा लगती है, आत्मा तद्रूप नहीं होता। तो क्षुधादिकका उपाय आहारादिक किसलियेग्रहण किया कहते हो? क्षुधादिसे पीडि़त हो तभी आहार ग्रहण करेगा. फिर कहोगे - जिस प्रकार कर्मोदयसे विहार होता है उसी प्रकार आहार ग्रहण होता है. सो विहार तो विहायोगति प्रकृतिके उदयसे होता है और पीड़ाका उपाय नहीं है तथा वह बिना इच्छा भी किसी जीवके होता देखा जाता है. तथा आहार है वह प्रकृति उदयसे नहीं है, क्षुधासे पीडि़त होने पर ही ग्रहण करता है. तथा आत्माा पवनादिको प्रेरित करे तभी निगलना होता है, इसलिये विहारवत् आहार नहीं है.
यदि कहोगे - सातावेदनीयके उदयसे आहार ग्रहण होता है, सो भी बनता नहींं है. यदि जीव क्षुधादिसे पीडि़त हो, पश्चात् आहारादिक ग्रहणसे सुख माने, उसके आहारादिक साताके उदयसे कहे जाते हैं. आहारादिका ग्रहण सातावेदनीयके उदयसे स्वयमेव हो ऐसा तो है नहीं। यदि ऐसा हो तो सातावेदनीयका मुख्य उदय देवोंके है, वे निरन्तर आहार क्तयों नहीं करते? तथा महामुनि उपवासादिक करें उनके साताका भी उदय और निरन्तर भोजन करनेवालोंको असाताका भी उदय सम्भव है.
इसलिये जिस प्रकार बिना इच्छा विहायोगति उदयके विहार सम्भव है, उसी प्रकार बिना इच्छा केवल सातावेदनीय ही के उदयसे आहारका ग्रहण सम्भव नहीं है.
फिर वे कहते हैं - सिद्धान्तमें केवलीके क्षुधादिक ग्यारह परीषह कहे हैं, इसलिये उनके क्षुधाका सद्भाव सम्भव है. तथा आहारादिक बिना उसकी उपशांतता कैसे होगी? इसलिये उनके आहारादि मानते हैं.
समाधान :- कर्मप्रकृतियोंका उदय मन्द-तीव्र भेद सहित होता है. वहाँ अति मन्द उदय होनेसे उस उदयजनित कार्यकी व्यक्तता भासित नहीं होती। इसलिये मुख्यरूपसे अभाव कहा जाता है, तारतम्यमें सद्भाव कहा जाता है. जैसे नववें गुणस्थानमें वेदादिकका उदय मन्द है, वहाँ मैथुनादि क्रिया व्यक्त नहीं है। इसलिये वहाँ ब्रह्मचर्य ही कहा है. तारतम्यमें मैथुनादिकका सद्भाव कहा जाता है. उसी प्रकार केवलीके असाताका उदय अतिमन्दहै।क्तयोंकिएक-एककांडकमेंअनन्तवेभाग-अनुभागरहतेहैं,ऐसेबहुत अनुभागकांडकोंसे व गुणसंक्रमणादिसे सत्तामें असातावेदनीयका अनुभाग अत्यन्त मन्द हुआ है, उसके उदयमें ऐसी क्षुधा व्यक्त नहीं होती जो शरीरको क्षीण करे. और मोहके अभावसे क्षुधादिकजनित दु:ख भी नहीं है। इसलिये क्षुधादिकका अभाव कहा जाता है और तारतम्यमें उसका सद्भाव कहा जाता है.
तथातूनेकहा-आहारादिकबिनाउसकीउपशांतताकैसेहोगी?परन्तु आहारादिकसे उपशांत होने योग्य क्षुधा लगे तो मन्द उदय कैसे रहा? देव, भोगभूमियाँ आदिकके किंचित मन्द उदय होनेपर भी बहुत काल पश्चात किंचित आहार ग्रहण होता है तो इनके अतिमन्द उदय हुआ है, इसलिये इनके आहारका अभाव सम्भव है.
फिर वह कहता है - देव, भोगभूमियोंका तो शरीर ही वैसा कि जिन्हें भूख थोड़ी और बहुत काल पश्चात् लगती है, उनका तो शरीर कर्मभूमिका औदारिक है। इसलिये इनका शरीर आहार बिना देशेन्यून कोटिपूर्व पर्यन्त उत्कृष्टरूपसे कैसे रहता है?
समाधान :- देवादिकका भी शरीर वैसा है। सो कर्मके ही निमित्तसे है. यहाँ केवल- ज्ञान होनेपर ऐसा ही कर्मका उदय हुआ, जिससे शरीर ऐसा हुआ कि उसको भूख प्रगट होती ही नहीं. जिस प्रकार केवलज्ञान होनेसे पूर्व केश, नख बढते थे, अब नहीं बढते। छाया होती थी अब नहीं होती। शरीरमें निगोद थी, उसका अभाव हुआ. बहुत प्रकारसे जैसे शरीरकी अवस्था अन्यथा हुई। उसी प्रकार आहार बिना भी शरीर जैसेका तैसा रहे, ऐसी भी अवस्था हुई. प्रत्यक्ष देखो, औरोंको जरा व्याप्त हो तब शरीर शिथिल हो जाता है, इनका आयु पर्यन्त शरीर शिथिल नहीं होता। इसलिये अन्य मनुष्योंकी और इनके शरीरकी समानता सम्भव नहीं है.
तथा यदि तू कहेगा - देवादिकके आहार ही ऐसा है जिससे बहुत कालकी भूख मिट जाये, परन्तु इनकी भूख काहेसे मिटी और शरीर पुष्ट किस प्रकार रहा? तो सुन, असाताका उदय मंद होनेसे मिटी, और प्रति समय परम औदारिक शरीरवर्गणाका ग्रहण होता है सो वह नोकर्म-आहार है। इसलिये ऐसी-ऐसी वर्गणाका ग्रहण होता है जिससे क्षुधादिक व्याप्तन हों और शरीर शिथिल न हो. सिद्धान्तमें इसीकी अपेक्षा केवलीको आहार कहा है.
तथा अन्नादिकका आहार तो शरीरकी पुष्टताका मुख्य कारण नहीं है. प्रत्यक्ष देखो, कोई थोड़ा आहार ग्रहण करता है और शरीर बहुत पुष्ट होता है। कोई बहुत आहार ग्रहण करता है और शरीर क्षीण रहता है. तथा पवनादि साधनेवाले बहुत कालतक आहार नहीं लेते और शरीर पुष्ट बना रहता है, व ऋद्धिधारी मुनि उपवासादि करते हैं तथापि शरीर पुष्ट बना रहता है। फिर केवलीके तो सर्वोत्कृष्टपना है उनके अन्नादिक बिना शरीर पुष्ट बना रहता है तो क्तया आश्चर्य हुआ? तथा केवली कैसे आहारको जायेंगे? कैसे याचना करेंगे?
तथा वे आहारको जायें तो समवशरण खाली कैसे रहेगा? अथवा अन्यका ला देना ठहराओगे तो कौन ला देगा? उनके मनकी कौन जानेगा? पूर्वमें उपवासादिकी प्रतिज्ञा की थी उसका कैसे निर्वाह होगा? जीव अंतराय सर्वत्र प्रतिभासित हो वहाँ कैसे आहार ग्रहण करेंगे? इत्यादि विरुद्धता भासित होती है. तथा वे कहते हैं- आहार ग्रहण करते हैं, परन्तु किसीको दिखाई नहीं देता. सो आहार ग्रहणको निंद्य जाना, तब उसका न देखना अतिशयमें लिखा है। सो उनके निंद्यपना तो रहा, और दूसरे नहीं देखते हैं तो क्तया हुआ? ऐसे अनेक प्रकार विरुद्धता उत्पन्न होती है.
तथा अन्य अविवेकताकी बातें सुनो - केवलीके निहार कहते हैं, रोगादिक हुए कहतेहैंऔरकहतेहैं-किसीनेतेजोलेश्याछोड़ीउससेवर्द्धमानस्वामीकेपेठूंगा (पेचिसका)रोग हुआ, उससे बहुत बार निहार होने लगा. यदितीर्थंकर केवलीके भी ऐसे कर्मका उदय रहा और अतिशय नहीं हुआ तो इन्द्रादि द्वारा पूज्यपना कैसे शोभा देगा? तथा निहार कैसे करते हैं, कहाँ करते हैं? कोई सम्भावित बातें नहीं हैं. तथा जिस प्रकार रागादियुक्त छद्मस्थके क्रिया होती है, उसी प्रकार केवलीके क्रिया ठहराते हैं.
वर्द्धमानस्वामीके उपदेशमें—हे गौतमऐसा बारम्बार कहना ठहराते हैं। परन्तु उनके तो अपने कालमें सहज दिव्यध्वनी होती है, वहाँ सर्वको उपदेश होता है, गौतमको सम्बोधन किस प्रकार बनता है? तथा केवलीके नमस्कारादि क्रिया ठहराते हैं, परन्तु अनुराग बिना वन्दना सम्भव नहीं है. तथा गुणाधिकको वन्दना सम्भव है, परन्तु उनसे कोई गुणाधिक रहा नहीं है सो कैसे बनती है?
तथा हाटमें समवसरण उतरा कहते हैं, सो इन्द्रकृत समवसरण हाटमें किस प्रकार रहेगा? इतनी रचनाका समावेश वहाँ कैसे होगा? तथा हाटमें किसलिये रहें? क्तया इन्द्र हाट जैसी रचना करनेमें भी समर्थ नहीं है, जिससे हाटका आश्रय लेना पड़े?
तथा कहते हैं - केवली उपदेश देनेको गये सो घर जाकर उपदेश देना अतिरागसे होता है और वह मुनिके भी सम्भव नहीं है तो केवलीके कैसे होगा? इसी प्रकार वहाँ अनेक विपरीतता प्ररूपित करते हैं. केवली शुद्ध केवलज्ञान-दर्शनमय रागादिरहित हुए हैं, उनके अघातियोंके उदयसे संभवित क्रिया कोई होती है। परन्तु उनके मोहादिकका अभाव हुआ है, इसलिये उपयोग जुड़नेसे जो क्रिया हो सकती हैवह सम्भव नहीं है. पाप प्रकृतिकाअनुभाग अत्यन्त मंद हुआ है, ऐसा मंद अनुभाग अन्य किसीके नहीं है। इसलिये अन्य जीवोंके पाप उदयसे जो क्रियाहोती देखी जाती है, वह केवलीके नहीं होती.
इस प्रकार केवली भगवानके साामान्य मनुष्य जैसी क्रियाका सद्भाव कहकर देवके स्वरूपको अन्यथा प्ररूपित करते हैं. गुरुका अन्यथा स्वरूप
तथा गुरुके स्वरूपको अन्यथा प्ररूपित करते हैं. मुनिके वस्त्रादिक चौदह उपकरण कहतेहैं सो हम पूछते हैं- मुनिको निर्ग्रन्थ कहते हैं, और मुनिपद लेते समय नव प्रकारके सर्व परिग्रहका त्याग करके महाव्रत अंगीकार करते हैं। सो यह वस्त्रादिक परिग्रह हैं या नहीं? यदि हैं तो त्याग करनेके पश्चात् किसलिये रखते हैं? और नहीं हैं तो वस्त्रादिक गृहस्थ रखते हैं, उन्हें भी परिग्रह मत कहो? सुवर्णादिकको परिग्रह कहो.
तथा यदि कहोगे - जिस प्रकार क्षुधाके अर्थ आहार ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार शीत-उष्णतादिकके अर्थ वस्त्रादिक ग्रहण करते हैं। परन्तु मुनिपद अंगीकार करते हुए आहारका त्याग नहीं किया है, परिग्रहका त्याग किया है. तथा अन्नादिकका संग्रह करना तो परिग्रह है, भोजन करने जायें वह परिग्रह नहीं है. तथा वस्त्रादिकका संग्रह करना व पहिनना वह सर्वत्र ही परिग्रह है सो लोकमें प्रसिद्ध है.
फिर कहोगे - शरीरकी स्थितिके अर्थ वस्त्रादिक रखते हैं। ममत्व नहीं है इससे इनको परिग्रह नहीं कहते, सो श्रद्धानमें तो जबसम्यग्¹ष्िट हुआ तभी समस्त परद्रव्योंमें ममत्वका अभाव हुआ। उस अपेक्षासे चौथा गुणस्थान ही परिग्रह रहित कहो. तथा प्रवृत्तिमें ममत्व नहीं है तो कैसे ग्रहण करते हैं? इसलिए वस्त्रादिकका ग्रहण-धारण छूटेगा तभी निष्परिग्रह होगा.
फिर कहोगे - वस्त्रादिकको कोई ले जाये तो क्रोध नहीं करते व क्षुधादिक लगे तो उन्हें बेचते नहीं हैं व वस्त्रादिक पहिनकर प्रमाद नहीं करते हैं। परिणामोंकी स्थिरता द्वारा धर्म ही साधन करते हैं, इसलिए ममत्व नहीं है. सो बाह्य क्रोध भले न करो, परन्तु जिसके ग्रहणमें इष्टबुद्धि होगी उसके वियोगमें अनिष्टबुद्धि होगी ही होगी. यदि इष्टबुद्धि नहीं है तो उसके अर्थ याचन किसलिये करते हैं? तथा बेचते नहीं हैं, सो धातु रखनेसे अपनी हीनता जानकर नहीं बेचते. परन्तु जिसप्रकार धनादिका रखना है उसी प्रकारवस्त्रादिका रखना है. लोकमें परिग्रहके चाहक जीवोंको दोनोकी इच्छा है। इसलिए चोरादिकके भयादिकके कारण दोनों समान हैं. तथा परिणामोंकी स्थिरता द्वारा धर्म साधनही से परिग्रहपना न हो, तो किसीको बहुत ठंड लगेगी वह रजाई रखकर परिणामोंकी स्थिरता करेगा और धर्म साधेगा। सो उसे भी निष्परिग्रह कहो? इस प्रकार गृहस्थधर्म-मुनिधर्म में विशेष क्तया रहेगा? जिसके परिषह सहनेकी शक्ति न हो, वह परिग्रह रखकर धर्म साधन करे उसका नाम गृहस्थधर्म। और जिसके परिणमन निर्मल होनेसे परिषहसे व्याकुल नहीं होते, वह परिग्रह न रखें और धर्म साधन करे उसका नाम मुनिधर्म - इतना हीविशेष है.
फिर कहोगे - शीतादिके परिषहसे व्याकुल कैसे नहीं होंगे? परन्तु व्याकुलता तो मोहउदयके निमित्तसे है। और मुनिके छठवें आदि गुणस्थानोंमें तीन चौकड़ीका उदय नहीं है तथा संज्वलनके सर्वघाती स्पर्द्धकोंका उदय नहीं है, देशघाती स्पर्द्धकोंका उदय है सो उनकाकुछबलनहींहै.जैसेवेदकसम्यग्¹Úकिोसम्यग्मोहनीयकाउदयहै,परन्तु सम्यक्तत्वका घात नहीं कर सकता। उसी प्रकार देशघाती संज्वलनका उदय परिणामों को व्याकुल नहीं कर सकता. अहो मुनियोंके और दूसरोंके परिणामोंकी समानता नहीं है. और सबके सर्वघाती उदय है, इनके देशघातीका उदय है इसलिये दूसरोंकेजैसे परिणाम होते हैं वैसे इनके कदाचित् नहीं होते. जिनके सर्वघाती कषायोंका उदय हो वे गृहस्थ ही रहते हैंऔरजिनकेदेशघातीकाउदयहोवेमुनिधर्मअंगीकारकरतेहैं।उनकेपरिणाम शीतादिकसे व्याकुल नहीं होते, इसलिये वस्त्रादिक नहीं रखते.
फिर कहोगे - जैनशास्त्रोंमें मुनि चौदह उपकरण रखे - ऐसा कहा है। सो
तुम्हारे ही शास्त्रोंमें कहा है, दिगम्बर जैनशास्त्रोंमें तो कहा नहीं है। वहाँ तो लँगोट माात्र परिग्रह रहने पर भी ग्यारहवीं प्रतिमाके धाारीको श्रावक ही कहा है.
अब यहाँ विचार करो कि- दोनोंमें कल्पित वचन कौन हैं? प्रथम तो कल्पित रचना कषायी हो वह करता है। तथा कषायी हो वही नीचपदमें उच्चपन प्रगट करता है. यहाँ दिगम्बरमें वस्त्रादि रखनेसे धर्म होता ही नहीं है - ऐसा तो नहीं कहा, परन्तु वहाँ श्रावक धर्म कहा है। श्वेताम्बरमें मुनिधर्म कहा है. इसलिए यहाँ जिसने नीची क्रिया होनेपर उच्चत्व प्रगट किया वही कषायी है. इस कल्पित कथनसे अपनेको वस्त्रादि रखने पर भी लोग मुनि मानने लगें। इसलिये मानकषायका पोषण किया और दूसरोंको सुगमक्रियामें उच्चपदका होना दिखाया, इसलिये बहुत लोग लग गये. जो कल्पित मत हुए हैं वे इसी प्रकार हुए हैं. इसलिए कषायी होकर वस्त्रादि होनेपर मुनिपना कहा है सो पूर्वोक्त युक्तिमें विरूद्ध भासित होता है। इसलिये यह कल्पित वचन हैं, ऐसा जानना .
फिर कहोगे- दिगम्बरमें भी शास्त्र, पींछी आदि उपकरण मुनिके कहे हैं। उसी प्रकार हमारे चौदह उपकरण कहे हैं?
समाधान :- जिससे उपकार हो उसका नाम उपकरण है. सो यहाँ शीतादिककी वेदना दूर करने से उपकरण ठहरायें तो सर्व परिग्रह सामग्री उपकरण नाम प्राप्त करे, परन्तु धर्ममें उनका क्तया प्रयोजन? वे तो पापके कारण हैं। धर्ममें तो जो धर्मके उपकारी हों उनका नाम उपकरण है. वहाँ-शास्त्र ज्ञानका कारण, पींछी-दयाका कारण, कमण्डल शौचका कारण है, सो यह तो धर्मके उपकारी हुए, वस्त्रादिक किस प्रकार धर्मके उपकारी होंगे? वे तो शरीर सुखके अर्थ ही धारण किए जाते हैं.
और सुनो, यदि शास्त्र रखकर महंतता दिखायें, पींछीसे बुहारी दें, कमण्डलसे जलादिक पियें व मेल उतारें, तो शास्त्रादिक भी परिग्रह ही हैं। परन्तु मुनि ऐसे कार्य नहीं करते. इसलिये धर्मके साधनको परिग्रह संज्ञा नहीं है। भोगके साधनको परिग्रह संज्ञा होती है ऐसा जानना.
फिर कहोगे- कमण्डलसे तो शरीरहीका मल दूर करते हैं। परन्तु मुनि मल दूर करनेकी इच्छासे कमण्डल नहीं रखते हैं. शास्त्र पढ़ना आदि कार्य करते हैं, वहाँ मललिप्त हों तो उनकी अविनय होगी, लोकनिंद्य। होंगे। इसलिए धर्मके अर्थ कमण्डल रखते हैं. इस प्रकार पींछी आदि उपकरण सम्भवित हैं, वस्त्रादिको उपकरण संज्ञा सम्भव नहीं है.
काम, अरति आदि मोहके उदयसे विकार बाह्य प्रगट हों, तथा शीतादि सहे नहीं जायेंगे, इसलिए विकार ढकनेको व शीतादि मिटानेको वस्त्रादि रखते हैं और मानके उदय से अपनी महंतता भी चाहते हैं, इसलिये उन्हें कल्पित युक्ति द्वारा उपकरण ठहराया है.
तथा घर-घर याचना करके आहार लाना ठहराते हैं. सो पहले तो यह पूछते हैं कि - याचना धर्मका अù है या पापका अù है? यदि धर्मका अù है तो माँगनेवाले सर्व धर्मात्मा हुए। और पापका अù है तो मुनिके किस प्रकार संभव है?
फिर यदि तू कहेगा - लोभसे कुछ धनादिककी याचना करें तो पाप हो। यह तो धर्म साधन के अर्थ शरीरकी स्थिरता करना चाहते हैं, इसलिये आहारादिककी याचना करते हैं?
समाधान :- आहारादिसे धर्म नहीं होता, शरीरका सुख होता है। इसलिये शरीर सुखके अर्थ अतिलोभ होनेपर याचना करते हैं. यदि अतिलोभ न होता तो आप किसलिये माँगता? वे ही देते तो देते, न देते तो न देते. तथा अतिलोभ हुआ वहीं पाप हुआ, तब मुनिधर्म नष्ट हुआ। दूसरा धर्म क्तया साधेगा?
अब वह कहता है - मनमें तो आहारकी इच्छा हो और याचना न करे तो माया- कषाय हुई। और याचना करने में हीनता आती है सो गर्व के कारण याचना न करे तो मानकषाय हुई. आहार लेना था सो माँग लिया, इसमें अतिलोभ क्तया हुआ और इससे मुनिधर्म किस प्रकार नष्ट हुआ? सो कहो.
उससे कहते हैं - जैसे किसी व्यापारी को कमानेकी इच्छा मंद है सो दुकान पर तो बैठे और मनमें व्यापार करनेकी इच्छा भी है। परन्तु किसीसे वस्तु लेन-देनरूप व्यापारके अर्थ प्रार्थना नहीं करता है, स्वयमेव कोई आये तो अपनी विधि मिलने पर व्यापार करता है तो उसके लोभकी मन्दता है, माया व मान नहीं है. माया, मानकषाय तो तब होगी जब छल करनेके अर्थ व अपनी महंतताके अर्थ ऐसा स्वंाग करे. परन्तु अच्छे व्यापारीके ऐसा प्रयोजननहींहै,इसलियेउसकेमाया-माननहींकहते.उसीप्रकारमुनियोंके आहारादिककी इच्छा मंद है. वे आहार लेने आते हैं और मनमें आहार लेनेकी इच्छा भी है, परन्तु आहारके अर्थ प्रार्थना नहीं करते। स्वयमेव कोई दे तो अपनी विधि मिलने पर आहार लेते हैं. वहाँ उनके लोभकी मन्दता है, माया व मान नहीं है. माया-मान तो तब होगा जब छल करनेके अर्थ व महंतताके अर्थ ऐसा स्वंाग करें, परन्तु मुनियोंकेऐसे प्रयोजन हैं नहीं, इसलिये उनके माया-मान नहीं है. यदि इसी प्रकार माया-मान हो, तो जो मन ही द्वारा पाप करते हैं, वचन-काय द्वारा नहीं करते, उन सबके माया ठहरेगी और जो उच्चपदवीके धारक नीचवृत्ति अंगीकार नहीं करते उन सबके मान ठहरेगा - ऐसा अनर्थ होगा .
तथा तूने कहा -—आहार माँगनेमें अतिलोभ क्तया हुआ?सो अतिकषाय हो तब लोकनिंद्य कार्य अंगीकार करके भी मनोरथ पूर्ण करना चाहता है। और मँागना लोकनिंद्य है,
उसे भी अंगीकार करके आहारकी इच्छा पूर्ण करनेकी चाह हुई, इसलिये यहाँ अतिलोभ हुआ.
तथा तूने कहा -—मुनिधर्म कैसे नÚ हुआ?परन्तु मुनिधर्ममें ऐसी तीव्रकषाय सम्भव नहीं है. तथा किसीके आहार देनेका परिणाम नहीं था और इसने उसके घरमें जाकर याचना की। वहाँ उसको संकोच हुआ और न देनेपर लोकनिंद्य होनेका भय हुआ, इसलिये उसे आहार दिया, परन्तु उसके(दातारके)अंतरंग प्राण पीडि़त होनेसे हिंसाका सद्भाव आया. यदि आपउसके घर में न जाते, उसीके देनेका उपाय होता तो देता, उसे हर्ष होता. यह तो दबाकर कार्य कराना हुआ. तथा अपने कार्यके अर्थ याचनारूप वचन है वह पापरूप है, सो यहाँ असत्य वचन भी हुआ. तथा उसके देनेकी इच्छा नहीं थी, इसने याचना की, तब उसने अपनी इच्छासे नहीं दिया, संकोचसे दिया इसलिये अदत्तग्रहण भी हुआ.तथागृहस्थकेघरमेंस्त्रीजैसी-तैसीबैठीथी और यहचलागया,सोवहाँ ब्रह्मचर्यकी बाड़का भंग हुआ. तथा आहार लाकर कितने काल तक रखा। आहारादिके रखनेको पात्रादिक रखे वह परिग्रह हुआ. इस प्रकार पाँच महाव्रतोंका भंग होनेसे मुनिधर्म नÚ होता है, इसलिये मुनिको याचनासे आहार लेना युक्त नहीं है .
फिर वह कहता है - मुनिके बाईस परीषहोंमें याचना परीषह कहा है। सो माँगे बिना उस परीषहका सहना कैसे होगा?
समाधान :- याचना करनेका नाम याचनापरीषह नहीं है. याचना न करनेका नाम याचनापरीषह है. जैसे - अरति करनेका नाम अरतिपरीषह नहीं है। अरति न करनेका नाम अरतिपरीषह है - ऐसा जानना. यदि याचना करना परीषह ठहरे तो रंकादि बहुत याचना करते हैं, उनके बहुत धर्म होगा. और कहोगे - मान घटानेके कारण इसे परीषह कहते हैं, तो किसी कषाय-कार्यके अर्थ कोई कषाय छोड़ने पर भी पापी ही होता है. जैसे - कोई लोभके अर्थ अपने अपमानको भी न गिने तो उसके लोभकी तीव्रता है, उस अपमान करानेसे भी महापाप होता है. और आपके कुछ इच्छा नहीं है, कोई स्वयमेव अपमान करे तो उसके महाधर्म है। परन्तु यहाँ तो भोजनके लोभके अर्थ याचना करके अपमान कराया इसलिये पाप ही है, धर्म नहीं है. तथा वस्त्रादिकके अर्थ भी याचना करता है, परन्तु वस्त्रादिक कोई धर्मका अंग नहीं है, शरीर सुखका कारण है इसलिये पूर्वोक्त प्रकारसे उसका निषेध जानना. देखो, अपने धर्मरूप उच्चपदको याचना करके नीचा करते हैं सो उसमें धर्मकी हीनता होती हैं.-इत्यादि अनेक प्रकारसे मुनिधर्ममें याचना आदि सम्भव नहीं है। परन्तु ऐसी असम्भवित क्रियाके धारकको साधु-गुरु कहते हैं. इसलिये गुरुका स्वरूप अन्यथा कहते हैं . धर्मका अन्यथा स्वरूप
तथाधर्मकास्वरूपअन्यथाकहतेहैं.सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चाारित्रइनकीएकता मोक्षमार्ग है, वही धर्म है - परन्तु उसका स्वरूप अन्यथा प्ररूपित करते हैं सो कहते हैं :-
तत्त्ववार्थश्रद्धानसम्यग्दर्शनहै।उसकीतोप्रधानतानहींहै.आपजिसप्रकार अरहंतदेव-साधु-गुरु-दया-धर्मका निरूपण करते हैं उसके श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते हैं. वहाँ प्रथम तो अर्हंतादिकका स्वरूप अन्यथा कहते हैं। तथा इतने ही श्रद्धानसे तत्त्ववश्रद्धान हुए बिना सम्यक्तत्व कैसे होगा? इसलिये मिथ्या कहते हैं.
तथा तत्त्ववोंके भी श्रद्धानको सम्यक्तत्व कहते हैं तो प्रयोजनसहित तत्त्ववोंका श्रद्धान नहीं कहते.गुणस्थान-मार्गणादिरूपजीवका,अणु-स्कन्धादिरूपअजीवका,पाप-पुण्यके स्थानोंका, अविरत आदि आस्रवोंका, व्रतादिरूप संवरका, तपश्चरणादिरूप निर्जराका, सिद्ध होनेके लिंगादि के भेदोंसे मोक्षका स्वरूप जिस प्रकार उनके शाास्त्रों में कहा है उस प्रकार सीख लेना। और केवलीका वचन प्रमाण है - ऐसे तत्त्ववश्रद्धानसे सम्यक्तत्व हुआ मानते हैं.
सो हम पूछते हैं कि - ग्रैवेयक जानेवाले द्रव्यलिंगी मुनिके ऐसा श्रद्धान होता है या नहीं? यदि होता है तो उसे मिथ्या¹ष्िट किसलिये कहते हैं? और नहीं होता है तो उसने तो जैनलिंग धर्मबुद्धिसे धारण किया है, उसके देवादिकी प्रतीति कैसे नहीं हुई? और उसके बहुत शास्त्राभ्यास है सो उसने जीवादिके भेद कैसे नहीं जाने? और अन्यमतका लवलेश भी अभिप्राय में नहीं है, उसको अरहंत वचनकी कैसे प्रतीति नहीं हुई? इसलिये उसके ऐसा श्रद्धान तो होता है। परन्तु सम्यक्तत्व नहीं हुआ. तथा नारकी, भोग-भूमिया, तिर्यंच आदिको ऐसा श्रद्धान होनेका निमित्त नहीं है, तथापि उनके बहुतकालपर्यन्त सम्यक्तत्व रहता है, इसलिये उनके ऐसा श्रद्धान नहीं होता, तब भी सम्यक्तत्व हुआ है.
इसलिये सम्यक्श्रद्धानका स्वरूप यह नहीं है. सच्चा स्वरूप है उसका वर्णन आगे करेंगे सो जानना.
तथा उनके शास्त्रोंका अभ्यास करना उसे सम्यग्ज्ञान कहते हैं। परन्तु द्रव्यलिंगी मुनिकेशास्त्राभ्यासहोनेपरभीमिथ्याज्ञानकहाहै,असंयतसम्यग्¹Úकिाविषयादिरूप जानना उसे सम्यग्ज्ञान कहा है.
इसलिये यह स्वरूप नहीं है. सच्चा स्वरूप आगे कहेंगे सो जानना.
तथा उनके द्वारा निरूपित अणुव्रत-महाव्रतादिरूप श्रावक-यतिका धर्म धारण करनेसे सम्यक्चारित्र हुआ मानते हैं। परन्तु प्रथम तो व्रतादिका स्वरूप अन्यथा कहते है वह कुछ पहले गुरु वर्णनमें कहा है. तथा द्रव्यलिंगीके महाव्रत होनेपर भी सम्यक्चारित्र नहीं होता, और उनके मतके अनुसार गृहस्थादिकके महाव्रतादि बिना अंगीकार किये भी सम्यक्चारित्र होता है.
इसलिये यह स्वरूप नहीं है. सच्चा स्वरूप दूसरा है सो आगे कहेंगे.
यहाँ वे कहते हैं - द्रव्यलिंगीके अन्तरंगमें पूर्वोक्त श्रद्धानादिक नहीं हुए, बाह्य ही हुए हैं। इसलिये सम्यक्तत्वादि नहीं हुए.
उत्तर :- यदि अन्तरंग नहीं है और बाह्य धारण करता है, तो वह कपटसे धारण करता है. और उसके कपट हो तो ग्रैवेयक कैसे जाये? वह तो नरकादिमें जायेगा. बन्ध तो अन्तरंग परिणामों से होता है। इसलिए अन्तरंग जैनधर्मरूप परिणाम हुए बिना ग्रैवेयक जाना सम्भव नहीं है.
तथा व्रतादिरूप शुभोपयोगहीसे देवका बन्ध मानते हैं और उसीको मोक्षमार्ग
मानते हैं, सो बन्धमार्ग मोक्षमार्ग को एक किया। परन्तु यह मिथ्या है.
तथा व्यवहारधर्ममें अनेक विपरीतताएँ निरूपित करते हैं. निंदकको मारने में पाप नहीं है ऐसा कहते हैं। परन्तु अन्यमती निन्दक तीर्थंकरादिकके होनेपर भी हुए। उनको इन्द्रादिक मारते नहीं हैं। यदि पाप न होता तो इन्द्रादिक क्तयों नहीं मारते? तथा प्रतिमाजी के आभरणादि बनाते हैं। परन्तु प्रतिबिम्ब तो वीतरागभाव बढ़ानेके लिए स्थापित किया था, आभरणादि बनानेसे अन्यमतकी मूर्त्तिवत यह भी हुए. इत्यादि कहाँ तक कहें? अनेक अन्यथा निरूपण करते हैं.
इसप्रकार श्वेताम्बर मत कल्पित जानना. यहाँ सम्यग्दर्शनादिकके अन्यथा
निरूपणसे मिथ्यादर्शनादिकहीकी पुÚता होती है। इसलिये उसका श्रद्धानादि नहीं करना.
ढूँढकमत विचार
तथा इन श्वेताम्बरोंमें ही ढूँढिये प्रगट हुए हैं। वे अपनेको सच्चा धर्मात्मा
मानते हैं, सो भ्रम है. किसलिये? सो कहते हैं :-
कितने ही तो भेष धारण करके साधु कहलाते हैं। परन्तु उनकेग्रन्थोंके
अनुसार भी व्रत, समिति, गुप्ति आदिका साधन भासित नहीं होता. और देखो मन-वचन- काय, कृत-कारित-अनुमोदनासे सर्व सावद्ययोग त्याग करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं। बादमें पालन नहीं करते . बालकको व भोलेको व शूद्रादिकको भी दीक्षा देते हैं. इस प्रकार त्याग करते हैं और त्याग करते हुए कुछ विचार नहीं करते कि - क्तया त्याग करता हूूूँ? बाादमें पालन भी नहीं करते और उन्हें सब साधु मानते हैं.
तथा यह कहता है - बादमें धर्मबुद्धि हो जायेगी तब तो उसका भला होगा? परन्तु पहले ही दीक्षा देनेवालेने प्रतिज्ञा भंग होती जानकर भी प्रतिज्ञा करायी, तथा इसने प्रतिज्ञा अंगीकार करके भंगकी, सो यह पाप किसे लगा? बादमें धर्मात्मा होनेका निश्चय कैसा? तथा जो साधुका धर्म अंगीकार करके यथार्थ पालन न करे उसे साधु मानें या न मानें? यदि मानें तो जो साधु मुनिनाम धारण करते हैं और भ्रÚ हैं उन सबको साधु मानो. न मानें तो इनके साधुपना नहीं रहा. तुम जैसे आचरण से साधु मानते हो, उसका भी पालन किसी विरलेके पाया जाता है। सबको साधु किसलिये मानते हो?
यहाँ कोई कहे - हम तो जिसके यथार्थ आचरण देखेंगे उसे साधु मानेंगे, और को नहीं मानेंगे. उससे पूछते हैं - एक संघमें बहुत भेषी हैं। वहाँ जिसके यथार्थ आचरण मानते हो, वह औरोंको साधु मानता है या नहीं मानता? यदि मानता है तो तुमसे भी अश्रद्धानी हुआ, उसे पूज्य कैसे मानते हो? और नहीं मानता तो उससे साधुका व्यवहार किसलिये वर्तता है? तथा आप तो उन्हें साधु न मानें और अपने संघमें रखकर औरोंसे साधु मनवाकर औरोंको अश्रद्धानी करता है ऐसा कपट किसलिये करता है? तथा तुम जिसको साधु नहीं मानोगे तब अन्य जीवोंको भी ऐसा ही उपदेश करोगे कि - ‘इनको साधु मत मानो,’ इससे तो धर्मपद्धतिमें विरोध होता है. और जिसको तुम साधु मानते हो उससे भी तुम्हारा विरोध हुआ, क्तयोंकि वह उसे साधु मानता है. तथा तुम जिसके यथार्थ आचरण मानते हो, वहाँ भी विचारकर देखो। वह भी यथार्थ मुनिधर्मका पालन नहीं करता है.
कोई कहे - अन्य भेषधारियोंसे तो बहुत अच्छे हैं, इसलिये हम मानते हैं। परन्तु अन्यमतोंमें तो नानाप्रकारके भेष सम्भव हैं, क्तयोंकि वहाँ रागभावका निषेध नहीं है. इस जैनमतमें तो जैसा कहा है, वैसा ही होनेपर साधु संज्ञा होती है.
यहाँ कोई कहे - शील-संयमादि पालते हैं, तपश्चरणादि करते हैं। सो जितना करे उतना ही भला है?
समाधान :- यह सत्य है, धर्म थोड़ा भी पाला हुआ भला ही है। परन्तु प्रतिज्ञा तो बड़े धर्मकी करें और पालें थोड़ा, तो वहाँ प्रतिज्ञाभंगसे महापाप होता है. जैसे कोई उपवासकी प्रतिज्ञा करके एकबार भोजन करे तो उसके बहुतबार भोजनका संयम होनेपर भी प्रतिज्ञा भंगसे पापी कहते हैं, उसी प्रकार मुनिधर्मकी प्रतिज्ञा करके कोई किंचित् धर्म न पाले, तो उसे शील-संयमादि होने पर भी पापी कहते हैं. और जैसे एकंत(एकाशन)की प्रतिज्ञा करके एकबार भोजन करे तो धर्मात्मा ही है। उसी प्रकार अपना श्रावकपद धारण करके थोड़ा भी धर्म साधन करे तो धर्मात्मा ही है. यहाँ ऊँचा नाम रखकर नीची क्रिया करनेमें पापीपना सम्भव है. यथायोग्य नाम धारण करके धर्मक्रिया करनेसे तो पापीपना होता नहीं है। जितना धर्म साधन करे उतना ही भला है.
यहाँ कोई कहे - पंचमकालके अंतपर्यन्त चतुर्विध संघका सद्भाव कहा है. इनको साधु न मानें तो किसको मानें?
उत्तर :- जिस प्रकार इसकालमें हंसका सद्भाव कहा है, और गम्यक्षेत्रमें हंस दिखाई नहीं देते, तो औरोंको तो हंस माना नहीं जाता। हंसका लक्षण मिलने पर ही हंस माने जाते हैं. उसी प्रकार इसकालमें साधुका सद्भाव है, और गम्यक्षेत्रमें साधु दिखाई नहीं देते, तो औरोंको तो साधु माना नहीं जाता। साधु का लक्षण मिलने पर ही साधु माने जाते हैं. तथा इनका प्रचार भी थोड़े ही क्षेत्रमें दिखाई देता है, वहाँसे दूरके क्षेत्रमें साधुका सद्भाव कैसे मानें? यदि लक्षण मिलने पर मानें तो यहाँ भी इसी प्रकार मानो. और बिना लक्षण मिले ही मानें तो वहाँ अन्य कुलिंगी हैं उन्हींको साधु मानो. इस प्रकार विपरीतता होती है, इसलिये बनता नहीं है.
कोई कहे- इस पंचमकालमें इस प्रकार भी साधुपद होता है। तो ऐसा सिद्धान्त वचन बतलाओ. बिना ही सिद्धान्त तुम मानते हो तो पापी होगे. इस प्रकार अनेक युक्ति द्वारा इनके साधुपना बनता नहीं है। और साधुपने बिना साधु मानकर गुरु माननेसे मिथ्यादर्शन होता है। क्तयोंकि भले साधुको गुरु माननेसे ही सम्यग्दर्शन होता है. प्रतिमाधारी श्रावक न होनेकी मान्यताका निषेध
तथा श्रावकधर्मकी अन्यथा प्रवृत्ति कराते हैं. त्रसहिंसा एवं स्थूल मृषादिक होनेपर भी जिसका कुछ प्रयोजन नहीं है ऐसा किंचित त्याग कराके उसे देशव्रती हुआ कहते हैं। और वह त्रसघातादिक जिसमें हो ऐसा कार्य करता है। सो देशव्रत गुणस्थानमें तो ग्यारह अविरति कहे हैं, वहाँ त्रसघात किस प्रकार सम्भव है? तथा ग्यारह प्रतिमाभेद श्रावकके हैं, उनमें दसवीं-ग्यारहवीं प्रतिमाधारक श्रावक तो कोई होता ही नहीं और साधु होता है.
पूछे तब कहते हंै - प्रतिमाधारी श्रावक इस काल नहीं हो सकते. सो देखो, श्रावकधर्म तो कठिन और मुनिधर्म सुगम - ऐसा विरुद्ध कहते हैं. तथा ग्यारहवीं प्रतिमाधारीको थोड़ा परिग्रह, मुनिको बहुत परिग्रह बतलाते हैं सो सम्भवित वचन नहीं है. फिर कहते हैं - यह प्रतिमा तो थोड़े ही काल पालन कर छोड़ देते हैं। परन्तु यह कार्य उत्तम है तो धर्मबुद्धि ऊँची क्रियाको किसलिये छोड़ेगा और नीचा कार्य है तो किसलिये अंगीकार करेगा? यह सम्भव ही नहीं है.
तथा कुदेव-कुगुरुको नमस्कारादि करनेसे भी श्रावकपना बतलाते हैं. कहते हैं- धर्मबुद्धिसे तो नही वन्दते हैं, लौकिक व्यवहार है। परन्तु सिद्धान्तमें तो उनकी प्रशंसा स्तवनको भी सम्यक्तत्वका अतिचार कहते हैं और गृहस्थोंका भला मनानेके अर्थ वन्दना करने पर भी कुछ नहीं कहते.
फिर कहोगे - भय, लज्जा, कुतूहलादिसे वन्दते हैं, तो इन्हीं कारणोंसे कुशीलादि सेवनकरनेपरभीपापमतकहो,अंतरंगमेंपापजाननाचाहिये.इसप्रकारतोसर्व आचारोंमें विरोध होगा.
देखो,मिथ्यात्वजैसेमहापापकीप्रवृत्तिछुड़ानेकीतोमुख्यतानहींहैऔर पवनकायकी हिंसा ठहराकर खुले मुँह बोलना छुड़ानेकी मुख्यता पायी जाती है। सो यह क्रमभंग उपदेश है. तथा धर्मके अंग अनेक हैं, उनमें एक परजीवकी दयाको मुख्य कहते हैं, उसका भी विवेक नहीं है. जलका छानना, अन्नका शोधना, सदोष वस्तुका भक्षण न करना, हिंसादिकरूप व्यापार न करना इत्यादि उसके अंगोंकी तो मुख्यता नहीं है. मुखपट्टी आदिका निषेध
तथा पट्टीका बाँधना, शौचादिक थोड़ा करना, इत्यादि कार्योंकी मुख्यता करते हैं। परन्तु मैलयुक्त पट्टीके थूकके सम्बन्धसे जीव उत्पन्न होते हैं, उनका तो यत्न नहीं है और पवनकी हिंसाका यत्न बतलाते हैं. सो नासिका द्वारा बहुत पवन निकलती है उसका तो यत्न करते ही नहीं. तथा उनके शास्त्रानुसार बोलनेहीका यत्न किया है तो सर्वदा किसलिये रखते हैं? बोलें तब यत्न कर लेना चाहिये. यदि कहंे - भूल जाते हैं। तो इतनी भी याद नहीं रहती तब अन्य धर्म साधन कैसे होगा? तथा शौचादिक थोड़े करें, सो सम्भवित शौच तो मुनिभी करते हैं। इसलिये गृहस्थको अपने योग्य शौच करना चाहिये. स्त्री संगमादि करके शौच किये बिना सामायिकादि क्रिया करनेसे अविनय, विक्षिप्तता आदि द्वारा पाप उत्पन्न होता है. इस प्रकार जिनकी मुख्यता करते हैं उनका भी ठिकाना नहीं है. और कितने ही दयाके अंग योग्य पालते हैं, हरितकाय आदिका त्याग करते हैं, जल थोड़ा गिराते हैं। इनका हम निषेध नहीं करते. मूर्तिपूजा निषेधका निराकरण
तथा इस अहिंसाका एकान्त पकड़कर प्रतिमा, चैत्यालय, पूजनादि क्रियाका उत्थापन करते हैं। सो उन्हींके शास्त्रोंमें प्रतिमा आदिका निरूपण है, उसे आग्रहसे लोप करते हैं. भगवतीसूत्रमें ऋद्धिधारी मुनिका निरूपण है वहाँ मेरुगिरि आदिमें जाकर—तत्थ चेययाइं वंदईऐसा पाठ है. इसका अर्थ यह है कि - वहाँ चैत्योंकी वंदना करते हैं. और चैत्य नाम प्रतिमाका प्रसिद्ध है. तथा वे हठसे कहते हैं - चैत्य शब्दके ज्ञानादिक अनेक अर्थ होते हैं, इसलिये अन्य अर्थ है, प्रतिमाका अर्थ नहीं है. इससे पूछते हैं - मेरुगिरि नन्दीश्वर द्वीपमें जा-जाकर वहाँ चैत्य वन्दना की, सो वहाँ ज्ञानादिककी वन्दना करनेका अर्थ कैसे सम्भव है? ज्ञानादिककी वन्दना तो सर्वत्र सम्भव है. जो वन्दनायोग्य चैत्य वहाँ सम्भव हो और सर्वत्र सम्भव न हो वहाँ उसे वन्दना करनेका विशेष सम्भव है और ऐसा सम्भवित अर्थ प्रतिमा ही है. और चैत्य शब्दका मुख्य अर्थ प्रतिमा ही है, सो प्रसिद्ध है. इसी अर्थ द्वारा चैत्यालय नाम सम्भव है। उसे हठ करके किसलिये लुप्त करें?
तथानन्दीश्वरद्वीपादिकमेंजाकरदेवादिकपूजनादिक्रियाकरतेहैं,उसका व्याख्यान उनके जहाँ-तहाँ पाया जाता है. तथा लोकमें जहाँ-तहाँ अकृृत्रिम प्रतिमाका निरूपण है. सो वह रचना अनादि है, वह रचना भोग-कुतूहलादिके अर्थ तो है नहीं. और इन्द्रादिकोंके स्थानोंमें निष्प्रयोजन रचना सम्भव नहीं है. इसलिये इन्द्रादिक उसे देखकर क्तया करते हैं? या तो अपने मन्दिरोंमें निष्प्रयोजन रचना देखकर उससे उदासीन होते होंगे, वहाँ दु:खी होते होंगे, परन्तु यह सम्भव नहीं है. या अच्छी रचना देखकर विषयोंका पोषण करते होंगे, परन्तु अरहन्तकी मूर्ति द्वारा सम्यग्¹ष्िट अपना विषय पोषण करें यह भी सम्भव नहीं है. इसलिये वहाँ उनकी भक्ति आदि ही करते हैं, यही सम्भव है.
उनके सूर्याभदेवका व्याख्यान है। वहाँ प्रतिमाजीको पूजनेका विशेष वर्णन किया है. उसे गोपनेके अर्थ कहते हैं - देवोंका ऐसा ही कर्त्तव्य है. सो सच है, परन्तु कर्त्तव्यका तो फल होता ही होता है। वहाँ धर्म होता है या पाप होता है? यदि धर्म होता है तो अन्यत्र पाप होता था यहाँ धर्म हुआ। इसे औरोंके स¹श कैसे कहें? यह तो योग्य कार्य हुआ. और पाप होता है तो वहाँ—णमोत्थुणंका पाठ पढ़ा। सो पापके ठिकाने ऐसा पाठ किसलिये पढ़ा?
तथा एक विचार यहाँ यह आया कि -—णमोत्थुणंके पाठमें तो अरहन्तकी भक्ति है। सो प्रतिमाजीके आगे जाकर यह पाठ पढ़ा, इसलिये प्रतिमाजीके आगे जो अरहंत भक्तिकी क्रिया है वह करना युक्त हुई.
तथा वे ऐसा कहते हैं - देवोंके ऐसा कार्य है, मनुष्योंके नहीं है। क्तयोंकि मनुष्योंको प्रतिमा आदि बनाने में हिंसा होती है. तो उन्हींके शास्त्रोंमें ऐसा कथन है कि-द्रौपदी रानी प्रतिमाजीके पूजनादिक जैसे सूर्याभदेवने किये उसी प्रकार करने लगी। इसलिये मनुष्योंके भी ऐसा कार्य कर्त्तव्य है.
यहाँ एक यह विचार आया कि - चैत्यालय, प्रतिमा बनानेकी प्रवृत्ति नहीं थी तो द्रौपदीने किस प्रकार प्रतिमाका पूजन किया? तथा प्रवृत्ति थी तो बनानेवाले धर्मात्मा थे या पापी थे? यदि धर्मात्मा थे तो गृहस्थोंको ऐसा कार्य करना योग्य हुआ, और पापी थे तो वहाँ भोगादिकका प्रयोजन तो था नहीं, किसलिये बनाया? तथा द्रौपदीने वहाँ—णमोत्थुणं का पाठ किया व पूजनादि किया , सो कुतूहल किया या धर्म किया? यदि कुतूहल किया तो महापापिनी हुई. धर्ममें कुतूहल कैसा? और धर्म किया तो औरोंको भी प्रतिमाजीकी स्तुति-पूजा करना युक्त है.
तथा वे ऐसी मिथ्यायुक्ति बनाते हैं - जिस प्रकार इन्द्रकी स्थापनासे इन्द्रका कार्य सिद्ध नहीं है। उसी प्रकार अरहंत प्रतिमासे कार्य सिद्ध नहीं है. सो अरहंत किसीको भक्त मानकर भला करते हों तब तो ऐसा भी मानें। परन्तु वे तो वीतराग हैं. यह जीव भक्तिरूप अपने भावोंसे शुभफल प्राप्त करता है. जिस प्रकार स्त्रीके आकाररूप काष्ट-पाषाणकी मूर्ति देखकर वहाँ विकाररूप होकर अनुराग करे तो उसको पापबन्ध होगा। उसी प्रकार अरहंतके आकाररूप धातु-पाषाणादिककी मूर्ति देखकर धर्मबुद्धिसे वहाँ अनुराग करे तो शुभकी प्राप्ति कैसे न होगी? वहाँ वे कहते हैं - बिना प्रतिमा ही हम अरहंतमें अनुराग करके शुभ उत्पन्न करेंगे। तो इनसे कहते है - आकार देखनेसे जैसा भाव होता है वैसा परोक्ष स्मरण करनेसे नहीं होता। इसी से लोकमें भी स्त्रीके अनुरागी स्त्रीका चित्र बनाते हैं। इसलिये प्रतिमाके अवलम्बन द्वारा भक्ति विशेष होनेसे विशेष शुभकी प्राप्ति होती है.
फिर कोई कहे प्रतिमाको देखो, परन्तु पूजनादिक करनेका क्तया प्रयोजन है?
उत्तर :- जैसे कोई किसी जीवका आकार बनाकर घात करे तो उसे उस जीवकी हिंसा करने जैसा पाप होता है, व कोई किसीका आकार बनाकर द्वेषबुद्धिसे उसकी बुरी अवस्था करे तो जिसका आकार बनायाउसकी बुरी अवस्था करने जैसा फल होता है। उसी प्रकार अरहंतका आकार बनाकर धर्मानुरागबुद्धिसे पूजनादि करे तो अरहंतके पूजनादि करने जैसा शुभ(भाव)उत्पन्न होता है तथा वैसा ही फल होता है. अति अनुराग होनेपर प्रत्यक्ष दर्शन न होनेसे आकार बनाकर पूजनादि करते हैं. इस धर्मानुरागसे महापुण्य होता है.
तथा ऐसा कुतर्क करते हैं कि - जिसके जिस वस्तुका त्याग हो उसके आगे उस वस्तुका रखना हास्य करना है। इसलिये चंदनादि द्वारा अरहन्तकी पूजन युक्त नहीं है.
समाधान :- मुनिपद लेते ही सर्व परिग्रह त्याग किया था, केवलज्ञान होनेके पश्चात् तीर्थंकरदेवके समवशरणादि बनाये, छत्र-चँवरादि किये सो हास्य किया या भक्ति की? हास्य किया तो इन्द्र महापापी हुआ। सो बनता नहीं है. भक्ति की तो पूजनादिकमें भी भक्ति ही करते हैं. छद्मस्थके आगे त्याग की हुई वस्तु रखना हास्य करना है। क्तयोंकि उसके विक्षिप्तता हो आती है. केवलीके व प्रतिमाके आगे अनुरागसे उत्तम वस्तु रखनेका दोष नहीं है। उनके विक्षिप्तता नहीं होती. धर्मानुरागसे जीवका भला होता है.
फिर वे कहते हैं - प्रतिमा बनानेमें, चैत्यालयादि करानेमें, पूजनादि करानेमें हिंसा होती है, और धर्म अहिंसा है। इसलिये हिंसा करके धर्म माननेसे महापाप होता है। इसलिये हम इन कार्योंका निषेध करते हैं.
उत्तर :- उन्हींके शाास्त्रमें ऐसा वचन है :-
सुच्चा जाणइ कल्लाणं सुच्चा जाणइ पावगं .
उभयं पि जाणए सुच्चा जं सेय तं समायर॥१॥
यहाँ कल्याण, पाप और उभय - यह तीनों शाास्त्र सुनकर जाने, ऐसा कहा है. सो उभय तो पाप और कल्याण मिलनेसे होगा, सो ऐसे कार्यका भी होना ठहरा. वहाँ पूछते हैं - केवल धर्मसे तो उभय हल्का है ही, और केवल पापसे उभय बुरा है या भला है? यदि बुरा है तो इसमें तो कुछ कल्याणका अंश मिला है, पापसे बुरा कैसे कहें? भला है, तो केवल पापको छोड़कर ऐसे कार्य करना ठहरा. तथा युक्तिसे भी ऐसा ही सम्भव है. कोई त्यागी होकर मन्दिरादिक नहीं बनवाता है व सामयिकादिक निरवद्य कार्योंमें प्रवर्त्तता है। तो उन्हें छोड़कर प्रतिमादि कराना व पूजनादि करना उचित नहीं हैं परन्तु कोई अपने रहनेके लिए मकान बनाये, उससे तो चैत्यालयादि करानेवाला हीन नहीं है. हिंसा तो हुई, परन्तु उसके तो लोभ पापानुरागकी वृद्धि हुई और इसके लोभ छूटकर धर्मानुराग हुआ. तथा कोई व्यापारादि कार्य करे, उससे तो पूजनादि कार्य करना हीन नहीं है. वहाँ तो हिंसादि बहुत होते हैं, लोभादि बढ़ता है, पापहीकी प्रवृत्ति है. यहाँ हिंसादिक भी किंचित् होते हैं, लोभादिक घटते हैं और धर्मानुराग बढ़ता है. -इस प्रकार जो त्यागी न हों, अपने धनको पापमें खर्चते हों, उन्हें चैत्यालयादि बनवाना योग्य है. और जो निरवद्य सामायिकादि कार्योंमें उपयोगको न लगा सकें उनको पूजनादि करने का निषेध नहीं हैं.
फिर तुम कहोगे - निरवद्य सामायिकादि कार्य ही क्तयों न करें? धर्ममें काल लगाना, वहाँ ऐसे कार्य किसलिये करें?
उत्तर :- यदि शरीर द्वारा पाप छोड़ने पर ही निरवद्यपना हो, तो ऐसा ही करें। परन्तु परिणामोंमें पाप छूटने पर निरवद्यपना होता है. सो बिना अवलम्बन सामायिकादिमें जिसके परिणाम न लगें वह पूजनादि द्वारा वहाँ अपना उपयोग लगाता है. वहाँ नाना प्रकारकेआलम्बनद्वाराउपयोगलगजाताहै.यदिवहाँउपयोगकोनलगायेतो पापकार्योंमें उपयोग भटकेगा और उससे बुरा होगा। इसलिये वहाँ प्रवृत्ति करना युक्त है.
तुम कहते हो कि -—धर्मके अर्थ ंहिंसा करनेसे तो महापाप होता है, अन्यत्र हिंसा करनेसे थोड़ा पाप होता है। सो प्रथम तो यह सिद्धान्तका वचन नहीं है और युक्तिसे भी नहीं मिलता। क्तयोंकि ऐसा माननेसे तो - इन्द्र जन्मकल्याणकमें बहुत जलसे अभिषेक करता है, समवशरणमें देव पुष्पवृष्िट करना, चँवर ढालना इत्यादि कार्य करते हैं सो वे महापापी हुए.
यदि तुम कहोगे - उनका ऐसा ही व्यवहार है, तो क्रिया का फल तो हुए बिना रहता नहीं है. यदि पाप है तो इन्द्रादिक तो सम्यग्¹ष्िट हैं, ऐसा कार्य किसलिये करेंगे? और धर्म है तो किसलिये निषेध करते हो.
भला तुम्हीं से पूछते हैं - तीर्थंकरकी वन्दनाको राजादिक गये साधुकी वन्दनाको दूर भी जाते हैं, सिद्धान्त सुनने आदि कार्य करनेके लिये गमनादि करते हैं वहाँ मार्गमें हिंसा हुई. तथा साधर्मियोंको भोजन कराते हैं, साधुका मरण होने पर उसका संस्कार करते हैं, साधु होने पर उत्सव करते हैं इत्यादि प्रवृत्ति अब भी देखी जाती है। सो यहाँ भी हिंसा होती है। परन्तु यह कार्य तो धर्म के ही अर्थ हैं, अन्य कोई प्रयोजन नहीं है. यदि यहाँ महापाप होता है, तो पूर्व कालमें ऐसे कार्य किये उनका निषेध करो. और अब भी गृहस्थ ऐसा कार्य करते हैं, उनका त्याग करो. तथा यदि धर्म होता है तो धर्म के अर्थ हिंसा में महापाप बतलाकर किसलिये भ्रममें डालते हो?
इसलिये इस प्रकार मानना युक्त है - कि जैसे थोड़ा धन ठगाने पर बहुत
धन का लाभ हो तो वह कार्य करना योग्य है। उसी प्रकार थोड़े हिंसादिक पाप होनेपर बहुत धर्म उत्पन्न हो तो वह कार्य करना योग्य है. यदि थोड़े धन के लोभसे कार्य बिगाडे़ तो मूर्ख है। उसी प्रकार थोड़ी हिंसाके भय से बड़ा धर्म छोडे़ तो पापी ही होता है. तथा कोई बहुत धन ठगाये और थोड़ा धन उत्पन्न करे, व उत्पन्न नहीं करे तो वह मूर्ख है। उसी प्रकार बहुत हिंसादि द्वारा बहुत पाप उत्पन्न करे और भक्ति आदि धर्ममें थोड़ा प्रवर्ते व नहीं प्रवर्ते, तो वह पापी ही होता है. तथा जिस प्रकार बिना ठगाये ही धनका लाभ होने पर ठगाये तो मूर्ख है। उसी प्रकार निरवद्य धर्मरूप उपयोग होने पर सावद्यधर्ममें उपयोग लगाना योग्य नहीं है.
इस प्रकार अपने परिणामों की अवस्था देखकर भला हो वह करना। परन्तु एकान्त पक्ष कार्यकारी नहीं है. तथा अहिंसा ही केवल धर्मका अù नहीं है। रागादिकोंका घटना धर्मका मुख्य अù है. इसलिये जिस प्रकार परिणामोंमें रागादिक घटें वह कार्य करना.
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तथा गृहस्थोंको अणुव्रतादिकके साधन हुए बिना ही सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रोषध आदि क्रियाओंका मुख्य आचरण कराते हैं. परन्तु सामायिकतो राग-द्वेषरहित साम्यभाव होने पर होती है, पाठ मात्र पढ़नेसे व उठना-बैठना करनेसे ही तो होती नहीं है.
फिर कहोगे - अन्य कार्य करता उससे तो भला है? सो सत्य। परन्तु सामायिक पाठ में प्रतिज्ञा तो ऐसी करता है कि - मन-वचन-काय द्वारा सावद्यको न करूँगा, न कराऊँगा। परन्तु मन में तो विकल्प होता ही रहता है, और वचन-कायमें भी कदाचित् अन्यथा प्रवृत्ति होती है वहाँ प्रतिज्ञाभंग होती है. सो प्रतिज्ञाभंग करने से तो न करना भला है। क्तयोंकि प्रतिज्ञाभंग महापाप है.
फिर हम पूछते हैं - कोई प्रतिज्ञा भी नहीं करता और भषापाठ पढ़ता है, उसका अर्थ जानकर उसमें उपयोग रखता है. कोई प्रतिज्ञा करे उसे तो भलीभाँति पालता नहीं है और प्राकृतादिकके पाठ पढ़ता है। उसके अर्थका अपनेको ज्ञान नहीं है, बिना अर्थ जाने वहाँ उपयोग नहीं रहता तब उपयोग अन्यत्र भटकता है. ऐसे इन दोनोंमें विशेष धर्मात्मा कौन? यदि पहले को कहोगे, तो ऐसा ही उपदेश क्तयों नहीं देते? तथा दूसरे को कहोगे तो प्रतिज्ञाभंगकापापहुआवपरिणामोंकेअनुसारधर्मात्मापनानहींठहरा।परन्तुपाठादि करनेके अनुसार ठहरा.
इसलिये अपना उपयोग जिस प्रकार निर्मलहो वह कार्य करना. सध सके वह प्रतिज्ञा करना. जिसका अर्थ जाने वह पाठ पढ़ना. पद्धति द्वारा नाम रखाने में लाभ नहीं है.
तथा प्रतिक्रमण नाम पूर्वदोष निराकरण करनेका है। परन्तु—मिच्छामि दुक्तकडं़ इतना कहनेहीसे तो दुष्कृत मिथ्या नहीं होते। किये हुए दुष्कृत मिथ्या होने योग्य परिणाम होने पर ही दुष्कृत मिथ्या होते हैं। इसलिये पाठ ही कार्यकारी नहीं है.
तथा प्रतिक्रमण के पाठमें ऐसा अर्थ है कि - बारह व्रतादिकमें जो दुष्कृत लगे हों वे मिथ्या हों। परन्तु व्रत धारण किये बिना ही उनका प्रतिक्रमण करना कैसे सम्भव है? जिसके उपवास न हो, वह उपवासमें लगे दोषका निराकरण करे तो असम्भवपना होगा.
इसलिये यह पाठ पढ़ना किस प्रकार बनता है?
तथा प्रोषधमें भी सामायिकवत् प्रतिज्ञा करके पालन नहीं करते। इसलिये पूर्वोक्त ही दोष है. तथा प्रोषध नाम तो पर्वका है। सो पर्वके दिन भी कितने कालतक पापक्रिया करता है, पश्चात् प्रोषधधारी होता है. जितने काल बने उतने काल साधन करने का तो दोष नहीं है। परन्तु प्रोषधका नाम करे सो युक्त नहीं है. सम्पूर्ण पर्वमें निरवद्य रहने पर ही प्रोषध होता है. यदि थोड़े भी काल से प्रोषध नाम हो तो सामायिकको भी प्रोषध कहो, नहीं तो शास्त्रमें प्रमाण बतलाओ कि - जघन्य प्रोषधका इतना काल है. यह तो बड़ा नाम रखकर लोगोंको भ्रम में डालने का प्रयोजन भासित होता है.
तथा आखड़ी लेने का पाठ तो अन्य कोई पढ़ता है, अंगीकार अन्य करता है. परन्तु पाठ में तो—मेरे त्याग हैऐसा वचन है। इसलिये जो त्याग करे उसीको पाठ पढ़ना चाहिये. यदि पाठ न आये तो भाषा ही से कहे। परन्तु पद्धति के अर्थ यह रीति है.
तथा प्रतिज्ञा ग्रहण करने-कराने की तोमुख्यता है और यथाविधि पालने की शिथिलता है, व भााव निर्मल होनेका विवेक नहीं है. आर्त्तपरिणामोंसे व लोभादिकसे भी उपवासादि करके वहाँ धर्म मानता है। परन्तु फल तो परिणामोंसे होता है.
इत्यादि अनेक कल्पित बातें करते हैं। सो जैन धर्म में सम्भव नहीं हैं.
इसप्रकारयहजैनमेंश्वेताम्बरमतहै।वहभीदेवादिककावतत्त्ववोंकाव मोक्षमार्गादिका अन्यथा निरूपण करता है। इसलिये मिथ्यादर्शनादिकका पोषक है सो त्याज्य है.
सच्चे जिन धर्मका स्वरूप आगे कहते हैं। उसके द्वारा मोक्षमार्गमें प्रवर्त्तना योग्य है. वहाँ प्रवर्त्तने से तुम्हारा कल्याण होगा.
-इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक शास्त्रमें अन्यमत निरूपक
पाँचवा अधिकार समाप्त हुआ ॥५॥

छठवाँ अधिकार

कुदेव, कुगुरु, और कुधर्मका प्रतिषेध

दोहा - मिथ्या देवादिक भजें, हो हैमिथ्याभाव .
तज तिनकों सांचे भजो, यह हित-हेत-उपाव ..
अर्थ :- अनादिसे जीवोंके मिथ्यादर्शनादिकभाव पाये जाते हैं, उनकी पुष्टताका कारण कुदेव-कुगुरु-कुधर्म सेवन है। उसका त्याग होनेपर मोक्षमार्गमें प्रवृत्ति होती है। इसलिये इनका निरूपण करते हैं.

कुदेवका निरूपण और उसके श्रद्धानादिका निषेध

वहाँ जो हितके कर्त्ता नहीं हैं और उन्हें भ्रमसे हितका कर्त्ता जानकर सेवन करें सो कुदेव हैं.
उनका सेवन तीन प्रकारके प्रयोजनसहित करते हैं. कहीं तो मोक्षका प्रयोजन है, कहीं परलोकका प्रयोजन है, और कहीं इसलोकका प्रयोजन है। सो प्रयोजन तो सिद्ध नहीं होते, कुछ विशेष हानि होती है। इसलिये उनका सेवन मिथ्याभाव है. वह बतलाते हैं :-
अन्यमतोंमें जिनके सेवनसे मुक्तिका होना कहा है, उन्हें कितने ही जीव मोक्षके अर्थ सेवन करते हैं, परन्तु मोक्ष होता नहीं है. उनका वर्णन पहले अन्यमत अधिकारमें कहा ही है. तथा अन्यमत में कहे देवोंको कितने ही -—परलोकमें सुख होगा दु:ख नहीं होगा- ऐसे प्रयोजनसहित सेवन करते हैं. सो ऐसी सिद्धि तो पुण्य उपजाने और पाप न उपजानेसे होती है। परन्तु आप तो पाप उपजाता है और कहता है इरश्वर हमारा भला करेगा, तो वहाँ अन्याय ठहरा। क्तयोंकि किसीको पापका फल दे, किसीको न दे ऐसा तो है नहीं. जैसे अपने परिणाम करेगा वैसा ही फल पायेगा। ईश्वर किसीका बुरा-भला करनेवाला नहीं हैं.
तथा उन देवोंका सेवन करते हुए उन देवोंका तो नाम देते हैं और अन्य जीवोंकी हिंसा करते हैं तथा भोजन, नृत्यादि द्वारा अपनी इन्द्रियोंका विषय पोषण करते हैं। सो पापपरिणामोंका फल तो लगे बिना रहेगा नहीं. हिंसा, विषय-कषायोंको सब पाप कहते हैं और पापका फल भी सब बुरा ही मानते हैं। तथा कुदेवोंके सेवनमें हिंसा-विषयादिकहीका अधिकार है। इसलिये कुदेवोंके सेवनसे परलोकमें भला नहीं होता. व्यन्तरादिका स्वरूप और उनके पूजनेका निषेध
तथा बहुतसे जीव इस पर्यायसम्बन्धी, शत्रुनाशादिक व रोगादिक मिटाने, धनादिककी व पुत्रादिककी प्राप्ति, इत्यादि दु:ख मिटाने व सुख प्राप्त करनेके अनेक प्रयोजनसहित कुदेवादिका सेवन करते हैं। हनुमानादिकको पूजते हैं। देवियोंको पूजते हैं। गनगौर, सांझी आदि बनाकर पूजते हैं। चौथ, शीतला, दहाड़ी आदि को पूजते हैं। भूत-प्रेत, पितर, व्यन्तरादिककोपूजतेहैं।सूर्य-चन्दक्रमा,शनिश्चरादिज्योतिषियोंकोपूजतेहैं।पीर- पैगंबरादिको पूजते हैं। गाय, घोड़ा आदि तिर्यंचोंको पूजते हैं। अग्नि-जलादिकको पूजते हैं। शस्त्रादिकको पूजते हैं। अधिक क्तया कहें, रोड़ा इत्यादिकको भी पूजते हैं.
सो इस प्रकार कुदेवादिका सेवन मिथ्या¹ष्िटसे होता है। क्तयोंकि प्रथम तो वह जिनका सेवन करता है उनमेंसे कितने ही तो कल्पनामात्र देव हैं। इसलिये उनका सेवन कार्यकारी कैसे होगा? तथा कितने ही व्यन्तरादिक हैं। सो वे किसीका भला-बुरा करनेको समर्थ नहीं हैं. यदि वे ही समर्थ होगें तो वे ही कर्त्ता ठहरेंगे। परन्तु उनके करनेसे कुछ होता दिखायी नहीं देता। प्रसन्न होकर धनादिक नहीं दे सकते और द्वेषी होकर बुरा नहीं कर सकते.
यहाँ कोई कहे - दु:ख देते तो देखे जाते हैं, माननेसे दु:ख देना रोक देते हैं?
उत्तर :- इसके पापका उदय हो, तब उनके ऐसी ही कुतूहलबुद्धि होती है, उससे वे चेष्टा करते हैं, चेष्टा करनेसे यह दु:खी होता है. तथा वे कुतूहलसे कुछ कहें और यह उनका कहा हुआ न करे, तो वे चेष्टा करते रुक जाते हैं। तथा इसे शिथिल जानकर कुतूहल करते रहते हैं. यदि इसके पुण्यका उदय हो तो कुछ कर नहीं सकते.
ऐसा भी देखा जाता है - कोई जीव उनको नहीं पूजते, व उनकी निन्दा करते हैं व वे भी उनसे द्वेष करते है, परन्तु उसे दु:ख नहीं दे सकते. ऐसा भी कहते देखे जाते हैं कि - अमुक हमको नहीं मानता, परन्तु उसपर हमारा कोई वश नहीं चलता. इसलिये व्यंतरादिक कुछ करनेमें समर्थ नहीं हैं, इसके पुण्य-पापहीसे सुख-दु:ख होता है। उनके मानने-पूजनेसे उलटा रोग लगता है, कुछ कार्यसिद्धि नहीं होती.
तथा ऐसा जानना - जो कल्पित देव हैं उनका भी कहीं अतिशय, चमत्कार देखा जाता है, वह व्यन्तरादिक द्वारा किया होता है. कोई पूर्व पर्यायमें उनका सेवक था, पश्चात् मरकर व्यन्तरादि हुआ, वहीं किसी निमित्तसे ऐसी बुद्धि हुई, तब वह लोकमें उनको सेवन करनेकी प्रवृत्ति करानेके अर्थ कोई चमत्कार दिखाता है. जगत भोला। किंचित् चमत्कार देखकर उस कार्यमें लग जाता है. जिस प्रकार जिनप्रतिमादिकका भी अतिशय होना सुनते व देखते हैं सो जिनकृत नहीं है, जैनी व्यन्तरादिक होते हैं। उसी प्रकार कुदेवोंका कोई चमत्कार होता है, वह उनके अनुचर व्यन्तरादिक द्वारा किया होता है ऐसा जानना.
तथा अन्यमतमें परमेश्वरने भक्तोंकी सहाय की व प्रत्यक्ष दर्शन दिये इत्यादि कहते हैं। वहाँ कितनी ही तो कल्पित बातें कही हैं. कितने ही उनके अनुचर व्यन्तरादिक द्वारा किये गयेकार्योंकोपरमेश्वरकेकियेकहतेहैं.यदिपरमेश्वरकेकियेहोंतोपरमेश्वरतो त्रिकालज्ञ है, सर्वप्रकार समर्थ है। भक्तको दु:ख किसलिये होने देगा? तथा आज भी देखते हैं कि - म्लेच्छ आकर भक्तोंको उपद्रव करते हैं, धर्म-विध्वंस करते हैं, मूर्तिको वि¼न करते हैं. यदि परमेश्वरको ऐसे कार्योंका ज्ञान न हो, सर्वज्ञपना नहीं रहेगा. जाननेके पश्चात् भी सहाय न करे तो भक्तवत्सलता गई और सामथ्र्यहीन हुआ. तथा साक्षीभूत रहता है तो पहले भक्तोंको सहाय की कहते हैं वह झूठ है। क्तयोंकि उसकी तो एकसी वृत्ति है.
फिर यदि कहोगे - वैसी भक्तित नहीं है। तो म्लेच्छोंसे तो भले हैं, और मूर्ति आदि तो उसीकी स्थापना थी, उसे तो वि¼न नहीं होने देना था? तथा म्लेच्छ-पापियों का उदय होता है सो परमेश्वरका किया है या नहीं? यदि परमेश्वरका किया है। तो निन्दकोंको सुखी करता है, भक्ततोंको दु:ख देनेवाले पैदा करता है, वहाँ भक्ततवत्सलपना कैसे रहा? और परमेश्वरका किया नहीं होता, तो परमेश्वर सामथ्र्यहीन हुआ। इसलिये परमेश्वरकृत कार्य नहीं है. कोई अनुचर व्यन्तरादिक ही चमत्कार दिखलाता है - ऐसा ही निश्चय करना.
यहाँ कोई पूछे कि - कोई व्यन्तर अपना प्रभुत्व कहता है, अप्रत्यक्षको बतला देता है, कोई कुस्थान निवासादिक बतलाकर अपनीहीनताकहताहै,पूछतेहैंसोनहीं बतलाता, भ्रमरूप वचन कहता है, औरोंको अन्यथा परिणमित करता है, दु:ख देता है - इत्यादि विचित्रता किस प्रकार है?
उत्तर:-व्यन्तरोंमेंप्रभुत्वकीअधिकता-हीनतातोहै,परन्तुजोकुस्थानमें निवासादिक बतलाकर हीनता दिखलाते हैं वहतोकुतूहलसे वचनकहते हैं.व्यन्तर बालककी भाँति कुतूहल करते रहते हैं. जिस प्रकार बालक कुतूहल द्वारा अपनेको हीन दिखलाता है, चिढ़ाता है, गाली सुनाता है, ऊँचे स्वरसे रोता है, बादमें हँसने लग जाता है। उसी प्रकार व्यन्तर चेष्टा करते हैं. यदि कुस्थानहीके निवासी हों तो उत्तमस्थानमें आते है। वहाँ किसके लानेसे आते है? अपने आप आते हैं तो अपनी शक्तित होनेपर कुस्थानमें किसलिये रहते हैं? इसलिये इनका ठिकाना तो जहाँ उत्पन्न होते हैं वहाँ इस पृथ्वीके नीचे व ऊपर है सो मनोज्ञ है. कुतूहलके लिए जो चाहें सो कहते हैं. यदि इनको पीड़ा होती हो तो रोते-रोते हँसने कैसे लग जाते हैं?
इतना है कि - मंत्रादिककी अ®चत्यशक्तित है। सो किसी सच्चे मन्त्रके निमित्त- नैमित्तिक सम्बन्ध हो तो उसके ®कचित् गमनादि नहीं हो सकते, व ®कचित् दु:ख उत्पन्न होता है, व कोई प्रबल उसे मना करे तब रह जाता है व आप ही रह जाता है। - इत्यादि मन्त्रकी शक्तित है, परन्तु जलाना आदि नहीं होता. मन्त्रवाले जलाया कहते है। वह फिर प्रगट हो जाता है, क्तयोंकि वैकिक्रयिक शरीरका जलाना आदि सम्भव नहीं है.
व्यन्तरोंके अवधिज्ञान किसीको अल्प क्षेत्र-काल जाननेका है, किसीको बहुत है. वहाँ उनके इच्छा हो और अपनेको ज्ञान बहुत हो तो अप्रत्यक्षको पूछने पर उसका उत्तर देते हैं. अल्प ज्ञान हो तो अन्य महत् ज्ञानीसे पूछ आकर जवाब देते हैं. अपनेको अल्प ज्ञान हो व इच्छानहोतोपूछनेपरउसकाउत्तरनहींदेते-ऐसाजानना.अल्पज्ञानवाले व्यन्तरादिकको उत्पन्न होनेके पश्चात् कितने काल ही पूर्वजन्मका ज्ञान हो सकता है, फिर उसका स्मरणमात्र रहता है, इसलिये वहाँ इच्छा द्वारा आप कुछ चेष्टा करें तो करते हैं, पूर्व जन्मकी बातें कहते हैं। कोई अन्य बात पूछे तो अवधिज्ञान तो थोड़ा है, बिना जाने किस प्रकार कहें? जिसका उत्तर आप न दे सकें व इच्छा न हो, वहाँ मान कुतूहलादिकसे उत्तर नहीं देते व झूठ बोलते हैं - ऐसा जानना.
देवोंमें ऐसी शक्तित है कि - अपने व अन्यके शरीरको व पुद्गल स्कन्धको जैसी इच्छा हो तदनुसार परिणमित करते हैं। इसलिये नानाआकारादिरूप आप होते हैं व अन्य नाना चरित्र दिखाते हैं. अन्य जीवके शरीरको रोगादियुक्तत करते हैं.
यहाँ इतना है कि - अपने शरीरको व अन्य पुद्गल स्कन्धोंको जितनी शक्तित हो उतने ही परिणमित कर सकते है। इसलिये सर्वकार्य करनेकी शक्तित नहीं है. अन्य जीवके शरीरादिको उसके पुण्य-पाप के अनुसार परिणमित कर सकते हैं. उसके पुण्यका उदय हो तो आप रोगादिरूप परिणमित नहीं कर सकता, और पापउदय हो तो उसका इष्ट कार्य नहीं कर सकता.
इस प्रकार व्यन्तरादिककी शक्तित जानना.
यहाँ कोई कहे - इतनी शक्ति जिनमें पायी जाये उनके मानने-पूजनेमें क्तया दोष?
उत्तर :- अपने पापका उदय होनेसे सुख नहीं दे सकते, पुण्यका उदय होनेसे दु:ख नहीं दे सकते। तथा उनको पूजनेसे कोई पुण्यबन्ध नहीं होता, रागादिककी वृद्धि होनेसे पापही होता है। इसलिये उनका मानना-पूजना कार्यकारी नहीं है, बुरा करनेवाला है. तथा व्यन्तरादिक मनवाते हैं, पुजवाते हैं - वह कुतूहल करते हैं। कुछ विशेष प्रयोजन नहीं रखते. जो उनको माने-पूजे, उसीसे कुतूहल करते रहते हैं। जो नहीं मानते-पूजते उनसे कुछ नहीं कहते. यदि उनको प्रयोजन ही हो, तो न मानने-पूजनेवालेको बहुत दु:खी करें। परन्तु जिनके न मानने-पूजनेका निश्चय है, उससे कुछ भी कहते दिखायी नहीं देते. तथा प्रयोजन तो क्षुधादिककी पीड़ा हो तब हो। परन्तु वह तो उनके व्यक्तत होती नहीं है. यदि हो तो उनके अर्थ नैवेद्यादिक देते हैं, उसे ग्रहण क्तयों नहीं करते?व औरोंको भोजनादि करानेको ही क्तयों कहते हैं? इसलिये उनके कुतूहलमात्र किक्रया है. अपनेमें उनके कुतूहलका स्थान होनेपर दु:ख होगा, हीनता होगी। इसलिये उनको मानना-पूजना योग्य नहीं है.
तथा कोई पूछे कि व्यन्तर ऐसा कहते हैं - गया आदिमें पिंडदान करो तो हमारी गति होगी, हम फिर नहीं आयेंगे. सो क्तया है?
उत्तर :- जीवोंके पूर्वभवका संस्कार तो रहता ही है. व्यन्तरोंको भी पूर्वभवके स्मरणादिसे विशेष संस्कार है। इसलिये पूर्वभव में ऐसी ही वासना थी - गयादिकमें पिंड- दानादि करनेपर गति होती है, इसलिये ऐसे कार्य करनेको कहते हैं. यदि मुसलमान आदि मरकर व्यन्तर होते हैं, वे तो ऐसा नहीं कहते, वे तो अपने संस्काररूप ही वचन कहते हैं। इसलिये सर्व व्यन्तरोंकी गति उसी प्रकार होती हो तो सभी समान प्रार्थना करें। परन्तु ऐसा नहीं है. ऐसा जानना.
इस प्रकार व्यन्तरादिकका स्वरूप जानना.
तथासूर्य,चन्दक्रमा,ग्रहादिकज्योतिषीहैं।उनकोपूजतेहैंवहभीभ्रमहै. सूर्यादिककोपरमेश्वरकाअंशमानकरपूजतेहैं,परन्तुउसकेतोएकप्रकाशकीही अधिकता भासित होती है। सो प्रकाशवान्् तो अन्य रत्नादिक भी होते है। अन्य कोई ऐसा लक्षण नहीं है जिससे उसे परमेश्वरका अंश मानें. तथा चन्दक्रमादिकको धनादिककी प्राप्तिके अर्थपूजतेहैं। परन्तुउनकेपूजनसेही धन होता हो तोसर्व दरिद्रीइसकार्यको करें, इसलिये यह मिथ्याभाव हैं. तथा ज्योतिषके विचारसे बुरे ग्रहादिक आनेपर उनकी पूजनादि करते हैं, इसके अर्थ दानादिक देते हैं। सो जिस प्रकार हिरनादिक स्वयमेव गमनादिक करते हैं, और पुरूषके दायें-बायें आने पर सुख-दु:ख होनेके आगामी ज्ञानको कारण होते हैं, कुछ सुख-दु:ख देनेको समर्थ नहीं हैं। उसी प्रकार ग्रहादिक स्वयमेव गमनादिक करते हैं, और प्राणीके यथासम्भव योगको प्राप्त होनेपर सुख-दु:ख होनेके आगामी ज्ञानको कारण होते हैं, कुछ सुख-दु:ख देनेको समर्थ नहीं हैं. कोई तो उनका पूजनादि करते हैं उनके भी इष्ट नहीं होता। कोई नहीं करता उसके भी इष्ट हंोता है। इसलिये उनका पूजनादि करना मिथ्याभाव है.
यहाँ कोई कहे - देना तो पुण्य है सो भला ही है?
उत्तर :- धर्मके अर्थ देना पुण्य है. यह तो दु:खके भयसे व सुखके लोभसे देते हैं, इसलिये पाप ही है.
इत्यादि अनेक प्रकारसे ज्योतिषी देवोंको पूजते हैं सो मिथ्या है.
तथा देवी-दहाड़ी आदि हैं। वे कितनी ही तो व्यन्तरी व ज्योतिषिनी हैं, उनका अन्यथा स्वरूप मानकर पूजनादि करते हैं. कितनी ही कल्पित हैं। सो उनकी कल्पना करके पूजनादि करते हैं.
इस प्रकार व्यन्तरादिकके पूजनेका निषेध किया. क्षेत्रपाल, पद्मावती आदि पूजनेका निषेध
यहाँ कोई कहे - क्षेत्रपाल, दहाड़ी, पद्मावती आदि देवी, यक्ष-यक्षिणी आदि जो जिनमतका अनुसरण करते हैं उनके पूजनादि करनेमें दोष नहीं है?
उत्तर :- जिनमतमें संयम धारण करनेसे पूज्यपना होता है। और देवोंके संयम होता ही नहीं. तथा इनको सम्यक्तत्वी मानकर पूजते हैं सो भवनत्रिकमें सम्यक्तत्वकी भी मुख्यता नहीं है. यदि सम्यक्तत्वसे ही पूजते हैं तो सर्वार्र्थसिद्धिके देव, लौकान्तिक देव उन्हें ही क्तयों न पूजे? फिर कहोगे - इनके जिनभक्तित विशेष है। सो भक्तितकी विशेषता सौधर्म इन्दक्रके भी है, वह सम्यग्¹ष्िट भी है। उसे छोड़कर इन्हें किसलिये पूजें? फिर यदि कहोगे - जिस प्रकारराजाकेप्रतिहारादिकहैं,उसीप्रकारतीर्थंकरकेक्षेत्रपालादिकहैं।परन्तु समवसरणादिमें इनका अधिकार नहीं है, यह तो झूठी मान्यता है. तथा जिस प्रकार प्रतिहारादिकके मिलाने पर राजासे मिलते हैं। उसी प्रकार यह तीर्थंकरसे नहीं मिलाते. वहाँ तो जिसके भक्तित हो वही तीर्थंकरके दर्शनादिक करता है, कुछ किसीके आधीन नहीं है.
तथा देखो अज्ञानता आयुधादि सहित रौद्रस्वरूप है जिनका, उनकी गा-गाकर भक्तित करते हैं. सो जिनमतमें भी रौद्ररूप पूज्य हुआ तो यह भी अन्य मतके ही समान हुआ. तीव्र मिथ्यात्वभावसे जिनमतमें भी ऐसी विपरीत प्रवृत्तिका मानना होता है.
इस प्रकार क्षेत्रपालादिकको भी पूजना योग्य नहीं है.
तथा गाय, सर्पादि तिर्यंच हैं वे प्रत्यक्ष ही अपनेसे हीन भासित होते हैं। उनका तिरस्कारादि कर सकते हैं, उनकी ®नद्यदशा प्रत्यक्ष देखी जाती है. तथा वृक्ष, अग्नि, जलादिक स्थावर हैं। वे तिर्यंचोंसे भी अत्यन्त हीन अवस्थाको प्राप्त देखे जाते हैं. तथा शस्त्र, दवात आदि अचेतन हैं। वे सर्वशक्तितसे हीन प्रत्यक्ष भासित होते हैं, उनमें पूज्यपने का उपचार भी सम्भव नहीं है. - इसलिये इनका पूजना महा मिथ्याभाव है. इनको पूजनेसे प्रत्यक्ष व अनुमान द्वारा कुछ भी फलप्राप्ति भासित नहीं होती। इसलिये इनको पूजना योग्य नहीं है.
इस प्रकार सर्व ही कुदेवोंको पूजना-मानना निषिद्ध है.
देखो तो मिथ्यात्वकी महिमा लोकमें तो अपनेसे नीचेको नमन करनेमें अपनेको ®नद्य मानते हैं, और मोहित होकर रोड़ों तकको पूजते हुए भी ®नद्यपना नहीं मानते. तथा लोकमें तो जिससे प्रयोजन सिद्ध होता जाने, उसीकी सेवा करते हैं और मोहित होकर—कुदेवोंसे मेरा प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा- ऐसा बिना विचारे ही कुदेवोंका सेवन करते हैं. तथा कुदेवोंका सेवन करते हुए हजारों विध्न होते हैं उन्हें तो गिनता नहीं है और किसी पुण्यके उदयसे इष्टकार्य होजाये तो कहता है - इसके सेवनसे यह कार्य हुआ. तथा कुदेवादिकका सेवन किये बिना जो इष्ट कार्य हों, उन्हें तो गिनता नहीं है और कोई अनिष्ट हो जाये तो कहता है - इसका सेवन नहीं किया इसलिये अनिष्ट हुआ. इतना नहीं विचारता कि - इन्हींके आधीन इष्ट-अनिष्ट करना हो तो जो पूजते हैं उनके इष्ट होगा, नहीं पूजते उनके अनिष्ट होगा। परन्तु ऐसा तो दिखायी नहीं देता. जिस प्रकार किसीके शीतलाको बहुत मानने पर भी पुत्रादि मरते देखे जाते हैं, किसीके बिना माने भी जीते देखे जाते हैं। इसलिये शीतलाका मानना ®कचित् कार्यकारी नहीं है.
इसी प्रकार सर्व कुदेवोंका मानना ®कचित् कार्यकारी नहीं है.
यहाँ कोई कहे - कार्यकारी नहीं है तो न हो, उनके मानने से कुछ बिगाड़ भी तो नहीं होता?
उत्तर :- यदिबिगाड़नहोतो हमकिसलिये निषेध करें?परन्तुएक तो मिथ्यात्वादि ¹ढ़ होनेसे मोक्षमार्ग दुर्लभ हो जाता है, यह बड़ा बिगाड़ है। और दूसरे पापबंध होनेसे आगामी दु:ख पाते हैं, यह बिगाड़ है.
यहाँ पूछे कि - मिथ्यात्वादिभाव तो अतत्त्वव-श्रद्धानादि होनेपर होते हैं और पापबंध खोटे(बुरे)कार्य करनेसे होता है। सो उनके माननेसे मिथ्यात्वादिक व पापबंध किस प्रकार होंगे?
उत्तर :- प्रथम तो परद्रव्योंको इष्ट-अनिष्ट मानना ही मिथ्या है, क्तयोंकि कोई द्रव्य किसीका मित्र-शत्रु है नहीं. तथा जो इष्ट-अनिष्ट पदार्थ पाये जाते हैं उसका कारण पुण्य-पापहै।इसलियेजैसेपुण्यबन्धहो,पापबन्धनहो।वहकरना.तथायदि कर्मउदयका भी निश्चय न हो और इष्ट-अनिष्टके बाह्य कारणोंके संयोग-वियोगका उपाय करे। परन्तु कुदेवको माननेसे इष्ट-अनिष्ट बुद्धि दूर नहीं होती, केवल वृद्धिको प्राप्त होती है। तथा उससे पुण्यबंध भी नहीं होता, पापबन्ध होता है. तथा कुदेव किसीको धनादिक देते या छुड़ा लेते नहीं देखे जाते, इसलिये ये बाह्यकारण भी नहीं हैं. इनकी मान्यता किस अर्थ की जाती है? जब अत्यन्त भ्रमबुद्धि हो, जीवादि तत्त्ववोंके श्रद्धान-ज्ञानका अंश भी न हो, और राग-द्वेषकी अति तीव्रता हो। तब जो कारण नहीं हैं उन्हें भी इष्ट-अनिष्टका कारण मानते हैं, तब कुदेवोंकी मान्यता होती है.
ऐसे तीव्र मिथ्यात्वादि भाव होनेपर मोक्षमार्ग अति दुर्लभ हो जाता है.

कुगुरूका निरूपण और उसके श्रद्धानादिकका निषेध

आगे कुगुरूके श्रद्धानादिकका निषेध करते हैं :-
जो जीव विषय-कषायादि अधर्मरूप तो परिणमित होते हैं, और मानादिकसे अपनेको धर्मात्मा मानते हैं, धर्मात्माके योग्य नमस्कारादि किक्रया कराते हैं, अथवा ®कचित् धर्मका कोई अंग धारण करके बड़े धर्मात्मा कहलाते हैं, बड़े धर्मात्मा योग्य किक्रया कराते हैं - इस प्रकार धर्मका आश्रय करके अपनेको बड़ा मनवाते हैं, वे सब कुगुरू जानना। क्तयोंकि धर्मपद्धतिमें तो विषय-कषायादि छूटनेपर जैसे धर्मको धारण करे वैसा ही अपना पद मानना योग्य है. कुलादि अपेक्षा गुरूपनेका निषेध
वहाँ कितने ही तो कुल द्वारा अपनेको गुरू मानते हैं. उनमें कुछ ब्राह्मणादिक तो कहते हैं - हमारा कुल ही ऊँचा है, इसलिये हम सबके गुरू हैं. परन्तु कुलकी उच्चता तो धर्मसाधनसे है.यदि उच्चकुलमें उत्पन्न होकर हीनआचरण करे तो उसे उच्च कैसे मानें? यदि कुलमें उत्पन्न होनेसे ही उच्चपना रहे, तो मांसभक्षणादि करने पर भी उसे उच्च ही मानो। सो वह बनता नहीं है. भारत ग्रन्थमें भी अनेक ब्राह्मण कहे हैं. वहाँ—जो ब्राह्मण होकर चांडाल कार्य करे, उसे चांडाल ब्राह्मण कहना- ऐसा कहा है. यदि कुलहीसे उच्चपना हो तो ऐसी हीन संज्ञा किसलिये दी है?
तथा वैष्णवशास्त्रोंमें ऐसा भी कहते हैं - वेदव्यासादिक मछली आदिसे उत्पन्न हुए हैं. वहाँ कुलका अनुकक्रम किस प्रकार रहा? तथा मूल उत्पत्ति तो ब्रह्मासे कहते हैं। इसलिये सबका एक कुल है, भिन्न कुल कैसे रहा? तथा उच्चकुलकी स्त्रीके नीचकुलके पुरूषसे व नीचकुलकी स्त्रीके उच्चकुलके पुरूषसे संगम होनेसे सन्तति होती देखी जाती है। वहाँ कुलका प्रमाण किस प्रकार रहा? यदि कदाचित् कहोगे - ऐसा है तो उच्च-नीच कुलके विभाग किसलिये मानते हो? सो लौकिक कार्योंमें असत्य प्रवृत्ति भी सम्भव है, धर्मकार्यमें तो असत्यता सम्भव नहीं है। इसलिये धर्मपद्धतिमें कुल अपेक्षा महन्तपना सम्भव नहीं है. धर्मसाधनहीसेमहन्तपनाहोताहै.ब्राह्मणादिकुलोंमेंमहन्तताहैसोधर्मप्रवृत्तिसेहै। धर्मप्रवृत्तिको छोड़कर हिंसादि पापमें प्रवर्तनेसे महन्तपना किस प्रकार रहेगा?
तथा कोई कहते हंै कि - हमारे बड़े भक्त हुए हैं, सिद्ध हुए हैं, धर्मात्मा हुए हैं। हम उनकी सन्ततिमें हैं, इसलिए हम गुरु हैं. परन्तु उन बड़ोंके बड़े तो ऐसे उत्तम थे नहीं। यदि उनकीसन्ततिमेंउत्तमकार्यकरनेसेउत्तममानतेहोतोउत्तमपुरूषकीसन्ततिमेंजो उत्तमकार्य न करे, उसे उत्तम किसलिये मानते हो? शास्त्रोंमें व लोकमें यह प्रसिद्ध है कि पिता शुभकार्य करके उच्चपद प्राप्त करता है, पुत्र अशुभकार्य करके नीचपदको प्राप्त करता है। पिता अशुभ कार्य करके नीचपदको प्राप्त करता है, पुत्र शुभकार्य करके उच्चपदको प्राप्त करता है. इसलिये बड़ोंकी अपेक्षा महन्त मानना योग्य नहीं है.
इस प्रकार कुलद्वारा गुरुपना मानना मिथ्याभाव जानना.
तथा कितने ही पट्ट द्वारा गुरुपना मानते हैं. पूर्वकालमें कोई महन्त पुरुष हुआ हो, उसकी गादीपर जो शिष्य-प्रतिशिष्य होते आये हों, उनमें उस महत्पुरुष जैसे गुण न होने पर भी गुरुपना मानते हैं. यदि ऐसा ही हो तो उस गादीमें कोई परस्त्रीगमनादि महापाप कार्य करेगा वह भी धर्मात्मा होगा, सुगतिको प्राप्त होगा। परन्तु यह सम्भव नहीं है. और वह पापी है तो गादीका अधिकार कहाँ रहा?जो गुरुपद योग्य कार्य करे वही गुरु है.
तथा कितने ही पहले तो स्त्री आदिके त्यागी थे। बाद में भ्रष्ट ंहोकर विवाहादि कार्य करके गृहस्थ हुए, उनकी सन्तति अपनेको गुरु मानती है। परन्तु भ्रष्ट होनेके बाद गुरुपना किस प्रकार रहा? अन्य गृहस्थोंके समान यह भी हुए. इतना विशेष हुआ कि यह भ्रष्ट होकर गृहस्थ हुए। इन्हें मूल गृहस्थधर्मी गुरु कैसे मानें ?
तथा कितने ही अन्य तो सर्व पापकार्य करते हैं, एक स्त्रीसे विवाह नहीं करते और इसी अंगद्वारा गुरुपना मानते हैं. परन्तु एक अब्रह्म ही तो पाप नहीं है, हिंसा परिग्रहादिक भीपापहै।उन्हेंकरतेहुएधर्मात्मा-गुरुकिसप्रकारमानें?तथावहधर्मबुद्धिसे विवाहादिकका त्यागी नहीं हुआ हैै। परन्तु किसी आजीविका व लज्जा आदि प्रयोजनके लिये विवाह नहीं करता. यदि धर्मबुद्धि होती तो हिंसादिक किसलिए बढ़ाता? तथा जिसके धर्मबुद्धि नहीं है उसके शीलकी भी ¹ढ़ता नहीं रहती, और विवाह नहीं करता तब परस्त्री गमनादि महापाप उत्पन्न करता है. ऐसी किक्रया होनेपर गुरुपना मानना महा भ्रष्टबुद्धि है.
तथा कितने ही किसी प्रकारका भेष धारण करनेसे गुरुपना मानते हैं। परन्तु भेष धारण करनेसे कौनसा धर्म हुआ कि जिससे धर्मात्मा-गुरु मानें? वहाँ कोई टोपी लगाते हैं, कोई गुदड़ी रखते हैं, कोई चोला पहिनते हैं, कोई चादर ओढ़ते हैं, कोई लाल वस्त्र रखते हैं, कोई श्वेत वस्त्र रखते हैं, कोई भगवा रखते हैं, कोई टाट पहिनते हैं, कोई मृगछाला रखते हैं, कोई राख लगाते हैं - इत्यादि अनेक स्वांग बनाते हैं. परन्तु यदि शीत- उष्णादिक नहीं सहे जाते थे, लज्जा नहीं छूटी थी, तो पगड़ी जामा इत्यादि प्रवृत्तिरूप वस्त्रादिका त्याग किसलिये किया? उनको छोड़कर ऐसे स्वांग बनानेमें धर्मका कौनसा अंग हुआ? गृहस्थोंको ठगनेके अर्थ ऐसे भेष जानना. यदि गृहस्थ जैसा अपना स्वांग रखे तो गृहस्थ ठगे कैसे जायेंगे? और इन्हें उनके द्वारा आजीविका व धनादिक व मानादिकका प्रयोजन साधना है। इसलिये ऐसे स्वांग बनाते हैं. भोला जगत उस स्वांगको देखकर ठगाता है और धर्म हुआ मानता है। परन्तु यह भ्रम है. यही कहा है :-
जह कुवि वेस्सारत्तो मुसिज्जमाणो विमण्णए हरिसं .
तह मिच्छवेसमुसिया गयं पि ण मुणंति धम्म-णिहिं ॥५॥
(उपदेशसिद्धान्तरत्नमाला)
अर्थ:- जैसे कोई वैश्यासक्त पुरुष धनादिकको ठगाते हुए भी हर्ष मानते हैं। उसी प्रकार मिथ्याभेष द्वारा ठगे गये जीव नष्ट होते हुए धर्मधनको नहीं जानते हैं. भावार्थ :- इन मिथ्यावेषवाले जीवोंकी सुश्रुषा आदिसे अपना धर्मधन नष्ट होता है उसका विषादनहीं है, मिथ्याबुद्धिसे हर्ष करते हैं. वहाँ कोई तो मिथ्याशास्त्रोंमें जो वेष निरूपित किये हैं उनको धारण करते हैं। परन्तु उन शास्त्रोंके कर्त्ता पापियों ने सुगम किक्रया करनेसे उच्चपद प्ररूपित करनेमें हमारी मान्यता होगी व अन्य बहुत जीव इस मार्गमें लग जायेंगे, इस अभिप्रायसे मिथ्या उपदेश दिया है.उसकी परम्परासे विचार रहित जीव इतना भी विचार नहीं करते कि - सुगमकिक्रयासे उच्चपद होना बतलाते हैं सो यहाँ कुछ दगा है. भ्रमसे उनके कहे हुए मार्गमें प्रवर्त्तते हैं.
तथा कोई शास्त्रोंमें तो कठिन मार्ग निरूपित किया है वह तो सधेगा नहीं और अपना ऊँचा नाम धराये बिना लोग मानेंगे नहीं। इस अभिप्रायसे यति, मुनि, आचार्य, उपाध्याय, साधु, भट्टारक, संन्यासी, योगी, तपस्वी, नग्न - इत्यादि नाम तो ऊँचा रखते हैं और इनके आचारोंको साध नहीं सकते।इसलिये इच्छानुसार नाना वेष बनाते हैं. तथा कितने ही अपनी इच्छानुसार ही नवीन नाम धारण करते हैं और इच्छानुसार ही वेष बनाते हैं.
इस प्रकार अनेक वेष धारण करनेसे गुरुपना मानते हैं। सो यह मिथ्या है.
यहाँ कोई पूछे कि - वेष तो बहुत प्रकारसे दिखते हैं, उनमें सच्चे-झूठे वेषकी पहिचान किस प्रकार होगी?
समाधान :- जिन वेषोंमें विषय-कषायका किंचित् लगाव नहीं है वे वेष सच्चे हैं. वे सच्चे वेष तीन प्रकारके हैं। अन्य सर्व वेष मिथ्या हैं.
वही—षट्पाहुड़में कुन्दकुन्दाचार्यने कहा है :-
एगं जिणस्स रूवं बिदियं उक्तिकट्ठसावयाणं तु .
अवरट्ठियाण तइयं चउत्थ पुण ®लगदंसणं णत्थि॥१८॥(दर्शनपाहुड़)
अर्थ :- एक तो जिनस्वरूप निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि®लग, दूसरा उत्कृष्ट श्रावकोंका रूप - दशवीं, ग्यारहवीं प्रतिमाधारी श्रावकका लिंग, तीसरा आर्यिकायोंका रूप - यह स्त्रियोंका लिंग - ऐसे यह तीन ®लग तो श्रद्धानपूर्वक हैं तथा चोैथा कोई लिंग सम्यग्दर्शन- स्वरूप नहीं है. भावार्थ :- इन तीन लिंगके अतिरिक्त अन्य लिंगको जो मानता है वह श्रद्धानी नहीं है, मिथ्या¹ष्िट है. तथा इन वेषियों में कितने ही वेषी अपने वेषकी प्रतीति करानेके अर्थ किंचित् धर्मके अंगको भी पालते हैं. जिस प्रकार खोटा रुपया चलानेवाला उसमें कुछ चाँदीका अंश भी रखता है।उसी प्रकार धर्मका कोई अंग दिखाकर अपना उच्चपद मानते हैं.
यहाँ कोई कहे कि - जो धर्म साधन किया उसका तो फल होगा?
उत्तर :- जिसप्रकार उपवासका नाम रखाकर कणमात्र भीभक्षण करेतो पापी है, और एकात(एकाशन)कानामरखाकरकिंचित्कमभोजनकरे तब भी धर्मात्मा है। उसी प्रकार उच्च पदवीका नाम रखाकर उसमें किंचित् भी अन्यथा प्रवर्त्ते तो महापापी है, और नीची पदवीका नाम रखाकर ®कचित् भी धर्मसाधन करे तो धर्मात्मा है. इसलिये धर्मसाधन तो जितना बने उतना ही करना, कुछ दोष नहीं है। परन्तु ऊँचा धर्मात्मा नाम रखाकर नीच किक्रया करनेसे तो महापाप ही होता है.
वही—षट्पाहुड़में कुन्दकुन्दाचार्यने कहा है :-
जहजायरूवसरिसो तिलतुसमेत्तं ण गिहदि हत्थेसु.
जइ लेइ अप्पबहुयं तत्तो पुण जाइ णिग्गोदम् ॥१८॥(सूत्रपाहुड़)
अर्थ :- मुनिपद है वह यथाजातरूप स¹श है. जैसा जन्म होते हुए था वैसा नग्न है. सो वह मुनि अर्थ यानी धन-वस्त्रादिक वस्तुएँ उनमें तिलके तुषमात्र भी ग्रहण नहीं करता. यदि कदाचित् अल्प व बहुत ग्रहण करे तो उससे निगोद जाता है.
सो यहाँ देखो, गृहस्थपनेमें बहुत परिग्रह रखकर कुछ प्रमाण करे तो भी स्वर्ग- मोक्षका अधिकारी होता है और मुनिपनेमें ®कचित् परिग्रह अंगीकार करने पर भी निगोदगामी होता है. इसलिये ऊँचा नाम रखाकर नीची प्रवृत्ति युक्त नहीं है.
देखो, हंुडावसर्पिणी कालमें यह कलिकाल वर्त रहा है. इसके दोषसे जिनमतमें मुनिका स्वरूप तो ऐसा है जहाँ बाह्याभ्यन्तर परिग्रहका लगाव नहीं है, केवल अपने आत्माका आपरूप अनुभवन करते हुए शुभाशुभभावोंसे उदासीन रहते है। और अब विषय- कषायासक्त जीव मुनिपद धारण करते हैं। वहाँ सर्व सावद्यके त्यागी होकर पंच-महाव्रतादि अंगीकार करते हैं, श्वेत-रक्तादि वस्त्रों को ग्रहण करते हैं, भोजनादिमें लोलुपी होते हैं, अपनी पद्धति बढ़ानेके उद्यमी होते हैं व कितने ही धनादिक भी रखते हैं, ®हसादिक करते हैं व नाना आरम्भ करते हैं. परन्तु अल्प परिग्रह ग्रहण करनेका फल निगोद कहा है, तब ऐसे पापों का फल तो अनन्त संसार होगा ही होगा.
लोगोंकी अज्ञानता तो देखो, कोई एक छोटी भी प्रतिज्ञा भंग करे उसे तो पापी कहते हैं और ऐसी बड़ी प्रतिज्ञा भंग करते देखकर भी उन्हें गुरुमानते हैं, उनका मुनिवत् सन्मानादि करते हैं। सो शास्त्रमें कृत, कारित, अनुमोदनाका फल कहा है। इसलिये उनको भी वैसा ही फल लगता है.
मुनिपद लेनेका कक्रम तो यह है - पहले तत्त्ववज्ञान होता है, पश्चात् उदासीन परिणाम होते हैं, परिषहादि सहनेकी शक्ति होती है। तब वह स्वयमेव मुनि होना चाहता है और तब श्रीगुरु मुनिधर्म अंगीकार कराते हैं.
यह कैसी विपरीतता है कि - तत्त्ववज्ञानरहित विषय-कषायासक्त जीवोंको मायासे व लोभ दिखाकरमुनिपद देना, पश्चात्अन्यथा प्रवृत्ति कराना।सोयह बड़ा अन्याय है.
इस प्रकार कुुगुरुका व उनके सेवनका निषेध किया.
अब इस कथनको ¹ढ़ करनेके लिये शास्त्रोंकी साक्षी देते हैं.
वहाँ—उपदेशसिद्धान्तरत्नमालामें ऐसा कहा है :-
गुरुणो भट्टा जाया स¶े थुणि ऊण ®लति दाणाइं.
दोण्णवि अमुणियसारा दूसमिसमयम्मि बुøं ति॥३१॥
कालदोषसे गुरु जो हैं वे तो भाट हुए। भाटवत् शब्द द्वारा दातारकी स्तुति करके दानादि ग्रहण करते हैं. सो इस दु:षमकालमें दोनों ही - दातार व पात्र संसारमें डूबते हैं. तथा वहाँ कहा है :-
सप्पे दिट्ठे णासइ लोओ णहि कोवि ®कपि अक्तखेइ.
जो चयइ कुगुरु सप्पं हा मूढा भणइ तं दुट्ठं॥३६॥
अर्थ :- सर्पको देखकर कोई भागे, उसे तो लोग कुछ भी नहीं कहते. हाय हाय देखो तो, जो कुगुरुसर्पको छोड़ते हैं उसे मूढ़लोग दुष्ट कहते हैं, बुरा बोलते हैं.
सप्पो इक्तकं मरणं कुगुरु अणंताइ देह मरणाइरं.
तो वर सप्पं गहियं मा कुगुरु सेवणं भ¶ं॥३७॥
अहो, सर्प द्वारा तो एकबार मरण होता है और कुगुरुअनन्त मरण देता है - अनन्तबार जन्म-मरण कराता है. इसलिये हे भदक्र, सर्पका ग्रहण तो भला और कुगुरुका सेवन भला नहीं है.
वहाँ और भी गाथाएँ यह श्रद्धान ¹ढ़ करनेको कारण बहुत कही हंै सो उस ग्रंथसे जान लेना.
तथा—संघपट्टमें ऐसा कहा है :-
क्षुत्क्षाम: किल कोपि रंकशिशुक: प्रवृज्य चैत्ये क्तवचित्
कृत्वा ®कचनपक्षमक्षतकलि:प्राप्तस्तदाचार्यकम्.
चित्रं चैत्यगृहे गृहीयति निजे गच्छेकुटुम्बीयति
स्वं शकक्रीयति बालिशीयति बुधान् विश्व वराकीयति..
अर्थ :- देखो, क्षुधासे कृश किसी रंकका बालक कहीं चैत्यालयादिमें दीक्षा धारण करके, पापरहित न होता हुआ किसी पक्ष द्वारा आचार्यपदको प्राप्त हुआ. वह चैत्यालयमें अपने गृहवत् प्रवर्तता है, निजगच्छमें कुटुम्बवत् प्रवर्तता है, अपनेको इन्द्रवत् महान मानता है, ज्ञानियोंको बालकवत् अज्ञानी मानता है, सर्व गृहस्थोंको रंकवत् मानता है। सो यह बड़ा आश्चर्य हुआ है.
तथा—यैर्जातो न च वर्द्धितो न च न च कक्रीतोइत्यादि काव्य है। उसका अर्थ ऐसा है - जिनसे जन्म नहीं हुआ है, बढ़ा नहीं है, मोल नहीं लिया है, देनदार नहीं हुआ है - इत्यादिकोईप्रकारसम्बन्धनहींहै।औरगृहस्थोंकोवृषभवत्हाँकतेहैं,जबरदस्ती दानादिक लेते हैं। सो हाय हाय यह जगत् राजासे रहित है, कोई न्याय पूछनेवाला नहीं है.
इस प्रकार वहाँ इस श्रद्धानके पोषक काव्य हैं सो उस ग्रन्थसे जानना.
यहाँ कोई कहता है - यह तो श्वेताम्बरविरचित् उपदेश है, उसकी साक्षी किसलिये दी?
उत्तर :- जैसे नीचा पुरूष जिसका निषेध करे, उसका उत्तम पुरूषके तो सहज ही निषेध हुआ। उसी प्रकार जिनके वस्त्रादिक उपकरण कहे वे ही जिसका निषेध करें, तब दिगम्बर धर्ममें तो ऐसी विपरीतताका सहज ही निषेध हुआ.
तथा दिगम्बर गं्रथोंमें भी इस श्रद्धानके पोषक वचन हैं.
वहाँ श्री कुन्दकुन्दाचार्यकृत—षट्पाहुड़में ऐसा कहा है :-
दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवरे®ह सिस्साणं.
तं सोऊण सकण्णे दंसणहीणो ण वंदिव्वो॥२॥(दर्शनपाहुड़)
अर्थ :- सम्यग्दर्शन है मूल जिसका ऐसा जिनवर द्वारा उपदेशित धर्म है। उसे सुनकर हे कर्णसहित पुरूषों यह मानो कि - सम्यक्तत्वरहित जीव वंदना योग्य नहीं है. जो आप कुगुरुहै उस कुगुरुके श्रद्धान सहित सम्यक्तत्वी कैसे हो सकता है? बिना सम्यक्तत्व अन्य धर्म भी नहीं होता. धर्मके बिना वंदने योग्य कैसे होगा?
फिर कहते हैं :-
जे दंसणेसु भट्ठा णाणे भट्ठा चरित्तभट्ठा य.
एदे भट्ठ वि भट्ठा सेसं पि जणं विणासंति॥८॥(दर्शनपाहुड़)
जो दर्शनमें भ्रष्ट हैं, ज्ञानमें भ्रष्ट हैं, चारित्र भ्रष्ट हैं। वे जीव भ्रष्टसे भ्रष्ट हैं। और भी जीव जो उनका उपदेश मानते हैं उन जीवोंका नाश करते हैं, बुरा करते हैं.
फिर कहते हैं :-
जे दंसणेसु भट्ठा पाए पाडंति दंसणधराणं.
ते होंति लल्लमूआ बोही पुण दुल्लहा ते®स॥१२॥(दर्शनपाहुड़)
जो आप तो सम्यक्तत्वसे भ्रष्ट हैं और सम्यक्तत्वधारियोंको अपने पैरों पड़वाना चाहते हैं, वे लूले-गूँगे होते हैं अर्थात् स्थावर होते हैं तथा उनके बोधकी प्राप्ति महा दुर्लभ होती है.
जे वि पडंति च ते®स जाणंता लज्जागारवभयेण.
ते®स पि णत्थि बोही पावं अणुमोयमाणाणं॥१३॥(दर्शनपाहुड़)
जो जानते हुए भी लज्जा, गारव और भयसे उनके पैरों पड़ते हैं उनके भी बोधि अर्थात्सम्यक्तत्वनहींहै.कैसेहैंवेजीव?पाापकीअनुमोदनाकरतेहैं.पापियोंका सन्मानादि करनेसे भी उस पापकी अनुमोदनाका फल लगता है.
तथा कहते हैं :-
जस्स परिग्गहगहणं अप्पं बहुयं च हवइ ®लगस्स.
सो गरहिउ जिणवयणे परिगहरहिओ णिरायारो॥१९॥(सूत्रपाहुड़)
जिस ®लगके थोड़ा व बहुत परिग्रहका अंगीकार हो वह जिनवचनमें निन्दा योग्य है. परिग्रह रहित ही अनगार होता है.
तथा कहते हैं :-
धम्मम्मि णिप्पवासो दोसावासो य उच्छुफुल्लसमो.
णिप्फलणिग्गुणयारोणडसवणोणग्गरूवेण॥७१॥(भावपाहुड़)
अर्थ :- जो धर्ममें निरुद्यमी है, दोषोंका घर है, इक्षुफूल समान निष्फल है, गुणके आचरण से रहित है। वह नग्नरूपसे नट-श्रमण है, भांडवत् वेशधारी है. अब, नग्न होनेपर भांडका ¹ष्टान्त सम्भव है। परिग्रह रखे तो यह ¹ष्टान्त भी नहीं बनता.
जे पावमोहियमई ®लगं घेत्तू ण जिणव®रदाणं.
पाावं कुणंति पावा ते चत्ता मोक्तखमग्गम्मि॥७८॥(मोक्षपाहुड़)
अर्थ :- पापसे मोहित हुई है बुद्धि जिनकी। ऐसे जो जीव जिनवरों का ®लग धारण करके पाप करते हैं, वे पापमूर्ति मोक्षमार्गमें भ्रष्ट जानना.
तथा ऐसा कहा है :-
जे पंचचेलसत्ता गंथग्गाही य जायणासीला.
आधाकम्मम्मि रया ते चत्ता मोक्तखमग्गम्मि॥७९॥(मोक्षपाहुड़)
अर्थ :- जो पंचप्रकार वस्त्रमें आसक्त हैं, परिग्रहको ग्रहण करनेवाले हैं, याचना- सहित हैं, अध:कर्म दोषोंमें रत हैं। उन्हें मोक्षमार्गमें भ्रष्ट जानना.
और भी गाथा सूत्र वहाँ उस श्रद्धानको ¹ढ़ करनेके लिये कहे हैं वे वहाँसे जानना.
तथा कुन्दकुन्दाचार्यकृत—®लगपाहुड़है, उसमें मुनि®लग धारण करके जो ®हसा, आरम्भ, यंत्र-मंत्रादि करते हैं उनका बहुत निषेध किया है.
तथा गुणभद्राचार्यकृत—आत्मानुशासनमें ऐसा कहा है :-
इतस्ततश्च त्रस्यन्तो विभाववयर्यां यथा मृगा:.
व्नाब्दसन्त्यग्रामंकलौ कष्टंतपस्विन: ॥१९७॥
अर्थ :- कलिकालमें तपस्वी मृगकी भाँति इधर-उधरसे भयभीत होकर वनसे नगरके समीप वास करते हैं, यह महाखेदकारी कार्य है. यहाँ नगरके समीपही रहनेका निषेध किया, तो नगरमें रहना तो निषिद्ध हुआ ही.
वरं गार्हस्थ्यमेवाद्य तपसो भाविजन्मन:.
सुस्त्रीकटाक्षलुण्टाकलुप्तवैराग्यसम्पद: ॥२००॥
अर्थ :- होनेवाला है अनन्त संसार जिससे ऐसे तपसे गृहस्थपना ही भला है. कैसा है वह तप? प्रभात होते ही स्त्रियोंके कटाक्षरूपी लुटेरों द्वारा जिसकी वैराग्य-सम्पदा लुट गई है - ऐसा है.
तथा योगीन्द्रदेवकृत—परमात्मप्रकाशमेऐसा कहा है :-
चिल्लाचिल्लीपुत्थिय®ह, तूसइ मूढु णिभंतु.
एय®ह लज्जइ णाणियउ, बंधहं हेउ मुणंतु॥२१५॥
चेला-चेली और पुस्तकों द्वारा मूढ़ संतुष्ट होता है। भ्रान्तिरहित ऐसा ज्ञानी उन्हें बन्धका कारण जानता हुआ उनसे लज्जायमान होता है.
केणवि अप्पउ वंचियउ, सिरुलुंचिवि छारेण.
सयलवि संग ण परिहरिय, जिणवर®लगधरेण॥२१७॥
किसी जीव द्वारा अपना आत्मा ठगा गया, वह कौन? कि जिस जीवने जिनवरका ®लग धारण किया और राखसे सिरका लोंच किया। परन्तु समस्त परिग्रह नहीं छोड़ा.
जे जिण®लगु धरेवि मुणि, इट्ठपरिग्गह ®लति.
छ¶ किरेविणु ते जि जिय,सा पुणु छ¶ गििलंति॥२१८॥
अर्थ :- हे जीव जो मुनि जिन®लग धारण करके इष्ट परिग्रहको ग्रहण करते हैं, वे छर्दि(उल्टी)करके उसी छर्दिका पुन: भक्षण करते हैं अर्थात् निन्दनीय हैं. इत्यादि वहाँ कहते हैं.
इस प्रकार शास्त्रोंमें कुगुरुका व उनके आचरणका व उनकी सुश्रुषाका निषेध किया है सो जानना.
तथाजहाँमुनिकोधात्री-दूतआदिछयालीसदोषआहारादिमेंकहेहैं।वहाँ गृहस्थोंके बालकोंको प्रसन्न करना, समाचार कहना, मंत्र-औषधि-ज्योतिषादि कार्य बतलाना तथा किया-कराया, अनुमोदित भोजन लेना - इत्यादि किक्रयाओंका निषेध किया है। परन्तु अब कालदोषसे इन्हीं दोषोंको लगाकर आहारादि ग्रहण करते हैं.
तथा पाश्र्वस्थ, कुशीलादि भ्रष्टाचारी मुनियोंका निषेध किया है, उन्हींके लक्षणोंको धारण करते हैं. इतना विशेष है कि - वेद्रव्यसेतोनग्न रहते हैं,यह नाना परिग्रह रखते हैं. तथा वहाँ मुनियोंके भ्रामरी आदि आहार लेनेकी विधि कही है। परन्तु यह आसक्त होकर, दातारके प्राण पीडि़त करके आहारादिका ग्रहण करते हैैं.तथा जो गृहस्थधर्ममें भी उचित नहीं हैं व अन्याय, लोक®नद्य, पापरूपकार्य करते प्रत्यक्ष देखे जाते हैं.
तथा जिनबिम्ब, शास्त्रादिक सर्वोत्कृष्ट पूज्य उनकी तो अविनय करते हैं और आप उनसे भी महंतता रखकर ऊपर बैठना आदि प्रवृत्तिको धारण करते हैं - इत्यादि अनेक विपरीतताएँ प्रत्यक्ष भासित होती हैं और अपनेको मुनि मानते हैं, मूलगुण आदिके धारी कहलाते हैं. इस प्रकार अपनी महिमा कराते हैं और गृहस्थ भोले उनके द्वारा प्रशंसादिकसे ठगाते हुए धर्मका विचार नहीं करते, उनकी भक्ति में तत्पर होते हैं। परन्तु बड़े पापको बड़ा धर्म मानना इस मिथ्यात्वका फल कैसे अनन्त संसार नहीं होगा? शास्त्रमें एक जिनवचनको अन्यथा माननेसे महापापी होना कहा है। यहाँ तो जिनवचनकी कुछ बात ही नहीं रखी, तो इसके समान और पाप कोैन है? शिथिलाचारकी पोषक युक्यिाँ अेोर उनका निराकरण
अब यहाँ, कुयुक्ति द्वारा जो उन कुगुरुओं की स्थापना करते हैं उनका निराकरण करते हैं.
वहाँ वह कहता है - गुरु बिना तो निगुरा कहलायेंगे और वैसेेे गुरु इस समय दिखते नहीं हैं। इसलिये इन्हींको गुरु मानना ?
उत्तर :- निगुरा तो उसका नाम है जो गुरु मानता ही नहीं. तथा जो गुरुको तो माने, परन्तु इस क्षेत्रमें गुरुका लक्षण न देखकर किसीको गुरु न माने तो इस श्रद्धानसे तो निगुरा होता नहीं हैं. जिस प्रकार नास्तिक तो उसका नाम है जो परमेश्वरको मानताही नहीं, और जो परमेश्वरको तो माने परन्तु इस क्षेत्रमें परमेश्वरका लक्षण न देखकर किसीको परमेश्वर न माने तो नास्तिक तो होता नहीं है। उसी प्रकार यह जानना.
फिर वह कहता है- जैन शास्त्रोंमें वर्तमानमें केवलीका तो अभाव कहा है, मुनिका तो अभाव नहीं कहा है?
उत्तर :- ऐसा तो कहा नहीं है कि इन देशोंमें सद्भाव रहेगा । परन्तु भरतक्षेत्रमें कहते हैं, सो भरतक्षेत्र तो बहुत बड़ा है, कहीं सद्भाव होगा। इसलिये अभाव नहीं कहा है. यदि तुम रहते हो उसी क्षेत्रमें सद्भाव मानोगे, तो जहाँ ऐसे भी गुरु नहीं मिलेंगे वहाँ जाओगे तब किसको गुरु मानोगे? जिस प्रकार - हंसोंका सद्भाव वर्तमान में कहा है, परन्तुहंस दिखायीनहीं देतेतोऔर पक्षियोंकोतो हंसमाना नहींजाता।उसी प्रकार वर्तमानमें मुनियों का सद्भाव कहा है, परन्तु मुनि दिखायी नहीं देते तो औरोंको तो मुनि माना नहीं जा सकता.
फिर वह कहता है - एक अक्षरके दाताको गुरु मानते हैं। तो जो शास्त्र सिखलायें व सुनायें उन्हें गुरु कैसे न मानें?
उत्तर :- गुरु नाम बडे़का है. सो जिस प्रकारकी महंतता जिसके सम्भव हो, उसे उस प्रकार गुरुसंज्ञा सम्भव है.जैसे - कुल अपेक्षा माता-पिताको गुरुसंज्ञा है: उसी प्रकार विद्या पढ़ानेवालेको विद्या अपेक्षा गुरुसंज्ञा है. यहाँ तो धर्मका अधिकार है, इसलिये जिसके धर्म अपेक्षा महंतता सम्भवित हो उसे गुरु जानना.परन्तु धर्म नाम चारित्रका है,— चारित्तं खलु धम्मोऐसा शास्त्रमें कहा है। इसलिये चारित्रके धारकको ही गुरुसंज्ञा है. तथा जिस प्रकार भूतादिका नाम भी देव है, तथापि यहाँ देवके श्रद्धानमें अरहन्तदेवका ही ग्रहण है। उसी प्रकार औरोंका भी नाम गुरु है, तथापि यहाँ श्रद्धानमें निर्ग्रन्थका ही ग्रहण है.जैनधर्ममें अर्हन्तदेव, निर्ग्रन्थगुरु ऐसा प्रसिद्ध वचन है.
यहाँ प्रश्न है कि निर्ग्रन्थके सिवा अन्यको गुरु नहीं मानते। सो क्तया कारण है?
उत्तर :- निर्ग्रन्थके सिवा अन्य जीव सर्वप्रकारसे महंतता धारण नहीं करते. जैसे - लोभी शास्त्र व्याख्यान करे वहाँ वह इसे शास्त्र सुनानेसे महंत हुआ और यह उसे धन- वस्त्रादि देनेसे महंत हुआ.यद्यपि बाह्यमें शास्त्र सुनानेवाला महंत रहता है, तथापि अन्तरंगमें लोभी होता है।इसलिये सर्वथा महंतता नहीं हुई.
यहाँ कोई कहे - निर्ग्रन्थ भी तो आहार लेते हैं?
उत्तर :- लोभी होकर, दातारकी सुश्रुषा करके, दीनतासे आहार नहीं लेते। इसलिये महंतता नहीं घटती.जो लोभी हो वही हीनता प्राप्त करता है.इसी प्रकार अन्य जीव जानना.इसलियेनिर्ग्रन्थहीसर्वप्रकारमहंततायुक्तहैंं।निर्ग्रन्थकेसिवाअन्यजीव सर्वप्रकार गुणवान नहीं हैं। इसलिये गुणोंकी अपेक्षा महंतता और दोषोंकी अपेक्षा हीनता भासित होती है, तब नि:शंक स्तुति नहीं की जा सकती .
तथानिर्ग्रन्थके सिवा अन्य जीव जैसा धर्म साधन करते हैं, वैसा व उससे अधिक धर्मसाधनगृहस्थभीकरसकतेहैं।वहाँगुरुसंज्ञाकिसकोहोगी?इसलियेजो बाह्याभ्यन्तर परिग्रह रहित निर्ग्रन्थ मुनि हैं उन्हींको गुरु जानना.
यहाँ कोई कहे - ऐसे गुरु तो वर्तमानमें यहाँ नहीं हैं, इसलिये जिस प्रकार अरहन्तकी स्थापना प्रतिमा है, उसी प्रकार गुरुओंकी स्थापना यह वेषधारी हैं?
उत्तर :- जिस प्रकार राजाकी स्थापना चित्रादि द्वारा करे तो वह राजाका प्रतिपक्षी नहीं है, और कोई सामान्य मनुष्य अपनेको राजा मनाये तो राजाका प्रतिपक्षी होता है। उसी प्रकार अरहन्तादिककी पाषाणादिमें स्थापना बनाये तो उनका प्रतिपक्षी नहीं है, और कोई सामान्य मनुष्य अपनेको मुनि मनाये तो वह मुनियोंका प्रतिपक्षी हुआ.इस प्रकार भी स्थापना होती हो तो अपनेको अरहन्त भी मनाओऔर यदि उनकी स्थापना है तो बाह्यमें तो वैसा ही होना चाहिये। परन्तु वे निर्ग्रन्थ, यह बहुत परिग्रहके धारी - यह कैसे बनता है?
तथा कोई कहे - अब श्रावक भी तो जैसे सम्भव हैं वैसे नहीं हैं, इसलिये जैसे श्रावक वैसे मुनि ?
उत्तर :- श्रावकसंज्ञा तो शास्त्रमें सर्व गृहस्थ जैनियोंको है.श्रेणिक भी असंयमी था, उसे उत्तरपुराणमें श्रावकोत्तम कहा है.बारह सभाओंमें श्रावक कहे हैं वहाँ सर्व व्रतधारी नहीं थे.यदि सर्व व्रतधारी होते तो असंयत मनुष्योंकी अलग संख्या कही जाती, सो नहीं कही है। इसलिये गृहस्थ जैन श्रावक नाम प्राप्त करता है.और मुनिसंज्ञा तो निर्ग्रन्थके सिवा कहीं कही नहीं है.
तथा श्रावकके तो आठ मूलगुण कहे हैं.इसलिये मद्य, मांस, मधु, पाँच उदम्बरादि फलोंका भक्षण श्रावकोंके है नहीं।इसलिये किसी प्रकारसे श्रावकपना तो सम्भवित भी है। परन्तु मुनिके अट्ठाईस मूलगुण हैं सो वेषियोंके दिखायी ही नहीं देते, इसलियेे मुनिपना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है.तथा गृहस्थ अवस्थामें तो पहले जम्बूकुमारादिकने बहुत ®हसादि कार्य किये सुने जाते हैं। मुनि होकर तो किसीने ®हसादिक कार्य किये नहीं हैं, परिग्रह रखा नहीं है। इसलिये ऐसी युक्ति कार्यकारी नहीं है.
देखो, आदिनाथजीके साथ चार हजार राजा दीक्षा लेकर पुन: भ्रष्ट हुए, तब देव उनसे कहने लगे - ‘जिनलिंगी होकर अन्यथा प्रवर्तोगे तो हम दंड देंगे. जिनलिंग छोड़कर जो तुम्हारी इच्छा हो सो तुम जानो’.इसलिये जिनलिंगी कहलाकर अन्यथा प्रवर्ते, वे तो दंडयोग्य हैं। वंदनादि-योग्य कैसे होंगे?
अब अधिक क्तया कहेंजिनमतमें कुवेष धारण करते हैं वे महापाप करते हैं। अन्य जीव जो उनकी सुश्रुषा आदि करते हैं वे भी पापी होते हैं.पद्मपुराणमें यह कथा है कि - श्रेष्ठी धर्मात्माने चारण मुनियोंको भ्रमसे भ्रष्ट जानकर आहार नहीं दिया। तब जो प्रत्यक्ष भ्रष्ट हैं उन्हें दानादिक देना कैसे सम्भव है?
यहाँ कोई कहे - हमारे अन्तरंगमें श्रद्धान तो सत्य है,परन्तु बाह्य लज्जादिसे शिष्टाचार करते हैं। सो फल तो अन्तरंगका होगा?
उत्तर :- षट्पाहुड़ में लज्जादिसे वन्दनादिकका निषेध बतलाया था, वह पहले ही कहा था.कोई जबरदस्ती मस्तक झुकाकर हाथ जुड़वाये, तब तो यह सम्भव है कि हमारा अन्तरंग नहीं था। परन्तु आप ही मानादिकसे नमस्कारादि करे, वहाँ अन्तरंग कैसे न कहें? जैसे - कोई अन्तरंगमें तो माँसको बुरा जाने। परन्तु राजादिकको भला मनवानेको माँस भक्षण करे तो उसे व्रती कैसे मानें?उसी प्रकार अंतरंगमें तो कुगुरु-सेवनको बुरा जाने। परन्तु उनको व लोगों को भला मनवानेके लिये सेवन करे तो श्रद्धानी कैसे कहें?इसलिये बाह्यत्याग करने पर ही अन्तरंगत्याग सम्भव है.इसलिये जो श्रद्धानी जीव हैं, उन्हें किसी प्रकारसे भी कुगुरुओंकी सुश्रुषा आदि करना योग्य नहीं है.
इस प्रकार कुगुरुसेवनका निषेध किया.
यहाँ कोई कहे - किसी तत्त्ववश्रद्धानीको कुगुरुसेवनसे मिथ्यात्व कैसे हुआ?
उत्तर :- जिस प्रकार शीलवती स्त्री परपुरुषके साथ भर्तारकी भाँति रमणकिक्रया सर्वथानहींकरती।उसीप्रकारतत्त्ववश्रद्धानीपुरुषकुगुरुकेसाथसुगुरुकीभाँति नमस्कारादि किक्रया सर्वथा नहीं करता.क्तयोंकि यह तो जीवादि तत्त्ववोंका श्रद्धानी हुआ है - वहाँ रागादिकका निषेध करनेवाला श्रद्धान करता है, वीतरागभावको श्रेष्ठ मानता है- इसलिये जिसके वीतरागता पायी जाये, उन्हीं गुरुको उत्तम जानकर नमस्कारादि करता है। जिनके रागादिक पाये जायें, उन्हें निषिद्ध जानकर कदापि नमस्कारादि नहीं करता.
कोई कहे - जिस प्रकार राजादिकको करता है। उसी प्रकार इनको भी करता है?
उत्तर:-राजादिकधर्मपद्धतिमेंनहींहैं,गुरुकासेवनतोधर्मपद्धतिमेंहै. राजादिकका सेवन तो लोभादिकसे होता है, वहाँ चारित्रमोहका ही उदय सम्भव है। परन्तु गुरुके स्थान पर कुगुरुका सेवन किया, वहाँ तत्त्ववश्रद्धानके कारण तो गुरु थे, उनसे यह प्रतिकूल हुआ. सो लज्जादिकसे जिसने कारणमें विपरीतता उत्पन्न की उसके कार्यभूत तत्त्ववश्रद्धानमें ¹ढ़ता कैसे सम्भव है?इसलिये वहाँ दर्शनमोहका उदय सम्भव है.
इस प्रकार कुगुरुओंका निरुपण किया.

कुधर्मका निरुपण अेोर उसके श्रद्धानादिकका निषेध

अब कुधर्मका निरुपण करते हैं:-
जहाँ ®हसादि पाप उत्पन्न हों व विषय-कषायोंकी वृद्धि हो वहाँ धर्म माने। सो कुधर्म जानना.यज्ञादिक किक्रयाओंमें महा®हसादिक उत्पन्न करे, बड़े जीवोंका घात करे और इन्दिक्रयोंके विषय पोषण करे, उन जीवोंमें दुष्टबुद्धि करके रौद्रध्यानी हो, तीव्र लोभसे औरोंका बुरा करके अपना कोई प्रयोजन साधना चाहे। और ऐसे कार्य करके वहाँ धर्म माने। सो कुधर्म है.
तथा तीर्थोंमें व अन्यत्र स्नानादि कार्य करे, वहाँ बड़े-छोटे बहुतसे जीवोंकी ®हसा होती है, शरीरको चैन मिलता है। इसलिये विषय-पोषण होता है और कामादिक बढ़ते हैं। कुतूहलादिसे वहाँ कषायभाव बढ़ाता है और धर्म मानता है। सो यह कुधर्म है.
तथा संकक्रान्ति, ग्रहण, व्यतिपातादिकमें दान देता है व बुरे ग्रहादिके अर्थ दान देता है। पात्र जानकर लोभी पुरुषोंको दान देता है। दान देनेमें सुवर्ण, हस्ती, घोड़ा, तिल आदि वस्तुओंको देता है. परन्तु संकक्रान्ति आदि पर्व धर्मरूप नहीं हैं, ज्योतिषीके संचारादिक द्वारा संकक्रान्तिआदि होतेहैं.तथादुष्टग्रहादिककेअर्थदिया-वहाँ भय,लोभादिककी अधिकता हुई, इसलिये वहाँ दान देनेमें धर्म नहीं है. तथा लोभी पुरुष देने योग्य पात्र नहीं है, क्तयोंकि लोभी नाना असत्य युक्यिाँ करके ठगते हैं, ®कचित् भला नहीं करते. भला तो तब होता है जब इसके दानकी सहायतासे वह धर्म साधन करे। परन्तु वह तो उल्टा पापरूप प्रवर्तता है. पापके सहायकका भला कैसे होगा?
यही—रयणसारशास्त्रमें कहा है :-
सप्पुरिसाणं दाणं कप्पतरूणं फलाणं सोहं वा.
लोहीणं दाणं जइ विमाणसोहा सवस्स जाणेह॥२६॥
अर्थ :- सत्पुरुषोंको दान देना कल्पवृक्षोंके फलोंकी शोभा समान है. शोभा भी है और सुखदायक भी है. तथा लोभी पुरुषोंको दान देना होता है सो शव अर्थात् मुर्देकी ठठरीकी शोभा समान जानना. शोभा तो होती है परन्तु मालिकको परम दु:खदायक होती है। इसलिये लोभी पुरुषोंको दान देनेमें धर्म नहीं है.
तथा द्रव्य तो ऐसा देना चाहिये जिससे उसके धर्म बढ़े। परन्तु स्वर्ण, हस्ती आदि देनेसे तो ®हसादिक उत्पन्न होते हैं और मान-लोभादिक बढ़ते हैं उससे महापाप होता है. ऐसी वस्तुओंको देनेवालेके पुण्य कैसे होगा?
तथा विषयासक्त जीव रतिदानादिकमें पुण्य ठहराते हैं। परन्तु जहाँ प्रत्यक्ष कुशीलादि पाप हों वहाँ पुण्य कैसे होगा? तथा युक्ति मिलानेको कहते हैं कि वह स्त्री सन्तोषप्राप्त करती है. सो स्त्री तो विषय-सेवन करनेसे सुख पाती ही है, शीलका उपदेश किसलिये दिया? रतिकालके अतिरिक्त भी उसके मनोरथ न प्रवर्ते तो दु:ख पाती है। सो ऐसी असत्य युक्तित बनाकर विषय-पोषण करनेका उपदेश देते हैं.
इसी प्रकार दया-दान व पात्र-दानके सिवा अन्य दान देकर धर्म मानना सर्व कुधर्म है.
तथा व्रतादिक करके वहाँ ®हसादिक व विषयादिक बढ़ाते हैं। परन्तु व्रतादिक तो उन्हें घटानेके अर्थ किये जाते हैं. तथा जहाँ अन्नका तो त्याग करे और कंदमूलादिका भक्षण करे वहाँ ®हसा विशेष हुई, स्वादादिक विषय विशेष हुए.
तथा दिनमें तो भोजन करता नहीं है और रात्रिमें भोजन करता है। वहाँ प्रत्यक्ष ही दिन-भोजनसे रात्रि-भोजनमें विशेष ®हसा भासित होती है, प्रमाद विशेष होता है.
तथा व्रतादिक करके नाना }ाृंगार बनाता है, कुतूहल करता है, जुआ आदिरूप प्रवर्तता है - इत्यादि पापकिक्रया करता है। तथा व्रतादिकका फल लौकिक इष्टकी प्राप्ति, अनिष्टके नाशको चाहता है। वहाँ कषायोंकी तीव्रता विशेष हुई.
इस प्रकार व्रतादिकसे धर्म मानता है सो कुधर्म है.
तथा कोई भक्तित आदि कार्योंमें ®हसादिक पाप बढ़ाते हैं। गीत-नृत्यगानादिक व इष्ट भोजनादिक व अन्य सामग्रियों द्वारा विषयोंका पोषण करते हैं। कुतूहल प्रमादादिरूप प्रवर्तते हैं - वहाँ पाप तो बहुत उत्पन्न करते हैं और धर्मका ®कचित् साधन नहीं है. वहाँ धर्म मानते हैं सो सब कुधर्म है.
तथा कितने ही शरीरको तो क्तलेश उत्पन्न करते हैं, और वहाँ ®हसादिक उत्पन्न करते हैं व कषायादिरूप प्रवर्तते हैं. जैसे पंचाग्नि तपते हैं, सो अग्निसे बड़े-छोटे जीव जलते हैं, ®हसादिक बढ़ते हैं, इसमें धर्म क्तया हुआ? तथा औंधे मुँह झूलते हैं, ऊध्र्वबाहु रखते हैं. - इत्यादि साधन करते हैं, वहाँ क्तलेश ही होता है. यह कुछ धर्मके अंग नहीं हैं.
तथा पवन-साधन करते हैं वहाँ नेती, धोती इत्यादि कार्योंमें जलादिकसे ®हसादिक उत्पन्न होते हैं। कोई चमत्कार उत्पन्न हो तो उससे मानादिक बढ़ते हैं। वहाँ ®कचित् धर्मसाधन नहीं है. - इत्यादिक क्तलेश तो करते हैं, विषय-कषाय घटानेका कोई साधन नहीं करते. अन्तरंगमें कक्रोध, मान, माया, लोभका अभिप्राय है। वृथा क्तलेश करके धर्म मानते हैं सो कुधर्म है.
तथा कितने ही इस लोकमें दु:ख सहन न होनेसे व परलोकमें इष्टकी इच्छा व अपनी पूजा बढ़ानेके अर्थ व किसी कक्रोधादिकसे आपघात करते हैं. जैसे - पतिवियोगसे अग्निमें जलकर सती कहलाती है, व हिमालयमें गलते हैं, काशीमें करौंत लेते हैं, जीवित मरण लेते हैं - इत्यादि कार्योंसे धर्म मानते हैं। परन्तु आपघातका तो महान पाप है. यदि शरीरादिकसे अनुराग घटा था तो तपश्चरणादि करना था, मर जानेमें कौन धर्मका अंग हुआ? इसलिये आपघात करना कुधर्म है.
इसी प्रकार अन्य भी बहुतसे कुधर्मके अंग हैं. कहाँ तक कहें, जहाँ विषय-कषाय बढ़ते हों और धर्म मानें सो सब कुधर्म जानना.
देखो, कालका दोष, जैनधर्ममें भी कुधर्मकी प्रवृत्ति हो गयी है. जैनमतमें जो धर्म- पर्व कहे हैं वहाँ तो विषय-कषाय छोड़कर संयमरूप प्रवर्तना योग्य है. उसे तो ग्रहण नहीं करते और व्रतादिकका नाम धारण करके वहाँ नाना }ाृंगार बनाते हैं, इष्ट भोजनादि करते हैं, कुतूहलादि करते हैं व कषाय बढ़ानेके कार्य करते हैं, जुआ इत्यादि महान पापरूप प्रवर्तते हैं.
तथापूजनादिकार्योंमेंउपदेशतोयहथाकि-—सावद्यलेशो बहूपुण्यराशौ दोषायनालंबहुत पुण्यसमूहमें पापका अंश दोषके अर्थ नहीं है. इस छल द्वारा पूजा- प्रभावनादि कार्योंमें - रात्रिमें दीपकसे, व अनन्तकायादिकके संग्रह द्वारा, व अयत्नाचार प्रवृत्तिसे ®हसादिरूप पाप तो बहुत उत्पन्न करते हैं और स्तुति, भक्ति आदि शुभपरिणामोंमें नहीं प्रवर्तते व थोड़े प्रवर्तते हैं। सो वहाँ नुकसान बहुत, नफा थोड़ा या कुछ नहीं. ऐसे कार्य करनेमें तो बुरा ही दिखना होता है.
तथा जिनमन्दिर तो धर्मका ठिकाना है. वहाँ नाना कुकथा करना, सोना इत्यादि प्रमादरूप प्रवर्तते हैं। तथा वहाँ बाग-बाड़ी इत्यादि बनाकर विषय-कषायका पोषण करते हैं. तथा लोभी पुरुषको गुरु मानकर दानादिक देते हैं व उनकी असत्य स्तुति करके महंतपना मानते हैं. - इत्यादि प्रकारसे विषय-कषायोंको तो बढ़ाते हैं और धर्म मानते हैं। परन्तु जिनधर्म तो वितरागभावरूप है, उसमें ऐसी विपरीत प्रवृत्ति कालदोषसे ही देखी जाती है.
इस प्रकार कुधर्मसेवनका निषेध किया.
अब, इसमें मिथ्यात्वभाव किस प्रकार हुआ सो कहते हैं :-
तत्त्ववश्रद्धान करनेमें प्रयोजनभूत तो एक यह है कि - रागादिक छोड़ना. इसी भावका नाम धर्म है. यदि रागादिक भावोंको बढ़ाकर धर्म माने, वहाँ तत्त्ववश्रद्धान कैसे रहा? तथा जिन-आज्ञासे प्रतिकूल हुआ. रागादिभाव तो पाप हैं, उन्हें धर्म माना सो यह झूठा श्रद्धान हुआ। इसलिये कुधर्मके सेवनमें मिथ्यात्वभाव है.
इसप्रकारकुदेव-कुगुरु-कुशास्त्रसेवनमेंमिथ्यात्वभावकीपुष्िटहोतीजानकर इसका निरूपण किया.
यही—षट्पाहुड़में कहा है :-
कुच्छियदेवं धम्मं कुच्छिय®लगं च बंदए जो दु.
लज्जाभयगारवदो मिच्छादिट्ठी हवे सो हु॥९२॥(मोक्षपाहुड़)
अर्थ :- यदि लज्जासे, भयसे, व बड़ाईसे भी कुत्सित् देवको, कुत्सित् धर्मको व कुत्सित् ®लगको वन्दता है तो मिथ्या¹ष्िट होता है.
इसलिये जो मिथ्यात्वका त्याग करना चाहे। वह पहले कुदेव, कुगुरु, कुधर्मका त्यागी हो. सम्यक्तत्वके पच्चीस मलोंके त्यागमें भी अमूढ़¹ष्िटमें व षडायतनमें इन्हींका त्याग कराया है। इसलिये इनका अवश्य त्याग करना.
तथा कुदेवादिकके सेवनसे जो मिथ्यात्वभाव होता है सो वह हिंसादिक पापोंसे बड़ा पाप है. इसके फलसे निगोद, नरकादि पर्यायें पायी जाती हैं. वहाँ अनन्तकालपर्यन्त महा संकट पााया जाता है, सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति महा दुर्लभ हो जाती है.
यही—षट्पाहुड़में कहा है :-
कुच्छियधम्मम्मि रओ कुच्छियपासंडिभत्तिसंजुत्तो.
कुच्छियतवं कुणंतो कुच्छियगइभायणोहोइं ॥१४०॥(भावपाहुड़)
अर्थ :- जो कुत्सित धर्ममें रत है, कुत्सित पाखण्िडयोंकी भक्तिसे संयुक्त है, कुत्सित तपको करता है। वह जीव कुत्सित अर्थात् खोटी गतिको भोगनेवाला होता है.
सो हे भव्यो ®कचित्मात्र लोभसे व भयसे कुदेवादिकका सेवन करके जिससे अनन्तकाल पर्यन्त महादु:ख सहना होता है ऐसा मिथ्यात्वभाव करना योग्य नहीं है.
जिनधर्ममें यह तो आम्नाय है कि पहले बड़ा पाप छुड़ाकर फिर छोटा पाप छुड़ाया है। इसलिये इस मिथ्यात्वको सप्तव्यसनादिकसे भी बड़ा पाप जानकर पहले छुड़ाया है. इसलिये जो पापके फलसे डरते हैं, अपने आत्माको दु:खसमुद्रमें नहीं डुबाना चाहते, वे जीव इस मिथ्यात्वको अवश्य छोड़ो। निन्दा-प्रशंसादिकके विचारसे शिथिल होना योग्य नहीं है. क्तयोंकि नीतिमें भी ऐसा कहा है :-
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्.
अद्यैव वास्तु मरणं तु युगान्तरे वा
न्यायात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा: ॥८४॥(नीतिशतक)
कोई निन्दा करता है तो निन्दा करो, स्तुति करता है तो स्तुति करो, लक्ष्मी आओ व जहाँ-तहाँ जाओ, तथा अभी मरण होओ व युगान्तरमें होओ। परन्तु नीतिमें निपुण पुरुष न्यायमार्गसे एक डग भी चलित नहीं होते.
ऐसा न्याय विचारकर निन्दा-प्रशंसादिकके भयसे, लोभादिकसे, अन्यायरूप मिथ्यात्व प्रवृत्ति करना युक्त नहीं है.
अहोदेव-गुरु-धर्मतोसर्वोत्कृष्टपदार्थहैं,इनकेआधारसेधर्महै.इनमें शिथिलता रखनेसे अन्य धर्म किस प्रकार होगा? इसलिये बहुत कहनेसे क्तया? सर्वथा प्रकारसे कुदेव-कुगुरु-कुधर्मका त्यागी होना योग्य है.
कुदेवादिकका त्याग न करनेसे मिथ्यात्वभाव बहुत पुष्ट होता है और वर्तमानमें यहाँ इनकी प्रवृत्ति विशेष पायी जाती है। इसलिये इनका निषेधरूप निरूपण किया है. उसे जानकर मिथ्यात्वभाव छोड़कर अपना कल्याण करो.
-इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्रमें कुदेव-कुगुरु-कुधर्म निषेध
वर्णनरूप छठवाँ अधिकार समाप्त हुआ॥६॥

सातवाँ अधिकार

जैन मिथ्या¹ष्िटयोंका विवेचन

दोहा :- इस भवतरुका मूल इक, जानहु मिथ्याभाव .
ताकौं करि निर्मूल अब, करिए मोक्ष उपाव ..
अब, जो जीव जैन हैं, जिन आज्ञा को मानते हैं, और उनके भी मिथ्यात्व रहता है, उसका वर्णन करते हैं - क्तयोंकि इस मिथ्यात्वबैरीका अंश भी बुरा है, इसलिये सूक्ष्म मिथ्यात्व भी त्यागने योग्य है.
वहाँ जिनागममें निश्चय-व्यवहाररूप वर्णन है. उनमें यथार्थ का नाम निश्चय है, उपचार का नाम व्यवहार है. इनके स्वरूप को न जानते हुए अन्यथा प्रवर्तते हैं, वही कहते हैं :-

निश्चयाभासी मिथ्या¹ष्िट

कितने ही जीव निश्चयको न जानते हुए निश्चयाभासके श्रद्धानी होकर अपनेको मोक्षमार्गी मानते हैं, अपने आत्माका सिद्धसमान अनुभव करते हैं, आप प्रत्यक्ष संसारी हैं, भ्रम से अपने को सिद्ध मानते हैं, वही मिथ्या¹ष्िट है.
शास्त्रोंमें जो सिद्ध समान आत्माको कहा है वह द्रव्य¹ष्िटसे कहा है, पर्याय अपेक्षा सिद्ध समान नहीं है. जैसे - राजा और रंक मनुष्यपने की अपेक्षा समान हैं, परन्तु राजापने और रंकपने की अपेक्षा से तो समान नहीं हंै। उसी प्रकार सिद्ध और संसारी जीवत्वपनेकी अपेक्षा समान हंै, परन्तु सिद्धपने और संसारीपने की अपेक्षा तो समान नहीं हंै. तथापि ये तो जैसे सिद्ध शुद्ध हैं, वैसे ही अपने को शुद्ध मानते हैं. परन्तु वह शुद्ध-अशुद्ध अवस्था पर्याय है। इस पर्याय अपेक्षा समानता मानी जाये तो यही मिथ्या¹ष्िट है.
तथा अपनेको केवलज्ञानादिकका सद्भाव मानते हैं, परन्तु अपनेको क्षयोपशमरूप मति-श्रुतादि ज्ञानका सद्भाव है, क्षायिकभाव तो कर्मका क्षय होनेपर होता है और ये भ्रमसे कर्मका क्षय हुए बिना ही क्षायिकभाव मानते हैं, सो यही मिथ्या¹ष्िट है.
शास्त्रमें सर्व जीवोंका केवलज्ञान स्वभाव कहा है, वह शक्ति अपेक्षासे कहा है। क्तयोंकि सर्व जीवोंमें केवलज्ञानादिरूप होनेकी शक्ति है, वर्त्तमान व्यक्तता तो व्यक्त होनेपर ही कही जाती है.
कोई ऐसा मानता है कि आत्माके प्रदेशोंमें तो केवलज्ञान ही है, ऊपर आवरण होनेसे प्रगट नहीं होता, सो यह भ्रम है. यदि केवलज्ञान हो तो वज्रपटलादि आडे़ होनेपर भी वस्तु को जानता है। कर्म आडे़ आने पर वह कैसे अटकेगा? इसलिये कर्मके निमित्तसे केवलज्ञानका अभाव ही है. यदि इसका सर्वदा सद्भाव रहता तो इसे पारिणामिकभाव कहते, परन्तु यह तो क्षायिकभाव है.‘सर्वभेद जिसमें ग°भत हैं ऐसा चैतन्यभाव, सो पारिणामिकभाव है.’इसकी अनेक अवस्थाएँ मतिज्ञानादिरूप व केवलज्ञानादिरूप हैं, सो यह पारिणामिकभाव नहीं हैं. इसलिये केवलज्ञानका सर्वदा सद्भाव नहीं मानना.
तथा शास्त्रोंमें जो सूर्यका दृष्टान्त दिया है उसका इतना ही भाव लेना कि जैसे मेघपटलहोतेहुएसूर्यकाप्रकाशप्रगटनहींहोता,उसीप्रकारकर्मउदयहोतेहुए केवलज्ञान नहीं होता. तथा ऐसे भाव नहीं लेना कि जैसे सूर्य में प्रकाश रहता है वैसे आत्मा में केवलज्ञान रहता है। क्तयोंकि दृष्टान्त सर्व प्रकार से मिलता नहीं है. जैसे - पुद्गलमें वर्ण गुण है, उसकी हरित-पीतादि अवस्थाएँ हैं, सो वर्त्तमान में कोई अवस्था होने पर अन्य अवस्था का अभाव है। उसी प्रकार आत्मामें चैतन्यगुण है, उसकी मतिज्ञानादिरूप अवस्थाएँ हैं, सो वर्त्तमान में कोई अवस्था होने पर अन्य अवस्थाका अभाव ही है.
तथा कोई कहे कि आवरण नाम तो वस्तुको आच्छादित करने का है। केवलज्ञानका सद्भाव नहीं है तो केवलज्ञानावरण किसलिये कहते हो?
उत्तर :- यहाँ शक्ति है, उसे व्यक्तत न होने दे। इस अपेक्षा आवरण कहा है. जैसे - देशचारित्रका अभाव होनेपर शक्ति घातनेकी अपेक्षा अप्रत्याख्यानावरण कषाय कहा, उसी प्रकार जानना.
तथा ऐसा जानना कि वस्तुमें परनिमित्तसे जो भाव हो उसका नाम औपाधिकभाव है और परनिमित्त के बिना जो भाव हो उसका नाम स्वभावभाव है. जैसे - जलको अग्निका निमित्त होनेपर उष्णपना हुआ, वहाँ शीतलपनेका अभाव ही है। परन्तु अग्निका निमित्त मिटने पर शीतलता ही हो जाती है इसलिये सदाकाल जलका स्वभाव शीतल कहा जाता है, क्तयोंकि ऐसी शक्ति सदा पायी जाती है और व्यक्तत होनेपर स्वभाव व्यक्तत हुआ कहते हैं. कदाचित् व्यक्ततरूप होता है. उसी प्रकार आत्माको कर्मका निमित्त होने पर अन्य रूप हुआ, वहाँ केवलज्ञानका अभाव ही है। परन्तु कर्मका निमित्त मिटने पर सर्वदा केवलज्ञान हो जाता है। इसलिये सदाकाल आत्माका स्वभाव केवलज्ञान कहा जाता है, क्तयोंकि ऐसी शक्ति सदा पायी जाती है. व्यक्तत होने पर स्वभाव व्यक्तत हुआ कहा जाता है.
तथा जैसे शीतल स्वभावके कारण उष्ण जलको शीतल मानकर पानादि करे तो जलना ही होगा। उसी प्रकारकेवलज्ञानस्वभावके कारण अशुद्ध आत्माको केवलज्ञानी मानकर अनुभव करे तो दु:खी ही होगा.
इसप्रकार जो आत्माका केवलज्ञानादिरूप अनुभव करते हैं वे मिथ्या¹ष्िट हैं.
तथा रागादिक भाव अपनेको प्रत्यक्ष होनेपर भी भ्रम से आत्माको रागादि रहित मानते हैं. सो पूछते हैं कि ये रागादिक तो होते दिखाई देते हैं, ये किस द्रव्यके अस्तित्व में हैं? यदि शरीर या कर्मरूप पुद्गलके अस्तित्व में हों तो ये भाव अचेतन या मूर्तिक होंगे। परन्तु ये रागादिक तो प्रत्यक्ष चेतनता सहित अमूर्तिक भाव भासित होते हैं. इसलिये ये भाव आत्मा ही के हैं.
यही समयसार कलश में कहा है :-
कार्यत्वादकृतं न कर्म न च तज्जीवप्रकृत्योर्द्वयो -
रज्ञाया: प्रकृते: स्वकार्यफलभुग्भावानुषंगात्कृति: .
नैकस्या: प्रकृतेरचित्त्ववलसनाज्जीवोऽस्य कर्ता ततो
जीवस्यैव च कर्म तच्चिदनुगं ज्ञाता न यत्पुद्गल: ॥२०३॥
इसका अर्थ यह है - रागादिरूप भावकर्म है सो किसीके द्वारा नहीं किया गया ऐसा नहीं है, क्तयोंकि यह कार्यभूत है. तथा जीव और कर्मप्रकृति इन दोनोंका भी कर्त्तव्य नहीं है, क्तयोंकि ऐसा हो तो अचेतन कर्मप्रकृति को भी उस भावकर्मका फल - सुख-दु:खका भोगना होगा। सो असम्भव है. तथा अकेली कर्मप्रकृतिका भी यह कर्त्तव्य नहीं है, क्तयोंकि उसके अचेतनपना प्रगट है. इसलिये इस रागादिकका जीव ही कर्त्ता है और यह रागादिक जीवहीका कर्म है। क्तयोंकि भावकर्म तो चेतनाका अनुसारी है, चेतना बिना नहीं होता, और पुद्गल ज्ञाता है नहीं.
इसप्रकार रागादिभाव जीवके अस्तित्वमें हैं.
अब, जो रागादिभावोंका निमित्त कर्महीको मानकर अपनेको रागादिकका अकर्त्ता मानते हैं वे कर्त्ता तो आप हैं। परन्तु आपको निरुद्यमी होकर प्रमादी रहना है, इसलिये कर्महीका दोष ठहराते हैं, सो यह दु:खदायक भ्रम है.
ऐसा ही समयसार के कलशमें कहा है :-
रागजन्मनि निमित्ततां परद्रव्यमेव कलयन्ति ये तु ते .
उत्तरन्ति न हि मोहवाहिनीं शुद्धबोधविधुरान्धबुद्धय: ॥२२१॥
इसका अर्थ :- जो जीव रागादिककी उत्पत्तिमें परद्रव्यहीका निमित्तपना मानते हैं, वे जीव - शुद्धज्ञान से रहित अन्धबुद्धि हैं जिनकी - ऐसे होते हुए मोहनदीके पार नहीं उतरते हैं.
तथा समयसारके ‘सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार’ में - जो आत्माको अकर्त्ता मानता है और यह कहता है कि कर्म ही जगाते-सुलाते हैं, परघातकर्मसे हिंसा है, वेदकर्मसे अब्रह्म है, इसलिये कर्म ही कर्त्ता है - उस जैनीको सांख्यमती कहा है. जैसे सांख्यमती आत्माको शुद्धमानकर स्वच्छन्द होता है, उसी प्रकार यह हुआ.
तथा इस श्रद्धान से यह दोष हुआ कि रागादिकको अपना नहीं जाना, अपनेको अकर्त्ता माना, तब रागादिक होने का भय नहीं रहा तथा रागादिकको मिटाने का उपाय करना नहीं रहा। तब स्वच्छन्द होकर खोटे कर्मोंका बन्ध करके अनन्त संसारमें रुलता है.
यहाँ प्रश्न है कि समयसार में ही ऐसा कहा है :-
—वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा भिन्ना भावा: सर्व एवास्य पुंस:
इसका अर्थ :- वर्णादिक अथवा रागादिक भाव हैं वे सभी इस आत्मा से भिन्न हैं. तथा वहीं रागादिक को पुद्गलमय कहा है, तथा अन्य शास्त्रोंमें भी आत्माको रागादिकसे भिन्न कहा है। सो वह किस प्रकार है?
उत्तर :- रागादिकभाव परद्रव्यके निमित्त से औपाधिकभाव होते हैं, और यह जीव उन्हें स्वभाव जानता है. जिसे स्वभाव जाने उसे बुरा कैसे मानेगा और उसके नाश का उद्यम किसलिये करेगा? इसलिये यह श्रद्धान भी विपरीत है. उसे छुड़ाने के लिये स्वभाव की अपेक्षा रागादिकको भिन्न कहा है और निमित्तकी मुख्यता से पुद्गलमय कहा है. जैसे - वैद्य रोग मिटाना चाहता है। यदि शीत की अधिकता देखता है तब उष्ण औषधि बतलाता है, और यदि आतापकी अधिकता देखता है तब शीतल औषधि बतलाता है. उसी प्रकार श्री गुरु रागादिक छुड़ाना चाहते हैं। जो रागादिकको परका मान कर स्वच्छन्द होकर निरुद्यमी होता है, उसे उपादान कारणकी मुख्यतासे रागादिक आत्माके हैं - ऐसा श्रद्धान कराया है। तथा जो रागादिक को अपना स्वभाव मानकर उनके नाश का उद्यम नहीं करता, उसे निमित्तकारण की मुख्यतासे रागादिक परभाव हैं - ऐसा श्रद्धान कराया है.
दोनों विपरीत श्रद्धानोंसे रहित होनेपर सत्य श्रद्धान होगा तब ऐसा मानेगा कि ये रागादिक भाव आत्मा का स्वभाव तो नहीं हंै, कर्मके निमित्तसे आत्मा के अस्तित्व में विभाव पर्यायरूप से उत्पन्न होते हैं, निमित्त मिटने पर इनका नाश होने से स्वभावभाव रह जाता है। इसलिये इनके नाश का उद्यम करना.
यहाँ प्रश्न है कि यदि कर्मके निमित्तसे होते हैं तो कर्मका उदय रहेगा तब तक यह विभाव दूर कैसे होंगे? इसलिये इसका उद्यम करना तो निरर्थक है?
उत्तर :- एक कार्य होने में अनेक कारण चाहिये. उनमें जो कारण बुद्धिपूर्वक हों उन्हें तो उद्यम करके मिलाये, और अबुद्धिपूर्वक कारण स्वयमेव मिलें तब कार्यसिद्धि होती है. जैसे - पुत्रहोने का कारण बुद्धिपूर्वक तो विवाहादि करना है, और अबुद्धिपूर्वक भवितव्य है। वहाँ पुत्रका अर्थी विवाहादिका तो उद्यम करे, और भवितव्य स्वयमेव हो तब पुत्र होगा. उसी प्रकार विभााव दूर करने के कारण बुद्धिपूर्वक तो तत्त्ववविचारादि हैं, और अबुद्धिपूर्वक मोहकर्मके उपशमादिक हैं। सो उसका अर्थी तत्त्ववविचारादिकका तो उद्यम करे, और मोहकर्मके उपशमादिक स्वयमेव हों तब रागादिक दूर होते हैं.
यहाँ ऐसा कहते हैं कि जैसे विवाहादिक भी भवितव्य आधीन हैं। उसी प्रकार तत्त्ववविचारादिक भी कर्मके क्षयोपशमादिकके आधीन हैं। इसलिये उद्यम करना निरर्थक है?
उत्तर :- ज्ञानावरणका तो क्षयोपशम तत्त्ववविचारादिक करने योग्य तेरे हुआ है। इसलिये उपयोगको वहाँ लगानेका उद्यम कराते हैं. असंज्ञी जीवोंके क्षयोपशम नहीं है, तो उन्हें किसलिये उपदेश दें?
तब वह कहता है - होनहार हो तो वहाँ उपयोग लगे, बिना होनहार कैसे लगे?
उत्तर :- यदि ऐसा श्रद्धान है तो सर्वत्र किसी भी कार्यका उद्यम मत कर. तू खान-पान-व्यापारादिकका तो उद्यम करता है और यहाँ होनहार बतलाता है. इससे मालूम होता है कि तेरा अनुराग यहाँ नहीं है, मानादिकसे ऐसी झूठी बातें बनाता है.
इसप्रकार जो रागादिक होते हुए आत्माको उनसे रहित मानते हैं, उन्हें मिथ्या¹ष्िट जानना.
तथा कर्म-नोकर्मका सम्बन्ध होते हुए आत्माको निर्बन्ध मानते हैं, सो इनका बन्धन प्रत्यक्ष देखा जाता है, ज्ञानावरणादिकसे ज्ञानादिकका घात देखा जाता है, शरीर द्वारा उसके अनुसार अवस्थाएँ होती देखी जाती है, फिर बन्धन कैसे नहीं है? यदि बन्धन न होतो मोक्षमार्गी इनके नाश का उद्यम किस लिये करे?
यहाँ कोई कहे कि शास्त्रोंमें आत्माको कर्म-नोकर्मसे भिन्न अबद्धस्पृष्ट कैसे कहा है?
उत्तर :- सम्बन्ध अनेक प्रकारके हैं. वहाँ तादात्म्यसम्बन्धकी अपेक्षा आत्माको कर्म- नोकर्मसे भिन्न कहा है, क्तयोंकि द्रव्य पलटकर एक नहीं हो जाते, और इसी अपेक्षासे अबद्धस्पृष्ट कहा है. तथा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धकी अपेक्षा बन्धन है ही, उनके निमित्त से आत्माअनेकअवस्थाएँधारणकरताहीहै।इसलियेअपनेकोसर्वथानिर्बन्धमानना मिथ्या¹ष्िट है.
यहाँ कोई कहे कि हमें तो बन्ध-मुक्तिका विकल्प करना नहीं, क्तयोंकि शास्त्रमें ऐसा कहा है :-
—जइ बद्धउ मुक्तकउ मुणहि सो बंधियहि णिभंतु.
अर्थ :- जो जीव बंधा और मुक्त हुआ मानता है वह नि:संदेह बँधता है.
उससे कहते हैं। जो जीव केवल पर्याय¹ष्िट होकर बंध-मुक्त अवस्थाहीको मानते हैं, द्रव्यस्वभावका ग्रहण नहीं करते। उन्हें ऐसा उपदेश दिया है कि द्रव्यस्वभाव को न जानता हुआ जो जीव बंधा-मुक्त हुआ मानता है वह बंधता है. तथा यदि सर्वथा ही बंध-मुक्ति न हो तो यह जीव बँधता है - ऐसा क्तयों कहें? तथा बंधके नाशका - मुक्त होनेका उद्यम किसलिये किया जाये? और किसलिये आत्मानुभव किया जाये? इसलिये द्रव्य¹ष्िटसे एक दशा है और पर्याय ¹ष्िटसे अनेक अवस्थाएँ होती हैं - ऐसा मानना योग्य है.
ऐसे ही अनेक प्रकार से केवल निश्चयनयके अभिप्रायसे विरुद्ध श्रद्धानादि करता है.
जिनवाणीमें तो नाना नयों कि अपेक्षासे कहीं कैसा, कहीं कैसा निरूपण किया है। यह अपने अभिप्रायसे निश्चयनयकी मुख्यता से जो कथन किया हो - उसीको ग्रहण करके मिथ्या¹ष्िटको धारण करता है.
तथा जिनवाणीमें तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी एकता होने पर मोक्षमार्ग कहा है। सो इसके सम्यग्दर्शन-ज्ञानमें सात तत्त्ववोंका श्रद्धान और जानना होना चाहिए सो उनका विचार नहीं है, और चारित्रमें रागादिक दूर करना चाहिए उसका उद्यम नहीं है। एक अपने आत्माके शुद्ध अनुभवनको ही मोक्षमार्ग जानकर संतुष्ट हुआ है. उसका अभ्यास करनेको अन्तरंगमें ऐसा चिंतवन करता रहता है कि मैं ‘सिद्धसमान शुद्ध हूँ, केवलज्ञानादि सहित हूँ, द्रव्यकर्म-नोकर्म रहित हूँ, परमानंदमय हूँ, जन्म-मरणादि दु:ख मेरे नहीं हैं’। इत्यादि चिंतवन करता है.
सो यहाँ पूछते हैं कि यह चिंतवन यदि द्रव्य¹ष्िटसे करते हो तो द्रव्यतो शुद्ध-अशुद्ध सर्व पर्यायोंका समुदाय है। तुम शुद्धही अनुभवन किसलिये करते हो? और पर्याय¹ष्िटसे करते हो तो तुम्हारे तो वर्त्तमान अशुद्ध पर्याय है। तुम अपनेको शुद्ध कैसे मानते हो?
तथा यदि शक्तिअपेक्षा शुद्ध मानते हो तो ‘मैं ऐसा होने योग्य हूँ’ - ऐसा मानो। ‘मैं ऐसा हूँ’ - ऐसा क्तयों मानते हो? इसलिये अपनेको शुद्धरूप चिंतवन करना भ्रम है.कारण कि तुमने अपने को सिद्ध समान माना तो यह संसार अवस्था किसकी है? और तुम्हारे केवलज्ञानादि हैं तो यह मतिज्ञानादिक किसके हैं? और द्रव्यकर्म, नोकर्मरहित हो तो ज्ञानादिककी व्यक्तता क्तयों नहीं है? परमानंदमय हो तो अब कर्त्तव्य क्तया रहा? जन्म- मरणादि दु:ख नहीं हैं तो दु:खी कैसे होते हो? - इसलिये अन्य अवस्थामें अन्य अवस्था मानना भ्रम है.
यहाँ कोई कहे कि शास्त्रमें शुद्ध चिंतवन करनेका उपदेश कैसे दिया है?
उत्तर :- एक तो द्रव्य अपेक्षा शुद्धपना है, एक पर्याय अपेक्षा शुद्धपना है. वहाँ द्रव्य अपेक्षा तो परद्रव्यसे भिन्नपना और अपने भावों से अभिन्नपना - उसका नाम शुद्धपना है. और पर्याय अपेक्षा औपाधिकभावोंका अभाव होनेका नाम शुद्धपना है. सो शुद्ध चिंतवनमें द्रव्य अपेक्षा शुद्धपना ग्रहण किया है. वही समयसार व्याख्यामें कहा है :-
—एष एवाशेषद्र्रव्यान्तरभावेभ्यो भिन्नत्वेनोपास्यमान: शुद्ध इत्यभिलप्यते.
(गााथा ६ की टीका)
इसका अर्थ यह है कि आत्मा प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं है. सो यही समस्त परद्रव्योंके भावोंसे भिन्नपने द्वारा सेवन किया गया शुद्ध ऐसा कहा जाता है.
तथा वहीं ऐसा कहा है :-
—समस्तकारकचक्रप्रक्रियोत्तीर्णनिर्मलानुभूतिमात्रत्वाच्छुद्ध:.
(गााथा ७३ की टीका)
अर्थ :- समस्त ही कर्त्ता, कर्म आदि कारकोंके समूहकी प्रक्रियासे पारंगत ऐसी निर्मल अनुभूति, जो अभेदज्ञान तन्मात्र है, उससे शुद्ध है. इसलिये ऐसा शुद्ध शब्दका अर्थ जानना.
तथा इसीप्रकार केवल शब्दका अर्थ जानना - ‘जो परभावसे भिन्न नि:केवल आप ही’ - उसका नाम केवल है. इसी प्रकार अन्य यथाार्थ अर्थका अवधारण करना.
पर्याय अपेक्षा शुद्धपना माननेसे तथा अपनेको केवली माननेसे महाविपरीतता होती है, इसलिये अपनेको द्रव्य-पर्यायरूप अवलोकन करना. द्रव्यसे सामान्यस्वरूप अवलोकन करना, पर्यायमें अवस्था विशेष अवधारण करना.
इसी प्रकार चिंतवन करनेसे सम्यग्¹ष्िट होता है, क्तयोंकि सच्चा अवलोकन किये बिना सम्यग्¹ष्िट नाम कैसे प्राप्त करे? निश्चयाभासी की स्वच्छन्दता और उसका निषेध
तथा मोक्षमार्गमें तो रागादिक मिटानेका श्रद्धा-ज्ञान-आचरण करना है। वह तो विचारहीनहींहै,अपनेशुद्धअनुभवनमेंहीअपनेकोसम्यग्¹ष्िटमानकरअन्यसर्व साधनोंका निषेध करता है.
शास्त्राभ्यासकरनानिरर्थकबतलाताहै,द्रव्यादिककेतथागुणस्थान-मार्गणा- त्रिलोकादिकके विचारको विकल्प ठहराता है, तपश्चरण करनेको वृथा क्तलेश करना मानता है, व्रतादिक धारण करनेको बन्धनमें पड़ना ठहराता है, पूजनादि कार्योंको शुभास्रव जानकर हेय प्ररूपित करता है। - इत्यादि सर्वसाधनोंको उठाकर प्रमादी होकर परिणमित होता है.
यदि शास्त्राभ्यास निरर्थक हो तो मुनियोंके भी तो ध्यान और अध्ययन दो ही कार्य मुख्य हैं. ध्यान में उपयोग न लगे तब अध्ययनहीमें उपयोगको लगाते हैं, बीचमें अन्य स्थान उपयोग लगाने योग्य नहीं है. तथा शास्त्राभ्यास द्वारा तत्त्ववोंको विशेष जाननेसे सम्यग्दर्शन- ज्ञान निर्मल होता है. तथा वहाँ जब तक उपयोग रहे तब तक कषाय मन्द रहे और आगामी वीतरागभावोंकी वृद्धि हो। ऐसे कार्यको निरर्थक कैसे मानें?
तथा वह कहता है कि जिन शास्त्रोंमें अध्यात्म-उपदेश है उनका अभ्यास करना, अन्य शास्त्रोंके अभ्याससे कोई सिद्धि नहीं है.
उससे कहते हैं - यदि तेरे सच्ची दृष्िट हुई है तो सभी जैन शास्त्र कार्यकारी हैं. वहाँ भी मुख्यत: अध्यात्म-शास्त्रोंमें तो आत्मस्वरूपका मुख्य कथन है। सो सम्यग्¹ष्िट होने पर आत्मस्वरूपका निर्णयतो हो चुका, तब तो ज्ञानकी निर्मलताके अर्थ व उपयोगको मन्दकषायरूप रखनेके अर्थ अन्य शास्त्रोंका अभ्यास मुख्य चाहिये. तथा आत्मस्वरूपका निर्णय हुआ है, उसे स्पष्ट रखनेके अर्थ अध्यात्म-शास्त्रोंका भी अभ्यास चाहिये। परन्तु अन्य शास्त्रोंमें अरुचि तो नहीं होना चाहिये. जिसको अन्य शास्त्रोंकी अरुचि है उसे अध्यात्मकी रूचि सच्ची नहीं है.
जैसे जिसके विषयासक्तपना हो - वह विषयासक्त पुरुषोंकी कथा भी रुचिपूर्वक सुने व विषयके विशेषको भी जाने व विषयके आचरणमें जो साधन हों उन्हें भी हितरूप माने व विषयके स्वरूपको भी पहिचाने। उसी प्रकार जिसके आत्मरुचि हुई हो - वह आत्मरुचिके धारकतिर्थंकरादिकेपुराणोंकोभीजानेतथाआत्माकेविशेषजाननेकेलिये गुणस्थानादिकको भी जाने. तथा आत्मआचरणमें जो व्रतादिक साधन हैं उनको भी हितरूप माने तथा आत्माके स्वरूपको भी पहिचाने. इसलिये चारों ही अनुयोग कार्यकारी हैं.
तथा उनका अच्छा ज्ञान होनेके अर्थ शब्द-न्यायशास्त्रादिकको भी जानना चाहिये. इसलिये अपनी शक्तिके अनुसार सभीका थोड़ा या बहुत अभ्यास करना योग्य है.
फिर वह कहता है - ‘पद्मनन्दि पच्चीसी’में ऐसा कहा है कि आत्मस्वरूपसे निकलकर बाह्य शास्त्रोंमें बुद्धि विचरती है, सो वह बुद्धि व्यभिचारिणी है?
उत्तर :- यह सत्य कहा है. बुद्धि तो आत्माकी है। उसे छोड़कर परद्रव्य - शास्त्रोंमें अनुरागिनी हुई। उसे व्यभिचारिणी ही कहा जाता है.
परन्तु जैसे स्त्री शीलवती रहे तो योग्य ही है, और न रहा जाये तब उत्तम पुरुष को छोड़कर चांडालादिकका सेवन करनेसे तो अत्यन्त निन्दनीय होगी। उसी प्रकार बुद्धि आत्मस्वरूपमें प्रवर्ते तो योग्य ही है, और न रहा जाये तो प्रशस्त शास्त्रादि परद्रव्योंको छोड़कर अप्रशस्त विषयादिमें लगे तो महानिन्दनीय ही होगी. सो मुनियोंकी भी स्वरूपमें बहुत काल बुद्धि नहीं रहती, तो तेरी कैसे रहा करे?
इसलिये शास्त्राभ्यासमें उपयोग लगाना योग्य है.
तथा यदि द्रव्यादिकके और गुणस्थानादिकके विचारको विकल्प ठहराता है, सो विकल्प तो है। परन्तु निर्विकल्प उपयोग न रहे तब इन विकल्पोंको न करे तो अन्य विकल्प होंगे, वे बहुत रागादि गर्भित होते हैं. तथा निर्विकल्पदशा सदा रहती नहीं है। क्तयोंकि छद्मस्थका उपयोग एकरूप उत्कृष्ट रहे तो अन्तर्मुहूर्त रहता है.
तथा तू कहेगा कि मैं आत्मस्वरूपहीका चिंतवन अनेक प्रकार किया करूँगा। सो सामान्य चिंतवन में तो अनेक प्रकार बनते नहीं हैं, और विशेष करेगा तो द्रव्य-गुण-पर्याय, गुणस्थान, मार्गणा, शुद्ध-अशुद्ध अवस्था इत्यादि विचार होगा.
और सुन, केवल आत्मज्ञानहीसे तो मोक्षमार्ग होता नहीं है. सात तत्त्ववोंका श्रद्धान- ज्ञानहोनेपरतथारागादिकदूरकरनेपरमोक्षमार्गहोगा.सोसाततत्त्ववोंकेविशेष जाननेको जीव-अजीवके विशेष तथा कर्मके आस्रव-बन्धादिकके विशेष अवश्य जानने योग्य हैं, जिनसे सम्यग्दर्शन-ज्ञान की प्राप्ति हो.
और वहाँ पश्चात् रागादिक दूर करना. सो जोरागादिक बढ़ानेके कारण हैं उन्हें छोड़कर - जो रागादिक घटानेके कारण हों वहाँ उपयोगको लगाना. सो द्रव्यादिक और गुणस्थानादिकके विचार रागादिक घटानेके कारण हैं. इनमें कोई रागादिकका निमित्त नहीं है. इसलिये सम्यग्¹ष्िट होनेके पश्चात् भी यहाँ ही उपयोग लगाना.
फिर वह कहता है कि रागादि मिटानेके कारण हों उनमें तो उपयोग लगाना - परन्तु त्रिलोकवर्ती जीवोंकी गति आदिका विचार करना। कर्मके बन्ध, उदय, सत्तादिके बहुत विश्ोष जानना तथा त्रिलोकके आकार प्रमाणादिक जानना। - इत्यादि विचार क्तया कार्यकारी हैं?
उत्तर :- इनके भी विचार करनेसे रागादिक बढ़ते नहीं हैं, क्तयोंकि वे ज्ञेय इसको इष्ट-अनिष्टरूप हैं नहीं, इसलिये वर्त्तमान रागादिकके कारण नहीं हैं. तथा इनको विशेष जाननेसे तत्त्ववज्ञान निर्मल हो, इसलिये आगामी रागादिक घटानेको ही कारण हैं, इसलिये कार्यकारी हैं.
फिर वह कहता है - स्वर्ग-नरकादिको जाने वहाँ तो राग-द्वेष होता है?
समाधान :- ज्ञानीके तो ऐसी बुद्धि होती नहीं है, अज्ञानीके होती है. वहाँ पाप छोड़कर पुण्य-कार्यमें लगे वहाँ किंचित् रागादिक घटते ही हैं.
फिर वह कहता है - शाास्त्रमें ऐसा उपदेशा है किप्रयोजनभूत थोड़ाही जानना कार्यकारी है, इसलिये बहुत विकल्प किसलिये करें?
उत्तर :- जो जीव अन्य बहुत जानते हैं और प्रयोजनभूतको नहीं जानते। अथवा जिनकीबहुतजाननेकीशाक्तिनहीं,उन्हेंयहउपदेशदियाहै.तथाजिसकीबहुत जाननेकी शाक्ति हो उससे तो यह नहीं कहा कि बहुत जाननेसे बुरा होगा? जितना बहुत जानेगा उतना प्रयोजनभूत जानना निर्मल होगा. क्तयोंकि शास्त्रमें ऐसा कहा है :-
—सामान्यशास्त्रतो नूनं विशेषो बलवान् भवेत् .
इसका अर्थ यह है :- सामान्य शास्त्रसे विशेष बलवान है. विशेषसे ही अच्छी तरह निर्णय होता है, इसलिये विशेष जानना योग्य है.
तथा वह तपश्चरण को वृथा क्तलेश ठहराता है। सो मोक्षमार्गी होनेपर तो संसारी जीवोंसे उल्टी परिणति चाहिये. संसारियोंको इष्ट-अनिष्ट सामग्रीसे राग-द्वेष होता है, इसके राग-द्वेष नहीं होना चाहिये. वहाँ राग छोड़नेके अर्थ इष्ट सामग्री भोजनादिकका त्यागी होता है, और द्वेष छोड़नेके अर्थ अनिष्ट सामग्री अनशनादिको अंगीकार करता है. स्वाधीनरूपसे ऐसा साधन हो तो पराधीन इष्ट-अनिष्ट सामग्री मिलने पर भी राग-द्वेष न हो, सो होना तो ऐसा ही चाहिये। परन्तु तुझे अनशनादिसे द्वेष हुआ, इसलिये उसे क्तलेश ठहराया. जबयह क्तलेश हुआ तब भोजन करना सुख स्वयमेव ठहरा और वहाँ राग आया। सो ऐसी परिणति तो संसारियोंके पाई ही जाती है, तूने मोक्षमार्गी होकर क्तया किया?
यदि तू कहेगा - कितने ही सम्यग्¹ष्िट भी तपश्चरण नहीं करतेहैं.
उत्तर :- कारण विशेषसे तप नहीं हो सकता, परन्तु श्रद्धानमें तो तपको भला जानते हैं और उसके साधनका उद्यम रखते हैं. तुझे तो श्रद्धान यह है कि तप करना क्तलेश है, तथा तपका तेरे उद्यम नहीं है, इसलिये तुझे सम्यग्¹ष्िट कैसे हो?
फिर वह कहता है - शास्त्रमें ऐसा कहा है कि तप आदिका क्तलेश करता है तो करो, ज्ञान बिना सिद्धि नहीं है?
उत्तर :- जो जीव तत्त्ववज्ञानसे तो परा¢्मुख हैं, तपहीसे मोक्ष मानते हैं, उनको ऐसा उपदेश दिया है - तत्त्ववज्ञानके बिना केवल तपहीसे मोक्षमार्ग नहीं होता. तथा तत्त्ववज्ञान होनेपर रागादिक मिटाने के अर्थ तप करनेका तो निषेध है नहीं. यदि निषेध हो तो गणधरादिक तप किसलिए करें? इसलिये अपनी शक्ति अनुसार तप करना योग्य है.
तथा वह व्रतादिकको बन्धन मानता है। सो स्वच्छन्दवृत्ति तो अज्ञान अवस्थामें ही थी, ज्ञान प्राप्त करने पर तो परिणतिको रोकता ही है. तथा उस परिणतिको रोकनेके अर्थ बाह्य हिंसादिक कारणोंका त्यागी अवश्य होना चाहिये.
फिर वह कहता है - हमारे परिणाम तो शुद्ध हैं। बाह्य त्याग नहीं किया तो नहीं किया?
उत्तर :- यदि यह हिंसादि कार्य तेरे परिणाम बिना स्वयमेव होते हों तो हम ऐसा मानें. और यदि तू अपने परिणामसे कार्य करता है तो वहाँ तेरे परिणाम शुद्ध कैसे कहें? विषय-सेवनादि क्रिया अथवा प्रमादरूप गमनादि क्रिया परिणाम बिना कैसे हो? वह क्रिया तो स्वयं उद्यमी होकर तू करता है और वहाँ हिंसादिक होते हैं उन्हें गिनता नहीं है, परिणाम शुद्ध मानता है. सो ऐसी मान्यतासे तेरे परिणाम अशुद्ध ही रहेंगे.
फिर वह कहता है - परिणामोंको रोकें, बाह्य हिंसादिक भी कम करें। परन्तु प्रतिज्ञा करनेमें बन्धन होता है, इसलिये प्रतिज्ञारूप व्रत अंगीकार नहीं करना?
समाधान :- जिस कार्यको करनेकी आशा रहे उसकी प्रतिज्ञा नहीं लेते. और आशा रहे उससे राग रहता है. उस रागभावसे बिना कार्य किये भी अविरतिसे कर्मबन्ध होता रहता है। इसलिये प्रतिज्ञा अवश्य करने योग्य है. तथा कार्य करनेका बन्धन हुए बिना परिणाम कैसे रुकेंगे? प्रयोजन पड़ने पर तद्रूप परिणाम होंगे ही होंगे, तथा बिना प्रयोजन पडे़ उसे आशा रहती है। इसलिये प्रतिज्ञा करना योग्य है.
फिर वह कहता है - न जाने कैसा उदय आये और बादमें प्रतिज्ञा भंग हो, तो महापाप लगता है. इसलिये प्रारब्ध अनुसार कार्य बने सो बनो, प्रतिज्ञाका विकल्प नहीं करना?
समाधान :- प्रतिज्ञा ग्रहण करते हुए जिसका निर्वाह होता न जाने, वह प्रतिज्ञा तो न करे। प्रतिज्ञा लेते ही यह अभिप्राय रहे कि प्रयोजन पड़ने पर छोड़ दूँगा, तो वह प्रतिज्ञा क्तया कार्यकारी हुई?प्रतिज्ञा ग्रहण करते हुए तो यह परिणाम है कि मरणान्त होनेपर भी नहीं छोड़ूँगा, तो ऐसी प्रतिज्ञा करना युक्त ही है.बिना प्रतिज्ञा किये अविरत सम्बन्धी बन्ध नहीं मिटता.
तथा आगामी उदयके भयसे प्रतिज्ञा न ली जाये, तो उदयको विचारनेसे सर्व ही कर्त्तव्यका नाश होता है. जैसे- अपनेको पचता जाने उतना भोजन करे. कदाचित् किसीको भोजनसे अजीर्ण हुआ हो, और उस भयसे भोजन करना छोड़ दे तो मरण ही होगा. उसी प्रकार अपनेसे निर्वाह होता जाने उतनी प्रतिज्ञा करे. कदाचित् किसीके प्रतिज्ञासे भ्रष्टपना हुआ हो और उस भयसे प्रतिज्ञा करना छोड़ दे तो असंयम ही होगा। इसलिये जो बन सके वह प्रतिज्ञा लेना योग्य है.
तथा प्रारब्ध अनुसार तो कार्य बनता ही है, तू उद्यमी होकर भोजनादि किसलिये करता है? यदि वहाँ उद्यम करता है तो त्याग करनेका भी उद्यम करना योग्य ही है. जब प्रतिमावत् तेरी दशा हो जायेगी तब हम प्रारब्ध ही मानेंगे, तेरा कर्त्तव्य नहीं मानेंगे. इसलिये स्वच्छन्द होनेकी युक्ति किसलिये बनाता है? बने वह प्रतिज्ञा करके व्रत धारण करना योग्य ही है.
तथा वह पूजनादि कार्यको शुभास्रव जानकर हेय मानता है, सो यह सत्य ही है। परन्तुयदिइनकार्योंकोछोड़करशुद्धोपयोगरूपहोतोभलाहीहै,औरविषय- कषायरूप-अशुभरूप प्रवर्ते तो अपना बुरा ही किया.
शुभोपयोगसे स्वर्गादि हों, अथवा भली वासनासे या भले निमित्त से कर्मके स्थिति- अनुभाग घट जायें तो सम्यक्तत्वादि की भी प्राप्ति हो जाये. अशुभोपयोगसे नरक-निगोदादि हों,अथवाबुरीवासनासेयाबुरेनिमित्तसेकर्मकेस्थिति-अनुभागबढ़जायेंतो सम्यक्तत्वादिक महा दुर्लभ हो जायें.
तथा शुभोपयोग होनेसे कषाय मन्द होती है और अशुभोपयोग होनेसे तीव्र होती है। सो मन्दकषायका कार्य छोड़कर तीव्रकषायका कार्य करना तो ऐसा है जैसे कड़वी वस्तु न खाना और विष खाना. सो यह अज्ञानता है.
फिर वह कहता है - शास्त्रमें शुभ-अशुभको समान कहा है, इसलिये हमें तो विशेष जानना योग्य नहीं है?
समाधान :- जो जीव शुभोपयोगको मोक्षका कारण मानकर उपादेय मानते हैं और शुद्धोपयोगको नहीं पहिचानते, उन्हें शुभ-अशुभ दोनोंको अशुद्धताकी अपेक्षा व बन्धकारणकी अपेक्षा समान बतलाया है.
तथा शुभ-अशुभका परस्पर विचार करें तो शुभभावोंमें कषाय मन्द होती है, इसलिये बन्ध हीन होता है। अशुभभावोंमें कषाय तीव्र होती है, इसलिये बन्ध बहुत होता है. इस प्रकार विचार करने पर अशुभकी अपेक्षा सिद्धान्तमें शुभको भला भी कहा जाता है. जैसे - रोग तो थोड़ा या बहुत बुरा ही है, परन्तु बहुत रोगकी अपेक्षा थोड़े रोगको भला भी कहते हैं.
इसलिये शुद्धोपयोग न हो, तब अशुभसे छूटकर शुभमें प्रवर्तना योग्य है। शुभको छोड़कर अशुभमें प्रवर्तना योग्य नहीं है.
फिर वह कहता है - कामादिक या क्षुधादिक मिटानेकी अशुभरूप प्रवृत्ति तो हुए बिना रहती नहीं है, और शुभ प्रवृत्ति इच्छा करके करनी पड़ती है। ज्ञानीको इच्छा चाहिये नहीं, इसलिये शुभका उद्यम नहीं करना?
उत्तर :- शुभ प्रवृत्तिमें उपयोग लगनेसे तथा उसके निमित्तसे विरागता बढ़नेसे कामादिक हीन होते हैं और क्षुधादिकमें भी संक्तलेश थोड़ा होता है. इसलिये शुभोपयोगका अभ्यास करना. उद्यम करने पर भी यदि कामादिक व क्षुधादिक पीडि़त करते हैं तो उनके अर्थ जिससे थोड़ा पाप लगे वह करना. परन्तु शुभोपयोगको छोड़कर नि:शंक पापरूप प्रवर्तन करना तो योग्य नहीं है.
और तू कहता है - ज्ञानीके इच्छा नहीं है और शुभोपयोग इच्छा करनेसे होता है। सो जिस प्रकार कोई पुरुष किंचित्मात्र भी अपना धन देना नहीं चाहता, परन्तु जहाँ बहुत धन जाता जाने वहाँ अपनी इच्छासे थोड़ा धन देनेका उपाय करता है। उसी प्रकार ज्ञानी किंचित्मात्र भी कषायरूप कार्य नहीं करना चाहता, परन्तु जहाँ बहुत कषायरूप अशुभ कार्य होता जाने वहाँ इच्छा करके अल्प कषायरूप शुभ कार्य करनेका उद्यम करता है.
इसप्रकार यह बात सिद्ध हुई कि जहाँ शुद्धोपयोग होता जाने वहाँ तो शुभ कार्यका निषेध ही है और जहाँ अशुभोपयोग होता जाने वहाँ शुभका उपाय करके अंगीकार करना योग्य है.
इसप्रकार अनेक व्यवहारकार्योंका उत्थापन करके जो स्वच्छन्दपनेकोस्थापित करता है, उसका निषेध किया. केवल निश्चयाभासके अवलम्बी जीवकी प्रवृत्ति
अब,उसी केवल निश्चयावलम्बी जीवकी प्रवृत्ति बतलाते हैं :-
एक शुद्धात्माको जाननेसे ज्ञानी हो जाते हैं - अन्य कुछ भी नहीं चाहिये। ऐसा जानकर कभी एकान्तमें बैठकर ध्यानमुद्रा धारण करके ‘मैं सर्व कर्मोपाधिरहित सिद्धसमान आत्मा हूँ’ - इत्यादि विचारसे संतुष्ट होता है। परन्तु यह विशेषण किसप्रकार सम्भव हैं - ऐसा विचार नहीं है. अथवा अचल, अखण्ड, अनुपमादि विशेषण द्वारा आत्माको ध्याता है। सो यह विशेषण अन्य द्रव्योंमें भी संभवित हैं. तथा यह विशेषण किस अपेक्षासे हैं सो विचार नहीं है. तथा कदाचित् सोते-बैठते जिस-तिस अवस्थामें ऐसा विचार रखकर अपनेको ज्ञानी मानता है.
तथा ज्ञानीके आसġव-बन्ध नहीं हैं - ऐसा आगममें कहा है। इसलिये कदाचित् विषय-कषायरूप होता है, वहाँ बन्ध होनेका भय नहीं है, स्वच्छन्द हुआ रागादिरूप प्रवर्तता है.
सो स्व-परको जाननेका तोचिन्ह वैराग्यभाव है. सो समयसारमें कहा है :-
—सम्यग्¹ष्टेर्भवति नियतं ज्ञानवैराग्यशक्ति:
अर्थ :- सम्यग्¹ष्िटके निश्चयसे ज्ञान-वैराग्यशक्ति होती है.
फिर कहा है :-
सम्यग्¹ष्िट:स्वयमयमहं जातु बन्धो न मे स्या-
दित्युत्तानोत्पुलकवदनारागिणोऽप्याचरन्तु .
आलम्बन्तां समितिपरतां ते यतोऽद्यापि पापा
आत्मानात्मावगमविरहात्सन्ति सम्यक्तत्वशून्या:॥१३७॥
अर्थ :- स्वयमेव यह मैं सम्यग्¹ष्िट हूँ, मेरे कदाचित् बन्ध नहीं है - इस प्रकार ऊँचा फुलाया है मुँह जिन्होंने - ऐसे रागी वैराग्यशक्ति रहित आचरण करते हैं तो करो, तथा पाँच समितिकी सावधानीका अवलम्बन लेते हैं तो लो। परन्तु वे ज्ञानशक्ति बिना आज भी पापी ही हैं. यह दोनों आत्मा-अनात्माके ज्ञानरहितपने से सम्यक्तत्वरहित ही हैं.
फिर पूछते हैं - परको पर जाना तो परद्रव्योंमें रागादि करनेका क्तया प्रयोजन रहा? वहाँ कहता है - मोहके उदयसे रागादिक होते हैं. पूर्वकालमें भरतादिक ज्ञानी हुए उनके भी विषय-कषायरूप कार्य हुआ सुनते हैं.
उत्तर :-ज्ञानीके भी मोहके उदयसे रागादिक होते हैं, यह सत्य है। परन्तु बुद्धि- पूर्वक रागादिक नहीं होते. उसका विशेष वर्णन आगे करेंगे.
तथा जिसके रागादिक होनेका कुछ विषाद नहीं है, उसके नाशका उपाय भी नहीं है, उसको रागादिक बुरे हैं - ऐसा श्रद्धान भी नहीं सम्भवित होता. और ऐसे श्रद्धान बिना सम्यग्¹ष्िट कैसे हो सकता है? जीवाजीवादि तत्त्ववोंका श्रद्धान करनेका प्रयोजन तो इतना ही श्रद्धान है.
तथा भरतादिक सम्यग्¹ष्िटयोंके विषय-कषायोंकी प्रवृत्ति जैसे होती है वह भी विशेषरूपसे आगे कहेंगे.तू उनकेउदाहरणसे स्वच्छन्द होगा तो तुझे तीव्र आसġव-बन्ध होगा.
वही कहा है :-
—मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि यदतिस्वच्छन्दमन्दोद्यमा:.
अर्थ :- ज्ञाननयका अवलोकन करनेवाले भी जो स्वच्छन्द मन्दउद्यमी होते हैं, वे संसारमें डुबते हैं.
और भी वहाँ—ज्ञानिन् कर्म न जातु कर्तु मुचितंइत्यादि कलशमें तथा—तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिन:इत्यादि कलशमें स्वच्छन्दी होनेका निषेध किया है. बिना इच्छाके जो कार्य हो वह कर्मबन्धका कारण नहीं है. अभिप्रायसे कर्त्ता होकर करे और ज्ञाता रहे यह तो बनता नहीं है - इत्यादि निरूपण किया है.
इसलिये रागादिकको बुरे - अहितकारी जानकर उनके नाश के अर्थ उद्यम रखना.
वहाँ अनुक्रमसे पहले तीव्र रागादि छोड़नेके अर्थ अशुभ कार्य छोड़कर शुभमें लगना, और पश्चात् मन्दरागादि भी छोड़नेके अर्थ शुभको भी छोड़कर शुद्धोपयोगरूप होना.
तथा कितने ही जीव अशुभमें क्तलेश मानकर व्यापारादि कार्य व स्त्री-सेवनादि कार्योंको भी घटाते हैं, तथा शुभको हेय जानकर शास्त्राभ्यासादि कार्योंमें नहीं प्रवर्तते हैं, वीतरागभावरूप शुद्धोपयोगको प्राप्त हुए नहीं हैं। इसलिए वे जीव अर्थ, काम, धर्म, मोक्षरूप पुरुषार्थसे रहित होते हुए आलसी-निरुद्यमी होते हैं.
उनकी निन्दा पंचास्तिकायकी व्याख्यामें की है. उनके लिये ¹ष्टान्त दिया है कि जैसे बहुत खीर-शक्तकर खाकर पुरुष आलसी होता है व जैसे वृक्ष निरुद्यमी है। वैसे वे जीव आलसी-निरुद्यमी हुए हैं.
अब इनसे पूछते हैं कि तुमने बाह्य तो शुभ-अशुभ कार्योंको घटाया, परन्तु उपयोग तो बिना आलम्बनके रहता नहीं है। तो तुम्हारा उपयोग कहाँ रहता है? सो कहो.
यदि वह कहे कि आत्माका चिंतवन करता है, तो शाास्त्रादि द्वारा अनेक प्रकारसे आत्माके विचारको तो तुमने विकल्प ठहराया, और आत्माका कोई विशेषण जाननेमें बहुत काललगतानहींहै,बारम्बारएकरूपचिंतवनमेंछद्मस्थकाउपयोगलगतानहींहै, गणधरादिकका भी उपयोग इसप्रकार नहीं रह सकता, इसलिये वे भी शाास्त्रादि कार्योंमें प्रवर्तते हैं, तेरा उपयोग गणधरादिकसे भी कैसे शुद्ध हुआ माने? इसलिये तेरा कहना प्रमाण नहीं है.
जैसेकोईव्यापारादिमेंनिरुद्यमीहोकरनिठल्लाजैसे-तैसेकालगँवाताहै। उसीप्रकार तू धर्ममें निरुद्यमी होकर प्रमाद सहित यों ही काल गँवाता है. कभी कुछ चिंतवन सा करता है, कभी बातें बनाता है, कभी भोजनादि करता है। परन्तु अपना उपयोग निर्मल करनेके लिए शास्त्राभ्यास, तपश्चरण, भक्ति आदि कर्मोंमें नहीं प्रवर्तता. सूना-सा होकर प्रमादि होनेका नाम शुद्धोपयोग ठहराता है. वहाँ क्तलेश थोड़ा होनेसे जैसे कोई आलसी बनकर पड़े रहनेमें सुख माने वैसे आनन्द मानता है.
अथवा जैसेकोई स्वप्नमें अपनेको राजा मानकर सुखी हो। उसी प्रकार अपनेको भ्रमसे सिद्ध समान शुद्ध मानकर स्वयं ही आनन्दित होता है. अथवा जैसे कहीं रति मानकर सुखीहोताहै।उसीप्रकारकुछविचारकरनेमेंरतिमानकरसुखीहोताहै,उसे अनुभवजनित आनन्द कहता है. तथा जैसे कहीं अरति मानकर उदास होता है। उसी प्रकार व्यापारादिक, पुत्रादिकको खेदका कारण जानकर उनसे उदास रहता है और उसे वैराग्य मानता है - सो ऐसा ज्ञान-वैराग्य तो कषायगर्भित है. वीतरागरूप उदासीन दशामें जो निराकुलता होती है वह सच्चा आनन्द, ज्ञान, वैराग्य ज्ञानी जीवोंके चारित्रमोहकी हीनता होनेपर प्रकट होता है.
तथा वह व्यापारादिक क्तलेश छोड़कर यथेष्ट भोजनादि द्वारा सुखी हुआ प्रवर्तता है और वहाँ अपनेको कषायरहित मानता है। परन्तु इसप्रकार आनन्दरूप होनेसे तो रौद्रध्यान होता है. जहाँ सुखसामग्रीको छोड़कर दु:खसामग्रीका संयोग होनेपर संक्तलेश न हो, राग- द्वेष उत्पन्न न हो। तब नि:कषाय भाव होता है.
ऐसी भ्रमरूप उनकी प्रवृत्ति पायी जाती है.
इसप्रकार जो जीव केवल निश्चयाभासके अवलम्बी हैं उन्हें मिथ्या¹ष्िट जानना. जैसे - वेदान्ती व सांख्यमती जीव केवल शुद्धात्माके श्रद्धानी हैं। उसी प्रकार इन्हें भी जानना. क्तयोंकि श्रद्धानकी समानताके कारण उनका उपदेश इन्हें इष्ट लगता है, इनका उपदेश उन्हें इष्ट लगता है.
तथा उन जीवोंको ऐसा श्रद्धान है कि केवल शुद्धात्माके चिंतवनसे तो संवर-निर्जरा होते हैं व मुक्तात्माके सुखका अंश वहाँ प्रगट होता है। तथा जीवके गुणस्थानादि अशुद्ध भावोंकाऔर अपने अतिरिक्त अन्य जीव-पुद्गलादिका चिंतवन करनेसे आस्रव-बन्ध होता है। इसलिये अन्य विचारसे परा¢्मुख रहते है.
सो यह भी सत्यश्रद्धान नहीं है, क्तयोंकि शुद्ध स्वद्रव्यका चिंतवन करो या अन्य चिंतवन करो। यदि वीतरागतासहित भाव हों तो वहाँ संवर-निर्जरा ही है, और जहाँ रागादिरूप भाव हों वहाँ आस्रव-बन्ध ही हैं. यदि परद्रव्यको जाननेसे ही आस्रव-बन्ध होते हों, तो केवली तो समस्त परद्रव्योंको जानते हैं, इसलिये उनके भी आस्रव-बन्ध होंगे.
फिर वह कहता है कि छद्मस्थके तो परद्रव्य चिंतवनसे आस्रव-बन्ध होता है? सो भी नहीं है। क्तयोंकि शुक्तलध्यानमें भी मुनियोंको छहों द्रव्योंके द्रव्य-गुण-पर्यायोंका चिंतवन होनेका निरूपण किया है, और अवधि-मन:पर्यय आदिमें परद्रव्यको जाननेहीकी विशेषता होतीहै। तथाचौथे गुणस्थान मेंकोईअपनेस्वरूप काचिंतवनकरताहैउसके भी आस्रव-बन्ध अधिक हैं तथा गुणश्रेणी निर्जरा नहीं है। पाँचवें-छट्ठे गुणस्थानमें आहार- विहारादि क्रिया होनेपर परद्रव्य चिंतवनसे भी आस्रव-बन्ध थोड़ा है और गुणश्रेणी निर्जरा होती रहती है. इसलिये स्वद्रव्य-परद्रव्यके चिंतवनसेनिर्जरा-बन्धनहींहोते,रागादि घटनेसे निर्जरा है और रागादि होनेसे बन्ध है. उसे रागादिके स्वरूपका यथाार्थ ज्ञान नहीं है, इसलिये अन्यथा मानता है.
अब वह पूछता है कि ऐसा है तो निर्विकल्प अनुभवदशामें नय-प्रमाण-निक्षेपादिकके तथा दर्शन-ज्ञानादिकके भी विकल्पोंका निषेध किया है - सो किस प्रकार है?
उत्तर :- जो जीव इन्हीं विकल्पोंमें लगे रहते हैं और अभेदरूप एक आत्माका अनुभव नहीं करते उन्हें ऐसा उपदेश दिया है कि यह सर्व विकल्प वस्तुका निश्चय करनेमें कारण है, वस्तुका निश्चय होनेपर इनका प्रयोजन कुछ नहीं रहता। इसलिये इन विकल्पोंको भी छोड़कर अभेदरूप एक आत्माका अनुभव करना, इनके विचाररूप विकल्पोंमें ही फँसा रहना योग्य नहीं है.
तथा वस्तुका निश्चय होनेके पश्चात ऐसा नहीं है कि सामान्यरूप स्वद्रव्यहीका चिंतवन रहा करे. स्वद्रव्यका तथा परद्रव्यका सामान्यरूप और विशेषरूप जानना होता है, परन्तु वीतरागता सहित होता है। उसीका नाम निर्विकल्पदशा है.
वहाँ वह पूछता है - यहाँ तो बहुत विकल्प हुए, निर्विकल्प संज्ञा कैसे संम्भव है?
उत्तर :- निर्विचार होनेका नाम निर्विकल्प नहीं है। क्तयोंकि छद्मस्थके जानना विचार सहित है, उसका अभाव माननेसे ज्ञानका अभाव होगा और तब जड़पना हुआ। सो आत्माके होता नहीं है. इसलिये विचार तो रहता है.
तथायहकहेकिएकसामान्यकाहीविचाररहताहै,विशेषकानहीं.तो सामान्यका विचार तो बहुत काल रहता नहीं है व विशेषकी अपेक्षा बिना सामान्यका स्वरूप भासित नहीं होता.
तथा यह कहे कि अपना ही विचार रहता है, परका नहीं। तो परमें परबुद्धि हुए बिना अपनेमें निजबुद्धि कैसे आये?
वहाँ वह कहता है - समयसारमें ऐसा कहा है :-
भावयेद्भेदविज्ञानमिदमच्छिन्नधारया .
तावद्यावत्पराच्च्युत्वा ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते ..(कलश १३०)
अर्थ :- भेदज्ञान को तबतक निरन्तर भाना, जब तक परसे छूटकर ज्ञान ज्ञानमें स्थित हो . इसलिये भेदज्ञान छूटनेपर परका जानना मिट जाता है, केवल आपहीको आप जानता रहता है.
यहाँ तो यह कहा है कि पूर्वकालमें स्व-परको एक जानता था। फिर भिन्न जाननेके लिये भेदज्ञानको तब तक भाना ही योग्य है जब तक ज्ञान पररूपको भिन्न जानकर अपने ज्ञानस्वरूपहीमें निश्चित हो जाये. पश्चात् भेदविज्ञान करनेका प्रयोजन नहीं रहता। स्वयमेव परको पररूप और आपको आपरूप जानता रहता है. ऐसा नहीं है कि परद्रव्यका जानना ही मिट जाता है. इसलिये परद्रव्यको जानने या स्वद्रव्यके विशेषोंके जाननेका नाम विकल्प नहीं है.
तो किस प्रकार है? सो कहते हैं. राग-द्वेषवश किसी ज्ञेयको जाननेमें उपयोग लगाना और किसी ज्ञेयके जाननेसे छुड़ाना - इसप्रकार बारम्बार उपयोगको भ्रमाना - उसका नाम विकल्प है. तथा जहाँ वीतरागरूप होकर जिसे जानते हैं उसे यथार्थ जानते हैं, अन्य-अन्य ज्ञेयको जाननेकेअर्थ उपयोगको भ्रमाते नहीं हैं। वहाँ निर्विकल्पदशा जानना.
यहाँ कोई कहे कि छद्मस्थका उपयोग तो नाना ज्ञेयोंमें भ्रमता ही भ्रमता है। वहाँ निर्विकल्पता कैसे सम्भव है?
उत्तर :- जितने काल एक जाननेरूप रहे तब तक निर्विकल्प नाम पाता है. सिद्धान्तमें ध्यानका लक्षण ऐसा ही किया है -
—एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम्(तत्त्ववार्थसुत्र ९-२७)
एकका मुख्य चिंतवन हो और अन्य चिंता रुक जाये - उसका नाम ध्यान है. सर्वार्थसिद्धि सूत्रकी टीकामें यह विशेष कहा है - यदि सर्व चिंता रुकनेका नाम ध्यान हो तो अचेतनपना आ जाये. तथा ऐसी भी विवक्षा है किसन्तान अपेक्षा नाना ज्ञेयोंका भी जानना होता है। परन्तु जब तक वीतरागता रहे, रागादिसे आप उपयोगको न भ्रमायें तब तक निर्विकल्पदशा कहते हैं.
फिर वह कहताहै -ऐसा है तो परद्रव्यसे छुड़ाकर स्वरूपमें उपयोग लगानेका उपदेश किसलिये दिया है?
समाधान :- जो शुभ-अशुभभावों के कारण परद्रव्य हैं। उनमें उपयोग लगानेसे जिनको राग-द्वेष हो आते हैं, और स्वरूप चिंतवन करें तो जिनके राग-द्वेष घटते हैं - ऐसे निचली अवस्थावाले जीवोंको पूर्वोक्त उपदेश है. जैसे - कोई स्त्री विकारभावसे पराये घरजाती थी।उसे मनाकिया किपराये घर मत जा,घरमें बैठी रह. तथा जोस्त्री निर्विकार भावसे किसीके घर जाकर यथायोग्य प्रवर्ते तो कुछ दोष है नहीं. उसी प्रकार उपयोगरूप परिणति राग-द्वेषभावसे परद्रव्योंमें प्रवर्तती थी। उसे मना किया कि परद्रव्योंमें प्रवर्तन मत कर, स्वरूपमें मग्न रह. तथा जो उपयोगरूप परिणति वीतरागभावसे परद्रव्यको जानकर यथायोग्य प्रवर्ते तो कुछ दोष है नहीं.
फिर वह कहता है - ऐसा है तो महामुनि परिग्रहादिक चिंतवनका त्याग किसलिये करते हैं?
समाधान :- जैसे विकारहित स्त्री कुशीलके कारण पराये घरोंका त्याग करती है। उसी प्रकार वीतराग परिणति राग-द्वेषके कारण परद्रव्योंका त्याग करती है. तथा जो व्यभीचारके कारण नहीं हैं ऐसे पराये घरोंमें जानेका त्याग है नहीं। उसी प्रकार जो राग- द्वेषके कारण नहीं हैं ऐसे परद्रव्योंको जाननेका त्याग है नहीं.
फिर वह कहता है - जैसे जो स्त्री प्रयोजन जानकर पितादिकके घर जाती है तो जाये, बिना प्रयोजन जिस-तिसके घर जाना तो योग्य नहीं है. उसी प्रकार परिणतिको प्रयोजन जानकर सात तत्त्ववोंका विचार करना, बिना प्रयोजन गुणस्थानादिकका विचार करना योग्य नहीं है?
समाधान :- जैसे स्त्री प्रयोजन जानकर पितादिक या मित्रादिकके भी घर जाये। उसी प्रकार परिणति तत्त्ववोंके विशेष जाननेके कारण गुणस्थानादिक व कर्मादिकको भी जाने. तथा यहाँ ऐसा जानना कि जैसे शीलवती स्त्री उद्यमपूर्वक तो विट पुरुषोंके स्थानपर न जायें यदि परवश वहाँ जाना बन जाये और वहाँ कुशील सेवन न करे तो स्त्री शीलवती ही है. उसी प्रकार वीतराग परिणति उपायपूर्वक तो रागादिकके कारण परद्रव्योंमें न लगे। यदि स्वयमेव उनका जानना हो जाये और वहाँ रागादिक न करे तो परिणति शुद्ध ही है. इसलिये मुनियोंको स्त्री आदिके परिषह होनेपर उनको जानते ही नहीं, अपने स्वरूपका ही जानना रहता है - ऐसा मानना मिथ्या है. उनको जानते तो हैं परन्तु रागादिक नहीं करते.
इसप्रकार परद्रव्योंको जानते हुए भी वीतरागभाव होता है. - ऐसा श्रद्धान करना.
तथा वह कहता है - ऐसा है तो शास्त्रमें ऐसा कैसे कहा है कि आत्माका श्रद्धान- ज्ञान-आचरण सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र है?
समाधान :- अनादिसे परद्रव्यमें आपरूप श्रद्धान-ज्ञान-आचरण था। उसे छुड़ानेके लिये यह उपदेश है. अपनेहीमें आपरूप श्रद्धान-ज्ञान-आचरण होनेसे परद्रव्यमें राग-द्वेषादि परिणति करनेका श्रद्धान व ज्ञान व आचरण मिट जाये तब सम्यग्दर्शनादि होते हैं. यदि परद्रव्यका परद्रव्यरूप श्रद्धानादि करनेसे सम्यग्दर्शनादि न होते हों तो केवलीके भी उनका अभाव हो. जहाँ परद्रव्यको बुरा जानना , निजद्रव्यको भला जानना हो। वहाँ तो राग-द्वेष सहज ही हुए, जहाँ आपको आपरूप और परको पररूप यथार्थ जानता रहे, वैसे ही श्रद्धानादिरूप प्रवर्तन करे। तभी सम्यग्दर्शनादि होते हैं - ऐसा जानना.
इसलिये बहुत क्तया कहें - जिसप्रकारसे रागादि मिटानेका श्रद्धान हो वही श्रद्धान सम्यग्दर्शन है, जिसप्रकारसे रागादि मिटानेका जानना हो वही जानना सम्यग्ज्ञान है, तथा जिसप्रकारसे रागादि मिटें वही आचरण सम्यक्चारित्र है। ऐसा ही मोक्षमार्ग मानना योग्य है.
इस प्रकार निश्चयनयके आभाससहित एकान्तपक्षके धारी जैनाभासोंके मिथ्यात्वका निरूपण किया.

व्यवहाराभासी मिथ्या¹ष्िट

अब, व्यवहाराभासपक्षके धारक जैनाभासोंके मिथ्यात्वका निरूपण करते हैं :-
जिनागममें जहाँ व्यवहारकी मुख्यतासे उपदेश है, उसे मानकर बाह्यसाधनादिकहीका श्रद्धानादिक करते हैं, उनके सर्वधर्मके अंग अन्यथारूप होकर मिथ्याभावको प्राप्त होते हैं - सो विशेष कहते हैं.
यहाँऐसाजानलेनाकिव्यवहारधर्मकीप्रवृत्तिसेपुण्यबन्धहोताहै,इसलिये पापप्रवृत्ति की अपेक्षा तो इसका निषेध है नहीं। परन्तु यहाँ जो जीव व्यवहारप्रवृत्तिहीसे सन्तुष्ट होकर सच्चे मोक्षमार्गमें उद्यमी नहीं होते हैं, उन्हें मोक्षमार्गमें सन्मुख करनेके लिये उस शुभरूप मिथ्याप्रवृत्ति का भी निषेधरूप निरूपण करते हैं.
यह जो कथन करते हैं उसे सुनकर यदि शुभप्रवृत्ति छोड़ अशुभमें प्रवृत्ति करोगे तब तो तुम्हारा बुरा होगा। और यदि यथार्थ श्रद्धान करके मोक्षमार्गमें प्रवर्तन करोगे तो तुम्हारा भला होगा.जैसे - कोई रोगी निर्गुण औषधीका निषेध सुनकर औषधी साधनको छोड़कर कुपथ्य करे तो वह मरेगा, उसमें वैद्यका कुछ दोष नहीं है। उसी प्रकार कोई संसारी पुण्यरूप धर्मका निषेध सुनकर धर्मसाधन छोड़ विषय-कषायरूप प्रवर्तन करेगा तो वही नरकादिमें दु:ख पायेगा. उपदेशदाताका तो दोष है नहीं. उपदेश देनेवाले का अभिप्राय तो असत्य श्रद्धानादि छुड़ाकर मोक्षमार्गमें लगानेका जानना.
सो ऐसे अभिप्रायसे यहाँ निरूपण करते हैं.
(कुलअपेक्षा धर्मधारक व्यवहाराभासी)
यहाँ कोई जीव तो कुलक्रमसे ही जैनी है, जैनधर्मका स्वरूप जानते नहीं, परन्तु कुलमें जैसी प्रवृत्ति चली आयी है वैसे प्रवर्तते है. वहाँ जिस प्रकार अन्यमती अपने कुलधर्म में प्रवर्तते हैं उसी प्रकार यह प्रवर्तते हैं. यदि कुलक्रमहीसेधर्म हो तो मुसलमान आदि सभी धर्मात्मा हो जायें. जैनधर्म की विशेषता क्तया रही?
वही कहा है :-
लोयम्मि रायणीई णायं ण कुलकम्मि कइयावि .
किं पुण तिलोय पहुणो जिणंदधम्माहिगारम्मि ॥७॥
(उपदेशसिद्धान्तरत्नमाला)
अर्थ :- लोकमें यह राजनीति है कि कदाचित् कुलक्रमसे न्याय नहीं होता है. जिसका कुल चोर हो, उसे चोरी करते पकड़लें तो उसका कुलक्रम जानकर छोड़ते नहीं हैं, दण्ड ही देते हैं. तो त्रिलोकप्रभु जिनेद्रदेवके धर्मके अधिकारमें क्तया कुलक्रमानुसार न्याय संभव है?
तथा यदि पिता दरिद्री हो और आप धनवान हो, तब वहाँ तो कुलक्रमका विचार करके आप दरिद्री रहता ही नहीं, तो धर्ममें कुलका क्तया प्रयोजन है? तथा पिता नरकमें जाये और पुत्र मोक्ष जाता है, वहाँ कुलक्रम कैसे रहा? यदि कुलपर ¹ष्िट हो तो पुत्र भी नरकगामी होना चाहिये. इसलिये धर्ममें कुलक्रमका कुछ भी प्रयोजन नहीं है.
शास्त्रोंका अर्थ विचारकर यदिकालदोषसे जिनधर्ममें भी पापी पुरुषों द्वारा कुदेव- कुगुरु-कुधर्म सेवनादिरूप तथा विषय-कषाय पोषनादिरूप विपरीत प्रवृत्ति चलाई गई हो, तो उसका त्याग करके जिन आज्ञानुसार प्रवर्तन करना योग्य है.
यहाँ कोई कहे कि परम्परा छोड़कर नवीन मार्गमें प्रवर्तन करना योग्य नहीं है?
उससे कहते हैं - यदि अपनी बुद्धिसे नवीन मार्ग पकड़े तो योग्य नहीं है. जो परम्परा अनादिनिधन जैनधर्मका स्वरूप शास्त्रोंमें लिखा है, उसकी प्रवृत्ति मिटाकर पापी पुरुषोंने बीचमें अन्यथा प्रवृत्ति चलाई हो, उसे परम्परा मार्ग कैसे कहा जा सकता है? तथा उसे छोड़कर पुरातन जैनशास्त्रोंमें जैसा धर्म लिखा था, वैसे प्रवर्तन करे तो उसे नवीन मार्ग कैसे कहा जा सकता है?
तथा यदि कुलमें जैसी जिनदेवकी आज्ञा है, उसी प्रकार धर्मकी प्रवृत्ति है तो अपनेको भी वैसे ही प्रवर्तन करना योग्य है। परन्तु उसे कुलाचार न जान धर्म जानकर, उसके स्वरूप फलादिकका निश्चय करके अंगीकार करना. जो सच्चे भी धर्मको कुलाचार जानकर प्रवर्तता है तो उसे धर्मात्मा नहीं कहते। क्तयोंकि सर्व कुलके उस आचरणको छोड़ दें तो आप भी छोड़ देगा. तथा वह जो आचरण करता है सो कुलके भयसे करता है, कुछ धर्मबुद्धिसे नहीं करता,इसलिये वह धर्मात्मा नहीं है.
इसलिये विवाहादि कुलसम्बन्धी कार्योंमें तो कुलक्रमका विचार करना, परन्तु धर्म सम्बन्धी कार्यमें कुलका विचार नहीं करना.जैसा धर्ममार्ग सच्चा है, उसी प्रकार प्रवर्तन करना योग्य है.
(परीक्षारहित आज्ञानुसारी धर्मधारक व्यवहाराभासी)
तथा कितने ही आज्ञानुसारी जैनी होते हैं. जैसी शास्त्रमें आज्ञा है उस प्रकार मानते हैं, परन्तु आज्ञाकी परीक्षा करते नहीं. यदि आज्ञा ही मानना धर्म हो तो सर्व मतवाले अपने-अपने शास्त्रकी आज्ञा मानकर धर्मात्मा हो जायें। इसलिये परीक्षा करके जिनवचनकी सत्यता पहिचानकर जिनआज्ञा मानना योग्य है.
बिना परीक्षा किये सत्य-असत्यका निर्णय कैसे हो? और बिना निर्णय किये जिस प्रकार अन्यमती अपने शास्त्रोंकी आज्ञा मानते हैं उसी प्रकार इसने जैनशास्त्रोंकी आज्ञा मानी. यह तो पक्षसे आज्ञा मानना है.
कोई कहे कि शास्त्रमें दस प्रकारके सम्यक्तत्वमें आज्ञासम्यक्तत्व कहा है व आज्ञाविचय धर्मध्यानका भेद कहा है व नि:शंकित अंगमें जिनवचनमें संशयका निषेध किया है। वह किस प्रकार है?
समाधान :- शास्त्रमें कितने ही कथन तो ऐसे हैं जिनकी प्रत्यक्ष-अनुमानादि द्वारा परीक्षा कर सकते हैं, तथा कई कथन ऐसे हैं जो प्रत्यक्ष-अनुमानादि गोचर नहीं हैं। इसलिये आज्ञाही से प्रमाण होते हैं. वहाँ नाना शास्त्रोंमें जो कथन समान हों उनकी तो परीक्षा करनेका प्रयोजन ही नहीं है। परन्तु जो कथन परस्पर विरुद्ध हों उनमेंसे जो कथन प्रत्यक्ष-अनुमानादिगोचरहोंउनकीतोपरीक्षाकरना.वहाँजिनशास्त्रोंकेकथनकी प्रमाणता ठहरे, उन शास्त्रोंमें जो प्रत्यक्ष-अनुमानगोचर नहीं हैं - ऐसे कथन किये हों, उनकी भी प्रमाणता करना. तथा जिन शास्त्रोंके कथनकी प्रमाणता न ठहरे उनके सर्व ही कथनकी अप्रमाणता मानना.
यहाँ कोई कहे कि परीक्षा करने पर कोई कथन किसी शास्त्रमें प्रमाण भासित हो, तथा कोई कथन किसी शास्त्रमें प्रमाण भासित हो। तब क्तया करें?
समाधान :- जो आप्त-भासित शास्त्र हैं उनमें कोई भी कथन प्रमाण-विरुद्ध नहीं होते. क्तयोंकि या तो जानपना ही न हो अथवा राग-द्वेष हो तब असत्य कहंे, सो आप्त ऐसे होते नहीं. तूने परीक्षा भलेप्रकार नहीं की, इसलिये भ्रम है.
फिर वह कहता है - छद्मस्थसे अन्यथा परीक्षा हो जाये तो वह क्तया करे?
समाधान :- सच्ची-झूठी दोनों वस्तुओंको कसनेसे और प्रमाद छोड़कर परीक्षा करनेसे तो सच्ची ही परीक्षा होती है. जहाँ पक्षपातके कारण भलेप्रकार परीक्षा न करे, वहीं अन्यथा परीक्षा होती है.
तथा वह कहता है कि शास्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध कथन तो बहुत हैं, किन-किनकी परीक्षा की जाये?
समाधान :- मोक्षमार्गमें देव-गुरु-धर्म, जीवादि तत्त्वव व बन्ध-मोक्षमार्ग प्रयोजनभूत हैं, सो इनकी परीक्षा कर लेना. जिन शास्त्रोंमें यह सच्चे कहे हों उनकी सर्व आज्ञा मानना, जिनमें यह अन्यथा प्ररूपित किये हों उनकी आज्ञा नहीं मानना.
जैसे - लोकमें जो पुरुष प्रयोजनभूत कार्योंमें झूठ न बोले, वह प्रयोजनरहित कार्योंमें कैसे झूठ बोलेगा? उसी प्रकार जिस शाास्त्रमें प्रयोजनभूत देवादिकका स्वरूप अन्यथा नहीं कहा,उसमेंप्रयोजनरहितद्वीप-समुद्रादिककाकथनअन्यथाकैसेहोगा?क्तयोंकि देवादिकका कथन अन्यथा करनेसे वक्ताके विषय-कषायका पोषण होता है.
प्रश्न:-देवादिककाअन्यथाकथनतोविषय-कषायवशकिया।परन्तुउन्हीं शास्त्रोंमें अन्य कथन अन्यथा किसलिये किये?
समाधान :- यदि एक ही कथन अन्यथा करे तो उसका अन्यथापना शीघ्र प्रगट हो जायेगा और भिन्न पद्धति ठहरेगी नहीं। इसलिये बहुत कथन अन्यथा करनेसे भिन्न पद्धति ठहरेगी. वहाँ तुच्छबुद्धि भ्रममें पड़ जाते हैं कि यह भी मत है, यह भी मत है. इसलिये प्रयोजनभूतका अन्यथापना मिलाने के लिये अप्रयोजनभूत कथन भी अन्यथा बहुत किये हैं तथा प्रतीति करानेके अर्थ कोई-कोई सच्चे कथन भी किये हैं. परन्तु जो चतुर हो सो भ्रममें नहीं पड़ता. प्रयोजनभूत कथनकी परीक्षा करके जहाँ सत्य भसित हो, उस मतकी सर्व आज्ञा माने.
सो परीक्षा करने पर जैनमत ही सत्य भासित होता है - अन्य नहीं। क्तयोंकि इसके वक्ता सर्वज्ञ-वीतराग हैं, वे झूठ किसलिये कहेंगे? इसप्रकार जिनआज्ञा माननेसे जो सच्चा श्रद्धान हो, उसका नाम आज्ञासम्यक्तत्व है. और वहाँ एकाग्र चिंतवन होनेसे उसीका नाम आज्ञाविचय धर्मध्यान है.
यदि ऐसा न मानें और बिना परीक्षा कियेे ही आज्ञा माननेसे सम्यक्तत्व व धर्मध्यान हो जाये तो जो द्रव्यलिंगी आज्ञा मानकर मुनि हुए, आज्ञानुसार साधन द्वारा ग्रैवेयक पर्यन्त जाते हैं। उनके मिथ्या¹ष्िटपना कैसे रहा? इसलिये कुछ परीक्षा करकेआज्ञा माननेपर ही सम्यक्तत्व व धर्मध्यान होता है. लोकमें भी किसी प्रकार परीक्षा होनेपर ही पुरुष की प्रतीति करते हैं.
तथा तूने कहा कि जिनवचनमें संशय करनेसे सम्यक्तत्वके शंका नामक दोष होता है। सो ‘न जाने यह किस प्रकार है’ - ऐसा मानकर निर्णय न करे वहाँ शंका नामक दोष होता है तथा निर्णय करनेका विचार करते ही सम्यक्तत्वमें दोष लगता हो तो अष्टसहस्त्रीमें आज्ञाप्रधानसे परीक्षाप्रधानको उत्तम किसलिये कहा? पृच्छना आदि स्वाध्यायके अंग कैसे कहे? प्रमाण-नयसे पदार्थोंका निर्णय करनेका उपदेश किसलिये दिया? इसलिये परीक्षा करके आज्ञा मानना योग्य है.
तथा कितने ही पापी पुरुषोंने अपने कल्पित कथन किये हैं और उन्हें जिनवचन ठहराया है, उन्हें जैनमतके शास्त्र जानकर प्रमाण नहीं करना. वहाँ भी प्रमाणादिकसे परीक्षा करके, व परस्पर शास्त्रोंसे विधि मिलाकर, व इसप्रकार सम्भव है या नहीं - ऐसा विचार करके विरुद्ध अर्थको मिथ्या ही जानना.
जैसे - किसी ठगने स्वयं पत्र लिखकर उसमें लिखनेवालेका नाम किसी साहूकारका रखा। उस नामके भ्रमसे धनको ठगाये तो दरिद्री होगा. उसी प्रकार पापी लोगोंने स्वयं ग्रन्थादि बनाकर वहाँ कर्त्ताका नाम जिन, गणधर, आचार्योंका रखा। उस नामके भ्रमसे झूठा श्रद्धान करे तो मिथ्या¹ष्िट ही होगा.
तथा वह कहता है - गोम्मटसारमें ऐसा कहा है कि सम्यग्¹ष्िट जीव अज्ञानी गुरुके निमित्तसे झूठ भी श्रद्धान करे तो आज्ञा माननेसे सम्यग्¹ष्िट ही है. सो यह कथन कैसे किया?
उत्तर :- जो प्रत्यक्ष-अनुमानादिगोचर नहीं है, और सुक्ष्मपनेसे जिनका निर्णय नहीं हो सकता उनकी अपेक्षा यह कथन है। परन्तु मूलभूत देव-गुरु-धर्मादि तथा तत्त्ववादिकका अन्यथा श्रद्धानहोनेपर तो सर्वथा सम्यक्तत्व रहता नहीं है - यह निश्चय करना. इसलिये बिना परीक्षा किये केवल आज्ञा ही द्वारा जो जैनी हैं उन्हें भी मिथ्या¹ष्िट जानना.
तथा कितने ही परीक्षा करके भी जैनी होते हैं। परन्तु मूल परीक्षा नहीं करते. दया, शील, तप, संयमादि क्रियाओं द्वारा। व पूजा, प्रभावनादि कार्योंसे। व अतिशय चमत्कारादिसे व जिनधर्मसे इष्ट प्र्राप्ति होनेके कारण जिनमतको उत्तम जानकर, प्रीतिवंत होकर जैनी होते हैं. सो अन्यमतोंमें भी ये कार्य तो पाये जाते हैं। इसलिये इन लक्षणोंमें तो अतिव्याप्ति पाया जाता है.
कोई कहे - जैसे जिनधर्ममें ये कार्य हैं, वैसे अन्यमतोंमें नहीं पाये जाते। इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है?
समाधान :- यह तो सत्य है, ऐसा ही है. परन्तु जैसे तू दयादिक मानता है उसी प्रकार तो वे भी निरूपण करते हैं. परजीवोंकी रक्षाको दया तू कहता है, वही वे कहते हैं. इसी प्रकार अन्य जानना.
फिर वह कहता है - उनके ठीक नहीं है। क्तयोंकि कभी दया प्ररूपित करते हैं, कभी हिंसा प्ररूपित करते हैं?
उत्तर :- वहाँ दयादिकका अंशमात्र तो आया। इसलिये अतिव्याप्तिपना इन लक्षणोंके पाया जाता है. इनके द्वारा सच्ची परीक्षा होती नहीं.
तो कैसे होती है? जिनधर्ममें सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रको मोक्षमार्ग कहा है. वहाँ सच्चे देवादिक व जीवादिकका श्रद्धान करनेसे सम्यक्तत्व होता है, व उनको जाननेसे सम्यग्ज्ञान होता है, व वास्तवमें रागादिक मिटने पर सम्यक्चारित्र होता है. सो इनके स्वरूपका जैसा जिनमतमें निरूपण किया है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं किया, तथा जैनीके सिवाय अन्यमती ऐसा कार्य कर नहीं सकते. इसलिये यह जिनमतका सच्चा लक्षण है. इस लक्षणको पहिचानकर जो परीक्षा करते हैं वे ही श्रद्धानी हैं. इसके सिवाय जो अन्य प्रकार से परीक्षा करते हैं वे मिथ्या¹ष्िट ही रहते हैं.
तथाकितनेहीसंगतिसेजैनधर्मधारणकरतेहैं,कितनेहीमहानपुरुषको जिनधर्ममें प्रवर्तता देख आप भी प्रवर्तते हैं, कितने ही देखादेखी जिनधर्मकी शुद्ध या अशुद्ध क्रियाओंमें प्रवर्तते हैं. - इत्यादि अनेक प्रकारके जीव आप विचारकर जिनधर्मका रहस्य नहीं पहिचानते और जैनी नाम धारण करते हैं. वे सब मिथ्या¹ष्िट ही जानना.
इतना तो है कि जिनमतमें पापकी प्रवृत्ति विशेष नहीं हो सकती और पुण्यके निमित्त बहुत हैं, तथा सच्चे मोक्षमार्गके कारण भी वहाँ बने रहते हैं। इसलिये जो कुलादिसे भी जैनी हैं, वे भी औरोंसे तो भले ही हैं.
(सांसारिक प्रयोजनार्थ धर्मधारक व्यवहाराभासी)
तथा जो जीव कपटसे आजीविकाके अर्थ, व बड़ाईके अर्थ, व कुछ विषय-कषाय- सम्बन्धी प्रयोजन विचारकर जैनी होते हैं। वे तो पापी ही हैं. अति तीव्र कषाय होनेपर ऐसी बुद्धि आती है. उनका सुलझना भी कठिन है. जैनधर्मका सेवन तो संसार-नाशके लिये किया जाता है। जो उसके द्वारा सांसारिक प्रयोजन साधना चाहते हैं वे बड़ा अन्याय करते हैं. इसलिये वे तो मिथ्या¹ष्िट हैं ही.
यहाँ कोई कहे - हिंसादि द्वारा जिन कार्योंको करते हैं। वही कार्य धर्म-साधन द्वारा सिद्ध किये जायें तो बुरा क्तया हुआ? दोनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं?
उससे कहते हैं - पापकार्य और धर्मकार्य का एक साधन करनेसे पाप ही होता है. जैसे - कोई धर्मका साधन चैत्यालय बनवाये और उसीको स्त्री-सेवनादि पापोंका भी साधन करे तो पाप ही होगा. हिंसादि द्वारा भोगादिकके हेतु अलग मकान बनवाता है तो बनवाये, परन्तु चैत्यालयमें भोगादि करना योग्य नहीं है. उसी प्रकार धर्मका साधन पूजा, शाास्त्रादिक कार्य हंै। उन्हींको आजीविकादि पापका भी साधन बनाये तो पापी ही होगा. हिंसादिसे आजीविकादिके अर्थ व्यापारादि करता है तो करे, परन्तु पूजादि कार्योंमें तो आजीविकादिका प्रयोजन विचारना योग्य नहीं है.
प्रश्न :- यदि ऐसा है तो मुनि भी धर्मसाधन कर पर-घर भोजन करते हैं तथा साधर्मी साधर्मी का उपकार करते-कराते हैं सो कैसे बनेगा?
उत्तर :- वे आप तो कुछ आजीविकादिका प्रयोजन विचारकर धर्म-साधन नहीं करते. उन्हें धर्मात्मा जानकर कितने ही स्वयमेव भोजन उपकारादि करते हैं, तब तो कोई दोष है नहीं. तथा यदि आप भोजनादिकका प्रयोजन विचारकर धर्म-साधता है तो पापी है ही. जो विरागी होकर मुनिपना अंगीकार करते हैं उनको भोजनादिकका प्रयोजन नहीं है. शरीरकी स्थितिके अर्थ स्वयमेव भोजनादि कोई दे तो लेते हैं, नहीं तो समता रखते हैं - संक्तलेशरूप नहीं होते. तथा अपने हितके अर्थ धर्म साधते हैं. उपकार करवानेका अभिप्राय नहीं है, और आपके जिसका त्याग नहीं है वैसा उपकार कराते हैं. कोई साधर्मी स्वयमेव उपकार करता है तो करे, और यदि न करे तो उन्हें कुछ संक्तलेश होता नहीं. - सो ऐसा तो योग्य है. परन्तु आपही आजीवकादिका प्रयोजन विचारकर बाह्यधर्मका साधन करे, जहाँ भोजनादिक उपकार कोई न करे वहाँ संक्तलेश करे, याचना करे, उपाय करे, अथवाधर्म- साधनमें शिथिल हो जाये। तो उसे पापी ही जानना.
इसप्रकार सांासारिक प्रयोजनसहित जो धर्म साधते हैं वे पापी भी हैं और मिथ्या¹ष्िट तो हैं ही.
इसप्रकार जिनमतवाले भी मिथ्या¹ष्िट जानना.
(उक्त व्यवहाराभासी धर्मधारकोंकी सामान्य प्रवृत्ति)
अब, इनके धर्म का साधन कैसे पाया जाता है सो विशेष बतलाते हैं :-
वहाँ कितने ही जीव कुलप्रवृत्तिसे अथवा देखा-देखी लोभादिके अभिप्रायसे धर्म साधते हैं, उनके तो धर्म¹ष्िट नहीं है.
यदि भक्ति करते हैं तो चित्त तो कहीं है, ¹ष्िट घूमती रहती है और मुखसे पाठादि करते हैं व नमस्कारादि करते हैं। परन्तु यह ठीक नहीं है. मैं कौन हूँ, किसकी स्तुति करता हूँ, किस प्रयोजनके अर्थ स्तुति करता हूँ, पाठमें क्तया अर्थ है, सो कुछ पता नहीं है.
तथाकदाचित्कुदेवादिककीभीसेवाकरनेलगजाताहै।वहाँसुदेव-गुरु- शास्त्रादि व कुदेव-गुरु-शास्त्रादिकी विशेष पहिचान नहीं है.
तथा यदि दान देता है तो पात्र-अपात्रके विचार रहित जैसे अपनी प्रशंसा हो वैसे दान देता है.
तथा तप करता है तो भूखा रहकर महंतपना हो वह कार्य करता है। परिणामोंकी पहिचान नहीं है.
तथा व्रतादिक धारण करता है तो वहाँ बाह्य क्रिया पर ¹ष्िट है। सो भी कोई सच्ची क्रिया करता है, कोई झूठी करता है। और जो अन्तरंग रागादिभाव पाये जाते हैं उनका विचार ही नहीं है, तथा बाह्यमें भी रागादिके पोषणके साधन करता है.
तथा पूजा-प्रभावनादि कार्य करता है तो वहाँ जिस प्रकार लोकमें बढ़ाई हो, व विषय-कषायका पोषण हो उस प्रकार कार्य करता है. तथा बहुत ंहिंसादिक उत्पन्न करता है.
सो यह कार्य तो अपने तथा अन्य जीवोंके परिणाम सुधारनेके अर्थ कहे हैं. तथा वहाँ किंचित् ंहिंसादिक भी उत्पन्न होते हैं, परन्तु जिसमें थोड़ा अपराध हो और गुण अधिक हो वह कार्य करना कहा है. सो परिणामोंकी तो पहिचान नहीं है और यहाँ अपराध कितना लगता है, गुण कितना होता है - ऐसे नफा-टोटेका ज्ञान नहीं है व विधि-अविधिका ज्ञान नहीं है.
तथा शास्त्राभ्यास करता है तो वहाँ पद्धतिरूप प्रवर्तता है. यदि बँाचता है तो औरोंको सुना देता है, यदि पढ़ता है तो आप पढ़ जाता है, सुनता है तो जो कहते हैं वह सुन लेता है। परन्तु जो शास्त्राभ्यासका प्रयोजन है उसे आप अन्तरंगमें नहीं अवधारण करता. - इत्यादि धर्मकार्योंके मर्मको नहीं पहिचानता.
कितने तो जिस प्रकार कुलमें बड़े प्रवर्तते हैं उसी प्रकार हमें भी करना, अथवा दूसरे करते हैं वैसा हमें भी करना व ऐसा करनेसे हमारे लोभादिककी सिद्धि होगी- इत्यादि विचारसहित अभूतार्थधर्मको साधते हैं.
तथा कितने ही जीव ऐसे होते हैं जिनके कुछ तो कुलादिरूप बुद्धि है, कुछ धर्मबुद्धि भी है। इसलिये पूर्वोक्त प्रकार भी धर्मका साधन करते हैं और कुछ आगे कहते हैं उस प्रकारसे अपने परिणामोंको भी सुधारते हैं- मिश्रपना पाया जाता है.
(धर्मबुद्धिसे धर्मधारक व्यवहाराभासी)
तथा कितने ही धर्मबुद्धिसे धर्म साधते हैं, परन्तु निश्चयधर्मको नहीं जानते, इसलिये अभूतार्थरूप धर्मको साधते हैं. वहाँ व्यवहारसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रको मोक्षमार्ग जानकर उनका साधन करते हैं.
सम्यग्दर्शन का अन्यथारूप
वहाँ शाास्त्रमें देव-गुरु-धर्मकी प्रतीति करनेसे सम्यक्तत्व होना कहा है. ऐसी आज्ञा मानकर अरहन्तदेव, निर्ग्रन्थगुरु, जैनशाास्त्रके अतिरिक्त औरोंको नमस्कारादि करनेका त्याग किया है। परन्तुउनके गुण-अवगुणकी परीक्षा नहीं करते, अथवा परीक्षा भी करते हैं तो तत्त्ववज्ञानपूर्वक सच्ची परीक्षा नहीं करते, बाह्यलक्षणों द्वारा परीक्षा करते हैं. -ऐसी प्रतीति से सुदेव-गुरु-शाास्त्रोंकी भक्तिमें प्रवर्तते हैं. देवभक्तिका अन्यथारूप
वहाँअरहन्तदेवहैं,इन्द्रादिद्वारापूज्यहैं,अनेकअतिशयसहितहैं,क्षुधादि दोषरहित है, शरीरकी सुन्दरताको धारण करते हैं, स्त्री-संगमादिरहित हैं, दिव्यध्वनी द्वारा उपदेश देते हैं, केवलज्ञान द्वारा लोकालोकको जानते हैं, काम-क्रोधादिक नष्ट किये हैं - इत्यादि विशेषण कहे हैं. वहाँ इनमेंसे कितने ही विशेषण पुद्गलाश्रित हैं और कितने ही जीवाश्रित हैं, उनको भिन्न-भिन्न नहीं पहिचानते. जिस प्रकार कोई असमानजातीय मनुष्यादि पर्यायोंमें जीव-पुद्गलके विशेषणोंको भिन्न न जानकर मिथ्या¹ष्िट धारण करता है, उसी प्रकार यह भी असमानजातीय अरहन्तपर्यायमें जीव-पुद्गलके विशेषणोंको भिन्न न जानकर मिथ्या¹ष्िट धारण करता है.
तथा जो बाह्य विशेषण हैं उन्हें तो जानकर उनके द्वारा अरहन्तदेवको महंतपना विशेष मानता है, और जो जीवके विशेषण हैं उन्हें यथावत् न जानकर उनके द्वारा अरहन्तदेवको महंतपना आज्ञानुसार मानता है अथवा अन्यथा मानता है. क्तयोंकि यथावत् जीवके विशेषण जाने तो मिथ्या¹ष्िट न रहे.
तथा उन अरहन्तोंको स्वर्ग-मोक्षदाता, दीनदयाल, अधमउधारक, पतितपावन मानता है। सो जैसे अन्यमती कत्तृत्वबुद्धिसे ईश्वरको मानता है। उसी प्रकार यह अरहन्तको मानता है. ऐसा नहीं जानता कि फल तो अपने परिणामोंका लगता है, अरहन्त उनको निमित्तमात्र है, इसलिये उपचार द्वारा वे विशेषण सम्भव होते हैं.
अपने परिणाम शुद्ध हुए बिना अरहन्त ही स्वर्ग-मोक्षादिके दाता नहीं है. तथा अरहन्तादिकके नामादिकसे श्वानादिकने स्वर्ग प्राप्त किया, वहाँ नामादिकका ही अतिशय मानते हैं। परन्तु बिना परिणामके नाम लेनेवालोंको भी स्वर्गकी प्राप्ति नहीं होती, तब सुननेवालोंको कैसे होगी? श्वानादिकको नाम सुननेके निमित्तसे कोई मन्दकषायरूप भाव हुए हैं उनका फल स्वर्ग हुआ है। उपचारसे नामहीकी मुख्यता की है.
तथा अरहन्तादिकके नाम-पूजनादिकसे अनिष्ट सामग्रीका नाश तथा इष्ट साामग्रीकी प्राप्ति मानकर रोगादि मिटानेके अर्थ व धनादिककी प्राप्तिके अर्थ नाम लेता है व पूजनादि करता है. सो इष्ट-अनिष्टका कारण तोपूर्वकर्मका उदय है, अरहन्त तो कर्त्ता है नहीं. अरहन्तादिककी भक्तिरूप शुभोपयोग परिणामोंसे पूर्वपापके संक्रमणादि हो जाते हैं, इसलिये उपचारसे अनिष्टके नाशका व इष्टकी प्राप्तिका कारण अरहन्तादिककी भक्ति कही जाती है. परन्तु जो जीव प्रथमसे ही सांसारिक प्रयोजनसहित भक्ति करता है उसके तो पापही का अभिप्राय हुआ. कांक्षा, विचिकित्सारूप भाव हुए - उनसे पूर्वपापके संक्रमणादि कैसे होंगे? इसलिये उसका कार्य सिद्ध नहीं हुआ.
तथा कितने ही जीव भक्तिको मुक्तिका कारण जानकर वहाँ अति अनुरागी होकर प्रवर्तते हैं. वह तो अन्यमती जैसे भक्तिसे मुक्ति मानते हैं वैसा ही इनकेभी श्रद्धान हुआ. परन्तु भक्ति तोरागरूप है और रागसे बन्ध है, इसलिये मोक्षका कारण नहीं है. जब रागका उदय आता है तब भक्ति न करे तो पापानुराग हो, इसलिये अशुभराग छोड़नेके लिये ज्ञानी भक्तिमें प्रवर्तते हैं और मोक्षमार्गको बाह्य निमित्तमात्र भी जानते हैं। परन्तु यहाँ ही उपादेयपना मानकर संतुष्ट नहीं होते, शुद्धोपयोगके उद्यमी रहते हैं.
वहींपंचास्तिकायव्याख्यामेंकहाहै:-इयं भक्ति: केवलभक्तिप्रधानस्याज्ञानिनो भवति. तीव्ररागज्वरविनोदार्थमस्थानरागनिषेदार्थं क्तवचित् ज्ञानिनोपि भवति..
अर्थ :- यह भक्ति केवल भक्ति ही है प्रधान जिसके ऐसे अज्ञानी जीवके होती है. तथा तीव्ररागज्वर मिटानेके अर्थ या कुस्थानके रागका निषेध करनेके अर्थ कदाचित् ज्ञानीके भी होती है.
वहाँ वह पूछता है - ऐसा है तो ज्ञानीसे अज्ञानीके भक्तिकी अधिकता होती होगी?
उत्तर :- यथार्थताकी अपेक्षा तो ज्ञानीके सच्ची भक्ति है, अज्ञानीके नहीं है. और रागभावकी अपेक्षा अज्ञानीके श्रद्धानमें भी उसे मुक्तिका कारण जाननेसे अति अनुराग है, ज्ञानीके श्रद्धानमें शुभबन्धका कारण जाननेसे वैसा अनुराग नहीं है. बाह्यमें कदाचित् ज्ञानीको अनुराग बहुत होता है, कभी अज्ञानीको होता है - ऐसा जानना.
इस प्रकार देवभक्तिका स्वरूप बतलाया. गुरुभक्तिका अन्यथारूप
अब, गुरुभक्ति उसके कैसी होती है सो कहते हैं :-
कितने ही जीव आज्ञानुसारी हैं. वे तो - यह जैनके साधु हैं, हमारे गुरु हैं, इसलिये इनकी भक्ति करनी - ऐसा विचारकर उनकी भक्ति करते हैं. और कितने ही जीव परीक्षा भी करते हैं. वहाँ यह मुनि दया पालते हैं, शील पालते हैं, धनादि नहीं रखते, उपवासादि तप करते हैं, क्षुधादि परीषह सहते हैं, किसीसे क्रोधादि नहीं करते हैं, उपदेश देकर औरोंको धर्ममें लगाते हैं - इत्यादि गुणोंका विचार कर उनमें भक्तिभाव करते हैं. परन्तु ऐसे गुण तो परमहंसादिक अन्यमतियोंमें तथा जैनी मिथ्या¹ष्िटयोंमें भी पाये जाते हैं, इसलिये इनमें अतिव्याप्तिपना है. इनके द्वारा सच्ची परीक्षा नहीं होती.
तथाजिनगुणोंकाविचारकरतेहैंउनमेंकितनेहीजीवाश्रितहैं,कितनेही पुद्गलाश्रित हैं। उनके विशेष न जानते हुए असमानजातीय मुनिपर्याय में एकत्वबुद्धिसे मिथ्या¹ष्िटहीरहतेहैं.तथासम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकीएकतारूपमोक्षमार्गवहही मुनियोंकासच्चालक्षणहै,उसेनहींपहिचानते.क्तयोंकियहपहिचानहोजायेतो मिथ्या¹ष्िट रहते नहीं. इसप्रकार यदि मुनियोंका सच्चा स्वरूप ही नहीं जानेंगे तो सच्ची भक्ति कैसे होगी? पुण्यबन्धके कारणभूत शुभक्रियारूप गुणोंको पहिचानकर उनकी सेवासे अपना भला होना जानकर उनमें अनुरागी होकर भक्ति करते हैं.
इस प्रकार गुरुभक्तिका स्वरूप कहा. शास्त्रभक्तिका अन्यथारूप
अब, शास्त्रभक्तिका स्वरूप कहते हैं :-
कितने ही जीव तो यह केवली भगवानकी वाणी है. इसलिये केवलीके पूज्यपनेके कारण यह भी पूज्य है - ऐसा जानकर भक्ति करते हैं. तथा कितने हीइसप्रकार परीक्षा करते हैं कि इन शास्त्रोंमें विरागता, दया, क्षमा, शील, संतोषादिकका निरूपण है इसलिये यहउत्कृष्टहैं-ऐसाजानकरभक्तिकरतेहैं.सोऐसाकथनतोअन्यशास्त्र वेदान्तादिकमें भी पाया जाता है.
तथा इन शास्त्रोंमें त्रिलोकादिकका गम्भीर निरूपण है, इसलिये उत्कृष्टता जानकर भक्ति करते हैं. परन्तु यहाँ अनुमानादिकका तो Ýवेश है नहीं, इसलिये सत्य-असत्यका निर्णय करके महिमा कैसे जानें? इसलिये इस प्रकार सच्ची परीक्षा नहीं होती. यहाँ तो अनेकान्तरूप सच्चे जीवादितत्त्ववोंका निरूपण है और सच्चा रत्नात्रयरूप मोक्षमार्ग दिखलाया है. उसीसे जैनशास्त्रोंकी उत्कृष्टता है, उसे नहीं पहिचानते. क्तयोंकि यह पहिचान हो जाये तो मिथ्या¹ष्िट रहती नहीं.
इस प्रकार शास्त्रभक्तिका स्वरूप कहा. ·
इस प्रकार इसको देव-गुरु-शास्त्रकी प्रतीति हुई, इसलिये व्यवहारसम्यक्तत्व हुआ मानता है. परन्तु उनका सच्चा स्वरूप भासित नहीं हुआ है। इसलिये प्रतीति भी सच्ची नहीं हुई है. सच्ची प्रतीतिके बिना सम्यक्तत्वकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये मिथ्या¹ष्िटही है. सप्ततत्त्ववका अन्यथारूप
तथा शास्त्रमें—तत्त्ववार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं(तत्त्ववार्थसूत्र १-२)ऐसा वचन कहा है - इसलिये शास्त्रोंमें जैसे जीवादि तत्त्वव लिखे हैं वैसे आप सीख लेता है और वहाँ उपयोग लगाता है, औरोंको उपदेश देता है। परन्तु उन तत्त्ववोंका भाव भासित नहीं होता और यहाँ उस वस्तुके भावहीका नाम तत्त्वव कहा है. सो भाव भासित हुए बिना तत्त्ववार्थश्रद्धान कैसे होगा? भाव भासन क्तया है? सो कहते हैं :-
जैसे कोई पुरुष चतुर होनेके अर्थ शास्त्र द्वारा स्वर, ग्राम, मूर्छना, रागोंका स्वरूप और ताल-तानके भेदको सीखता है। परन्तु स्वरादिका स्वरूप नहीं पहिचानता. स्वरूपकी पहिचान हुए बिना अन्य स्वरादिकको अन्य स्वरादिकरूप मानता है, अथवा सत्य भी मानता है तो निर्णय करके नहीं मानता है। इसलिये उसके चतुरपना नहीं होता. उसी प्रकार कोई जीव सम्यक्तत्वी होनेके अर्थ शास्त्र द्वारा जीवादिक तत्त्ववोंका स्वरूप सीख लेता है। परन्तु उनके स्वरूपको नहीं पहिचानता है स्वरूपको पहिचाने बिना अन्य तत्त्ववोंको अन्य तत्त्ववरूप मान लेता है, अथवा सत्य भी मनाता है तो निर्णय करके नहीं मानता। इसलिये उसके सम्यक्तत्व नहीं होता . तथा जैसे कोई शास्त्रादि पढ़ा हो या न पढ़ा हो। परन्तु स्वरादिके स्वरूपको पहिचानता है तो वह चतुर ही है. उसी प्रकार शास्त्र पढ़ा हो या न पढ़ा हो। यदि जीवादिकके स्वरूपको पहिचानता है तो वह सम्यग्¹ष्िट ही है. जैसे हिरन स्वर- रागादिकका नाम नहीं जानता परन्तु उसके स्वरूपको पहिचानता है। उसी प्रकार तुच्छबुद्धि जीवादिककानाम नहींजानतेपरन्तुउनकेस्वरूपकोपहिचानते हैं कि - ‘यह मैं हूँ, ये पर हैं। ये भाव बुरे हैं, ये भले हैं’। - इस प्रकार स्वरूपको पहिचाने उसका नाम भाव भासना है. शिवभूति मुनि जीवादिकका नाम नहीं जानते थे, और ‘तुषमाषभिन्न’१ ऐसा रटने लगे. सो यह सिद्धान्त का शब्द था नहीं। परन्तु स्व-परके भावरूप ध्यान किया, इसलिये केवली हुए. और ग्यारह अंगके पाठी जीवादि तत्त्ववोंके विशेष भेद जानते हैं। परन्तु भाव भासित नहीं होता, इसलिये मिथ्या¹ष्िट ही रहते हैं.
अब, इसके तत्त्ववश्रद्धान किस प्रकार होता है सो कहते हैं :- जीव-अजीवतत्त्ववका अन्यथारूप
जिनशास्त्रोंसेजीवकेत्रस-स्थावरादिरूपतथागुणस्थान-मार्गणादिरूपभेदको जानता है, अजीवके पुद्गलादि भेदोंको तथा उनके वर्णादि विशेषोंको जानता है। परन्तु अध्यात्मशास्त्रोंमें भेदविज्ञानको कारणभूत व वीतरागदशा होनेको कारणभूत जैसा निरूपण किया है वैसा नहीं जानता.
तथा किसी प्रसंगवश उसीप्रकार जानना होजाये तब शास्त्रानुसार जान तो लेता है। परन्तु अपनेको आपरूप जानकर परका अंश भी अपनेमें न मिलाना और अपना अंश भी परमें न मिलाना - ऐसा सच्चा श्रद्धान नहीं करता है.जैसेअन्यमिथ्या¹ष्िटनिर्धारबिना पर्यायबुद्धिसे जानपनेमें व वर्णादिमें अहंबुद्धि धारण करते हैं। उसीप्रकार यह भी आत्माश्रित ज्ञानादिमें तथा शरीराश्रित उपदेश-उपवासादि क्रियाओंमें अपनत्व मानता है.
तथा कभी शास्त्रानुसार सच्ची बात भी बनाता है। परन्तु अंतरंग निर्धाररूप श्रद्धान नहीं है. इसलिये जिस प्रकार मतवाला माताको माता भी कहे तो वह सयाना नहीं है। उसी प्रकार इसे सम्यक्तत्वी नहीं कहते.
तथा जैसे किसी और की ही बातें कर रहा हो, उस प्रकारसे आत्माका कथन करता है। परन्तु यह आत्मा ‘मैं हूँ’ - ऐसा भाव भासित नहीं होता.
तथा जैसे किसी और को औरसे भिन्न बतलाता हो, उस प्रकार आत्माऔर शरीरकी भिन्नता प्ररूपित करता है। परन्तु मैं इन शरीरादिसे भिन्न हूँ - ऐसा भाव भासित नहीं होता.
तथा पर्यायमें जीव-पुद्गलके परस्पर निमित्तसे अनेक क्रियाएँ होती है, उन्हें दोनों द्रव्योंके मिलापसे उत्पन्न हुई जानता है। यह जीवकी क्रिया है उसका पुद्गल निमित्त है, यह पुद्गलकी क्रिया है उसका जीव निमित्त है- ऐसा भिन्न-भिन्न भाव भासित नहीं होता. इत्यादि भाव भासित हुए बिना उसे जीव-अजीवका सच्चा श्रद्धानी नहीं कहते। क्तयोंकि जीव-अजीवको जाननेका तो यह ही प्रयोजन था, वह हुआ नहीं. आÏवतत्त्ववका अन्यथारूप
तथा आस्रवतत्त्ववमें जो हिंसादिरूप पापास्रव हैं उन्हें हेय जानता है। अहिंसादिरूप पुण्यास्रव हैं उन्हें उपादेय मानता है. परन्तु यह तो दोनो ही कर्मबन्धके कारण हैं, इनमें उपादेयपना मानना वही मिथ्या¹ष्िट है वही समयसारके बन्धादिकारमें कहा है:-
सर्व जीवोंके जीवन-मरण, सुख-दु:ख अपने कर्मके निमित्तसे होते हैं. जहाँ अन्य जीव अन्य जीवके इन कार्योंका कर्त्ता हो, वही मिथ्याध्यवसाय बन्धका कारण है. वहाँ अन्य जीवको जिलानेका अथवा सुखी करनेका अध्यवसाय हो वह तो पुण्यबन्धका कारण है, और मारने अथवा दुखी करनेका अध्यवसाय हो वह पापबन्धका कारण है.
इस प्रकार अहिंसावत् सत्यादिक तो पुण्यबन्धके कारण हैं और हिंसावत् असत्यादिक पापबन्धकेकारणहंै.येसर्वमिथ्याध्यवसायहैं,वेत्याज्यहैं.इसलियेहिंसादिवत् अहिंसादिकको भी बन्धका कारण जानकर हेय ही मानना.
हिंसामें मारनेकी बुद्धि हो, परन्तु उसकी आयु पूर्ण हुए बिनामरता नहीं है, यह अपनी द्वेषपरिणतिसे आप ही पाप बाँधता है. अंहिंसामें रक्षा करनेकी बुद्धि हो, परन्तु उसकी आयु अवशेष हुए बिना वह जीता नहीं है, यह अपनी प्रशस्त रागपरिणतिसे आप ही पुण्य बाँधता है. इसप्रकार यह दोनों हेय है। जहाँ वीतराग होकर ¹ष्टाज्ञातारूप प्रवर्ते वहाँ निर्बन्ध है सो उपादेय है.
सो ऐसी दशा न हो तब तक प्रशस्तरागरूप प्रवर्तन करो।परन्तु श्रद्धान तो ऐसा रखो कि यह भी बन्धका कारण है, हेय है।श्रद्धानमें इसे मोक्षमार्ग जानेतो मिथ्या¹ष्िट ही होता है.
तथा मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, योग - ये आस्रवके भेद हैं। उन्हें बाह्यरूप तो मानता है, परन्तु अंतरंग इन भावोंकी जातिको नहीं पहिचानता.
वहाँ अन्य देवादिके सेवनरूप गृहितमिथ्यात्वकोमिथ्यात्व जानता है, परन्तु अनादि अगृहितमिथ्यात्व है उसे नहीं पहिचानता.
तथाबाह्यत्रस-स्थावरकीहिंसातथाइन्द्रिय-मनकेविषयोंमेंप्रवृत्तिउसको अविरति जानता है।हिंसामें प्रमाद परिणति मूल है और विषयसेवनमें अभिलाषा मूल है उसका अवलोकन नहीं करता .
तथा बाह्य क्रोधादिक करना उसको कषाय जानता है, अभिप्रायमें राग-द्वेष बस रहे हैं उनको नहीं पहिचानता.
तथा बाह्य चेष्टा हो उसे योग जानता है, शक्तिभूत योगोंको नहीं जानता.
इस प्रकार आस्रवोंका स्वरूप अन्यथा जानता है.
तथा राग-द्वेष-मोहरूप जो आस्रवभाव हैं, उनका तो नाश करनेकी चिन्ता नहीं और बाह्यक्रिया अथवा बाह्यनिमित्त मिटानेका उपाय रखता है। सो उनके मिटानेसे आस्रव नहीं मिटता. द्रव्यलिंगी मुनि अन्य देवादिककी सेवा नहीं करता, हिंसा या विषयोंमें नहीं प्रवर्तता, क्रोधादि नहीं करता, मन-वचन-कायको रोकता है। तथापि उसके मिथ्यात्वादि चारों आस्रव पाये जाते हैं. तथा कपटसे भी वे कार्य नहीं करता है, कपटसे करे तो ग्रैवेयकपर्यन्त कैसे पहुँचे? इसलिये जो अन्तरंग अभिप्रायमें मिथ्यात्वादिरूप रागादिभाव हैं वे ही आस्रव हैं.
उन्हें नहीं पहिचानता इसलिये इसके आस्रवतत्त्ववका भी सत्य श्रद्धान नहीं है. बन्धतत्त्ववका अन्यथारूप
तथा बन्धतत्त्ववमें जो अशुभभावोंसे नरकादिरूप पापका बन्ध हो उसे तो बुरा जानता है और शुभभावोंसे देवादिरूप पुण्यका बन्ध हो उसे भला जानता है. परन्तु सभी जीवोंके दु:खसामग्रीमें द्वेष और सुख-सामग्रीमें राग पाया जाता है, सो इसके भी राग-द्वेष करनेका श्रद्धान हुआ. जैसा इस पर्याय सम्बन्धी सुख-दु:खसामग्रीमें राग-द्वेष करना है वैसा ही आगामी पर्याय सम्बन्धी सुख-दु:खसामग्रीमें राग-द्वेष करना है.
तथा शुभ-अशुभ भावोंसे पुण्य-पापका विशेष तो अघातिकर्मोंमें होता है, परन्तु अघातिकर्म आत्मगुणके घातक नहीं हैं. तथा शुभ-अशुभभावोंमें घातिकर्मोंका तो निरन्तर बन्धहोताहै,वेसर्वपापरूपहीहैं,औरवहीआत्मगुणकेघातकहैं.इसलिये अशुद्धभावोंसे कर्म बन्ध होता है, उसमें भला-बुरा जानना वही मिथ्या श्रद्धान है.
सो ऐसे श्रद्धानसे बन्धका भी उसे सत्य श्रद्धान नहीं है. संवरतत्त्ववका अन्यथारूप
तथा संवरतत्त्ववमें अहिंसादिरूप शुभास्रवभावोंको संवर जानता है. परन्तु एक ही कारणसे पुण्यबन्ध भी माने और संवर भी माने वह नहीं हो सकता.
प्रश्न :- मुनियोंके एक कालमें एक भाव होता है, वहाँ उनके बन्ध भी होता है और संवर-निर्जरा भी होते हैं, सो किस प्रकार है?
समाधान :- वह भाव मिश्ररूप है. कुछ वीतराग हुआ है, कुछ सराग रहा है. जो अंश वीतराग हुए उनसे संवर है और जो अंश सराग रहे उनसे बन्ध है. सो एक भावसे तो दो कार्य बनते हैं, परन्तु एक प्रशस्तरागहीसे पुण्यास्रव भी मानना और संवर-निर्जरा भी मानना सो भ्रम है. मिश्रभावमें भी यह सरागता है, यह वीतरागता है - ऐसी पहिचान सम्यग्¹ष्िटहीके होती है, इसलिये अवशेष सरागताको हेयरूप श्रद्धा करता है. मिथ्या¹ष्िटके ऐसीपहिचाननहींहै,इसलियेसरागभावमेंसंवरकेभ्रमसेप्रशस्तरागरूपकार्योंको उपादेयरूप श्रद्धा करता है.
तथा सिद्धान्तमें गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय, चारित्र - इनके द्वारा संवर होता है ऐसा कहा है,सो इनकी भी यथार्थ श्रद्धा नहीं करता.
किस प्रकार? सो कहते हैं :-
गुप्ति :-बाह्य मन-वचन-कायकी चेष्टा मिटाये, पाप-चिंतवन न करे, मौन धारण करे, गमनादि न करे। उसे वह गुप्ति मानता है. सो यहाँ तो मनमें भक्ति आदिरूप प्रशस्तरागसेनानाविकल्पहोतेहैं,वचन-कायकीचेष्टास्वयंनेरोकरखीहै।वहाँ शुभप्रवृत्ति है, और प्रवृृृृत्तिमें गुप्तिपना बनता नहीं है। इसलिये वीतरागभाव होनेपर जहाँ मन-वचन-कायकी चेष्टा न हो वही सच्ची गुप्ति है.
समिति :-तथा परजीवोंकी रक्षाके अर्थ यत्नाचार प्रवृृृृत्ति उसको समिति मानता है. सो हिंसाके परिणामोंसे तो पाप होता है और रक्षाके परिणामोंसे संवर कहोगे तो पुण्यबन्धका कारण कौन ठहरेगा? तथा एषणासमितिमें दोष टालता है वहाँ रक्षाका प्रयोजन है नहीं। इसलिये रक्षाहीके अर्थ समिति नहीं है.
तो समिति कैसी होती है? मुनियोंके किंचित राग होनेपर गमनादिक्रिया होती है, वहाँउन क्रियाओंमें अतिआसक्तताके अभावसे प्रमादरूप प्रवृृृृत्ति नहीं होती. तथा अन्य जीवोंको दु:खी करके अपना गमनादि प्रयोजन नहीं साधते, इसलिये स्वयमेव ही दया पलती है. इसप्रकार सच्ची समिति है.
धर्म :-तथा बन्धादिकके भयसे अथवा स्वर्ग-मोक्षकी इच्छासे क्रोधादि नहीं करते, परन्तु वहाँ क्रोधादि करनेका अभिप्राय तो मिटा नहीं है. जैसे -कोई राजादिकके भयसे १स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिषहजयचारित्रै: .(तत्त्ववार्थसूत्र ९-२) अथवा महंतपनेके लोभसे परस्त्रीका सेवन नहीं करता, तो उसे त्यागी नहीं कहते. व्ौसे ही यह क्रोधादिकका त्यागी नहीं है. तो कैसे त्यागी होता है? पदार्थ अनिष्ट-इष्ट भाासित होनेसे क्रोधादिक होते हैं। जब तत्त्ववज्ञानके अभ्याससे कोई इष्ट-अनिष्ट भाासित न हो, तब स्वयमेव ही क्रोधादिक उत्पन्न नहीं होते। तब सच्चा धर्म होता है.
अनुप्रेक्षा :-तथा अनित्यादि चिंतवनसे शरीरादिकको बुरा जान, हितकारी न जानकर उनसे उदास होना। उसका नाम अनुप्रेक्षा कहता है. सो यह तो जैसे कोई मित्र था तब उससे राग था और पश्चात् उसके अवगुण देखकर उदासीन हुआ। उसी प्रकार शरीरादिक से राग था, पश्चात् अनित्यादि अवगुण अवलोककर उदासीन हुआ। परन्तु ऐसी उदासीनता तो द्वेषरूप है. अपना और शरीरादिकका जहाँ-जैसा स्वभाव है वैसा पहिचानकर, भ्रमको मिटाकर, भला जानकर, राग नहीं करना और बुरा जानकर द्वेष नहीं करना। ऐसी सच्ची उदासीनताके अर्थ यथार्थ अनित्यत्वादिकका चिंतवन करना ही सच्ची अनुप्रेक्षा है.
परीषहजय :-तथा क्षुधादिक होनेपर उनके नाशका उपाय नहीं करना। उसे परीषह सहना कहता है. सो उपाय तो नहीं किया और अंतरंगमें क्षुधादि अनिष्ट सामग्री मिलनेपर दु:खी हुआ, रति आदिका कारण मिलनेपर सुखी हुआ। तो वे दु:ख-सुखरूप परिणाम हैं, वही आर्त्तध्यान-रौद्रध्यान हैं. ऐसे भावोंसे संवर कैसे हो? इसलिये दु:खका कारण मिलनेपर दु:खी न हो और सुखका कारण मिलनेपर सुखी न हो, ज्ञेयरूपसे उनका जाननेवाला ही रहे। वही सच्चा परीषहसहन है.
चारित्र :-तथा हिंसादि सावद्ययोगके त्यागको चारित्र मानता है, वहाँ महाव्रतादिरूप शुभयोगको उपादेयपने से ग्राह्य मानता है.परन्तु तत्त्ववार्थसूत्रमें आस्रव पदार्थका निरूपण करते हुए महाव्रत-अणुव्रतको भी आस्रवरूप कहा है. वे उपादेय कैसे हों? तथा आस्रव तो बन्धका साधक है और चारित्र मोक्षका साधक है। इसलिये महाव्रतादिरूप आस्रवभावोंको चारित्रपना संभव नहीं होता। सकल कषायरहित जो उदासीनभाव उसीका नाम चारित्र है.
जो चारित्रमोहके देशघाती स्पर्द्धकोंके उदयसे महामन्द प्रशस्तराग होता है, वह चारित्रका मल है. उसे छूटता न जानकर उसका त्याग नहीं करते, सावद्ययोगका ही त्याग करते हैं. परन्तु जैसे कोई पुरुष कन्दमूलादि बहुत दोषवाली हरितकायका त्याग करता है, और कितनी ही हरितकायोंका भक्षण करता है। परन्तु उसे धर्म नहीं मानता। उसी प्रकार मुनिहिंसादितीव्रकषायरूपभावोंकात्यागकरतेहंै,औरकितनेहीमन्दकषायरूप महाव्रतादिका पालन करते हैं। परन्तु उसे मोक्षमार्ग नहीं मानते.
प्रश्न :- यदि ऐसा है तो चारित्रके तेरह भेदोंमें महाव्रतादि कैसे कहे हैं?
समाधान :- वह व्यवहार चारित्र कहा है, और व्यवहार नाम उपचारका है. सो महाव्रतादि होनेपर ही वीतरागचारित्र होता है -ऐसा सम्बन्ध जानकर महाव्रतादिमें चारित्रका उपचार किया है। निश्चयसेनि:कषायभाव है, वही सच्चा चारित्र है.
इस प्रकार संवरके कारणोंको अन्यथा जानते हुए संवरका सच्चा श्रद्धानी नहीं होता. निर्जरातत्त्ववका अन्यथारूप
तथा यह अनशनादि तपसे निर्जरा मानता है। परन्तु केवल बाह्य तप ही करनेसे तो निर्जरा होती नहीं है. बाह्य तप तो शुद्धोपयोग बढ़ाने के अर्थ करते हैं. शुद्धोपयोग निर्जराका कारण है, इसलिये उपचारसे तपको भी निर्जराका कारण कहा है. यदि बाह्य दु:ख सहना ही निर्जराका कारण हो तो तिर्यंचादि भी भूख-तृषादि सहते हैं.
तबवहकहताहै-वेतोपराधीनतासेसहतेहैं।स्वाधीनतासेधर्मबुद्धिपूर्वक उपवासादिरूप तप करे उसके निर्जरा होती है.
समाधान :- धर्मबुद्धिसे बाह्य उपवासादि तो किये। और वहाँ उपयोग अशुभ, शुभ, शुद्धरूप जैसा परिणमित हो वैसा परिणमो. यदि बहुत उपवासादि करनेसे बहुत निर्जरा हो, थोड़े करनेसे थोड़ी निर्जरा हो - ऐसा नियम ठहरे। तब तो उपवासादिक हीमुख्य निर्जराका कारण ठहरेगा। सो तो बनता नहीं. परिणाम दुष्ट होनेपर उपवासादिकसे निर्जरा होना कैसे संभव है?
यदि ऐसा कहें कि जैसा अशुभ, शुभ, शुद्धरूप उपयोग परिणमित हो उसके अनुसार बन्ध-निर्जरा है। तो उपवासादि तप मुख्य निर्जराका कारण कैसे रहा? अशुभ- शुभपरिणाम बन्धके कारण ठहरे, शुद्धपरिणाम निर्जराके कारण ठहरे.
प्रश्न :- तत्त्ववार्थसूत्रमें—तपसा निर्जरा च(९-३)ऐसा कैसे कहा है?
समाधान :- शास्त्रमें—इच्छानिरोधस्तप:ऐसा कहा है। इच्छाको रोकना उसका नाम तप है. सो शुभ-अशुभ इच्छा मिटनेपर उपयोग शुद्ध हो वहाँ निर्जरा है. इसलिये तपसे निर्जरा कही है.
यहाँ कहता है - आहारादिरूप अशुभकी तो इच्छा दूर होनेपर ही तप होता है। परन्तु उपवासादिक व प्रायÂश्चत्तादिक शुभ कार्य हैं इनकी इच्छा तो रहती है?
समाधान :-ज्ञानीजनोंको उपवासादिककी इच्छा नहंीं है, एक शुद्धोपयोगकी इच्छा है। उपवासादिकरनेसेशुद्धोपयोगबढ़ताहै,इसलियेउपवासादिकरतेहैं.तथायदि उपवासादिसे शरीर या परिणामोंकी शिथिलता के कारण शुद्धोपयोगको शिथिल होता जाने तो वहाँ आहारादिक ग्रहण करते हैं. यदि उपवासादिकहीसेसिद्धि हो तो अजितनाथ आदि तेईस तीर्थंकर दीक्षा लेकर दो उपवास ही क्तयों धारण करते? उनकी तो शक्तिभी बहुत थी. परन्तु जैसे परिणाम हुए वैसे बाह्य साधन द्वारा एक वीतराग शुद्धोपयोगका अभ्यास किया.
प्रश्न :- यदि ऐसा है तो अनशनादिकको तप संज्ञा कैसे हुई?
समाधान :- उन्हें बाह्य तप कहा है. सो बाह्यका अर्थ यह है कि ‘बाहरसे औरोंको दिखायी दे कि यह तपस्वी है’। परन्तु आप तो फल जैसे अंतरंग परिणाम होंगे वैसा ही पायेगा, क्तयोंकि परिणामशुन्य शरीरकी क्रिया फलदाता नहीं है.
यहाँ फिर प्रश्न है कि शास्त्रमें तो अकाम-निर्जरा कही है. वहाँ बिना इच्छाके भूख- प्यास आदि सहनेसे निर्जरा होती है। तो फिर उपवासादि द्वारा कष्ट सहनेसे कैसे निर्जरा न हो?
समाधान :- अकाम-निर्जरामें भी बाह्य निमित्त तो बिना इच्छाके भूख-प्यासका सहन करना हुआ है,और वहाँ मन्दकषायरूप भाव हो। तो पापकी निर्जरा होती है, देवादि पुण्यका बन्ध होता है. परन्तु यदि तीव्रकषाय होनेपर भी कष्ट सहनेसे पुण्यबन्ध होता हो तो सर्व तिर्यंचादिक देव ही हों, सो बनता नहीं है. उसी प्रकार इच्छापूर्वक उपवासादि करनेसे वहाँभूख-प्यासादि कष्ट सहते हैं, सो यह बाह्य निमित्त है। परन्तु वहाँ जैसा परिणाम हो वैसा फल पाता है. जैसे अन्नको प्राण कहा उसी प्रकार. तथा इस प्रकार बाह्य साधन होने से अंतरंग तपकी वृद्धि होती है इसलिये उपचारसे इनको तप कहा है। परन्तु यदि बाह्य तप तो करे और अंतरंग तप न हो तो उपचारसे भी उसे तप संज्ञा नहीं है. कहा भी है :-
कषायविषयाहारो त्यागो यत्र विधीयते .
उपवास: स विज्ञेय: शेषं लंघनकं विदु: ..
जहाँ कषाय-विषय और आहारका त्याग किया जाता है उसे उपवास जानना. शेषको श्रीगुरु लंघन कहते हैं.
यहाँ कहेगा - यदि ऐसा है तो हम उपवासादि नहीं करेंगे?
उससे कहते है - उपदेश तो ऊँचा चढ़नेको दिया जाता है। तू उल्टा नीचे गिरेगा तो हम क्तया करेंगे? यदि तू मानादिकसे उपवासादि करता है तो कर या मत कर। कुछ सिद्धि नहीं है और यदि धर्मबुद्धिसे आहारादिकका अनुराग छोड़ता है तो जितना राग छूटा उतना ही छूटा। परन्तु इसीको तप जानकर इससे निर्जरा मानकर संतुष्ट मत हो.
तथा अंतरंग तपोंमें प्रायÂश्चत्त, विनय, वैयावृत्त, स्वाध्याय, त्याग और ध्यानरूप जो क्रियाएँ - उनमें बाह्य प्रवर्तन उसे तो बाह्यतपवत् ही जानना. जैसे अनशनादि बाह्य क्रिया हंै उसी प्रकार यह भी बाह्य क्रिया हैं। इसलिये प्रायÂश्चत्तादि बाह्यसाधन अंतरंग तप नहीं हंै. ऐसा बाह्य प्रवर्तन होनेपर जो अंतरंग परिणामोंकी शुद्धता हो उसका नाम अंतरंग तप जानना.
वहाँ भी इतना विशेष है कि बहुत शुद्धता होनेपर शुद्धोपयोगरूप परिणति होती है वहाँ तो निर्जरा ही है। बन्ध नहीं होता. और अल्प शुद्धता होनेपर शुभोपयोगका भी अंश रहता है। इसलिये जितनी शुद्धता हुई उससे तो निर्जरा है और जितना शुभभाव है उससे बन्ध है. ऐसा मिश्रभाव युगपत् होता है, वहाँ बन्ध और निर्जरा दोनों होते हैं.
यहाँ कोई कहे कि शुभभावोंसे पापकी निर्जरा होती है, पुण्यका बन्ध होता है। परन्तु शुद्धभावोंसे दोनोंकी निर्जरा होती है - ऐसा क्तयों नहीं कहते?
उत्तर :- मोक्षमार्गमें स्थितिका तो घटना सभी प्रकृतियोंका होता है। वहाँ पुण्य- पापका विशेष है ही नहीं. और अनुभागका घटना पुण्य-प्रकृतियोंमें शुद्धोपयोगसे भी नहीं होता. ऊपर-ऊपर पुण्यप्रकृतियोंके अनुभागका तीव्र बन्ध-उदय होता है और पापप्रकृतियोंके परमाणु पलटकर शुभप्रकृतिरूप होते हैं - ऐसा संक्रमण शुभ तथा शुद्ध दोनों भाव होनेपर होता है। इसलिये पूर्वोक्त नियम संभव नहीं है, विशुद्धताहीके अनुसार नियम संभव है.
देखो, चतुर्थगुणस्थानवाला शास्त्राभ्यास, आत्मचिंतवन आदि कार्य करे - वहाँ भी निर्जरा नहीं, बन्ध भी बहुत होता है. और पंचमगुणस्थानवाला विषयसेवनादि कार्य करे - वहाँभीउसकेगुणश्रेणीनिर्जराहोतीरहतीहै,बन्धभीथोड़ाहोताहै.तथा पंचमगुणस्थानवाला उपवासादि या प्रायÂश्चत्तादि तप करे उस कालमें भी उसके निर्जरा थोड़ी होता है. और छठवें गुणस्थानवाला आहार-विहारादि क्रिया करेउस कालमें भी उसके निर्जरा बहुत होती है, तथा बन्ध उससे थोड़ा होता है.
इसलिये बाह्य प्रवृत्तिके अनुसार निर्जरा नहीं है, अंतरंग कषायशक्ति घटनेसे विशुद्धता होनेपर निर्जरा होती है. सो इसके प्रगट स्वरूपका आगे निरूपण करेंगे वहाँसे जानना.
इस प्रकार अनशनादि क्रियाको तपसंज्ञा उपचारसे जानना. इसीसे इसे व्यवहार तप कहा है. व्यवहार और उपचारका एक अर्थ है. तथा ऐसे साधनसे जो वीतरागभावरूप विशुद्वता हो वह सच्चा तप निर्जराका कारण जानना.
यहाँ ¹ष्टान्त है - जैसे धनको व अन्नको प्राण कहा है. सो धनसे अन्न लाकर, उसका भक्षण करके प्राणोंका पोषण किया जाता है। इसलिये उपचारसे धन और अन्नको प्राण कहा है. कोई इन्द्रियादिक प्राणोंको न जाने और इन्हींको प्राण जानकर संग्रह करे तो मरणको ही प्राप्त होगा. उसी प्रकार अनशनादिको तथा प्रायÂश्चत्तादिको तप कहा है, क्तयोंकि अनशनादि साधनसे प्रायÂश्चत्तादिरूप प्रवर्तन करके वीतरागभावरूप सत्य तपका पोषण किया जाता है। इसलिये उपचारसे अनशनादिको तथा प्रायÂश्चत्तादिको तप कहा है. कोई वीतरागभावरूप तपको न जाने और इन्हींको तप जानकर संग्रह करे तो संसारही में भ्रमण करेगा.
बहुत क्तया, इतना समझ लेना कि निश्चयधर्म तो वीतरागभाव है, अन्य नाना विशेष बाह्यसाधनकी अपेक्षा उपचारसे किये हैं उनको व्यवहारमात्र धर्मसंज्ञा जानना. इस रहस्यको नहीं जानता इसलिये उसके निर्जराका भी सच्चा श्रद्धान नहीं है. मोक्षतत्त्ववका अन्यथारूप
तथा सिद्ध होना उसे मोक्ष मानता है. वहाँ जन्म-मरण-रोग-क्तलेशादि दु:ख दूर हुए अनन्तज्ञानद्वारालोकालोककाजाननाहुआ,त्रिलोकपूज्यपनाहुआ,-इत्यादिरूपसे उसकी महिमा जानता है. सो सर्व जीवोंके दु:ख दूर करनेकी, ज्ञेय जाननेकी, तथा पूज्य होनेकी इच्छा है. यदि इन्हींके अर्थ मोक्षकी इच्छा की तो इसके अन्य जीवोंके श्रद्धानसे क्तया विशेषता हुई?
तथा इसके ऐसा भी अभिप्राय है कि स्वर्गमेें सुख है उससे अनन्तगुना सुख मोक्षमें है.सोइसगुणाकारमेंवहस्वर्ग-मोक्षसुखकीएक जाति जानताहैवहाँस्वर्गमेेंतो विषयादिक सामग्रीजनित सुख होता है, उसकी जाती इसे भासित होती है। परन्तु मोक्षमें विषयादिक सामग्री है नहीं, सो वहाँके सुखकी जाति इसे भासित तो नहीं होती। परन्तु महान पुरुष स्वर्गसे भी मोक्षको उत्तम कहते हैं इसलिये यह भी उत्तम ही मानता है. जैसे - कोई गायनका स्वरूप न पहिचाने। परन्तु सभाके सर्व लोग सराहना करते हैं इसलिये आपभी सराहना करता है. उसी प्रकार यह मोक्षको उत्तम मानता है.
यहाँ वह कहता है - शास्त्रमें भी तो इन्द्रादिकसे अनन्तगुना सुख सिद्धोंके प्ररूपित किया है?
उत्तर :- तीर्थंकरके शरीरकी प्रभाको सूर्यप्रभासे कोटि गुनी कही, वहाँ उनकी एक जाति नहीं है। परन्तु लोकमें सूर्यप्रभाकी महिमा है, उससे भी अधिक महिमा बतलानेके लिये उपमालंकार करते हैं. उसी प्रकार सिद्धसुखको इन्द्रादिसुखसे अनन्तगुना कहा है, वहाँ उनकी एक जाति नहीं है। परन्तु लोकमें इन्द्रादिसुखकी महिमा है, उससे भी बहुत महिमा बतलानेके लिये उपमालंकार करते हैं.
फिर प्रश्न है कि वह सिद्धसुख और इन्द्रादिसुखकी एक जाति जानता है- ऐसा निश्चय तुमने कैसे किया?
समाधान :- जिस धर्मसाधनका फल स्वर्ग मानता है, उस धर्मसाधनहीका फल मोक्ष मानता है. कोई जीव इन्द्रादि पद प्राप्त करे, कोई मोक्ष प्राप्त करे, वहाँ उन दोनोंको एक जातिके धर्मका फल हुआ मानता है. ऐसा तो मानता है कि जिसके साधन थोड़ा होता है वह इन्द्रादिपद प्राप्त करता है, जिसके सम्पूर्ण साधन हो वह मोक्ष प्राप्त करता है। परन्तु वहाँ धर्मकी जाति एकजानता है. सो जो कारणकी एक जाति जाने, उसे कार्यकी भी एक जातिका श्रद्धान अवश्य हो। क्तयोंकि कारणविशेष होनेपर ही कार्यविशेष होता है. इसलिये हमने यह निश्चय किया कि उसके अभिप्रायमें इन्द्रादिसुख और सिद्धसुखकी एक जातिका श्रद्धान है.
तथाकर्मनिमित्तसेआत्माकेऔपाधिकभावथे,उनकाअभावहोनेपरआप शुद्धस्वभावरूप केवल आत्मा हुआ. जैसे - परमाणु स्कन्धसे पृथक् होनेपर शुद्ध होता है, उसी प्रकार यह कर्मादिकसे भिन्न होकर शुद्ध होता है. विशेष इतना कि वह दोनों अवस्थामें दु:खी-सुखी नहीं है। परन्तु आत्मा अशुद्ध अवस्थामें दु:खी था, अब उसका अभाव होने से निराकुल लक्षण अनन्तसुखकी प्राप्ति हुई.
तथा इन्द्रादिकके जो सुख है वह कषाय भावोंसे आकुलतारूप है, सो वह परमार्थसे दु:ख ही है। इसलिये उसकी और इसकी एक जाति नहीं है. तथा स्वर्गसुखका कारण प्रशस्तराग है, और मोक्षसुखका कारण वीतरागभाव है। इसलिये कारणमें भी विशेष है। परन्तु ऐसा भाव इसे भासित नहीं होता.
इसलिये मोक्षका भी इसको सच्चा श्रद्धान नहीं है.
इसप्रकार इसके सच्चा तत्त्ववश्रद्धान नहीं है. इसलिये समयसारमे ंकहा है कि अभव्यको तत्त्ववश्रद्धान होनेपर भी मिथ्यादर्शन ही रहता है. तथा प्रवचनसारमें कहा है कि आत्मज्ञानशून्य तत्त्ववार्थश्रद्धान कार्यकारी नहीं है. ·
तथा व्यवहार¹ष्िटसे सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे है उनको यह पालता है, पच्चीस दोष कहे हैं उनको टालता है, संवेगादिक गुण कहे हैं उनको धारण करता है। परन्तु जैसे बीजबोएबिनाखेतकेसबसाधनकरनेपरभीअन्ननहींहोता।उसीप्रकारसच्चा तत्त्ववश्रद्धानहुएबिनासम्यक्तत्वनहींहोता.पंचास्तिकायव्याख्यामेंजहाँअन्तमें व्यवहाराभासवालेका वर्णन किया है वहाँ ऐसा ही कथन किया है.
इसप्रकार इसको सम्यग्दर्शनके अर्थ साधन करनेपर भी सम्यग्दर्शन नहीं होता.
सम्यग्ज्ञानका अन्यथारूप
अब,शास्त्रमेंसम्यग्ज्ञानकेअर्थशास्त्राभ्यासकरनेसेसम्यग्ज्ञानहोनाकहाहै। इसलिये यह शास्त्राभ्यासमें तत्पर रहता है. वहाँ सीखना, सिखाना, याद करना, बाँचना, पढ़ना आदि क्रियाओंमें तो उपयोग को रमाता है। परन्तु उसके प्रयोजन पर ¹ष्िट नहीं है. इस उपदेशमें मुझे कार्यकारी क्तया है, सो अभिप्राय नहीं है। स्वयं शास्त्राभ्यास करके औरोंको सम्बोधन देनेका अभिप्राय रखता है, और बहुतसे जीव उपदेश मानें वहाँ सन्तुष्ट होता है। परन्तु ज्ञानाभ्यास तो अपने लिये किया जाता है और अवसर पाकर परका भी भला होता हो तो परका भी भला करे. तथा कोई उपदेश न सुने तो मत सुनों- स्वयं क्तयों विषाद करे? शास्त्रार्थका भाव जानकर अपना भला करना.
तथा शास्त्राभ्यासमें भी कितने ही तो व्याकरण, न्याय, काव्य आदि शास्त्रोंका बहुत अभ्यास करते हैं। परन्तु वे तो लोकमें पांडित्य प्रगट करनेके कारण हैं, उनमें आत्महितका निरूपण तो है नहीं. इनका तो प्रयोजन इतना ही है कि अपनी बुद्धि बहुत हो तो थोड़ा बहुत इनका अभ्यास करके पश्चात् आत्महितके साधक शास्त्रोंका अभ्यास करना. यदि बुद्धि थोड़ी हो तो आत्महितके साधक सुगम शास्त्रोंका ही अभ्यास करे.ऐसा नहीं करना कि व्याकरणादिका ही अभ्यास करते-करते आयु पूर्ण हो जाये और तत्त्ववज्ञानकी प्राप्ति न बने.
यहाँ कोई कहे - ऐसा है तो व्याकरणादिका अभ्यास नहीं करना चाहिये?
उससे कहते हैं कि उनके अभ्यासके बिना महान ग्रन्थोंका अर्थ खुलता नहीं है, इसलिये उनका भी अभ्यास करना योग्य है.
फिर प्रश्न है कि - महान ग्रन्थ ऐसे क्तयों बनाये जिनका अर्थ व्याकरणादिके बिना न खुले? भााषा द्वारा सुगमरूप हितोपदेश क्तयों नहीं लिखा? उनके कुछ प्रयोजन तो था नहीं?
समाधान :- भाषामें भी प्राकृत, संस्कृतादिकके ही शब्द हैं। परन्तु अपभ्रंश सहित हैं. तथा देश-देशमें भाषा अन्य-अन्य प्रकार है, तो महंत पुरुष शास्त्रोंमें अपभ्रंश शब्दकैसे लिखते हैं? बालक तोतला बोले परन्तु बड़े तो नहीं बोलते. तथा एक देशकी भाषारूप शाास्त्र दूसरे देशमें जाये, तो वहाँ उसका अर्थ कैसे भासित होगा? इसलिये प्राकृत, संस्कृतादि शुद्ध शब्दरूप ग्रन्थ रचे हैं.
तथा व्याकरणके बिना शब्दका अर्थ यथावत् भासित नहीं होता। न्यायके बिना लक्षण, परीक्षा आदि यथावत् नहीं हो सकते - इत्यादि. वचन द्वारा वस्तुके स्वरूपका निर्णय व्याकरणादि बिना भली-भाँति न होता जानकर उनकी आम्नाय अनुसार कथन किया है. भाषामें भी उनकी थोड़ी-बहुत आम्नाय आने पर ही उपदेश हो सकता है। परन्तु उनकी बहुत आम्नायसे भली-भाँति निर्णय हो सकता है.
फिर कहोगे कि ऐसा है तो अब भाषारूप ग्रन्थ किसलिये बनाते हैं?
समाधान :- कालदोषसे जीवोंकी मन्दबुद्धि जानकर किन्हीं जीवोंके जितना ज्ञान होगाउतना ही होगा - ऐसा अभिप्राय विचारकर भाषाग्रन्थ रचते हैं- इसलिये जो जीव व्याकरणादिका अभ्यास न कर सकें उन्हें ऐसे ग्रन्थों द्वारा ही अभ्यास करना.
तथा जो जीव शब्दोंकी नानायुक्यिोंसहित अर्थ करनेके लिये ही व्याकरणका अवगाहन करते हैं, वादादि करके महंत होनेके लिये न्यायका अवगाहन करते हैं, और चतुराई प्रगट करनेके लिये काव्यका अवगाहन करते हैं, - इत्यादि लौकिक प्रयोजनसहित इनका अभ्यास करते हैं वे धर्मात्मा नहीं हैं. इनका बन सके उतना थोड़ा-बहुत अभ्यास करके आत्महितके अर्थ जो तत्त्ववादिकका निर्णय करते हैं वही धर्मात्मा-पंडित जानना.
तथा कितने ही जीव पुण्य-पापादिक फलके निरूपक पुराणादि शास्त्रोंका। पुण्य- पापक्रियाके निरूपक आचारादि शास्त्रोंका। तथा गुणस्थान-मार्गणा, कर्मप्रकृति, त्रिलोकादिके निरूपक करणानुयोगके शास्त्रोंका अभ्यास करते हैं। परन्तुयदि आप इनका प्रयोजन नहीं विचारते, तब तो तोते जैसा ही पढ़ना हुआ. और यदि इनका प्रयोजन विचारते हैं तो वहाँ पापको बुरा जानना, पुण्यको भला जानना, गुणस्थानादिकका स्वरूप जान लेना, तथा जितना इनका अभ्यास करेंगे उतना हमारा भला है, - इत्यादि प्रयोजनका विचार किया है। सो इससे इतना तो होगा कि नरकादि नहीं होंगे, स्वर्गादिक होंगे। परन्तु मोक्षमार्गकी तो प्राप्ति होगी नहीं.
प्रथम सच्चा तत्त्ववज्ञान हो। वहाँ फिर पुण्य-पापके फलको संसार जाने, शुद्धोपयोगसे मोक्ष माने, गुणस्थानादिरूप जीवका व्यवहारनिरूपण जाने। इत्यादि ज्योंका त्यों श्रद्धान करता हुआ इनका अभ्यास करे तो सम्यग्ज्ञान हो.
सो तत्त्ववज्ञानके कारण आध्यात्मरूप द्रव्यानुयोगके शास्त्र हैं, और कितने ही जीव उन शास्त्रोंका भी अभ्यास करते हैं। परन्तु वहाँ जैसा लिखा है वैसा निर्णय स्वयं करके आपको आपरूप, परको पररूप और आस्रवादिका आस्रवादिरूप श्रद्धान नहीं करते. मुखसे तो यथावत् निरूपण ऐसा भी करें जिसके उपदेशसे अन्य जीव सम्यग्¹ष्िट हो जाये. परन्तु जैसे कोई लड़का स्त्रीका स्वांग बनाकर ऐसा गाना गाये जिसे सुनकर अन्य पुरुष-स्त्री कामरूप हो जायें। परन्तु वह तो जैसा सीखा वैसा कहता है, उसे कुछ भाव भासित नहीं होता, इसलिये स्वयं कामासक्त नहीं होता. उसी प्रकार यह जैसा लिखा है वैसा उपदेश देता है। परन्तु स्वयं अनुभव नहीं करता . यदि स्वयंको श्रद्धान हुआ होता तो अन्य तत्त्ववका अंश अन्य तत्त्ववमें न मिलाता। परन्तु इसका ठिकाना नहीं है, इसलिये सम्यग्ज्ञान नहीं होता.
इस प्रकार यह ग्यारह अंग तक पढ़े, तथापि सिद्धि नहीं होती. सो समयसारादिमें मिथ्या¹ष्िटको ग्यारह अंगोंका ज्ञान होना लिखा है.
यहाँ कोई कहे कि ज्ञान तो इतना होता है। परन्तु जैसा अभव्यसेनको श्रद्धानरहित ज्ञान हुआ वैसा होता है?
समाधान :- वह तो पापी था, जिसे हिंसादिकी प्रवृत्तिका भय नहीं था. परन्तु जो जीव ग्रैवेयिक आदिमें जाता है उसके ऐसा ज्ञान होता है। वह तो श्रद्धानरहित नहीं है. उसके तो ऐसा ही श्रद्धान है कि यह ग्रन्थ सच्चे हैं, परन्तु तत्त्ववश्रद्धान सच्चा नहीं हुआ. समयसार में एक ही जीवके धर्मका श्रद्धान, ग्यारह अंगका ज्ञान और महाव्रतादिका पालन करना लिखा है. प्रवचनसारमें ऐसा लिखा है कि आगमज्ञान ऐसा हुआ जिसके द्वारा सर्व पदार्थोंको हस्तामलकवत् जानता है. यह भी जानता है कि इनका जाननेवाला मैं हूँ।परन्तु मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, इसप्रकार स्वयंको परद्रव्यसे भिन्न केवल चैतन्यद्रव्य अनुभव नहीं करता. इसलिये आत्मज्ञानशून्य आगमज्ञान भी कार्यकारी नहीं है.
इस प्रकार यह सम्यग्ज्ञानके अर्थ जैन शास्त्रोंका अभ्यास करता है, तथापि इसके सम्यग्ज्ञान नहीं है.
सम्यक्चारित्रका अन्यथारूप
तथा इनके सम्यक्चारित्रके अर्थ कैसी प्रवृत्ति है सो कहते हैं :-
बाह्यक्रिया पर तो इनकी ¹ष्िट है और परिणाम सुधरने-बिगड़नेका विचार नहीं है. और यदि परिणामोंका भी विचार हो तो जैसे अपने परिणाम होते दिखाई दें उन्हीं पर ¹ष्िट रहतीहै, परन्तु उन परिणामोंकी परम्पराका विचार करने पर अभिप्रायमें जो वासना है उसका विचार नहीं करते.और फल लगता है सो अभिप्रायमें जो वासना है उसका लगता है . इसका विशेष व्याख्यान आगे करेंगे. वहाँ स्वरूप भलीभाँति भासित होगा.
ऐसी पहिचानके बिना बाह्य आचरण का ही उद्यम है.
वहाँकितनेहीजीवतोकुलक्रमसेअथवादेखादेखीयाक्रोध,मान,माया, लोभादिकसे आचरण करते हैं। उनके तो धर्मबुद्धि ही नहीं है, सम्यक्चारित्र कहाँसे हो? उन जीवोंमें कोई तो भोले हैं व कोई कषायी हैं। सो अज्ञानभाव व कषायी होनेपर सम्यक्चारित्र नहीं होता.
तथा कितने ही जीव ऐसा मानता हैं कि जाननेमें क्तया है, कुछ करेंगे तो फल लगेगा. ऐसा विचारकर व्रत-तप आदि क्रियाहीके उद्यमी रहते हैं और तत्त्ववज्ञानका उपाय नहंीं करते. सो तत्त्ववज्ञानके बिना महाव्रतादिका आचरण भी मिथ्याचारित्र ही नाम पाता है, और तत्त्ववज्ञान होनेपर कुछ भी व्रतादिक नहीं हैं तथापि असंयतसम्यग्¹ष्िट नाम पाता है. इसलिये पहले तत्त्ववज्ञानका उपाय करना, पश्चात् कषाय घटानेके लिये बाह्यसाधन करना. यही योगीन्द्रदेवकृत श्रावकाचारमेंकहा है :-
—दंसणभूमिहं बाहिरा, जिय वयरुंक्तख ण हुंति.
अर्थ :- इस सम्यग्दर्शन भूमिका बिना हे जीव व्रतरूपी वृक्ष नहीं होते. अर्थात जिन जीवोंके तत्त्ववज्ञान नहीं है वे यथार्थ आचरण नहीं आचरते.
वही विशेष बतलाते हैं :-
कितने ही जीव पहले तो बड़ी प्रतिज्ञा धारण कर बैठते हैं। परन्तु अन्तरंगमें विषय- कषाय वासना मिटी नहीं है, इसलिये जैसे-तैसे प्रतिज्ञा पूरी करना चाहते है. वहाँ उस प्रतिज्ञासे परिणाम दु:खी होते हैं. जैसे- कोई बहुत उपवास कर बैठता है और पश्चात् पीड़ासे दु:खी हुआ रोगीकी भाँति काल गँवाता है, धर्म साधन नहीं करता। तो प्रथम ही सधती जाने उतनी ही प्रतिज्ञा क्तयों न ले? दु:खी होनेमें आर्त्तध्यान हो, उसका फल अच्छा कैसे लगेगा? अथवा उस प्रतिज्ञाका दु:ख नहीं सहा जाता तब उसके बदले विषय-पोषणके लिये अन्य उपाय करता है. जैसे - तृषा लगे तब पानी तो न पिये और अन्य शीतल उपचार अनेक प्रकार करे, व घृत तो छोड़े और अन्य स्निग्ध वस्तुका उपाय करके भक्षण करे. - इसी प्रकार अन्य जानना.
यदि परीषह नहीं सहे जाते थे, विषय-वासना नहीं छूटी थी। तो ऐसी प्रतिज्ञा किसलिये की? सुगम विषय छोड़कर पश्चात् विषम विषयोंका उपाय करना पड़े ऐसा कार्य क्तयों करे? वहाँ तो उलटा रागभाव तीव्र होता है.
अथवा प्रतिज्ञामें दु:ख हो तब परिणाम लगानेके लिये कोई आलम्बन विचारता है. जैसे - उपवास करके फिर क्रीड़ा करता है, कितने ही पापी जुआ आदि कुव्यसनोंमें लग जाते हैं, अथवा सो रहना चाहते हैं. ऐसा जानते हैं कि किसी प्रकार काल पूरा करना. - इसीप्रकार अन्य प्रतिज्ञामें जानना.
अथवा कितने ही पापी ऐसे भी हैं कि पहले प्रतिज्ञा करते हैं, बादमें उससे दु:खी हों तब प्रतिज्ञा छोड़ देते हैं. प्रतिज्ञा लेना छोड़ना उनको खेल मात्र है। सो प्रतिज्ञा भंग करनेका महापाप है। इससे तो प्रतिज्ञा न लेना ही भला है.
इस प्रकार पहले तो निर्विचार होकर प्रतिज्ञा करते हैं और पश्चात् ऐसी दशा होती है.
जैनधर्म में प्रतिज्ञा न लेनेका दण्ड तो है नहीं. जैनधर्ममें तो ऐसा उपदेश है कि पहले तो तत्त्ववज्ञानी हो। फिर जिसका त्याग करे उसका दोष पहिचाने। त्याग करनेमें जो गुण हो उसे जाने। फिर अपने परिणामोंको ठीक करे। वर्त्तमान परिणामोंहीके भरोसे प्रतिज्ञा न कर बैठे। भविष्यमें निर्वाह होता जाने तो प्रतिज्ञा करे। तथा शरीरकी शक्ति व द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावादिकका विचार करे. - इसप्रकार विचार करके फिर प्रतिज्ञा करनी. वह भी ऐसी करनी जिससे प्रतिज्ञाके प्रति निरादरभाव न हो, परिणाम चढ़ते रहें. ऐसी जैनधर्मकी आम्नाय है.
यहाँ कोई कहे कि चांडालादिकने प्रतिज्ञा की, उनके इतना विचार कहाँ होता है?
समाधान :- मरणपर्यन्त कष्ट हो तो हो, परन्तु प्रतिज्ञा नहीं छोड़ना - ऐसा विचार करके वे प्रतिज्ञा करते हैं। प्रतिज्ञाके प्रति निरादरपना नहीं होता.
और सम्यग्¹ष्िट जो प्रतिज्ञा करते हैं सो तत्त्ववज्ञानादिपूर्वक ही करते हैं.
तथा जिनके अन्तरंग विरक्तता नहीं और बाह्यप्रतिज्ञा धारण करते हैं, वे प्रतिज्ञाके पहले और बादमें जिसकी प्रतिज्ञा करें उसमें अति आसक्त होकर लगते हैं. जैसे उपवासके धारणे-पारणेके भोजनमें अति लोभी होकर गरिष्ठादिभोजन करते हैं, शीघ्रता बहुतकरते हैं. जैसे - जलको रोक रखा था, जब वह छूटा तभी बहुत प्रवाह चलने लगा। उसी प्रकार प्रतिज्ञा द्वारा विषयवृत्ति रोक रखी थी, अंतरंग आसक्ति बढ़ती गई, और प्रतिज्ञा पूर्ण होते ही अत्यन्त विषयवृत्ति होने लगी। सो प्रतिज्ञाके कालमें विषयवासना मिटी नहीं, आगे-पीछे उसके बदले अधिक राग किया। सो फल तो रागभाव मिटनेसे होगा. इसलिये जितनी विरक्ति हुई हो उतनी प्रतिज्ञा करना. महामुनि भी थोड़ी प्रतिज्ञा करके फिर आहारादिमें उछटि(कमी)करते हैं. और बड़ी प्रतिज्ञा करते हैं तो अपनी शक्ति देखकर करते हैं. जिस प्रकार परिणाम चढ़ते रहें वैसा करते हैं. प्रमाद भी न हो और आकुलता भी उत्पन्न न हो - ऐसी प्रवृत्ति कार्यकारी जानना.
तथा जिनकी धर्म पर ¹ष्िट नहीं है वे कभी तो बड़ा धर्म आचरते हैं, कभी अधिक स्वच्छन्द होकर प्रवर्तते हैं. जैसे - किसी धर्मपर्वमें तो बहुत उपवासादि करते हैं, किसी धर्मपर्वमेंबारम्बारभोजनादिकरतेहैं.यदिधर्मबुद्धिहोतोयथायोग्यसर्वधर्मपर्वोंमें यथायोग्य संयमादि धारण करें. तथा कभी तो किसी धर्मकार्यमें बहुत धन खर्च करते हैं और कभी कोई धर्मकार्य आ पहुँचा हो तबभी वहाँ थोड़ा भी धन खर्च नहीं करते. सो धर्मबुद्धि हो तो यथाशक्ति यथायोग्य सभी धर्मकार्योंमें धन खर्चते रहें. - इसी प्रकार अन्य जानना.
तथा जिनके सच्चा धर्मसाधन नहीं है वे कोई क्रिया तो बहुत बड़ी अंगीकार करते हैं, तथा कोई हीन क्रिया करते हैं. जैसे - धनादिकका तो त्याग कियाऔर अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र इत्यादि विषयोंमें विशेष प्रवर्तते हैं. तथा कोई जामा पहिनना, स्त्री- सेवन करना इत्यादि कार्योंका तो त्याग करके धर्मात्मापना प्रगट करते हैं। और पश्चात् खोटे व्यापारादि कार्य करते हैं, लोकनिंद्य पापक्रियाओंमें प्रवर्तते हैं. - इसीप्रकार कोई क्रिया अति उच्च तथा कोई क्रिया अति नीची करते हैं. वहाँ लोकनिंद्य होकर धर्मकी हँसी कराते हैं कि देखो, अमुक धर्मात्मा ऐसे कार्य करता है. जैसे कोई पुरुष एक वस्त्र तो अति उत्तम पहने और एक वस्त्र अति हीन पहने तो हँसी ही होती है। उसी प्रकार यह भी हँसीको प्राप्त होता है.
सच्चे धर्मकी तो यह आम्नाय है कि जितने अपने रागादि दूर हुए हों उसके अनुसार जिस पदमें जो धर्मक्रिया सम्भव हो वह सब अंगीकार करे. यदि अल्प रागादि मिटे हों तो निचले पदमें ही प्रवर्तन करे। परन्तु उच्चपद धारण करके नीची क्रिया न करे.
यहाँ प्रश्न है कि स्त्री-सेवनादि त्याग ऊपरकी प्रतिमामें कहा है। इसलिये निचली अवस्थावाला उनका त्याग करे या नहीं?
समाधान :- निचली अवस्थावाला उनका सर्वथा त्याग नहीं कर सकता, कोई दोष लगता है। इसलिये ऊपरकी प्रतिमामें त्याग कहा है. निचली अवस्थामें जिस प्रकारका त्याग सम्भव हो। वैसा निचली अवस्थावाला भी करे। परन्तु जिस निचली अवस्थामें जो कार्य सम्भव ही नहीं है उसका करना तो कषायभावोंसे ही होता है. जैसे - कोई सप्तव्यसनका सेवन करता हो, और स्वस्त्रीका त्याग करे। तो कैसे हो सकता है? यद्यपि स्वस्त्रीका त्याग करना धर्म है। तथापि पहले सप्तव्यसनका त्याग हो, तभी स्वस्त्रीका त्याग करना योग्य है. - इसीप्रकार अन्य जानना.
तथा सर्व प्रकारसे धर्मको न जानता हो - ऐसा जीव किसी धर्मके अंगको मुख्य करके अन्य धर्मोंको गौण करता है. जैसे - कई जीव दया-धर्मको मुख्य करके पूजा- प्रभावनादि कार्यका उत्थापन करते हैं। कितने ही पूजा-प्रभावनादि धर्मको मुख्य करके हिंसादिककाभयनहींरखते।कितनेहीतपकीमुख्यतासेआर्त्तध्यानादिककरकेभी उपवासादि करते हैं, तथा अपनेको तपस्वी मानकर नि:शंक क्रोधादि करते हैं। कितने ही दानकी मुख्यतासे बहुत पाप करके भी धन उपार्जन करके दान देते हैं। कितने ही आरम्भ त्यागकी मुख्यतासे याचना आदि करते हैं।इत्यादि प्रकारसे किसी धर्मको मुख्य करके अन्य धर्मको नहीं गिनते तथा उसके आश्रयसे पापका आचरण करते हैं.
उनका यह कार्य ऐसा हुआ जैसे अविवेकी व्यापारीको किसी व्यापारमें नफेके अर्थ अन्य प्रकारसे बहुत टोटा पड़ता है. चाहिये तो ऐसा कि जैसे व्यापारीका प्रयोजन नफा है, सर्व विचार कर जैसे नफा बहुत हो वैसा करे। उसी प्रकार ज्ञानीका प्रयोजन वीतरागभाव है, सर्व विचार कर जैसे वीतरागभाव बहुत हो वैसा करे, क्तयोंकि मूलधर्म वीतरागभाव है.
इसीप्रकार अविवेकी जीव अन्यथा धर्म अंगीकार करते हैं। उनके तो सम्यक्चारित्रका आभास भी नहीं होता.
तथा कितने ही जीव अणुव्रत-महाव्रतादिरूप यथार्थ आचरण करते हैं - और आचरणके अनुसार ही परिणाम हैं, कोई माया-लोभादिकका अभिप्राय नहीं है। उन्हें धर्म जानकर मोक्षके अर्थ उनका साधन करते हैं, किन्हीं स्वर्गादिकके भोगोंकी भी इच्छा नहीं रखते। परन्तु तत्त्ववज्ञान पहले नहीं हुआ, इसलिये आपतो जानते हैं कि मैं मोक्षका साधन कर रहा हूँ।परन्तु जो मोक्षका साधन है उसे जानते भी नहीं, केवल स्वर्गादिकहीका साधन करते हैं. कोई मिसरीको अमृत जानकर भक्षण करे तो उससे अमृत का गुण तो नहीं होता। अपनी प्रतीतिके अनुसार फल नहीं होता। फल तो जैसे साधन करे वैसा ही लगता है.
शास्त्रमें ऐसा कहा है कि चारित्रमें ‘सम्यक्’ पद है। वह अज्ञानपूर्वक आचरणकी निवृत्तिके अर्थ है। इसलिये प्रथम तत्त्ववज्ञान हो और पश्चात् चारित्र हो सो सम्यक्चारित्र नाम पाता है. जैसे - कोई किसान बीज तो बोये नहीं और अन्य साधन करे तो अन्न प्राप्ति कैसे हो? घास-फूस ही होगा। उसी प्रकार अज्ञानी तत्त्ववज्ञानका तो अभ्यास करे नहीं और अन्य साधन करे तो मोक्ष प्राप्ति कैसे हो? देवपद आदि ही होंगे.
वहाँ कितने ही जीव तो ऐसे हैं जो तत्त्ववादिकके भली-भाँति नाम भी नहीं जानते, केवल व्रतादिकमें ही प्रवर्तते हैं कितने ही जीव ऐसे हैं जो पूर्वोक्त प्रकार सम्यग्दर्शन- ज्ञानका अयथार्थ साधन करके व्रतादिमें प्रवर्तते हैं. यद्यपि वे व्रतादिका यथार्थ आचरण करते हैं तथापि यथार्थ श्रद्धान-ज्ञान बिना सर्व आचरण मिथ्याचारित्र ही है.
यही समयसार कलशमें कहा है :-
क्तिलश्यन्तां स्वयमेव दुष्करतरैर्मोक्षोन्मुखै: कर्मभि:
क्तिलश्यन्तां च परे महाव्रततपो भारेण भग्नाश्चिरम् .
साक्षान्मोक्षमिदं निरामयपदंसंवेद्यमानंस्वयं
ज्ञानं ज्ञानगुणं विना कथमपि प्राप्तुं क्षमन्ते न हि ॥१४२॥
अर्थ :- मोक्षसे परा¢्मुख ऐसे अति दुस्तर पंचाग्नि तपनादि कार्यों द्वारा आप ही क्तलेश करते हैं तो करो। तथा अन्य कितने ही जीव महाव्रत और तपके भारसे चिरकाल पर्यन्त क्षीण होते हुए क्तलेश करते हैं तो करो।परन्तु यह साक्षात् मोक्षस्वरूप सर्व रोगरहित पद, जो अपने आप अनुभवमें आये ऐसा ज्ञानस्वभाव, वह तो ज्ञानगुणके बिना अन्य किसी भी प्रकारसे प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं है.
तथा पंचास्तिकायमें जहाँ अंतमें व्यवहाराभासीका कथन किया है वहाँ तेरह प्रकारका चारित्र होनेपरभी उसका मोक्षमार्गमें निषेध किया है.
तथा प्रवचनसारमें आत्मज्ञानशुन्य संयमभावको अकार्यकारी कहा है.
तथा इन्हीं ग्रन्थोंमें व अन्य परमात्मप्रकाशादि शास्त्रोंमें इस प्रयोजनके लिये जहाँ तहाँ निरूपण है.
इसलिये पहले तत्त्ववज्ञान होनेपर ही आचरण कार्यकारी है.
यहाँ कोई जाने कि बाह्यमें तो अणुव्रत-महाव्रतादि साधते हैं, अंतरंग परिणाम नहीं है, और स्वर्गादिककी वांछासे साधते हैं? - सो इसप्रकार साधनेसे तो पापबन्ध होता है. द्रव्यलिंगी मुनि अन्तिम ग्रैवेयक तक जाते हैं और पंचपरावर्तनोंमें इकतीस सागर पर्यन्त देवायुकी प्राप्ति अनन्तबार होना लिखा है। सो ऐसे उच्चपद तो तभी प्राप्त करे जब अन्तरंग परिणामपूर्वक महाव्रत पाले, महामन्दकषायी हो, इस लोक-परलोकके भोगादिककी चाह न हो।केवलधर्मबुद्धिसेमोक्षाभिलाषीहुआसाधनसाधे.इसलियेद्रव्यलिंगीकेस्थूलतो अन्यथापना है नहीं, सूक्ष्म अन्यथापना है। सो सम्यग्¹ष्िटको भासित होता है.
अब इनके धर्मसाधन कैसे हैं और उसमें अन्यथापना कैसे है?
सो कहते हैं :-
प्रथम तो संसारमें नरकादिके दु:ख जानकर व स्वर्गादिमें भी जन्म-मरणादिके दु:ख जानकर, संसारसे उदास होकर मोक्षको चाहते हैं. सो इन दु:खोंको तो दु:ख सभी जानते हैं. इन्द्र-अहमिन्द्रादिक विषयानुरागसे इन्द्रियजनित सुख भोगते हैं, उसे भी दु:ख जानकर निराकुल सुखअवस्थाको पहिचानकर मोक्षको चाहते हैं। वे ही सम्यग्¹ष्िट जानना.
तथा विषयसुखादिकका फल नरकादिक है। शरीर अशुचि, विनाशीक है, पोषण योग्य नहीं है। कुटुम्बादिक स्वार्थके सगे हैं। इत्यादि परद्रव्योंका दोष विचारकर उनका तो त्याग करते हैं- और व्रतादिकका फल स्वर्ग-मोक्ष है। तपश्चरणादि पवित्र अविनाशी फलके दाता हैं, उनके द्वारा शरीरका शोषणकरने योग्य है। देव-गुरु-शास्त्रादि हितकारी हैं। इत्यादि परद्रव्योंके गुणोंका विचार करके उन्हींको अंगीकार करते हैं. - इत्यादि प्रकारसे किसी परद्रव्यको बुरा जानकर अनिष्टरूप श्रद्धान करते हैं, किसी परद्रव्यको भला जानकर इष्ट श्रद्धान करते हैं. सो परद्रव्योंमे इष्ट-अनिष्टरूप श्रद्धान सो मिथ्या है.
तथा इसी श्रद्धानसे इनके उदासीनता भी द्वेषबुद्धिरूप होती है। क्तयोंकि किसीको बुरा जानना उसीका नाम द्वेष है.
कोई कहेगा - सम्यग्¹ष्िट भी तो बुरा जानकर परद्रव्यका त्याग करते हैं?
समाधान :- सम्यग्¹ष्िट परद्रव्योंको बुरा नहीं जानते, अपने रागभावको बुरा जानते हैं. आप रागभावको छोड़ते हैं, इसलिये उसके कारणका भी त्याग होता है. वस्तुका विचार करनेसे कोई परद्रव्य तो बुरा-भला है नहीं.
कोई कहेगा - निमित्तमात्र तो है?
उत्तर :- परद्रव्य कोई जबरन् तो बिगाड़ता नहीं है, अपने भाव बिगड़े तब वह भी बाह्य निमित्त है. तथा इसके निमित्त बिना भी भाव बिगड़ते हैं, इसलिये नियमरूपसे निमित्त भी नहीं है. इसप्रकार परद्रव्यका तो दोष देखना मिथ्याभाव है. रागादिभाव ही बुरे हैं, परन्तु इसके ऐसी समझ नहीं है। यह परद्रव्योंका दोष देखकर उनमें द्वेषरूप उदासीनता करता है. सच्ची उदासीनता तो उसका नामहै कि किसी भी द्रव्यका दोष या गुण नहीं भासित हो, इसलिये किसीको बुरा-भला न जाने। स्वको स्व जाने, परको पर जाने, परसे कुछ भी प्रयोजन मेरानहीं है ऐसा मानकर साक्षीभूत रहे. सो ऐसी उदासीनता ज्ञानीके ही होती है.
तथा यह उदासीन होकर शास्त्रमें जो अणुव्रत-महाव्रतरूप व्यवहारचारित्र कहा है उसे अंगीकार करता है, एकदेश अथवा सर्वदेश हिंसादि पापोंको छोड़ता है, उनके स्थान पर अहिंसादि पुण्यरूप कार्योंमें प्रवर्तता है. तथा जिस प्रकार पर्यायाश्रित पापकार्योंमें अपना कर्त्तापना मानता था। उसी प्रकार अब पर्यायाश्रित पुण्यकार्योंमें अपना कर्त्तापना मानने लगा. - इसप्रकार पर्यायाश्रित कार्योंमें अहंबुद्धि माननेकी समानता हुई. जैसे- ‘मैं जीवोंको मारता हूँ, मैं परिग्रह धारी हूँ’ - इत्यादिरूप मान्यता थी। उसी प्रकार- ‘मैं जीवोंकी रक्षा करता हूँ, मैं नग्न, परिग्रहरहित हूँ’- ऐसी मान्यता हुई. सो पर्यायाश्रित कार्योंमें अहंबुद्धि वही मिथ्या¹ष्िट है.
यही समयसार कलशमें कहा है :-
ये तु कर्तारमात्मानं पश्यन्ति तमसा तता: .
सामान्यजनवत्तेषां न मोक्षोऽपि मुमुक्षुतां ॥१९९॥
अर्थ :- जो जीव मिथ्या अंधकार व्याप्त होते हुए अपनेको पर्यायाश्रित क्रियाका कर्त्ता मानते हैं वे जीव मोक्षाभिलाषी होनेपर भी जैसे अन्यमती सामान्य मनुष्योंको मोक्ष नहीं होता। उसी प्रकार उनको मोक्ष नहीं होता। क्तयोंकि कर्त्तापनेके श्रद्धानकी समानता है.
तथा इसप्रकार आप कर्त्ता होकर श्रावकधर्म अथवा मुनिधर्म की क्रियाओंमें मन- वचन-कायकी प्रवृत्ति निरन्तर रखता है, जैसे उन क्रियाओंमें भंग न हो वैसे प्रवर्तता है। परन्तु ऐसे भाव तो सराग हैं। चारित्र है वह वीतरागभावरूप है. इसलिये ऐसे साधनको मोक्षमार्ग मानना मिथ्याबुद्धि है.
प्रश्न :- सराग-वीतराग भेदसे दो प्रकारका चारित्र कहा है सो किस प्रकार है?
उत्तर :- जैसे चावल दो प्रकारके हैं - एक तुषसहित हैं और एक तुषरहित हैं. वहाँ ऐसा जानना कि तुष है वह चावलका स्वरूप नहीं है, चावलमें दोष है. कोई समझदार तुषसहित चावलका संग्रह करता था। उसे देखकर कोई भोला तुषोंको ही चावल मानकर संग्रह करे तो वृथा खेदखिन्न ही होगा. वैसे चारित्र दो प्रकारका है - एक सराग है, एक वीतराग है. वहाँ ऐसा जानना कि जो राग है वह चारित्रका स्वरूप नहीं है, चारित्रमें दोष है. तथा कितने ही ज्ञानी प्रशस्तरागसहित चारित्रका धारण करते हैं। उन्हें देखकर कोई अज्ञानी प्रशस्तरागको ही चारित्र मानकर संग्रह करे तो वृथा खेदखिन्न ही होगा.
यहाँ कोई कहेगा कि पापक्रिया करनेसे तीव्र रागादिक होते थे, अब इन क्रियाओंको करने पर मन्द राग हुआ। इसलिये जितने अंशमें रागभाव कम हुआ उतने अंशोंमेंतो चारित्र कहो, जितने अंशोंमें राग रहा उतने अंशोंमें राग कहो. - इस प्रकार उसके सराग चारित्र सम्भव है.
समाधान :- यदि तत्त्ववज्ञानपूर्वक ऐसा हो, तबतो तुम कहते हो उसी प्रकार है. तत्त्ववज्ञानके बिना उत्कृष्ट(उग्र)आचरण होनेपर भी असंयम नाम ही पाता है, क्तयोंकि रागभाव करनेका अभिप्राय नहीं मिटता.
वहीबतलातेहैं:-द्रव्यलिंगीमुनिराज्यादिककोछोड़करनिर्ग्रन्थहोताहै, अट्ठाईस मूलगुणोंका पालन करता है, उग्रसे उग्र अनशनादि बहुत तप करता है, क्षुधादिक बाईस परीषह सहता है, शरीरके खंड-खंड होनेपर भी व्यग्र नही होता, व्रतभंगके अनेक कारणमिलने पर भी ¹ढ़ रहता है, किसीसे क्रोध नहीं करता, ऐसे साधनोंका मान नहीं करता,ऐसेसाधनोंमेंकोईकपटनहींहै,इनसाधनोंद्वाराइसलोक-परलोकके विषयसुखको नहीं चाहता। ऐसी उसकी दशा हुई है. यदि ऐसी दशा न हो तोग्रैवेयक पर्यन्त कैसे पहुँचे? परन्तु उसे मिथ्या¹ष्िट असंयमी ही शास्त्रमें कहा है. उसका कारण यह है कि उसके तत्त्ववोंका श्रद्धान-ज्ञान सच्चा नहीं हुआ है. पहले वर्णन किया उस प्रकार तत्त्ववोंका श्रद्धान-ज्ञान हुआ है। उसी अभिप्रायसे सर्व साधन करता है। परन्तु उन साधनोंके अभिप्राय की परम्पराका विचार करने पर कषायोंका अभिप्राय आता है.
किस प्रकार?सो सुनो :- यह पापके कारण रागादिकको तो हेय जानकर छोड़ता है। परन्तु पुण्यके कारण प्रशस्तरागको उपादेय मानता है, उसकी वृद्धिका उपाय करता है, सो प्रशस्तराग भी तो कषाय है. कषायको उपादेय माना तब कषाय करनेका ही श्रद्धान रहा. अप्रशस्त परद्रव्योंसे द्वेष करके प्रशस्त परद्रव्योंमेंराग करनेका अभिप्राय हुआ, कुछ परद्रव्योंमंे साम्यभावरूप अभिप्राय नहीं हुआ.
यहाँ प्रश्न है कि सम्यग्¹ष्िट भी तो प्रशस्तरागका उपाय रखता है?
उत्तर :- जैसे किसीका बहुत दण्ड होता था, वह थोड़ा दण्ड देनेका उपाय रखता है, थोड़ा दण्ड देकर हर्ष भी मानता है, परन्तु श्रद्धानमें दण्ड देना अनिष्ट ही मानता है। उसी प्रकार सम्यग्¹ष्िटके पापरूप बहुत कषाय होती थी, सो वह पुण्यरूप थोड़ी कषाय करनेका उपाय रखता है, थोड़ी कषाय होनेपर हर्ष भी मानता है, परन्तु श्रद्धानमें कषायको हेय ही मानता है. तथा जैसे- कोई कमाई का कारण जानकर व्यापारादिका उपाय रखता है, उपाय बन जाने पर हर्षमानता है। उसी प्रकार द्रव्यलिंगी मोक्षका कारण जानकर प्रशस्तरागकाउपायरखताहै,उपायबनजानेपरहर्षमानताहै.-इसप्रकार प्रशस्तरागके उपायमें और हर्षमें समानता होनेपर भी सम्यग्¹ष्िटके तो दण्ड समान और मिथ्या¹ष्िटके व्यापार समान श्रद्धान पाया जाता है. इसलिये अभिप्रायमें विशेष हुआ.
तथा इसके परीषह-तपश्चरणादिकके निमित्तसे दुख हो उसका इलाज तो नहीं करता । परन्तु दु:खका वेदन करता है। सो दु:खका वेदन करना कषाय ही है. जहाँ वीतरागता होती है वहाँ तो जैसे अन्य ज्ञेयको जानता है उसी प्रकार दु:खके कारण ज्ञेयको जानता है। सो ऐसी दशा इसकी होती नहीं है. तथा उनको सहता है वह भी कषायके अभिप्रायरूप विचारसे सहता है. वह विचार ऐसा होता है कि परवशतासे नरकादि गतिमें बहुत दु:ख सहन किये, यह परीषहादिका दु:ख तो थोड़ा है. इसको स्ववश सहनेसे स्वर्ग- मोक्षसुखकीप्राप्तिहोतीहै.यदिइनकोनसहेंऔरविषयसुखकासेवनकरेंतो नरकादिककी प्राप्ति होगी वहाँ बहुत दु:ख होगा - इत्यादि विचारसे परीषहोंमें अनिष्ट बुद्धि रहती है. केवल नरकादिकके भयसे तथा सुखके लोभसेउन्हें सहन करता है। सो यह सब कषायभाव ही हैं. तथा ऐसा विचार होता है कि जो कर्म बांधे थे वे भोगे बिना नहीं छूटते। इसलिये मुझे सहने पड़े. सो ऐसे विचारसे कर्मफलचेतनारूप प्रवर्तता है. तथा पर्याय¹ष्िटसे जो परीषहादिरूप अवस्था होती है उसे अपनेको हुई मानता है। द्रव्य¹ष्िटसे अपनी और शरीरादिककी अवस्थाको भिन्न नहीं पहिचानता. इसीप्रकार नानाप्रकारके व्यवहार विचारसे परीषहादिक सहन करता है.
तथा उसके राज्यादिक विषयसामग्रीका त्याग है और इष्ट भोजनादिकका त्याग करता रहता है. वह तो जैसे कोई दाहज्वरवाला वायु होनेकेभयसे शीतलवस्तु सेवनका त्याग करता है, परन्तु जब तक शीतलवस्तुका सेवन रुचता है तब तक उसके दाहका अभाव नहीं कहा जाता । उसी प्रकार रागसहित जीव नरकादिके भयसे विषयसेवनका त्याग करता है, परन्तु जब तक विषयसेवन रुचता है तब तक उसके रागका अभाव नहीं कहा जाता. तथा जैसे - अमृतके आस्वादी देवको अन्य भोजन स्वयमेव नहीं रुचता। उसी प्रकार स्वरसका आस्वादन करके विषयसेवनकी अरुचि इसके नहीं हुई है. इसप्रकार फलादिककी अपेक्षा परीषह सहनादिको सुखका कारण जानता है, और विषयसेवनादिको दु:खका कारण जानता है.
तथा तत्काल परीषहसहनादिकसे दु:ख होना मानता है, और विषयसेवनादिकसे सुख मानता है। तथा जिनसे सुख-दु:ख का होना माना जाये उनमें इष्ट-अनिष्ट बुद्धिसे राग-द्वेषरूप अभिप्रायका अभाव नहीं होता। और जहाँ राग-द्वेष हैं वहाँ चारित्र नहीं होता. इसलिये यह द्रव्यलिंगी विषयसेवन छोड़कर तपश्चरणादि करता है तथापि असंयमी ही है. सिद्धान्तमें असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटसे भी इसे हीन कहा है। क्तयोंकि उनके चौथा- पाँचवा गुणस्थान है और इसके पहला ही गुणस्थान है.
यहाँ कोई कहे कि असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटके कषायोंकी प्रवृत्ति विशेष है और द्रव्यलिंगी मुनिके थोड़ी है। इसीसे असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िट तो सोलहवें स्वर्गपर्यन्त ही जाते हैं और द्रव्यलिंगी अन्तिम ग्रैवेयकपर्यन्त जाता है. इसलिये भावलिंगी मुनिसे तो द्रव्यलिंगीको हीन कहो, उसे असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटसे हीन कैसे कहा जाय?
समाधान:-असंयतवदेशसंयतसम्यग्¹ष्िटकेकषायोंकीप्रवृत्तितोहै।परन्तु श्रद्धानमें किसीभी कषायके करनेका अभिप्राय नहीं है. तथा द्रव्यलिंगीके शुभकषाय करनेका अभिप्राय पाया जाता है, श्रद्धानमें उन्हें भला जानता है। इसलिये श्रद्धानकी अपेक्षा असंयत सम्यग्¹ष्िटसे भी इसके अधिक कषाय है.
तथा द्रव्यलिंगीके योगोंकी प्रवृत्ति शुभरूप बहुत होती है और अघातिकर्मोंमें पुण्य- पापबन्धकाविशेषशुभ-अशुभयोगोंकेअनुसारहै,इसलियेवहअन्तिमग्रैवेयकपर्यन्त पहुँचता है। परन्तु वह कुछ कार्यकारी नहीं है, क्तयोंकि अघातिया कर्म आत्मगुणके घातक नहीं हैं, उनके उदयसे उच्च-नीचपद प्राप्त किये तो क्तया हुआ? वे तो बाह्य संयोगमात्र संसारदशाके स्वांग हैं। आप तो आत्मा है। इसलिये आत्मगुणके घातक जो घातियाकर्म हैं उनकी हीनता कार्यकारी है.
उनघातियाकर्मोंकाबन्धबाह्यप्रवृत्तिकेअनुसारनहींहै,अंतरंगकषायशक्तिके अनुसार है। इसीलिये द्रव्यलिंगीकी अपेक्षा असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटके घातिकर्मोंका बन्ध थोड़ा है. द्रव्यलिंगीके तो सर्व घातिकर्मोंका बन्ध बहुत स्थिति-अनुभाग सहित होता है, और असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटके मिथ्यात्व-अनन्तानुबन्धी आदि कर्मोंका तो बन्ध है ही नहीं, अवशेषोंका बन्ध होता है वह अल्प स्थिति-अनुभाग सहित होता है. तथा द्रव्यलिंगीके कदापि गुणश्रेणी निर्जरा नहीं होती, सम्यग्¹ष्िटकेकदाचित् होतीहै औरदेशव सकल संयम होनेपर निरन्तर होती है. इसीसे यह मोक्षमार्गी हुआ है. इसलिये द्रव्यलिंगीे मुनिको शास्त्रमें असंयत व देशसंयत सम्यग्¹ष्िटसे हीन कहा है.
समयसार शास्त्रमें द्रव्यलिंगी मुनिकी हीनता गाथा, टीका और कलशोंमें प्रगट की है. तथा पंचास्तिकाय टीकामें जहाँ केवल व्यवहारावलम्बीका कथन किया है वहाँ व्यवहार पंचाचारहोनेपरभीउसकीहीनताहीप्रगटकीहै.तथाप्रवचनसारमेंसंसारतत्त्वव द्रव्यलिंगीको कहा है. परमात्मप्रकाशादि अन्य शास्त्रोंमें भी इस व्याख्यानको स्पष्ट किया है. द्रव्यलिंगीके जो जप, तप, शील, संयमादि क्रियाएँ पायी जाती हैं उन्हें भी इन शास्त्रोंमें जहाँ-तहाँ अकार्यकारी बतलाया है, सो वहाँ देख लेना. यहाँ ग्रन्थ बढ़ जानेके भयसे नहीं लिखते हैं.
इसप्रकार केवल व्यवहाराभासके अवलम्बी मिथ्या¹ष्िटयोंका निरूपण किया .

उभयाभासी मिथ्या¹ष्िट

अब,जोनिश्चय-व्यवहारदोनोंनयोंकेआभासकाअवलम्बनलेतेहैं-ऐसे मिथ्या¹ष्िटयोंका निरूपण करते हैं.
जो जीव ऐसा मानते हैं कि जिनमतमें निश्चय-व्यवहार दोनों नय कहते हैं, इसलिये हमें उन दोनोंका अंगीकार करना चाहिये - ऐसा विचारकर जैसा केवल निश्चयाभासके अवलम्बियोंका कथन किया था, वैसे तो निश्चयका अंगीकार करते हैं. और जैसे केवल व्यवहाराभासके अवलम्बियोंका कथन किया था, वैसे व्यवहारका अंगीकार करते हैं.
यद्यपि इस प्रकार अंगीकार करनेमें दोनों नयोंके परस्पर विरोध है, तथापि करें क्तया? सच्चा तो दोनों नयोंका स्वरूप भासित हुआ नहीं, और जिनमतमें दो नय कहे हैं उनमेंसे किसीको छोड़ा भी नहीं जाता। इसलिये भ्रमसहित दोनोंका साधन साधते हैं। वे जीव भी मिथ्या¹ष्िट जानना.
अब इनकी प्रवृत्तिका विशेष बतलाते हैं :-
अंतरंगमें आपने तो निर्धार करके यथावत् निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्गको पहिचाना नहीं, जिनआज्ञा मानकर निश्चय-व्यवहाररूप मोक्षमार्ग दो प्रकार मानते हैं.सो मोक्षमार्ग दो नहीं हैं, मोक्षमार्गका निरूपण दो प्रकार है.जहाँ सच्चे मोक्षमार्गको मोक्षमार्ग निरूपित किया जाय सो ‘निश्चय मोक्षमार्ग’ है. और जहाँ जो मोक्षमार्ग तो है नहीं, परन्तु मोक्षमार्गका निमित्त है व सहचारी है उसे उपचारसे मोक्षमार्ग कहा जाय सो ‘व्यवहार मोक्षमार्ग’ है. क्तयोंकि निश्चय-व्यवहारका सर्वत्र ऐसा ही लक्षण है. सच्चा निरूपण सो निश्चय, उपचार निरूपण सो व्यवहार इसलिये निरूपण-अपेक्षा दो प्रकार मोक्षमार्ग जानना.(किन्तु)एक निश्चय मोक्षमार्ग है, एक व्यवहार मोक्षमार्ग है - इसप्रकार दो मोक्षमार्ग मानना मिथ्या है.
तथा निश्चय-व्यवहार दोनोंको उपादेय मानता है वह भी भ्रम है। क्तयोंकि निश्चय- व्यवहारका स्वरूप तो परस्पर विरोधसहित है. कारण कि समयसारमें ऐसा कहा है :-
—ववहारोऽभूदत्थो भूदत्थो देसिऊण सुद्धणउ.
अर्थ :- व्यवहार अभूतार्थ है, सत्यस्वरूपका निरूपण नहीं करता, किसी अपेक्षा उपचारसे अन्यथा निरूपण करता है. तथा शुद्धनय जो निश्चय है, वह भूतार्थ है, जैसा वस्तुका स्वरूप है वैसा निरूपण करता है.
इस प्रकार इन दोनोंका स्वरूप तो विरुद्धतासहित है.
तथा तू ऐसा मानता है कि सिद्धसमान शुद्ध आत्माका अनुभवन सो निश्चय, और व्रत, शील, संयमादिरूप प्रवृत्ति सो व्यवहार। सो तेरा ऐसा मानना ठीक नहीं है। क्तयोंकि किसी द्रव्यभावका नाम निश्चय और किसीका नाम व्यवहार - ऐसा नहीं है.एक ही द्रव्यके भावको उस स्वरूप ही निरूपण करना सो निश्चयनय है, उपचारसे उस द्रव्यके भावको अन्यद्रव्यके भावस्वरूप निरूपण करना सो व्यवहार है. जैसे - मिट्टीके घड़ेको मिट्टीका घड़ा निरूपित किया जाय सो निश्चय और घृतसंयोगकेउपचारसे उसीको घृतका घड़ा कहा जाय सो व्यवहार. ऐसे ही अन्यत्र जानना.
इसलिये तू किसीको निश्चय माने और किसीको व्यवहार मााने वह भ्रम है.
तथा तेरे माननेमें भी निश्चय-व्यवहारको परस्पर विरोध आया. यदि तू अपनेको सिद्धसमान शुद्ध मानता है तो व्र्रतादिक किसलिये करता है? यदि व्र्रतादिकके साधन द्वारा सिद्ध होना चाहता है तो वर्त्तमानमें शुद्ध आत्माका अनुभव मिथ्या हुआ.
इसप्रकार दोनों नयोंके परस्पर विरोध है। इसलिये दोनों नयोंका उपादेयपना नहीं बनता.
यहाँ प्रश्न है कि समयसारादिमें शुद्ध आत्माके अनुभवको निश्चय कहा है। व्रत, तप, संयमादिको व्यवहार कहा है। उसप्रकार ही हम मानते हैं?
समाधान :- शुद्ध आत्माका अनुभव सच्चा मोक्षमार्ग है, इसलिये उसे निश्चय कहा. यहाँ स्वभावसे अभिन्न, परभावसे भिन्न - ऐसा ‘शुद्ध’ शब्दका अर्थ जानना. संसारी को सिद्ध मानना - ऐसा भ्रमरूप अर्थ ‘शुद्ध’ शब्दका नहीं जानना.
तथा व्रत, तप आदि मोक्षमार्ग है नहीं, निमित्तादिककी अपेक्षा उपचारसे इनको मोक्षमार्गकहतेहैं,इसलियेइन्हेंव्यवहारकहाहै.-इसप्रकारभूतार्थ-अभूतार्थ मोक्षमार्गपनेसे इनको निश्चय-व्यवहार कहा है। सो ऐसा ही मानना. परन्तु यह दोनों ही सच्चे मोक्षमार्ग हैं, इन दोनोंको उपादेय मानना। वह तो मिथ्याबुद्धि है.
वहाँ कहता है कि श्रद्धान तो निश्चयका रखते हैं और प्रवृत्ति व्यवहाररूप रखते हैं। - इस प्रकार हम दोनोंको अंगीकार करते हैं.
सो ऐसा भी नहीं बनता। क्तयोंकि निश्चयका निश्चयरूप और व्यवहारका व्यवहाररूप श्रद्धान करना योग्य है. एक ही नयका श्रद्धान होनेसे एकान्त मिथ्यात्व होता है. तथा प्रवृत्तिमें नयका प्रयोजन ही नहीं है. प्रवृत्ति तो द्रव्यकी परिणति है। वहाँ जिस द्रव्यकी परिणति हो उसको उसीकी प्ररूपित करे सो निश्चयनय, और उसहीको अन्य द्रव्यकी प्ररूपित करे सो व्यवहारनय। - ऐसे अभिप्रायानुसार प्ररूपणसे उस प्रवृत्तिमें दोनों नय बनते हैं। कुछ प्रवृत्ति ही तो नयरूप है नहीं. इसलिये इस प्रकार भी दोनों नयोंका ग्रहण मानना मिथ्या है.
तो क्तया करें? सो कहते हैं :-
निश्चयनयसे जो निरूपण किया हो उसे तो सत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान अंगीकार करना और व्यवहारनयसे जो निरूपण किया हो उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना.
यही समयसार कलश में कहा है :-
सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्तंजिनै -
स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजित: .
सम्य¢्निश्चयमेकमेवपरमं निष्कम्पमाक्रम्य किं
शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे ब¼नन्ति सन्तो धृतिम् ॥१७३॥
अर्थ :- क्तयोंकि सर्व ही हिंसादि व अहिंसादिमें अध्यवसाय है सो समस्त ही छोड़ना - ऐसा जिनदेवोंने कहा है. इसलिये मैं ऐसा मानता हूँ कि जो पराश्रित व्यवहार है सो सर्व ही छुड़ाया है. सन्त पुरुष एक परम निश्चयहीकोभले प्रकार निष्कम्परूपसे अंगीकार करके शुद्धज्ञानघनरूप निजमहिमामें स्थिति क्तयों नहीं करते?
भाावार्थ :- यहाँ व्यवहारका तो त्याग कराया है, इसलिये निश्चयको अंगीकार करके निजमहिमारूप प्रवर्तना युक्त है.
तथा षटपाहुड़में कहा है :-
जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकज्जम्मि.
जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणे कज्जे॥३१॥(मोक्षपाहुड़)
अर्थ :- जो व्यवहारमें सोता है वह योगी अपने कार्यमें जागता है. तथा जो व्यवहारमें जागता है वह अपने कार्यमें सोता है.
इसलिये व्यवहारनयका श्रद्धान छोड़कर निश्चयनयका श्रद्धान करना योग्य है.
व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्यको व उनके भावोंकोव कारणकार्यादिकको किसीको किसीमें मिलाकर निरूपण करता है। सो ऐसे ही श्रद्धानसे मिथ्यात्व है। इसलिये उसका त्याग करना. तथा निश्चयनय उन्हींको यथावत् निरूपण करता है, किसीको किसीमें नहीं मिलाता है। सो ऐसे ही श्रद्धानसे सम्यक्तत्व होता है। इसलिये उसका श्रद्धान करना.
यहाँ प्रश्न है कि यदि ऐसा है तो जिनमार्गमें दोनों नयोंका ग्रहण करना कहा है, सो कैसे?
समाधान :- जिनमार्गमें कहीं तो निश्चयनयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है, उसे तो ‘सत्यार्थ ऐसे ही है’ - ऐसा जानना. तथा कहीं व्यवहारनयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है, उसे ‘ऐसे है नहीं, निमित्तादिकी अपेक्षा उपचार किया है’ - ऐसा जानना. इसप्रकार जाननेका नाम ही दोनों नयोंका ग्रहण है. तथा दोनों नयोंके व्याख्यानको समान सत्यार्थ जानकर ‘ऐसे भी है, ऐसे भी है’- इसप्रकार भ्रमरूप प्रवर्तनसे तो दोनों नयोंका ग्रहण करना नहीं कहा है.
फिर प्रश्न है कि यदि व्यवहारनय असत्यार्थ है, तो उसका उपदेश जिनमार्गमें किसलिये दिया? एक निश्चयनयहीका निरूपण करना था.
समाधान :- ऐसा ही तर्क समयसारमें किया है. वहाँ यह उत्तर दिया है :-
जह णवि सक्तकमणज्जो अणज्जभासं विणा उ गाहेउं .
तहववहारेणविणापरमत्थुवएसणमसक्तकं ॥८॥
अर्थ :- जिस प्रकार अनार्य अर्थात् म्लेच्छको म्लेच्छभाषा बिना अर्थ ग्रहण करानेमें कोई समर्थ नहीं है। उसी प्रकार व्यवहारके बिना परमार्थका उपदेश अशक्तय है। इसलिये व्यवहारका उपदेश है.
तथा इसी सूत्रकी व्याख्यामें ऐसा कहा है कि—व्यवहारनयो नानुसर्त्तव्य
इसका अर्थ है :- इस निश्चयको अंगीकार करनेके लिये व्यवहार द्वारा उपदेश देते हैं। परन्तु व्यवहारनय है सो अंगीकार करने योग्य नहीं है.
प्रश्न :- व्यवहार बिना निश्चयका उपदेश कैसे नहीं होता? और व्यवहारनय कैसे अंगीकार नहीं करना? सो कहिये.
समाधान :- निश्चयसे तो आत्मा परद्रव्योंसे भिन्न, स्वभावसे अभिन्न स्वयंसिद्ध वस्तु है। उसे जो नहीं पहिचानते उनसे इसी प्रकार कहते रहें तब तो वे समझ नहीं पायें. इसलियेउनकोव्यवहारनयसेशरीरादिकपरद्रव्योंकीसापेक्षताद्वारानर-नारक- पृथ्वीकायादिरूप जीवके विशेष किये - तब मनुष्य जीव है, नारकी जीव है, इत्यादि प्रकार सहित उन्हें जीवकी पहिचान हुई.
अथवा अभेद वस्तुमें भेद उत्पन्न करके ज्ञान-दर्शनादि गुण-पर्यायरूप जीवके विशेष किये, तब जाननेवाला जीव है, देखनेवाला जीव है। - इत्यादि प्रकार सहित उनको जीवकी पहिचान हुई.
तथा निश्चयसे वीतरागभाव मोक्षमार्ग है। उसे जो नहीं पहिचानतेउनको ऐसे ही कहतेरहेंतोवेसमझनहींपायें.तबउनकोव्यवहारनयसे,तत्त्ववश्रद्धान-ज्ञानपूर्वक परद्रव्यके निमित्त मिटनेकी सापेक्षता द्वारा व्रत, शील, संयमादिरूप वीतरागभावके विशेष बतलाये। तब उन्हें वीतरागभावकी पहिचान हुई.
इसी प्रकार अन्यत्र भी व्यवहार बिना निश्चयके उपदेशका न होना जानना.
तथा यहाँ व्यवहारसे नर-नारकादि पर्यायहीको जीव कहा, सो पर्यायहीको जीव नहीं मान लेना. पर्याय तो जीव-पुद्गलके संयोगरूप हैं. वहाँ निश्चयसे जीवद्रव्य भिन्न है, उसहीको जीव मानना. जीवके संयोगसे शरीरादिकको भी उपचारसे जीव कहा, सो कथन मात्र ही है, परमार्थसे शरीरादिक जीव होते नहीं - ऐसा ही श्रद्धान करना.
तथा अभेद आत्मामें ज्ञान-दर्शनादि भेद किये, सो उन्हें भेदरूप ही नहीं मान लेना, क्तयोंकि भेद तो समझानेके अर्थ किये हैं. निश्चयसे आत्मा अभेद ही है। उसहीको जीव वस्तु मानना. संज्ञा-संख्यादिसे भेद कहे सो कथन मात्र ही हैं। परमार्थसे भिन्न-भिन्न हैं नहीं,- ऐसा ही श्रद्धान करना.
तथा परद्रव्यका निमित्त मिटानेकी अपेक्षासे व्रत-शील-संयमादिकको मोक्षमार्ग कहा, सो इन्हींको मोक्षमार्ग नहीं मान लेना। क्तयोंकि परद्रव्यका ग्रहण-त्याग आत्माके हो तो आत्मा परद्रव्यका कर्त्ता-हर्त्ता हो जाये. परन्तु कोई द्रव्य किसी द्रव्यके आधीन है नहीं । इसलिये आत्माअपनेभावरागादिकहैंउन्हेंछोड़करवीतरागीहोताहै।इसलियेनिश्चयसे वीतरागभाव ही मोक्षमार्ग है. वीतरागभावोंके और व्रतादिकके कदाचित् कार्य-कारणपना है, इसलिये व्रतादिकोमोक्षमार्ग कहे सो कथनमात्र हीहै। परमार्थसे बाह्यक्रिया मोक्षमार्ग नहीं है- ऐसा ही श्रद्धान करना.
इसीप्रकार अन्यत्र भी व्यवहारनयका अंगीकार नहीं करना ऐसा जान लेना.
यहाँ प्रश्न है कि व्यवहारनय परको उपदेशमें ही कार्यकारी है या अपना भी प्रयोजन साधता है?
समाधान :- आपभी जब तक निश्चयसे प्ररूपित वस्तुको न पहिचाने तब तक व्यवहारमार्गसेवस्तुकानिश्चयकरे।इसलियेनिचलीदशामेंअपनेकोभीव्यवहारनय कार्यकारी है। परन्तु व्यवहारको उपचारमात्र मानकर उसके द्वारा वस्तुको ठीक प्रकार समझे तब तो कार्यकारी हो। परन्तु यदि निश्चयवत् व्यवहारको भी सत्यभूत मानकर ‘वस्तु इस प्रकार ही है’ ऐसा श्रद्धान करे तो उलटा अकार्यकारी हो जाये.
यही पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें कहा है :-
अबुधस्य बोधनार्थं मुनिश्वरादेशयन्त्यभूतार्थम्.
व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ॥६॥
मााणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीतसिंहस्य .
व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य ॥७॥
अर्थ :- मुनिराज अज्ञानीकोसमझानेके लिये असत्यार्थ जो व्यवहारनय उसका उपदेश देते हैं. जो केवल व्यवहारहीको जानता है, उसे उपदेश ही देना योग्य नहीं है. तथा जैसे कोई सच्चे सिंहको न जाने उसे बिलाव ही सिंह है। उसी प्रकार जो निश्चयको नहीं जाने उसके व्यवहार ही निश्चयपनेको प्राप्त होता है.
यहाँ कोई निर्विचारी पुरुष ऐसा कहे कि तुम व्यवहारको असत्यार्थ-हेय कहते हो। तो हम व्रत, शील, संयमादि व्यवहारकार्य किसलिये करें? - सबको छोड़ देंगे.
उससे कहते हैं कि कुछ व्रत, शील, संयमादिकका नाम व्यवहार नहीं है। इनको मोक्षमार्ग मानना व्यवहार है, उसे छोड़दे। और ऐसा श्रद्धान कर किइनकोतो बाह्य सहकारी जानकर उपचारसे मोक्षमार्ग कहा है, यह तो परद्रव्याश्रित हैं। तथा सच्चा मोक्षमार्ग वीतरागभावहै,वहस्वद्रव्याश्रितहै.-इसप्रकारव्यवहारकोअसत्यार्थ-हेयजानना. व्रतादिकको छोड़नेसे तो व्यवहारका हेयपना होता नहीं है.
फिर हम पूछते हैं कि व्रतादिकको छोड़कर क्तया करेगा? यदि हिंसादिरूप प्रवर्तेगा तो वहाँ तो मोक्षमार्गका उपचार भी संम्भव नहीं है। वहाँ प्रवर्तनेसे क्तया भला होगा ? नरकादिप्राप्तकरेगा.इसलियेऐसाकरनातोनिर्विचारीपनाहै.तथाव्रतादिकरूप परिणतिकोमिटाकर केवल वीतराग उदासीनभावरूप होना बने तो अच्छा ही है। वह निचली दशामें हो नहीं सकता। इसलिये व्रतादि साधन छोड़कर स्वच्छन्द होना योग्य नहीं है. इसप्रकार श्रद्धानमें निश्चयको, प्रवृत्तिमें व्यवहारको उपादेय मानना वह भी मिथ्या भाव ही है.
तथा यह जीव दोनों नयोंका अंगीकार करनेके अर्थ कदाचित् अपनेको शुद्ध सिद्ध समान रागादि रहित केवलज्ञानादिसहित आत्माअनुभवता है, ध्यानमुद्रा धारण करके ऐसे विचारोंमें लगता है। सो ऐसा आप नहीं है, परन्तु भ्रमसे ‘निश्चयसे मैं ऐसा ही हूँ’ ऐसा मानकर सन्तुष्ट होता है. तथा कदाचित् वचन द्वारा निरूपण ऐसा ही करता है. परन्तु निश्चय तो यथावत् वस्तुको प्ररूपित करता है. प्रत्यक्ष आप जैसा नहीं है वैसाअपनेको माने तो निश्चय नाम कैसे पाये?जैसाकेवल निश्चयाभास वाले जीवके अयथार्थपना पहले कहा था उसी प्रकार इसके जानना.
अथवा यह ऐसा मानता है कि इस नयसे आत्मा ऐसा है, इस नयसे ऐसा है. सो आत्मा तो जैसा है वैसा ही है। परन्तु उसमें नय द्वारा निरूपण करनेका जो अभिप्राय है उसे नहीं पहिचानता. जैसे - आत्मा निश्चयसे तो सिद्धसमान केवलज्ञानादिसहित, द्रव्यकर्म- नोकर्म-भावकर्म रहित है, और व्यवहारनयसे संसारी मतिज्ञानादि सहित तथा द्रव्यकर्म- नोकर्म-भावकर्म सहित है - ऐसा मानता है।सो एक आत्माके ऐसे दो स्वरूप तो होते नहीं है। जिस भावहीका सहितपना उस भावहीका रहितपना एक वस्तुमें कैसे सम्भव हो? इसलिये ऐसा मानना भ्रम है.
तो किस प्रकार है? जैसे - राजा और रंक मनुष्यपनेकी अपेक्षा समान हैं। उसी प्रकार सिद्ध और संसारी को जीवत्वपनेकी अपेक्षा समान कहा है. केवलज्ञानादिकी अपेक्षा समानता मानी जाय, सो तो है नहीं। संसारीके निश्चयसेमतिज्ञानादिक ही हैं, सिद्धके केवलज्ञान है. इतना विशेष है कि संसारीके मतिज्ञानादिक कर्मके निमित्तसे हैं, इसलिये स्वभाव अपेक्षा संसारीमें केवलज्ञानकी शक्ति कही जाये तो दोष नहीं है. जैसे - रंक मनुष्यमें राजा होनेकीशक्ति पाई जाती है, उसी प्रकार यह शक्ति जानना. तथा द्रव्यकर्म- नोकर्म पुद्गलसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये निश्चयसे संसारीके भी इनका भिन्नपना है, परन्तु सिद्धकी भाँति इनका कारणकार्य अपेक्षा सम्बन्ध भी न माने तो भ्रम ही है. तथा भावकर्म आत्माका भाव है सो निश्चयसे आत्माहीका है, परन्तु कर्मके निमित्तसे होता है, इसलिये व्यवहारसे कर्मका कहा जाता है. तथा सिद्धकी भाँति संसारीके भी रागादिक न मानना, उन्हें कर्महीका मानना वह भी भ्रम है.
इस प्रकार नयोंद्वारा एक ही वस्तुको एक भाव अपेक्षा ‘ऐसा भी मानना और ऐसा भी मानना,’ वह तो मिथ्याबुद्धि है। परन्तु भिन्न-भिन्न भावोंकी अपेक्षा नयोंकी प्ररूपणा है - ऐसा मानकर यथासम्भव वस्तुको मानना सो सच्चा श्रद्धान है. इसलिये मिथ्या¹ष्िट अनेकान्तरूप वस्तुको मानता है परन्तु यथार्थ भावकोपहिचानकर नहीं मान सकता - ऐसा जानना.
तथा इस जीवके व्रत, शील, संयमादिकका अंगीकार पाया जाता है, सो व्यवहारसे ‘ये भी मोक्षके कारण हैं’- ऐसा मानकर उन्हें उपादेय मानता है। सो जैसे पहले केवल व्यवहारावलम्बी जीवके अयथार्थपना कहा था वैसे ही इसके भी अयथार्थपना जानना.
तथा यह ऐसा भी मानता है कि यथायोग्य व्रतादि क्रिया तो करने योग्य है। परन्तु इसमें ममत्व नहीं करना. सो जिसका आप कर्त्ता हो, उसमें ममत्व कैसे नहीं किया जाय? आप कर्त्ता नहीं है तो ‘मुझको करने योग्य है’ ऐसा भाव कैसे किया? और यदि कर्त्ता हैं तो वह अपना कर्म हुआ, तब कर्त्ता-कर्म सम्बन्ध स्वयमेव ही हुआ। सो ऐसी मान्यता तो भ्रम है.
तो कैसे है? बाह्य व्रतादिक हैं वे तो शरीरादिक परद्रव्यके आश्रित हैं, परद्रव्यका आप कर्त्ता है नहीं। इसलिये उसमें कर्त्तृत्वबुद्धि भी नहीं करना और वहाँ ममत्व भी नहीं करना. तथा व्रतादिकमें ग्रहण-त्यागरूप अपना शुभोपयोग हो, वह अपने आश्रित है, उसका आप कर्त्ता है। इसलिये उसमें कर्त्तृत्वबुद्धि भी मानना और वहाँ ममत्व भी करना. परन्तु इस शुभोपयोगको बन्धका ही कारण जानना, मोक्षका कारण नहीं जानना, क्तयोंकि बन्ध और मोक्षके तो प्रतिपक्षीपना है। इसलिये एक ही भाव पुण्यबन्धका भी कारण होऔर मोक्षका भी कारण हो - ऐसा मानना भ्रम है.
इसलिये व्रत-अव्रत दोनों विकल्परहित जहाँ परद्रव्यके ग्रहण-त्यागका कुछ प्रयोजन नहीं है - ऐसा उदासीन वीतराग शुद्धोपयोग वही मोक्षमार्ग है. तथा निचली दशामें कितने ही जीवोंके शुभोपयोग और शुद्धोपयोगका युक्तपना पाया जाता है। इसलियेउपचारसे व्रतादिक शुभोपयोगको मोक्षमार्ग कहा है। वस्तुका विचार करनेपरशुभोपयोग मोक्षका घातक ही है। क्तयोंकि बन्धका कारण वह ही मोक्षका घातक है - ऐसा श्रद्धान करना.
इसप्रकारशुद्धोपयोगहीकोउपादेयमानकरउसकाउपायकरना,और शुभोपयोग-अशुभोपयोगको हेय जानकर उनके त्यागका उपाय करना. जहाँ शुद्धोपयोग न हो सके वहाँ अशुभोपयोगको छोड़कर शुभमें ही प्रवर्तन करना, क्तयोंकि शुभोपयोगकी अपेक्षा अशुभोपयोगमें अशुद्धताकी अधिकता है. तथा शुद्धोपयोग हो तब तो परद्रव्यका साक्षीभूत ही रहता है, वहाँ तो कुछ परद्रव्यका प्रयोजन ही नहीं है. शुभोपयोग हो वहाँ बाह्य व्रतादिककी प्रवृत्ति होती है, और अशुभोपयोग हो वहाँ बाह्य अव्रतादिककी प्रवृत्ति होती है। क्तयोंकि अशुद्धोपयोगके और परद्रव्यकी प्रवृत्तिके निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध पाया जाता है. तथा पहले अशुभोपयोग छूटकर शुभोपयोग हो, फिर शुभोपयोग छूटकर शुद्धोपयोग हो - ऐसी क्रम- परिपाटी है.
तथा कोई ऐसा माने कि शुभोपयोग है सो शुद्धोपयोगका कारण है। सो जैसे अशुभोपयोग छूटकर शुभोपयोग होता है, वैसे शुभोपयोग छूटकर शुद्धोपयोग होता है. ऐसा ही कार्यकारणपना हो, तो शुभोपयोगका कारण अशुभोपयोग ठहरे. अथवा द्रव्यलिंगीके शुभोपयोग तो उत्कृष्ट होता है, शुद्धोपयोग होता ही नहीं। इसलिये परमार्थसे इनके कारण- कार्यपना है नहीं . जैसे रोगीको बहुत रोग था, पश्चात अल्प रोग रहा, तो वह अल्प रोग तो निरोग होनेका कारण है नहीं. इतना है कि अल्प रोग रहनेपर निरोग होनेका उपाय करे तो हो जाये। परन्तु यदि अल्प रोगको ही भला जानकर उसको रखनेका यत्न करे तो निरोगकैसेहो?उसीप्रकारकषायीकेतीव्रकषायरूपअशुभोपयोगथा,पश्चात् मन्दकषायरूप शुभोपयोग हुआ तो वह शुभोपयोग तो नि:कषाय शुद्धोपयोग होनेका कारण है नहीं. इतना है कि शुभोपयोग होनेपर शुद्धोपयोगका यत्न करे तो हो जाये। परन्तु यदि शुभोपयोगको ही भला जानकर उसका साधन किया करे तो शुद्धोपयोग कैसे हो? इसलिये मिथ्या¹ष्िटका शुभोपयोग तो शुद्धोपयोगका कारण है नहीं। सम्यग्¹ष्िटको शुभोपयोग होनेपर निकट शाुद्धोपयोग प्राप्त हो - ऐसी मुख्यतासे कहीं शुभोपयोगको शुद्धोपयोगका कारण भी कहते हैं - ऐसा जानना.
तथा यह जीव अपनेको निश्चय-व्यवहाररूप मोक्षमार्गका साधक मानता है. वहाँ पूर्वोक्त प्रकारसे आत्माको शुद्ध माना सो तो सम्यग्दर्शन हुआ। वैसा ही जाना सो साम्यग्ज्ञान हुआ।वैसाहीविचारमेंप्रवर्तनकियासोसम्यक्चारित्रहुआ.इसप्रकारतोअपनेको निश्चयरत्नत्रय हुआ मानता है। परन्तु मैं प्रत्यक्ष अशुद्ध। सो शुद्ध कैसे मानता-जानता- विचारता हूँ - इत्यादि विवेकरहित भ्रमसे संतुष्ट होता है.
तथाअरहंतादिकेसिवाअन्यदेवादिककोनहींमानता,वजैनशास्त्रानुसार जीवादिकके भेद सीख लिये हैं उन्हींको मानता है, औरोंको नहीं मानता, वह तो सम्यग्दर्शन हुआ। तथा जैनशास्त्रोंके अभ्यासमें बहुत प्रवर्तता है सो साम्यग्ज्ञान हुआ। तथा व्रतादिरूप क्रियाओंमें प्रवर्तता है सो सम्यक्चारित्र हुआ. - इसप्रकार अपनेको व्यवहाररत्नत्रय हुआ मानता है. परन्तु व्यवहार तो उपचारकानाम है। सो उपचार भी तोतब बनताहै जब सत्यभूत निश्चयरत्नत्रयके कारणादिक हो. जिस प्रकार निश्चयरत्नत्रय सध जाये उसी प्रकार इन्हें साधे तो व्यवहारपना भी सम्भव हो। परन्तु इसे तो सत्यभूत निश्चयरत्नत्रयकी पहिचान ही हुई नहीं, तो यह इसप्रकार कैसे साध सकेगा? आज्ञानुसार हुआ देखा-देखी साधन करता है. इसलिये इसके निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्ग नहीं हुआ.
निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्गका आगे निरूपण करेंगे, उसका साधन होनेपर ही मोक्षमार्ग होगा.
इसप्रकार यह जीव निश्चयाभासको मानता-जानता है। परन्तु व्यवहार साधनको भी भला जानता है, इसलिये स्वच्छन्द होकर अशुभरूप नहीं प्रवर्तता है, व्रतादिक शुभोपयोगरूप प्रवर्तता है, इसलिये अन्तिम ग्रैवेयक पर्यन्त पदको प्राप्त करता है. तथा यदि निश्चयाभासकी प्रबलतासे अशुभरूपप्रवृत्ति हो जाये तो कुगति में भी गमन होता है. परिणामोंके अनुसार फल प्राप्त करता है, परन्तु संसारका ही भोक्ता रहता है। सच्चा मोक्षमार्ग पाये बिना सिद्धपदको नहीं प्राप्त करता है.
इसप्रकारनिश्चयाभास-व्यवहाराभासदोनोंकेअवलम्बीमिथ्या¹ष्िटयोंकानिरूपण किया.

सम्यक्तत्वसन्मुख मिथ्या¹ष्िट

अब, सम्यक्तत्वके सन्मुख जो मिथ्या¹ष्िट हैं उनका निरूपण करते हैं :-
कोई मन्दकषायादिका कारण पाकर ज्ञानावरणादि कर्मोंका क्षयोपशम हुआ, जिससे तत्त्ववविचार करनेकी शक्ति हुई। तथा मोह मन्द हुआ, जिससे तत्त्ववविचारमें उद्यम हुआ, और बाह्यनिमित्त देव-गुरु-शास्त्रादिकका हुआ, उनसे सच्चे उपदेशका लाभ हुआ.
वहाँअपनेप्रयोजनभूतमोक्षमार्गके,देव-गुरु-धर्मादिकके,जीवादितत्त्ववोंके,तथा निज-परके और अपनेको अहितकारी-हितकारी भावोंके - इत्यादिके उपदेशसे सावधान होकर ऐसा विचार किया कि अहो मुझे तो इन बातों की खबर ही नहीं, मैं भ्रमसे भूलकर प्राप्त पर्याय ही में तन्मय हुआ। परन्तु इस पर्यायकी तो थोड़े ही काल की स्थिति है। तथा यहाँ मुझे सर्व निमित्त मिले हैं, इसलिये मुझे इन बातोंको बराबर समझना चाहिये, क्तयोंकि इनमें तो मेरा ही प्रयोजन भासित होता है. ऐसा विचारकर जो उपदेश सुना उसके निर्धार करनेका उद्यम किया.
वहाँ उ¶ेश, लक्षणनिर्देश और परीक्षा द्वारा उनका निर्धार होता है . इसलिये पहले तो उनके नाम सीखे, वह उ¶ेश हुआ. फिर उनके लक्षण जाने . फिर ऐसा सम्भवित है कि नहीं - ऐसे विचार सहित परीक्षा करने लगे.
वहाँ नाम सीख लेना और लक्षण जान लेना यह दोनों तो उपदेशके अनुसार होते हैं- जैसा उपदेश दिया हो वैसा याद कर लेना. तथा परीक्षा करनेमें अपना विवेक चाहिये. सो विवेकपूर्वक एकान्तमें अपने उपयोगमें विचार करे कि जैसा उपदेश दिया वैसा ही है या अन्यथाहै? वहाँ अनुमानादिक प्रमाणसे बराबर समझे. अथवा उपदेश तो ऐसा है, और ऐसा न माने तो ऐसा होगा। सो इनमें प्रबल युक्ति कौन है और निर्बल युक्ति कौन है? जो प्रबल भासित हो उसे सत्य जाने. तथा यदि उपदेशमें अन्यथा सत्य भासित हो, अथवा उसमें सन्देह रहे, निर्धार न हो। तो जो विशेषज्ञ हों उनसे पूछे, और वे उत्तर दें उसका विचार करे. इसीप्रकार जबतक निर्धार न हो तबतक प्रश्न-उत्तर करे. अथवा समान बुद्धिके धारक हों उनसे अपना विचार जैसा हुआ हो वैसा कहे और प्रश्न-उत्तर द्वारा परस्पर चर्चा करे। तथा जो प्रश्नोत्तरमें निरूपण हुआ हो उसका एकान्तमें विचार करे. इसीप्रकार जबतक अपने अंतरंगमें - जैसा उपदेश दिया था वैसा ही निर्णय होकर - भाव भासित न हो तब तक इसीप्रकार उद्यम किया करे.
तथा अन्यमतियों द्वारा जो कल्पित तत्त्ववोंका उपदेश दिया गया है, उससे जैन उपदेश अन्यथा भासित हो व सन्देह हो - तब भी पूर्वोक्त प्रकारसे उद्यम करे.
ऐसाउद्यमकरनेपरजैसाजिनदेवकाउपदेशहैवैसाहीसत्यहै,मुझेभी इसीप्रकार भासित होता है - ऐसा निर्णय होता है। क्तयोंकि जिनदेव अन्यथावादी हैं नहीं.
यहाँ कोई कहे कि जिनदेव यदि अन्यथावादी नहीं हैं तो जैसा उनका उपदेश है वैसा ही श्रद्धान कर लें, परीक्षा किसलिये करें?
समाधान :- परीक्षा किये बिना यह तो मानना हो सकता है कि जिनदेवने ऐसा कहा है सो सत्य है। परन्तु उनका भाव अपनेको भासित नहीं होगा. तथा भाव भासित हुये बिना निर्मल श्रद्धान नहीं होता। क्तयोंकि जिसकी किसीके वचनहीसे प्रतीति की जाय, उसके अन्यके भी वचनसे अन्यथा प्रतीति हो जाय। इसलिये शक्तिअपेक्षा वचनसे की गई प्रतीति अप्रतीतिवत् है. तथा जिसका भाव भासित हुआ हो, उसे अनेक प्रकारसे भी अन्यथा नहीं मानता। इसलिये भाव भासित होनेपर जो प्रतीति होती है वही सच्ची प्रतीति है.
यहाँ यदि कहोगे कि पुरुषकी प्रमाणतासे वचनकी प्रमाणता की जाती है? तो पुरुषकी भी प्रमाणता स्वयमेव तो नहीं होती। उसके कुछ वचनोंकी परीक्षा पहले कर ली जाये, तब पुरुषकी प्रमाणता होती है.
प्रश्न :- उपदेश तो अनेक प्रकारके हैं, किस-किसकी परीक्षा करें?
समाधान :- उपदेशमें तो कोई उपादेय, कोई हेय, तथा कोई ज्ञेयतत्त्ववोंका निरूपण किया जाता है. वहाँ उपादेय-हेय तत्त्ववोंकी तो परीक्षा कर लेना, क्तयोंकि इनमें अन्यथापना होनेसे अपना बुरा होता है. उपादेयको हेय मानलें तो बुरा होगा, हेयको उपादेय मानलें तो बुरा होगा.
फिर वह कहेगा - स्वयं परीक्षा न की और जिनवचनहीसे उपादेयको उपादेय जाने तथा हेयको हेय जाने तो इसमें कैसा बुरा होगा?
समाधान :- अर्थका भाव भासित हुये बिना वचनका अभिप्राय नहीं पहिचाना जाता. यह तो मानलें कि मैं जिनवचनानुसार मानता हूँ, परन्तु भाव भासित हुए बिना अन्यथापना हो जाये. लोकमें भी नौकरको किसी कार्यके लिये भेजते हैं। वहाँ यदि वह उस कार्यका भाव जानता हो तो कार्यको सुधारेगा। यदि भाव भासित नहीं होगा तो कहीं चूक ही जायेगा. इसलिये भाव भासित होनेके अर्थ हेय-उपादेय तत्त्ववोंकी परीक्षा अवश्य करना चाहिये.
फिर वह कहता है - यदि परीक्षा अन्यथा हो जाये तो क्तया करें?
समाधान :- जिनवचन और अपनी परीक्षामें समानता हो, तब तो जाने कि सत्य परीक्षा हुई है. जबतक ऐसा न हो तबतक जैसे कोई हिसाब करता है और उसकी विधि न मिले तबतक अपनी चूकको ढूँढता है। उसी प्रकार यह अपनी परीक्षामें विचार किया करे.
तथा जो ज्ञेयतत्त्वव हैं उनकी परीक्षा हो सके तो परीक्षा करे। नहीं तो यह अनुमान करे कि जो हेय-उपादेय तत्त्वव ही अन्यथा नहीं कहे, तो ज्ञेयतत्त्ववोंको अन्यथा किसलिये कहेंगे? जैसे- कोई प्रयोजनरूप कार्योंमें भी झूठ नहीं बोलता, वह अप्रयोजन झूठ क्तयों बोलेगा? इसलिये ज्ञेयतत्त्ववोंका स्वरूप परीक्षा द्वारा भी अथवा आज्ञासे जाने. यदि उनका यथार्थ भाव भासित न हो तो भी दोष नहीं है.
इसीलिये जैनशास्त्रोंमें जहाँ तत्त्ववादिकका निरूपण किया। वहाँ तो हेतु, युक्ति आदि द्वारा जिस प्रकार उसे अनुमानादिसे प्रतीति आये उसीप्रकार कथन किया है. तथा त्रिलोक, गुणस्थान, मार्गणा, पुराणादिकके कथन आज्ञानुसार किये हैं. इसलिये हेयोपादेय तत्त्ववोंकी परीक्षा करना योग्य है.
वहाँ जीवादिक द्रव्यों व तत्त्ववोंको तथा स्व-परको पहिचानना. तथा त्यागने योग्य मिथ्यात्व-रागादिक और ग्रहण करने योग्य सम्यग्दर्शनादिकका स्वरूप पहिचानना. तथा निमित्त-नैमित्तिकादिक जैसे हैं, वैसे पहिचानना. - इत्यादि मोक्षमार्गमें जिनके जाननेसे प्रवृत्ति होती हैउन्हें अवश्य जानना. सो इनकी तो परीक्षा करना. सामान्यरूपसे किसी हेतु-युक्ति द्वारा इनको जानना, व प्रमाण-नय द्वारा जानना, व निर्देष-स्वामित्वादिसे और सत्-संख्यादिसे इनके विशेष जानना. जैसी बुद्धि हो - जैसा निमित्त बने, उसी प्रकार इनको सामान्य-विशेषरूपसे पहिचानना. तथा इस जानने में उपकारी गुणस्थान-मार्गणादिक व पुराणादिक व व्रतादिक-क्रियादिकका भी जानना योग्य है. यहाँ जिनकी परीक्षा हो सके उनकी परीक्षा करना, न हो सके उनकी आज्ञानुसार जानकारी करना.
इसप्रकार इस जाननेके अर्थ कभी स्वयं ही विचार करता है, कभी शास्त्र पढ़ता है, कभी सुनता है, कभी अभ्यास करता है, कभी प्रश्नोत्तर करता है, - इत्यादिरूप प्रवर्तता है. अपना कार्य करनेका इसको हर्ष बहुत है, इसलिये अन्तरंग प्रीतिसे उसका साधन करता है.इसप्रकारसाधन करते हुए जब तक(१)सच्चा तत्त्ववश्रद्धान न हो,(२)‘यह इसीप्रकार है’ - ऐसी प्रतीति सहित जीवादितत्त्ववोंका स्वरूप आपको भासित न हो,(३) जैसे पर्यायमें अहंबुद्धि है वैसे केवल आत्मामें अहंबुद्धि न आये,(४)हित-अहितरूप अपने भावोंको न पहिचाने - तबतक सम्यक्तत्वके सन्मुख मिथ्या¹ष्िट है. यह जीव थोड़े ही कालमें साम्यक्तत्वको प्राप्त होगा। इसी भवमें या अन्य पर्यायमें साम्यक्तत्वको प्राप्त करेगा.
इस भवमें अभ्यास करके परलोकमें तिर्यंचादि गतिमेंभी जाये तो वहाँ संस्कारके बलसे देव-गुरु-शास्त्रके निमित्त बिना भी सम्यक्तत्व हो जाये, क्तयोंकि ऐसे अभ्यासके बलसे मिथ्यात्वकर्मका अनुभाग हीन होता है. जहाँ उसका उदय न हो वहीं सम्यक्तत्व हो जाता है.
मूलकारण यही है. देवादिकका तो बाह्य निमित्त है। सो मुख्यतासे तो इनके निमित्तसे ही साम्यक्तत्व होता है। तारतम्यसे पूर्व अभ्यास-संस्कारसे वर्त्तमानमें इनका निमित्त न होतो भीसाम्यक्तत्व हो सकता है. सिद्धान्तमें—तन्निसर्गादधिगमाद्वा(तत्त्ववार्थसूत्र १-३)ऐसा सूत्र है. इसका अर्थ यह है कि वह सम्यग्दर्शन निसर्ग अथवा अधिगमसे होता है. वहाँ देवादिक बाह्यनिमित्तके बिना हो उसे निसर्गसे हुआ कहते हैं। देवादिकके निमित्तसे हो, उसे अधिगमसे हुआ कहते हैं.
देखो तत्त्ववविचारकी महिमा तत्त्ववविचाररहित देवादिककी प्रतीति करे, बहुत शास्त्रोंका अभ्यास करे, व्रतादिक पाले, तपश्चरणादि करे, उसको तो साम्यक्तत्व होनेका अधिकार नहीं । और तत्त्ववविचारवाला इनके बिना भी साम्यक्तत्वका अधिकारी होता है.
तथा किसी जीवको तत्त्ववविचार होनेके पहिले कोई कारण पाकर देवादिककीप्रतीति हो, व व्रत-तपका अंगीकार हो, पश्चात् तत्त्ववविचार करे। परन्तु साम्यक्तत्वका अधिकारी तत्त्ववविचार होनेपर ही होता है.
तथा किसीको तत्त्ववविचार होनेके पश्चात् तत्त्ववप्रतीति न होनेसे सम्यक्तत्व तो नहीं हुआ और व्यवहारधर्मकी प्रतीति-रुचि होगई, इसलिये देवादिककी प्रतीति करता है व व्रत- तपको अंगीकार करता है. किसीको देवादिककी प्रतीति और सम्यक्तत्व युगपत् होते हैं तथा व्रत-तप सम्यक्तत्वके साथ भी होते हैं और पहले पीछे भी होते हैं. देवादिककी प्रतीतिका तो नियम है, उसके बिना सम्यक्तत्व नहीं होता। व्रतादिकका नियम है नहीं. बहुत जीव तो पहले सम्यक्तत्व हो पश्चातही व्रतादिकको धारण करते हैं, किन्हीं को युगपत् भी हो जाते हैं. इसप्रकार यह तत्त्ववविचारवाला जीव सम्यक्तत्वका अधिकारी है। परन्तु उसके सम्यक्तत्व हो ही हो, ऐसा नियम नहीं है। क्तयोंकि शास्त्रमें सम्यक्तत्व होनेसे पूर्व पंचलब्धियोका होना कहा है.
पाँच लब्धियोंका स्वरूप
क्षयोपशम, विशुद्ध, देशना, प्रयोग्य, करण. वहाँ जिसके होनेपर तत्त्ववविचार हो सके - ऐसा ज्ञानावरणादि कर्मोंका क्षयोपशम हो अर्थात उदयकालको प्राप्त सर्वघाती स्पर्धकोंके निषेकोंके उदयका अभाव सो क्षय, तथा अनागतकालमें उदय आने योग्य उन्हींका सत्तारूप रहना सो उपशम- ऐसी देशघाती स्पर्धकोंके उदय सहित कर्मोंकी अवस्था उसका नाम क्षयोपशम है। उसकी प्राप्ति सो क्षयोपशमलब्धि है.
तथा मोहका मन्द उदय आनेसे मन्दकषायरूप भाव हों कि जहाँ तत्त्ववविचार होसके सो विशुद्धलब्धि है.
तथा जिनदेवके उपदिष्ट तत्त्ववका धारण हो, विचार हो, सो देशनालब्धि है. जहाँ नरकादिमें उपदेशका निमित्त न हो वहाँ वह पूर्व संस्कारसे होती है.
तथा कर्मोंकी पूर्वसत्ता अंत: कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण रह जाये और नवीन बन्ध अंत: कोड़ाकोड़ी प्रमाण उसके संख्यातवें भागमात्र हो, वह भी उस लब्धिकालसे लगाकर क्रमश: घटता जाये और कितनी हीपापप्रकृतियोंका बन्ध मिटता जाये - इत्यादि योग्य अवस्थाका होना सो प्रयोग्यलब्धि है.
सो ये चारों लब्धियाँ भव्य या अभव्यके होती हैं. ये चार लब्धियाँ होनेके बाद सम्यक्तत्व हो तो हो न हो तो नहीं भी हो - ऐसा ‘लब्धिसार’ में कहा है. इसलिये उस तत्त्ववविचारवालेको सम्यक्तत्व होनेका नियम नहीं है. जैसे - किसीको हितकी शिक्षा दी, उसे जानकर वह विचार करे कि यह जो शिक्षा दी सो कैसे है? पश्चात विचार करनेपर उसको ‘ऐसे ही है’- ऐसी उस शिक्षाकी प्रतीति हो जाये।अथवा अन्यथा विचार हो या अन्य विचारमें लगकर उस शिक्षाका निर्धार न करे तो प्रतीति नहीं भी हो। उसी प्रकार श्रीगुरुने तत्त्ववोपदेश दिया, उसे जानकर विचार करे कि यह उपदेश दिया सो किस प्रकार है? पश्चात् विचार करने पर उसको ‘ऐसा ही है’- ऐसी प्रतीति हो जाये। अथवा अन्यथा विचार हो या अन्य विचारमें लगकर उस उपदेशका निर्धार न करे तो प्रतीति नहीं भी हो. सो मूलकारण मिथ्यात्वकर्र्म है। उसका उदय मिटे तो प्रतीति हो जाये, न मिटे तो नहीं हो। ऐसा नियम है. उसका उद्यम तो तत्त्ववविचार करना मात्र ही है.
तथा पाँचवी करणलब्धि होनेपर सम्यक्तत्व हो ही हो - ऐसा नियम है. सो जिसके पहले कही हुई चार लब्धियाँ तो हुई हों और अंतर्मुहूर्त पश्चात जिसके सम्यक्तत्व होना हो उसी जीवके करणलब्धि होती है.
सोइसकरणलब्धिवालेकेबुद्धिपूर्वकतोइतनाहीउद्यमहोताहैकिउस तत्त्ववविचारमें उपयोगको तद्रूप होकर लगाये, उससे समय-समय परिणाम निर्मल होते जाते हैं. जैसे - किसीके शिक्षाका विचार ऐसा निर्मल होने लगा कि जिससे उसको शीघ्र ही उसकी प्रतीति हो जायेगी। उसी प्रकार तत्त्ववोपदेशका विचार ऐसा निर्मल होने लगा कि जिससेउसकोशीघ्रहीउसकाश्रद्धानहोजायेगा.तथाइनपरिणामोंकातारतम्य केवलज्ञान द्वारा देखा, उसका निरूपण करणानुयोगमें किया है.
इस करणलब्धिके तीन भेद हैं - अध:करण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण. इनका विशेष व्याख्यान तो लब्धिसार शास्त्रमें किया है वहाँसे जानना. यहाँ संक्षेपमें कहते हैं.
त्रिकालवर्ती सर्व करणलब्धिवाले जीवोंके परिणामोंकी अपेक्षा ये तीन नाम हैं. वहाँ करण नाम तो परिणामोंका है.
जहाँ पहले और पिछले समयोंके परिणाम समान हों सो अध:करण है.जैसे - किसी जीवके परिणाम उस करणके पहले समयमें अल्प विशुद्धतासहित हुए, पश्चात् समय- समय अनन्तगुनी विशुद्धतासे बढ़ते गये, तथा उसके द्वितीय-तृतीय आदि समयोंमें जैसे परिणाम हों वैसे किन्हीं अन्य जीवोंके प्रथम समयमें ही हो और उनके उससे समय-समय अनन्तगुनी विशुद्धतासे बढ़ते हों - इसप्रकार अध:प्रवृत्तिकरण जानना.
तथा जिसमें पहले और पिछले समयोंके परिणाम समान न हों, अपूर्व ही हों, वह अपूर्वकरण है. जैसे कि उस करणके परिणाम जैसे पहले समयमें हो वैसे किसी भी जीवके द्वितीयादि समयोंमें नहीं होते, बढ़ते ही होते हैं। तथा यहाँ अध:करणवत् जिन जीवोंके करणका पहला समय ही हो, उन अनेक जीवोंके परिणाम परस्पर समान भी होते हैं और अधिक-हीनविशुद्धतासहितभीहोतेहैं।परन्तुयहाँइतनाविशेषहुआकिइसकी उत्कृष्टतासे भी द्वितीयादि समयवाले के जघन्य परिणाम भी अनन्तगुनी विशुद्धता सहित ही होतेहैं.इसीप्रकारजिन्हेंकरणप्रारम्भकियेद्वितीयादिसमयहुएहोंउनकेउस समयवालोंके परिणाम तो परस्पर समान या असमान होते हैं। परन्तु ऊपरके समयवालोंके परिणाम उस समय समान सर्वथा नहीं होते, अपूर्व ही होते, इसप्रकार अपूर्वकरणजानना.
तथा जिसमें समान समयवर्ती जीवोंके परिणाम समान ही होते हैं, निवृत्ति अर्थात परस्पर भेद उससे रहित होते हैं। जैसे उस करणके पहले समयमें सर्व जीवोंके परिणाम परस्पर समान ही होते हैं, उसी प्रकार द्वितीयादि समयोंमें परस्पर समानता जानना। तथा प्रथमादि समयवालोंसे द्वितीयादि समयवालोंके अनन्तगुनी विशुद्धता सहित होते हैं. इसप्रकार अनिवृत्तिकरणजानना.
इस प्रकार ये तीन करण जानना.
वहाँ पहले अन्तर्मुहूर्त कालपर्यन्त अध:करण होता है. वहाँ चार आवश्यक होते हैं- समय-समय अनन्तगुनी विशुद्धता होती है। तथा एक(-एक)अन्तर्मुहूर्तसे नवीन बन्धकी स्थिति घटती जाती है, सो स्थितिबन्धापसरण है। तथा प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग समय- समय अनन्तगुना बढ़ता है। और अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग-बन्ध समय-समय अनन्तवें भाग होता है- इसप्रकार चार आवश्यक होते हैं.
वहाँ पश्चात् अपूर्वकरण होता है. उसका काल अध:करणके कालके संख्यातवें भाग है. उसमें ये आवश्यक और होते हैं- एक-एक अन्तर्मुहूर्तसे सत्ताभूत पूर्वकर्मकी स्थिति थी, १समए समए भिण्णा भावा तम्हा अपुव्वकरणो हु ॥३६॥(लब्धिसार) २एगसमए वट्टंताणं जीवाणं परिणामेहि ण विज्जदे णियट्टी णिव्वित्ती जत्थ ते अणियट्टीपरिणामा . उसकोघटाताहैसोस्थितिकाण्डकघातहै।तथाउससेछोटेएक-एकअन्तर्मुहूर्तसे पूर्वकर्मके अनुभागको घटाता है सो अनुभागकाण्डकघात है। तथा गुणश्रेणीके कालमें क्रमश: असंख्यातगुने प्रमाणसहित कर्मोंकी निर्जराके योग्य करता है सो गुणश्रेणी निर्जरा है. तथा गुणसंक्रमण यहाँ नहीं होता , परन्तु अन्यत्र अपूर्वकरण हो वहाँ होता है.
इसप्रकारअपूर्वकरणहोनेकेपश्चात्अनिवृत्तिकरणहोताहै.उसकाकाल अपूर्वकरणके भी संख्यातवें भाग है. उसमें पूर्वोक्त आवश्यक सहित कितना ही काल जानेके बाद अन्तरकरणकरता है, जो अनिवृत्तिकरणके काल पश्चात् उदय आने योग्य ऐसे मिथ्यात्वकर्मके मुहूर्तमात्र निषेकउनका अभाव करता है। उन परमाणुओंको अन्य स्थितिरूप परिणमित करता है. तथा अन्तरकरण करनेके पश्चात् उपशमकरण करता है. अन्तरकरण द्वारा अभावरूप किये निषेकोंके ऊपरवाले जो मिथ्यात्वके निषेक हैं उनको उदय आनेके अयोग्यबनाताहै.इत्यादिकक्रियाद्वाराअनिवृत्तिकरणकेअन्तसमयकेअनन्तरजिन निषेकोंका अभाव किया था, उनका काल आये, तब निषेकोंके बिना उदय किसका आयेगा? इसलिये मिथ्यात्वका उदय न होनेसे प्रथमोपशम सम्यक्तत्व की प्राप्ति होती है. अनादि मिथ्या¹ष्िटके सम्यक्तत्व मोहनीय और मिश्र मोहनीयकी सत्ता नहीं है, इसलिये वह एक मिथ्यात्वकर्मका ही उपशम करके उपशमसम्यग्¹ष्िट होता है. तथा कोई जीव सम्यक्तत्व पाकर फिर भ्रष्ट होता है, उसकी दशा भी अनादि मिथ्या¹ष्िट जैसी हो जाती है.
यहाँ प्रश्न है कि परीक्षा करके तत्त्ववश्रद्धान किया था, उसका अभाव कैसे हो?
समाधान :- जैसे किसी पुरुषको शिक्षा दी. उसकी परीक्षा द्वारा उसे ‘ऐसे ही है’ - ऐसी प्रतीति भी आयी थी। पश्चात् किसी प्रकारसे अन्यथा विचार हुआ, इसलिये उस शिक्षामें संदेह हुआ कि इसप्रकार है या इसप्रकार? अथवा ‘न जाने किस प्रकार है?’ अथवा उस शिक्षाको झूठ जानकर उससे विपरीतता हुई तब उसे अप्रतीति हुई और उसके उस शिक्षाकी प्रतीतिका अभाव होगया. अथवा पहले तो अन्यथा प्रतीति थी ही , बीचमें शिक्षाके विचारसे यथार्थ प्रतीति हुई थी। परन्तुउस शिक्षाका विचार किये बहुतकालहो गया, तब उसे भूलकर जैसी पहले अन्यथा प्रतीति थी वैसी ही स्वयमेव हो गई. तब उस शिक्षाकी प्रतीतिका अभाव हो जाता है. अथवा यथार्थ प्रतीति पहले तो की - पश्चात् न तो कोई अन्यथा विचार किया, न बहुत काल हुआ। परन्तु वैसे ही कर्मोंदयसे होनहारके अनुसार स्वयमेव ही उस प्रतीतिका अभाव होकर अन्यथापना हुआ. ऐसे अनेक प्रकारसे उस शिक्षाकी यथार्थ प्रतीति का अभाव होता है. उसी प्रकार जीवको जिनदेवका तत्त्ववादिरूप उपदेश हुआ। उसकी परीक्षा करके उसे ‘ऐसे ही है’ ऐसा श्रद्धान हुआ, पश्चात् जैसे पहले कहे थे वैसे अनेक प्रकारसे उस यथार्थ श्रद्धानका अभाव होता है. यह कथन स्थूलरूपसे बतलाया है। तारतम्यसे तो केवलज्ञानमें भासित होता है कि -‘इस समय श्रद्धान है और इस समय नहीं है’। क्तयोंकि यहाँ मूलकारण मिथ्यात्व कर्म है. उसका उदय हो तब तो अन्य विचारादि कारण मिलें या न मिलें, स्वयमेव सम्यक् श्रद्धानका अभाव होता है. और उसका उदय न होतब अन्य कारण मिलें या न मिलें, स्वयमेव सम्यक् श्रद्धान हो जाता है.सो ऐसी अंतरंग समय-समय सम्बन्धी सूक्ष्मदशा का जानना छद्मस्थको नहीं होता , इसलिये इसे अपनी मिथ्या-सम्यक् श्रद्धानरूप अवस्थाके तारतम्यका निश्चय नहीं हो सकता। केवलज्ञानमें भासित होता है. - इस अपेक्षा गुणस्थानोंका पलटना शास्त्रमें कहा है.
इस प्रकार जो सम्यक्तत्वसे भ्रष्ट हो उसे सादिमिथ्या¹ष्िट कहते हैं - उसे भी पुन: सम्यक्तत्वकी प्राप्तिमें पूर्वोक्त पाँच लब्धियाँ होती हैं विशेष इतना कि यहाँ किसी जीवके दर्शनमोहकीतीनप्रकृतियोंकीसत्ताहोतीहै,सोतीनोंकाउपशमकरकेप्रथमोपशम सम्यक्तत्वी होता है. अथवा किसीके सम्यक्तत्व मोहनीयका उदय आता है, दो प्रकृतियोंका उदय नहीं होता, वह क्षयोपशम सम्यक्तत्वी होता है। उसके गुणश्रेणी आदि क्रिया नहीं होती तथा अनिवृत्तिकरण नहीं होता. तथा किसीको मिश्रमोहनीयका उदय आता है, दोप्रकृतियोंका उदय नहीं होता, वह मिश्र गुणस्थानकोप्राप्त होता है, उसके करण नहीं होते. - इस प्रकार सादि मिथ्या¹ष्िटके मिथ्यात्व छूटने पर दशा होती है. क्षायिक सम्यक्तत्वको वेदक सम्यग्¹ष्िट ही प्राप्त करता है, इसलिये उसका कथन यहाँ नहीं किया है. इसप्रकार सादि मिथ्या¹ष्िटका जघन्य तो मध्यम अन्तर्मुहूर्तमात्र, उत्कृष्ट किंचित् न्यून अर्द्धपुद्गलपरावर्तनमात्र काल जानना.
देखो, परिणामोंकी विचित्रता कोई जीव तो ग्यारहवें गुणस्थानमें यथाख्यातचारित्र प्राप्त करके पुन: मिथ्या¹ष्िट होकरकिंचित् न्यून अर्द्धपुद्गलपरावर्तन काल पर्यन्त संसारमें रुलता है, और कोईनित्यनिगोदसेनिकलकरमनुष्य होकरमिथ्यात्वछूटने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें केवलज्ञान प्राप्त करता है.ऐसा जानकर अपने परिणाम बिगड़नेका भय रखना और उनके सुधारनेका उपाय करना.
तथा उस सादि मिथ्या¹ष्िटके थोड़े काल मिथ्यात्वकाउदय रहे तो बाह्य जैनीपना नष्ट नहीं होता, व तत्त्ववोंका अश्रद्धान व्यक्त नहीं होता, व विचार किये बिना ही व थोड़े विचारहीसे पुन: सम्यक्तत्वकी प्राप्ति हो जाती है. तथा बहुत काल तक मिथ्यात्वकाउदय रहे तो जैसी अनादि मिथ्या¹ष्िटकी दशा होती है वैसी इसकी भी दशा होती है. गृहीत मिथ्यात्वको भी वह ग्रहण करता है और निगोदादिमें भी रुलता है. इसका कोई प्रमाण नहीं है.
तथा कोई जीव सम्यक्तत्वसे भ्रष्ट होकर सासादन होता है और वहाँ जघन्य एक समय उत्कृष्ट छह आवली प्रमाण काल रहता है. उसके परिणामकी दशा वचन द्वारा कहनेमें नहीं आती.सूक्ष्मकाल मात्र किसी जातिके केवलज्ञानगम्य परिणाम होते हैं. वहाँ अनन्तानुबन्धीका तो उदय होता है, मिथ्यात्वका उदय नहीं होता. सो आगम प्रमाणसे उसका स्वरूप जानना.
तथाकोईजीवसम्यक्तत्वसेभ्रष्टहोकरमिश्रगुणस्थानकोप्राप्तहोताहै.वहाँ मिश्रमोहनीयका उदय होता है, इसका काल मध्यम अन्तर्मुहूर्तमात्र है. सो इसका भी काल थोड़ा है, इसलिये इसके भी परिणाम केवलज्ञानगम्य हैं. यहाँ इतना भासित होता है कि जैसे किसीकोशिक्षा दी। उसे वह कुछ सत्य और कुछ असत्य एक ही कालमें माने। उसीप्रकार तत्त्ववोंका श्रद्धान-अश्रद्धान एक ही कालमें हो मिश्रदशा है.
कितने ही कहते हैं - ‘हमें तो जिनदेव तथा अन्य देव सर्व ही वन्दन करने योग्य हैं’ - इत्यादि मिश्रश्रद्धानको मिश्रगुणस्थान कहते हैं, सो ऐसा नहीं है। यह तो प्रत्यक्ष मिथ्यात्वदशा है. व्यवहाररूप देवादिकका श्रद्धान होनेपर भी मिथ्यात्व रहता है, तब इसके तो देव-कुदेवका कुछ निर्णय ही नहीं है। इसलिये इसके तो यह विनय मिथ्यात्व प्रगट है - ऐसा जानना.
इसप्रकार सम्यक्तत्वके सन्मुख मिथ्या¹ष्िटयोंकाकथन किया, प्रसंग पाकर अन्य भी कथन किया है. ·
इसप्रकार जैनमतवाले मिथ्या¹ष्िटयोंके स्वरूपका निरूपण किया.
यहाँ नानाप्रकारके मिथ्या¹ष्िटयोंका कथन किया है. उसका प्रयोजन यह जानना कि उनप्रकारोंकोपहिचानकर अपनेमेंऐसा दोष हो तो उसे दूर करकेसम्यक्श्रद्धानीहोना, औरोंके ही ऐसे दोष देख-देखकर कषायी नहीं होना। क्तयोंकि अपना भला-बुरा तो अपने परिणामोंसे है. औरोंको तो रुचिवान देखे तो कुछ उपदेश देकर उनका भी भला करें. इसलिये अपने परिणाम सुधारनेका उपाय करना योग्य है। सर्व प्रकारके मिथ्यात्वभाव छोड़कर सम्यग्¹ष्िट होना योग्य है। क्तयोंकि संसारका मूल मिथ्यात्व है, मिथ्यात्वके समान अन्य पाप नहीं है.
एकमिथ्यात्वऔरउसकेसाथअनन्तानुबन्धीकाअभावहोनेपरइकतालीस प्रकृतियोंकातो बन्ध ही मिट जाता है, स्थिति अंत:कोड़ाकोड़ी सागरकी रह जाती है, अनुभाग थोड़ा ही रह जाता है, शीघ्र ही मोक्षपदको प्राप्त करता है. तथा मिथ्यात्वका सद्भाव रहने पर अन्य अनेक उपाय करने पर भी मोक्षमार्ग नहीं होता. इसलिये जिस-तिस उपायसे सर्वप्रकार मिथ्यात्वकानाश करना योग्य है.
इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्रमें जैनमतवाले मिथ्या¹Úयिोंका
निरूपण जिसमें हुआ ऐसा (सातवाँ) अधिकार
सम्पूर्ण हुआ ॥७॥

आठवाँ अधिकार

उपदेशका स्वरूप

अब मिथ्यादृष्िट जीवोंको मोक्षमार्गका उपदेश देकर उनका उपकार करना यही उत्तम उपकार है. तीर्थंकर, गणधराधिक भी ऐसा ही उपकार करते हैं। इसलिये इस शास्त्रमें भी उन्हींके उपदेशानुसार उपदेश देते हैं.
वहाँ उपदेशका स्वरूप जाननेके अर्थ कुछ व्याख्यान करते हैं। क्तयोंकि उपदेशको यथावत् न पहचाने तो अन्यथा मानकर विपरीत प्रर्वतन करे. इसलिये उपदेशका स्वरूप कहते हैं.
जिनमत में उपदेश चार अनुयोगोंके द्वारादियाहै.प्रथमानुयोग,करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग - यह चार अनुयोग हैं.
वहाँ तीर्थंकर-चक्रवर्ती आदि महान पुरुषोंके चरित्रका जिसमें निरूपण किया हो वह प्रथमानुयोगहै. तथा गुणस्थानमार्गणादिरूपजीवका व कर्मोंका व त्रिलोकादिकका जिसमें निरूपण हो वह करणानुयोगहै.तथागृहस्थ-मुनिकेधर्मआचरणकरनेकाजिसमें निरूपणहोवहचरणानुयोगहै.तथाषट्द्रव्य,सप्ततत्त्ववादिककावस्व-पर-भेद विज्ञानादिकका जिसमें निरूपण हो वह द्रव्यानुयोगहै.

अनुयोगों का प्रयोजन

अब इनका प्रयोजन कहते हैं :- प्रथमानुयोगका प्रयोजन
प्रथमानुयोगमें तो संसार की विचित्रता, पुण्य-पापका फल, महन्तपुरुषोंकी प्रवृत्ति इत्यादि निरूपणसे जीवों को धर्ममें लगाया है. जो जीव तुच्छबुद्धि हों वे भी उससे धर्म सन्मुख होते हैं। क्तयोंकि वे जीव सूक्ष्म निरूपणको नहीं पहिचानते, लौकिक कथाओंको जानते हैं, वहाँउनका उपयोग लगता है.तथाप्रथमानुयोगमेंलौकिकप्रवृत्तिरूपही निरूपण होनेसे उसे वे भली-भाँति समझ जाते हैं. तथा लोकमें तो राजादिककी कथाओंमें पापका पोषण होता है. यहाँ महन्तपुरुष राजादिककी कथाएँ तो हैं, परन्तु प्रयोजन जहाँ- तहाँ पापको छुड़ा कर धर्ममें लगानेका प्रगट करते हैं। इसलिये वे जीव कथाओंके लालचसे तो उन्हें पढ़ते-सुनते हैं और फिर पापको बुरा, धर्मको भला जानकर धर्ममें रुचिवंत होते हैं.
इसप्रकारतुच्छबुद्धिओंकोसमझानेकेलियेयहअनुयोगहै.‘प्रथम’अर्थात् ‘अव्युत्पन्न मिथ्यादृष्िट’, उनके अर्थ जो अनुयोग सो प्रथमानुयोग है. ऐसा अर्थ गोम्मटसार की टीकामेंकिया है.
तथा जिन जीवोंके तत्त्ववज्ञान हुआ हो, पश्चात् इस प्रथमानुयोग को पढ़ें-सुनें तो उन्हें यह उसके उदाहरणरूप भासित होता है. जैसे - जीव अनादिनिधन है, शरीरादिक संयोगी पदार्थ हैं, ऐसा यह जानता था. तथा पुराणोंमें जीवोंके भवान्तर निरूपित किये हैं, वे उस जानने के उदाहरण हुए.तथा शुभ-अशुभ शुद्धोपयोगको जानता था, वह उसके फलको जानता था. पुराणोंमें उन उपयोगोंकी प्रवृत्ति और उनका फल जीवके हुआ सो निरूपण किया है, वही उस जानने का उदाहरण हुआ. इसीप्रकार अन्य जानना.
यहाँ उदाहरण का अर्थ यह है कि जिस प्रकार जानता था, उसीप्रकार वहाँ किसी जीव के अवस्था हुई - इसलिये यह उस जानने की साक्षी हुई.
तथा जैसे कोई सुभट है - वह सुभटोंकी प्रशंसा और कायरोंकी निन्दा जिसमें हो ऐसी किन्हीं पुराण-पुरुषोंकी कथा सुननेसे सुभटपनेमें अति उत्साहवान होता है। उसी प्रकार धर्मात्मा है - वह धर्मात्माओंकी प्रशंसा और पापियोंकी निन्दा जिसमें हो ऐसी किन्हीं पुराण-पुरुषोंकी कथा सुननेसे धर्ममें अति उत्साहवान होता है.
इसप्रकार यह प्रथमानुयोगका प्रयोजन जानना. करणानुयोगका प्रयोजन
तथा करणानुयोगमें जीवोंके व कर्मोंके विशेष तथा त्रिलोकादिककी रचना निरूपित करके जीवोंको धर्ममें लगाया है. जो जीव धर्ममें उपयोग लगाना चाहते हैं वे जीवोंके गुणस्थान-मार्गणा आदि विशेष तथा कर्मोंके कारण-अवस्था-फल किस-किसके कैसे-कैसे पाये जाते हैं इत्यादि विशेष तथा त्रिलोकमें नरक स्वर्गादिके ठिकाने पहिचान कर पापसे विमुख होकर धर्ममें लगते हैं तथा ऐसे विचारमें उपयोग रम जाये तब पाप-प्रवृत्ति छूटकर स्वयमेव तत्काल धर्म उत्पन्न होता है। उस अभ्याससे तत्त्ववज्ञानकी भी प्राप्ति शीघ्र होती है. तथा ऐसा सूक्ष्म यथार्थ कथन जिनमतमें ही है, अन्यत्र नहीं है। इसप्रकार महिमा जानकर जिनमतका श्रद्धानी होता है.
तथा जो जीव तत्त्ववज्ञानी होकर इस करणानुयोगका अभ्यास करते हैं, उन्हें यह उसके विशेषणरूप भासित होता है. जो जीवादि तत्त्ववोंको आप जानता है, उन्हींके विशेष करणानुयोगमें किये हैं। वहाँ कितने ही विशेषण तो यथावत् निश्चयरूप हैं, कितने ही उपचार सहित व्यवहाररूप हैं, कितने ही द्रव्य-क्षेत्र-काल भावादिकके स्वरूप प्रमाणादिरूप हैं, कितने ही निमित्त आश्रयादि अपेक्षा सहित हैं, - इत्यादि अनेक प्रकारके विशेषण निरूपित किये हैं, उन्हें ज्योंका त्यों मानता हुआ उस करणानुयोगका अभ्यास करता है.
इस अभ्याससे तत्त्ववज्ञान निर्मल होता है. जैसे - कोई यह तो जानता था कि यह रत्न है। परन्तु उस रत्नके बहुत से विशेष जानने पर निर्मल रत्न का पारखी होता है। उसी प्रकार तत्त्ववोंको जानता था कि यह जीवादिक हैं, परन्तु उन तत्त्ववोंके बहुत विशेष जाने तो निर्मल तत्त्ववज्ञान होता है. तत्त्ववज्ञान निर्मल होने पर आप ही विशेष धर्मात्मा होता है.
तथाअन्यठिकानेउपयोगकोलगायेतोरागादिककीवृद्धिहोतीहै,और छद्मस्थका उपयोग निरन्तर एकाग्र नहीं रहता। इसलिये ज्ञानी इस करणानुयोग के अभ्यासमें उपयोगको लगाता है, उससे केवलज्ञान द्वारा देखे गये पदार्थोंका जानपना इसके होता है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षहीका भेद है, भासित होनेमें विरुद्धता नहीं है.
इस प्रकार यह करणानुयोगका प्रयोजन जानना.
‘करण’ अर्थात् गणित कार्यके कारणरूप सूत्र, उनका जिसमें ‘अनुयोग’- अधिकार हो वह करणानुयोग है. इसमें गणित वर्णन की मुख्यता है - ऐसा जानना. चरणानुयोगका प्रयोजन
अबचरणानुयोगकाप्रयोजनकहतेहैं.चरणानुयोगमेंनानाप्रकारधर्मकेसाधन निरूपित करके जीवों को धर्ममें लगाते हैं. जो जीव हित-अहित को नहीं जानते, हिंसादिक पाप कार्योंमें तत्पर हो रहते हैं। उन्हें जिसप्रकार पापकार्योंको छोड़कर धर्मकार्योंमें लगें, उस प्रकार उपदेश दिया है। उसे जानकर जो धर्म आचरण करनेको सन्मुख हुए, वे जीव गृहस्थधर्म व मुनिधर्म का विधान सुनकर आपसे जैसा सधे वैसे धर्म-साधनमें लगते हैं.
ऐसे साधन से कषाय मन्द होती है और उसके फलमें इतना तो होता है कि कुगतिमें दु:ख नहीं पाते, किन्तु सुगति में सुख प्राप्त करते हैं। तथा ऐसे साधन से जिनमतका निमित्त बना रहता है, वहाँ तत्त्ववज्ञानकी प्राप्ति होना हो तो होजाती है.
तथा जो जीव तत्त्ववज्ञानी होकर चरणानुयोगका अभ्यास करते हैं, उन्हें यह सर्व आचरण अपने वीतरागभावके अनुसार भासित होते हैं. एकदेश व सर्वदेश वीतरागता होनेपर ऐसी श्रावकदशा-मुनिदशा होती है। क्तयोंकि इनके निमित्त-नैमित्तिकपना पाया जाता है. ऐसा जानकर श्रावक-मुनिधर्मके विशेष पहिचानकर जैसा अपना वीतरागभाव हुआ हो वैसा अपने योग्य धर्मको साधते हैं. वहाँ जितने अंशमें वीतरागता होती है, उसे कार्यकारी जानते है। जितने अंशमें राग रहता है, उसे हेय जानते हैं। सम्पूर्ण वीतरागताको परम धर्म मानते हैं.
ऐसा चरणानुयोगका प्रयोजन है. द्रव्यानुयोगका प्रयोजन
अब द्रव्यानुयोगका प्रयोजन कहते हैं. द्रव्यानुयोगमें द्रव्योंका व तत्त्ववोंका निरूपण करके जीवोंको धर्ममें लगाते हैं. जो जीव जीवादिक द्रव्योंको व तत्त्ववोंको नहीं पहिचानते, आपको-परको भिन्न नहीं जानते। उन्हें हेतु-दृष्टान्त युक्ति द्वारा व प्रमाण-नयादि द्वारा उनका स्वरूप इस प्रकार दिखाया है जिससे उनको प्रतीति हो जाये. उसके अभ्याससे अनादि अज्ञानता दूर होती है. अन्यमत कल्पित तत्त्ववादिक झूठ भासित हो तब जिनमत की प्रतीति हो और उनके भावको पहिचाननेका अभ्यास रखें, तो शीघ्रही तत्त्ववज्ञान की प्राप्ति हो जाये.
तथा जिनके तत्त्ववज्ञान हुआ हो वे जीव द्रव्यानुयोगका अभ्यास करें तो उन्हें अपने श्रद्धानके अनुसार वह सर्व कथन प्रतिभासित होते हैं. जैसे - किसी ने कोई विद्या सिख ली, परन्तु यदि उसका अभ्यास करता रहे तो वह याद रहती है, न करे तो भूल जाता है. इस प्रकार इसको तत्त्ववज्ञान हुआ, परन्तु यदि उसके प्रतिपादक द्रव्यानुयोगका अभ्यास करता रहे तो वह तत्त्ववज्ञान रहता है, न करे तो भूल जाता है. अथवा संक्षेपरूपसे तत्त्ववज्ञान हुआ था, वह नाना युक्ति-हेतु-दृष्टान्तादि द्वारा स्पष्ट हो जाये तो उसमें शिथिलता नहीं हो सकती. तथा इस अभ्याससे रागादि घटने से शीघ्र मोक्ष सधता है.
इस प्रकार द्रव्यानुयोगका प्रयोजन जानना.

अनुयोगोंके व्याख्यानका विधान

अब इन अनुयोगोंमें किस प्रकार व्याख्यान है, सो कहते हैं :- प्रथमानुयोगके व्याख्यानका विधान
प्रथमानुयोगमें जो मूल कथाएँ हैं। वे तो जैसी हैं। वैसी ही निरूपित करते हैं. तथा उनमें प्रसंगोपात्त व्याख्यान होता है। वह कोई तो ज्योंका त्यों होता है, कोई ग्रन्थकर्त्ताके विचारानुसार होता है। परन्तु प्रयोजन अन्यथा नहीं होता.
उदाहरण :- जैसे - तीर्थंकर देवोंके कल्याणकोंमें इन्द्र आये, यह कथा तो सत्य है. तथा इन्द्रने स्तुतिकी, उसका व्याख्यान किया। सो इन्द्र ने तो अन्य प्रकारसे ही स्तुति की थी और यहाँ ग्रन्थकर्त्ताने अन्य ही प्रकार से स्तुति करना लिखा है। परन्तु स्तुतिरूप प्रयोजन अन्यथा नहीं हुआ. तथा परस्पर किन्हींके वचनालाप हुआ। वहाँ उनके तो अन्य प्रकार अक्षर निकले थे, यहाँ ग्रन्थकर्त्ताने अन्य प्रकार कहे। परन्तु प्रयोजन एक ही दिखलाते हैं. तथा नगर, वन, संग्रामादिकके नामादिक तो यथावत् ही लिखते हैं और वर्णन हीनाधिक भी प्रयोजनका पोषण करता हुआ निरूपित करते हैं. - इत्यादि इसी प्रकार जानना.
तथा प्रसंगरूप कथा भी ग्रन्थकर्त्ता अपने विचारानुसार कहते हैं. जैसे - धर्मपरीक्षामें मूर्खोंकीकथालिखी।सोवहीकथामनोवेगनेकहीथीऐसानियमनहींहै।परन्तु मूर्खपनेका पोषण करने वाली कोई कथा कही थी ऐसे अभिप्रायका पोषण करते हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
यहाँ कोई कहे - अयथार्थ कहना तो जैन शास्त्रमें सम्भव नहीं है?
उत्तर :- अन्यथा तो उसका नाम है जो प्रयोजन अन्यका अन्य प्रगट करे. जैसे - किसीसेे कहा कि तू ऐसा कहना, उसने वे ही अक्षर तो नहीं कहे, परन्तु उसी प्रयोजन सहित कहे तो उसे मिथ्यात्वादी नहीं कहते - ऐसा जानना. यदि जैसा का तैसा लिखनेका सम्प्रदाय हो तो किसी ने बहुत प्रकार से वैराग्य चिन्तवन किया था उसका सर्व वर्णन लिखनेसे ग्रन्थ बढ़ जायेगा, तथा कुछ न लिखनेसे उसका भाव भासित नहीं होगा, इसलिये वैराग्यके ठिकाने थोड़ा-बहुत अपने विचारके अनुसार वैराग्य पोषक ही कथन करेंगे, सराग पोषक कथन नहीं करेंगे. वहाँ प्रयोजन अन्यथा नहीं हुआ इसलिये अयथार्थ नहीं कहते. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा प्रथमानुयोगमें जिसकी मुख्यता हो उसी का पोषण करते हैं. जैसे - किसीने उपवास किया, उसका तो फल अल्प था, परन्तु उसे अन्य धर्मपरिणतिकी विशेषता हुई इसलिये विशेष उच्चपदकी प्राप्ति हुई, वहाँ उसको उपवासहीका फल निरूपित करते हैं. इसी प्रकार अन्य जानना.
तथा जिस प्रकार किसीने शीलादिकी प्रतिज्ञा दृढ़ रखी व नमस्कारमन्त्रका स्मरण किया व अन्य धर्म साधन किया, उसके कष्ट दूर हुए, अतिशय प्रगट हुए। वहाँ उन्हींका वैसा फल नहीं हुआ है, परन्तु अन्य किसी कर्मके उदयसे वैसे कार्य हुए हैं। तथापि उनको उन शीलादिकका ही फल निरूपित करते हैं. उसी प्रकार कोई पाप कार्य किया, उसको उसी का तो वैसा फल नहीं हुआ है, परन्तु अन्य कर्मके उदय से नीचगति को प्राप्त हुआ अथवा कष्टादिक हुए। उसे उसी पापकार्य का फल निरूपित करते हैं. इत्यादि इसी प्रकार जानना.
यहाँ कोई कहे - ऐसा झूठा फल दिखलाना तो योग्य नहीं है। ऐसे कथनको प्रमाण कैसे करें?
समाधान :- जो अज्ञानी जीव बहुत फल दिखाये बिना धर्ममें न लगें व पाप से न डरें, उनका भला करने के अर्थ ऐसा वर्णन करते हैं. झूठ तो तब हो, जब धर्मके फलको पापका फल बतलायें, पापके फलको धर्मका फल बतलायें, परन्तु ऐसा तो है नहीं. जैसे - दस पुरुष मिलकर कोई कार्य करें, वहाँ उपचारसे एक पुरुषका भी किया कहा जाये तो दोष नहीं है. अथवा जिसके पितादिकने कोई कार्य किया हो, उसे एक जाति अपेक्षा उपचारसे पुत्रादिकका किया कहा जाये तो दोष नहीं है. उसी प्रकार बहुत शुभ व अशुभ कार्योंका एकफल हुआ, उसे उपचारसे एक शुभ व अशुभकार्यका फल कहा जाये तो दोष नहीं है. अथवा अन्य शुभ व अशुभकार्यका फल जो हुआ हो, उसे एक जाति अपेक्षा उपचार से किसी अन्य ही शुभ व अशुभकार्यका फल कहें तो दोष नहीं है.
उपदेश में कहीं व्यवहारवर्णन है, कहीं निश्चयवर्णन है. यहाँ उपचाररूप व्यवहार- वर्णनकियाहै,इसप्रकारइसेप्रमाणकहतेहैं.इसकोतारतम्यनहींमानलेना। तारतम्यकातो करणानुयोगमें निरूपण किया है, सो जानना.
तथा प्रथमानुयोगमें उपचाररूप किसी धर्मका अंग होनेपर सम्पूर्ण धर्म हुआ कहते है. जैसे - जिन जीवोंके शंका-कांक्षादिक नहीं हुए, उनको सम्यक्तत्व हुआ कहते हैं। परन्तु किसी एक कार्य में शंका-कांक्षा न करने से ही तो सम्यक्तत्व नहीं होता, सम्यक्तत्व तो तत्त्ववश्रद्धान होने पर होता है। परन्तु निश्चयसम्यक्तत्वका तो व्यवहारसम्यक्तत्वमें उपचार किया औरव्यवहारसम्यक्तत्वकेकिसीएकअंगमेंसम्पूर्णव्यवहारसम्यक्तत्वकाउपचारकिया- इसप्रकार उपचार द्वारा सम्यक्तत्व हुआ कहते हैं.
तथा किसी जैनशास्त्रका एस अंग जानने पर सम्यग्ज्ञान हुआ कहते हैं. सो संशयादि रहित तत्वज्ञान होने पर सम्यग्ज्ञान होता है। परन्तु यहाँ पूर्ववत् उपचार से सम्यग्ज्ञान कहते हैं.
तथा कोई भला आचरण होनेपर सम्यक्चारित्र हुआ कहते हैं. वहाँ जिसने जैनधर्म अंगीकार किया हो व कोई छोटी-मोटी प्रतिज्ञा ग्रहण की हो, उसे श्रावक कहते हैं. सो श्रावक तो पंचमगुणस्थानवर्ती होने पर होता है। परन्तु पूर्ववत् उपचारसे इसे श्रावक कहा है. उत्तरपुराणमें श्रेणिकको श्रावकोत्तम कहा है सो वह तो असंयत था। परन्तु जैन था इसलिये कहा है. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा जो सम्यक्तत्वरहित मुनिलिंग धारण करे, व द्रव्यसे भी कोई अतिचार लगाता हो, उसे मुनि कहते हैं. सो मुनि तो षष्ठादि गुणस्थानवर्ती होनेपर होता है। परन्तु पूर्ववत् उपचार से उसे मुनि कहा है. समवसरणसभामें मुनियोंकि संख्या कही, वहाँ सर्व ही शुद्ध भावलिंगी मुनि नहीं थे। परन्तु मुनिलिंग धारण करने से सभी को मुनि कहा. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा प्रथमानुयोगमें कोई धर्मबुद्धि से अनुचित कार्य करे उसकी भी प्रशंसा करते हैं. जैसे - विष्णुकुमारने मुनियोंका उपसर्ग दूर किया सो धर्मानुराग से किया। परन्तु मुनिपद छोड़कर यह कार्य करना योग्य नहीं था। क्तयोंकि ऐसा कार्य तो गृहस्थ धर्ममें सम्भव है, और गृहस्थधर्मसे मुनिधर्म ऊँचा है। सो ऊँचा धर्म छोड़कर नीचा धर्म अंगीकार किया वह अयोग्य है। परन्तु वात्सल्य अंग की प्रधानता से विष्णुकुमारजी की प्रशंसा की है. इस छलसे औरोंको ऊँचा धर्म छोड़कर नीचा धर्म अंगीकार करना योग्य नहीं है
तथा जिस प्रकार ग्वालेने मुनि को अग्निसे तपाया, सो करुणासे यह कार्य किया। परन्तु आये हुए उपसर्ग को तो दूर करे, सहज अवस्थामें जो शीतादिकका परिषह होता है, उसे दूर करने पर रति मानने का कारण होता है, और उसे रति करना नहीं है, तब उलटा उपसर्ग होता है. इसीसे विवेकी उनके शीतादिकका उपचार नहीं करते. ग्वाला अविवेकी था, करुणासे यह कार्य किया, इसलिये उसकी प्रशंसा की है, परन्तु इस छल से औरोंको धर्मपद्धतिमें जो विरुद्ध हो वह कार्य करना योग्य नहीं है.
तथा जैसा - वज्रकरणराजाने स्ंाहिोदर राजाको नमन नहीं किया, मुद्रिकामें प्रतिमा रखी। सो बडे़-बडे़ सम्यग्दृष्िट राजादिकको नमन करते हैं, उसमें दोष नहीं है। तथा मुद्रिकामें प्रतिमा रखनेमें अविनय होती है, यथावत् विधिसे ऐसी प्रतिमा नहीं होती, इसलिये इस कार्यमें दोष है। परन्तु उसे ऐसा ज्ञान नहीं था, उसे तो धर्मानुरागसे ‘मैं और को नमन नहीं करूँगा’ ऐसी बुद्धि हुई। इसलिये उसकी प्रशंसा की है. परन्तु इस छल से औरोंको ऐसे कार्य करना योग्य नहीं है.
तथा कितने ही पुरुषोंने पुत्रादिककी प्राप्तिके अर्थ अथवा रोगकष्टादि दूर करनेके अर्थ चैत्यालय पूजनादि कार्य किये, स्तोत्रादि किये, नमस्कारमन्त्र स्मरण किया। परन्तु ऐसा करनेसेतोनि:कांक्षितगुणकाअभावहोताहै,निदानबन्धनामकआर्त्तध्यानहोताहै, पापहीका प्रयोजन अंतरंगमें है इसलिये पापही का बन्ध होता है। परन्तु मोहित होकर भी बहुत पापबन्ध का कारण कुदेवादिका तो पूजनादि नहीं किया, इतना उसका गुण ग्रहण करके उसकी प्रशंसा करते हैं. इस छल से औरोंको लौकिक कार्योंके अर्थ धर्म साधन करना युक्त नहीं है. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
इसी प्रकार प्रथमानुयोगमें अन्य कथन भी हों, उन्हें यथासम्भव जानकर भ्रमरूप नहीं होना. करणानुयोगके व्याख्यानका विधान
अब, करणानुयोगमें किसप्रकार व्याख्यान है सो कहते हैं :-
जैसा केवलज्ञान द्वारा जाना वैसा करणानुयोगमें व्याख्यान है. तथा केवलज्ञानद्वारा तो बहुत जाना, परन्तु जीव को कार्यकारी जीव-कर्मादिकका व त्रिलोकादिकका ही निरूपण इसमें होता है. तथा उनका भी स्वरूप सर्व निरूपित नहीं हो सकता, इसलिये जिस प्रकार वचनगोचर होकर छद्मस्थके ज्ञानमें उनका कुछ भाव भासित हो, उस प्रकार संकुचित करके निरूपण करते हैं. यहाँ उदाहरण - जीवके भावोंकी अपेक्षा गुणस्थान कहें हैं, वे भाव अनन्तस्वरूपसहितवचनगोचरनहींहैं,वहाँबहुतभावोंकीएकजातिकरकेचौदह गुणस्थान कहे हैं. तथा जीवोंको जाननेके अनेक प्रकार हैं, वहाँ मुख्य चौदह मागर्णाका निरूपण किया है. तथा कर्म परमाणु अनन्त प्रकार शक्यिुक्त हैं, उनमें बहुतोंकी एक जाति करके आठ व एक सौ अड़तालीस प्रकृतियाँ कही हैं. तथा त्रिलोकमें अनेक रचनाएँ हैं, वहाँ कुछ मुख्य रचनाओंका निरूपण कहते हैं. तथा प्रमाण के अनंत भेद हैं, वहाँ संख्यातादि तीन भेद व इनके इक्तकीस भेद निरूपित किये हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथाकरणानुयोगमेंयद्यपिवस्तुकेक्षेत्र,काल,भावादिकअखंडितहै।तथापि छद्मस्थको हीनादिक ज्ञान होने के अर्थ प्रदेश, समय, अविभाग-प्रतिच्छेदादिककी कल्पना करके उनका प्रमाण निरूपित करते हैं. तथा एक वस्तुमें भिन्न-भिन्न गुणोंका व पर्यायोंका भेदकरकेनिरूपणकरतेहैं.तथाजीव-पुद्गलादिकयद्यपिभिन्न-भिन्नहैं।तथापि सम्बन्धादिक द्वारा अनेक द्रव्य से उत्पन्न गति, जाति आदि भेदोंको एक जीवके निरूपित करते हैं, - इत्यादि व्याख्यान व्यवहारनयकी प्रधानता सहित जानना, क्तयोंकि व्यवहार के बिना विशेष नहीं जान सकता. तथा कहींनिश्चयवर्णन भी पाया जाता है. जैसे - जीवादिक द्रव्योंका प्रमाण निरूपण किया, वहाँ भिन्न-भिन्न इतने ही द्रव्य हैं. वह यथा सम्भव जान लेना.
तथा करणानुयोगमें जो कथन हैं वे कितने ही तो छद्मस्थके प्रत्यक्ष-अनुमानादिगोचर होते हैं, तथा जो न हों उन्हें आज्ञा प्रमाण द्वारा मानना. जिस प्रकार जीव-पुद्गलके स्थूल बहुतकालस्थायीमनुष्यादिपर्यायेंवघटादिपर्यायेंनिरूपितकीं,उनकेतोप्रत्यक्ष अनुमानादि हो सकते हैं। परन्तु प्रतिसमय सूक्ष्मपरिणमनकी अपेक्षा ज्ञानादिकके व स्निग्ध-रूक्षादिकके अंश निरूपित किये हैं, वे आज्ञा से ही प्रमाण होते हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा करणानुयोगमें छद्मस्थोंकि प्रवृत्ति के अनुसार वर्णन नहीं किया है, केवल- ज्ञानगम्य पदार्थोंका निरूपण है. जिस प्रकार कितने ही जीव तो द्रव्यादिकका विचार करते हैं व व्रतादिक पालते हैं। परन्तु उनके अंतरंग सम्यक्तत्वचारित्र शक्ति नहीं है इसलिये उनको मिथ्यादृष्िट-अव्रती कहते हैं. तथा कितने ही जीव द्रव्यादिकके व व्रतादिकके विचार रहित हैं,अन्यकार्योंमेंप्रवर्ततेहैं,वनिद्रादिद्वारानिर्विचारहोरहेहैं।परन्तुउनके सम्यक्तत्वादिशक्तिका सद्भाव है इसलिये उनको सम्यक्तत्वी व व्रती कहते हैं.
तथा किसी जीव के कषायोंकी प्रवृत्ति तो बहुत है और उसके अंतरंग कषायशक्ति थोड़ी है, तो उसे मन्दकषायी कहते हैं. तथा किसी जीव के कषायोंकी प्रवृत्ति तो थोड़ी है और उनके अंतरंग कषायशक्ति बहुत है, तो उसे तीव्रकषायी कहते हैं. जैसे - व्यंतरादिक देव कषायोंसे नगर नाशादि कार्य करते हैं, तथापि उनके थोड़ी कषायशक्तिसे पीत लेश्या कही है . और एकेन्द्रियादिक जीव कषाय कार्य करते दिखायी नहीं देते, तथापि उनके बहुत कषायशक्तिसे कृष्णादि लेश्या कही है. तथा सर्वाथसिद्धिके देव कषायरूप थोडे़ प्रवर्तते हैं, उनके बहुत कषायशक्तिसे असंयम कहा है. और पंचम गुणस्थानी व्यापार अबह्मादि कषायकार्यरूप बहुत प्रवर्तते हैं, उनके मन्दकषायशक्तिसे देशसंयम कहा है. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथाकिसीजीवकेमन-वचन-कायकीचेष्टाथोड़ीहोतीदिखायीदे,तथापि कर्माकर्षण शक्तिकी अपेक्षा बहुत योग कहा है. किसीके चेष्टा बहुत दिखायी दे, तथापि शक्तिकी हीनता से अल्प योग कहा है. जैसे - केवली गमनादि क्रिया रहित हुए, वहाँ भी उनके योग बहुत कहा है. द्वीन्द्रियादिक जीव गमनादि करते हैं, तथापि उनके योग अल्प कहा है. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा कहीं जिसकी व्यक्तता कुछ भासित नहीं होती, तथापि सूक्ष्मशक्तिके सद्भावसे उसका वहाँ अस्तित्व कहा है. जैसे - मुनिके अब्रह्म कार्य कुछ नहीं है, तथापि नववें गुणस्थानपर्यन्त मैथुन संज्ञा कही है. अहमिन्द्रोंके दु:खका कारण व्यक्त नहीं है, तथापि कदाचित् असाताका उदय कहा है. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथाकरणानुयोगसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रादिकधर्मकानिरूपणकर्मप्रकृतियोंके उपशमादिककी अपेक्षासहित सूक्ष्मशक्ति जैसे पायी जाती है वैसे गुणस्थानादिमें निरूपण करता है व सम्यग्दर्शनादिके विषयभूत जीवादिकोंका भी निरूपण सूक्ष्मभेदादि सहित करता है. यहाँ कोई करणानुयोगके अनुसार आप उद्यम करे तो हो नहीं सकता। करणानुयोगमें तो यथार्थ पदार्थ बतलानेका मुख्य प्रयोजन है, आचरण कराने की मुख्यता नहीं है. इसलिये यह तो चराणानुयोगादिकके अनुसार प्रर्वतन करे, उससे जो कार्य होना है वह स्वयमेव ही होता है. जैसे - आप कर्मोंके उपशमादि करना चाहे तो कैसे होंगे? आप तो तत्त्ववादिकका निश्चय करने का उद्यम करे, उससे स्वयमेव ही उपशमादि सम्यक्तत्व होते हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
एकअन्तर्मूहूर्तमेंग्यारहवेंगुणस्थानसेगिरकरक्रमश:मिथ्या¹ष्िटहोताहैऔर चढ़कर केवलज्ञान उत्पन्न करता है. सो ऐसे सम्यक्तत्वादिके सूक्ष्मभाव बुद्धिगोचर नहीं होते. इसलिये करणानुयोगके अनुसार जैसेका तैसा जान तो ले , परन्तु प्रवृत्ति बुद्धिगोचर जैसे भला हो वैसी करे.
तथा करणानुयोगमें भी कहीं उपदेशकी मुख्यता सहित व्याख्यान होता है, उसे सर्वथा उसी प्रकार नहीं मानना. जैसे - हिंसादिकके उपायको कुमतिज्ञान कहा है। अन्य मतादिकके शास्त्राभ्यासको कुश्रुतज्ञान कहा है। बुरा दिखे, भला न दिखे, उसे विभंगज्ञान कहा है। सो इनको छोड़नेके अर्थ उपदेश द्वारा ऐसा कहा है. तारतम्यसे मिथ्या¹ष्िटके सभी ज्ञान कुज्ञान है, सम्यग्¹ष्िटके सभी ज्ञान सुज्ञान हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा कहीं स्थूल कथन किया हो उसे तारतम्यरूप नहीं जानना. जिस प्रकार व्याससे तीन गुनी परिधि कही जाती है, परन्तु सूक्ष्मता से कुछ अधिक तीन गुनी होती है. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा कहीं मुख्यताकी अपेक्षा व्याख्यान हो उसे सर्वप्रकार नहीं जानना. जैसे - मिथ्या¹ष्िट और सासादन गुणस्थान वालोंको पापजीव कहा है, असंयतादि गुणस्थानवालोंको पुण्यजीव कहा है, सो मुख्यपनेसे ऐसा कहा है। तारतम्यसे दोनोंके पाप-पुण्य यथासम्भव पाये जाते हैं. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
ऐसे ही और भी नानाप्रकार पाये जाते हैं, उन्हें यथासम्भव जानना.
इस प्रकार करणानुयोगमें व्याखाानका विधान बतलाया. चरणानुयोगके व्याख्यानका विधान
अब, चरणानुयोगमेंे व्याख्यानका विधान बतलाते हैं.
चरणानुयोगमंे जिसप्रकार जीवोंके अपनी बुद्धिगोचर धर्मका आचरण हो वैसा उपदेश दिया है. वहाँ धर्मतो निश्चयरूप मोक्षमार्ग है वही है, उसके साधनादिक उपचारसे धर्म हैं. इसलिये व्यवहारनयकी प्रधानतासे नानाप्रकार उपचार धर्मके भेदादिकोंका इस में निरूपण किया जाता है। क्तयोंकि निश्चयधर्म में तो कुछ ग्रहण-त्यागका विकल्प नहीं है, और इसके निचली अवस्थामें विकल्प छूटता नहीं है। इसलिये इस जीवको धर्मविरोधी कार्योंको छुड़ानेका और धर्मसाधनादि कार्योंको ग्रहण कराने का उपदेश इसमें है.
वह उपदेश दो प्रकार से दिया जाता है - एक तो व्यवहारहीका उपदेश देते हैं. एक निश्चयसहित व्यवहारका उपदेश देते हैं.
वहाँ जिन जीवोंके निश्चयका ज्ञान नहीं है व उपदेश देने पर भी नहीं होता दिखायी देता ऐसे मिथ्या¹ष्िट जीव कुछ धर्म सन्मुख होने पर उन्हें व्यवहार ही का उपदेश देते हैं। तथा जिन जीवोंको निश्चयव्यवहारका ज्ञान है व उपदेश देने पर उनका ज्ञान होता दिखायी देता है - ऐसे सम्यग्¹ष्िट जीव व सम्यक्तत्वसन्मुख मिथ्या¹ष्िट जीव उनको निश्चय सहित व्यवहारका उपदेश देते हैं। क्तयोंकि श्रीगुरु सर्व जीवोंके उपकारी हैं.
सो असंज्ञी जीव तो उपदेश ग्रहण करने योग्य नहीं है, उनका तो उपकार इतना ही किया कि और जीवों को उनकी दया का उपदेश दिया.
तथा जो जीव कर्मप्रबलतासे निश्चयमोक्षमार्गको प्राप्त नहीं हो सकते, उनका इतना ही उपकार किया कि उन्हें व्यवहार धर्मका उपदेश देकर कुगतिके दु:खोंके कारण पापकार्य छुड़ाकर सुगतिके इन्द्रियसुखोंके कारणरूप पुण्यकार्योंमें लगाया. वहाँ जितने दु:ख मिटे उतना ही उपकार हुआ.
तथा पापीके तो पाप वासना ही रहती है और कुगति में जाता है, वहाँ धर्मका निमित्त नहीं है, इसलिये परम्परासे दु:ख ही प्राप्त करता रहता है. तथा पुण्यवान के धर्म वासना रहती है और सुगति में जाता है, वहाँ धर्मके निमित्त प्राप्त होते हैं, इसलिये परम्परासे सुख को प्राप्त करता है। अथवा कर्म शक्तिहीन हो जाये तो मोक्षमार्गको भी प्राप्त हो जाता है। इसलिये व्यवहार उपदेश द्वारा पाप से छुड़ाकर पुण्यकार्योंमें लगाते हैं.
तथा जो जीव मोक्षमार्गको प्राप्त हुआ व प्राप्त होने योग्य है। उनका ऐसा उपकार किया कि उनको निश्चय सहित व्यवहारका उपदेश देकर मोक्षमार्गमें प्रवर्तित किया.
श्रीगुरु तो सर्व का ऐसा ही उपकार करते हैं। परन्तु जिन जीवोंका ऐसा उपकार न बने तो श्रीगुरु क्तया करें? - जैसा बना वैसा ही उपकार किया। इसलिये दो प्रकार से उपदेश देते हैं.
वहाँ व्यवहार उपदेशमें तो बाह्य क्रियाओं की ही प्रधानता है। उनके उपदेश से जीव पापक्रिया छोड़कर पुण्यक्रियाओंमें प्रवर्तता है, वहाँ क्रियाके अनुसार परिणाम भी तीव्रकषाय छोड़कर कुछ मन्दकषायी हो जाते हैं, सो मुख्यरूपसे तो इस प्रकार है। परन्तु किसी के न हो तो मत होओ, श्रीगुरु तो परिणाम सुधारनेके अर्थ बाह्यक्रियाओंका उपदेश देते हैं.
तथा निश्चयसहित व्यवहारके उपदेशमें परिणामोंकी ही प्रधानता है। उसके उपदेशसे तत्त्ववज्ञान के अभ्यास द्वारा व वैराग्य भावना द्वारा परिणाम सुधारे वहाँ परिणामके अनुसार बाह्यक्रिया भी सुधर जाती है. परिेणाम सुधरने पर बाह्यक्रिया सुधरती ही है। इसलिये श्रीगुरु परिणाम सुधारने का मुख्य उपदेश देते हैं.
इसप्रकार दो प्रकार के उपदेशमें जहाँ व्यवहार का ही उपदेश हो वहाँ सम्यग्दर्शन के अर्थ अरहन्तदेव, निर्ग्रन्थ गुरु, दया-धर्मको ही मानना, और को नहीं मानना। तथा जीवादिक तत्त्ववोंका व्यवहार स्वरूप कहा है उसका श्रद्धान करना। शंकादि पच्चीस दोष न लगाना। नि:शंकितादि अंग व संवेगादिक गुणोंका पालन करना इत्यादि उपदेश देते हैं.
तथा सम्यक्तज्ञानके अर्थ जिनमतके शास्त्रोंका अभ्यास करना, अर्थ व्यंजनादि अंगोंका साधन करना इत्यादि उपदेश देते हैं. तथा सम्यक्चारित्रके अर्थ एक देश व सर्वदेश हिंसादि पापोंका त्याग करना, व्रतादि अंगोंका पालन करना इत्यादि उपदेश देते हैं. तथा किसी जीव के विशेष धर्मका साधन न होता जान कर एक आखड़ी आदिकका ही उपदेश देते हैं. जैसे - भीलको कौएका माँस छुड़वाया, ग्वालेको नमस्कारमन्त्र जपनेका उपदेश दिया, गृहस्थको चैत्यालय, पूजा-प्रभावनादि कार्यका उपदेश देते हैं, - इत्यादि जैसा जीव हो उसे वैसा उपदेश देते हैं.
तथा जहाँ निश्चयसहित व्यवहार का उपदेश हो वहाँ सम्यग्दर्शनके अर्थ यथार्थ तत्त्ववोंका श्रद्धान कराते हैं. उनका जो निश्चयस्वरूप है सो भूतार्थ है, व्यवहारस्वरूप है सो उपचार है - ऐसे श्रद्धानसहित व स्वपरके भेदज्ञान द्वारा परद्रव्यमें रागादि छोड़ने के प्रयोजनसहित उन तत्त्ववोंका श्रद्धान करनेका उपदेश देते हैं. ऐसे श्रद्धानसे अरहन्तादिके सिवा अन्य देवादिक झूठ भासित हो तब स्वयमेव उनका मानना छूट जाता है, उसका भी निरूपण करते हैं. तथा सम्यग्ज्ञान के अर्थ संशयादिरहित उन्हीं तत्त्ववोंको उसी प्रकार जानने का उपदेश देते हैं, उस जाननेको कारण जिनशास्त्रोंका अभ्यास है, इसलिये उस प्रयोजन के अर्थ जिनशास्त्रोंका भी अभ्यास स्वयमेव होता है। उसका निरूपण करते हैं. तथा सम्यक्चारित्रकेअर्थरागादिदूरकरनेकाउपदेशदेतेहैं।वहाँएकदेशवसर्वदेश तीव्ररागादिकका अभाव होने पर उनके निमित्तसे जो एकदेश व सर्वदेश पापक्रिया होती थी वह छूटती है, तथा मंदरागसे श्रावक-मुनि के व्रतोंकी प्रवृत्ति होती है और मंद रागका भी अभाव होनेपर शुद्धोपयोग की प्रवृत्ति होती है, उसका निरूपण करते हैं.
तथा यथार्थ श्रद्धान सहित सम्यग्¹ष्िटयोंके जैसे कोई यथार्थ आखड़ी होती है या भक्ति होती है या पूजा-प्रभावनादि कार्य होते हैं या ध्यानादिक होते हैं उनका उपदेश देते हैं. जिनमतमें जैसा सच्चा परम्परामार्ग है वैसा उपदेश देते हैं.
इस तरह दो प्रकार से चरणानुयोग मैं उपदेश जानना.
तथा चरणानुयोगमें तीव्र कषायोंका कार्य छुड़ाकर मन्दकषायरूप कार्य करने का उपदेश देते हैं. यद्यपि कषाय करना बुरा ही है, तथापि सर्व कषाय न छूटते जानकर जितने कषाय घटे उतना ही भला होगा - ऐसा प्रयोजन वहाँ जानना. जैसे - जिन जीवोंके आरम्भादि करनेकी व मन्दिरादि बनवाने की, व विषय सेवन की व क्रोधादि करने की इच्छा सर्वथा दूर होती न जाने, उन्हें पूजा-प्रभावनादिक करनेका व चैत्यालयादि बनवानेका व जिनदेवादिकके आगे शोभादिक, नृत्य-गानादिक करनेका व धर्मात्मा पुरुषों की सहाय आदि करने का उपदेश देते हैं। क्तयोंकि इनमें परम्परा कषायका पोषण नहीं होता. पापकार्योंमें परम्परा कषायका पोषण होता है, इसलिये पापकार्योंसे छुड़ाकर इन कार्योंमें लगाते हैं. तथा थोड़ा-बहुत जितना छूटना जाने उतना पापकार्य छुड़ाकर उन्हें सम्यक्तत्व व अणुव्रतादि पालनेका उपदेश देते हैं. तथा जिन जीवोंके सर्वथा आरम्भादिककी इच्छा दूर हुई है, उनको पूर्वोक्त पूजादिक कार्य व सर्व पापकार्य छुड़ाकर महाव्रतादि क्रियाओंका उपदेश देते हैं. तथा ंकिंचित् रागादिक छूटते जानकर उन्हें दया, धर्मोपदेश, प्रतिक्रमण आदि कार्य करनेका उपदेश देते हैं. जहाँ सर्व राग दूर हुआ हो वहाँ कुछ करनेका कार्य ही नहीं रहा। इसलिये उन्हें कुछ उपदेश ही नहीं है. - ऐसा क्रम जानना.
तथा चरणानुयोगमें, कषायी जीवोंको कषाय उत्पन्न करके भी पापको छुड़ाते हैं और धर्ममें ही लगाते हैं. जैसे - पापका फल नरकादिके दु:ख दिखाकर उनको भय कषाय उत्पन्न करके पापकार्य छुड़वाते हैं, तथा पुण्यके फल स्वर्गादिकके सुख दिखाकर उन्हें लोभ कषाय उत्पन्न करके धर्मकार्योंमें लगाते हैं. तथा यह जीव इन्द्रियविषय, शरीर, पुत्र, धनादिकके अनुरागसे पाप करता है, धर्म परा¢्मुख रहता है। इसलिये इन्द्रियविषयोंको मरण, क्तलेशादिके कारण बतलाकर उनमें अरति कषाय कराते हैं. शरीरादिको अशुचि बतलाकर वहाँ जुगुप्सा कषाय कराते हैं। पुत्रादिको धनादिकके ग्राहक बतलाकर वहाँ द्वेष कराते हैं। तथा धनादिकको मरण, क्तलेशादिका कारण बतलाकर वहाँ अनिष्टबुद्धि कराते हैं. - इत्यादि उपायोंसे विषयादिमें तीव्रराग दूर होने से उनके पापक्रिया छूटकर धर्ममें प्रवृत्ति होती है. तथा नामस्मरण, स्तुतिकरण, पूजा, दान, शीलादिकसे इसलोकमें दारिद्रय कष्ट दूर होते हैं, पुत्र-धनादिककी प्राप्ति होती है, - इसप्रकार निरूपण द्वारा उनके लोभ उत्पन्न करके उन धर्मकार्योंमें लगाते हैं.
इसीप्रकार अन्य उदाहरण जानना.
यहाँ प्रश्न है कि कोई कषाय छुड़ाकर कोई कषाय कराने का प्रयोजन क्तया?
समाधान :- जैसे रोग तो शीतांग भी है और ज्वर भी है। परन्तु किसीका शीतांग से मरण होता जाने, वहाँ वैद्य उसको ज्वर होने का उपाय करता है, और ज्वर होने पश्चात् उसके जीने की आशा हो तब बादमें ज्वर को भी मिटाने का उपाय करता है. उसी प्रकार कषाय तो सभी हेय हैं। परन्तु किन्हीं जीवोंकी कषायोंसे पापकार्य होता जाने, वहाँ श्रीगुरु उनको पुण्य कार्यके कारणभूत कषाय होनेका उपाय करते हैं, पश्चात् उसके सच्ची धर्मबुद्धि हुई जानें तब बादमें वह कषाय मिटानेका उपाय करते हैं. ऐसा प्रयोजन जानना.
तथा चरणानुयोगमें जैसे जीव पाप छोड़कर धर्ममें लगें वैसे अनेक युक्यिों द्वारा वर्णन करते हैं. वहाँ लौकिक ¹ष्टान्त, युक्ति, उदाहरण, न्यायवृत्तिके द्वारा समझाते हैं व कहींअन्यमतकेभीउदाहरणादिकहतेहैं.जैसे-‘सूक्तमुक्तावली’मेंलक्ष्मीको कमलवासिनी कही व समुद्र में विष और लक्ष्मी उत्पन्न हुए उस अपेक्षा उसे विष की भगिनी कही है. इसी प्रकार अन्यत्र कहते हैं.
वहाँ कितने ही उदाहरणादि झूठे भी हैं। परन्तु सच्चे प्रयोजन का पोषण करते हैं, इसलिये दोष नहीं है.
यहाँ कोई कहे कि झूठका तो दोष लगता है?
उसका उत्तर :- यदि झूठ भी है और सच्चे प्रयोजनका पोषण करे तो उसे झूठ नहीं कहते. तथा सच भी है और झूठे प्रयोजन का पोषण करे तो वह झूठ ही है.
अलंकार-युक्ति-नामादिकमें वचन अपेक्षा झूठ-सच नहीं है, प्रयोजन की अपेक्षा झूठ-सच है. जैसे - तुच्छ शोभासहित नगरी को इन्द्रपुरी के समान कहते हैं सो झूठ है, परन्तु शोभाके प्रयोजन का पोषण करता हैं, इसलिये झूठ नहीं है. तथा ‘इस नगरी में छत्र को ही दंड़ है अन्यत्र नहीं है’- ऐसा कहा सो झूठ है। अन्यत्र भी दण्ड़ देना पाया जाता है, परन्तु वहाँ अन्यायवान थोड़े हैं और न्यायवान को दण्ड़ नहीं देते, ऐसे प्रयोजन का पोषण करता है, इसलिये झूठ नहीं है. तथा बृहस्पतिका नाम ‘सुरगुरु’ लिखा है व मंगलका नाम ‘कुज’ लिखा है सो ऐसे नाम अन्यमत अपेक्षा है. - इनका अक्षरार्थ है सो झूठा है। परन्तु वह नाम उस पदार्थका अर्थ प्रगट करता है, इसलिये झूठ नहीं है.
इसप्रकार अन्यमतादि के उदाहरणादि देते हैं सो झूठ है। परन्तु उदाहरणादिकका तो श्रद्धान कराना है नहीं, श्रद्धान तो प्रयोजन का कराना है, और प्रयोजन सच्चा है, इसलिये दोष नहीं है.
तथाचरणानुयोगमेंछद्मस्थकीबुद्धिगोचरस्थूलपनेकीअपेक्षासेलोकप्रवृत्तिकी मुख्यता सहित उपदेश देते हैं। परन्तु केवलज्ञानगोचर सूक्ष्मपने की अपेक्षा नहीं देते। क्तयोंकि उसका आचरण नहीं हो सकता. यहाँ आचरण करनेका प्रयोजन है.
जैसे - अणुव्रती के त्रस ंंहिंसा का त्याग कहा है और उसके स्त्री-सेवनादि क्रियाओंमें त्रसहिंसा होती है. यह भी जानता है कि जिनवाणीमें यहाँ त्रस कहे हैं। परन्तु इसके त्रस मारने का अभिप्राय नहीं है, और लोकमें जिसका नाम त्रस घात है उसे नहीं करता है। इसलिये उस अपेक्षा उसके त्रसहिंसाका त्याग है.
तथा मुनिके स्थावरहिंसाका भी त्याग कहा है। परन्तु मुनि पृथ्वी, जलादिमें गमनादि करते हैं वहाँ सर्वथा त्रसका भी अभाव नहीं है। क्तयोंकि त्रस जीवोंकी भी अवगाहना इतनी छोटी होती है कि जो ¹ष्िटगोचर न हो और उनकी स्थिति पृथ्वी जलादिमें ही है - ऐसा मुनि जिनवाणीसे जानते हैं व कदाचित् अवधिज्ञानादि द्वारा भी जानते हैं। परन्तु उनके प्रमादसे स्थावर-त्रसहिंसाका अभिप्राय नहीं है. तथा लोक में भूमि खोदना तथा अप्रासुक जलसे क्रिया करना इत्यादि प्रवृत्तिका नाम स्थावरहिंसा है, और स्थूल त्रसजीवोंको पीडि़त करने का नाम त्रस हिंसा है - उसे नहीं करते। इसलिये मुनि को सर्वथा हिंसाका त्याग कहते हैं. तथा इसी प्रकार असत्य, स्तेय, अब्रह्म, परिग्रहका त्याग कहा है.
केवलज्ञानके जानने की अपेक्षा तो असत्यवचनयोग बारहवें गुणस्थानपर्यन्त कहा है, अदत्तकर्मपरमाणु आदि परद्रव्य का ग्रहण तेरहवें गुणस्थानपर्यन्त हैं, वेदका उदय नववें गुणस्थान पर्यन्त है, अंतरंग परिग्रह दसवें गुणस्थानपर्यन्त है, बाह्यपरिग्रह समवसरणादि केवलीके भी होता है। परन्तु(मुनि को)प्रमादसे पापरूप अभिप्राय नहीं है, और लोक प्रवृत्तिमें जिन क्रियाओं द्वारा ‘यह झूठ बोलता है, चोरी करता है, कुशील सेवन करता है, परिग्रहरखताहै’-इत्यादिनामपाताहै,वेक्रियाएँइनकेनहींहैं।इसलिये असत्यादिका इनके त्याग कहा जाता है.
तथा जिस प्रकार मुनि के मूलगुणोंमें पंचेन्द्रियोंके विषयका त्याग कहा है। परन्तु इन्द्रियोंका जानना तो मिटता नहीं है, और विषयोंमें राग-द्वेष सर्वथा दूर हुआ हो तो यथाख्यातचारित्र हो जाये सो हुआ नहीं है। परन्तु स्थूलरूप से विषयेच्छाका अभाव हुआ है और बाह्यविषयसामग्री मिलाने की प्रवृत्ति दूर हुई है। इसलिये उनके इन्द्रियविषयका त्याग कहा है.
इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा व्रती जीव त्याग व आचरण करता है सो चरणानुयोगकी पद्धति अनुसार व लोक प्रवृत्तिके अनुसार त्याग करता है. जैसे - किसी ने त्रसंंहिंसा का त्याग किया, वहाँ चरणानुयोगमें व लोक में जिसे त्रसंंहिंसा कहते हैं उसका त्याग किया है, केवलज्ञानादि द्वारा जो त्रस देखे जाते हैं उनकी हिंसा का त्याग बनता ही नहीं. वहाँ जिस त्रस हिंंसाका त्याग किया, उसरूप मन का विकल्प न करना सो मन से त्याग है, वचन न बोलना सो वचन से त्याग है, काय द्वारा नहीं प्रवर्तना सो काय से त्याग है. इसप्रकार अन्य त्याग व ग्रहण होता है सो ऐसी पद्धति सहित ही होता है ऐसा जानना.
यहाँ प्रश्न है कि करणानुयोग में तो केवलज्ञान अपेक्षा तारतम्य कथन है, वहाँ छठवें गुणस्थान में सर्वथा बारह अविरतियोंका अभाव कहा, सो किस प्रकार कहा?
उत्तर :- अविरति भी योग कषायमें गर्भित थी, परन्तु वहाँ भी चरणानुयोग की अपेक्षा त्यागका अभाव उसही का नाम अविरति कहा है, इसलिये वहाँ उनका अभाव है. मन-अविरतिका अभाव कहा, सो मुनिको मन के विकल्प होते हैं। परन्तु स्वेच्छाचारी मन की पापरूप प्रवृत्तिके अभाव से मन-अविरतिका अभाव कहा है - ऐसा जानना.
तथा चरणानुयोगमें व्यवहार-लोक-प्रवृत्ति की अपेक्षा ही नामादिक कहते हैं. जिस प्रकारसम्यक्तत्वीकोपात्रकहातथामिथ्यात्वीकोअपात्रकहा।सोयहाँजिसके जिनदेवादिकका श्रद्धान पाया जाये वह तो सम्यक्तत्वी, जिसके उनका श्रद्धान नहीं है वह मिथ्यात्वी जानना. क्तयोंकि दान देना चरणानुयोगमें कहा है, इसलिये चरणानुयोगके ही सम्यक्तत्व-मिथ्यात्व ग्रहण करना. करणानुयोगकी अपेक्षा सम्यक्तत्व-मिथ्यात्व ग्रहण करने से वही जीव ग्यारहवें गुणस्थानमें था और वही अन्तर्मुहूर्तमें पहले गुणस्थानमें आये , तो वहाँ दातार पात्र-अपात्रका कैसे निर्णय कर सके?
तथा द्रव्यानुयोगकी अपेक्षा सम्यक्तत्व-मिथ्यात्व ग्रहण करनेपर मुनिसंघमें द्रव्यलिंगी भी हैं और भावलिंगी भी हैं सो प्रथम तो उनका ठीक(निर्णय)होना कठिन है। क्तयोंकि बाह्य प्रवृत्ति समान है। तथा यदि कदाचित् सम्यक्तत्वी को किसी चिन्ह द्वारा ठीक(निर्णय)हो जाये और वह उसकी भक्ति न करे तो औरोंको संशय होगा कि इसकी भक्ति क्तयों नहीं की? इसप्रकार उसका मिथ्या¹ष्िटपना प्रगट हो तब संघमें विरोध उत्पन्न हो। इसलिये यहाँ व्यवहार सम्यक्तत्व-मिथ्यात्व की अपेक्षा कथन जानना.
यहाँ कोई प्रश्न करे - सम्यक्तत्वी तो द्रव्यलिंगीको अपने से हीनगुणयुक्त मानता है, उसकी भक्ति कैसे करें?
समाधान :- व्यवहार धर्मका साधन द्रव्यलिंगीके बहुत है और भक्ति करना भी व्यवहार है. इसलिये जैसे - कोई धनवान हो, परन्तु जो कुलमें बड़ा हो उसे कुल अपेक्षा बड़ा जानकर उसका सत्कार करता है। उसी प्रकार आप सम्यक्तत्व गुण सहित है, परन्तु जो व्यवहार धर्ममें प्रधान हो उसे व्यवहारधर्मकी अपेक्षा गुणाधिक मान कर उसकी भक्ति करता है, ऐसा जानना. इसी प्रकार जो जीव बहुत उपवासादि करे उसे तपस्वी कहते हैं। यद्यपि कोई ध्यान-अध्ययनादि विशेष करता है वह उत्कृष्ट तपस्वी है तथापि यहाँ चरणानुयोगमें बाह्यतपकी ही प्रधानता है, इसलिये उसी को तपस्वी कहते हैं. इसप्रकार अन्य नामादिक जानना.
ऐसे ही अन्य प्रकार सहित चरणानुयोगमें व्याख्यानका विधान जानना. द्रव्यानुयोगके व्याख्यानका विधान
अब, द्रव्यानुयोगमें व्याख्यानका विधान कहते हैं :-
जीवोंके जीवादि द्रव्योंका यथार्थ श्रद्धान जिसप्रकार हो उस प्रकार विशेष, युक्ति, हेतु, दृष्टान्तादिकका यहाँ निरूपण करते हैं, क्तयोंकि इसमें यथार्थ श्रद्धान करानेका प्रयोजन है. वहाँ यद्यपि जीवादि वस्तु अभेद हैं तथापि उनमें भेदकल्पना द्वारा व्यवहारसे द्रव्य-गुण- पर्यायादिकके भेदोंको निरूपण करते हैं. तथा प्रतीति कराने के अर्थ अनेक युक्यिों द्वारा उपदेश देते हैं अथवा प्रमाण-नय द्वारा उपदेश देते हैं वह भी युक्ति है, तथा वस्तुके अनुमान प्रत्यभिज्ञानादिक करनेको हेतु-¹ष्टान्तादिक देते हैं। इस प्रकार यहाँ वस्तु की प्रतीति करानेको उपदेश देते हैं.
तथा यहाँ मोक्षमार्गका श्रद्धान करानेके अर्थजीवादि तत्त्ववोंका विशेष, युक्ति, हेतु, ¹ष्टान्तादि द्वारा निरूपण करते हैं. वहाँ स्वपर भेदविज्ञानादिक जिस प्रकार हों उस प्रकार जीव-अजीवकानिर्णयकरतेहैं।तथावीतरागभावजिसप्रकारहोउसप्रकार आस्रवादिकका स्वरूप बतलाते हैं। और वहाँ मुख्यरूप से ज्ञान-वैराग्य के कारण जो आत्मानुभवनादिक उनकी महिमा गाते हैं.
तथा द्रव्यानुयोगमें निश्चय अध्यात्म-उपदेशकी प्रधानता हो, वहाँ व्यवहार धर्मका भी निषेध करते हैं. जो जीव आत्मानुभव का उपाय नहीं करते और बाह्य क्रियाकाण्डमें मग्न हैं, उनको वहाँसे उदास करके आत्मानुभवनादिमें लगानेको व्रत-शील-संयमादिकका हीनपना प्रगट करते हैं. वहाँ ऐसा नहीं जान लेना कि इनको छोड़कर पापमें लगना।क्तयोंकि उस उपदेशका प्रयोजन अशुभमें लगानेका नहीं है शुद्धोपयोगमें लगानेको शुभोपयोगका निषेध करते हैं.
यहाँ कोई कहे कि अध्यात्मशास्त्रमें पुण्य-पाप समान कहे हैं, इसलिये शुद्धोपयोग हो तो भला ही है, न हो तो पुण्यमें लगो या पापमें लगो?
उत्तर :- जैसे शुद्ध जाति की अपेक्षा जाट, चांडाल समान कहें हैं। परन्तु चांडालसे जाट कुछ उत्तम है। वह अस्पृश्य है, यह अपृश्य है। उसी प्रकार बन्ध कारण की अपेक्षा पुण्य-पापसमानहैं।परन्तुपापसेपुण्यकुछभलाहै।वहतीव्रकषायरूपहै,यह मन्दकषायरूप है। इसलिये पुण्य छोड़कर पापमें लगना युक्त नहीं है - ऐसा जानना.
तथा जो जीव जिनबिम्ब भक्ति आदि कार्योंमें ही मग्न हैं उनको आत्मश्रद्धानादि करानेको ‘देहमें देव है, मन्दिरोंमें नहीं’ - इत्यादि उपदेश देते हैं. वहाँ ऐसा नहीं जान लेना कि भक्ति छोड़कर भोजनादिसे अपनेको सुखी करना। क्तयोंकि उस उपदेशका प्रयोजन ऐसा नहीं है.
इसीप्रकार अन्य व्यवहारका निषेध वहाँ किया हो उसे जान कर प्रमादी नहीं होना. ऐसा जानना कि जो केवल व्यवहारसाधनमें ही मग्न हैं उनको निश्चयरूचि कराने के अर्थ व्यवहार को हीन बतालाया है.
तथा उन्हीं शास्त्रोंमें सम्यग्¹ष्िटके विषय-भोगादिकको बन्धका कारण नहीं कहा, निर्जराका कारण कहा। परन्तु यहाँ भोगोंका उपादेयपना नहीं जान लेना. वहाँ सम्यग्¹ष्िट की महिमा बतलानेको जो तीव्रबन्धके कारण भोगादिक प्रसिद्ध थे, उन भोगादिकके होने पर भी श्रद्धानशक्तिके बलसे मन्द बन्ध होने लगा उसे गिना नहीं और उसी बल से निर्जरा विशेष होने लगी, इसलिये उपचारसे भोगोंको भी बन्धका कारण नहीं कहा, निर्जराका कारण कहा. विचार करने पर भोग निर्जराके कारण हों तो उन्हें छोड़कर सम्यग्¹ष्िट मुनिपद का ग्रहण किसलिये करे? यहाँ इस कथनका इतना ही प्रयोजन है कि देखो, सम्यक्तत्व की महिमा जिसके बलसे भोग भी अपने गुणको नहीं कर सकते.
इसीप्रकार अन्य भी कथन हों तो उनका यथार्थपना जान लेना.
तथा द्रव्यानुयोगमें भी चरणानुयोगवत् ग्रहण-त्याग कराने का प्रयोजन है। इसलिये छद्मस्थ के बुद्धिगोचर परिणामों की अपेक्षा ही वहाँ कथन करते हैं. इतना विशेष है कि चरणानुयोमेंतोबाह्यक्रियाकीमुख्यतासेवर्णनकरतेहैं,द्रव्यानुयोगमेंआत्मपरिणामोंकी मुख्यतासे निरूपण करते हैं। परन्तु करणानुयोगवत् सूक्ष्म वर्णन नहीं करते. उसके उदाहरण देते हैं :-
उपयोगके शुभ, अशुभ, शुद्ध - ऐसे तीन भेद कहे हैं। वहाँ धर्मानुरागरूप परिणाम वह शुभोपयोग, पापानुरागरूप व द्वेषरूप परिणाम वह अशुभोपयोग, और राग-द्वेषरहित परिणाम वह शुद्धोपयोग - ऐसा कहा है सो इस छद्मस्थ के बुद्धिगोचर परिणामोंकी अपेक्षा वह कथन है। करणानुयोगमें कषायशक्तिकी अपेक्षा गुणस्थानादिमें संक्तलेशविशुद्ध परिणामोंकी अपेक्षा निरूपण किया है वह विवक्षा यहाँ नहीं है.
करणानुयोगमें तो रागादि रहित शुद्धोपयोग यथाख्यातचारित्र होनेपर होता है, वह मोहके नाशसे स्वयमेव होगा। निचली अवस्थावाला शुद्धोपयोगका साधन कैसे करे? तथा द्रव्यानुयोगमें शुद्धोपयोग करने का ही मुख्य उपदेश है। इसलिये वहाँ छद्मस्थ जिस कालमें बुद्धिगोचर भक्ति आदि व हिंसा आदि कार्यरूप परिणामोंको छोड़कर आत्मानुभवनादि कार्योंमें प्रवर्ते उस काल उसे शुद्धोपयोगी कहते हैं. यद्यपि यहाँ केवलज्ञानगोचर सूक्ष्मरागादिक हैं, तथापि उसकी विवक्षा यहाँ नहीं की, अपनी बुद्धिगोचर रागादिक छोड़ता है, इस अपेक्षा उसे शुद्धोपयोगी कहा है.
इसी प्रकार स्व-पर श्रद्धानादिक होनेपर सम्यक्तत्वादि कहे, वह बुद्धिगोचर अपेक्षासे निरूपण है। सूक्ष्म भाावों की अपेक्षा गुणस्थानादिमें सम्यक्तत्वादिका निरूपण करणानुयोगमें पाया जाता है. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
इसलिये द्रव्यानुयोगकेकथनकी विधि करणानुयोगसेमिलानाचाहेतोकहींतो मिलती है, कहीं नहीं मिलती. जिसप्रकार यथाख्यातचारित्र होने पर तो दोनो अपेक्षा शुद्धोपयोग है, परन्तु निचली दशामें द्रव्यानुयोग अपेक्षा से तो कदाचित् शुद्धोपयोग होता है, परन्तु करणानुयोग अपेक्षा से सदाकाल कषाय अंश के सद्भावसे शुद्धोपयोग नहीं है. इसी प्रकार अन्य कथन जान लेना.
तथा द्रव्यानुयोगमें परमतमें कहे हुए तत्त्ववादिकको असत्य बतलानेके अर्थ उनका निषेध करते हैं। वहाँ द्वेषबुद्धि नहीं जानना. उनको असत्य बतलाकर सत्य श्रद्धान करानेका प्रयोजन जानना. ·
इसीप्रकार और भी अनेक प्रकारके द्रव्यानुयोगमें व्याख्यानका विधान है.
इसप्रकारचारोंअनुयोगकेव्याख्यानकाविधानकहा.वहाँकिसीग्रन्थमेंएक अनुयोगकी, किसी में दो की, किसीमें तीन की और किसी मेंं चारोंकी प्रधानता सहित व्याख्यान होता है। सो जहाँ जैसा सम्भव हो वहाँ वैसा समझ लेना.

अनुयोगोंके व्याख्यानकी पद्धति

अब, इन अनुयोगोंमें कैसी पद्धतिकी मुख्यता पायी जाती है सो कहते हैं :-
प्रथमानुयोगमें तो अलंकार शास्त्र की व काव्यादि शास्त्रोंकि पद्धति मुख्य है। क्तयोंकि अलंकारादिसे मन रंजायमान होता है, सीधी बात कहनेसे ऐसा उपयोग नहीं लगता - जैसाअलंकारादियुक्तसहितकथनसेउपयोगलगताहै.तथापरोक्षबातकोकुछ अधिकतापूर्वक निरूपण किया जाये तो उसका स्वरूप भली-भांाति भासित होता है.
तथा करणानुयोगमें गणित आदि शास्त्रों की पद्धति मुख्य है। क्तयोंकि वहाँ द्रव्य- क्षेत्र-काल-भावके प्रमाणादिकका निरूपण करते हैं। सो गणित ग्रन्थोंकि आम्नायसे उसका सुगम जानपना होता है.
तथा चरणानुयोगमें सुभाषित नीतिशास्त्रोंकी पद्धति मुख्य है। क्तयोंकि वहाँ आचरण कराना है। इसलियेलोकप्रवृत्ति के अनुसार नीतिमार्ग बतलानेपर वह आचरण करता है.
तथाद्रव्यानुयोगमेंन्यायशास्त्रोंकिपद्धतिमुख्यहै।क्तयोंकिवहाँनिर्णयकरनेका प्रयोजन है और न्यायशास्त्रोंमें निर्णय करनेका मार्ग दिखाया है.
इस प्रकार इन अनुयोगोंमें मुख्य पद्धति है और भी अनेक पद्धति सहित व्याख्यान इनमें पाये जाते हैं.
यहाँ कोई कहे - अलंकार, गणित, नीति, न्यायका ज्ञान तो पण्िडतोंके होता है। तुच्छ बुद्धि समझे नहीं, इसलिये सीधा कथन क्तयों नहीं किया?
उत्तर :- शास्त्र हैं सो मुख्यरूप से पण्िडतों और चतुरोंके अभ्यास करने योग्य हैं, यदि अलंकारादि आम्नाय सहित कथन हो तो उनका मन लगे. तथा जो तुच्छ बुद्धि हैं उनको पण्िडत समझादें, और जो नहीं समझ सकें तो उन्हें मुँहसे सीधा ही कथन कहें. परन्तु ग्रन्थोंमें सीधा कथन लिखनेसे विशेषबुद्धि जीव उनके अभ्यासमें विशेष नहीं प्रवर्ते, इसलिये अलंकारादि आम्नाय सहित करते हैं.
इसप्रकार इन चार अनुयोगोंका निरूपण किया.
तथा जैनमत में बहुत शास्त्र तो इन चारों अनुयोगोंमें गर्भित हैं.
तथा व्याकरण, न्याय, छन्द, कोषादिक शास्त्र व वैद्यक, ज्योतिष, मन्त्रादि शास्त्र भी जिनमतमें पाये जाते हैं. उनका क्तया प्रयोजन है सो सुनो :-
व्याकरण-न्यायादि शाास्त्रोंका प्रयोजन
व्याकरण-न्यायादिकका अभ्यास होने पर अनुयोगरूप शास्त्रोंका अभ्यास हो सकता है। इसलिये व्याकरणादि शास्त्र कहें हैं.
कोई कहे - भााषारूप सीधा निरूपण करते तो व्याकरणादि का क्तया प्रयोजन था?
उत्तर :- भाषातो अपभ्रंशरूप अशुद्धवाणी है, देश-देशमें और-और हैं। वहाँ महन्त पुरुष शाास्त्रोंमें ऐसी रचना कैसे करें? तथा व्याकरण-न्यायादि द्वारा जैसे यथार्थ सूक्ष्म अर्थकानिरूपणहोताहैवैसासीधीभाषामेंनहींहोसकता।इसलियेव्याकरणादिकी आम्नायसे वर्णन किया है. सो अपनी बुद्धिके अनुसार थोड़ा बहुत इनका अभ्यास करके अनुयोगरूप प्रयोजनभूत शास्त्रोंका अभ्यास करना.
तथा वैद्यकादि चमत्कारसे जिनमतकी प्र्रभावना हो व औषधादिकसे उपकार भी बने। अथवा जो जीव लौकिक कार्योंमें अनुरक्त है वे वैद्यकादि चमत्कारसे जैनी होकर पश्चात् सच्चा धर्म प्राप्त करके अपना कल्याण करें - इत्यादि प्रयोजन सहित वैद्यकादि शास्त्र कहे हैं.
यहाँ इतना है कि यह भी जैन शास्त्र हैं ऐसा जानकर इनके अभ्यासमें बहुत नहीं लगना. यदि बहुत बुद्धिसे इनका सहज जानना हो और इनको जानने से अपने रागादिक विकार बढ़ते न जाने, तो इनका भी जानना होओ. अनुयोगशास्त्रवत् ये शास्त्र बहुत कार्यकारी नहीं हैं, इसलिये इनके अभ्यासका विशेष उद्यम करना योग्य नहीं है.
प्रश्न :- यदि ऐसा है तो गणधरादिकने इनकी रचना किसलिये की?
उत्तर :- पूर्वोक्त किंचित् प्रयोजन जानकर इनकी रचना की है. जैसे बहुत धनवान कदाचित् अल्पकार्यकारी वस्तु का भी संचय करता है। परन्तु थोडे़ धनवाला उन वस्तुओंका संचय करे तो धन तो वहाँ लग जाये, फिर बहुत कार्यकारी वस्तु का संग्रह काहेसे करे? उसी प्रकार बहुत बुद्धिमान गणधरादिक कथंचित् अल्पकार्यकारी वैद्यकादि शास्त्रोंका भी संचय करते हैं। परन्तु थोड़ा बुद्धिमान उनके अभ्यासमें लगे तो बुद्धि तो वहाँ लग जाये, फिर उत्कृष्ट कार्यकारी शाास्त्रोंका अभ्यास कैसे करे?
तथा जैसे - मन्दरागी तो पुराणादिमें श्रुंगारादिका निरूपण करे तथापि विकारी नहीं होता। परन्तु तीव्ररागी वैसे श्रुंगारादिका निरूपण करे तो पाप ही बान्धेगा. उसी प्रकार मन्दरागी गणधरादिक हैं वे वैद्यकादि शाास्त्रोंका निरूपण करें तथापि विकारी नहीं होते। परन्तु तीव्ररागी उनके अभ्यासमें लग जाये तो रागादिक बढ़ाकर पापकर्मको बाँधेंगे - ऐसा जानना.
इसप्रकार जैनमत के उपदेश का स्वरूप जानना.

अनुयोगोंमें दोष-कल्पनाओंका निराकरण

अब, इनमें कोई दोष-कल्पना करता है, उसका निराकरण करते हैं :- प्रथमानुयोगमें दोष कल्पनाका निराकरण
कितने ही जीव कहते हैं - प्रथमानुयोगमें श्रुंगारादिक व संग्रामादिकका बहुत कथन करते हैं, उनके निमित्त से रागादिक बढ़ जाते हैं, इसलिये ऐसा कथन नहीं करना था, व ऐसा कथन सुनना नहीं.
उनसे कहते हैं - कथा कहना हो तब तो सभी अवस्थाओंका कथन करना चाहिये। तथा यदि अलंकारादि द्वारा बढ़ाकर कथन करते हैं, सो पण्िडतोंके वचन तो युक्ति सहित ही निकलते हैं.
और यदि तुम कहोगे कि सम्बन्ध मिलानेको सामान्य कथन किया होता, बढ़ाकर कथन किसलिये किया?
उसका उत्तर यह है कि परोक्ष कथनको बढ़ाकर कहे बिना उसका स्वरूप भासित नहीं होता. तथा पहले तो भोग-संग्रामादि इसप्रकार किये, पश्चात् सबका त्याग करके मुनि हुए। इत्यादि चमत्कार तभी भासित होंगे जब बढ़ाकर कथन किया जाये.
तथा तुम कहते हो - उसके निमित्तसे रागादिक बढ़ जाते हैं। सो जैसे कोई चैत्यालय बनवाये, उसका प्रयोजन तो वहाँ धर्म कार्य कराने का है। और कोई पापी वहाँ पाप कार्य करे तो चैत्यालय बनवाने वाले का तो दोष नहीं है. उसी प्रकार श्रीगुरुने पुराणादिमें श्रुंगारादिका वर्णन किया। वहाँ उनका प्रयोजन रागादिक कराने का तो है नहीं, धर्ममें लगाने का प्रयोजन है। परन्तु कोई पापी धर्म न करे और रागादिक ही बढ़ाये तो श्रीगुरुका क्तया दोष है?
यदि तू कहे कि रागादिकका निमित्त हो ऐसा कथन ही नहीं करना था.
उसका उत्तर यह है - सरागी जीवोंका मन केवल वैराग्यकथन में नहीं लगता. इसलिये जिसप्रकार बालकको बताशेके आश्रयसे औषधि देते हैं। उसी प्रकार सरागी को भोगादि कथन के आश्रय से धर्ममें रुचि कराते हैं.
यदि तू कहेगा - ऐसा है तो विरागी पुरुषोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका अभ्यास करना योग्य नहीं है?
उसका उत्तर यह है - जिनके अंतरंगमें रागभाव नहीं है, उनको श्रुंगारादि कथन सुननेपर रागादि उत्पन्न ही नहीं होते. वे जानते हैं कि यहाँ इसीप्रकार कथन करने की पद्धति है.
फिर तू कहेगा - जिनको श्रुंगारादिका कथन सुननेपर रागादि हों आयें, उन्हें तो वैसा कथन सुनना योग्य नहीं है?
उसका उत्तर यह है - जहाँ धर्महीका तो प्रयोजन है और जहाँ-तहाँ धर्म का पोषण करते हैं - ऐसे जैन पुराणादिकमें प्रसंगवश श्रुंगारादिकका कथन किया है. उसे सुनकर भी तो बहुत रागी हुआ तो वह अन्यत्र कहाँ विरागी होगा? वह तो पुराण सुनना छोड़कर अन्य कार्य भी ऐसे ही करेगा जहाँ बहुत रागादि हों। इसलिये उसको भी पुराण सुनने से थोड़ी बहुत धर्मबुद्धि हो तो हो. अन्य कार्योंसे तो यह कार्य भला ही है.
तथा कोई कहे - प्रथमानुयोगमें अन्य जीवोंकी कहानियाँ हैं, उनसे अपना क्तया प्रयोजन सधता है?
उससे कहते हैं - जैसे कामी पुरुषोंकी कथा सुनने पर अपनेको भी काम का प्रेम बढ़ता है। उसी प्रकार धर्मात्मा पुरुषोंकी कथा सुनने पर अपनेको धर्मकी प्रीति विशेष होती है. इसलिये प्रथमानुयोगका अभ्यास करना योग्य है. करणानुयोगमें दोष-कल्पनाका निराकरण
तथाकितनेहीजीवकहतेहैं-करणानुयोगमेंगुणस्थान,मार्गणादिककाव कर्मप्रकृतियोंका कथन किया व त्रिलोकादिकका कथन किया। सो उन्हें जान लिया कि ‘यह इसप्रकार है’, ‘यह इसप्रकार है’ इसमें अपना कार्य क्तया सिद्ध हुआ? या तो भक्ति करें, या व्रत-दानादि करें, या आत्मानुभवन करें - इससे अपना भला हो.
उनसे कहते हैं - परमेश्वरतो वीतराग हैं। भक्ति करनेसे प्रसन्न होकर कुछ करते नहीं हैं. भक्ति करनेसे कषाय मन्द होती है, उसका स्वयमेव उत्तम फल होता है. सो करणानुयोगके अभ्यासमें उससे भी अधिक मन्द कषाय हो सकती है, इसलिये इसका फल अति उत्तम होता है. तथा व्रत-दानादिक तो कषाय घटानेके बाह्यनिमित्तके साधन हैं और करणानुयोगका अभ्यास करने पर वहाँ उपयोग लग जाये तब रागादिक दूर होते हैं सो यह अंतरंगनिमित्तकासाधनहै।इसलियेयहविशेषकार्यकारीहै.व्रतादिकधारणकरके अध्ययनादि करते हैं. तथा आत्मानुभव सर्वोत्तम कार्य है। परन्तु सामान्य अनुभवमें उपयोग टिकता नहीं है, और नहीं टिकता तब अन्य विकल्प होते हैं। वहाँ करणानुयोगका अभ्यास हो तो उस विचार में उपयोगको लगाता है.
यह विचार वर्त्तमान भी रागादिक घटाता है और आगामी रागादिक घटानेका कारण है, इसलिये यहाँ उपयोग लगाना.
जीव-कर्मादिकके नानाप्र्रकारसे भेद जाने, उनमें रागादिक करने का प्रयोजन नहीं है, इसलिये रागादिक बढ़ते नहीं हैं। वीतराग होनेका प्रयोजन जहाँ-तहाँ प्रगट होता है, इसलिये रागादि मिटाने का कारण है.
यहाँ कोई कहे - कोई कथन तो ऐसा ही है, परन्तु द्वीप-समुद्रादिकके योजनादिका निरूपण किया उनमें क्तया सिद्धि है?
उत्तर :- उनको जानने पर उनमें कुछ इष्ट-अनिष्ट बुद्धि नहीं होती, इसलिये पूर्वोक्त सिद्धि होती है.
फिर वह कहता है - ऐसा है तो जिनसे कुछ प्रयोजन नहीं है ऐसे पाषाणादिकको भी जानते हुए वहाँ इष्ट-अनिष्टपना नहीं मानते, इसलिये वह भी कार्यकारी हुआ.
उत्तर :- सरागी जीव रागादि प्रयोजन बिना किसी को जानने का उद्यम नहीं करता। यदि स्वयमेव उनका जानना होतो अंतरंग रागादिकके अभिप्रायवश वहाँसे उपयोगको छुड़ाना ही चाहता है. यहाँ उद्यम द्वारा द्वीप-समुद्रादिकको जानता है, वहाँ उपयोग लगाता है। सो रागादि घटने पर ऐसा कार्य होता है. तथा पाषाणादिकमें इस लोकका कोई प्रयोजन भासित हो जाये तो रागादिक हो आते हैं और द्वीपादिकमें इस लोक सम्बन्धी कार्य कुछ नहीं है इसलिये रागादिकका कारण नहीं है.
यदि स्वर्गादिककी रचना सुनकर वहाँ राग हो, तो परलोक सम्बन्धी होगा। उसका कारण पुण्यको जाने तब पाप छोड़कर पुण्यमें प्रवर्त्ते इतना ही लाभ होगा। तथा द्वीपादिकको जाननेपर यथावत् रचना भासित हो तब अन्यमतादिकका कहा झूठ भासित होनेसे सत्य श्रद्धानी हो और यथावत् रचना जाननेसे भ्रम मिटने पर उपयोगकी निर्मलता हो। इसलिये वह अभ्यास कार्यकारी है.
तथा कितने ही कहते हैं - करणानुयोग में कठिनता बहुत है, इसलिये उसके अभ्यासमें खेद होता है.
उनसे कहते हैं - यदि वस्तु शीघ्र जाननेमें आयेतो वहाँ उपयोग उलझता नहीं है। तथा जानी हुई वस्तु को बारम्बार जानने का उत्साह नहीं होता तब पापकार्योंमें उपयोग लग जाता है। इसलिये अपनी बुद्धि अनुसारकठिनता से भी जिसका अभ्यास होता जाने उसका अभ्यास करना, तथा जिसका अभ्यास हो ही न सके उसका कैसे करे?
तथा तू कहता है - खेद होता है. परन्तु प्रमादी रहनेमें तो धर्म है नहीं। प्रमादसे सुखी रहे वहाँ तो पाप ही होता है। इसलियेधर्मके अर्थ उद्यम करना ही योग्य है.
ऐसा विचार करके करणानुयोगका अभ्यास करना. चरणानुयोगमें दोष-कल्पनाका निराकरण
तथा कितने ही जीव ऐसा कहते हैं - चरणानुयोगमें बाह्य व्रतादि साधनका उपदेश है, सो इनसे कुछ सिद्धि नहीं है। अपने परिणाम निर्मल होना चाहिए, बाह्यमें चाहे जैसा प्रवर्तो। इसलिये इस उपदेशसे परा¢्मुख रहते हैं.
उनसे कहते हैं - आत्मपरिणामोंके और बाह्य प्रवृत्तिके निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है. क्तयोंकि छद्मस्थ के क्रियाएँ परिणामपूर्वक होती हैं। कदाचित् बिना परिणाम कोई क्रिया होती है, सो परवशतासेहोतीहै. अपने वशसे उद्यम पूर्वक कार्य करें और कहें कि ‘परिणाम इस रूप नहीं है’, सो यह भ्रम है. अथवा बाह्य पदार्थका आश्रय पाकर परिणाम हो सकते हैं। इसलियेपरिणाममिटानेकेअर्थबाह्यवस्तुकानिषेधकरनासमयसारादिमेंकहाहै। इसीलियेरागादिभावघटनेपरअनुक्रमसेबाह्यऐसेश्रावक-मुनिधर्महोतेहैं.अथवा इसप्रकारश्रावक-मुनिधर्मअंगीकारकरनेपरपाँचवंे-छठवेंआदिगुणस्थानोंमेंरागादि घटनेपर परिणामोंकी प्राप्ति होती है - ऐसा निरूपण चरणानुयोगमें किया है.
तथा यदि बाह्यसंयमसे कुछ सिद्धि न हो तो सर्वार्थसिद्धिवासी देव सम्यग्¹ष्िट बहुत ज्ञानी हैं उनके तो चौथा गुणस्थान होता है और गृहस्थ श्रावक मनुष्योंके पंचम गुणस्थान होता है, सो क्तया कारण? तथा तीर्थंकरादिक गृहस्थ पद छोड़कर किसलिये संयम ग्रहण करें?इसलिये यह नियम है कि बाह्य संयम-साधन बिना परिणाम निर्मल नहीं हो सकते। इसलिये बाह्य साधनका विधान जाननेके लिये चरणानुयोगका अभ्यास अवश्य करना चाहिये. द्रġव्यानुयोगमें दोष-कल्पनाका निराकरण
तथा कितने ही जीव कहते हैं कि द्रव्यानुयोगमें व्रत-संयमादि व्यवहारधर्मका हीनपना प्रगट किया है. सम्यग्¹ष्िटके विषय-भोगादिकको निर्जराका कारण कहा है - इत्यादि कथन सुनकर जीव स्वच्छन्द होकर पुण्य छोड़कर पापमें प्रवर्त्तेंगे, इसलिये इनका पढ़ना-सुनना योग्य नहीं है.
उससे कहते हैं - जैसा गधा मिश्री खाकर मर जाये तो मनुष्य तो मिश्री खाना नहीं छोड़ेंगे। उसीप्रकार विपरीतबुद्धि अध्यात्मग्रंथ सुनकर स्वच्छन्द हो जायेतो विवेकी तो अध्यात्मग्रन्थोंका अभ्यास नहीं छोड़ेंगे. इतना करे कि जिसे स्वच्छन्द होता जाने, उसे जिसप्रकार वह स्वच्छन्द न हो उसप्रकार उपदेश दे. तथा अध्यात्मग्रंथोंमें भी स्वच्छन्द होनेका जहाँ तहाँ निषेध करते हैं, इसलिये जो भली-भांति उनको सुने वह तो स्वच्छन्द होता नहीं। परन्तु एक बात सुनकर अपने अभिप्रायसे कोई स्वच्छन्द हो तो ग्रन्थका तो दोष है नहीं, उस जीव ही का दोष है.
तथा यदि झूठे दोषकी कल्पना करके अध्यात्मशास्त्रोंको पढ़ने-सुननेका निषेध करेंे तो मोक्षमार्गका मूल उपदेश तो वहाँ है। उसका निषेध करनेसे तो मोक्षमार्गका निषेध होता है. जैसे - मेघवर्षा होने पर बहुत से जीवों का कल्याण होता है और किसी को उलटा नुकसान हो, तो उसकी मुख्यता करके मेघका तो निषेध नहीं करना। उसी प्रकार सभामें अध्यात्म उपदेश होने पर बहुत से जीवोंको मोक्षमार्गकी प्राप्ति होती है, परन्तु कोई उलटा पापमें प्रवर्ते, तो उसकी मुख्यता करके अध्यात्मशास्त्रोंका तो निषेध नहीं करना.
तथा अध्यात्मग्रन्थोंसे कोई स्वच्छन्द हो। सो वह तो पहले भी मिथ्या¹ष्िट था, अब भी मिथ्या¹ष्िट ही रहा. इतना ही नुकसान होगा की सुगति न होकर कुगति होगी. परन्तु अध्यात्म-उपदेश न होनेपर बहुत जीवोंके मोक्षमार्गकी प्राप्तिका अभाव होता है और इसमें बहुत जीवोंका बहुत बुरा होता है। इसलिये अध्यात्म-उपदेशका निषेध नहीं करना.
तथा कितने ही जीव कहते हैं कि द्रव्यानुयोगरूप अध्यात्म-उपदेश है वह उत्कृष्ट है। सो उच्चदशाको प्राप्त हों उनको कार्यकारी है। निचली दशावालोंको व्रतसंयमादिकका ही उपदेश देना योग्य है.
उनसे कहते हैं - जिनमतमें यह परिपाटी है कि पहले सम्यक्तत्व होता है फिर व्र्रत होतें हैं। वह सम्यक्तत्व स्व-पर का श्रद्धान होने पर होता है और वह श्रद्धान द्रव्यानुयोगका अभ्यास करने पर होता है। इसलिये प्रथम द्रव्यानुयोगके अनुसार श्रद्धान करके सम्यग्¹ष्िट हो, पश्चात् चरणानुयोगके अनुसार व्रतादिक धारण करके व्रती हो. -इसप्रकार मुख्य रूपसे तो निचली दशामें ही द्रव्यानुयोग कार्यकारी हेै। गौणरूप से जिसे मोक्षमार्गकी प्राप्ति होती न जाने उसे पहले किसी व्रतादिक का उपदेश देते हैं। इसलिये ऊँची दशावालोंको अध्यात्म- अभ्यास योग्य है ऐसा जानकर निचली दशावालोंको वहाँ से परा¢्मुख होना योग्य नहीं है.
तथा यदि कहोगे कि ऊँचे उपदेशका स्वरूप निचली दशावालोंको भासित नहीं होता.
उसका उत्तर यह है - और तो अनेक प्रकार की चतुराई जानें और यहाँ मूर्खपना प्रगट करें, वह योग्य नहीं है. अभ्यास करने से स्वरूप भली-भांति भासित होता है, अपनी बुद्धि अनुसार थोड़ा बहुत भासित हो। परन्तु सर्वथा निरुद्यमी होने का पोषण करें वह तो जिनमार्ग का द्वेषी होना है.
तथा यदि कहोगे कि यह काल निकृष्ट है, इसलिये उत्कृष्ट अध्यात्म-उपदेश की मुख्यता नहीं करना.
तोउनसेकहतेहैं-यहकालसाक्षात्मोक्षनहोनेकीअपेक्षानिकृष्टहै, आत्मानुभवनादिकद्वारासम्यक्तत्वादिकहोनाइसकालमेंमनानहींहै।इसलिये आत्मानुभवनादिकके अर्थ द्रव्यानुयोगका अवश्य अभ्यास करना.
वही षट्पाहुड़में(मोक्षपाहुड़में)कहा है :-
अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाऊण जंति सुरलोए.
लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुआ णिव्वुदिं जंति ॥७७॥
अर्थ :- आज भी त्रिरत्न से शुद्ध जीव आत्मा को ध्याकर स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं व लौकान्तिकमें देवपना प्राप्त करते हैं। वहाँ से च्युत होकर मोक्ष जाते हैं.बहुरि. इसलिये इस काल में भी द्रव्यानुयोगका उपदेश मुख्य चाहिये.
कोई कहता है - द्रव्यानुयोगमें अध्यात्म-शास्त्र हैं। वहाँ स्व-पर भेदविज्ञानादिकका उपदेश दिया वह तो कार्यकारी भी बहुत है और समझ में भी शीघ्र आता है। परन्तु द्रव्य- गुण-पर्यायादिकका व प्रमाण-नयादिकका व अन्यमतके कहे तत्त्ववादिकके निराकरणका कथन किया, सो उनके अभ्याससे विकल्प विशेष होते हैं और वे बहुत प्रयास करने पर जाननेमें आते हैं। इसलिये उनका अभ्यास नहीं करना.
उनसे कहते हैं - सामान्य जाननेसे विशेष जानना बलवान है. ज्यों-ज्यों विशेष जानता है त्यों-त्यों वस्तुस्वभाव निर्मल भासित होता है, श्रद्धान ¹ढ़ होता है, रागादि घटते हैं। इसलिये उस अभ्यासमें प्रवर्त्तना योग्य है.
इसप्रकार चारों अनुयोगों में दोष-कल्पना करके अभ्याससे परा¢्मुख होना योग्य नहीं है.

व्याकरण-न्यायादि शास्त्रोंकी उपयोगिता

तथा व्याकरण न्यायादिक शास्त्र हैं, उनका भी थोड़ा बहुत अभ्यास करना। क्तयोंकि उनके ज्ञान बिना बड़े शास्त्रोंका अर्थ भासित नहीं होता. तथा वस्तु का स्वरूप भी इनकी पद्धति जाननेपर जैसा भासित होता है वैसा भाषादिक द्वारा भासित नहीं होता। इसलिये परम्परा कार्यकारी जानकर इनका भी अभ्यास करना। परन्तु इन्हीं में फंस नहीं जाना. इनका कुछ अभ्यास करके प्रयोजनभूतशास्त्रोंके अभ्यास में प्रवर्त्तना.
तथा वैद्यकादि शास्त्र हैं उनसे मोक्षमार्गमें कुछ प्रयोजन ही नहीं है। इसलिये किसी व्यवहारधर्मकेअभिप्रायसेबिनाखेदकेइनकाअभ्यासहोजायेतोउपकारादिकरना, पापरूप नहीं प्रवर्त्तना। और इनका अभ्यास न हो तो मत होओ, कुछ बिगाड़ नहीं है.
इसप्रकार जिनमतके शास्त्र निर्दोष जानकर उनका उपदेश मानना.

अनुयोगोंमें दिखाई देनेे वाले परस्पर विरोधका निराकरण

अब, शास्त्रोंमें अपेक्षादिकको न जानने से परस्पर विरोध भासित होता है, उसका निराकरण करते हैं.
प्रथमादि अनुयोगोंकी आम्नायके अनुसार यहाँ जिस प्रकार कथन किया हो, वहाँ उसप्रकार जान लेना। अन्य अनुयोगके कथनको अन्य अनुयोगके कथनसे अन्यथा जानकर सन्देह नहीं करना. जैसे - कहीं तो निर्मल सम्यग्¹ष्िट के ही शंका, कांक्षा, विचिकित्साका अभाव कहा। कहीं भयका आठवें गुणस्थान पर्यंत, लोभका दसवें पर्यंत, जुगुप्साका आठवें पर्यंत उदय कहा। वहाँ विरुद्ध नहीं जानना. सम्यग्दृष्िटके श्रद्धानपूर्वक तीव्र शंकादिकका अभाव हुआ है अथवा मुख्यत: सम्यग्¹ष्िट शंकादि नहीं करता, उस अपेक्षा चरणानुयोगमें सम्यग्दृष्िटके शंकादिकका अभाव कहा है। परन्तु सूक्ष्मशक्ति की अपेक्षा भयादिकका उदय अष्टमादि गुणस्थान पर्यंत पाया जाता है, इसलिये करणानुयोगमें वहाँ तक उनका सद्भाव कहा है. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
पहले अनुयोगोंके उपदेश विधानमें कई उदाहरण कहें हैं, वह जानना अथवा अपनी बुद्धिसे समझ लेना.
तथा एक ही अनुयोगमें विवक्षावश अनेकरूप कथन करते हैं. जैसे - करणानुयोगमें प्रमादोंका सातवें गुणस्थान में अभाव कहा, वहाँ कषायादिक प्रमादके भेद कहे। तथा वहीं कषायादिकका सद्भाव दसवें आदि गुणस्थान पर्यंत कहा, वहाँ विरुद्ध नहीं जानना। क्तयोंकि यहाँ प्रमादोंमें तो जिन शुभाशुभभावोंके अभिप्राय सहित कषायादिक होते हैं उनका ग्रहण है, और सातवें गुणस्थानमें ऐसा अभिप्राय दूर हुआ है इसलिये उनका वहाँ अभाव कहा है. तथा सूक्ष्मादिभावोंकी अपेक्षा उन्हीं का दसवें आदि गुणस्थान पर्यंत सद्भाव कहा है.
तथा चरणानुयोगमें चोरी, परस्त्री आदि सप्तव्यसनका त्याग पहली प्रतिमा में कहा है, तथा वहीं उनका त्याग दूसरी प्रतिमा में कहा है, वहाँ विरुद्ध नहीं जानना। क्तयोंकि सप्तव्यसनमें तो चोरी आदि कार्य ऐसे ग्रहण किये हैं जिनसे दंडादिक पाता है, लोक में अति निन्दा होती है. तथा व्रतोंमें ऐसे चोरी आदि त्याग करने योग्य कहे हैं कि जो गृहस्थ धर्मसें विरुद्ध होते हैं व किंचित् लोकनिंद्य होतेे हैं - ऐसा अर्थ जानना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा नाना भाावों की सापेक्षता से एक ही भावका अन्य-अन्य प्रकार से निरूपण करते हैं. जैसे - कहीं तो महाव्रतादिकको चारित्र के भेद कहा, कहीं महाव्रतादि होने पर भीद्रव्यलिंगीकोअसंयमीकहा,वहाँविरुद्धनहींजानना।क्तयोंकिसम्यग्ज्ञानसहित महाव्रतादिक तो चारित्र हैं और अज्ञानपूर्वक व्रतादिक होने पर भी असंयमी ही है.
तथा जिस प्रकार पाँच मिथ्यात्वोंमें भी विनय कहा है और बारह प्रकार के तपोंमें भी विनय कहा है वहाँ विरुद्ध नहीं जानना। क्तयोंकि जो विनय करने योग्य नहीं हैं उनकी भी विनय करके धर्म मानना वह तो विनय मिथ्यात्व है, और धर्मपद्धति से जो विनय करने योग्य उनकी यथा योग्य विनय करनासो विनय तप है.
तथा जिसप्रकार कहीं तो अभिमान की निन्दा की, और कहीं प्रशंसा की वहाँ विरुद्ध नहीं जानना। क्तयोंकि मान कषायसे अपनेको ऊँचा मनवाने के अर्थ विनयादि न करे वह अभिमान तो निंद्य ही है, और निर्लोभपनेसे दीनता आदि न करे वह अभिमान प्रशंसा योग्य है.
तथा जैसे कहीं चतुराई कि निन्दा की, कहीं प्रशंसा की वहाँ विरुद्ध नहीं जानना। क्तयोंकि माया कषाय से किसीको ठगनेके अर्थ चतुराई करें वह तो निंद्य ही है, और विवेक सहित यथासम्भव कार्य करनेमें जो चतुराई हो वह श्लाध्य ही है. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा एक ही भावकी कहीं तो उससे उत्कृष्ट भाावकी अपेक्षा निन्दा की हो, और कहीं उससे हीन भावकी अपेक्षासे प्रशंसा की हो वहाँ विरुद्ध नहीं जानना. जैसे - किसी शुभक्रियाकी जहाँ निन्दा की हो वहाँ तो उससे ऊँची शुभक्रिया व शुद्धभावकी अपेक्षा जानना, और जहाँ प्रशंसा की हो वहाँ उससे नीची क्रिया व अशुभक्रियाकी अपेक्षा जानना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा इसीप्रकार किसी जीवकी ऊँचे जीवकी अपेक्षासे निन्दा की हो वहाँ सर्वथा निन्दा नहीं जानना, और किसीकी नीचे जीवकी अपेक्षासे प्रशंसा की हो सो सर्वथा प्रशंसा नहीं जानना। परन्तु यथासम्भव उसका गुण-दोष जान लेना.
इसीप्रकार अन्य व्याख्यान जिस अपेक्षा सहित किये हों उस अपेक्षासे उनका अर्थ समझना.
तथा शास्त्रमें एक ही शब्दका कहीं तो कोई अर्थ होता है, कहीं कोई अर्थ होता है। वहाँ प्रकरण पहिचानकर उसका सम्भवित अर्थ जानना. जैसे - मोक्षमार्गमें सम्यग्दर्शन कहा, वहाँ दर्शन शब्द का अर्थ श्रद्धान है और उपयोगवर्णनमें दर्शन शब्दका अर्थ वस्तुका सामान्य स्वरूप ग्रहण मात्र है, तथा इन्द्रियवर्णनमें दर्शन शब्दका अर्थ नेत्र द्वारा देखना मात्र है. तथा जैसे सूक्ष्म और बादरका अर्थ - वस्तुओंके प्रमाणादिक कथनमें छोटे प्रमाणसहित हो उसका नाम सूक्ष्म, और बड़े प्रमाणसहित हो उसका नाम बादर - ऐसा होता है. तथा पुद्गल स्कंधादिके कथनमें इन्द्रियगम्य न हो वह सूक्ष्म, और इन्द्रियगम्य हो वह बादर - ऐसा अर्थ है. जीवादिकके कथनमें ऋद्धि आदिके निमित्त बिना स्वयमेव न रुके उसका नाम सूक्ष्म और रुके उसका नाम बादर - ऐसा अर्थ है. वस्त्रादिकके कथन में महीन का नाम सूक्ष्म और मोटेका नाम बादर - ऐसा अर्थ है.
तथा प्रत्यक्ष शब्दका अर्थ लोकव्यवहारमें तो इन्द्रिय द्वारा जानने का नाम प्रत्यक्ष है, प्रमाणभेदोंमें स्पष्ट प्रतिभासका नाम प्रत्यक्ष है, आत्मानुभवनादिमें अपनेमें अवस्था हो उसका नाम प्रत्यक्ष है. तथा जैसे - मिथ्या¹ष्िट के अज्ञान कहा, वहाँ सर्वथा ज्ञान का अभाव नहीं जानना, सम्यग्ज्ञानके अभावसे अज्ञान कहा है. तथा जिस प्रकार उदीरणा शब्दका अर्थ जहाँ देवादिकके उदीरणा नहीं कही वहाँ तो अन्य निमित्तसे मरण हो उसका नाम उदीरणा है, और दस करणोंके कथनमें उदीरणाकरण देवायुके भी कहा है, वहाँ ऊपरके निषेकोंका द्रव्य उदयावली में दिया जाये उसका नाम उदीरणा है. इसीप्रकार अन्यत्र यथासम्भव अर्थ जानना.
तथा एक ही शब्द के पूर्व जोड़नेसे अनेक प्रकार अर्थ होते हैं व उसी शब्दके अनेक अर्थ हैं। वहाँ जैसा सम्भव हो वैसा अर्थ जानना. जैसे - ‘जीते’ उसका नाम ‘जिन’ है। परन्तु धर्मपद्धतिमें कर्मशत्रुको जीते उसका नाम ‘जिन’ जानना. यहाँ कर्मशत्रु शब्दको पहले जोड़नेसे जो अर्थ होता है वह ग्रहण किया अन्य नहीं किया, तथा जैसे ‘प्राण धारण करे उसका नाम जीव’ है. जहाँ जीवन-मरणका व्यवहार अपेक्षा कथन हो वहाँ तो इन्द्रियादि प्राणधारणकरेवहजीवहै।तथाद्रव्यादिककानिश्चयअपेक्षानिरूपणहोवहाँ चैतन्यप्राणको धारण करे वह जीव है. तथा जैसे - समय शब्द के अनेक अर्थ हैं। वहाँ आत्मा का नाम समय है, सर्व पदार्थ का नाम समय है, काल का नाम समय है, समयमात्र काल का नाम समय है, शाास्त्रका नाम समय है, मत का नाम समय है. इसी प्रकार अनेक अर्थों में जैसा जहाँ सम्भव हो वैसा अर्थ वहाँ जान लेना.
तथा कहीं तो अर्थ अपेक्षा नामादिक कहते हैं, कहीं रूढ़ी अपेक्षा नामादिक कहते हैं. जहाँ रूढ़ी अपेक्षा नामादिक लिखे हों वहाँ उनका शब्दार्थ ग्रहण नहीं करना। परन्तु उसका जो रूढ़ीरूप अर्थ हो वही ग्रहण करना. जैसे - सम्यक्तत्वादिको धर्म कहा वहाँ तो यह जीव को उत्तम स्थान में धारण करता है इसलिये इसका नाम सार्थ है। तथा धर्मद्रव्य का नाम धर्म कहा वहाँ रूढ़ी नाम है, इसका अक्षरार्थ ग्रहण नहीं करना, परन्तु इस नाम की धारक एक वस्तु है ऐसा अर्थ ग्रहण करना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा कहीं शब्दका जो अर्थ होता है वह तो ग्रहण नहीं करना, परन्तु वहाँ जो प्रयोजनभूत अर्थ हो वह ग्रहण करना. जैसे - कहीं किसी का अभाव कहा हो और वहाँ किंचित् सद्भाव पाया जाये तो वहाँ सर्वथा अभाव नहीं ग्रहण करना। किंचित् सद्भाव को गिनकर अभाव कहा है - ऐसा अर्थ जानना. सम्यग्दृष्िटके रागादिकका अभाव कहा, वहाँ इसीप्रकार अर्थ जानना. तथा नोकषाय का अर्थ तो यह है कि ‘कषाय का निषेध’। परन्तु यह अर्थ ग्रहण नहीं करना। यहाँ तो क्रोधादि समान यह कषाय नहीं हंै, किंचित् कषाय हैं, इसलिये नोकषाय - ऐसा अर्थ ग्रहण करना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथाजैसेकहींकिसीयुक्तिसेकथनकियाहो,वहाँप्रयोजनग्रहणकरना. समयसार कलशमें यह कहा है कि—धोबी के ¹ष्टान्तवत् परभाव के त्यागकी ¹ष्िट यावत् प्रवृत्तिको प्राप्त नहीं हुई तावत् यह अनुभूति प्रगट हुई। सो यहाँ यह प्रयोजन है कि परभावका त्याग होते ही अनुभूति प्रगट होती है. लोक में किसी के आते ही कोई कार्य हुआ हो, वहाँ ऐसा कहते हैं कि ‘यह आया ही नहीं और यह ऐसा कार्य हो गया.’ ऐसा ही प्रयोजन यहाँ ग्रहण करना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा जैसे कहीं कुछ प्रमाणादिक कहे हों, वहाँ वही नहीं मान लेना, परन्तु प्रयोजन हो वह जानना. ज्ञानार्णवमें ऐसा कहा है - ‘इस कालमें दो-तीन सत्पुरुष है’। सो नियमसे इतने ही नहीं है, परन्तु यहाँ ‘थोडे़ हैं’ ऐसा प्रयोजन जानना. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
इसी रीति सहित और भी अनेक प्रकार शब्दोंके अर्थ होते हैं, उनको यथासम्भव जानना, विपरीत अर्थ नहीं जानना.
तथा जो उपदेश हो, उसे यथार्थ पहिचानकर जो अपने योग्य उपदेश हो उसे अंगीकार करना. जैसे - वैद्यक शास्त्रोंमें अनेक औषधियाँ कहीं हैं, उनको जाने। परन्तु ग्रहण उन्हीं का करे जिनसे अपना रोग दूर हो. अपने को शीत का रोग हो तो उष्ण औषधि का ही ग्रहण करे, शीतल औषधिका ग्रहण न करे। यह औषधि औरोंको कार्यकारी है, ऐसा जाने. उसी प्रकार जैन शाास्त्रोंमें अनेक उपदेश हैं, उन्हें जाने। परन्तु ग्रहण उसी काकरेजिनसेअपनाविकारदूरहोजाये.अपनेकोजोविकारहोउसका निषेधकरनेवाले उपदेश को ग्रहण करे, उसके पोषक उपदेश को ग्रहण न करे। यह उपदेश औरोंको कार्यकारी है ऐसा जाने.
यहाँ उदाहरण कहते हैं - जैसे शास्त्रोंमें कहीं निश्चयपोषक उपदेश है, कहीं व्यवहारपोषकउपदेशहै.वहाँअपनेकोव्यवहारकाआधिक्तयहोतोनिश्चयपोषक उपदेशकाग्रहणकरकेयथावत्प्रवर्त्ते,औरअपनेकोनिश्चयकाआधिक्तयहोतो व्यवहारपोषक उपदेश का ग्रहण करके यथावत् प्रवर्त्ते. तथा पहले तो व्यवहार श्रद्धान के कारण आत्मज्ञान से भ्रष्ट हो रहा था, पश्चात् व्यवहार उपदेश ही की मुख्यता करके आत्मज्ञान का उद्यम न करे। अथवा पहले तो निश्चय श्रद्धान के कारण वैराग्य से भ्रष्ट होकर स्वच्छन्दी हो रहा था, पश्चात् निश्चय उपदेश ही की मुख्यता करके विषय-कषायका पोषण करता है. इसीप्रकार विपरीत उपदेश ग्रहण करने से बुरा ही होता है.
तथा जैसे आत्मानुशासनमें ऐसा कहा है कि—तू गुणवान होकर दोष क्तयों लगाता है? दोषवान होना था तो दोषमय ही क्तयों नहीं हुआ?सो यदि जीव आपतो गुणवान हो और कोई दोष लगता हो वहाँ वह दोष दूर करने के लिये उस उपदेश को अंगीकार करना. तथा आप तो दोषवान है और इस उपदेशका ग्रहणकरके गुणवान पुरुषोंको नीचा दिखलाये तो बुरा ही होगा. सार्व दोषमय होने से तो किंचित् दोषरूप होना बुरा नहीं है, इसलिये तुझसे तो वह भला है. तथा यहाँ यह कहा है कि—तू दोषमय ही क्तयों नहीं हुआ?सो यह तो तर्क किया है, कहीं सर्व दोषमय होने के अर्थ यह उपदेश नहीं है. तथा यदि गुणवान की किंचित् दोष होने पर भी निन्दा है तो दोषरहित तो सिद्ध है। निचली दशामें तो कोई गुण, कोई दोष होता ही है.
यहाँ कोई कहे - ऐसा है तो—मुनिलिंग धारण करके किंचित् परिग्रह रखे वह भी निगोद जाता है- ऐसा षट्पाहुडमें कैसे कहा है?
उत्तर :- ऊँची पदवी धारण करके उस पदमें सम्भवित नहीं है ऐसे नीचे कार्य करे तो प्रतिज्ञाभंगादि होने से महादोष लगता है, और नीची पदवी में वहाँ सम्भवित ऐसे गुण- दोष हों तो हों, वहाँ उसका दोष ग्रहण करना योग्य नहीं है - ऐसा जानना.
तथा उपदेशसिद्धान्तरत्नमालामें कहा है - ‘आज्ञानुसार उपदेश देने वालेका क्रोध भी क्षमा का भंडा़र है’। परन्तु यह उपदेश वक्ताको ग्रहण करने योग्य नहीं है. इन उपदेश से वक्ता क्रोध करता रहेतो उसका बुरा ही होगा. यह उपदेश श्रोताओंके ग्रहण करने योग्य है. कदाचित् वक्ता क्रोध करके भी सच्चा उपदेश दे तो श्रोता गुण ही मानेंगे. इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा जैसे किसीको अति शीतांग रोग हो उसके अर्थ अति उष्ण रसादिक औषधियाँ कही हैं। उन औषधियोंको जिसके दाह हो व तुच्छ शीत हो वह ग्रहण करे तो दु:ख ही पायेगा. उसी प्रकार किसीके किसी कार्य की अति मुख्यता हो उसके अर्थ उसके निषेधका अति खींचकर उपदेश दिया हो। उसे जिसके उस कार्य की मुख्यता न हो व थोड़ी मुख्यता हो वह ग्रहण करे तो बुरा ही होगा.
यहाँ उदाहरण - जैसे किसी के शास्त्राभ्यास की अति मुख्यता है और आत्मानुभवका उद्यमहीनहींहै,उसकेअर्थबहुतशास्त्राभ्यासकानिषेधकियाहै.तथाजिसके शास्त्राभ्यास नहीं है व थोड़ा शास्त्राभ्यास है, वह जीव उस उपदेशसे शास्त्राभ्यास छोड़ दे और आत्मानुभवमें उपयोग न रहे तब उसका तो बुरा ही होगा.
तथा जैसे किसीके यज्ञ-स्नानादि द्वारा हिंसासे धर्म मानने की मुख्यता है, उसके अर्थ - ‘यदि पृथ्वी उलट जाये तब भी हिंसा करनेसे पुण्यफल नहीं होता’ - ऐसा उपदेश दिया है. तथा जो जीव पूजनादि कार्यों द्वारा किंचित् हिंसा लगाता है और बहुत पुण्य उपजाता है, वह जीव इस उपदेशसे पूजनादि कार्य छोड़ दे और हिंसा रहित सामायिकादि धर्ममें लगे नहीं तब उसका तो बुरा ही होगा. इसप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा जैसे कोई औषधि गुणकारी है। परन्तु अपनेको जब तक उस औषधिसे हित हो तब तक उसका ग्रहण करे। यदि शीत मिटने पर भी उष्ण औषधिका सेवन करता ही रहे तो उल्टा रोग होगा. उसी प्रकार कोई धर्म कार्य है। परन्तु अपने को जब तक उस धर्म कार्यसे हित हो तब तक उसका ग्रहण करे। यदि उच्च दशा होनेपर निचली दशा सम्बन्धी धर्म के सेवनमें लगे तो उल्टा विकार ही होगा.
यहाँ उदाहरण - जैसे पाप मिटनेके अर्थ प्रतिक्रमणादि धर्मकार्य कहे हैं। परन्तु आत्मानुभव होनेपर प्रतिक्रमणादिका विकल्प करे तो उल्टा विकार बढ़ेगा। इसीसे समयसार में प्रतिक्रमणादिकको विष कहा है. तथा जैसे अव्रती को करने योग्य प्रभावना आदि धर्मकार्य कहे हैं, उन्हें व्रती होकर करे तो पाप ही बाँधेगा. व्यापारादि आरम्भ छोड़कर चैत्यालयादि कार्योंका अधिकारी हो यह कैसे बनेगा? इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
तथा जैसे पाकादिक औषधियाँ पुष्िटकारी हैं, परन्तु ज्वरवान् उन्हें ग्रहण करे तो महादोष उत्पन्न हो, उसी प्रकार ऊँचा धर्म बहुत भला है, परन्तु अपने विकार भाव दूर न हो और ऊँचेधर्म का ग्रहण करे तो महान दोष उत्पन्न होगा. यहाँ उदाहरण - जैसे अपना अशुभ विकार भी नहीं छूटा हो और निर्विकल्प दशाको अंगीकार करे तो उल्टा विकार बढे़गा। तथा भोजनादि विषयोंमें आसक्त हो और आरम्भत्यागादि धर्मको अंगीकार करे तो दोष ही उत्पन्न होगा. तथा जैसे व्यापारादि करनेका विकार तो छूटे नहीं और त्यागके भेष रूप धर्म अंगीकार करे तो महान दोष उत्पन्नहोगा. इसी प्रकार अन्यत्र जानना.
इसीप्रकार और भी सच्चे विचारसे उपदेश को यथार्थ जानकर अंगीकार करना. बहुत विस्तार कहाँ तक कहें। अपनेको सम्यग्ज्ञान होनेपर स्वयं ही को यथार्थ भासित होता है. उपदेश तो वचनात्मक है तथा वचन द्वारा अनेक अर्थ युगपत् नहीं कहे जाते। इसलिये उपदेश तो एक ही अर्थ की मुख्यता सहित होता है.
तथा जिस अर्थ का जहाँ वर्णन है, वहाँ उसीकी मुख्यता है। दूसरे अर्थकी वहीं मुख्यता करे तो दोनों उपदेश ¹ढ़ नहीं होंगे। इसलिये उपदेशमें एक अर्थको ¹ढ़ करे। परन्तु सर्व जिनमतका चिî स्याद्वाद है और ‘स्यात्’ पदका अर्थ ‘कथंचित्’ है। इसलिये जो उपदेश हो उसे सर्वथा नहीं जान लेना. उपदेश के अर्थको जान कर वहाँ इतना विचार करना कि यह उपदेश किस प्रकार है, किस प्रयोजन सहित है, किस जीव को कार्यकारी है? इत्यादि विचार करके उसका यथार्थ अर्थ ग्रहण करे. पश्चात् अपनी दशा देखे. जो उपदेश जिस प्रकार अपनेको कार्यकारी हो उसे उसी प्रकार आप अंगीकार करे। और जो उपदेश जानने योग्य ही हो तो उसे यथार्थ जान ले. इसप्रकार उपदेशके फलको प्राप्त करे.
यहाँ कोई कहे - जो तुच्छ बुद्धि इतना विचार न कर सके वह क्तया करे?
उत्तर :- जैसे व्यापारी अपनी बुद्धिके अनुसार जिसमें समझे सो थोड़ा या बहुत व्यापार करे, परन्तु नफा-नुकसान का ज्ञान तो अवश्य होना चाहिये. उसी प्रकार विवेकी अपनी बुद्धिके अनुसार जिसमें समझे सो थोड़े या बहुत उपदेश को ग्रहण करे, परन्तु मुझे यह कार्यकारी है, यह कार्यकारी नहीं है - इतना तो ज्ञान अवश्य होना चाहिये. सो कार्य तो इतना है कि यथार्थ श्रद्धान-ज्ञान करके रागादि घटाना. सो यह कार्य अपना सिद्ध हो उसी उपदेश का प्रयोजन ग्रहण करे। विशेष ज्ञान न हो तो प्रयोजन को तो नहीं भूले। इतनी तो सावधानी अवश्य होना चाहिये. जिसमें अपने हितकी हानि हो, उसप्रकार उपदेश का अर्थ समझना योग्य नहीं है.
इसप्रकार स्याद्वाद¹ष्िट सहित जैन शाास्त्रोंका अभ्यास करने से अपना कल्याण होता है.
यहाँ कोई प्रश्न करे - जहाँ अन्य-अन्य प्रकार सम्भवित हों वहाँ तो स्याद्वाद सम्भव है। परन्तु एक ही प्रकार से शाास्त्रमें परस्पर विरोध भासित हो वहाँ क्तया करे? जैसे - प्रथमानुयोगमें एक तीर्थंकरके साथ हजारों मोक्ष गये बतलाये हैं। करणानुयोगमें छह महीना आठ समयमें छहसो आठ जीव मोक्ष जाते हैं - ऐसा नियम कहा है. प्रथमानुयोगमें ऐसा कथन किया है कि देव-देवांगना उत्पन्न होकर फिर मरकर साथ ही मनुष्यादि पर्याय मेंउत्पन्नहोतेहैं.करणानुयोगमेंदेवकीआयुसागरोंप्रमाणऔरदेवांगनाकीआयु पल्योंप्रमाण कही है. - इत्यादि विधि कैसे मिलती है?
उत्तर :- करणानुयोगमें जो कथन है वह तो तारतम्य सहित है, और अन्य अनुयोग में कथन प्रयोजनानुसार है। इसलिये करणानुयोगका कथन तो जिस प्रकार किया है उसी प्रकार है। औरोंके कथनकी जैसे विधि मिले वैसा मिला लेना. हजारों मुनि तीर्थंकरके साथ मोक्ष गये बतलाये, वहाँ यह जानना कि एक ही कालमें इतने मोक्ष नहीं गये हैं, परन्तु जहाँ तीर्थंकर गमनादि क्रिया मिटाकर स्थारि हुए, वहाँ उनके साथ इतने मुनि तिष्ठे, फिर आगे- पीछे मोक्ष गये. इसप्रकार प्रथमानुयोग और करणानुयोगका विरोध दूर होता है. तथा देव- देवांगना साथ उत्पन्न हुए, फिर देवांगना ने चयकर बीचमें अन्य पर्याय धारण कीं, उनका प्रयोजन न जानकर कथन नहीं किया. फिर वे साथ मनुष्यपर्यायमें उत्पन्न हुए. इसप्रकार विधि मिलाने से विरोध दूर होता है. इसीप्रकार अन्यत्र विधि मिला लेना.
फिर प्रश्न है कि इसप्रकार के कथनोंमें भी किसी प्रकार विधि मिलती है. परन्तु कहीं नेमिनाथ स्वामी का सौरीपुर में, कहीं द्वारावती में जन्म कहा। तथा रामचन्द्रादिककी कथा अन्य-अन्य प्रकारसे लिखी है इत्यादि। एकेन्द्रियादिको कहीं सासादन गुणस्थान लिखा, कहीं नहीं लिखा इत्यादि। - इन कथनोंकी विधि किस प्रकार मिलेगी?
उत्तर :- इसप्रकार विरोध सहित कथन काल दोषसे हुए हैं. इस काल में प्रत्यक्ष- ज्ञानी व बहुश्रुतोंका तो आभाव हुआ और अल्पबुद्धि ग्रंथ करने के अधिकारी हुए उनको भ्रम से कोई अर्थ अन्यथा भासित हुआ उसको ऐसे लिखा। अथवा इस काल में कितने ही जैनमत में भी कषायी हुए हैं सो उन्होनें कोई कारण पाकर अन्यथा कथन लिखे हैं. इसप्रकार अन्यथा कथन हुए, इसलिये जैनशाास्त्रों में विरोध भासित होने लगा.
जहाँ विरोध भासित हो वहाँ इतना करना कि यह कथन करनें वाले बहुत प्रामाणिक हैं या यह कथन करनें वाले बहुत प्रामाणिक हैं? ऐसे विचार करके बडे़ आचार्यादिकोंं का कहा हुआ कथन प्रमाण करना. तथा जिनमत के बहुत शाास्त्र हैं उनकी आम्नाय मिलाना. जो कथन परम्परा आम्नाय से मिलें उस कथन को प्रमाण करना. इसप्रकार विचार करने पर भी सत्य-असत्य का निर्णय न हो सके तो ‘जैसे केवली को भासित हुए हैं वैसे प्रमाण हैं’ ऐसा मान लेना, क्तयोंकि देवादिकका व तत्त्ववोंका निर्धार हुए बिना तो मोक्षमार्ग होता नहीं है. उसका तो निर्धार भी हो सकता है, इसलिये कोई उनका स्वरूप विरुद्ध कहे तो आप ही को भासित हो जायेगा. तथा अन्य कथन का निर्धार न हो, या संशयादि रहें, या अन्यथा भी जानपना हो जाये। और केवली का कहा प्रमाण है - ऐसा श्रद्धान रहे तो मोक्षमार्गमें विध्न नहीं है, ऐसा जानना.
यहाँ कोई तर्क करे कि जैसे नानाप्रकार के कथनजिनमत में कहे हैं वैसे अन्यमत में भी कथन पाये जाते हैं. सो अपने मत के कथन का तो तुमने जिस-तिसप्रकार स्थापन किया और अन्यमत में ऐसे कथन को तुम दोष लगाते हो? यह तो तुम्हे राग-द्वेष है?
समाधान :- कथन तो नाना प्रकार के हों और एक ही प्रयोजन का पोषण करें तो कोई दोष नहीं, परन्तु कहीं किसी प्रयोजनका और कहीं किसी प्रयोजन का पोषण करें तो दोष ही है. अब, जिनमतमें तो एक रागादि मिटानेका प्रयोजन है। इसलिये कहीं बहुत रागादि छुड़ाकर थोडे़ रागादि करानेके प्रयोजन का पोषण किया है, कहीं सर्व रागादि मिटानेके प्रयोजन का पोषण किया है। परन्तु रागादि बढ़ाने का प्रयोजन कहीं नहीं है, इसलिये जिनमत का सर्व कथन निर्दोष है. और अन्यमत में कहीं रागादि मिटाने के प्रयोजन सहित कथन करते हैं,कहीं रागादि बढ़ानेके प्रयोजन सहित कथन करते हैं। इसी प्रकार अन्य भी प्रयोजन की विरूद्धता सहित कथन करते हैं,इसलिये अन्यमतका कथन सदोष है. लोक में भी एक प्रयोजन का पोषण करने वाले नाना कथन कहे उसे प्रामाणिक कहा जाता है और अन्य-अन्य प्रयोजन का पोषण करनेवाली बात करेे उसे बावला कहते हैं.
तथा जिनमत में नानाप्रकार के कथन हैं सो भिन्न-भिन्न अपेक्षा सहित हैं वहाँ दोष नहीं है. अन्यमतमें एक ही अपेक्षा सहित अन्य-अन्य कथन करते हैं वहाँ दोष है. जैसे - जिनदेवके वीतरागभाव हैं और समवसरणादि विभूति भी पायी जाती है, वहाँ विरोध नहीं है. समवसरणादि विभूति की रचना इन्द्रादिक करते हैं, उनको उसमें रागादिक नहीं है, इसलिये दोनों बातें सम्भवित है. और अन्यमत में ईश्वर को सााक्षीभूत वीतराग भी कहते हैं तथा उसी के द्वारा किये गये काम-क्रोधादिभाव निरूपित करते हैं, सो एक आत्मा को ही वीतरागपना और काम-क्रोधादि भाव कैसे सम्भवित हैं? इसीप्रकार अन्यत्र जानना.
तथा काल दोष में जिनमत में एक ही प्रकारसे कोई कथन विरुद्ध लिखे हैं, सो यह तुच्छबुद्धियों कि भूल है, कुछ मतमें दोष नहीं है. वहाँ भी जिनमतका अतिशय इतना है कि प्रमाणविरुद्ध कथन कोई नहीं कर सकता. कहीं सौरीपुरमें, कहीं द्वारावतीमें नेमिनाथ स्वामी का जन्म लिखा है। सो कहीं भी हो, परन्तु नगरमें जन्म होना प्रमाणविरुद्ध नहीं है, आज भी होते दिखायी देते हैं.
तथा अन्यमतमें सर्वज्ञादिक यथार्थ ज्ञानियोंके रचे हुए ग्रन्थ बतलाते हैं, परन्तु उनमें परस्पर विरुद्धता भासित होती है. कहीं तो बालब्रह्मचारी की प्रशंसा करते हैं, कहीं कहते हैं -‘पुत्र बिना गति नहीं होती’ - सो दोनों सच्चे कैसे हों? ऐसे कथन वहाँ बहुत पाये जाते हैं. तथा उनमें प्रमाणविरुद्ध कथन पाये जाते हैं. जैसे - ‘मुखमें वीर्य गिरनेसे मछली के पुत्र हुआ’, सो ऐसा इस काल में किसी के होता दिखायी नहीं देता, और अनुमान से भी नहीं मिलता - ऐसे कथन भी बहुत पाये जाते हैं. यदि यहाँ सर्वज्ञादिककी भूल मानें तो वे कैसे भूलेंगे? और विरुद्ध कथन मानने में नहीं आता। इसलिये उनके मतमें दोष ठहराते हैं. ऐसा जानकर एक जिनमत का ही उपदेश ग्रहण करने योग्य है.

अनुयोगोंका अभ्यासक्रम

वहाँ प्रथमानुयोगादिकका अभ्यास करना. पहले इसका अभ्यास करना, फिर इसका करना ऐसा नियम नहीं है, परन्तु अपने परिणामोंकी अवस्था देखकर जिसके अभ्याससे अपनी धर्ममें प्रवृत्ति हो उसी का अभ्यास करना. अथवा कभी किसी शाास्त्रका अभ्यास करे, कभी किसी शाास्त्रका अभ्यास करे. तथा जैसे - रोजनामचेमें तो अनेक रकमें जहाँ-तहाँ लिखी हैं, उनकी खातेमें ठीक खतौनी करे तो लेन-देन का निश्चय हो। उसी प्रकार शास्त्रोंमें तो अनेक प्रकार का उपदेश जहाँ-तहाँ दिया है, उसे सम्यग्ज्ञान में यथार्थ प्रयोजन सहित पहिचानेतो हित-अहित का निश्चय हो.
इसलिये स्यात्पदकी सापेक्षता सहित सम्यग्ज्ञान द्वारा जो जीव जिनवचनोंमें रमते हैं, वे जीव शीघ्र हीशुद्धात्मस्वरूप को प्राप्त होते हैं. मोक्षमार्ग में पहला उपाय आगमज्ञान कहा है, आगमज्ञान बिना धर्म का साधन नहीं हो सकता, इसलिये तुम्हें भी यथार्थ बुद्धि द्वारा आगमका अभ्यास करना. तुम्हारा कल्याण होगा.
-इति श्री मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्रमें उपदेशस्वरूपप्रतिपादक
आठवाँ अधिकार सम्पूर्ण हुआ ॥८॥

नौवाँ अधिकार

मोक्षमार्गका स्वरूप

दोहा -शिव उपाय करतें प्रथम, कारन मंगलरूप .
विघन विनाशक सुखकरन, नमौं शुद्ध शिवभूप ..
अब, मोक्षमार्ग का स्वरूप कहते हैं. प्रथम मोक्षमार्गके प्रतिपक्षी जो मिथ्यादर्शनादिक उनका स्वरूप बतलाया - उन्हें तो दु:खरूप, दु:खका कारण जानकर, हेय मानकर उनका त्याग करना. तथा बीचमें उपदेश का स्वरूप बतलाया उसे जानकर उपदेश को यथार्थ समझना.अब,मोक्षकेमार्गजोसम्यग्दर्शनादिकउनकास्वरूपबतलातेहैं-उन्हें सुखरूप, सुखका कारण जानकर, उपादेय मानकर अंगीकार करना। क्तयोंकि आत्माका हित मोक्ष ही है। उसी का उपाय आत्मा का कर्त्तव्य है। इसलिये उसी का उपदेश यहाँ देते हैं.

आत्माका हितमोक्ष ही है

वहाँ आत्मा का हित मोक्ष ही है, अन्य नहीं। ऐसा निश्चय किसप्रकार होता है सो कहते हैं.
आत्माके नानाप्रकार गुण- पर्यायरूप अवस्थाएँ पायी जाती है। उनमें अन्य तो कोई अवस्था हो, आत्माका कुछ बिगाड़-सुधार नहीं है। एक दु:ख-सुख अवस्थासे बिगाड़-सुधार है. यहाँ कुछ हेतु-दृष्टांत नहीं चाहिये। प्रत्यक्ष ऐसा ही प्रतिभासित होता है.
ल्ोक में जितने आत्मा हैं उनके एक उपाय यह पाया जाता है कि दु:ख न हो, सुख हो। तथा अन्य भी जितने उपाय करते हैं वे सब एक इसी प्रयोजन सहितकरते हैं, दूसरा प्रयोजन नहीं है. जिनके निमित्तसे दु:ख होता जानें उनको दूर करनेका उपाय करते हैं, और जिनके निमित्त से सुख होता जानें उनके होनेका उपाय करते हैं.
तथा संकोच-विस्तार आदि अवस्था भी आत्मा के ही होती है, व अनेक परद्रव्यों का भी संयोग मिलता है। परन्तु जिनसे सुख-दु:ख होता न जाने, उनके दूर करनेका व होनेका कुछ भी उपाय कोई नहीं करता.
सो यहाँ आत्मद्रव्यका ऐसा ही स्वभाव जानना. और तो सर्व अवस्थाओंको सह सकता है, एक दु:खको नहीं सह सकता. परवशता से दु:ख हो तो यह क्तया करे, उसे भोगताहै।परन्तुस्ववशतासेकिंचित्भीदु:खकोसहननहींकरता.तथासंकोच- विस्तारादि अवस्था जैसी हो वैसी होओ, उसे स्ववशता से भी भोगता है। वहाँ स्वभाव में तर्क नहीं है. आत्माका ऐसा ही स्वभाव जानना.
देखो, दु:खी हो तब सोना चाहता है। वहाँ सोनेमें ज्ञानादिक मन्द हो जाते हैं, परन्तु जड़ सरीखा भी होकर दु:खको दूर करना चाहता है. तथा मरना चाहता है। वहाँ मरने में अपना नाशमानता है, परन्तु अपना अस्तित्व खोकर भी दु:ख दूर करना चाहता है. इसलिये एक दु:खरूप पयार्यका अभाव करना ही इसका कर्त्तव्य है.
तथा दु:ख न हो वही सुख है। क्तयोंकि आकुलतालक्षणसहित दु:ख उसका अभाव ही निराकुललक्षण सुख है। सो यह भी प्रत्यक्ष भाासित होता है. बाह्य किसी सामग्री का संयोग मिलो - जिसके अंतरंगमें आकुलता है वह दु:खी ही है। जिसके आकुलता नहीं है वह सुखी है.तथाआकुलताहोतीहैवहरागादिककषायभावहोनेपरहोतीहै।क्तयोंकि रागादिभावोंसे यह तो द्रव्योंको अन्य प्रकार परिणमित करना चाहे, और वे द्रव्य अन्य प्रकार परिणमित हों। तब इसके आकुलता होती है. वहाँ या तो अपने रागादि दूर हों, या आप चाहे उसी प्रकार सर्वद्रव्य परिणमित हों तो आकुलता मिटे। परन्तु स्वद्रव्य तो इसके आधीन नहीं है. कदाचित् कोई द्रव्य जैसी इसकी इच्छा हो उसी प्रकार परिणमित हो, तब भी इसकी आकुलता सर्वथा दूर नहीं होती। सर्व कार्य जैसे वह चाहे वैसे ही हों, अन्यथा न हों, तब वह निराकुल रहे। परन्तु यह तो हो ही नहीं सकता।क्तयोंकि किसी द्रव्य का परिणमन किसी द्रव्य के आधीन नहीं है. इसलिये अपने रागादिभाव दूर होने पर निराकुलता हो। सो यह कार्य बन सकता है।क्तयोंकि रागादिभाव आत्मा के स्वभाव भाव तो हैं नहीं, औपाधिकभाव हैं, परनिमित्तसे हुए हैं, और वह निमित्त मोहकर्मका उदय है। उसका अभाव होने पर सर्व रागादिक विलय हो जायें तब आकुलता का नाश होने पर दु:ख दूर हो, सुखकी प्राप्ति हो. इसलिये मोहकर्मका नाश हितकारी है.
तथा उस आकुलता का सहकारी कारण ज्ञानावरणादिकका उदय है. ज्ञानावरण, दर्शनावरणके उदयसे ज्ञान-दर्शन सम्पूर्ण प्रगट नहीं होते। इसलिये इसको देखने-जानने की आकुलता होती है. अथवायथार्थ सम्पूर्ण वस्तु का स्वभाव नहीं जानता तब रागादिरूप होकर प्रवर्तता है, वहाँ आकुलता होती है.
तथा अंतरायके उदय से इच्छानुसार दानादि कार्य न बनें, तब आकुलता होती है. उनका उदय है वह मोहका उदय होनेपर आकुलताको सहकारी कारण है। मोहके उदयका नाश होनेपर उनका बल नहीं है। अंतर्मुहूर्तकालमें अपने आप नाशको प्राप्त होते हैं। परन्तु सहकारी कारण भी दूर हो जाये तब प्रगटरूपन निराकुल दशा भासित होती है. वहाँ केवलज्ञानी भगवान अनन्तसुखरूप दशाको प्राप्त कहे जाते हैं.
तथा अघाति कर्मोंके उदयके निमित्तसे शरीरादिकका संयोग होता है। वहाँ मोहकर्मका उदय होनेसे शरीरादिकका संयोग आकुलताको बाह्य सहकारी कारण है. अन्तरंग मोहके उदय से रागादिक हों, और बाह्य अघाति कर्मों के उदयसे रागादिकके कारण शरीरादिकका संयोग हो - तब आकुलता उत्पन्न होती है. तथा मोहके उदय का नाश होनेपर भी अघाति कर्मका उदय रहता है, वह कुछ भी आकुलता उत्पन्न नहीं कर सकता। परन्तु पूर्वमें आकुलता का सहकारी कारण था, इसलिये अघाति कर्मका भी नाश आत्मा को इष्ट ही है. केवलीको इनके होने पर भी कुछ दु:ख नहीं है, इसलिये इनके नाश का उद्यम भी नहीं है। परन्तु मोहका नाश होनेपर यह कर्म अपने आप थोडे़ ही कालमें सर्वनाशको प्राप्त हो जाते हैं.
इसप्रकार सर्व कर्मोंका नाश होना आत्माका हित है. तथा सर्व कर्मके नाशहीका नाम मोक्ष है. इसलिये आत्माका हित एक मोक्षही है, और कुछ नहीं - ऐसा निश्चय करना.
यहाँ कोई कहे - संसारदशामें पुण्यकर्म का उदय होनेपर भी जीव सुखी होता है। इसलिये केवल मोक्षही हित है ऐसा किसलिये कहते हैं?
समाधान :- संसारदशामें सुख तो सर्वथा है ही नहीं। दु:ख ही है. परन्तु किसी के कभी बहुत दु:ख होता है, किसी के कभी थोड़ा दु:ख होता है। सो पूर्वमें बहुत दु:ख था व अन्य जीवों के बहुत दु:ख पाया जाता है, उस अपेक्षा से थोडे़ दु:ख वाले को सुखी कहते हैं. तथा उसी अभिप्राय से थोडे़ दु:खवाला अपनेको सुखी मानता है। परमार्थसे सुख है नहीं . तथा यदि थोड़ा भी दु:ख सदाकाल रहता हो तो उसे भी हितरूप ठहरायें, सो वह भी नहीं है। थोडे़ कालही पुण्य का उदय रहता है, और वहाँ थोड़ा दु:ख होता है, पश्चात् बहुत दु:ख हो जाता है। इसलिये संसार अवस्था हितरूप नहीं है.
जैसे - किसीको विषमज्वर है। उसको कभी असाता बहुत होती है, कभी थोड़ी होती है. थोड़ी असाता होतो वह अपनेको अच्छा मानता है. लोगभी कहते हैं - अच्छा है। परन्तु परमार्थसे जबतक ज्वरका सद्भाव है तबतक अच्छा नहीं है. उसीप्रकार संसारीको मोहका उदय है। उसको कभी आकुलता बहुत होती है, कभी थोड़ी होती है. थोड़ी आकुलता हो तब वह अपने को सुखी मानता है. लोग भी कहते हैं - सुखी है। परन्तु परमार्थसे जबतक मोहका सद्भाव है तबतक सुख नहीं है.
तथा सुनो, संसारदशामें भी आकुलता घटने पर सुख नाम पाता है, आकुलता बढ़नेपर दु:ख नाम पाता है। कहीं बाह्य सामग्रीसे सुख-दु:ख नहीं है. जैसे - किसी दरिद्रीको किंचित् धन की प्राप्ति हुई - वहाँ कुछ आकुलता घटनेसे उसे सुखी कहते हैं, और वह भी अपने को सुखी मानता है. तथा किसी बहुत धनवान को किंचित् धन की हानि हुई - वहाँ कुछ आकुलता बढ़नेसे उसे दु:खी कहते हैं, और वह भी अपनेको दु:खी मानता है.
इसी प्रकार सर्वत्र जानना.
तथाआकुलताघटना-बढ़नाभीबाह्यसामग्रीकेअनुसारनहींहै,कषायभावोंके घटने-बढ़ने के अनुसार है. जैसे - किसीके थोड़ा धन है और उसे सन्तोष है, तो उसे आकुलता थोड़ी है। तथा किसी के बहुत धन है और उसके तृष्णा है, तो उसे आकुलता बहुत है. तथा किसी को किसी ने बहुत बुरा कहा और उसे क्रोध नहीं हुआ तो उसको आकुलता नहीं होती। और थोड़ी बातें कहनेसे ही क्रोध हो आये तो उसको आकुलता बहुत होती है. तथा जैसे गायको बछडे़ से कुछ भी प्रयोजन नहीं है, परन्तु मोह बहुत है, इसलिये उसकी रक्षा करनेकी बहुत आकुलता होती है। तथा सुभटके शरीरादिकसे बहुत कार्य सधते हैं, परन्तु रण में मानादिकके कारण शरीरादिकसे मोह घट जाये, तब मरनेकी भी थोड़ी आकुलता होती है. इसलिये ऐसा जानना कि संसारअवस्थामें भी आकुलता घटने-बढ़नेसे ही सुख-दु:ख माने जाते हैं. तथा आकुलताका घटना-बढ़ना रागादिक कषाय घटने-बढ़नेके अनुसार है.
तथापरद्रव्यरूप बाह्यसामग्री के अनुसार सुख-दु:ख नहीं है. कषायसे इसके इच्छा उत्पन्न हो और इसकी इच्छा अनुसार बाह्यसामग्री मिले, तब इसके कुछ कषाय का उपशमन होने से आकुलता घटती है, तब सुख मानता है - और इच्छानुसार सामग्री नहीं मिलती, तब कषाय बढ़नेसे आकुलता बढ़ती है, और दु:ख मानता है. सो है तो इसप्रकार। परन्तु यह जानता है कि मुझे परद्रव्य के निमित्तसे सुख-दु:ख होते हैं. ऐसा जानना भ्रम ही है. इसलिये यहाँ ऐसा विचार करना कि संसार अवस्थामें किंचित़ कषाय घटने से सुख मानते हैं, उसे हित जानते हैं। - तो जहाँ सर्वथा कषाय दूर होनेपर व कषायके कारण दूर होने पर परम निराकुलता होनेसे अनन्त सुख प्राप्त होता है - ऐसी मोक्ष अवस्थाको कैसे हित न माने?
तथा संसार अवस्थामें उच्चपदकोप्राप्त करे तो भी या तो विषयसामग्री मिलाने की आकुलता होती है, या विषम सेवन की आकुलता होती है, या अपने को अन्य किसी क्रोधादि कषाय से इच्छा उत्पन्न हो उसे पूर्ण करनेकी आकुलता होती है। कदापि सर्वथा निराकुल नहीं हो सकता। अभिप्रायमें तो अनेक प्रकार की आकुलता बनी ही रहती है. और कोई आकुलता मिटानेके बाह्य उपाय करे। सो प्रथम तो कार्य सिद्ध नहीं होता। और यदि भवितव्ययोगसे वह कार्य सिद्ध हो जाये तोतत्काल अन्य आकुलता मिटानेके उपायमें लगता है.इसप्रकार आकुलता मिटानेकी आकुलता निरन्तर बनी रहती है.यदि ऐसी आकुलता न रहे तो वह नये-नये विषय सेवनादि कार्योंमें किसलिये प्रवर्त्तता है?इसलिये संसार अवस्था में पुण्य के उदय से इन्द्र-अहमिन्द्रादि पद प्राप्त करे तो भी निराकुलता नहीं होती, दु:खी ही रहता है. इसलिये संसार अवस्था हितकारी नहीं है.
तथा मोक्षअवस्थामें किसी भी प्रकार की आकुलता नहीं रही, इसलिये आकुलता मिटानेका उपाय करने का भी प्रयोजन नहीं है। सदाकाल शांतरससे सुखी रहते हैं, इसलिये मोक्षअवस्था ही हितकरी है. पहले भी संसार अवस्थाके दु:खका और मोक्षअवस्थाके सुख का विशेष वर्णन किया है, वह इसी प्रयोजन के अर्थ किया है.उसे भी विचार कर मोक्षको हितरूप जान कर मोक्षका उपाय करना. सर्व उपदेशका तात्पर्य इतना है.
पुरुषार्थसे ही मोक्षप्राप्ति
वहाँ प्रश्न है कि मोक्षका उपाय काललब्धि आने पर भवितव्यानुसार बनता है, या मोहादिके उपशमादि होने पर बनता है, या अपने पुरुषार्थसे उद्यम करने पर बनता है सो कहो. यदि प्रथम दोनों कारण मिलने पर बनता है, तो हमे उपदेश किसलिये देते हो? और पुरुषार्थसे बनता है तो उपदेश सब सुनते हैं, उनमें कोई उपाय कर सकता है, कोई नहीं कर सकता। सो कारण क्तया?
समाधान :- एक कार्य होनेमें अनेक कारण मिलते हैं. सो मोक्षका उपाय बनता है वहाँ तो पूर्वोक्त तीनों ही कारण मिलते हैं, और नहीं बनता वहाँ तीनों ही कारण नहीं मिलते. पूर्वोक्त तीन कारण कहे उनमें काललब्धि व होनहार तो कोई वस्तु नहीं है। जिस काल में कार्य बनता है वही काललब्धि, और जो कार्य हुआ वही होनहार. तथा जो कर्मके उपशमादिक हैं वह पुद्गल की शक्ति है उसका आत्मा कर्त्ता-हर्त्ता नहीं है. तथा पुरुषार्थ से उद्यम करते हैं सो यह आत्मा का कार्य है। - इसलिये आत्मा को पुरुषार्थसे उद्यम करनेका उपदेश देते हैं.
वहाँ यह आत्मा जिस कारणसे कार्यसिद्धि अवश्य हो उस कारणरूप उद्यम करे, वहाँ तो अन्य कारण मिलते ही मिलते हैं, और कार्य की भी सिद्धि होती ही होती है. तथा जिस कारण से कार्य की सिद्धि हो अथवा नहीं भी हो, उस कारणरूप उद्यम करे, वहाँ अन्य कारण मिलें तो कार्यसिद्धि होती है, न मिले तो सिद्धि नहीं होती.
सो जिनमतमें जो मोक्षका उपाय कहा है, इससे मोक्ष होता ही होता है. इसलिये जो जीव पूरुषार्थसे जिनेश्वरके उपदेशानुसार मोक्षका उपाय करता है उसके काललब्धि व होनहार भी हुए और कर्मके उपशमादि हुए हैं तो वह ऐसा उपाय करता है. इसलिये जो पुरुषार्थसे मोक्षका उपाय करता है उसको सर्व कारण मिलते हैं और उसको अवश्य मोक्षकी प्राप्ति होती है - ऐसा निश्चय करना. तथा जो जीव पुरुषार्थसे मोक्षका उपाय नहीं करता उसके काललब्धि व होनहार भी नहीं और कर्मके उपशमादि नहीं हुए हैं तो यह उपाय नहीं करता. इसलिये जो पुरुषार्थसे मोक्षका उपाय नहीं करता उसको कोई कारण नहीं मिलते और उसको मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती - ऐसा निश्चय करना.
तथा तू कहता है - उपदेश तो सभी सुनते हैं, कोई मोक्षका उपाय कर सकता है, कोई नहीं कर सकता। सो कारण क्तया?
उसका कारण यही है कि जो उपदेश सुनकर पुरुषार्थ करते हैं वे मोक्षका उपाय कर सकते हैं, और जो पुरुषार्थ नहीं करते हैं वे मोक्षका उपाय नहीं कर सकते.उपदेश तो शिक्षा मात्र है, फल जैसा पुरुषार्थ करे वैसा लगता है.
फिर प्रश्न है कि द्रव्यलिंगीमुनि मोक्षके अर्थ गृहस्थपना छोड़कर तपश्चरणादि करता है वहाँ पुरुषार्थ तो किया, कार्य सिद्ध नहीं हुआ। इसलिये पुरुषार्थ करने से तो कुछ सिद्धि नहीं है?
समाधान :- अन्यथा पुरुषार्थसे फल चाहे तो कैसे सिद्धि हो? तपश्चरणादि व्यवहार साधनमें अनुरागी होकर प्रवर्त्ते उसका फल शास्त्रमें तो शुभबन्ध कहा है, और यह उससे मोक्ष चाहता है, कैसे होगाा? यह तो भ्रम है.
फिर प्रश्न है कि भ्रमका भी तो कारण कर्म ही है, पुरुषार्थ क्तया करे?
उत्तर :- सच्चे उपदेश से निर्णय करने पर भ्रम दूर होता है। परन्तु ऐसा पुरुषार्थ नहीं करता, इसी से भ्रम रहता है. निर्णय करने का पुरुषार्थ करे - तो भ्रमका कारण जो मोहकर्म,उसकेभीउपशमादिहोंतबभ्रमदूरहोजाये।क्तयोंकिनिर्णयकरतेहुए परिणामोंकी विशुद्धता होती है, उससे मोह के स्थिति-अनुभाग घटते हैं.
फिर प्रश्न है कि निर्णय करनेमें उपयोग नहीं लगाता, उसका भी तो कारण कर्म है?
समाधान :- एकेन्द्रियादिक के विचार करने की शक्ति नहीं है, उनके तो कर्महीका कारण है. इसके तो ज्ञानावरणादिकके क्षयोपशमसे निर्णय करने की शक्ति हुई है, जहाँ उपयोग लगाये उसी का निर्णय हो सकता है. परन्तु यह अन्य निर्णय करनेमें उपयोग लगाता है, यहाँ उपयोग नहीं लगाता. सो यह तो इसीका दोष है, कर्मका तो कुछ प्रयोजन नहीं है.
फिर प्रश्न है कि सम्यक्तत्व-चारित्रका घातक मोह है, उसका अभाव हुए बिना मोक्षका उपाय कैसे बने?
उत्तर :- तत्त्ववनिर्णय करनेमें उपयोग न लगाये वह तो इसी का दोष है. तथा पुरुषार्थसेतत्त्ववनिर्णयमेंउपयोगलगायेतबस्वयमेवहीमोहकाअभावहोनेपर सम्यक्तत्वादिरूप मोक्ष के उपाय का पुरुषार्थ बनता है. इसलिये मुख्यतासे तो तत्त्ववनिर्णयमें उपयोग लगानेका पुरुषार्थ करना. तथा उपदेश भी देते हैं, सो यही पुरुषार्थ कराने के अर्थ दिया जाता है, तथा इस पुरुषार्थसे मोक्षके उपाय का पुरुषार्थ अपनेआप सिद्ध होगा.
और तत्त्ववनिर्णय न करने में किसी कर्मका दोष है नहीं, तेरा ही दोष है। परन्तु तू स्वयं तो महन्त रहना चाहता है और अपना दोष कर्मादिकको लगाता है। सो जिनआज्ञा माने तो ऐसी अनीति संभव नहीं है. तुझे विषय-काषायरूप ही रहना है, इसलिये झूठ बोलता है. मोक्षकी सच्ची अभिलाषा हो तो ऐसी युक्ति किसलिये बनाये? सांासारिक कार्योंमें अपने पुरुषार्थसे सिद्धि न होती जाने, तथापि पुरुषार्थसे उद्यम किया करता है, यहाँ पुरुषार्थ खो बैठा। इसलिये जानते हैं कि मोक्षको देखादेखी उत्कृष्ट कहता है। उसका स्वरूप पहिचानकर उसे हितरूप नहीं जानता. हित जानकर उसका उद्यम बने सो न करे यह असम्भव है.
यहाँ प्रश्न है कि तुमने कहा सो सत्य। परन्तु द्रव्य कर्मके उदय से भावकर्म होता है, भावकर्मसे द्रव्यकर्म का बन्ध होता है, तथा फिर उसके उदयसे भावकर्म होता है - इसी अनादिसे परम्परा है, तब मोक्षका उपाय कैसे हो?
समाधान :- कर्मका बन्ध व उदय सदाकाल समान ही होता रहे तब तो ऐसा ही है। परन्तु परिणामोंके निमित्तसे पूर्वबद्धकर्म के भी उत्कर्षण-अपकर्षण-संक्रमणादि होनेसे उनकी शक्ति हीनाधिक होती है। इसलिये उनका उदय भी मन्द-तीव्र होता है. उनके निमित्तसे नवीन बन्ध भी मन्द-तीव्र होता है. इसलिये संसारी जीवोंको कर्मोदयके निमित्तसे कभी ज्ञानादिक बहुत प्रगट होते हैं, कभी थोड़े प्रगट होते हैं। कभी रागादिक मन्द होते हैं, कभी तीव्र होते हैं. इसप्रकार परिवर्तन होता रहता है.
वहाँ कदाचित् संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त पर्याय प्राप्त की, तब मन द्वारा विचार करने की शक्ति हुई. तथा इसके कभी तीव्र रागादिक होते हैं, कभी मन्द होते हैं. वहाँ रागादिकका तीव्र उदय होने से तो विषयकषयादिकके कार्योंमें ही प्रवृत्ति होती है. तथा रागादिकका मन्द उदय होनेसे बाह्य उपदेशादिकका निमित्त बने और स्वयं पुरुषार्थ करके उन उपदेशादिकमें उपयोग को लगाये तो धर्मकार्योंमें प्रवृत्ति हो। और निमित्त न बने व स्वयं पुरुषार्थ न करे तो अन्य कार्योंमें ही प्रवर्त्ते, परन्तु मन्द रागादिसहित प्रवर्त्ते. - ऐसे अवसरमें उपदेश कार्यकारी है.
विचारशक्तिरहित जो एकेन्द्रियादिक हैं, उनके तो उपदेश समझनेका ज्ञान ही नहीं है। और तीव्र रागादिसहित जीवोंका उपयोग उपदेशमें लगता नहीं है. इसलिये जो जीव विचारशक्तिसहित हों, तथा जिनके रागादि मन्द हों। उन्हें उपदेश के निमित्तसे धर्म की प्राप्ति हो जाये तो उनका भला हो। तथा इसी अवसरमें पुरुषार्थ कार्यकारी है.
एकेन्द्रियादिक तो धर्मकार्य करनेमें समर्थ ही नहीं हैं, कैसे पुरुषार्थ करें? और तीव्रकषायी पुरुषार्थ करे तो वह पाप ही का करे, धर्मकार्य का पुरुषार्थ हो नहींं सकता.
इसलिये जो विचारशक्तिसहित हो और जिसके रागादिक मन्द हों - वह जीव पुरुषार्थसे उपदेशादिकके निमित्तसे तत्त्ववनिर्णयादिमें उपयोग लगाये तो उसका उपयोग वहाँ लगे और तब उसका भला हो. यदि इस अवसर में भी तत्त्ववनिर्णय करनेका पुरुषार्थ न करे, प्रमादसे काल गँवाये - या तो मन्दरागादि सहित विषयकषायोंके कार्योंमें ही प्रवर्त्ते, या व्यवहारधर्मकार्योंमें प्रवर्त्ते। तब अवसर तो चला जायेगा और संसार में ही भ्रमण होगा.
तथा इस अवसरमें जो जीव पुरुषार्थसे तत्त्ववनिर्णय करनेमें उपयोग लगानेका अभ्यास रखें, उनके विशुद्धता बढे़गी। उससे कर्मोंकी शक्ति हीन होगी, कुछ काल में अपने आप दर्शनमोहका उपशम होगा। तब तत्त्ववोंकी यथावत् प्रतीति आयेगी सो इसका तो कर्त्तव्य तत्त्ववनिर्णयका अभ्यास ही है, इसीसे दर्शनमोहका उपशमतो स्वयमेव होता है। उसमें जीव का कर्त्तव्य कुछ नहीं है.
तथा उसके होने पर जीवके स्वयमेव सम्यग्दर्शन होता है. और सम्यग्दर्शन होने पर श्रद्धान तो यह हुआ कि ‘मैं आत्मा हूँ, मुझे रागादिक नहीं करना’ । परन्तु चारित्रमोहके उदय से रागादिक होते हैं. वहाँ तीव्र उदय हो तबतो विषयादिमें प्रवर्तता है. और मन्द उदय हो तब अपने पुरुषार्थसे धर्मकार्योंमें व वैराग्यादि भावनामें उपयोगको लगाता है। उसके निमित्तसे चारित्रमोह मन्द हो जाता है। - ऐसा होनेपर देशचारित्र व सकलचारित्र अंगीकार करनेका पुरुषार्थ प्रगट होता है तथा चारित्र को धारण करके अपने पुरुषार्थसे धर्ममें परिणतिको बढ़ाये वहाँ विशुद्धता से कर्म की शक्ति हीन होती है, उससे विशुद्धता बढ़ती है, और उससे कर्मकी शक्ति अधिक हीन होती है. इसप्रकार क्रमसे मोहका नाश करे तब सर्वथा परिणाम विशुद्ध होते हैं, उनके द्वारा ज्ञानावरणादिका नाश हो तब केवलज्ञान प्रगट होता है. पश्चात् वहाँ बिना उपाय अघाति कर्मका नाश करके शुद्ध सिद्धपदको प्राप्त करता है.
इसप्रकार उपदेशका तो निमित्त बने और अपना पुरुषार्थ करे तो कर्मका नाश होता है.
तथा जब कर्मका उदय तीव्र हो तब पुरुषार्थ नहीं हो सकता। ऊपर के गुणस्थानोंसे भी गिर जाता है। वहाँ तो जैसी होनहार हो वैसा होता है. परन्तु जहाँ मन्द उदय हो और पुरुषार्थ होसके वहाँ तो प्रमादि नहीं होना। सावधान होकर अपना कार्य करना.
जैसे - कोई पुरुष नदी के प्रवाह में पड़ा बह रहा है, वहाँ पानी का जोर हो तब तो उसका पुरुषार्थ कुछ नहीं, उपदेश भी कार्यकारी नहीं. और पानी का जोर थोड़ा हो तब यदि पुरुषार्थ करके निकले तो निकल आयेगा. उसी को निकलने की शिक्षा देते हैं. और न निकले तो धीरे-धीरे बहेगा और फिर पानी का जोर होने पर बहता चला जायेगा. उसी प्रकार जीव संसारमें भ्रमण करता है, वहाँ कर्मोंका तीव्र उदय हो तब तो उसका पुरुषार्थ कुछ नहीं है, उपदेश भी कार्यकारी नहीं. और कर्मका मन्द उदय हो तब पुरुषार्थ करके मोक्षमार्गमें प्रवर्तन करे तो मोक्ष प्राप्त कर ले. उसी को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं. और मोक्षमार्गमें प्रवर्तन नहीं करे तो किंचित् विशुद्धता पाकर फिर तीव्र उदय आने पर निगोदादि पर्याय को प्राप्त करेगा.
इसलिये अवसर चूकना योग्य नहीं है. अब सर्व प्रकार से अवसर आया है, ऐसा अवसर प्राप्त करना कठिन है. इसलिये श्रीगुरु दयालु होकर मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं, उसमें भव्य जीवोंको प्रवृत्ति करना.

मोक्षमार्गका स्वरूप

अब, मोक्षमार्गका स्वरूप कहते हैं.
जिनकेनिमित्तसेआत्माअशुद्धदशाकोधारणकरकेदु:खीहुआ-ऐसेजो मोहादिक कर्म उनका सर्वथा नाश होने पर केवल आत्मा की सर्व प्रकार शुद्ध अवस्था का होना - वह मोक्ष है. उसका जो उपाय - कारण। उसे मोक्षमार्ग जानना.
वहाँ कारण तो अनेक प्रकार के होते हैं. कोई कारण तो ऐसे होते हैं जिनके हुए बिना तो कार्य नहीं होता, और जिनके होने पर कार्य हो या न भी हो. जैसे - मुनिलिंग धारण किये बिना तो मोक्ष नहीं होता. परन्तु मुनिलिंग धारण करने पर मोक्ष होता भी है और नहीं भी होता. तथा कितने ही कारण ऐसे हैं कि मुख्यत: तो जिनके होने पर कार्य होता है, परन्तु किसी के बिना हुए भी कार्यसिद्धि होती है. जैसे - अनशनादि बाह्यतपका साधन करने पर मुख्यत: मोक्ष प्राप्त करते हैं। परन्तु भरतादिकके बाह्यतप किये बिना ही मोक्षकी प्राप्ति हुई. तथा कितने ही कारण ऐसे हैं जिनके होने पर कार्यसिद्धि होती ही होती है, और जिनके न होने पर सर्वथा कार्य सिद्धि नहीं होती. जैसे - सम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्रकी एकता होनेपर तो मोक्ष होता ही होता है, और उनके न होने पर सर्वथा मोक्ष नहीं होता. - ऐसे यह कारण कहे, उनमें अतिशयपूर्वक नियमसे मोक्षका साधक जो सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रका एकीभाव सो मोक्षमार्ग जानना. इन सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान- सम्यक्चारित्रमें एक भी न हो तो मोक्षमार्ग नहीं होता.
वही ‘सूत्रमें’ कहा है:-—सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:..(तत्त्ववार्थसूत्र १-१)
इस सूत्रकी टीका में कहा है कि यहाँ—मोक्षमार्ग:ऐसा एकवचन कहा, उसका अर्थ यह है कि तीनों मिलने पर एक मोक्षमार्ग है, अलग-अलग तीन मार्ग नहीं हैं.
यहाँ प्रश्न है कि असंयत सम्यग्दृष्िटके तो चारित्र नहीं है, उसको मोक्षमार्ग हुआ है या नहीं हुआ है?
समाधान :- मोक्षमार्ग उसके होगा, यह तो नियम हुआ। इसलिये उपचार से इसके मोक्षमार्ग हुआभी कहते हैं। परमार्थसे सम्यक्चारित्र होने पर ही मोक्षमार्ग होता है. जैसे - किसी पुरुषको किसी नगर चलने का निश्चय हुआ। इसलिये उसको व्यवहार से ऐसा भी कहते हैं कि ‘यह उस नगर को चला है’। परमार्थ से मार्गमें गमन करने पर ही चलना होगा. उसी प्रकार असंयतसम्यग्दृष्िटको वीतरागभावरूप मोक्षमार्गका श्रद्धान हुआ। इसलिये उसको उपचारसे मोक्षमार्गी कहते हैं। परमार्थसे वीतरागभावरूप परिणमित होने पर ही मोक्षमार्ग होगा. तथा प्रवचनसारमें भी तीनोंकी एकाग्रता होने पर ही मोक्षमार्ग कहा है. इसलिये यह जानना कि तत्त्ववश्रद्धान-ज्ञान बिना तो रागादि घटाने से मोक्षमार्ग नहीं है, और रागादि घटाये बिना तत्त्ववश्रद्धान-ज्ञानसे भी मोक्षमार्ग नहीं है. तीनों मिलने पर साक्षात् मोक्षमार्ग होता है.
अब, इनका निर्देश, लक्षणनिर्देश और परीक्षाद्वार से निरूपण करते हैं :-
वहाँ ‘सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र मोक्ष का मार्ग है’ - ऐसानाम मात्र कथन वह तो ‘निर्देश’ जानना.
तथा अतिव्याप्ति, अव्याप्ति, असम्भवपने से रहित हो और जिससे इनको पहचाना जाये सो ‘लक्षण’ जानना। उसका जो निर्देश अर्थात् निरूपण सो ‘लक्षणनिर्देश’ जानना.
वहाँ जिसको पहिचानना हो उसका नाम लक्ष्य है, उसके सिवाय और का नाम अलक्ष्य है. सो लक्ष्य व अलक्ष्य दोनो में पाया जाये, ऐसा लक्षण जहाँ कहा जाये वहाँ अतिव्याप्तिपना जानना. जैसे - आत्मा का लक्षण ‘अमूर्त्तत्व’ कहा। सो अमूर्त्तत्वलक्षण लक्ष्य जो आत्मा है उसमें भी पाया जाता है, और अलक्ष्य जो आकाशादिक हैं उनमें भी पाया जाता है। इसलिये यह ‘अतिव्याप्ति’ लक्षण है. इसके द्वारा आत्मा को पहिचानने से आकाशादिकभी आत्मा हो जायेंगे। यह दोष लगेगा.
तथा जो किसी लक्ष्यमें तो हो और किसी में न हो, ऐसे लक्ष्यके एक देश में पाया जाये - ऐसा लक्षण जहाँ कहा जाये वहाँ अव्याप्तिपना जानना. जैसे - आत्मा का लक्षण केवलज्ञानादि कहा जाये। सो केवलज्ञान किसी आत्मा में तो पाया जाता है, किसी में नहीं पाया जाता। इसलिये यह ‘अव्याप्त’ लक्षण है. इसके द्वारा आत्मा को पहिचानने से अल्पज्ञानी आत्मा नहीं होगा। यह दोष लगेगा.
तथाजोलक्ष्यमेंपायाहीनहींजाये,ऐसालक्षणजहाँकहाजाये-वहाँ असम्भवपना जानना. जैसे - आत्माका लक्षण जड़पना कहा जाये। सो प्रत्यक्षादि प्रमाणसे यह विरुद्ध है। क्तयोंकि यह ‘असम्भव’ लक्षण है. इसके द्वारा आत्मा माननेसेपुद्गलादिक आत्मा हो जायेंगे, और आत्मा है वह अनात्मा हो जायेगा। यह दोष लगेगा.
इसप्रकार अतिव्याप्त, अव्याप्त तथा असम्भवी लक्षण हो वह लक्षणाभास है. तथा लक्ष्य में तो सर्वत्र पाया जाये और अलक्ष्य में कहीं न पाया जाये वह सच्चा लक्षण है. जैसे - आत्माका स्वरूप चैतन्य है। सो यह लक्षण सर्व ही आत्मा में तो पाया जाता है, अनात्मा में कहीं नहीं पाया जाता। इसलिये यह सच्चा लक्षण है. इसके द्वारा आत्मा मानने से आत्मा-अनात्मा का यथार्थ ज्ञान होता है। कुछ दोष नहीं लगता. इसप्रकार लक्षण का स्वरूप उदाहरण मात्र कहा.
अब, सम्यग्दर्शनादिकका सच्चा लक्षण कहते हैं :-
सम्यग्दर्शनका सच्चा लक्षण
विपरीताभिनिवेशरहितजीवादिकतत्त्ववार्थश्रद्धानवहसम्यग्दर्शनकालक्षणहै.जीव अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष यह सात तत्त्ववार्थ हैं. इनका जो श्रद्धान - ‘ऐसाहीहै,अन्यथानहींहै’-ऐसाप्रतीतिभाव,सोतत्त्ववार्थश्रद्धान।तथा विपरीताभिनिवेश जो अन्यथा अभिप्राय उससे रहित। सो सम्यग्दर्शन है.
यहाँ विपरीताभिनिवेशके निराकरण के अर्थ‘सम्यक्’पद कहा है, क्तयोंकि ‘सम्यक्’ ऐसा शब्द प्रशंसावाचक है। वहाँ श्रद्धान में विपरीताभिनिवेशका अभाव होने पर ही प्रशंसा सम्भव है ऐसा जानना.
यहाँ प्रश्न है कि ‘तत्त्वव’ और ‘अर्थ’ यह दो पद कहे, उनका प्रयोजन क्तया?
समाधान :- ‘तत्’ शब्द है सो ‘यत्’ शब्द की अपेक्षा सहित है, इसलिये जिसका प्रकरण हो उसे तत् कहा जाता है और जिसका जो भाव अर्थात् स्वरूप सो तत्त्वव जानना. कारण कि‘तस्य भावस्तत्त्ववं’ऐसा तत्त्वव शब्द का समास होता है. तथा जो जानने में आये ऐसा ‘द्रव्य’ व ‘गुण-पर्याय’ उसका नाम अर्थ है. तथा ‘तत्त्ववेन अर्थस्तत्त्ववार्थ:’ तत्त्वव अर्थात् अपना स्वरूप, उससे सहित पदार्थ उनका श्रद्धान सो सम्यग्दर्शन है. यहाँ यदि तत्त्ववश्रद्धान ही कहते तो जिसका यह भाव(तत्त्वव)है, उसके श्रद्धान बिना केवल भाव ही का श्रद्धान कार्यकारी नहीं है. तथा यदि अर्थश्रद्धान ही कहते तो भाव के श्रद्धान बिना पदार्थ का श्रद्धान भी कार्यकारी नहीं है.
जैैसे - किसी को ज्ञान-दर्शनादिक व वर्णादिकका तो श्रद्धान हो - यह जानपना है, यह श्वेतपना है, इत्यादि प्रतीति हो। परन्तु ज्ञान-दर्शन आत्मा का स्वभाव है, मैं आत्मा हूँ। तथा वर्णादि पुद्गल का स्वभाव है, पुद्गल मुझ से भिन्न-अलग पदार्थ है। ऐसा पदार्थ का श्रद्धान न हो तो भाव का श्रद्धान कार्यकारी नहीं है. तथा जैसे‘मैं आत्मा हूँ’ ऐसा श्रद्धान किया। परन्तु आत्मा का स्वरूप जैसा है वैसा श्रद्धान नहीं किया तो भाव के श्रद्धान बिना पदार्थ का भी श्रद्धान कार्यकारी नहीं है. इसलिये तत्त्ववसहित अर्थका श्रद्धान होता है सो ही कार्यकारी है. अथवा जीवादिकको तत्त्ववसंज्ञा भी है और अर्थ संज्ञा भी है, इसलिये ‘तत्त्ववमेवार्थस्तत्त्ववार्थ:’जो तत्त्वव सो ही अर्थ, उनका श्रद्धान सो सम्यग्दर्शन है.
इस अर्थ द्वारा कहीं तत्त्ववश्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहे और कहीं पदार्थश्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहे, वहाँ विरोध नहीं जानना.
इसप्रकार ‘तत्त्वव’ और ‘अर्थ’ दो पद कहनेका प्रयोजन है.
तत्त्ववार्थ सात ही क्तयों?
फिर प्रश्न है कि तत्त्ववार्थ तो अनन्त हैं. वे सामान्य अपेक्षासे जीव-अजीवमें सर्व गर्भित हुए। इसलिये दो ही कहना थे या अनन्त कहना थे. आस्रवादिक तो जीव-अजीवही के विशेष हैं, इनको अलग कहने का प्रयोजन क्तया?
सामाधान :- यदि यहाँ पदार्थ श्रद्धान करनेका ही प्रयोजन होता तब तो सामान्यसे या विशेष से जैसे सर्व पदार्थोंका जानना हो, वैसे ही कथन करते। वह तो यहाँ प्रयोजन है नहीं। यहाँ तो मोक्षका प्रयोजन है. सो जिन सामान्य या विशेष भावोंका श्रद्धान करने से मोक्ष हो और जिनका श्रद्धान किये बिना मोक्ष न हो। उन्हीं का यहाँ निरूपण किया है.
सो जीव-अजीवयह दो तो बहुत द्रव्योंकि एक जाति अपेक्षा सामान्यरूप तत्त्वव कहे. यह दोनों जाति जाननेसे जीवको आपापर का श्रद्धान हो - तब परसे भिन्न अपने को जाने, अपने हित के अर्थ मोक्षका उपाय करे। और अपनेसे भिन्न परको जाने, तब परद्रव्य से उदासीन होकर रागादिक त्यागकर मोक्षमार्गमें प्रवर्ते. इसलिये इन दो जातियोंका श्रद्धान होने पर ही मोक्ष होता है और दो जातियाँ जाने बिना आपापर का श्रद्धान न हो तब पर्यायबुद्धिसे संसारिक प्रयोजन ही का उपाय करता है.परद्रव्यमें रागद्वेषरूप होकर प्रवर्ते, तब मोक्षमार्गमें कैसे प्रवर्ते? इसलिये इन दो जातियोंका श्रद्धान न होने पर मोक्ष नहीं होता. इस प्रकार यह दो सामान्य तत्त्वव तो अवश्य श्रद्धान करने योग्य कहे हैं.
तथा आस्रवादि पाँच कहे, वे जीव-पुद्गल की पर्याय हैं। इसलिये यह विशेषरूप तत्त्वव हैं। सो इन पाँच पर्यायोंको जानने से मोक्षका उपाय करने का श्रद्धान होता है.
वहाँ मोक्षको पहिचानेतो उसे हित मान कर उसका उपयोग करे। इसलिये मोक्षका श्रद्धान करना.
तथा मोक्षका उपाय संवर-निर्जरा है। सो इनको पहिचानेतो जैसे संवर-निर्जराहो वैसे प्रवर्ते। इसलिये संवर-निर्जराका श्रद्धान करना.
तथा संवर-निर्जरा तो अभावलक्षण सहित है। इसलिये जिनका अभाव करना है उनको पहिचानना चाहिये. जैसे - क्रोधका अभाव होने पर क्षमा होती है। सो क्रोधको पहिचाने तो उसका अभाव करके क्षमारूप प्रवर्तन करे. उसी प्रकार आस्रवका अभाव होने पर संवर होता है और बन्धका एकदेश अभाव होने पर निर्जरा होती है। सो आस्रव बन्धको पहिचाने तो उनका नाश करके संवर-निर्जरारूप प्रवर्तन करे। इसलिये आस्रव-बन्धका श्रद्धान करना.
इसप्रकार इन पाँच पर्यायोंका श्रद्धान होनेपर ही मोक्षमार्ग होता है, इनको न पहिचाने तो मोक्षकी पहिचान बिना उसका उपाय किसलिये करे? संवर-निर्जराकी पहिचान बिना उनमें कैसे प्रवर्तन करे? आस्रव-बन्धकी पहिचान बिना उनका नाश कैसे करे? - इसप्रकार इन पाँच पर्यायोंका श्रद्धान न होने पर मोक्षमार्ग नहीं होता.
इसप्रकार यद्यपि तत्त्ववार्थ अनन्त हैं, उनका सामान्य विशेषसे अनेक प्रकार प्ररूपण हो। परन्तु यहाँ एक मोक्षका प्रयोजन है। इसलिये दो तो जाति अपेक्षा सामान्यतत्त्वव और पाँच पर्यायरूप विशेषतत्त्वव मिला कर सात ही तत्त्वव कहे.
इनके यथार्थ श्रद्धानके आधीन मोक्षमार्ग है. इनके सिवा औरोंका श्रद्धान हो या न हो या अन्यथा श्रद्धान हो। किसी के आधीन मोक्षमार्ग नहीं है ऐसा जानना.
तथा कहीं पुण्य-पाप सहित नवपदार्थ कहे हैं। सो पुण्य-पाप आस्रवादिकके ही विशेष हैं, इसलिये साततत्त्ववोंमें गर्भित हुए. अथवा पुण्य-पापका श्रद्धान होनेपर पुण्यको मोक्षमार्ग न माने, या स्वच्छन्दी होकर पापरूप न प्रवर्ते। इसलिये मोक्षमार्ग में इनका श्रद्धान भीउपकारीजानकरदोतत्त्ववविशेषकेविशेषमिलाकरनवपदार्थकहे.तथा समयसारादिमें इनको नवतत्त्वव भी कहा है.
फिर प्रश्न :- इनका श्रद्धान सम्यग्दर्शन कहा। सो दर्शन तो सामान्य अवलोकनमात्र और श्रद्धान प्रतीतिमात्र। इनके एकार्थपना किस प्रकार सम्भव है?
उत्तर:-प्रकरणकेवशसेधातुकाअर्थअन्यथाहोताहै.सोयहाँप्रकरण मोक्षमार्गका है. उसमें ‘दर्शन’ शब्दका अर्थ सामान्य अवलोकनमात्र नहीं ग्रहण करना, क्तयोंकि चक्षु-अचक्षुदर्शनसे सामान्य अवलोकन तो सम्यग्¹ष्िट-मिथ्या¹ष्िटके समान होता है, कुछ इससे मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति-अप्रवृत्ति नहीं होती. तथा श्रद्धान होता है सो सम्यग्¹ष्िट ही के होता है, इससे मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति होती है. इसलिये ‘दर्शन’ शब्दका अर्थ भी यहाँ श्रद्धानमात्र ही ग्रहण करना.
फिर प्रश्न :- यहाँ विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धान करना कहा, सो प्रयोजन क्तया?
समाधान :- अभिनिवेश नाम अभिप्रायका है. सो जैसा तत्त्ववार्थश्रद्धान का अभिप्राय है वैसा न हो, अन्यथा अभिप्राय हो, उसका नाम विपरीताभिनिवेश है. तत्त्ववार्थश्रद्धान करने का अभिप्राय केवल उनका निश्चय करना मात्र ही नहीं है। वहाँ अभिप्राय ऐसा है कि जीव- अजीव को पहिचान कर अपने को तथा परको जैसाका तैसा माने, तथा आस्रवको पहिचान करउसेहेयमाने,तथाबन्धकोपहिचानकरउसकोअहितमाने,तथासंवरको पहिचानकर उसे उपादेय माने, तथा निर्जरा को पहिचान कर उसे हित का कारण माने, तथा मोक्षको पहिचानकर उसको अपना परमहित माने - ऐसा तत्त्ववार्थश्रद्धानका अभिप्राय है। उससे उलटे अभिप्रायका नाम विपरीताभिनिवेश है. सच्चा तत्त्ववार्थश्रद्धान होनेपर इसका अभाव होता है. इसलिये तत्त्ववार्थश्रद्धान है सो विपरीताभिनिवेशरहित है - ऐसा यहाँ कहा है.
अथवा किसी के आभासमात्र तत्त्ववार्थश्रद्धान होता है। परन्तु अभिप्राय में विपरीतपना नहीं छूटता. किसी प्रकार से पूर्वोक्त अभिप्रायसे अन्यथा अभिप्राय अंतरंग में पाया जाता है तो उसको सम्यग्दर्शन नहीं होता. जैसे - द्रव्यलिंगी मुनि जिनवचनोंसे तत्त्ववोंकि प्रतीति करे, परन्तु शरीराश्रित क्रियाओंमें अहंकार तथा पुण्यास्रव में उपादेयपना इत्यादि विपरीत अभिप्रायसे मिथ्या¹ष्िट ही रहता है. इसलिये जो तत्त्ववार्थश्रद्धान विपरीताभिनिवेश रहित है, वही समयग्दर्शन है.
इसप्रकार विपरीताभिनिवेशरहित जीवादि तत्त्ववार्थों का श्रद्धानपनासो सम्यग्दर्शनका लक्षण है, सम्यग्दर्शन लक्ष्य है.
वही तत्त्ववार्थसूत्रमें कहा है :-
—तत्त्ववार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्.. १-२..
तत्त्ववार्थों का श्रद्धान वही सम्यग्दर्शन है.
तथा सर्वार्थसिद्धि नामक सूत्रों की टीका है - उसमें तत्त्ववादिक पदोंका अर्थ प्रगट लिखा है तथा साथ ही तत्त्वव कैसे कहे सो प्रयोजन लिखा है. उसके अनुसार यहाँ कुछ कथन किया है ऐसा जानना.
तथा पुरुषार्थसिद्ध्युपाय में भी इसीप्रकार कहा है :-
जीवाजीवादीनां तत्त्ववार्थानां सदैव कर्त्तव्यम् .
श्रद्धानं विपरीताभिनिवेशविविक्तमात्मरूपं तत् ॥२२॥
अर्थ:-विपरीताभिनिवेशसेरहितजीव-अजीवादितत्त्ववार्थोंकाश्रद्धानसदाकाल करना योग्य है. यह श्रद्धान आत्मा का स्वरूप है, दर्शनमोह उपाधी दूर होनेपर प्रगट होता है, इसलिये आत्मा का स्वभाव है. चतुर्थादि गुणस्थानमें प्रगट होता है, पश्चात् सिद्ध अवस्था में भी सदाकाल इसका सद्भाव रहता है - ऐसा जानना. तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षणमें अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भवदोष का परिहार
यहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि तिर्यंचादि तुच्छज्ञानी कितने ही जीव सात तत्त्ववोंका नाम भी नहीं जान सकते, उनके भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति शास्त्रमें कही है। इसलिये तुमने तत्त्ववार्थश्रद्धानपना सम्यक्तत्वका लक्षण कहा उसमें अव्याप्ति दूषण लगता है.
समाधान :- जीव-अजीवादिकके नामादिक जानो या न जानो या अन्यथा जानो, उनका स्वरूप यथार्थ पहिचान कर श्रद्धान करने पर सम्यक्तत्व होता है.
वहाँ कोई सामान्यरूप से स्वरूपको पहिचानकर श्रद्धान करता है. कोई विशेषरूप से स्वरूपको पहिचानकर श्रद्धान करता है. इसलिये जो तुच्छज्ञानी तिर्यंचादिक सम्यग्¹ष्िट हैं वे जीवादिकका नाम भी नहीं जानते, तथापि उनका सामान्यरूपसे स्वरूप पहिचान कर श्रद्धान करते हैं, इसलिये उनके सम्यक्तत्वकी प्राप्ति होती है.
जैसे - कोई तिर्यंच अपना और ओरोंका नामादिक तो नहीं जानता। परन्तु आप ही में अपनत्व मानता है, औरोंको पर मानता है. उसी प्रकार तुच्छज्ञानी जीव-आजीवका नाम नहीं जानता। परन्तु जो ज्ञानादि स्वरूप आत्मा है उसमें तो अपनत्व मानता है, और जो शरीरादि है उनको पर मानता है - ऐसा श्रद्धान उसके होता है। वही जीव-अजीव का श्रद्धान है. तथा जैसे वही तिर्यंच सुखादिकके नामादिक नहीं जानता है, तथापि सुख अवस्थाको पहिचान कर उसके अर्थ आगामी दु:खके कारण को पहिचान कर उसका त्याग करना चाहता है, तथा जो दु:खका कारण बन रहा है उसके अभावका उपाय करता है. उसी प्रकार तुच्छज्ञानी मोक्षादिकका नाम नहीं जानता, तथापि सर्वथा सुखरूप मोक्ष अवस्था का श्रद्धान करता हुआ उसके अर्थ आगामी बन्धका कारण जो रागादिक आस्रव उसके त्यागरूप संवर करना चाहता है, तथाजो संसार दु:ख का कारणहै उसकी शुद्धभाव से निर्जरा करना चाहता है. इसप्रकार आस्रवादिकका उसके श्रद्धान है.
इसप्रकार उसके भी सप्ततत्त्वव का श्रद्धान पाया जाता है. यदि ऐसा श्रद्धान न हो तो रागादि त्यागकर शुद्धभाव करने की चाह न हो. वही कहते हैं :-
यदि जीव-अजीव की जाति न जान कर आपापर को न पहिचाने तो परमें रागादिक कैसे न करे? रागादिकको न पहिचाने तो उनका त्याग कैसे करना चाहे? वे रागादिक ही आस्रव हैं. रागादिकका फल बुरा न जाने तो किसलिये रागादिक छोड़ना चाहे? उन रागादिकका फल वही बन्ध है. तथा रागादिरहित परिणाम को पहिचानता है तो उस रूप होना चाहता है. उस रागादिरहित परिणाम ही का नाम संवर है. तथा पूर्व संसार अवस्था के कारण की हानि को पहिचानता है तो उसके अर्थ तपश्चरणादिसे शुद्धभाव करना चाहता है. उस पूर्व संसार अवस्था का कारण कर्म है उसकी हानि वही निर्जरा है. तथा संसार अवस्था के अभाव को न पहिचाने तो संवर-निर्जरा रूप किसलिये प्रवर्ते? उस संसार अवस्था का अभाव वही मोक्ष है. इसलिये सातों तत्त्ववोंका श्रद्धान होने पर ही रागादिक छोड़कर शुद्धभाव होने की इच्छा उत्पन्न होती है. यदि इनमें एक भी तत्त्वव का श्रद्धान न हो तो ऐसी चाह उत्पन्न नहीं होती. तथा ऐसी चाह तुच्छज्ञानी तिर्यंचादि सम्यग्¹ष्िट के होती हीहै।इसलियेउसकेसाततत्त्ववोंकाश्रद्धानपायाजाताहैऐसानिश्चयकरना. ज्ञानावरणका क्षयोपशम थोड़ा होने से विशेषरूप से तत्त्ववोंका ज्ञान न हो, तथापि दर्शनमोह के उपशमादिकसे सामान्यरूप से तत्त्ववश्रद्धानकी शक्ति प्रगट होती है. इसप्रकार इस लक्षणमें अव्याप्ति दूषण नहीं है.
फिर प्रश्न :- जिस काल में सम्यग्¹ष्िट विषयकषायोंके कार्यमें प्रवर्तता है उस काल में सात तत्त्ववोंका विचार ही नहीं है, वहाँ श्रद्धान कैसे सम्भवित है? और सम्यक्तत्व रहता ही है। इसलिये उस लक्षण में अव्याप्ति दूषण आता है?
समाधान :- विचार है वह तो उपयोग के आधीन है। जहाँ उपयोग लगे उसी का विचार होता है. तथा श्रद्धान है सो प्रतीति रूप है. इसलिये अन्य ज्ञेयका विचार होने पर व सोना आदि क्रिया होने पर तत्त्ववोंका विचार नहीं है। तथापि उनकी प्रतीति बनी रहती है, नष्ट नहीं होती। इसलिये उसके सम्यक्तत्व का सद्भाव है.
जैसे - किसी रोगी मनुष्यको ऐसी प्रतीति है कि मैं मनुष्य हूँ, तिर्यंचादि नहीं हूँ, मुझे इस कारण से रोग हुआ है, सो अब कारण मिटाकर रोगको घटा कर निरोग होना. तथा वही मनुष्य अन्य विचारादिरूप प्रवर्तता है, तब उसको ऐसा विचार नहीं होता, परन्तु श्रद्धान ऐसा ही रहा करता है. उसी प्रकार इस आत्मा को ऐसी प्रतीति है कि ‘मैं आत्मा हूँ पुद्गलादि नहीं हूँ, मेरे आस्रवसे बन्ध हुआ है, सो अब संवर करके, निर्जरा करके, मोक्षरूप होना’. तथा वही आत्मा अन्य विचारादिरूप प्रवर्तता है तब उसके ऐसा विचार नहीं होता, परन्तु श्रद्धान ऐसा ही रहा करता है.
फिर प्रश्न है कि ऐसा श्रद्धान रहता है तो बन्ध होने के कारणोंमें कैसे प्रवर्तता है?
उत्तर :- जैसे वही मनुष्य किसी कारणके वश रोग बढ़ने के कारणोंमेंभी प्रवर्तता है, व्यापारादिक कार्य व क्रोधादिक कार्य करता है, तथापि उस श्रद्धान का उसके नाश नहीं होता। उसी प्रकार वही आत्मा कर्म उदय निमित्तके वश बन्ध होनेके कारणोंमें भी प्रवर्तता है, विषय-सेवनादि कार्य व क्रोधादि कार्य करता है,तथापि उस श्रद्धान का उसके नाश नहीं होता. इसका विशेष निर्णय आगे करेंगे.
इसप्रकार सप्त तत्त्वव का विचार न होने पर भी श्रद्धान का सद्भाव पाया जाता है, इसलिये वहाँ अव्याप्तिपना नहीं है.
फिर प्रश्न :- उच्च दशामें जहाँ निर्विकल्प आत्मानुभव होता है वहाँ तो सप्त तत्त्ववादिकके विकल्पका भी निषेध किया है. सो सम्यक्तत्व के लक्षण का निषेध करना कैसे सम्भव है? और वहाँ निषेध सम्भव है तो अव्याप्ति दूषण आया?
उत्तर :- निचली दशामें सप्ततत्त्ववोंके विकल्पोंमें उपयोग लगाया, उससे प्रतीति को दृढ़ किया और विषयादिकसे उपयोग छुड़ाकर रागादि घटाये. तथा कार्य सिद्ध होनेपर कारणोंका भी निषेध करते हैं। इसलिये जहाँ प्रतीति भी ¹ढ़ हुई और रागादिक दूर हुए, वहाँ उपयोग भ्रमानेका खेद किसलिये करें? इसलिये वहाँ उन विकल्पोंका निषेध किया है. तथा सम्यक्तत्वका लक्षण तो प्रतीति ही है। सो प्रतीति का तो निषेध नहीं किया. यदि प्रतीति छुड़ायी हो तो इस लक्षण का निषेध किया कहा जाये, सो तो है नहीं. साातों तत्त्ववोंकी प्रतीति वहाँ भी बनी रहती है, इसलिये यहाँ अव्याप्तिपना नहीं है.
फिर प्रश्न है कि छद्मस्थके तो प्रतीति-अप्रतीतिकहना सम्भव है, इसलिये वहाँ सप्ततत्त्ववों की प्रतीति सम्यक्तत्व का लक्षण कहा सो हमने माना। परन्तु केवली-सिद्ध भगवान के तो सर्वका जानपना समानरूप है, वहाँ सप्त तत्त्ववों की प्रतीति कहना सम्भव नहीं है, और उनके सम्यक्तत्वगुण पाया ही जाता है, इसलिये वहाँ उस लक्षणका अव्याप्तिपना आया?
समाधान :- जैसे छद्मस्थके श्रुतज्ञानके अनुसार प्रतीति पायी जाती है, उसी प्रकार केवली-सिद्धभगवानके केवलज्ञानके अनुसार प्रतीति पायी जाती है. जो सप्ततत्त्ववों का स्वरूप पहले ठीक किया था, वही केवलज्ञान द्वारा जाना, वहाँ प्रतीति का परमावगाढ़पना हुआ। इसीसे परमावगाढ़ सम्यक्तत्व कहा. जो पहले श्रद्धान किया था, उसको झूठ जाना होता तो वहाँ अप्रतीति होती। सो तो जैसा सप्त तत्त्ववोंका श्रद्धान छद्मस्थके हुआ था, वैसा ही केवली-सिद्ध भगवान के पाया जाता है। इसलिये ज्ञानादिककी हीनता-अधिकता होनेपर भी तिर्यंचादिक व केवली-सिद्ध भगवान के सम्यक्तत्वगुण समान ही कहा है.
तथा पूर्व अवस्था में यह माना था कि संवर-निर्जरासे मोक्ष का उपाय करना. पश्चात़् मुक्त अवस्था होने पर ऐसा मानने लगे कि संवर-निर्जरासे हमारे मोक्ष हुआ. तथा पहले ज्ञान की हीनतासे जीवादिकके थोडे़ विशेष जाने थे, पश्चात़् केवलज्ञान होने पर उनके सर्व विशेष जाने। परन्तु मूलभूत जीवादिकके स्वरूप का श्रद्धान जैसा छद्मस्थके पाया जाताहैवैसाहीकेवलीकेपायाजाताहै.तथायद्यपिकेवली-सिद्धभगवानअन्य पदार्थोंको भी प्रतीति सहित जानते हैं, तथापि वे पदार्थ प्रयोजन भूत नहीं हैं। इसलिये सम्यक्तत्वगुणमें सप्त तत्त्ववों ही का श्रद्धान ग्रहण किया है.केवली-सिद्धभगवान रागादिरूप नहीं परिणमित होते,, संसार अवस्था को नहीं चाहते। सो यह इस श्रद्धानका बल जानना.
फिर प्रश्न है कि सम्यग्दर्शन को तो मोक्षमार्ग कहा था, मोक्षमें इसका सद्भाव कैसे कहते हैं?
उत्तर :- कोई कारण ऐसा भी होता है जो कार्य सिद्ध होनेपर भी नष्ट नहीं होता. जैसे - किसी वृक्षके किसी एक शाखासे अनेक शाखा युक्त अवस्था हुई, उसके होनेपर वह एक शाखाा नष्ट नहीं होती। उसी प्रकार किसी आत्मा के सम्यक्तत्वगुणसे अनेक गुणयुक्त मुक्त अवस्था हुई, उसके होनेपर सम्यक्तत्वगुण नष्ट नहीं होता. इस प्रकार केवली-सिद्ध भगवान के भी तत्त्ववार्थश्रद्धानलक्षण सम्यक्तत्व ही पाया जाता है, इसलिये वहाँ अव्याप्तिपना नहीं है.
फिर प्रश्न :- मिथ्या¹ष्िटके भी तत्त्ववश्रद्धान होता है ऐसा शास्त्रमें निरूपण है. प्रवचनसारमें आत्मज्ञानशुन्य तत्त्ववार्थश्रद्धान अकार्यकारी कहा है। इसलिये सम्यक्तत्वका लक्षण तत्त्ववार्थश्रद्धान करने पर उसमें अतिव्याप्ति दूषण लगता है?
समाधान :- मिथ्या¹ष्िटके जो तत्त्ववश्रद्धान कहा है, वह नामनिपेक्षसे कहा है - जिसमें तत्त्ववश्रद्धान का गुण नहीं, और व्यवहार में जिसका नाम तत्त्ववश्रद्धान कहा जाये वह मिथ्या¹ष्िट के होता है। अथवा आगमद्रव्यनिपेक्षसे होता है - तत्त्ववार्थश्रद्धानके प्रतिपादक शास्त्रोंका अभ्यास करता है, उनका स्वरूप निश्चय करने में उपयोग नहीं लगाता है - ऐसा जानना. तथा यहाँ सम्यक्तत्व का लक्षण तत्त्ववार्थश्रद्धान कहा है, सो भावनिक्षेपसे कहा है.ऐसागुणसहितसच्चातत्त्ववार्थश्रद्धानमिथ्या¹ष्िटकेकदाचित्नहींहोता.तथा आत्मज्ञानशून्य तत्त्ववार्थश्रद्धान कहा है वहाँ भी वही अर्थजानना. जिसके सच्चे जीव- अजीवादिकाश्रद्धान हो उसके आत्मज्ञान कैसे नहीं होगा? होता ही होता है. इस प्रकार किसी भी मिथ्या¹ष्िटके सच्चा तत्त्ववश्रद्धान सर्वथा नहीं पाया जाता, इसलिये उस लक्षणमें अतिव्याप्ति दूषण नहीं लगता.
तथाजोयहतत्त्ववार्थश्रद्धानलक्षणकहा,सोअसम्भवीभीनहींहै।क्तयोंकि सम्यक्तत्वका प्रतिपक्षी मिथ्यात्वका यह नहीं है। उसका लक्षण इससे विपरीततासहित है.
इसप्रकार अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भवपनेसे रहित सर्व सम्यग्¹ष्िटयोंमें तो पाया जायेऔरकिसीमिथ्या¹ष्िटमेंनपायाजाये-ऐसासम्यग्दर्शनकासच्चालक्षण तत्त्ववार्थश्रद्धान है. सम्यक्तत्वके विभिन्न लक्षणोंका समन्वय
फिर प्रश्न उत्पन्न होता है कि यहाँ सातों तत्त्ववोंके श्रद्धान का नियम कहते हो सो नहीं बनता. क्तयोंकि कहीं पर से भिन्न अपने श्रद्धान ही को सम्यक्तत्व कहते हैं. समयसारमें ‘एकत्वे नियतस्य’ इत्यादि कलश है - उसमें ऐसा कहा है कि इस आत्माका परद्रव्यसे भिन्न अवलोकन वही नियम से सम्यग्दर्शन है। इसलिये नवतत्त्वव की संततिको छोड़कर हमारे यह एक आत्मा ही होओ.
तथा कहीं एक आत्मा के निश्चयही को सम्यक्तत्व कहते हैं. पुरुषार्थसिद्ध्युपायमें ‘दर्शनमात्मविनिÂश्चति:’ऐसा पद है, सो उसका यही अर्थ है. इसलिये जीव-अजीवही का व केवल जीवहीका श्रद्धान होने पर सम्यक्तत्व होता है, सातोंके श्रद्धानका नियम होता तो ऐसा किसलिये लिखते?
समाधान :- परसे भिन्न अपना श्रद्धान होता है, सो आस्रवादिकके श्रद्धानसे रहित होता है या सहित होता है? यदि रहित होता है, तो मोक्षके श्रद्धान बिना किस प्रयोजन के अर्थ ऐसा उपाय करता है? संवर-निर्जराके श्रद्धान बिना रागादिक रहित होकर स्वरूपमें उपयोग लगानेका किसलिये उद्यम रखता है? आस्रव-बन्धके श्रद्धान बिना पूर्व अवस्थाको किसलियेछोड़ताहै?इसलियेआस्रवादिककेश्रद्धानरहितआपापरकाश्रद्धानकरना सम्भवित नहीं है. तथा यदि आस्रवादिकके श्रद्धान सहित होता है, तो स्वयमेव ही सातों तत्त्ववोंके श्रद्धानका नियम हुआ. तथा केवल आत्मा का निश्चय है, सो पर का पररूप श्रद्धान हुए बिना आत्मा का श्रद्धान नहीं होता, इसलिये अजीवका श्रद्धान होने पर ही जीव का श्रद्धान होता है. तथा उसके पूर्ववत् आस्रवादिकका भी श्रद्धान होता ही होता है, इसलिये यहाँ भी सातों तत्त्ववोंके ही श्रद्धानका नियम जानना.
तथा आस्रवादिकके श्रद्धान बिना आपापरका श्रद्धान व केवल आत्मा का श्रद्धान सच्चा नहीं होता। क्तयोंकि आत्मा द्रव्य है, सो तो शुद्ध-अशुद्ध पर्याय सहित है. जैसे - तन्तु अवलोकन बिना पटका अवलोकन नहीं होता, उसी प्रकार शुद्ध-अशुद्ध पर्याय पहिचाने बिना आत्मद्रव्य का श्रद्धान नहीं होता। उस शुद्ध-अशुद्ध अवस्था की पहिचान आस्रवादिककी पहिचानसे होती है. तथा आस्रवादिकके श्रद्धान बिना आपापरका श्रद्धान व केवल आत्माका श्रद्धान कार्यकारी भी नहीं है। क्तयोंकि श्रद्धानकरो या न करो, आप है सो आप है ही, पर है सो पर है. तथा आस्रवादिकका श्रद्धान हो तो आस्रव-बन्धका अभाव करके संवर- निर्जरारूपउपायसे मोक्षपद को प्राप्त करे. तथा जो आपापर का भी श्रद्धान कराते हैं। सो उसी प्रयोजनके अर्थ कराते हैं। इसलिये आस्रवादिकके श्रद्धानसहित आपापर का जानना व आपका जानना कार्यकारी है.
यहाँ प्रश्न है कि ऐसा है तो शास्त्रोंमें आपापरके श्रद्धानको व केवल आत्मा के तथा श्रद्धान ही को सम्यक्तत्व कहा व कार्यकारी कहा। तथा नवतत्त्वव की संतति छोड़कर हमारे एक आत्मा ही होओ - ऐसाकहा, सो किस प्रकार कहा?
समाधान :- जिसके सच्चा आपापर का श्रद्धान व आत्मा का श्रद्धान हो, उसके सातों तत्त्ववोंका श्रद्धान होता ही होता है. तथा जिसके सच्चा सात तत्त्ववोंका श्रद्धान हो उसके आपापर का व आत्माका श्रद्धान होता ही होता है - ऐसा परस्पर अविनाभावीपना जानकर आपापरके श्रद्धानको या आत्मश्रद्धानही को सम्यक्तत्व कहा है.
तथा इस छलसे कोई सामान्यरूपसे आपापरको जानकर व आत्मा को जानकर कृतकृत्यपना माने, तो उसके भ्रम है। क्तयोंकि ऐसा कहा है :-
—निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत्खरविषाणवत्
इसका अर्थ यह है :- विशेष रहित सामान्य है सो गधेके सींग समान है.
इसलिये प्रयोजनभूत आस्रवादिक विशेषों सहित आपापरका व आत्मा का श्रद्धान करना योग्य है. अथवा सातों तत्त्ववार्थोंके श्रद्धानसे रागादिक मिटाने के अर्थ परद्रव्योंको भिन्न भाता है व अपने आत्मा ही को भाता है, उसके प्रयोजन की सिद्धि होती है। इसलिये मुख्यतासे भेदविज्ञान को व आत्मज्ञान को कार्यकारी कहा है.
तथा तत्त्ववार्थ-श्रद्धान किये बिना सर्व जानना कार्यकारी नहीं है, क्तयोंकि प्रयोजन तो रागादिक मिटानेका है। सो आस्रवादिकके श्रद्धान बिना यह प्रयोजन भासित नहीं होता। तब, केवल जाननेही से मानको बढ़ाता है। रागादिक नहीं छोड़ता, तब उसका कार्य कैसे सिद्धहोगा?तथानवतत्त्ववसंततिकाछोड़नाकहाहै।सोपूर्वमेंनवतत्त्ववकेविचारसे सम्यग्दर्शन हुआ, पश्चात् निर्विकल्प दशा होने के अर्थ नवतत्त्ववोंके भी विकल्प छोड़नेकी चाह की. तथा जिसके पहले ही नवतत्त्ववोंका विचार नहीं है, उसको वह विकल्प छोड़नेका क्तया प्रयोजन है? अन्य अनेक विकल्प आपके पाये जाते हैं उन्हीं का त्याग करो.
इस प्रकार आपापर के श्रद्धान में व आत्मश्रद्धानमें साततत्त्ववोंके श्रद्धान की सापेक्षता पायी जाती है, इसलिये तत्त्ववार्थश्रद्धान सम्यक्तत्व का लक्षण है.
फिर प्रश्न है कि कहीं शास्त्रोंमें अरहन्त देव, निर्ग्रन्थ गुरु, हिंसारहित धर्मके श्रद्धान
को सम्यक्तत्व कहा है, सो किस प्रकार है?
समाधान :- अरहन्त देवादिकके श्रद्धानसे कुदेवादिकका श्रद्धान दूर होने के कारण गृहीतमिथ्यात्वका अभाव होता है, उस अपेक्षा इसको सम्यक्तत्व कहा है. सर्वथा सम्यक्तत्वका लक्षण यह नहीं है। क्तयोंकि द्रव्यलिंगी मुनि आदि व्यवहार धर्मके धारक मिथ्या¹ष्िटोंके भी ऐसा श्रद्धान होता है.
अथवा जैसे अणुव्रत, महाव्रत होने पर तो देशचारित्र, सकलचारित्र हो या न हो। परन्तु अणुव्रत, महाव्रत हुए बिना देशचारित्र, सकलचारित्र कदाचित् नहीं होता। इसलिये इन व्रतोंको अनवयरूप कारण जानकर कारणमें कार्यका उपचार करके इनको चारित्र कहा है. उसीप्रकारअरहन्तदेवादिककाश्रद्धानहोनेपरतोसम्यक्तत्वहोयानहो।परन्तु अरहन्तादिकका श्रद्धान हुए बिना तत्त्ववार्थश्रद्धानरूप सम्यक्तत्व कदाचित् नहीं होता। इसलिये अरहन्तादिकके श्रद्धानको अनवयरूप कारण जानकर कारणमें कार्यका उपचार करके इस श्रद्धानको सम्यक्तत्व कहा है. इसीसे इसका नाम व्यवहार सम्यक्तत्व है.
अथवा जिसके तत्त्ववार्थश्रद्धान हो, उसके सच्चे अरहन्तादिकके स्वरूपका श्रद्धान होता ही होता है. तत्त्ववार्थश्रद्धान बिना पक्षसे अरहन्तादिकका श्रद्धान करे, परन्तु यथावत् स्वरूप की पहिचान सहित श्रद्धान नहीं होता. तथा जिसके सच्चे अरहन्तादिकके स्वरूपका श्रद्धान हो, उसके तत्त्ववश्रद्धान होता ही होता है। क्तयोंकि अरहन्तादिकका स्वरूप पहिचाननेसे जीव- अजीव-आस्रवादिककी पहिचान होती है.
इसप्रकारइनकोपरस्परअविनाभावीजानकरकहींअरहन्तादिककेश्रद्धानको सम्यक्तत्व कहा है.
यहाँ प्रश्न है कि नारकादि जीवोंके देव-कुदेवादिकका व्यवहार नहीं है और उनके सम्यक्तत्व पाया जाता है। इसलिये सम्यक्तत्व होनेपर अरहन्तादिकका श्रद्धान होता ही होता है, ऐसा नियम सम्भव नहीं है?
समाधान:-सप्ततत्त्ववोंकेश्रद्धानमेंअरहन्तादिककाश्रद्धानगर्भितहै।क्तयोंकि तत्त्ववश्रद्धान में मोक्षतत्त्ववको सर्वोत्कृष्ट माानते हैं, वह मोक्षतत्त्वव तो अरहन्त-सिद्धका लक्षण है. जो लक्षणको उत्कृष्ट माने वह उसके लक्ष्यको उत्कृष्ट माने ही माने। इसलिये उनको भी सर्वोत्कृष्ट मााना, औरको नहीं माना। वही देव का श्रद्धान हुआ. तथा मोक्षके कारण संवर- निर्जरा हंै, इसलिये इनको भी उत्कृष्ट मानता है। और संवर-निर्जरा के धारक मुख्यत: मुनि हैं, इसलिये मुनि को उत्तम माना, औरोंको नहीं माना। वही गुरुका श्रद्धान हुआ. तथा रागादिक रहित भाव का नाम अहिंसा है, उसी को उपादेय मानते हैं, औरोंको नहीं मानते। वही धर्मका श्रद्धान हुआ. इसप्रकार तत्त्ववश्रद्धान में गर्भित अरहन्तदेवादिकका श्रद्धान होता है. अथवा जिस निमित्तसे इसके तत्त्ववार्थश्रद्धान होता है, उस निमित्तसे अरहन्तदेवादिकका भी श्रद्धान होता है. इसलिये सम्यक्तत्व में देवादिकके श्रद्धानका नियम है.
फिर प्रश्न है कि कितने ही जीव अरहन्तादिकका श्रद्धान करते हैं, उनके गुण पहिचानतेहैंऔरउनकेतत्त्ववश्रद्धानरूपसम्यक्तत्वनहींहोता।इसलियेजिसकेसच्चा अरहन्तादिकका श्रद्धान हो, उसके तत्त्ववश्रद्धान होता ही होता है - ऐसा नियम सम्भव नहीं है?
समाधान :- तत्त्ववश्रद्धान बिना अरहन्तादिकके छियालीस आदि गुण जानता है वह पर्यायाश्रित गुण जानता है। परन्तु भिन्न-भिन्न जीव-पुद्गलमें जिसप्रकार सम्भव है उस प्रकार यथार्थ नहीं पहिचानता, इसलिये सच्चा श्रद्धान भी नहीं होता। क्तयोंकि जीव-अजीव जाति पहिचाने बिना अरहन्तादिकके आत्माश्रित गुणोंको व शरीराश्रित गुणोंको भिन्न-भिन्न नहीं जानता. यदि जाने तो अपनी आत्माको परद्रव्यसे भिन्न कैसे न माने? इसलिये प्रवचनसारमें ऐसा कहा है :-
जो जाणदि अरहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं .
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ॥८०॥
इसका अर्थ यह है :- जो अरहन्तको द्रव्यत्व, गुणत्व, पर्यायत्व से जानता है वह आत्मा को जानता है। उसका मोह विलयको प्राप्त होता है.
इसलिये जिसके जीवादि तत्त्ववोंका श्रद्धान नहीं है, उसके अरहन्तादिकका भी सच्चा श्रद्धान नहीं है. तथा मोक्षादिक तत्त्ववके श्रद्धान बिना अरहन्तादिकका महात्म्य यथार्थ नहीं जानता.लौकिकअतिशयादिसेअरहन्तका,तपश्चरणादिसेगुरुकाऔरपरजीवोंकी अहिंसादिसे धर्मकी महिमा जानता है, सो यह पराश्रितभाव हैं. तथा आत्माश्रित भावोंसे अरहन्तादिकका स्वरूप तत्त्ववश्रद्धान होनेपर ही जाना जाता है। इसलिये जिसके सच्चा अरहन्तादिकका श्रद्धान हो उसके तत्त्ववश्रद्धान होता ही होता है - ऐसा नियम जानना.
इसप्रकार सम्यक्तत्व का लक्षणनिर्देश किया.
यहाँ प्रश्न है कि सच्चा तत्त्ववार्थश्रद्धान व आपापर का श्रद्धान व आत्मश्रद्धान व देव- गुरु-धर्मका श्रद्धान सम्यक्तत्व का लक्षण कहा. तथा इन सर्व लक्षणोंकि परस्पर एकता भी दिखायी सो जानी। परन्तु अन्य-अन्य प्रकार लक्षण कहने का प्रयोजन क्तया?
उत्तर :- यह चार लक्षण कहे, उनमें सच्ची ¹ष्िटसे एक लक्षण ग्रहण करने पर चारों लक्षणोंका ग्रहण होता है. तथापि मुख्य प्रयोजन भिन्न-भिन्न विचारकर अन्य-अन्य प्रकार लक्षण कहे हैं.
जहाँ तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षण कहा है, वहाँ तो यह प्रयोजन है कि इन तत्त्ववोंको पहिचानेतो यथार्थ वस्तुके स्वरूपका व अपने हित-अहित का श्रद्धान करे तब मोक्षमार्गमें प्रवर्ते.
तथा जहाँ आपापरका भिन्न श्रद्धान लक्षण कहा है, वहाँ तत्त्ववार्थश्रद्धानका प्रयोजन जिससे सिद्ध हो उस श्रद्धान को मुख्य लक्षण कहा है. जीव-अजीवके श्रद्धान का प्रयोजन आपापर का भिन्न श्रद्धान करना है. तथा आस्रवादिकके श्रद्धानका प्रयोजन रागादिक छोड़ना है, सो आपापर का भिन्न श्रद्धान होनेपर परद्रव्यमें रागादि न करने का श्रद्धान होता है. इस प्रकार तत्त्ववार्थश्रद्धानका प्रयोजन आपापर के भिन्न श्रद्धानसे सिद्ध होता जानकर इस लक्षण को कहा है.
तथा जहाँ आत्मश्रद्धान लक्षण कहा है, वहाँ आपापरके भिन्न श्रद्धानका प्रयोजन इतना ही है कि - आपको आप जानना. आपको आप जाननेपर पर का भी विकल्प कार्यकारी नहीं है. ऐसे मूलभूत प्रयोजनकी प्रधानता जानकर आत्मश्रद्धानको मुख्य लक्षण कहा है.
तथा जहाँ देव-गुरु-धर्मका श्रद्धान लक्षण कहा है, वहाँ बाह्य साधन की प्रधानता कीहै।क्तयोंकिअरहन्तदेवादिककाश्रद्धानसच्चेतत्त्ववार्थश्रद्धानकाकारणहैऔर कुदेवादिकका श्रद्धान कल्पित तत्त्ववश्रद्धानका कारण है. सो बाह्य कारण कि प्रधानता से कुदेवादिकका श्रद्धान छुड़ाकर सुदेवादिकका श्रद्धान कराने के अर्थ देव-गुरु-धर्मके श्रद्धान को मुख्य लक्षण कहा है.
इसप्रकार भिन्न-भिन्न प्रयोजनोंकी मुख्यता से भिन्न-भिन्न लक्षण कहे हैं.
यहाँ प्रश्न है कि यह चार लक्षण कहे, उनमें यह जीव किस लक्षणको अंगीकार करे?
समाधान :- मिथ्यात्वकर्मके उपशमादि होनेपर विपरीताभिनिवेशका अभाव होता है। वहाँ चारों लक्षण युगपत् पाये जाते हैं. तथा विचार अपेक्षा मुख्यरूपसे तत्त्ववार्थोंका विचार करता है, या आपापरका भेदविज्ञान करता है, या आत्मस्वरूपही का स्मरण करता है, या देवादिकका स्वरूप विचारता है. इसप्रकार ज्ञानमें तो नानाप्रकार विचार होते हैं, परन्तु श्रद्धान में सर्वत्र परस्पर सापेक्षपना पाया जाता है. तत्त्ववविचार करता है तो भेदविज्ञानादिके अभिप्राय सहित करता है. और भेदविज्ञान करता है तो तत्त्ववविचारादिके अभिप्राय सहित करता है. इसी प्रकार अन्यत्र भी परस्पर सापेक्षपना है। इसलिये सम्यग्¹ष्िटके श्रद्धान में चारों ही लक्षणोंका अंगीकार है.
तथा जिसके मिथ्यात्वका उदय है उसके विपरीताभिनिवेश पाया जाता है। उसके यह लक्षण आभासमात्र होते हैं, सच्चे नहीं होते. जिनमतके जीवादिक तत्त्ववोंको मानता है, अन्यको नहीं मानता, उनके नाम-भेदादिकको सीखता है - ऐसा तत्त्ववश्रद्धान होता है। परन्तु उनके यथार्थ भावका श्रद्धान नहीं होता. तथा आपापर के भिन्नपने की बातें करे, चिंतवन करे। परन्तु जैसे पर्यायमें अहंबुद्धि है और वस्त्रादिकमें परबुद्धि है, वैसे आत्मामें अहंबुद्धि और शरीरादिमें परबुद्धि नहीं होती. तथा आत्माका जिनवचनानुसार चिंतवन करे। परन्तु प्रतीतिरूप आपका आपरूप श्रद्धान नहींं करता है. तथा अरहन्तदेवादिकके सिवा अन्य कुदेवादिकको नहीं मानता। परन्तु उसके स्वरूपको यथार्थ पहिचानकर श्रद्धान नहींं करता - इसप्रकार यह लक्षणाभास मिथ्या¹ष्िटके होते हैं. इनमें कोई होता है, कोई नहीं होता। वहाँ इनके भिन्नपना भी सम्भवित है.
तथा इन लक्षणाभासोंमें इतना विशेष है कि पहले तो देवादिकका श्रद्धान हो, फिर तत्त्ववोंका विचार हो, फिर आपापरका चिंतवन करे, फिर केेवल आत्मा का चिंतवन करे - इस अनुक्रमसे साधन करे तो परम्परा सच्चे मोक्षमार्गको पाकर कोई जीव सिद्धपद को भी प्राप्त कर ले. ताथा इस अनुक्रमका उल्लंघन करके - जिसके देवादिककी मान्यता का तो कुछ ठिकाना नहीं है और बुद्धिकी तीव्रता से तत्त्ववविचारादिमें प्रवर्तता है, इसलिये अपने को ज्ञानी जानता है। अथवा तत्त्ववविचारमें भी उपयोग नहीं लगाता, आपापर का भेदविज्ञानी हुआ रहता है। अथवा आपापर का भी ठीक नहीं करता, और अपने को आत्मज्ञानी मानता है. सो यह सब चतुराई की बातें हैं, मानादिक कषायके साधन हैं, कुछ भी कार्यकारी नहीं हैं. इसलिये जो जीव अपना भला करना चाहे, उसे जबतक सच्चे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति न हो, तब तक इनको भी अनुक्रम ही से अंगीकार करना.
वही कहते हैं :- पहले तो आज्ञादिसे व किसी परीक्षा से कुदेवादिककी मान्यता छोड़कर अरहन्तदेवादिकका श्रद्धान करना। क्तयोंकि यह श्रद्धान होनेपर गृहीतमिथ्यात्वका तो अभाव होता है, तथा मोक्षमार्गके वि¼न करने वाले कुदेवादिकका निमित्त दूर होता है, मोक्षमार्गकासहायकअरहन्तदेवादिककानिमित्तमिलताहै।इसलियेपहलेदेवादिकका श्रद्धानकरना.फिरजिनमतमेंकहेजीवादिकतत्त्ववोंकाविचारकरना,नाम-लक्षणादि सीखना। क्तयोंकि इस अभ्याससे तत्त्ववार्थश्रद्धान की प्राप्ति होती है. फिर आपापरका भिन्नपना जैसे भासित हो वैसा विचार करता रहे। क्तयोंकि इस अभ्याससे भेदविज्ञान होता है.
फिर आपमें अपनत्व मनानेके अर्थ स्वरूपका विचार करता रहे। क्तयोंकि इस अभ्याससे आत्मानुभवकी प्राप्ति होती है.
इसप्रकार अनुक्रमसे इनको अंगीकार करके फिर इन्हीं में कभी देवादिकके विचारमें, कभी तत्त्ववविचार में, कभी आपापरके विचार में, कभी आत्म विचारमें उपयोग लगाये. ऐसे अभ्याससे दर्शनमोह मन्द होता जाये तब कदाचित् सच्चे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है. परन्तु ऐसा नियम तो है नहीं। किसी जीव के कोई प्रबल विपरीत कारण बीचमें हो जाये तो सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं भी होती। परन्तु मुख्यरूप से बहुत जीवोंके तो इस अनुक्रमसे कार्यसिद्धि होती है। इसलिये इनको इसप्र्रकार अंगीकार करना. जैसे - पुत्रका अर्थी विवाहादि कारणोंको मिलाये, पश्चात् बहुत पुरुषोंके तो पुत्र की प्राप्ति होती ही है। किसी को न हो तो न हो. इसे तो उपाय करना. उसी प्रकार सम्यक्तत्वका अर्थी इन कारणोंको मिलाये, पश्चात् बहुत जीवोंके तो सम्यक्तत्वकी प्राप्ति होती ही है। किसी को न हो तो नहीं भी हो. परन्तु इसे तो अपने से बने वह उपाय करना.
इसप्रकार सम्यक्तत्वका लक्षण निर्देश किया.
यहाँ प्रश्न है कि सम्यक्तत्वके लक्षण तो अनेक प्रकार कहे, उनमें तुमने तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षण को मुख्य किया सो कारण क्तया?
समाधान :- तुच्छबुद्धियोंको अन्य लक्षणमें प्रयोजन प्रगट भासित नहीं होता व भ्रम उत्पन्न होता है. और इस तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षणमें प्रगट प्रयोजन भासित होता है, कुछ भ्रम उत्पन्न नहीं होता, इसलिये इस लक्षणको मुख्य किया है. वही बतलाते हैं :-
देव-गुरु-धर्मके श्रद्धान में तुच्छबुद्धियोंको यह भासित हो कि अरहन्तदेवादिकको मानना, औरको नहीं मानना, इतना ही सम्यक्तत्व है. वहाँ जीव-अजीवका व बन्ध-मोक्षके कारण-कार्यकास्वरूपभासितनहो,तबमोक्षमार्गप्रयोजनकीसिद्धिनहो।व जीवादिकका श्रद्धान हुए बिना इसी श्रद्धानमें सन्तुष्ट होकर अपने को सम्यक्तत्वी माने। एक कुदेवादिकसे द्वेष तो रखे, अन्य रागादि छोड़नेका उद्यम न करे। ऐसा भ्रम उत्पन्न हो.
तथा आपापरके श्रद्धानमें तुच्छबुद्धियोंको यह भासित हो कि आपापरका ही जानना कार्यकारी है, इसी से सम्यक्तत्व होता है. वहाँ आस्रवादिकका स्वरूप भासित न हो, तब मोक्षमार्ग प्रयोजन की सिद्धि न हो। व अस्रवादिकका श्रद्धान हुए बिना इतना ही जाननेमें सन्तुष्ट होकर अपने को सम्यक्तत्वी माने, स्वच्छन्द होकर रागादि छोड़नेका उद्यम न करें। ऐसा भ्रम उत्पन्न हो.
तथा आत्मश्रद्धानमें तुच्छबुद्धियोंको यह भासित हो कि आत्माही का विचार कार्यकारी है, इसी से सम्यक्तत्व होता है. वहाँ जीव-अजीवादिकका विशेष व आस्रवादिकका स्वरूप भासितनहो,तबमोक्षमार्गप्रयोजनकोसिद्धिनहो।वजीवादिककेविशेषव आस्रवादिकके स्वरूप का श्रद्धान हुए बिना इतने ही विचार से अपनेको सम्यक्तत्वी माने, स्वच्छन्द होकर रागादि छोड़नेका उद्यम न करे. - इसके भी ऐसा भ्रम उत्पन्न होता है.
ऐसा जानकर इन लक्षणोंको मुख्य नहीं किया.
तथातत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षणमें जीव-अजीवादिकका व आस्रवादिकका श्रद्धान होता है, वहाँ सर्वका स्वरूप भलीभाँति भासित होता है, तब मोक्षमार्गके प्रयोजन की सिद्धि होती है. तथा यह श्रद्धान होनेपर सम्यक्तत्वी होता है, परन्तु यह सन्तुष्ट नहीं होता. आस्रवादिकका श्रद्धान होनेसे रागादि छोड़कर मोक्षका उद्यम रखता है. इसके भ्रम उत्पन्न नहीं होता. इसलिये तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षणको मुख्य किया है.
अथवातत्त्ववार्थश्रद्धानलक्षणमेंतोदेवादिककाश्रद्धानवआपापरकाश्रद्धानव आत्मश्रद्धान गर्भित होता है, वह तो तुच्छबुद्धियोंको भी भासित होता है. तथा अन्य लक्षणमें तत्त्ववश्रद्धानका गर्भितपना विशेष बुद्धिमान हों उन्हीं को भासित होता है, तुच्छबुद्धियोंको नहीं भासित होता। इसलिये तत्त्ववार्थश्रद्धान लक्षणको मुख्य किया है.
अथवामिथ्या¹ष्िटकेआभासमात्रयहहों।वहाँतत्त्ववार्थोंकाविचारतोशीघ्रतासे विपरीताभिनिवेश दुर करने को कारण होता है, अन्य लक्षण शीघ्र कारण न हों, व विपरीताभिनिवेशके भी कारण हो जायें.
इसलिये यहाँ सर्वप्रकार प्रसिद्ध जानकर विपरीताभिनिवेश रहित जीवादि तत्त्ववार्थोंका श्रद्धान सो ही सम्यक्तत्व का लक्षण है, ऐसा निर्देश किया. ऐसे लक्षण निर्देश का निरूपण किया.
ऐसा लक्षण जिस आत्मा के स्वभावमें पाया जाता है वही सम्यक्तत्वी जानना.
सम्यक्तत्वके भेद और उनका स्वरूप
अब, इस सम्यक्तत्वके भेद बतलाते हैं :-
वहाँ प्रथम निश्चय-व्यवहारका भेद बतलाते है - विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धानरूप आत्माका परिणाम वह तो निश्चयसम्यक्तत्व है, क्तयोंकि यह सत्यार्थ सम्यक्तत्वका स्वरूप है, सत्यार्थहीका नाम निश्चय है. तथा विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धानको कारणभूत श्रद्धान सो व्यवहारसम्यक्तत्व है, क्तयोंकि कारणमें कार्यका उपचार किया है, सो उपचारहीका नाम व्यवहार है.
वहाँ सम्यग्¹ष्िट जीवके देव-गुरु-धर्मादिकका सच्चा श्रद्धान है, उसी निमित्तसे इसके श्रद्धानमेंविपरीताभिनिवेशकाअभावहै.यहाँविपरीताभिनिवेशरहितश्रद्धानसोतो निश्चयसम्यक्तत्व है और देव-गुरु-धर्मादिकका श्रद्धान है सो व्यवहारसम्यक्तत्व है.
इस प्रकार एक ही कालमें दोनों सम्यक्तत्व पाये जाते हैं.
तथा मिथ्या¹ष्िट जीवके देव-गुरु-धर्मादिकका श्रद्धान अभ्यासमात्र होता है और इसके श्रद्धानमें विपरीताभिनिवेशका अभाव नहीं होता। इसलिये यहाँ निश्चयसम्यक्तत्व तो है नहीं और व्यवहारसम्यक्तत्व भी आभासमात्र है। क्तयोंकि इसके देव-गुरु-धर्मादिकका श्रद्धान है सो विपरीताभिनिवेशके अभावको साक्षात् कारण नहीं हुआ. कारण हुए बिना उपचार सम्भव नहीं है। इसलिये साक्षात् कारण अपेक्षा व्यवहारसम्यक्तत्व भी इसके सम्भव नहीं है.
अथवा इसके देव-गुरु-धर्मादिकका श्रद्धान नियमरूप होता है, सो विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धान को परम्परा कारणभूत है. यद्यपि नियमरूप कारण नहीं है, तथापि मुख्यरूपसे कारण है. तथा कारणमें कार्यका उपचार सम्भव है। इसलिये मुख्यरूप परम्परा कारण अपेक्षा मिथ्या¹ष्िट के भी व्यवहारसम्यक्तत्व कहा जाता है.
यहाँ प्रश्न है कि कितने ही शास्त्रोंमें देव-गुरु-धर्मके श्रद्धानको व तत्त्ववश्रद्धान को तोव्यवहारसम्यक्तत्वकहाहैऔरआपापरकेश्रद्धानकोवकेवलआत्माकेश्रद्धानको निश्चयसम्यक्तत्व कहा है सो किस प्रकार है?
समाधान:-देव-गुरु-धर्मकेश्रद्धानमेंतोप्रवृत्तिकीमुख्यताहै।जोप्रवृत्तिमें अरहन्तादिकको देवादिक माने और को न माने, उसे देवादिकका श्रद्धानी कहा जाता है. और तत्त्ववश्रद्धानमें उनके विचार की मुख्यता है। जो ज्ञानमें जीवादिक तत्त्ववोंका विचार करे, उसे तत्त्ववश्रद्धानीकहते हैं. इस प्रकार मुख्यता पायी जाती है. सो यह दोनों किसी जीव को सम्यक्तत्व के कारण तो होते हंै, परन्तु इसका सद्भाव मिथ्या¹ष्िट के भी सम्भव नहीं है। इसलिये इनको व्यवहारसम्यक्तत्व कहा है.
तथा आपापरके श्रद्धानमें व आत्मश्रद्धानमें विपरीताभिनिवेशरहितपनेकी मुख्यता है. जो आपापर का भेद विज्ञान करे व अपने आत्मा का अनुभव करे उसके मुख्यरूपसे विपरीताभिनिवेश नहीं होता। इसलिये भेदविज्ञानीको व आत्मज्ञानीको सम्यग्¹ष्िट कहते हैं. इस प्रकार मुख्यता से आपापरका श्रद्धान व आत्मश्रद्धान सम्यग्¹ष्िटके ही पाया जाता है। इसलिये इनको निश्चयसम्यक्तत्व कहा.
ऐसाकथनमुख्यताकीअपेक्षाहै.तारतम्यरूपसेयहचारोंआभासमात्र- मिथ्या¹ष्िटके होते हैं, सच्चे-सम्यग्¹ष्िटके होते हैं. वहाँ आभासमात्र हैं - वे तो नियम बिना परम्परा कारण हैं और सच्चे हैं - सो नियमरूप साक्षात् कारण हैं। इसलिये इनको व्यवहाररूपकहतेहैं.इनकेनिमित्तसेजोविपरीताभिनिवेशरहितश्रद्धानहुआसो निश्चयसम्यक्तत्व है - ऐसा जानना.
फिर प्रश्न :- कितने ही शाास्त्रोंमें लिखा है कि आत्मा है वही निश्चयसम्यक्तत्व है और सर्व व्यवहार है सो किस प्रकार है?
समाधान :- विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धान हुआ सो आत्मा ही का स्वरूप है, वहाँ अभेदबुद्धिसे आत्मा और सम्यक्तत्व में भिन्नता नहीं है इसलिये निश्चयसे आत्मा ही को सम्यक्तत्व कहा. अन्य-सर्व सम्यक्तत्वको निमित्तमात्र हैं व भेद-कल्पना करने पर आत्मा और सम्यक्तत्वके भिन्नता कही जाती है। इसलिये अन्य सर्व व्यवहार कहे हैं - ऐसा जानना.
इस प्रकार निश्चयसम्यक्तत्व और व्यवहारसम्यक्तत्वसे सम्यक्तत्व के दो भेद हैं.
तथा अन्य निमित्तादि अपेक्षा आज्ञानसम्यक्तत्वादि सम्यक्तत्वके दस भेद किये हैं.
वह आत्मानुशासनमें कहा है :-
आज्ञामार्गसमु…वमुपदेशात्सूत्रबीजसंक्षेपात् .
विस्तारार्थाभ्यां भवमवपरमावादिगाढे च ॥११॥
अर्थ :- जिनआज्ञासे तत्त्ववश्रद्धान हुआ हो सो आज्ञासम्यक्तत्व है.
यहाँ इतना जानना - ‘मुझको जिनआज्ञा प्रमाण है’, इतना ही श्रद्धान सम्यक्तत्व नहीं है. आज्ञा मानना तो कारणभूत है. इसीसे यहाँ आज्ञासे उत्पन्न कहा है. इसलिये पहले जिनआज्ञा मानने से पश्चात् जो तत्त्ववश्रद्धान हुआ सोआज्ञासम्यक्तत्वहै. इसीप्रकार निर्ग्रन्थ मार्ग के अवलोकन से तत्त्ववश्रद्धान हो सोमार्गसम्यक्तत्वहैं ं ं ं ंं
इसप्रकार आठ भेद तो कारण अपेक्षा किये. तथा श्रुतकेवली के जो तत्त्ववश्रद्धान है उसेअवगाढ़सम्यक्तत्वकहतेहैं.केवलज्ञानीकेजोतत्त्ववश्रद्धानहैउसको परमावगाढ़सम्यक्तत्वकहते हैं. - ऐसे दो भेद ज्ञान के सहकारीपने की अपेक्षा किये.
इस प्रकार सम्यक्तत्व के दस भेद किये.
वहाँ सर्वत्र सम्यक्तत्वका स्वरूप तत्त्ववार्थश्रद्धान ही जानना.
तथा सम्यक्तत्वके तीन भेद किये हैं :- १-औपशमिक, २-क्षायोपशमिक, ३-क्षायिक. सो यह तीन भेद दर्शनमोहकी अपेक्षा किये हैं.
वहाँऔपशमिकसम्यक्तत्वकेदोभेदहैं-प्रथमोपशमसम्यक्तत्वऔर द्वितीयोपशमसम्यक्तत्व. वहाँ मिथ्या¹ष्िट गुणस्थानमें करण द्वारा दर्शनमोहका उपशम करके जो सम्यक्तत्व उत्पन्न हो, उसे प्रथमोपशमसम्यक्तत्व कहते हैं.
वहाँ इतना विशेष है - अनादि मिथ्या¹ष्िट के तो एक मिथ्यात्वप्रकृति का ही उपशम होता है, क्तयोंकि इसके मिश्रमोहनीय और सम्यक्तत्वमोहनीय की सत्ता है नहीं. जब जीव उपशमसम्यक्तत्वकोप्राप्तहो,वहाँउससम्यक्तत्वकेकालमेंमिथ्यात्वकेपरमाणुओंको मिश्रमोहनीयरूप और सम्यक्तत्वमोहनीयरूप परिणमित करता है तब तीन प्रकृतियोंकी सत्ता होती है। इसलिये अनादि मिथ्या¹ष्िट के एक मिथ्यात्वप्रकृतिकी सत्ता है, उसी का उपशम होता है. तथा सादि मिथ्या¹ष्िट के किसी के तीन प्रकृतियोंकी सत्ता है, किसी के एक ही कीे सत्ता है. जिसके सम्यक्तत्वकालमें तीन की सत्ता हुई थी वह सत्ता पायी जाये, उसके तीन की सत्ता है और जिसके मिश्रमोहनीय, सम्यक्तत्वमोहनीयकी उद्वेलना हो गई हो, उनके परमाणु मिथ्यात्वरूप परिणमित हो गये हों, उसके एक मिथ्यात्व की सत्ता है। इसलिये सादि मिथ्या¹ष्िटके तीन प्रकृतियोंका व एक प्रकृति का उपशम होता है.
उपशम क्तया? सो कहते हैं :- अनिवृत्तिकरणमेंकिये अन्तरकरणविधानसे जो सम्यक्तत्व के कालमें उदय आने योग्य निषेक थे, उनका तो अभाव किया, उनके परमाणु अन्यकालमें उदय आने योग्य निषेकरूप किये . तथा अनिवृत्तिकरणमें ही किये उपशमविधान सेजो उस काल के पश्चाात् उदय आने योग्य निषेक थे वे उदीरणारूप होकर इस काल में उदय न आसकें ऐसे किये.
इसप्रकार जहाँ सत्ता तो पायी जाये और उदय न पाया जाये - उसका नाम उपशम है.
यह मिथ्यायत्व से हुआ प्रथमोपशमसम्यक्तत्व है, सो चतुर्थादि सप्तम गुणस्थानपर्यन्त पाया जाता है.
तथाउपशमश्रेणीकेसन्मुखहोनेपरसप्तमगुणस्थानमेंक्षयोपशमसम्यक्तत्वसेजो उपशम सम्यक्तत्व हो, उसका नाम द्वितीयोपशमसम्यक्तत्व है. यहाँ करण द्वारा तीन ही प्रकृतियोंका उपशम होता है, क्तयोंकि इसके तीन ही की सत्ता पायी जाती है. यहाँ भी अन्तरकरण विधान से व उपशम विधान से उनके उदयका अभाव करता है वही उपशम है. सो यह द्वितीयोपशमसम्यक्तत्व सप्तमादि ग्यारहवें गुणस्थान पर्यन्त होता है. गिरते हुए किसीके छट्ठे, पाँचवें और चौथे भी रहता है. - ऐसा जानना.
इस प्रकार उपशमसम्यक्तत्व दो प्रकार का है. सो यह सम्यक्तत्व वर्त्तमानकाल में क्षायिकवत् निर्मल है। इसके प्रतिपक्षी कर्मकी सत्ता पायी जाती, इसलिये अन्तर्मुहूर्त्त कालमात्र यह सम्यक्तत्व रहता है. पश्चात् दर्शनमोहका उदय आता है - ऐसा जानना.
इसप्रकार उपशमसम्यक्तत्व का स्वरूप कहा.
तथा जहाँ दर्शनमोह की तीन प्रकृतियोंमें सम्यक्तत्वमोहनीयका उदय हो, अन्य दो का उदय न हो, वहाँ क्षयोपशमसम्यक्तत्व होता है. उपशमसम्यक्तत्वका काल पूर्ण होनेपर यह सम्यक्तत्व होता है व सादिमिथ्या¹ष्िटके मिथ्यात्वगुणस्थानसे व मिश्रगुणस्थानसे भी इसकी प्राप्ति होती है.
क्षयोपशम क्तया? सो कहते हैं :- दर्शनमोहकी तीन प्रकृतियोंमें मिथ्यात्व का अनुभाग है, उसके अनन्तवें भाग मिश्रमोहनीयका है, उसके अनन्तवेंभाग सम्यक्तत्वमोहनीयका है. इनमें सम्यक्तत्वमोहनीय प्र्रकृति देशघाती है। इसका उदय होने पर भी सम्यक्तत्वका घात नहीं होता. किंचित् मलिनता करे, मूलघात न कर सके, उसीका नाम देशघाती है.
सो जहाँ मिथ्यात्व व मिश्रमिथ्यात्व के वर्त्तमान काल में उदय आने योग्य निषेकोंका उदय हुए बिना ही निर्जरा होती है वह तो क्षय जानना, और आगामीकाल में उदय आने योग्य निषेकोंकि सत्ता पायी जाये वही उपशम है, और सम्यक्तत्वमोहनीयका उदय पाया जाताहै,ऐसीदशाजहाँहोसोक्षयोपशमहै।इसलियेसमलतत्त्ववार्थश्रद्धानहोवह क्षयोपशमसम्यक्तत्व है.
यहाँ जो मल लगता है, उसका तारतम्यस्वरूप तो केवली जानते हैं। उदाहरण बतलानेके अर्थ चल मलिन अगाढ़पना कहा है. वहाँ व्यवहारमात्र देवादिककी प्रतीति तो हो, परन्तु अरहन्तदेवादिमें - यह मेरा है, यह अन्य का है, इत्यादि भाव सो चलपना है. शंकादिमललगेसोमलिनपनाहै.यहशान्तिनाथशांतिकर्त्ताहै,इत्यादिभावसो अगाढ़पनाहै.ऐसेउदाहरणव्यवहारमात्रबतलाये,परन्तुनियमरूपनहींहै. क्षयोपशमसम्यक्तत्व में जो नियमरूप कोई मल लगता है सो केवली जानते हैं. इतना जानना कि इसके तत्त्ववार्थश्रद्धान में किसी प्रकार से समलपना होता है, इसलिये यह सम्यक्तत्व निर्मल नहीं है. इस क्षयोपशमसम्यक्तत्वका एक ही प्रकार है, इसमें कुछ भेद नहीं है.
इतनाविशेषहैकिक्षायिकसम्यक्तत्वकेसन्मुखहोनेपरअन्तर्मुहूर्त्तकालमात्रजहाँ मिथ्यात्वकी प्रकृतिका क्षय करता है, वहाँ दो ही प्रकृतियोंकी सत्ता रहती है. पश्चात् मिश्रमोहनीयका भी क्षय करता है वहाँ सम्यक्तत्वमोहनीय की ही सत्ता रहती है. पश्चात् सम्यक्तत्वमोहनीय की काण्डकघातादि क्रिया नहीं करता, वहाँ कृतकृत्यवेदकसम्यग्¹ष्िट नाम पाता है - ऐसा जानना.
तथाइसक्षयोपशमसम्यक्तत्वहीकानामवेदकसम्यक्तत्वहै.जहाँ मिथ्यात्वमिश्रमोहनीयकीमुख्यतासेकहाजाये,वहाँक्षयोपशमनामपाताहै. सम्यक्तत्वमोहनीयकी मुख्यता से कहा जाये, वहाँ वेदक नाम पाता है. सो कथनमात्र दो नाम हैं, स्वरूप में भेद नहीं है. तथा यह क्षयोपशमसम्यक्तत्व चतुर्थादि सप्तमगुणस्थान पर्यन्त पाया जाता है.
इसप्रकार क्षयोपशमसम्यक्तत्वका स्वरूप कहा.
तथातीनोंप्रकृतियोंकेसर्वथासर्वनिषेकोंकानाशहोनेपरअत्यन्तनिर्मल तत्त्ववार्थश्रद्धानहोसोक्षायिकसम्यक्तत्वहै.सोचतुर्थादिचारगुणस्थानोंमेंकहीं क्षयोपशमसम्यग्¹ष्िटको इसकी प्राप्ति होती है.
कैसेहोतीहै?सोकहतेहैं:-प्रथमतीनकरणद्वारावहाँमिथ्यात्वके परमाणुओंको मिश्रमोहनीय व सम्यक्तत्वमोहनीयरूप परिणमित करे व निर्जरा करे। -इसप्रकार मिथ्यात्वकीसत्तानाशकरे.तथामिश्रमोहनीयकेपरमाणुओंकोसम्यक्तत्वमोहनीयरूप परिणमित करे व निर्जरा करे। - इसप्रकार मिश्रमोहनीयका नाश करे. तथा सम्यक्तत्वमोहनीय के निषेक उदयमें आकर खिरें, उसकी बहुत स्थिति आदि हो तो उसे स्थितिकाण्डकादि द्वारा घटाये. जहाँ अन्तर्मुहूर्त्त स्थिति रहे तब कृतकृत्यवेदकसम्यग्दृष्िट हो. तथा अनुक्रमसे इन निषेकोंका नाश करके क्षायिकसम्यग्¹ष्िट होता है.
सो यह प्रतिपक्षी कर्मके अभाव सेनिर्मल है व मिथ्यात्वरूप रंजनाके अभावसे वीतराग है। इसका नाश नहीं होता. जबसे उत्पन्न हो तब से सिद्ध अवस्था पर्यन्त इसका सद्भाव है.
इसप्रकार क्षायिकसम्यक्तत्व का स्वरूप कहा.
ऐसे तीन भेद सम्यक्तत्व के हैं.
तथा अनन्तानुबन्धी कषाय की सम्यक्तत्व होनेपर दो अवस्थायें होती हैं. या तो अप्रशस्त उपशम होता है या विसंयोजन होता है.
वहाँ जो करण द्वारा उपशम विधान से उपशम हो, उसका नाम प्रशस्त उपशम है. उदयका अभाव उसका नाम अप्रशस्त उपशम है.
सो अनन्तानुबंधीका प्रशस्त उपशम तो होता ही नहीं, अन्य मोहकी प्रकृतियोंका होता है. तथा इसका अप्रशस्त उपशम होता है.
तथा जो तीन करण द्वारा अनन्तानुबंधीके परमाणुओंको अन्य चारित्रमोहकी प्रकृतिरूप परिणमित करके उनकी सत्ता नाश करे, उसका नाम विसंयोजन है.
सो इनमें प्रथमोपशमसम्यक्तत्वमें तो अनन्तानुबंधीका अप्रशस्त उपशम ही है. तथा द्वितीयोपशमसम्यक्तत्वकी प्राप्ति पहले अनन्तानुबंधीका विसंयोजन होनेपर ही होता है - ऐसा नियम कोई आचार्य लिखते हैं, कोई नियम नहीं लिखते. तथा क्षयोपशमसम्यक्तत्वमें किसी जीव के अप्रशस्त उपशम होता है व किसी के विसंयोजन होता है. तथा क्षायिकसमयक्तत्व है सो पहले अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन होनेपर ही होता है. - ऐसा जानना.
यहाँयहविशेषहैकिउपशमतथाक्षयोपशमसम्यक्तत्वीकेअनन्तानुबंधीके विसंयोजनसे सत्ता का नाश हुआ था, वह फिर मिथ्यात्वमें आये तो अनन्तानुबंधी का बन्ध करे, वहाँ फिर उसकी सत्ता का सद्भाव होता है. और क्षायिकसम्यग्¹ष्िट मिथ्यात्वमें आता नहीं है, इसलिये उसके अनन्तानुबंधी की सत्ता कदाचित् नहीं होती.
यहाँ प्रश्न है कि अनन्तानुबंधी तो चारित्रमोह की प्रकृति है, सो चारित्र का घात करे, इससे सम्यक्तत्वका घात किस प्रकार सम्भव है?
समाधान :- अनन्तानुबंधीके उदयसे क्रोधादिरूप परिणाम होते हैं, कुछ अतत्त्ववश्रद्धान नहीं होता। इसलिये अनन्तानुबंधी चारित्र ही का घात करती है, सम्यक्तत्वका घात नहीं करती. सो परमार्थसे है तो ऐसा ही, परन्तु अनन्तानुबंधीके उदयसे जैसे क्रोधादिक होते हैं वैसे क्रोधादिक सम्यक्तत्व होनेपर नहीं होते - ऐसा निमित्त-नैमित्तिकपना पाया जाता है. जैसे-त्रसपनेकीघातकतोस्थावरप्रकृतिहीहंै,परन्तुत्रसपनाहोनेपर एकेन्द्रियजातिप्रकृतिका भी उदय नहीं होता, इसलिये उपचार से एकेन्द्रियप्रकृतिको भी त्रसपने का घातकपना कहा जाये तो दोष नहीं है. उसी प्रकार सम्यक्तत्व का घातक तो दर्शनमोह है, परन्तु सम्यक्तत्व होनेपर अनन्तानुबंधी कषायोंका भी उदय नहीं होता, इसलिये उपचारसे अनन्तानुबन्धीके भी सम्यक्तत्व का घातकपना कहा जाये तो दोष नहीं है.
यहाँ फिर प्रश्न है कि अनन्तानुबंधी भी चारित्रही का घात करती है, तो इसके जानेपर कुछ चारित्र हुआ कहो. असंयत गुणस्थानमें असंयम किसलिये कहते हो?
समाधान :- अनन्तानुबंधी आदि भेद हैं वे तीव्रमन्द कषाय की अपेक्षा नहीं हैं। क्तयोंकि मिथ्या¹ष्िट के तीव्र कषाय होनेपर व मन्दकषाय होनेपर अनन्तानुबंधी आदि चारोंका उदय युगपत् होता है. वहाँ चारोंके उत्कृष्ट स्पर्द्धक समान कहे हैं.
इतना विशेष है कि अनन्तानुबंधी के साथ जैसा तीव्र उदय अप्रत्याख्यानादिकका हो, वैसा उसके जानेपर नही होता. इसी प्रकार अप्रत्याख्यानके साथ जैसा प्रत्याख्यान संज्वलन का उदय हो , वैसा उसके जानेपर नहीं होता. तथा जैसा प्रत्याख्यानके साथ संज्वलनका उदय हो, वैसा केवल संज्वलनका उदय नहीं होता. इसलिये अनन्तानुबंधीके जाने पर कुछ कषायों की मन्दता तो होती है, परन्तु ऐसी मन्दता नहीं होती जिससे कोई चारित्र नाम प्राप्तकरे.क्तयोंकिकषायोंकेअसंख्यातलोकप्रमाणस्थानहैं।उनमेंसर्वत्रपूर्वस्थानसे उत्त्वारस्थानमें मन्दता पायी जाती है। परन्तुव्यवहारसे उन स्थानोंमें तीन मर्यादाएँ कीं. आदि के बहुत स्थान तो असंयमरूप कहे, फिर कितने ही देश संयमरूप कहे, फिर कितने ही सकलसंयमरूप कहे. उनमें प्रथम गुणस्थानसे लेकर चतुर्थ गुणस्थान पर्यंत जो कषायके स्थान होते हैं वे सर्व असंयमहीकेहोते हैं. इसलिये कषायोंकी मन्दता होने पर भी चारित्र नाम नहीं पाते हैं.
यद्यपि परमार्थसेकषायका घटना चारित्रका अंश है, तथापि व्यवहारसे जहाँ ऐसा कषायोंका घटना हो जिससे श्रावकधर्म या मुनिधर्मका अंगीकार हो, वहीं चारित्र नाम पाता है. सो असंयतमें ऐसे कषाय घटती नहीं हैं, इसलिये यहाँ असंयम कहा है. कषायोंका अधिक-हीनपना होने पर भी, जिस प्रकार प्रमत्तादि गुणस्थानोंमें सर्वत्र सकल संयम ही नाम पाता है, उसी प्रकार मिथ्यात्वादि असंयत पर्यंत गुणस्थानोंमें असंयम नाम पाता है. सर्वत्र असंयम की समानता नहीं जानना.
यहाँ फिर प्रश्न है कि अनन्तानुबंधी सम्यक्तत्व का घात नहीं करती है तो इसका उदय होनेपर सम्यक्तत्वसे भ्रष्ट होकर सासादन गुणस्थानको कैसे प्राप्त करता है?
समाधान :- जैसे किसी मनुष्यके मनुष्यपर्याय नाशका कारण तीव्र रोग प्रगट हुआ हो, उसको मनुष्यपर्याय का छोड़ने वाला कहते हैं. तथा मनुष्यपना दूर होनेपर देवादिपर्याय हो, वह तो रोग अवस्थामें नहीं हुई. यहाँ मनुष्य ही का आयु है. उसी प्रकार सम्यक्तत्वीके सम्यक्तत्वके नाश का कारण अनन्तानुबंधीका उदय प्रगट हुआ, उसे सम्यक्तत्वका विरोधक सासादन कहा. तथा सम्यक्तत्वका अभाव होनेपर मिथ्यात्व होता है, वह तो सासादनमें नहीं हुआ. यहाँ उपशमसम्यक्तत्वका ही काल है - ऐसा जानना.
इसप्रकार अनन्तानुबंधी चतुष्टयकी सम्यक्तत्व होनेपर अवस्था होती नहीं, इसलिये सात प्रकृतियोंके उपशमादिकसे भी सम्यक्तत्व की प्राप्ति कही जाती है.
फिर प्रश्न :- सम्यक्तत्वमार्गणाके छह भेद किये हैं, सो किस प्रकार हैं?
समाधान :- सम्यक्तत्वके तो भेद तीन ही हैं. तथा सम्यक्तत्वके अभावरूप मिथ्यात्व है. दोनोंका मिश्रभाव सो मिश्र है. सम्यक्तत्वका घातक भाव सो सासादन है. इस प्रकार सम्यक्तत्वमार्गणासे जीव का विचार करने पर छह भेद कहे हैं.
यहाँकोईकहेकिसम्यक्तत्वसेभ्रष्टहोकरमिथ्यात्वमेंआयाहोउसे मिथ्यात्वसम्यक्तत्व कहा जाये. परन्तु यह असत्य है, क्तयोंकि अभव्यके भी उसका सद्भाव पाया जाता है. तथा मिथ्यात्वसम्यक्तत्व कहना ही अशुद्ध है. जैसे संयममार्गणामें असंयम कहा, भव्यमार्गणामें अभव्य कहा, उसी प्रकार सम्यक्तत्वमार्गणामें मिथ्यात्व कहा. मिथ्यात्वको सम्यक्तत्वका भेद नहीं जानना. सम्यक्तत्व अपेक्षा विचार करनेपर कितने ही जीवोंके सम्यक्तत्व का अभाव भासित हो, वहाँ मिथ्यात्व पाया जाता है - ऐसा अर्थ प्रगट करनेके अर्थ सम्यक्तत्व मार्गणामें मिथ्यात्व कहा है. इसीप्रकार सासादन, मिश्र भी सम्यक्तत्वके भेद नहीं हैं. सम्यक्तत्वके भेद तीन ही हैं, ऐसा जानना.
यहाँ कर्मके उपशमादिकसे उपशमादि सम्यक्तत्व कहे, सो कर्मके उपशमादिक इसके करनेसे नहीं होते. यह तो तत्त्ववश्रद्धान करनेका उद्यम करे, उसके निमित्तसे स्वयमेव कर्मके उपशमादि होते हैं, तब इसके तत्त्ववश्रद्धान की प्राप्ति होती है - ऐसा जानना.
ऐसे सम्यक्तत्वके भेद जानना.
इसप्रकार सम्यग्दर्शनका स्वरूप कहा.
सम्यग्दर्शनके आठ अंग
तथा सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे हैं :- नि:शंकितत्व, नि:कांक्षितत्व, निर्विचिकित्सत्व, अमूढ़¹ष्िटत्व, उपबृ ंहण, स्थितिकरण, प्रभावना और वात्सल्य.
वहाँभयकाअभावअथवातत्त्ववोंमेंसंशयकाअभावसोनि:शंकितत्वहै.तथा परद्रव्यादिमें रागरूप वांछाका अभाव सो नि:कांक्षितत्व है. तथा परद्रव्यादिमें द्वेषरूप ग्लानिका अभाव निर्विचिकित्सत्व है. तथा तत्त्ववोंमें व देवादिकमें अन्यथा प्रतीतिरूप मोहका अभाव सो अमूढ़दृष्िटत्व है. तथा आत्मधर्मका व जिनधर्मका बढ़ाना उसका नाम उपबृ ंहण है, इसी अंगका नाम उपगूहन भी कहा जाता है। वहाँ धर्मात्मा जीवोंके दोष ढँकना - ऐसा उसका अर्थ जानना. तथा अपने स्वभावमें तथा जिनधर्ममें अपनेको व परको स्थापित करना सो स्थितिकरण है. तथा अपने स्वरूप की व जिनधर्मकी महिमा प्रगट करना सो प्रभावना है. तथा स्वरूपमें व जिनधर्म में व धर्मात्मा जीवोंमें अति प्रीतिभाव, सो वात्सल्य है. ऐसे यह आठ अंग जानना.
जैसे मनुष्य शरीरके हस्तपादादिक अंग हैं, उसी प्रकार यह सम्यक्तत्वके अंग हैं.
यहाँ प्रश्न है कि कितने ही सम्यक्तत्वी जीवोंके भी भय, इच्छा, ग्लानि आदि पाये जाते हैं, और कितने ही मिथ्या¹ष्िटयोंके नहीं पाये जाते। इसलिये नि:शंकितादिक अंग सम्यक्तत्वके कैसे कहते हो?
समाधान :- जैसे मनुष्यशरीरकेहस्त-पादादिक अंग कहे जाते हैं। वहाँ कोई मनुष्य ऐसा भी हो जिसके हस्त-पादादिमें कोई अंग न हो। वहाँ उसके मनुष्य शरीर तो कहा जाता है, परन्तु उन अंगों बिना वह शोभायमान सकल कार्यकारी नहीं होता. उसी प्रकार सम्यक्तत्व के नि:शंकितादि अंग कहे जाते हैं। वहाँ कोई सम्यक्तत्वी ऐसा भी हो जिसके नि:शंकितत्वादिमें कोई अंग न हो। वहाँ उसके सम्यक्तत्व तो कहा जाता है, परन्तु उन अंगों के बिना वह निर्मल सकल कार्यकारी नहीं होता. तथा जिसप्रकार बन्दरके भी हस्तपादादि अंग होते हैं, परन्तु जैसे मनुष्यके होते हैं वैसे नहीं होते। उसी प्रकार मिथ्या¹ष्िटयोंके भी व्यवहाररूप नि:शंकितादिक अंग होते हैं, परन्तु जैसे निश्चयकी सापेक्षता सहित सम्यक्तत्वी के होते हैं वैसे नहीं होते.
सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोष
तथा सम्यक्तत्वमें पच्चीस मल कहे हैं :- आठ शंकादिक, आठ मद, तीन मूढ़ता, षट् अनायतन, सो यह सम्यक्तत्वीके नहीं होते. कदाचित् किसी को कोई मल लगे, परन्तु सम्यक्तत्वका सर्वथा नाश नहीं होता, वहाँ सम्यक्तत्व मलिन ही होता है - ऐसा जानना. बहु ं ं ं ं ं ं ं ं

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परिशिष्ट १

समाधिमरण स्वरूप

(पंडितप्रवर टोडरमलजी के सुपुत्र पंडित गुमानिरामजी द्वारा रचित) परिशिष्ट २

रहस्यपूर्ण चिट्ठी

(अचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी द्वारा लिखित)
सिद्ध श्री मुलताननगर महा शुभस्थानमें साधर्मी भाई अनेक उपमा योग्य अध्यात्मरस रोचक भाई श्री खानचन्दजी, गंगाधरजी, श्रीपालजी, सिद्धारथदासजी, अन्य सर्व साधर्मी योग्य लिखी टोडरमलके श्री प्रमुख विनय शब्द अवधारण करना.
यहाँ यथासम्भव आनन्द है, तुम्हारे चिदानन्दघनके अनुभवसे सहजानन्द की वृद्धि चाहिये.
अपरंच तुम्हारा एक पत्र भाईजी श्री रामसिंहजी भुवानीदासजी पर आया था. उसके समाचार जहानाबादसे मुझको अन्य साधर्मियोंने लिखे थे.
सो भाईजी, ऐसे प्रश्न तुम सरीखे ही लिखें. इस वर्तमानकाल में अध्यात्मरसके रसिक बहुत थोडे़ हैं. धन्य हैं जो स्वात्मानुभवकी बात भी करते हैं. वही कहा है :-
तत्प्रति प्रीतिचित्तेन येन वार्तापि हि श्रुता .
निश्चितं स भवे…व्यो भाविनिवार्णभाजनम् ..
अर्थ :- जिस जीवने प्रसन्न चित्तसे इस चेतनस्वरूप आत्मा की बात भी सुनी है, वह निश्चय से भव्य है. अल्पकालमें मोक्षका पात्र है.
सो भाईजी, तुमने प्रश्न लिखे उनके उत्तर अपनी बुद्धि अनुसार कुछ लिखते हैं सो जानना और अध्यात्म आगमकी चर्चागर्भित पत्र तो शीघ्र-शीघ्र दिया करें, मिलाप तो कभी होगा तब होगा. और निरन्तर स्वरूपानुभवनका अभ्यास रखोगेजी. श्रीरस्तु.
अब, स्वानुभवदशामें प्रत्यक्ष-परोक्षादिक प्रश्नोंके उत्तर स्वबुद्धि अनुसार लिखते हैं :-
वहाँ प्रथमही स्वानुभवका स्वरूप जानने के निमित्त लिखते हैं :-
जीव पदार्थ अनादिसेमिथ्या¹ष्िट है. वहाँ स्व-परके यथाार्थरूपसे विपरीत श्रद्धान का नाम मिथ्यात्व है. तथा जिस काल किसी जीवके दर्शनमोहके उपशम-क्षय-क्षयोपशमसे स्व-परके यथाार्थ श्रद्धानरूप तत्त्ववार्थश्रद्धान हो तब जीव सम्यक्तत्वी होता है। इसलिये स्व- परके श्रद्धानमें शुद्धात्म श्रद्धानरूप निश्चयसम्यक्तत्व गर्भित है.
तथा यदि स्व-परका श्रद्धान नहीं है और जिनमतमेंकहे जो देव, गुरु, धर्म उन्हीं को मानता है। व सप्ततत्त्ववोंको मानता है। अन्यमतमें कहे देवादि व तत्त्ववादिको नहीं मानता है। तोइसप्रकारकेवलव्यवहारसम्यक्तत्वसेसम्यक्तत्वीनामनहींपाता।इसलियेस्व-पर भेदविज्ञानसहित जो तत्त्ववार्थश्रद्धान हो उसी को सम्यक्तत्व जानना.
तथा ऐसा सम्यक्तत्वी होनेपर जो ज्ञान पंचेन्द्रिय व छट्ठे मनके द्वारा क्षयोपशमरूप मिथ्यात्वदशामें कुमति-कुश्रुतिरूप हो रहा था वही ज्ञान अब मति-श्रुतरूप सम्यग्ज्ञान हुआ. सम्यक्तत्वी जितना कुछ जाने वह जानना सर्व सम्यग्ज्ञानरूप है.
यदि कदाचित् घट-पटादिक पदार्थोंको अयथार्थ भी जाने तो वह आवरणजनित औदायिक अज्ञान भाव है. जो क्षयोपशमरूप प्रगट ज्ञान है वह तो सर्व सम्यग्ज्ञान ही है, क्तयोंकि जाननेमें विपरीतरूप पदार्थोंको नहीं साधता. सो यह सम्यग्ज्ञान केवलज्ञानका अंश है। जैसे थोड़ा-सा मेघपटल विलय होने पर कुछ प्रकाश प्रगट होता है वह सर्व प्रकाश का अंश है.
जो ज्ञान मति-श्रुतरूप हो प्रवर्त्तता है वही ज्ञान बढ़ते-बढ़ते केवलज्ञानरूप होता है। सम्यग्ज्ञान की अपेक्षा तो जाति एक है.
तथा इस सम्यक्तत्वीके परिणाम सविकल्प तथा निर्विकल्परूप होकर दो प्रकार प्रवर्त्तते हैं. वहाँ जो परिणाम विषय-कषायादिरूप व पूजा, दान, शास्त्राभ्यासादिकरूप प्रवर्त्तता है उसे सविकल्परूप जानना.
यहाँ प्रश्न :-शुभाशुभरूप परिणमित होते हुए सम्यक्तत्वका अस्तित्व कैसे पाया जाय?
समाधान :- जैसे कोई गुमाश्ता सेठके कार्यमें प्रवर्त्तता है, उस कार्यको अपना भी कहता है, हर्ष-विषादको भी प्राप्त होता है, उस कार्यमें प्रवर्त्तते हुए अपनी और सेठ की जुदाई का विचार नहीं करता। परन्तु अंतरंग श्रद्धान ऐसा है कि यह मेरा कार्य नहीं है. ऐसा कार्य करता गुमाश्ता साहूकार है. यदि वह सेठके धन को चुरा कर अपना माने तो गुमाश्ता चोर होय. उसीप्रकार कर्मोदयजनित शुभाशुभरूप कार्यको कर्त्ता हुआ तद्रूप परिणमित हो। तथापि अंतरंगमें ऐसा श्रद्धान है कि यह कार्य मेरा नहीं है. यदि शरीराश्रित व्रत-संयमको भी अपना माने तो मिथ्या¹ष्िट होय. सो ऐसे सविकल्प परिणाम होते हैं.
अब सविकल्पहीके द्वारा निर्विकल्प परिणाम होनेका विधान कहते हैं:-
वही सम्यक्तत्वी कदाचित् स्वरूप ध्यान करनेको उद्यमी होता है, वहाँ प्रथम भेदविज्ञान स्वपरकाकरे।नोकर्म-द्रव्यकर्म-भावकर्मरहितकेवलचैतन्य-चमत्कारमात्रअपनास्वरूप जाने। पश्चात् परका भी विचार छूट जाय, केवल स्वात्मविचार ही रहता है। वहाँ अनेक प्रकार निजस्वरूपमें अहंबुद्धि धरता है. चिदानन्द हूँ, शुद्ध हूँ, सिद्ध हूँ, इत्यादि विचार होनेपर सहज ही आनन्द तरंग उठती है, रोमांच हो आता है। तत्पश्चात् ऐसा विचार तो छूट जाये, केवल चिन्मात्रस्वरूप भासने लगे। वहाँ सर्व परिणाम उस रूप में एकाग्र होकर प्रवर्त्तते हैं। दर्शन-ज्ञानादिकका व नय-प्रमाणादिकका भी विचार विलय हो जाता है.
चैतन्यस्वरूप जो सविकल्पसे निश्चय किया था, उसहीमें व्याप्य-व्यापकरूप होकर इस प्रकार प्रवर्त्तता है जहाँ ध्याता-ध्येयपना दूर हो गया. सो ऐसी दशा का नाम निर्विकल्प अनुभव है. बडे़ नयचक्रग्रन्थमें ऐसा ही कहा है :-
तच्चाणेसणकाले समयं बुज्झेहि जुत्तिमग्गेण .
णो आराइणसमये पच्चक्तखोअणुहवो जह्मा ॥२६६॥
अर्थ :- तत्त्ववके अवलोकन(अन्वेषण)का जो काल उसमें समय अर्थात् शुद्धात्माको युक्ति अर्थात् नय-प्रमाण द्वारा पहले जाने. पश्चात् आराधन समय जो अनुभवकाल उसमें नय-प्रमाण नहीं है, क्तयोंकि प्रत्यक्ष अनुभव है.
जैसे - रत्नको खरीदनेमें अनेक विकल्प करते हैं, जब प्रत्यक्ष उसे पहिनते हैं, तब विकल्प नहीं है - पहिनने का सुख ही है. इसप्रकार सविकल्प के द्वारा निर्विकल्प अनुभव होता है.
तथा जो ज्ञान पाँच इन्द्रियों व छठवें मन के द्वारा प्रवर्त्तता था, वह ज्ञान सब ओरसे सिमटकर इस निर्विकल्प अनुभवमें केवल स्वरूपसन्मुख हुआ. क्तयोंकि वह ज्ञान क्षयोपशमरूप है इसलिये एक कालमें एक ज्ञेय ही को जानता है, वह ज्ञान स्वरूप जानने को प्रवर्त्तित हुआ तब अन्यका जानना सहज ही रह गया. वहाँ ऐसी दशा हुई कि बाह्य अनेक शब्दादिक विकार हों तो भी स्वरूप ध्यानी को कुछ खबर नहीं - इसप्रकार मतिज्ञान भी स्वरूपसन्मुख हुआ. तथा नयादिकके विचार मिटनेपर श्रुतज्ञान भी स्वरूपसन्मुख हुआ.
ऐसावर्णनसमयसारकीटीकाआत्मख्यातिमेंहैतथाआत्मावलोकनादिमेंहै. इसीलिये निर्विकल्प अनुभव को अतीन्द्रिय कहते हैं. क्तयोंकि इन्द्रियोंका धर्मतो यह है कि स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्दको जानें, वह यहाँ नहीं है। और मनका धर्म यह है कि अनेक विकल्प करे, वह भी यहाँ नहीं है। इसलिये यद्यपि जो ज्ञान इन्द्रिय-मन में प्रवर्त्तता था वही ज्ञान अब अनुभवमें प्रवर्त्तता है तथापि इस ज्ञानको अतीन्द्रिय कहते हैं.
तथा इस स्वानुभवको मन द्वारा हुआ भी कहते हैं क्तयोंकि इस अनुभव में मतिज्ञान- श्रुतज्ञान ही हैं, अन्य कोई ज्ञान नहीं है.
मति-श्रुतज्ञान इन्द्रिय-मनके अवलम्बन बिना नहीं होता, सो यहाँ इन्द्रियका तो अभाव ही है, क्तयोंकि इन्द्रियका विषय मूर्तिक पदार्थ ही है. तथा यहाँ मनज्ञान है क्तयोंकि मनका विषय अमूर्तिक पदार्थ भी है, इसलिये यहाँ मन-सम्बन्धी परिणाम स्वरूपमें एकाग्र होकरअन्यचिन्ताकानिरोधकरतेहैं,इसलियेइसेमनद्वाराकहतेहैं.— एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम्ऐसा ध्यानका भी लक्षण ऐसे अनुभवदशा में सम्भव है.
तथा समयसार नाटकके कवित्तमें कहा है :-
वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावै विश्राम .
रस स्वादत सुख ऊपजै, अनुभव याकौ नाम ..
इसप्रकारमनबिनाजुदेहीपरिणामस्वरूपमेंप्रवर्त्तितनहींहुए,इसलिये स्वानुभवको मनजनित भी कहते हैं। अत: अतीन्द्रिय कहनेमें और मनजनित कहनेमें कुछ विरोध नहीं है, विवक्षाभेद है.
तथा तुमने लिखा कि—आत्मा अतीन्द्र्रिय है, इसलिये अतीन्द्र्रिय द्वारा ही ग्रहण किया जाता है।सो(भाईजी)मन अमूर्तिक का भी ग्रहण करता है, क्तयोंकि मति-श्रुतज्ञानका विषय सर्वद्रव्य कहे हैं. उक्तं च तत्त्ववार्थ सूत्रे :-
—मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु .(१-२६)
तथा तुमने प्रत्यक्ष-परोक्षका प्रश्न लिखा सो भाईजी, प्रत्यक्ष-परोक्ष तो सम्यक्तत्व के भेद हैं नहीं. चौथे गुणस्थानमें में सिद्ध समान क्षायिक सम्यक्तत्व हो जाता है, इसलिये सम्यक्तत्व तो केवल यथार्थ श्रद्धान रूप ही है. वह(जीव)शुभाशुभकार्य करता भी रहता है. इसलिये तुमने जो लिखा था कि—निश्चयसम्यक्तत्व प्रत्यक्ष है और व्यवहारसम्यक्तत्व परोक्ष है,सोऐसानहींहै.सम्यक्तत्वकेतोतीनभेदहैं-वहाँउपशमसम्यक्तत्वऔर क्षायिकसम्यक्तत्वतोनिर्मलहै,क्तयोंकिवेमिथ्यात्वकेउदयसेरहितहैंऔर क्षयोपशमसम्यक्तत्वसमलहै,क्तयोंकिसम्यक्तत्वमोहनीयकेउदयसेसहितहै.परन्तुइस सम्यक्तत्वमें प्रत्यक्ष-परोक्षके कोई भेद तो नहीं हैं.
क्षायिक सम्यक्तत्वीके शुभाशुभरूप प्रवर्त्तते हुए व स्वानुभवरूप प्रवर्त्तते हुए सम्यक्तत्वगुण तो समान ही है, इसलिये सम्यक्तत्वके तो प्रत्यक्ष-परोक्ष भेद नहीं मानना.
तथा प्रमाण के प्रत्यक्ष-परोक्ष भेद हैं, सो प्रमाण सम्यग्ज्ञान है। इसलिये मतिज्ञान- श्रुतज्ञान तो परोक्षप्रमाण हैं, अवधि-मन:पर्यय-केवलज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण हैं.—आद्ये परोक्षं, प्रत्यक्षमन्यत्(तत्त्ववार्थसूत्र अ‹ १, सूत्र ११-१२)ऐसा सूत्र का वचन है. तथा तर्कशास्त्रमें प्रत्यक्ष-परोक्षका ऐसा लक्षण कहा है -—स्पष्टप्रतिभासात्मकं प्रत्यक्षमस्पष्टं परोक्षं.
जो ज्ञान अपने विषयको निर्मलतारूप स्पष्टतया भलीभाँति जाने सो प्रत्यक्ष और जो स्पष्ट भलीभाँति न जाने सो परोक्ष. वहाँ मतिज्ञान-श्रुतज्ञानके विषय तो बहुत हैं, परन्तु एक भी ज्ञेयको सम्पूर्ण नहीं जान सकता इसलिये परोक्ष कहे और अवधि-मन:पर्ययज्ञान के विषय थोडे़ हैं तथापि अपने विषयको स्पष्ट भलीभाँति जानता है इसलिये एकदेश प्रत्यक्ष है और केवलज्ञान सर्व ज्ञेय को आपस्पष्ट जानता है इसलिये सर्वप्रत्यक्ष है.
तथा प्रत्यक्षके दो भेद हैं :- एक परमार्थ प्रत्यक्ष, दूसरा सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष. वहाँ अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान तो स्पष्ट प्रतिभासरूप हैंं ही, इसलिये पारमार्थिक प्रत्यक्ष हैं. तथा नेत्रादिकसे वर्णादिकको जानते हैं वहाँ व्यवहारसे ऐसा कहते हैं - ‘इसने वर्णादिक प्रत्यक्ष जाने’, एकदेश निर्मलता भी पायी जाती है, इसलिये इनको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहते हैं। परन्तु यदि एक वस्तुमें अनेक मिश्र वर्ण हैं वे नेत्र द्वारा भलीभाँति नहीं ग्रहण किये जाते हैं, इसलिये इसको परमार्थ-प्रत्यक्ष नहीं कहा जाता है.
तथा परोक्ष प्र्रमाण के पाँच भेद हैं :- स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम.
वहाँ जो पूर्व काल में जो वस्तु जानी थी उसे याद करके जानना, उसे स्मृति कहते हैं. दृष्टांत द्वारा वस्तु का निश्चय किया जाये उसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं. हेतुके विचार युक्त जो ज्ञान उसे तर्क कहते हैं. हेतु से साध्य वस्तुका जो ज्ञान उसे अनुमान कहते हैं. आगम से जो ज्ञान हो उसे आगम कहते हैं.
ऐसे प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण के भेद कहे हैं.
वहाँ इस स्वानुभनदशामें जो आत्मा को जाना जाता है सो श्रुतज्ञान द्वारा जाना जाता है. श्रुतज्ञान है वह मतिज्ञानपूर्वक ही है, वे मतिज्ञान-श्रुतज्ञान परोक्ष कहे हैं, इसलिये यहाँ आत्माका जानना प्रत्यक्ष नहीं है. तथा अवधि-मन:पर्ययका विषय रूपीपदार्थ ही है और केवलज्ञान छद्मस्थके है नहीं , इसलिये अनुभवमें अवधि-मन:पर्यय-केवल द्वारा आत्मा का जानना नहीं है. तथा यहाँ आत्मा को स्पष्ट भलीभाँति नहीं जानता है, इसलिये पारमार्थिक प्रत्यक्षपना तो सम्भव नहीं है.
तथा जैसे नेत्रादिक से वर्णादिक जानते हैं वैसे एकदेश निर्मलता सहित भी आत्मा के असंख्यात प्रदेशादिक नहीं जानते हैं, इसलिये सांव्यवहारिक प्रत्यक्षपना भी सम्भव नहीं है.
यहाँ पर तो आगम-अनुमानादिक परोक्ष ज्ञानसे आत्माका अनुभव होता है. जैनागममें जैसा आत्माका स्वरूप कहा है उसे वैसा जानकर उसमें परिणामोंको मग्न करता है इसलिये आगम परोक्ष प्रमाण कहते हैं. अथवा—मैं आत्मा ही हूँ, क्तयोंकि मुझमें ज्ञान है। जहाँ-जहाँ ज्ञान है वहाँ-वहाँ आत्मा है - जैसे सिद्धादिक हैं। तथा जहाँ आत्मा नहीं है वहाँ ज्ञान भी नहीं है - जैसे मृतक कलेवरादिक हैं.- इसप्रकार अनुमान द्वारा वस्तु का निश्चय करके उसमें परिणाम मग्न करता है. इसलिये अनुमान परोक्ष प्रमाण कहा जाता है. अथवा आगम-अनुमानादिक द्वारा जो वस्तु जाननेमें आयी उसी को याद रख कर उसमें परिणाम मग्न करता है इसलिये स्मृति कही जाती है। इत्यादि प्रकार से स्वानुभवमें परोक्ष प्रमाण द्वारा ही आत्मा का जानना होता है. वहाँ पहले जानना होता है, पश्चात् जो स्वरूप जाना उसी में परिणाम मग्न होते हैं, परिणाम मग्न होनेपर कुछ विशेष जानपना होता नहीं है.
यहाँ फिर प्रश्न :-यदि सविकल्प-निर्विकल्पमें जाननेका विशेष नहीं है तो अधिक आनन्द कैसे होता है?
उसका समाधान :- सविकल्प दशामें ज्ञान अनेक ज्ञेयोंको जाननेरूप प्रवर्त्तता था, निर्विकल्पदशामें केवल आत्माका ही जानना है। एक तो यह विशेषता है. दूसरी विशेषता यहहैकिजोपरिणामनानाविकल्पोंमेंपरिणमितहोताथावहकेवलस्वरूपहीसे तादात्म्यरूप होकर प्रवृत्त हुआ। दूसरी यह विशेषता हुई.
ऐसी विशेषताऐं होनेपर कोई वचनातीत ऐसा अपूर्व आनन्द होता है जो कि विषय सेवन में उसकी जाति का अंश भी नहीं है, इसलिये उस आनन्दको अतीन्द्रिय कहते हैं.
यहाँ फिर प्रश्न :-अनुभव में भी आत्मा परोक्ष ही है, तो ग्रन्थोंमें अनुभव को प्रत्यक्ष कैसे कहते हैं? ऊपरकी गाथा में ही कहा है ‘पच्चखो अणुहवो जम्हा’ सो कैसे है?
उसका समाधान :- अनुभव में आत्मा तो परोक्ष ही है, कुछ आत्मा के प्रदेश आकार तो भासित होते नहीं हैं। परन्तु स्वरूपमें परिणाम मग्न होनेसे जो स्वानुभव हुआ वह स्वानुभवप्रत्यक्ष है. स्वानुभवका स्वाद कुछ आगम-अनुमानादिक परोक्ष प्रमाण द्वारा नहीं जानता है, आप ही अनुभवके रस स्वाद को वेदता है. जैसे कोई अंध-पुरुष मिश्री को आस्वादता है। वहाँ मिश्रीके आकारादि तो परोक्ष हैं, जो जिðा से स्वाद लिया है वहस्वाद प्रत्यक्ष है - वैसे स्वानुभवमें आत्मा परोक्ष है, जो परिणामसे स्वाद आया वहस्वाद प्रत्यक्ष है। - ऐसा जानना.
अथवा जो प्रत्यक्षकी ही भाँति हो उसे भी प्रत्यक्ष कहते हैं. जैसे लोकमें कहते हैं कि —हमने स्वप्नमें अथवा ध्यानमें अमुक पुरुषको देखा। वहाँ कुछ प्रत्यक्ष देखा नहीं है, परन्तु प्रत्यक्षकी ही भाँति प्रत्यक्षवत् यथार्थ देखा इसलिये उसे प्रत्यक्ष कहा जाता है. उसी प्रकार अनुभव में आत्मा प्रत्यक्ष की भाँति यथार्थ प्रतिभासित होता है, इसलिये इस न्यान से आत्मा का भी प्रत्यक्ष जानना होता है - ऐसाकहें तो दोष नहीं है. कथन तो अनेक प्रकार से है, वह सर्व आगम-अध्यात्म शास्त्रोंसे जैसे विरोध न हो वैसे विवक्षाभेदसे कथन जानना.
यहाँ प्रश्न :-ऐसा अनुभव कौन गुणस्थान में होता है?
उसका समाधान :- चौथेही से होता है, परन्तु चौथेमें तो बहुत कालके अन्तरालसे होता है और ऊपर के गुणस्थानोंमें शीघ्र-शीघ्र होता है.
फिर यहाँ प्रश्न :-अनुभव तो निर्विकल्प है, वहाँ ऊपरके और नीचेके गुणस्थानों में भेद क्तया?
उसका समाधान :- परिणामोंकी मग्नतामें विशेष है. जैसे दो पुरुष नाम लेते हैं और दोनोंही के परिणाम नाम में हैं। वहाँ एक को तो मग्नता विशेष है और एक को थोड़ी है - उसी प्रकार जानना.
फिर प्रश्न :-यदि निर्विकल्प अनुभवमें कोई विकल्प नहीं है तो शुक्तलध्यानका प्रथम भेद पृथकत्ववितर्कवीचार कहा, वहाँ ‘पृथकत्ववितर्क’ - नाना प्रकारके श्रुतका ‘वीचार’ - अर्थ-व्यंजन-योगसंक्रमण - ऐसा क्तयों कहा?
समाधान :- कथन दो प्रकार है - एक स्थूलरूप है, एक सूक्ष्मरूप है. जैसे स्थूलता से तो छठवें ही गुणस्थानमें सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत कहा और सूक्ष्मतासेनववें गुणस्थान तक मैथुन संज्ञा कही। उसी प्रकार यहाँ अनुभवमें निर्विकल्पता स्थूलरूप कहते हैं. तथा सूक्ष्मतासे पृथकत्ववितर्क वीचारादिक भेद व कषायादिक दसवें गुणस्थान तक कहे हैं. वहाँ अपने जाननेमें व अन्यके जाननेमें आये ऐसे भावका कथन स्थूल जानना तथा जो आप भी न जाने और केवली भगवान ही जानें - ऐसे भावका कथन सूक्ष्म जानना. चरणानुयोगादिकमें स्थूलकथन की मुख्यता है और करणानुयोग में सूक्ष्मकथन की मुख्यता है। ऐसा भेद अन्यत्र भी जानना.
इसप्रकार निर्विकल्प अनुभव का स्वरूप जानना.
तथा भाईजी, तुमने तीन ¹ष्टांत लिखे व ¹ष्टांतमें प्रश्न लिखा, सो ¹ष्टांत सर्वांग मिलता नहीं है. ¹ष्टांतहै वह एकप्रयोजनकोबतलाता है। सो यहाँद्वितीयाकाविधु (चन्द्रमा),जलविन्दु,अग्निकणिका-यहतोएकदेशहैं,औरपूर्णमासीकाचन्द्र, महासागर तथा अग्निकुण्ड - यह सर्वदेश हैं. उसी प्रकार चौथे गुणस्थानमें आत्मा के ज्ञानादिगुण एकदेश प्रगट हुए हैं, तेरहवें गुणस्थानमें आत्मा के ज्ञानादिक गुण सवर्था प्रगट होते हैं। और जैसे ¹ष्टांतोंकी एक जाति है वैसे ही जितने गुण अव्रत-सम्यग्¹ष्िट के प्रगट हुए हैं उनकी और तेरहवें गुणस्थानमें जो गुण प्रगट होते हैं उनकी एक जाति है.
वहाँ तुमने प्रश्न लिखा किएक जाति है तो जिसप्रकार केवली सर्वज्ञेयोंको प्रत्यक्ष जानते हैं उसी प्रकार चौथे गुणस्थानवाला भी आत्माको प्रत्यक्ष जानता होगा?
उत्तर :- भाईजी, प्रत्यक्षताकी अपेक्षा एक जाति नहीं है, सम्यग्ज्ञान की अपेक्षा एक जाति है. चौथे गुणस्थान वालेको मति-श्रुतरूप सम्यग्ज्ञान है और तेरहवें गुणस्थान वालेको केवलरूप सम्यग्ज्ञान है. तथा एकदेश सर्वदेश का अनतर तो इतना ही है कि मति- श्रुतज्ञानवाला अमूर्तिक वस्तुको अप्रत्यक्ष और मूर्तिक वस्तु को भी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष, किंचित् अनुक्रमसे जानता है तथा सर्वथा सर्व वस्तुको केवलज्ञान युगपत् जानता है। वह परोक्ष जानता है, यह प्रत्यक्ष जानता है इतना ही विशेष है. और सर्वप्रकार एक ही जाति कहें तो जिसप्रकार केवली युगपत् प्रत्यक्ष अप्रयोजनरूप ज्ञेयको निर्विकल्परूप जानते हैं उसीप्रकार यह भी जाने - ऐसा तो है नहीं। इसलिये प्रत्यक्ष-परोक्षका विशेष जानना.
उक्त च अष्ट सहस्री मध्ये :-
स्याद्वादकेवलज्ञानेसर्वतत्त्ववप्रकाशने .
भेद: साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ..
अर्थ :- स्याद्वाद अर्थात् श्रुतज्ञान और केवलज्ञान - यह दोनों सर्व तत्त्ववोंका प्रकाशन करनेवाले हैं. विशेष इतना ही है कि केवलज्ञान प्रत्यक्ष है, श्रुतज्ञान परोक्ष है. परन्तु वस्तु है सो और नहीं है.
तथा तुमने निश्चय सम्यक्तत्वका स्वरूप और व्यवहार सम्यक्तत्वका स्वरूप लिखा है सो सत्य है, परन्तु इतना जानना कि सम्यक्तत्वीके व्यवहार सम्यक्तत्वमें व अन्यकालमें अन्तरù निश्चयसम्यक्तत्व गर्भित है, सदैव गमनरूप रहता है.
तथातुमनेलिखा-कोईसाधर्मीकहताहैकिआत्माको प्रत्यक्ष जाने तो कर्मवर्गणाको प्रत्यक्ष क्तयों न जाने?
सो कहते हैं कि आत्मा को तो प्रत्यक्ष केवली ही जानते है, कर्मवर्गणाको अवधिज्ञानी भी जानते हैं.
तथा तुमने लिखा -द्वितीयाके चन्द्रमाकी भाँति आत्माके प्रदेश थोडे़से खुले कहो?
उत्तर :- यह ¹ष्टान्त प्रदेशोंकी अपेक्षा नहीं है, यह ¹ष्टान्त गुणकी अपेक्षा है.
जो सम्यक्तत्व सम्बन्धी और अनुभव सम्बन्धी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षादिकके प्रश्न तुमने लिखे थे, उनका उत्तर अपनी बुद्धि अनुसार लिखा है। तुम भी जिनवाणी से तथा अपनी परिणतिसे मिलान कर लेना.
अर भाईजी, विशेष कहाँ तक लिखें, जो बात जानते हैं वह लिखनेमें नहीं आती. मिलनेपर कुछ कहा भी जाये, परन्तु मिलना कर्माधीन है, इसलिये भला यह है कि चैतन्यस्वरूपके अनुभवका उद्यमी रहना.
वर्त्तमानकालमें अध्यात्मतत्त्वव तो आत्मख्याति-समयसारग्रन्थकी अमृतचन्द्र आचार्यकृत संस्कृतटीका - में है और आगमकी चर्चा गोम्मटसारमें है। तथा और अन्यग्रन्थोंमें है.
जो जानते हैं वह सब लिखने में आवे नहीं, इसलिये तुम भी अध्यात्म तथा आगम ग्रन्थोंका अभ्यास रखना और स्वरूपानन्दमें मग्न रहना.
और तुमने कोई विशेष ग्रन्थ जाने हों सो मुझको लिख भेजना. सााधर्मियोंको तो परस्परचर्चा ही चाहिये. और मेरी तो इतनी बुद्धि है नहीं, परन्तु तुम सरीखे भाइयोंसे परस्पर विचार है सो बड़ी वार्ता है.
जबतक मिलना नहीं हो तबतक पत्रतो अवश्य ही लिखा करोगे.
मिती फागुन बदी ५, सं ‹ १८११’

परमार्थवचनिका

(कविवर पं० बनारसीदासजी रचित)
एक जीवद्रव्य, उसके अनंत गुण, अनंत पर्यायें, एक-एक गुणके असंख्यात प्रदेश, एक-एक प्रदेशमें अनन्त कर्मवर्गणाएँ, एक-एक कर्मवर्गणामें अनंत-अनंत पुद्गलपरमाणु, एक-एक पुद्गलपरमाणु अनंत गुण अनंत पर्यायसहित विराजमान.
यह एक संसारावस्थित जीवपिण्डकी अवस्था. इसीप्रकार अनंत जीवद्रव्य सपिण्डरूप जानना. एक जीवद्रव्य अनंत-अनंत पुद्गलद्रव्यसे संयोगित(संयुक्त)मानना.
उसका विवरण - अन्य अन्यरूप जीवद्रव्यकी परिणति, अन्य अन्यरूप पुद्गलद्रव्य की परिणति.
उसका विवरण - एक जीवद्रव्य जिसप्रकार की अवस्था सहित नाना आकाररूप परिणमित होता है वह प्रकार अन्य जीवसे नहीं मिलता। उसका और प्रकार है. इसी प्रकार अनंतानंतस्वरूपजीवद्रव्यअनंतानंतस्वरूपअवस्थासहितवर्तरहेहैं.किसीजीवद्रव्यके परिणाम किसी अन्य जीवद्रव्य के नहीं मिलते. इसीप्रकार एक पुद्गलपरमाणु एकसमयमें जिसप्रकार की अवस्था धारण करता है, वह अवस्था अन्य पुद्गलपरमाणुद्रव्य से नहीं मिलती. इसलिये पुद्गल(परमाणु)द्रव्यकी भी अन्य-अन्यता जानना.
अब, जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य एकक्षेत्रावगाही अनादिकालके हैं, उनमें विशेष इतना कि जीवद्रव्यएक,पुद्गलपरमाणुद्रव्यअनंतानंत,चलाचलरूप,आगमनगमनरूप,अनंताकार परिणमनमरूप, बन्धमुक्ति शक्तिसहित वर्तते हैं.
अब, जीवद्रव्य की अनंती अवस्थाएँ, उनमें तीन अवस्थाएँ मुख्य स्थापित कीं - एक अशुद्ध अवस्था, एक शुद्धाशुद्धरूप मिश्र अवस्था, एक शुद्ध अवस्था - यह तीन अवस्थाएँ संसारी जीवद्रव्यकी . संसारातीत सिद्ध अनवस्थितरूप कहे जाते हैं.
अब,तीनोंअवस्थाओंकाविचार-एकअशुद्धनिश्चयात्मकद्रव्य,एकशुद्ध निश्चयात्मक द्रव्य, एक मिश्र निश्चयात्मक द्रव्य. अशुद्ध निश्चयद्रव्य को सहकारी अशुद्ध व्यवहार, मिश्रद्रव्यको सहकारी मिश्रव्यवहार, शुद्ध द्रव्यको सहकारी शुद्ध व्यवहार. अब, निश्चय-व्यवहारका विवरण लिखते हैं :-
निश्चय तो अभेदरूप द्रव्य, व्यवहार द्रव्यके यथास्थित भाव. परन्तु विशेष इतना कि - जितनेकाल संसारावस्था उतनेकाल व्यवहार कहा जाता है, सिद्ध व्यवहारातीत कहे जाते हैं, क्तयोंकि संसार व्यवहार एकरूप बतलाया है. संसारी सो व्यवहारी, व्यवहारी सो संसारी. अब, तीन अवस्थाओंका विवरण लिखते हैं :-
जितने काल मिथ्यात्व अवस्था, उतने काल अशुद्ध निश्चयात्मक द्रव्य अशुद्धव्यवहारी. साम्यग्¹ष्िटहोतेहीचतुर्थगुणस्थानसेबारहवेंगुणस्थानकपर्यंतमिश्रनिश्चयात्मकद्रव्य मिश्रव्यवहारी. केवलज्ञानी शुद्धनिश्चयात्मक शुद्धव्यवहारी. अब, निश्चय तो द्रव्यका स्वरूप, व्यवहार संसारावस्थित भाव, उसका विवरण कहते है :-
मिथ्या¹ष्िट जीव अपना स्वरूप नहीं जानता, इसलिये परस्वरूपमें मग्न होकर कार्य मानता है। वह कार्य करता हुआ अशुद्ध व्यवहारी कहा जाता है.
सम्यग्¹ष्िट अपने स्वरूपको परोक्ष प्रमाण द्वारा अनुभवता है। परसत्ता-परस्वरूप से अपना कार्य न मानता हुआ योगद्वार से अपने स्वरूपके ध्यान-विचाररूप क्रिया करता है, वह कार्य करते हुए मिश्रव्यवहारी कहा जाता है.
केवलज्ञानीयथाख्यातचारित्रकेबलसेशुद्धात्मस्वरूपकारमणशीलहैइसलिये शुद्धव्यवहारी कहा जाता है. योगारूढ़ अवस्था विद्यमान है इसलिये व्यवहारी नाम कहते हैं. शुद्धव्यवहारीसरहदतेरहवेंगुणस्थानसेलेकरचौदहवेंगुणस्थानपर्यंतजानना. असिद्धत्वपरिणमनत्वात् व्यवहार:. अब, तीनों व्यवहारका स्वरूप कहते हैं :-
अशुद्धव्यवहार शुभाशुभाचाररूप, शुद्धशुद्धव्यवहार शुभोपयोगमिश्रित स्वरूपाचरणरूप, शुद्धव्यवहार शुद्धस्वरूपाचरणरूप.
परन्तु विशेष इनका इतना कि कोई कहे कि शुद्धस्वरूपाचरणात्म तो सिद्धमें भी विद्यमानहै,वहाँभीव्यवहारसंज्ञाकहनाचाहिये.परन्तुऐसानहींहै,क्तयोंकि संसारीअवस्थापर्यन्त व्यवहार कहा जाता है. संसारावस्थाके मिटने पर व्यवहार भी मिटा कहा जाता है. यहाँ यह स्थापना की है. इसलिये सिद्ध व्यवहारातीत कहे जाते हैं.
इति व्यवहार विचार समाप्त. अब आगम अध्यात्म स्वरूप कहते हैं :-
आगम - वस्तुका जो स्वभाव उसे आगम कहते हैं. आत्माका जो अधिकार उसे अध्यात्म कहते हैं. आगम तथा अध्यात्मस्वरूप भाव आत्मद्रव्यके जानने. वे दोनों भाव संसार अवस्थामें त्रिकालवर्ती मानने.
उसका विवरण - आगमरूप कर्मपद्धति, अध्यात्मरूप शुद्धचेतनापद्धति.
उसकाविवरण-कर्मपद्धतिपौद्गलिकद्रव्यरूपअथवाभावरूप।द्रव्यरूप पुद्गलपरिणाम, भावरूप पुद्गलाकार आत्माकी अशुद्धपरिणतिरूप परिणाम। - उन दोनों परिणामोंको आगमरूप स्थापित किया. अब शुद्धचेतनापद्धति शुद्धात्मपरिणाम। वह भी द्रव्यरूप अथवाभावरूप.द्रव्यरूपतोजीवत्वपरिणाम,भावरूपज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्यआदि अनन्तगुणपरिणाम। वे दोनों परिणाम अध्यात्मरूप जानना.
आगम अध्यात्म दोनों पद्धतियोंमें अनन्तता माननी. अनन्तता कही उसका विचार
अनन्तता का स्वरूप ¹ष्टान्त द्वारा बतलाते हैं. जैसे वटवृक्षका एक बीज हाथमें लेकर उसका विचार दीर्घ¹ष्िटसे करें तो उस वटके बीज में एक वटका वृक्ष है। यह वृक्ष जैसाकुछ भावी काल में होनहार है वैसे विस्तारसहित विद्यमान उसमें वास्तवरूप मौजूद है, अनेक शाखा-प्रशाखा, पत्र, पुष्प, फल संयुक्त है. फल-फलमें अनेक बीज होते हैं.
इसप्रकार की अवस्था एक वटके बीज सम्बन्धी विचारें. और भी सूक्ष्म¹ष्िट दें तो जो-जो बीज उस वटवृक्षमें हैं वे-वे अंतर्गर्भित वटवृक्ष संयुक्त होते हैं. इसी भाँति एक वटमें अनेक-अनेक बीज, एक-एक बीजमें एक-एक वट, उसका विचार करें तो भाविनयप्रमाणसे न वटवृक्षोंकी मर्यादा पाई जाती है, न बीजोंकी मर्यादा पाई जाती है.
इसी प्रकार अनन्तताका स्वरूप जानना.
उस अनन्तताके स्वरूपको केवलज्ञानी पुरूष भी अनन्तही देखते-जानते-कहते हैैं। अनन्तका दूसरा अंत है ही नहीं जो ज्ञानमें भाषित हो. इसलिये अनन्तता अनन्तरूप ही प्रतिभासित होती है.
इसप्रकार आगम-अध्यात्मकी अनन्तता जानना.
उसमें विशेष इतना कि अध्यात्मका स्वरूप अनन्त, आगमका स्वरूप अनन्तानन्तरूप, यथापना-प्रमाणसे अध्यात्म एक द्रव्याश्रित, आगम अनन्तानन्त पुद्गलद्रव्याश्रित.
इन दोनोंका स्वरूप सर्वथा प्रकार तो केवलज्ञानगोचर है, अंशमात्र मति-श्रुतज्ञान ग्राह्य है, इसलिये सर्वथाप्रकार आगमी अध्यात्मी तो केवली, अंशमात्र मतिश्रुतज्ञानी, देशमात्र ज्ञाता अवधिज्ञानी मन:पर्ययज्ञानी। यह तीनों यथावस्थित ज्ञानप्रमाण न्यूनाधिकरूप जानना.
मिथ्या¹ष्िट जीव न आगमी न अध्यात्मी है. क्तयों? इसलिये कि कथन मात्र तो ग्रन्थपाठके बल से आगम-अध्यात्मका स्वरूप उपदेश मात्र कहता है, परन्तु आगमअध्यात्म कास्वरूपसम्यक्प्रकारसेनहींजानता।इसलियेमूढजीवनआगमीनअध्यात्मी, निर्वेदकत्वात्. अब मूढ तथा ज्ञानी जीवका विशेषपना और भी सुनो :-
ज्ञाता तो मोक्षमार्ग साधना जानता है, मूढ मोक्षमार्ग को साधना नहीं जानता.
क्तयों? - इसलिये सुनों मूढ जीव आगम पद्धति को व्यवहार कहता है, अध्यात्म पद्धतिको निश्चय कहता है। इसलिये आगम-अंगको एकान्तपने साधकर मोक्षमार्ग दिखलाता है, अध्यात्म-अंगको व्यवहार से नहीं जानता - यह मूढ¹ष्िटका स्वभाव है। उसे इसी प्रकार सूझता है.
क्तयों? - इसलिये कि आगम-अंग बाह्यक्रियारूप प्रत्यक्ष प्रमाण है, उसका स्वरूप साधना सुगम. वह बाह्यक्रिया करता हुआ मूढ जीव अपनेको मोक्षका अधिकारी मानता है। अन्तर्गर्भित जो अध्यात्मरूप क्रिया वह अन्र्त¹ष्िटग्राह्य है, वह क्रिया मूढ जीव नहीं जानता. अन्र्त¹ष्िटके अभावसे अन्तर्क्रिया ¹ष्िटगोचर नहीं होती, इसलिये मिथ्या¹ष्िट जीव मोक्षमार्ग साधनेमें असमर्थ है. अब सम्यग्¹ष्िटका विचार सुनो :-
साम्यग्¹ष्िट कौन है सो सुनो - संशय, विमोह, विभ्रम - ये तीन भाव जिसमें नहीं सो सम्यग्¹ष्िट.
संशय, विमोह, विभ्रम क्तया है? उसका स्वरूप ¹ष्टान्त द्वारा दिखलाते हैं सो सुनो - जैसे चार पुरुष किसी एक स्थान में खडे़ थे. उन चारोंके पास आकर किसी और पुरुषने एक सीपका टुकड़ा दिखाया और प्रत्येक, प्रत्येकसे प्रश्न किया कि यह क्तया है? - सीप है या चाँदी है? प्रथम ही एक संशयवान पुरुष बोला - कुछ सुध(समझ)नहीं पड़ती कि यह सीप है या चाँदी है? मेरी ¹ष्िटमें इसका निरधार नहीं होता. दूसरा विमोहवान पुरुष बोला - मुझे यह कुछ समझ नहीं है कि तुम सीप किससे कहते हो, चाँदी किससे कहते हो? मेरी ¹ष्िटमें कुछ नहीं आता, इसलिये हम नहीं जानते कि तू क्तया कहता है. अथवा चुप हो रहता है बोलता नहीं गहलरूपसे. तीसरा विभ्रमवाला पुरुष भी बोला की यह तो प्रत्यक्षप्रमाण चाँदी है , इसे सीप कौन कहेगा? मेरी ¹ष्िटमें तो चाँदी सुझती है इसलिये सर्वथा प्रकार यह चाँदी है। - इसप्रकार तीनों पुरुषोने तो उस सीप का स्वरूप जाना नहीं इसलिये तीनों मिथ्यात्वादी हैं. अब चौथा पुरुष बोला यह तो प्रत्यक्षप्रमाण सीपका टुकड़ा है, इसमें क्तया धोखा? सीप सीप सीप, निरधार सीप, इसको जो कोई और वस्तु कहे वह प्रत्यक्षप्रमाण भ्रामक अथवा अंध. उसी प्रकार सम्यग्¹ष्िटको स्व-पर स्वरूप में न संशय, न विमोह, न विभ्रम, यथार्थ ¹ष्िट है। इसलिये सम्यग्¹ष्िट जीव अंर्त¹ष्िटसे मोक्षपद्धति को साधना जानता है. बाह्यभाव बाह्यनिमित्तरूप मानता है, वह निमित्त नानारूप है, एकरूप नहीं है. अंर्त¹ष्िटके प्रमाणमेंे मोक्षमार्गसाधे और सम्यग्ज्ञान स्वरूपाचरणकी कणिका जागने पर मोक्षमार्ग सच्चा.
म्ोक्षमार्ग को साधना यह व्यवहार, शुद्धद्रव्य अक्रियारूप सो निश्चय. इसप्रकार निश्चय-व्यवहार का स्वरूप सम्यग्¹ष्िट जानता है, मूढ़ जीव न जानता है, न मानता है. मूढ़ जीव बन्धपद्धति को साध कर मोक्ष कहता है, वह बात ज्ञाता नहीं मानते.
क्तयों? इसलिये कि बन्ध के साधने से बन्ध सधता है, मोक्ष नहीं सधता. ज्ञाता जब कदाचित् बन्ध पद्धति का विचार करता है तब जानता है कि इस पद्धति से मेरा द्रव्य अनादिका बन्धरूप चला आया है। अब इस पद्धति से मोह तोड़कर प्रवर्त। इस पद्धति का राग पूर्व की भाँति हे नर किसलिये करते हो? क्षणमात्र भी बन्धपद्धति में मग्न नहीं होता वह ज्ञाता अपने स्वरूप को विचारता है, अनुभव करता है, ध्याता है, गाता है, श्रवण करता है, नवधाभक्ति, तप, क्रिया, अपने शुद्धस्वरूपके सन्मुख होकर करता है. यह ज्ञाता का आचार इसी का नाम मिश्र व्यवहार . अब हेय-ज्ञेय-उपादेय ज्ञाताकी चाल उसका विचार लिखते हैंं :-
हेेय - त्यागरूप तो अपने द्रव्य की अशुद्धता। ज्ञेय - विचाररूप अन्य षट्द्रव्योंका स्वरूप। उपादेय-आचरणरूप अपने द्रव्यकी शुद्धता। उसका विवरण - गुणस्थान प्रमाण हेय-ज्ञेय-उपादेयकी शक्ति ज्ञाता की होती है. ज्यों-ज्यों ज्ञाता की हेय-ज्ञेय-उपादेयरूप शक्ति वर्धमान हो त्यों-त्यों गुणस्थानकी बढ़वारी कही है.
गुणस्थानप्रमाण ज्ञान, गुणस्थानप्रमाण क्रिया. उसमें विशेष इतना कि एक गुणस्थान वर्ती अनेकजीव हों तो अनेकरूप का ज्ञान कहा जाता है, अनेकरूप की क्रिया कही जाती है. भिन्न-भिन्न सत्ता के प्रमाण से एकता नहीं मिलती. एक-एक जीवद्रव्यमें अन्य-अन्यरूप औदयिकभाव होते है, उन औदयिक भावानुसार ज्ञानकी अन्य-अन्यता जानना.
परन्तुविशेषइतनाकिकिसीजातीकाज्ञानऐसानहींहोताकि परसत्तावलंबनशीली होकर मोक्षमार्ग सााक्षात् कहे. क्तयों? अवस्था-प्रमाण परसत्तावलंबक है. (परन्तु)परसत्तावलंबी ज्ञान को परमार्थता नहीं कहता .
जो ज्ञान हो वह स्वसत्तावलंबनशील होता है, उसका नाम ज्ञान. उस ज्ञान को सहकारभूत निमित्तरूप नानाप्रकार के औदयिक भाव होते हैं, उन औदयिकभावोंका ज्ञाता तमाशगीर है, न कर्त्ता, न भोक्ता, न अवलम्बी है। इसलिये कोई ऐसा कहे कि इसप्रकार के औदयिकभाव सर्वथा होतो फलाना गुणस्थान कहा जाये तो झूठ है. उन्होंने द्रव्यका स्वरूप सर्वथा प्रकार नहीं जाना है.
क्तयों?इसलियेकिऔरगुणस्थानोंकीकौनबातचलाये?केवलीकेभी औदयिकभावोंकी नानाप्रकारता जानना. केवलीके भी औदयिकभाव एक-से नहीं होते. किसी केवली को दण्ड-कपाटरूप क्रिया का उदय होता है, किसी केवली को नहीं होता. जब केवलीमें भी उदय की नाना प्रकारता है तब और गुणस्थान की कौन बात चलाये?
इसलिये औदयिकभावोंके भरोसे ज्ञान नहींहै,ज्ञानस्वशक्तिप्रमाणहै.स्व-पर प्रकाशक ज्ञान की शक्ति, ज्ञायकप्रमाण ज्ञान, सवरूपाचरणरूप चारित्र यथानुभव प्रमाण - यह ज्ञाता का सामथ्र्यपना है.
इस बातोंका विवरण कहाँ तक लिखें, कहाँ तक कहें? वचनातीत, इन्द्रियातीत, ज्ञानातीत है, इसलिये यह विचार बहुत क्तया लिखें? जो ज्ञाता होगा वह थोड़ा ही लिखा बहुत करके समझेगा, जो अज्ञानी होगा वह यह चिट्ठी सुनेगा सही, परन्तु समझेगा नहीं. यह वचनिका ज्यों कि त्यों सुमतिप्रमाण केवलीवचनानुसारी है. जो इसे सुनेगा, समझेगा, श्रद्धेगा। उसे कल्याणकारी है - भाग्यप्रमाण.
इति परमार्थवचनिका.
परिशिष्ट ४

उपादान-निमित्तकी चिट्ठी

(कविवर पं० बनारसीदासजी लिखित)
प्रथम ही कोई पूछता है कि निमित्त क्तया, उपादान क्तया?
उसका विवरण - निमित्त तो संयोगरूप कारण, उपादान वस्तु की सहज शक्ति.
उसकाविवरण-एकद्रव्यार्थिकनिमित्त-उपादान,एकपर्यायार्थिकनिमित्त- उपादान.
उसका विवरण - द्रव्यार्थिक निमित्त-उपादान गुणभेदकल्पना, पर्यायार्थिक निमित्त- उपादान परयोगकल्पना. उसकी चौभंगी.
प्रथम ही गुणभेदकल्पना की चौभंगी का विस्तार कहता हूँ. सो किस प्रकार? इसप्रकार सुनो - जीवद्रव्य, उसके अनंत गुण, सब गुण असहाय स्वाधीन सदाकाल. उनमें दो गुण प्रधान-मुख्य स्थापित किये। उसपर चौभंगी का विचार -
एकतो जीव का ज्ञानगुण, दूसरा जीवका चारित्रगुण. ये दोनोंगुण शुद्धरूप भाव जानने, अशुद्धरूप भी जानने, यथायोग्य स्थानक मानने. उसका विवरण - इन दोनों कि गति न्यारी-न्यारी, शक्ति न्यारी-न्यारी, जाति न्यारी-न्यारी, सत्ता न्यारी-न्यारी.
उसका विवरण - ज्ञानगुण की तो ज्ञान-अज्ञानरूप गति, स्व-पर प्रकाशक शक्ति, ज्ञानरूप तथा मिथ्यारूप जाति, द्रव्यप्रमाण सत्ता। परन्तु एक विशेष इतना - कि ज्ञानरूप जाति का नाश नहीं है, मिथ्यात्वरूप जाति का नाश सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति होने पर। - यह तो ज्ञानगुण का निर्णय हुआ.
अब चारित्रगुणका विवरण कहते हैं - संक्तलेश विशुद्धरूप गति, थिरता-अस्थिरता शक्ति, मंद-तीव्ररूप जाति, द्रव्यप्रमाण सत्ता। परन्तु एक विशेष कि मन्दताकी स्थिति चौदहवें गुणस्थान पर्यंत है, तीव्रताकी स्थिति पाँचवें गुणस्थान पर्यंत है.
अब तो दोनोंका गुणभेद न्यारा-न्यारा किया. अब इनकी व्यवस्था - न ज्ञान चारित्र के आधीन है, न चारित्र ज्ञान के आधीन है। दोनों असहायरूप हैं. यह तो मर्यादाबंध है. अब, चौभंगी का विचार - ज्ञानगुण निमित्त, चारित्रगुण उपादानरूप, उसकाविवरण :-
एक तो अशुद्ध निमित्त, अशुद्ध उपादान। दूसरा अशुद्ध निमित्त, शुद्ध उपादान। तीसरा शुद्ध निमित्त, अशुद्ध उपादान। चौथा शुद्ध निमित्त, शुद्ध उपादान.
उसका विवरण - सूक्ष्म¹ष्िट देकर एक समयकी अवस्था द्रव्यकी लेना, समुच्चयरूप मिथ्यात्व-सम्यक्तत्व की बात नहीं चलाना. किसी समय जीव की अवस्था इस प्रकार होती है कि जानरूप ज्ञान, विशुद्ध चारित्र। किसी समय अजानरूप ज्ञान, विशुद्ध चारित्र। किसी समय जानरूप ज्ञान, संक्तलेशरूप चारित्र। किसी समय अजानरूप ज्ञान, संक्तलेश चारित्र। जिस समय अजानरूप गति ज्ञान की, संक्तलेशरूप गति चारित्रकी। उस समय निमित्त उपादान दोनों अशुद्ध. किसी समय अजानरूप ज्ञान, विशुद्धरूप चारित्र। उस समय अशुद्ध निमित्त, शुद्ध उपादान. किसी समय जानरूप ज्ञान, संक्तलेशरूप चारित्र। उस समय शुद्ध निमित्त, अशुद्ध उपादान. किसी समय जानरूप ज्ञान, विशुद्धरूप चारित्र। उस समय शुद्ध निमित्त, शुद्ध उपादान. इस प्रकार जीव की अन्य-अन्य दशा सदाकाल अनादिरूप है.
उसका विवरण - जानरूप ज्ञान की शुद्धता कही जाय, विशुद्धरूप चारित्र की शुद्धताकहीजाय।अज्ञानरूपज्ञानकीअशुद्धताकहीजाय,संक्तलेशरूपचारित्रकी अशुद्धता कही जाय.
अब उसका विचार सुनो :-
मिथ्यात्व अवस्थामें किसी समय जीव का ज्ञानगुण जानरूप होता है तब क्तया जानता है? ऐसा जानता है कि लक्ष्मी, पुत्र, कलत्र इत्यादि मुझसे न्यारे हैं। प्रत्यक्ष-प्रमाण। मैं मरूँगा, ये यहाँ ही रहेंगे - ऐसा जानता है. अथवा ये जायेंगे, मैं रहूँगा, किसी काल इसमें मेरा एक दिन वियोग है, ऐसा जानपना मिथ्या¹ष्िट को होता है सो तो शुद्धता कही जाय, परन्तु सम्यक् शुद्धता नहीं, गर्भित शुद्धता। जब वस्तुका स्वरूप जाने तब सम्यक्शुद्धता। वह ग्रन्थिभेद के बिना नहीं होती। परन्तु गर्भित शुद्धता सो भी अकाम निर्जरा है.
उसी जीवको किसी समय ज्ञानगुण अंजानरूप है गहलरूप, उससे केवल बंध है. इसीप्रकार मिथ्यात्व-अवस्था में किसी समय चारित्रगुण विशुद्धरूप है, इसलिये चारित्रावरण कर्म मन्द है, उस मन्दता से निर्जरा है. किसी समय चारित्रगुण संक्तलेशरूप है, इसलिये केवलतीव्रबंधहै.इसप्रकारमिथ्या-अवस्थामेंजिससमयजानरूपज्ञानहैऔर विशुद्धतारूप चारित्र है, उस समय निर्जरा है. जिस समय अजानरूप ज्ञान है, संक्तलेशरूप चारित्र है, उस समय बंध है.उसमें विशेष इतना कि अल्प निर्जरा बहुतबंध इसलिये मिथ्यात्व-अवस्था में केवल बंध कहा। अल्पकी अपेक्षा. जैसे किसी पुरुष को नफा थोड़ा टोटा बहुत, उस पुरुष को टोटावाला ही कहा जाय. परन्तु बन्ध-निर्जरा के बिना जीव किसी अवस्थामें नहीं है. ¹ष्टांत यह कि - विशुद्धता से निर्जरा न होती तो एकेन्द्रिय जीव निगोद अवस्था से व्यवहारराशिमें किसके बल आता, वहाँ तो ज्ञानगुण अजानरूप गहलरूप है - अबद्धरूप है, इसलिये ज्ञानगुणका तो बल नहीं है. विशुद्धरूप चारित्रके बल से जीव व्यवहार राशि में चढ़ता है, जीवद्रव्यमें कषाय की मन्दता होती है. उससे निर्जरा होती है. उसी मन्दता के प्रमाणमें शुद्धता जानना.
अब और भी विस्तार सुनो :-
जानपनाज्ञानकाऔरविशुद्धताचारित्रकी दोनोंमोक्षमार्गानुसारीहैं,इसलिये दोनोंमें विशुद्धता मानना। परन्तु विशेष इतना कि गर्भितशुद्धता प्रगट शुद्धता नहीं है. इन दोनों गुणों कि गर्भित शुद्धता जब तक ग्रन्थिभेद न हो तब तक मोक्षमार्ग नहीं साधती। परन्तु उध्र्वता को करे, अवश्य करे ही. इस दोनों गुणों कि गर्भितशुद्धता जब ग्रन्थिभेद होता है तब इस दोनोंकि शिखा फूटती है, तब दोनों गुण धाराप्रवाहरूप से मोक्षमार्गको चलते हैं। ज्ञानगुण की शुद्धता से ज्ञानगुण निर्मल होता है, चारित्रगुण की शुद्धता से चारित्र गुण निर्मल होता है. वह केवलज्ञान का अंकुर, वह यथाख्यातचारित्रका अंकुर.
यहाँ कोई प्रश्न करता है कि तुमने कहा कि ज्ञान का जानपना और चारित्र की विशुद्धता - दोनोंसे निर्जरा है। वहाँ ज्ञान का जानपना से निर्जरा, यह हमने माना। चारित्र की विशुद्धता से निर्जरा कैसे? यह हम नहीं समझे.
उसका समाधान :- सुन भैया विशुद्धता स्थिरतारूप परिणाम से कहते हैं। वह स्थिरता यथाख्यात का अंश है। इसलिये विशुद्धता में शुद्धता आयी.
वह प्रश्नकार बोला - तुमने विशुद्धता से निर्जरा कही. हम कहते हैं कि विशुद्धता से निर्जरा नहीं है, शुभबन्ध है.
उसका समाधान :- सुन भैया यह तो तू सच्चा। विशुद्धतासे शुभबन्ध, संक्तलेशतासे अशुभबन्ध, यह तो हमने भी माना, परन्तु और भेद इसमें हैं सो सुन -अशुभपद्धति अधोगति का परिणमन है, शुभपद्धति उध्र्वगतिका का परिणमन है। इसलिये अधोरूप संसार और उध्र्वरूप मोक्षस्थानपकड़(स्वीकार कर), शुद्धता उसमें आयी मान, मान, इसमें धोखा नहीं है। विशुद्धता सदाकाल मोक्षका मार्ग है, परन्तु ग्रन्थिभेद बिना शुद्धता का जोर नहीं चलता है न?
जैसे - कोई पुरुष नदी में डुबकी मारे, फिर जब उछले तब दैवयोग सेउस पुरुष के ऊपर नौका आ जाये तो यद्यपि वह तैराक पुरुष है तथापि किस भाँति निकले? उसका जोर नहीं चलता। बहुतकलबल करे परन्तु कुछ वश नहीं चलता। उसी प्रकार विशुद्धता की भी ऊध्र्वता जाननी. इसलिये गर्भित शुद्धता कही है. वह गर्भितशुद्धता ग्रन्थिभेद होने पर मोक्षमार्गको चली। अपने स्वभावसे वर्धमानरूप हुई तब पूर्ण यथाख्यात प्रगट कहा गया. विशुद्धता कि जो ऊध्र्वता वही उसकी शुद्धता.
औरसुन,जहाँमोक्षमार्गसाधावहाँकहाकि-— सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणिमोक्षमार्ग:और ऐसा भी कहा कि -—ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्ष:.
उसका विचार - चतुर्थ गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थानपर्यंत मोक्षमार्ग कहा। उसका विवरण - सम्यक्रूप ज्ञानधारा, विशुद्धरूप चारित्रधारा - दोनों धाराएँ मोक्षमार्ग को चलीं, वहाँ ज्ञानसे ज्ञान की शुद्धता, क्रिया से क्रियाकी शुद्धता है. यदि विशुद्धतामें शुद्धता है तो यथाख्यातरूप होती है. यदि विशुद्धतामें वह नहीं होती तो केवलीमें ज्ञानगुण शुद्ध होता, क्रिया अशुद्ध रहती। परन्तु ऐसा तो नहीं है. उसमें शुद्धता थी उससे विशुद्धता हुई है.
यहाँ कोई कहे कि ज्ञान की शुद्धता से क्रिया शुद्ध हुई सो ऐसा नहीं है. कोई गुण किसी गुण के सहारे नहीं है, सब असहायरूप हैं.
और भी सुन - यदि क्रिया पद्धति सर्वथा अशुद्ध होती है तो अशुद्धताकी इतनी शक्ति नहीं है मोक्षमार्गको चले, इसलिये विशुद्धतामें यथाख्यात का अंश है, इसलिये वह अंश क्रम-क्रमसे पूर्ण हुई.
हे भाई प्रश्नवाले, तूने विशुद्धतामें शुद्धता मानी या नहीं? यदि तूने वह मानी, तो कुछ और कहने का काम नहीं। यदि तूने नहीं मानी तो तेरा द्रव्य इसीप्रकार परिणत हुआ है हम क्तया करें? यदि मानी तो शाबाश
यह द्रव्यार्थिककी चौभंगी पूर्ण हुई. निमित्त-उपादान शुद्धशुद्धरूप विचार :-
अब पर्यायार्थिक की चौभंगी सुनो - एक तो वक्ता अज्ञानी, श्रोता भी अज्ञानी। वहाँ तो निमित्त भी अशुद्ध, उपादान भी अशुद्ध. दूसरा वक्ता अज्ञानी, श्रोता ज्ञानी। वहाँ निमित्त अशुद्ध और उपादान शुद्ध. तीसरा वक्ता ज्ञानी, श्रोता अज्ञानी। वहाँ निमित्त शुद्ध और उपादान अशुद्ध. चौथा वक्ता ज्ञानी, श्रोता भी ज्ञानी। वहाँ तो निमित्त भी शुद्ध, उपादान भी शुद्ध.
यह पर्यायार्थिककी चौभंगी सिद्ध की.
इति निमित्त-उपादान शुद्धाशुद्धरूप विचार वचनिका.
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